केंद्र का इम्तिहान नहीं होते विधानसभा चुनाव

हरियाणा में विपक्ष कई हिस्सों में बंटा हुआ है, जिसका कांग्रेस को सीधा फायदा होगा। लेकिन महाराष्ट्र में ऐसी बात नही है। जहां  लोकसभा में सीटें बढ़ने के बावजूद विधानसभा क्षेत्रों में हारी है कांग्रेस। अरुणाचल में चीन की सीमा पर इंफ्रांस्टक्चर की कमी मुख्य चुनावी मुद्दा।

पंद्रहवीं लोकसभा का गठन हुए पांच महीने हो चले हैं। इस बीच हुए विभिन्न विधानसभाओं के उपचुनावों को यूपीए सरकार की लोकप्रियता में गिरावट का पैमाना नहीं माना जा सकता। इन उप चुनावों में मोटे तौर पर उन्हीं राजनीतिक दलों की जीत हुई, जिनकी उन राज्यों में सरकारें थी। यूपीए सरकार की लोकप्रियता या अलोकप्रियता का पैमाना राज्य विधानसभा चुनावों के नतीजों को भी नहीं माना जाना चाहिए। यूपीए के पिछले शासनकाल में हरियाणा और राजस्थान को छोड़कर कांग्रेस कहीं भी नहीं जीती थी। फिर भी लोकसभा चुनावों में 2004 से ज्यादा सीटें लेकर वापस आई। इसी तरह 2003 में राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में जीत के बावजूद भारतीय जनता पार्टी 2004 का लोकसभा चुनाव बुरी तरह हार गई थी। इसलिए अक्टूबर 2009 में होने वाले महाराष्ट्र, हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश विधानसभाओं के चुनावों को यूपीए सरकार की लोकप्रियता या अलोकप्रियता का पैमाना नहीं माना जाना चाहिए।

हरियाणा में कांग्रेस के दुबारा सत्ता में आने की संभावना हर हालत में पचास फीसदी से ज्यादा है। इसकी वजह लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के नतीजे भी हैं। दस में से नौ लोकसभा सीटें जीतकर मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपनी लोकप्रियता का सबूत दिया है। यही वजह है कि वहां वक्त से पहले विधानसभा चुनाव करवाए जा रहे हैं ताकि हालात खिलाफ होने से पहले ही मौजूदा माहौल को भुनाकर अगले पांच साल सत्ता सुरक्षित कर ली जाए। हरियाणा में कांग्रेस के लिए माहौल लोकसभा चुनाव से भी ज्यादा अनुकूल है। लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और इंडियन नेशनल लोकदल ने मिलकर चुनाव लड़ा था। पिछली लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी की एक सीट थी, लेकिन इनलोद से गठबंधन के बाद भाजपा ने वह भी खो दी। पांच साल पहले जब हरियाणा में इनलोद की सरकार थी तो मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला अलोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गए थे। इसका खामियाजा भारतीय जनता पार्टी को भी भुगतना पड़ा, क्योंकि वह सत्ता में उसकी भागीदार थी। भाजपा-इनलोद का गठबंधन टूटा था तो भाजपा कार्यकर्ताओं ने राहत की सांस ली थी, लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा आलाकमान ने फिर गलती की। उन्हीं ओमप्रकाश चौटाला से मिलकर चुनाव लड़ा, जिससे उसे 2004 में जीती एकमात्र सीट से भी हाथ धोना पड़ा। अब भाजपा किसी के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ रही, लेकिन उसकी साख खराब हो चुकी है। लोग यह मानकर चल रहे हैं कि त्रिशंकु विधानसभा आने पर भाजपा चौटाला को मुख्यमंत्री बनने में मदद करेगी। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी भाजपा की छवि कुछ ऐसी ही हो गई थी। लोग यह मानकर चल रहे थे कि त्रिशंकु विधानसभा आने पर भाजपा मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री बनने में मदद करेगी। जबकि उत्तर प्रदेश की जनता मुलायम सिंह के यादवी शासन से इतना त्रस्त आ चुकी थी कि उन्हें किसी भी हालत में दुबारा नहीं देखना चाहती थी। नतीजतन जनता ने मायावती को पूर्ण बहुमत देकर सत्ता में पहुंचा दिया। मुलायम और चौटाला की परिवारवादी, जातिवादी राजनीति ही नहीं, अलबत्ता भ्रष्टाचार भी इन दोनों नेताओं की लोकप्रियता में गिरावट का कारण बना। वैसे भी हरियाणा में इस बार पांच कोणीय चुनाव हो रहे हैं जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को होना चाहिए। सिर्फ एक दलित फैक्टर कांग्रेस के लिए नुकसानदायक हो सकता है क्योंकि मायावती ने राज्य में बसपा को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए सारी ताकत झोंक दी है। कांग्रेस को चौटाला, भजनलाल, मायावती के साथ भाजपा से भी मुकाबला करना है। इसके बावजूद उसका पलड़ा भारी है।

