जाहिर होने लगा एटमी करार का सच

ईरान-पाक-भारत गैस पाइप लाईन को रद्द करने का अमेरिकी मकसद पूरा होता दिखाई दे रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय पाइप लाईन को घाटे का सौदा बताकर खारिज करने के पक्ष में है। यही था अमेरिका का मकसद।

अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री बनने के पौने दो महीने बाद ही 11 मई 1998 को अपने घर पर जल्दबाजी में बुलाई एक प्रेस कांफ्रेंस में देश के परमाणु शक्ति संपन्न हो जाने का ऐलान किया था। उस समय हम कांग्रेस दफ्तर में थे और प्रेस कांफ्रेंस की जानकारी मिलते ही प्रधानमंत्री आवास सात रेस कोर्स की ओर दौड़े थे। वाजपेयी के लिए रखी कुर्सी के पीछे दोनों ओर राष्ट्रीय ध्वज लगाए गए थे। तब तक ऐसा मंच अमेरिकी राष्ट्रपति की प्रेस कांफ्रेंस में दिखाई देता था, जहां राष्ट्रपति के पीछे अमेरिका के दो बड़े ध्वज लगाए जाते थे। भारत के किसी प्रधानमंत्री की इस तरह की पहली प्रेस कांफ्रेंस थी, जिसमें वाजपेयी ने देश के परमाणु शक्ति संपन्न होने का ऐलान किया। तब यह बात समझ में आई कि अमेरिका की तरह राष्ट्रीय ध्वज क्यों लगाए गए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने वाजपेयी को बधाई दी थी कि वह खुद जो नहीं कर पाए थे, उसे उन्होंने कर दिया है। यह वाजपेयी सरकार की उपलब्धि नहीं थी, परमाणु परीक्षण की तैयारी तो नरसिंह राव के कार्यकाल में ही हो चुकी थी, लेकिन अमेरिकी दबाव में नहीं कर पाए थे। संसद में इस बात की बहस हो चुकी है कि उनके मंत्रिमंडल के किसी सदस्य ने ही परमाणु परीक्षण होने की बात अमेरिका को लीक कर दी थी।

नरसिंह राव भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंतित थे लेकिन वह इंदिरा गांधी की ओर से तय सीटीबीटी पर दस्तखत नहीं करने की नीति नहीं छोड़ना चाहते थे। अमेरिका के सामने घुटने टेक कर परमाणु ऊर्जा ईंधन हासिल करने की बजाए उन्होंने ऊर्जा ईंधन का दूसरा रास्ता चुनने का फैसला किया था। वह रास्ता था ईरान से गैस खरीदकर उसे पाकिस्तान के रास्ते से भारत लाने का। ईरान-पाक-भारत गैस पाईप लाईन का विचार सबसे पहले डाक्टर आरके पचौरी के दिमाग में 1989 में आया था। उन्होंने ईरान के उपप्रधानमंत्री अली शम्स अरदेकनी के साथ बातचीत करके रूपरेखा तैयार की और दोनों देशों की सरकारों को सौंप दी। नरसिंह राव ने प्रधानमंत्री बनने के बाद बात आगे बढ़ाई और उन्हीं के शासनकाल में 1993 में ईरान के साथ एमओयू पर दस्तखत हो गए। पाईप लाईन पाकिस्तान से होकर गुजरनी थी लेकिन ठीक उसी समय भारत-पाक में तनाव बढ़ गया और परियोजना ठंडे बस्ते में चली गई। अमेरिका को ईरान-पाक-भारत पाईप लाईन परियोजना कभी भी पसंद नहीं थी। क्योंकि यह पाईप लाईन पूरे क्षेत्र में विकास का मूल मंत्र बन सकती थी इसलिए 'शांति पाईप लाईन' मानी जाने लगी थी। ठीक उसी समय चीन अमेरिका के लिए प्रमुख खतरे के तौर पर उभर रहा था और ईरान-पाक-भारत पाईप लाईन का अगला पड़ाव चीन हो सकता था। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि गैस पाईप लाईन परियोजना को ठप्प करवाने के लिए भारत-पाक तनाव में अमेरिका की अहम भूमिका थी। ठीक उसी समय कश्मीर में बड़े पैमाने पर आतंकवादियों की घुसपैठ शुरू हो गई थी। अमेरिका अपनी रणनीति में कामयाब रहा और गैस पाईप लाईन ठंडे बस्ते में चली गई।

