भाजपा की गुटबाजी संघ का सिरदर्द

नितिन गडकरी को भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाने के पीछे संघ की दलील यह है कि पार्टी के सभी मौजूदा राष्ट्रीय नेता गुटबाजी में शामिल हैं। हालांकि राजनाथ सिंह को जब पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था तब वह गुटबाजी की राजनीति का शिकार नहीं थे। लेकिन उनके चार साल के कार्यकाल में पार्टी भयंकर रूप से गुटबाजी की शिकार हुई है। इस गुटबाजी का पहला कारण यह था कि राजनाथ सिंह ने पार्टी के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी को साथ लेकर चलने की जहमत नहीं उठाई। संघ ने क्योंकि लालकृष्ण आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने की मुहिम छेड़ी थी इसलिए राजनाथ सिंह यह मानकर चल रहे होंगे कि संघ लालकृष्ण आडवाणी को पसंद नहीं करता। राजनाथ सिंह ने संघ की इच्छा मानकर आडवाणी की अनदेखी और उनके समर्थकों को प्रमुख पदों से हटाने की मुहिम छेड़ दी थी। राजनाथ सिंह यहीं पर भूल कर गए, संघ अगर आडवाणी को इस हद तक नापसंद करता तो उन्हें विपक्ष का नेता भी नहीं रहने देता। मुझे याद है राजनाथ सिंह को अध्यक्ष बनाने का फैसला हो गया था और उस का ऐलान भाजपा के मुंबई अधिवेशन के समापन पर होना था। तब अधिवेशन के लिए दिल्ली से मुंबई जाते हुए आडवाणी के घोर विरोधी मुरली मनोहर जोशी ने शिगूफा छोड़ा था कि वह लोकसभा में विपक्ष के नेता भी नहीं रहेंगे। उनका तर्क था कि जब संघ ने वाजपेयी और आडवाणी दोनों को उनकी उम्र को आधार बनाकर पद छोड़ने का दबाव बनाया है तो वह विपक्ष के नेता पद पर भी कैसे रहेंगे। लेकिन मुरली मनोहर जोशी के समझने में चूक हो गई, इसीलिए मुंबई जाकर उन्हें अपने कहे से पीछे हटना पड़ा। लालकृष्ण आडवाणी पूरे पांच साल विपक्ष के नेता भी बने रहे और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी घोषित हुए। भाजपा संसदीय बोर्ड की ओर से आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने पर उन्हीं मुरली मनोहर जोशी ने भाजपा मुख्यालय में आडवाणी के मुंह में बर्फी डालकर अपनी झेंप मिटाई थी। इस मौके पर आडवाणी को मिठाई खिलाने वाले दूसरे नेता जसवंत सिंह भी मौजूद थे, जिन्होंने वाजपेयी के कार्यकाल में ही खुद को उनका उत्तराधिकारी बनने के लेख छपवाने शुरू कर दिए थे।

