सेना का आधुनिकीकरण रोकने की साजिश

जॉर्ज फर्नाडिज के खिलाफ दायर एफआईआर के गुण दोष पर कुछ ज्यादा कहने की जरूरत नहीं। ऐसा मानने वालों की कमी नहीं, जो जॉर्ज फर्नाडिज को भ्रष्ट मानते हैं, लेकिन ऐसा मानने वालों की भी कमी नहीं, जो उन्हें जुझारू और सच्चा देश भक्त मानते हैं और इस केस को पूरी तरह राजनीति से प्रेरित समझते है। डीआरडीओ की आपत्ति को जॉर्ज के खिलाफ एफआईआर का मुख्य आधार बनाया गया है। कहा गया है कि डीआरडीओ के तत्कालीन अध्यक्ष अबदुल कलाम ने राजग सरकार को यह कहते हुए बराक मिसाइल खरीदने से रोका था कि एक तो वह पूरी तरह सक्षम नहीं है और दूसरा डीआरडीओ जल्द ही त्रिशूल बनाकर सेना को सौंप देगा। लेकिन डीआरडीओ की रिकॉर्ड कितना खराब है, यह अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पहले वायुसेना को दशक के इंतजार के बाद 'आकाश' की जगह विदेशी टेक्नोलॉजी हासिल करनी पड़ी और वह अब तक भी 'त्रिशूल' सेना के हवाले नहीं कर सका। त्रिशूल और आकाश का सेना पिछले बीस साल से इंतजार कर रही है, डीआरडीओ के भरोसे सेना का आधुनिकीकरण आने वाले सौ साल तक नहीं होगा। मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि झूठ की बुनियाद पर खडा यह केस धराशायी हो जाएगा। इसके बावजूद कि सीबीआई ने जॉर्ज फर्नांडिज के एक पुराने घरेलू वफादार को जॉर्ज के खिलाफ मोहरे के तौर पर इस्तेमाल किया है। मीडिया के कुछ जाने पहचाने जॉर्ज फर्नांडिज विरोधी चेहरों को छोड़ दे तो मोटे तौर पर देश भर के मीडिया ने इस केस को राजनीतिक विद्वेष का माना है। आमतौर पर कांग्रेस के समर्थक माने जाने वाले अखबारों के संपादकीय भी सीबीआई के रवैये की आलोचना करने को मजबूर हुए। एक कांग्रेसी सांसद के अखबार ने तो अपने संपादकीय में यहां तक लिखा कि सीबीआई 1150 करोड़ के सौदे में सिर्फ दो करोड़ रूपए की रिश्वत बताकर अपनी पोल खुद खोल रही है। अखबार की यह भी आपत्ति है कि दो करोड़ की रिश्वत की जांच पर बीसियों करोड़ खर्च करने का फैसला निश्चित रूप से राजनीति से प्रेरित ही है। जैसा मैंने पहले लिखा, मैं केस के गुण दोष पर नहीं जाऊंगा, लेकिन यूपीए सरकार की ओर से अब तक जॉर्ज फर्नांडिज के खिलाफ एफआईआर दर्ज न करना जरूर आश्चर्यचकित कर रहा था। जिस तरह उन्होंने पिछले चालीस साल से कांग्रेस की नीतियों की लगातार आलोचना की और पहले बोफार्स सौदे और बाद में सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को उठाते रहे, उससे उनके खिलाफ कोई न कोई संगीन एफआईआर दर्ज किया जाना संभावित ही था। लेकिन यहां जरूरी है यह सोचना कि इससे देश और सेना की तैयारियों पर क्या असर पड़ेगा। मनमोहन सिंह जब वित्त मंत्री थे, तो उन्होंने रक्षा बजट घटा दिया था, अब उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही फिर वही खेल शुरू कर दिया है। हालांकि प्रणब मुखर्जी ने जॉर्ज फर्नांडिज की ओर से सेना के आधुनिकीकरण की योजना को आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है और उन्होंने हाल ही में अवाक्स जैसे कुछ बड़े सौदें भी किए हैं। लेकिन जिस तरह न चाहते हुए भी प्रणब मुखर्जी को राजग कार्यकाल के सारे रक्षा सौदें सीबीआई को सौंपने पड़े और अब जॉर्ज फर्नांडिज और तत्कालीन नौसेना अध्यक्ष सुशील कुमार के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है, तो वह मंत्रालय छोड़ना चाहते है। मनमोहन सिंह अगर अपने मंत्रिमंडल के फेरबदल में प्रणब मुखर्जी से रक्षा मंत्रालय ले लें, तो वह राहत महसूस करेंगे। राजनीतिक विद्वेष की कोई सीमा नहीं होती, लेकिन इस घटनाक्रम से सबसे ज्यादा नुकसान सेना के आधुनिकीकरण का होगा। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल विनय शंकर कारगिल युद्ध के समय गोला बारूद विभाग के महानिदेशक थे, उनका मानना है कि यह प्रवृत्ति बंद होनी चाहिए, क्योंकि इससे सेना का आधुनिकीकरण प्रभावित होगा। राजनीतिक आधार पर पूर्व रक्षा मंत्रियों और सेनाध्यक्षों के खिलाफ मुकदमें दायर करने के बजाय हथियारों की खरीद को पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। हालांकि प्रणब मुखर्जी ने हाल ही में हथियारों की खरीद की जो नई नीति घोषित की है, उसके मुताबिक ट्रायल के बाद मौके पर ही यह तय कर लिया जाएगा कि कौन सा उपकरण पास हुआ। लेकिन रिश्वतखोरी की बीमारी उसके बाद ही शुरू होती है, जब मामला 'प्राइस नेगोशिएशन' कमेटी के पास जाता है, हर तरह का दबाव तभी शुरू होता है। पारदर्शिता अपनाना कोई मुश्किल काम नहीं है, क्यों नहीं ऐसा कर लिया जाता कि किसी भी उपकरण का टेंडर बुलाए जाने के बाद ही 'प्राइस नेगाशिएट' कर लिया जाए और बाद में ट्रायल किया जाए। ट्रायल में जिस कंपनी और देश का उपकरण उम्दा साबित हो, उसे पहले से तय कीमत पर खरीदने का सैद्धांतिक फैसला उसी समय हो जाए। इसके साथ ही जिन कंपनियों और देशों के उपकरण तय मापदंड से कम पाए जाएं, उन्हें यह बताया जाए कि उनके उपकरण में क्या-क्या कमियां हैं। वाजपेयी सरकार ने पारदर्शिता के लिए एक और कदम उठाया था, उन्होंने सप्लायर कंपनियों को रजिस्टर्ड करने और कमीशन को कानूनी तौर पर लागू करने का एलान किया था, लेकिन यूपीए सरकार ने आते ही इस नीति को खारिज कर दिया और परदे के पीछे से लेन-देन का चक्कर फिर शुरू हो गया, जो हाल ही में स्कॉर्पियन डील में साफ हो चुका है। यह याद रखना चाहिए कि देश में सबसे ज्यादा खरीदारी रक्षा मंत्रालय नहीं करता, अलबत्ता ओएनजीसी करता है और ओएनजीसी की खरीदारी में कमीशन को कानूनी मान्यता हासिल है। दुनियाभर की हथियारों की कंपनियां अपने हथियार बेचने के लिए हर हरबा इस्तेमाल करती है और भारत के राजनीतिज्ञ उसका फायदा उठाते रहे हैं। बोफोर्स सौदे की जांच को हालांकि यूपीए सरकार ने आते ही ब्रेक लगा दी, लेकिन तब तक यह साबित हो चुका था कि बोफोर्स खरीद में दलाली ली गई थी, इतना ही नहीं रिश्वत के खाते भी सील हो चुके थे। अब बोफार्स तोपों के बाद जो बराक मिसाइलों के साथ हुआ है, उससे सेना का आधुनिकीकरण रूकने की आशंका पैदा हो गई है। बोफार्स तोपों की जांच के बाद सेना को नई खेप नहीं मिली और उसके स्पेयर पाट्र्स भी नहीं मिले। एचडीडबलयू विवाद के बाद पनडुबबी बनाने की टेक्नोलॉजी हासिल करना भी खटाई में पड़ गया। नतीजा यह निकला कि इस मामले में हम ब्राजील और तुर्की जैसे छोटे देशों से भी पिछड़ गए। फिर डेनेल तोप का भी वही हश्र हुआ और अब बराक मिसाइल और कारसनोपोल के गोलों का आयात रूक जाएगा। अगर हम दुनिया की हथियार बनाने वाली कंपनियों को अपनी घरेलू राजनीति के लिए बदनाम करते रहेंगे, तो हम हथियार कहां से खरीदेंगे। अपनी घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के कारण वामपंथी दलों ने इजरायल की आईएआई को बलैकलिस्ट करने की मांग कर दी है। शायद लोगों को यह पता नहीं कि यह प्राइवेट कंपनी नहीं, अलबत्ता यह इजरायल की सरकारी कंपनी है और हमने उससे सिर्फ बराक मिसाइलें नहीं ली, अलबत्ता सुधरी हुई किस्म की बराक-2 बनाने के लिए डीआरडीओ के साथ समझौता भी किया है। हमने आईएआई से अवाक्स जैसी प्रणाली का सौदा भी किया है, जिसे हासिल करने के बाद भारत दुनिया की तीसरी सैन्य ताकत बन जाएगा। पहले ही बहुत नुकसान हो चुका है और अगर हथियारों की खरीद पर राजनीति बंद न हुई तो भारतीय फौज आधुनिकीकरण में बहुत पिछड़ जाएगी।

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