प्रधानमंत्री बनने के पौने दो महीने के बाद पांच परमाणु परीक्षण करने और देश को परमाणु शक्ति घोषित करने से अमेरिका की नाराजगी बढ़नी ही थी। भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए गए। लेकिन 1999 में वाजपेयी के दुबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद अमेरिका ने भारत को आगे बढ़ने से रोकने के लिए सीटीबीटी पर दस्तखत की बातचीत शुरू की। एक तरफ विदेशमंत्री जसवंत सिंह अमेरिकी राष्ट्रपति के दूत टालबोट से बातचीत कर रहे थे, तो दूसरी ओर वाजपेयी ने ठंडे बस्ते में पड़ी गैस पाईप लाईन पर फिर से बात शुरू करवा दी थी। वाजपेयी सरकार ने सीटीबीटी पर दस्तखत को सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट के साथ जोड़कर अमेरिका पर दबाव बढ़ा दिया था। उधर पाइप लाईन योजना ढीली पड़ गई क्योंकि कारगिल के बाद वाजपेयी सरकार का कोई भी मंत्री पाक को विश्वसनीय देश मानने को तैयार नहीं था। आखिर 2775 किलोमीटर की पाईप लाईन में से करीब 707 किलोमीटर पाईप लाईन तो पाकिस्तान में डाली जानी थी। उस पाईप लाईन की गारंटी कौन देगा। पाकिस्तान में जनून की हद तक भारत विरोध होने के कारण आतंकियों की ओर से पाईप लाईन को बार-बार काट देने की आशंका थी। जुलाई 2002 में जब ईरान के उपविदेश मंत्री हुसैन अदेली जब भारत आए और उन्होंने गैस पाईप लाईन पर बात की तो भारत ने उन्हें अपनी आशंका से अवगत करवा दिया था। संसद पर आतंकी हमला हो चुका था इसलिए वाजपेयी सरकार फूंक-फूंककर कदम रखना चाहती थी। वाजपेयी सरकार ने ईरान से गैस लेने के दूसरे विकल्प पर विचार शुरू किया। यह विकल्प था ईरान से समुद्र के रास्ते पाईप लाने का। यह रास्ता पाकिस्तान से गैस पाईप लाने से कई गुणा महंगा तो था लेकिन ज्यादा सुरक्षित था। जनवरी 2003 में जब ईरान के उपराष्ट्रपति मोहम्मद खातमी गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि के तौर पर भारत आए तो उन्होंने गैस पाईप लाईन पर प्रधानमंत्री वाजपेयी से बात की थी। वाजपेयी ने कहा था ईरान के पास गैस है और हमें जरूरत है, लेकिन रास्ते में कुछ रुकावटें हैं। वाजपेयी को डर था कि पाकिस्तान को मिलने वाली आठ सौ मिलियन डालर तक की ट्रांजिट फीस भारत के खिलाफ आतंकवाद फैलाने में इस्तेमाल की जाएगी और पाइप लाईन पर खतरा भी बना रहेगा। अब पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की ओर से आतंकवादियों को ट्रेनिंग देने की सरकारी नीति के कबूलिया बयान से वाजपेयी की आशंका सच साबित हो गई है। इसीलिए वाजपेयी सरकार जहां समुद्र के वैकल्पिक रूट पर विचार कर रही थी वहां उसने ईरान के सामने यह प्रस्ताव भी रखा था कि उसे बाड़मेर में भारत की सीमा पर गैस दी जाए, रास्ते की गारंटी ईरान खुद ले। ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा सचिव हसन रोहानी फरवरी 2004 में जब भारत आए तो इन दोनों विकल्पों पर उनकी भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार बृजेश मिश्र से चर्चा हुई थी।