महाराष्ट्र में ऐसी स्थिति नहीं है। कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस दस साल से सत्ता में हैं, इसलिए सत्ता विरोधी रुझान भी देखने को मिल रहा है। महाराष्ट्र में वैसे भी गठबंधन सरकार की छवि उतनी अच्छी नहीं है। लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की सीटें बढ़ने से कांग्रेस की लोकप्रियता का अंदाज लगाना गलत होगा। कांग्रेस 2004 में 13 लोकसभा सीटें जीती थी लेकिन 2009 में उसे चार सीटों की बढ़ोत्तरी के साथ 17 सीटें मिली। जबकि उसकी साझेदार राष्ट्रवादी कांग्रेस को नौ की बजाए आठ सीटें मिली। वैसे गठबंधन की तीन सीटें बढ़ना कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस की लोकप्रियता का नतीजा दिखाई देता है, लेकिन ऐसा है नहीं। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के उम्मीदवारों की वजह से भाजपा-शिवसेना को नुकसान उठाना पड़ा था। राज ठाकरे ने जहां-जहां अपने उम्मीदवार खड़े किए वहां-वहां भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा। वह खुद तो कोई सीट नहीं जीते, लेकिन उन्होंने वोट कटवा की अहम भूमिका निभाकर कांग्रेस को फायदा पहुंचाया। यहां देखने वाली बात यह है कि लोकसभा में भाजपा-शिवसेना की पांच सीटें घटने के बावजूद उसकी लोकप्रियता में गिरावट की बजाए इजाफा हुआ। कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस की तीन सीटें बढ़ने के बावजूद उसकी लोकप्रियता में गिरावट हुई है। लोकसभा की 48 सीटों के 288 विधानसभा क्षेत्रों के नतीजों पर नजर दौड़ाएं तो पता चलेगा कि कांग्रेस को 81 सीटों पर बढ़त हासिल मिली थी, जबकि राष्ट्रवादी कांग्रेस को 50 सीटों पर ही बढ़त हासिल हुई। मौजूदा विधानसभा में इस समय खाली नौ सीटें भी जोड़ लें तो कांग्रेस के पास 79 और राष्ट्रवादी कांग्रेस के पास 69 सीटें थी। इसका मतलब हुआ कि 148 सीटों के मुकाबले गठबंधन को 131 सीटें मिली हैं जो महाराष्ट्र विधानसभा में बहुमत से 14 कम हैं। कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस को इस बार फिर राज ठाकरे से फायदा होगा क्योंकि वह सौ सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं, अगर लोकसभा चुनावों की तरह वोट कटवा साबित हुए तो भाजपा-शिवसेना के लिए पिछली बार की 118 सीटें बचा पाना भी मुश्किल होगा। वैसे भी नारायण राणे शिवसेना में काफी सेंध लगा चुके हैं। वह 2004 के चुनाव नतीजों के बाद अपने आठ विधायक खो चुकी हैं जो अब कांग्रेसी पाले में हैं। यही वजह है कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे अपने भतीजे पर लगातार प्रहार करते हुए उन्हें महाराष्ट्र का जिन्ना बता रहे हैं। जिन्ना ने देश का विभाजन करवा दिया था और राजठाकरे मराठी वोटरों में विभाजन करा रहे हैं। भाजपा-शिवसेना राजठाकरे को वोट देने से कांग्रेस को फायदे का प्रचार करके राजठाकरे की ताकत घटाने की कोई कसर नहीं छोड़ रही। कांग्रेस-राकांपा को राजठाकरे का सहारा है, लेकिन लोकसभा चुनाव की तरह विधानसभा चुनाव में भी वह उतने वोट कटवा साबित होंगे, इसमें संदेह है। दूसरी तरफ कांग्रेस को परंपरागत सेक्युलर वोटों के बंटवारे का नुकसान भी उठाना पड़ेगा। वामपंथी दलों, सेक्युलर जनता दल और महाराष्ट्र के दलित वोटरों की परंपरागत रिपब्लिकन पार्टी ने मिलकर चौथा मोर्चा खोल लिया है, जो कांग्रेस-राकांपा गठबंधन को तगड़ा नुकसान पहुंचाएगा। करीब चार फीसदी वोटों वाली रिपब्लिकन पार्टी पहले कांग्रेस-राकांपा के साथ थी। वैसे भी महाराष्ट्र में कांग्रेस-राकांपा गठबंधन की सड़कों की खस्ता हालत, पानी की कमी से फसलों की बर्बादी, बिजली की कमी जैसी समस्याओं को झेलना पड़ रहा है। कर्जो के बोझ से दबे किसानों की आत्म हत्याएं थम नहीं रहीं, खाद्य पदार्थों और अन्य कृषि पदार्थों का उत्पादन गिर गया है। शहरी समस्याएं मुंह बाएं खड़ी हैं, महाराष्ट्र देश का ऐसा राज्य बन गया है जिसमें शहरी गरीबों की तादाद सर्वाधिक हो गई है।

अरुणाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले चीन की ओर से सीमा पर बढ़ी गतिविधियां बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है। अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने शासनककाल में सिक्किम समस्या का तो स्थाई समाधान कर लिया था, लेकिन अरुणाचल प्रदेश अभी भी चीन की आंख की किरकिरी बना हुआ है। अरुणाचल में विकास इस बार बड़ा मुद्दा बना है। दो साल पहले प्रधानमंत्री ने वायदा किया था कि अरुणाचल में उसी तरह सड़कों का जाल बिछाया जाएगा, जैसा सीमा पार चीनी कब्जे वाले तिब्बत में फैला हुआ है। चीनी हरकतों के बाद अब इंफ्रास्टक्चर की जरूरत भी बढ़ गई है, इसलिए मनमोहन सिंह जल्द वादा निभाने का चुनावी आश्वासन दे रहे हैं। चीनी दूतावास अरुणाचल के नागरिकों को वीजा नहीं देता था लेकिन अरुणाचल में प्रस्तावित तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा की प्रस्तावित यात्रा के बाद भारत पर दबाव बढ़ाने के लिए उसने नई चाल चली है। अब चीन ने भारत के जम्मू कश्मीर राज्य को विवादास्पद घोषित करने के लिए वहां के नागरिकों को भारतीय पासपोर्ट पर वीजा देने की बजाए अलग से कागज पर वीजा की मोहर लगाकर देना शुरू कर दिया है।

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