जो गलती आडवाणी के अध्यक्ष पद छोड़ने से पहले मुरली मनोहर जोशी ने की थी वहीं गलती राजनाथ सिंह ने अध्यक्ष पद संभालने के बाद शुरू कर दी थी। भाजपा कार्यकर्ताओं में सर्वाधिक लोकप्रिय नरेंद्र मोदी को संसदीय बोर्ड से हटाया जाना गुटबाजी की शुरुआत साबित हुआ। नरेंद्र मोदी को हटाए जाने की कोई वाजिब वजह भी नहीं थी। राजनाथ सिंह का यह तर्क तो किसी के गले नहीं उतरा था कि जब बाकी मुख्यमंत्री संसदीय बोर्ड में नहीं है, तो मोदी क्यों रहे। राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी को हटाकर अपना ही नुकसान किया। मोदी को हटाए जाने से राजनाथ सिंह पिछड़ा वर्ग विरोधी ठाकुर नेता के तौर पर स्थापित हो गए। राजनाथ सिंह का यह कदम आडवाणी विरोधी और संघ को खुश करने वाला भी माना गया क्योंकि उन दिनों संघ का एक प्रभावशाली गुट विश्व हिंदू परिषद के दबाव में मोदी के खिलाफ था। राजनाथ सिंह का दूसरा कदम अरुण जेतली को पार्टी प्रवक्ता पद से हटाने का था, यह कदम भी सीधे तौर पर आडवाणी गुट पर हमला माना गया। अपने शुरुआती कार्यकाल में ही राजनाथ सिंह ने अपनी छवि गुटबाजी को बढ़ावा देने वाले अध्यक्ष के तौर पर बना ली थी। जो उसके कार्यकाल खत्म होने तक बनी रही। कर्नाटक, उत्तराखंड और राजस्थान की गुटीय राजनीति में राष्ट्रीय अध्यक्ष का शामिल हो जाना उनके कार्यकाल का सबसे कमजोर पक्ष रहा। हालांकि कर्नाटक के मामले में राजनाथ सिंह का येदुरप्पा की पीठ पर हाथ रखना सही कदम था, क्योंकि अनंत कुमार के हाथ में नेतृत्व सौंप कर भाजपा कभी भी सत्ता में नहीं आ सकती थी। अनंत कुमार जाति से ब्राह्मण हैं और कर्नाटक की मौजूदा राजनीति में ब्राह्मणों के नेतृत्व में कोई पार्टी सत्ता तक नहीं पहुंच सकती। चुनावों में टिकट बंटवारे के समय येदुरप्पा और प्रदेश अध्यक्ष सदानंद गौड़ा के हाथ में कमान सौंपना राजनाथ सिंह का सही फैसला साबित हुआ, जबकि आडवाणी गुट हर फैसले में अनंत कुमार की सहमति चाहता था। लेकिन वही राजनाथ सिंह जब उत्तराखंड में बेदाग छवि वाले मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूरी के खिलाफ भगत सिंह कोशियारी को हवा दे रहे थे या राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को उखाड़ने की कोशिश करने वालों से जुड़ा दिखते थे तो गुटबाजी को हवा देते दिखाई देते थे। किसी भी राष्ट्रीय राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष को न सिर्फ निष्पक्ष रहना चाहिए, अलबत्ता निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए। मुझे याद है कि जब राजनाथ सिंह ने अपनी पहली टीम बनाई थी तो वह लालकृष्ण आडवाणी को दिखाने ले गए थे, लेकिन आडवाणी ने उसे देखने से इनकार कर दिया था क्योंकि वह पहले ही प्रैस में लीक हो गई थी। जब आडवाणी ने लिस्ट नहीं देखी, तो राजनाथ सिंह उसे उनके मेज पर छोड़ गए थे, ताकि बाद में देख लें।

सवाल यह है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का पहला प्रयोग विफल हो जाने के बाद दूसरा प्रयोग भी वैसा ही क्यों किया जा रहा है। राजनाथ सिंह भले ही पसंद पूर्व सरसंघ चालक के.एस. सुदर्शन की थे, लेकिन उन्हें चुना पार्टी ने ही था। अब नितिन गडकरी नए संघ प्रमुख मोहन भागवत की पसंद हैं, लेकिन उन्हें चुनेगी पार्टी ही। सवाल यह है कि संघ ऐसा क्यों कर रहा है, क्या ऊपर से अध्यक्ष लादा जाना भारतीय जनता पार्टी के हित में होगा। पूर्व का अनुभव बताता है कि यह नुकसानदायक साबित होगा। भले ही भाजपा संगठन की नकेल हमेशा से आरएसएस के हाथ में रही है लेकिन ऐसा पहले कभी नहीं होता था कि राष्ट्रीय अध्यक्ष का फैसला बिना राष्ट्रीय नेताओं से सलाह-मशविरा किए ही हो जाए। पार्टी के वरिष्ठ नेता जानते हैं कि के.एस. सुदर्शन ने राजनाथ सिंह के नाम पर फैसले से पहले पार्टी के सभी नेताओं को बुलाकर सुझाव मांगे थे। उन्हीं मे से राजनाथ सिंह का नाम उभरा था, जिस पर अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की भी सहमति हुई थी। सिर्फ कल्याण सिंह उन्हें अध्यक्ष बनाने के खिलाफ थे और संघ प्रमुख ने उन्हें भरोसे में लेने की जिम्मेदारी राजनाथ सिंह पर छोड़ी थी। झंडेवाला से निकलने के बाद राजनाथ सिंह ने वाजपेयी और आडवाणी का आशीर्वाद लिया था और कल्याण सिंह से फोन पर बात करके उन्हें उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री प्रोजैक्ट कर के चुनाव लड़ने का ऐलान किया था। इस तरह शुरुआत तो गुटबाजी से ऊपर उठकर हुई थी, लेकिन राजनाथ सिंह का कार्यकाल पार्टी की गुटबाजी के चरम पर पहुंचने के लिए याद किया जाएगा।