ईरान से गैस लेने के लिए यही दोनों विकल्प ज्यादा कारगर हो सकते हैं, लेकिन मनमोहन सरकार ने दोनों विकल्प छोड़कर सीधे पाकिस्तान से ईरान-पाक-भारत गैस पाईप लाईन पर बातचीत शुरू कर दी। पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर ने इस परियोजना को अपने एजेंडे पर ले लिया था। चौबीस सितंबर 2004 को मनहट्टन में हुई पहली मनमोहन-मुशर्रफ मुलाकात में ही गैस पाईप लाईन के जरिए दोनों देशों में खुशहाली लाने की बात तय हुई। केबिनेट ने चार महीनों के भीतर 14 फरवरी 2005 को परियोजना को हरी झंडी दे दी। इससे खफा अमेरिकी राजदूत मेलफोर्ड ने उसी हफ्ते मणिशंकर अय्यर से मुलाकात कर अमेरिकी नाराजगी से अवगत करवाया। फरवरी और जुलाई में सिर्फ पांच महीनों का अंतर होता है, 18 जुलाई 2005 को मनमोहन और जार्ज बुश ने एटमी करार के संबंध में साझा बयान जारी कर दिया था। उसके छह महीने के भीतर पाईप लाइन के पैरोकार मंत्री मणिशंकर से पेट्रोलियम मंत्रालय छीन लिया गया था। यह आशंका उसी दिन से जाहिर की जा रही थी कि अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाकर और गैस पाईप लाइन परियोजना को रद्द करने की शर्त लगाकर प्रतिबंध ढीले करने का वादा किया है। यह तब भी जाहिर हो गया था जब भारत ने आईएईए में ईरान के खिलाफ वोट दिया था।

मनमोहन सिंह सरकार ने उस समय कहा था कि न तो गैस पाइप लाईन परियोजना रद्द करने की कोई शर्त रखी गई है और न ही करार के बदले में भारत को सीटीबीटी पर दस्तखत करने होंगे। मनमोहन सिंह ने न सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट पर दावा कमजोर किया अलबत्ता अब अमेरिका के नए राष्ट्रपति बोराक ओबामा ने सीटीबीटी पर दस्तखत का दबाव भी बनाना शुरू कर दिया है। विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने संसद में कहा था कि भारत अपनी विदेश नीति खुद तय करेगा, सौदे के पीछे कोई भी बात छिपी हुई नहीं है। पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा से बयान दिलाकर आशंकाओं को खारिज कर दिया गया था। एटमी करार सिरे चढ़ने के बाद अभी आठ महीने पहले दो नवंबर 2008 को प्रणव मुखर्जी ने तेहरान में कहा कि गैस पाईप लाईन और एटमी करार में कोई विरोधाभास नहीं है। भारत दोनों करारों से अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करेगा। लेकिन वास्तविकता  यह है कि मनमोहन सिंह ने एटमी करार कर कई हजार गुणा महंगा सौदा कबूल करके ईरान-पाक-भारत शांति पाईप लाईन प्रोजेक्ट को अपनी मौत मरने देने पर सहमति दे दी थी। चार साल की ना नुकर के बाद अब पेट्रोलियम मंत्रालय ने पाईप लाईन परियोजना को घाटे का सौदा करार देते हुए एक रिपोर्ट तैयार की है। मंत्रालय की दलील है कि ईरान गैस का ज्यादा भाव मांग रहा है, गैस पाइप लाईन सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है, जबकि इस बीच रिलायंस की कृष्णा-गोदावरी परियोजना शुरू हो जाने के बाद घरेलू उत्पादन भी बढ़ चुका है, लिहाजा शांति पाईप लाईन की कोई जरूरत नहीं।

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