ऐसा लगता है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने 55 से 60 की उम्र और प्रादेशिक नेता को अध्यक्ष बनाने का फार्मूला पिछले अनुभव से सबक लेते हुए दिया था। पिछले दिनों कुछ पत्रकारों के साथ दोपहर भोज में मोहन भागवत ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने 55 से 60 तक उम्र का फार्मूला राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए नहीं, अलबत्ता राष्ट्रीय टीम की औसत उम्र रखने के लिए सुझाया था। इसलिए इस बार अगर 52 साल के नितिन गडकरी को पार्टी का अध्यक्ष बनाया जाता है तो अगला अध्यक्ष 60 से ऊपर उम्र का भी हो सकता है।  नितिन गडकरी को अघ्यक्ष बनाने के पीछे सबसे बड़ा तर्क पार्टी को सर्वोच्च स्तर पर व्याप्त गुटबाजी से निकालने की कोशिश है। भले ही नितिन गडकरी चारों बड़े राष्ट्रीय नेताओं वैंकैया नायडू, अरुण जेतली,  सुषमा स्वराज और अनंत कुमार से छोटे हैं। अलबत्ता भाजपा के सबसे ज्यादा लोकप्रिय मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से भी काफी छोटे हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यकाल क्योंकि तीन साल का होता है, इसलिए 2014 के लोकसभा चुनाव से करीब डेढ़ साल पहले नया अध्यक्ष चुना जाएगा। उस समय चुनावों से ठीक पहले अगर नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का फैसला करना पड़ा तो उम्र का फार्मूला बाधा नहीं बनेगा। सुषमा स्वराज और अरुण जेतली के विपक्ष का नेता बन जाने के बाद इन दोनों की तो संगठन में ज्यादा दिलचस्पी भी नहीं रहेगी। संघ मुख्यालय नागपुर निवासी नितिन गडकरी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के पीछे मुख्य तर्क यह है कि वह राष्ट्रीय नेताओं की गुटबाजी से पूरी तरह मुक्त हैं, भले ही उनका राष्ट्रीय कद नहीं है। पार्टी और संघ के सामने समस्या यह है कि राष्ट्रीय कद के सभी नेता गुटबाजी के शिकार हैं। दूसरे दर्जे के चारों ही राष्ट्रीय नेता लालकृष्ण आडवाणी के करीबी माने जाते हैं, उनमें से कोई भी अध्यक्ष बनता वह पूर्वाग्रही होए बिना नहीं रहता। इसलिए गुटबाजी और बढ़ाने का खतरा होता। नितिन गडकरी वैसे भी प्रमोद महाजन की तरह अच्छे संगठनकर्ता और जुगाड़ृ माने जाते हैं। उन्होंने विदर्भ में भाजपा को स्थापित करने में सफलता हासिल करके नेतृत्व देने की क्षमता का लोहा मनवाया है। आरएसएस ने नितिन गडकरी के नाम का सुझाव देते समय भले ही भाजपा के किसी गुट से सलाह-मशविरा नहीं किया। जिस कारण अंदर ही अंदर असंतोष व्याप्त है, लेकिन पार्टी को चलाने वाले संगठन मंत्रियों को भरोसे में लेकर किया गया फैसला है। नितिन गडकरी अध्यक्ष बनते हैं और अध्यक्ष बनने के बाद गुटबाजी से मुक्त रहते हैं तो पार्टी के गुटबाजी मुक्त होने की संभावना बढ़ जाएगी। निकट भविष्य में आडवाणी की जगह सुषमा स्वराज लोकसभा में विपक्ष की नेता बनती हैं तो पार्टी की नई तिकड़ी सुषमा, अरुण, गडकरी की होगी। लेकिन एक खतरा है पूरा नेतृत्व ब्राह्मणों के हाथ में होगा, तीनों ब्राह्मण हैं। तब नरेंद्र मोदी ही भविष्य का विकल्प बनेंगे।

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