भ्रष्टाचार और लोकतंत्र

राजनीतिक भ्रष्टाचार देश को कोढ़ की तरह खाए जा रहा है। कितनी ही बार राजनीतिज्ञों के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश हुआ। कई सुखरामों, जयललिताओं, मायावतियों के शयन कक्षों और बाथरूमों मे नोटों की प्लास्टिक के बैगों में भरी गड्डियां मिल चुकीं। कई लालू यादवों, ओम प्रकाश चौटालाओं के आमदनी से ज्यादा जायदाद के सबूत मिल चुके। लेकिन कभी किसी बड़े राजनीतिज्ञ को सजा होते नहीं दिखी। सबसे पहले जब किसी नेता का कोई घोटाला सामने आता है तो उस नेता की पार्टी और नेता खुद आरोपों को बेबुनियाद, बेसिरपैर के, झूठे कहकर खारिज करने की कोशिश करते हैं। बोफोर्स घोटाला सामने आया था तो राजीव गांधी ने उसे पूरी तरह खारिज कर दिया था। आज भी कांग्रेसी संसद में राजीव गांधी के पाक-साफ होने के सबूत के तौर पर उनका संसद में दिया गया बयान ही दोहराते हैं। हालांकि हर कोई जानता है कि बोफोर्स घोटाला हुआ था, दलाली का पैसा क्वात्रोची के जरिए कहां-कहां पहुंचा, इसे छुपाने के लिए कितने पापड़ नहीं बेले गए। अगर यह घोटाला न हुआ होता, अगर बोफोर्स तोप सौदों की खरीद में दलाली हासिल न की गई होती, तो क्वात्रोची को भारत छोड़कर जाने की क्या जरूरत थी। सबूतों के अभाव में भले ही कोई बरी हो जाए, आजकल भारतीय कानून व्यवस्था की हालत भी कौन नहीं जानता। न्यायपालिका की सबसे बड़ी विफलता यह है कि वह किसी बड़े राजनीतिज्ञ को सजा नहीं दे पाई। अगर बोफोर्स दलाली का पैसा लंदन के क्वात्रोची के बैंक खाते में नहीं था, तो मनमोहन सिंह को उस सील खाते को खुलवाने की क्या जल्दी पड़ी थी। विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज ने तब यह कहा था कि जब जांच एजेंसियां क्वात्रोची के खाते में रखे पैसे का दलाली से लिंक नहीं जोड़ पाई, तो कब तक खाता सील रह सकता था। उन्होंने यह भी कहा था कि यह सरकार का फैसला था। लेकिन जब राजनीतिक बवाल खड़ा हुआ तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सीबीआई पर दबाव डाला कि वह खाता खुलवाने की जिम्मेदारी ले। सीबीआई ने जिम्मेदारी लेते हुए कहा था कि उसका एक अधिकारी लंदन गया था और उसी ने खाता खुलवाया था। लेकिन इस मामले में जब सूचना के अधिकार के तहत अरुण जेतली ने सीबीआई से सारे सबूत मांगे तो सीबीआई ने पलटी खा ली है। अब सीबीआई ने कहा है कि उसने खाता खुलवाने का फैसला नहीं किया था, क्योंकि सीबीआई ने तो अभी जांच ही पूरी नहीं की। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी क्योंकि यह कहते हुए ठुकराई गई है कि अभी जांच पूरी नहीं हुई, इसलिए सारी जानकारी नहीं दी जा सकती, इसलिए यह पोल खुली है। बोफोर्स घोटाले को नकारने और छुपाने की जितनी मर्जी कोशिश की जाए, अदालतों के नकारा फैसलों की जितनी मर्जी दुहाई दी जाए, लेकिन बोफोर्स का भूत बार-बार उठ खड़ा होता है। अब उस समय के रक्षा राज्यमंत्री और राजीव गांधी के बाल सखा अरुण सिंह ने यह कहकर ठंडी कढ़ी में उबाल ला दिया है कि घोटाला तो हुआ था। अब पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह के मामले को ही लें। पिछले साल जब इराक के तेल के बदले अनाज घोटाले के संबंध में वोल्कर कमेटी की रिपोर्ट आई थी तो मनमोहन सिंह का बयान भी राजीव गांधी जैसा ही था। उन्होंने बिना किसी जांच के संयुक्त राष्ट्र जैसी दुनिया की सर्वोच्च संस्था की जांच को एक झटके में ही खारिज कर दिया और नटवर सिंह को क्लीन चिट दे दी। कांग्रेस ने नटवर सिंह और खुद पर लगे आरोपों को खारिज कर दिया, इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्र को कानूनी नोटिस देने की धमकी दी गई। लेकिन जब वोल्कर ने कांग्रेस को नोटिस देने की चुनौती दी, तो यूपीए सरकार और कांग्रेस की घिग्घी बंध गई। विपक्ष चाहता था कि जेपीसी गठित हो। लेकिन मनमोहन सिंह ने पहले वीरेंद्र दयाल को विशेष जांच अधिकारी नियुक्त किया और बाद में जस्टिस पाठक की रहनुमाई में एक जांच कमेटी बना दी। लगातार यह माना जा रहा था कि रिपोर्ट लीपापोती वाली होगी, क्योंकि नटवर सिंह पिछले नौ महीनों में खुद को नेहरू-इंदिरा परिवार का वफादार बताते हुए यह भी कहते रहे थे कि कांग्रेस उनके खून में है। लेकिन ठीक उन्हीं दिनों नजमा हेपतुल्ला ने मुझे एक बात कही थी कि सोनिया गांधी खुद को पाक-साफ साबित करने के लिए नटवर सिंह को बलि का बकरा बना देंगी। यह बात अब करीब-करीब सही होती लग रही है। हालांकि मैं इस बारे में पूरी तरह स्पष्ट नहीं हूं क्योंकि पाठक कमेटी की रपट में एक रास्ता खोलकर रखा गया है। यह रिपोर्ट ठीक उस समय में आई है जब मनमोहन सिंह सरकार अमेरिका के साथ किए गए परमाणु समझौते पर संकट में घिरी है। संकट को बढ़ाने के लिए नटवर सिंह अहम भूमिका निभा रहे हैं। अब यह नटवर सिंह को तय करना है कि वह बरी होना चाहते हैं या फंसना चाहते हैं। पाठक कमेटी की रपट ने दोनों रास्ते खोले हुए हैं। जहां एक तरफ यह कहा गया है कि नटवर सिंह और उनके बेटे जगत सिंह के काते मे मुनाफे के पैसे जमा नहीं हुए, वहां यह भी कहा गया है कि इन दोनों ने अपनी हैसियत का फायदा उठाते हुए सिफारिशी चिट्ठी लिखी, जिससे अंदलीब सहगल और आदित्य खन्ना को फायदा हुआ। जबकि रपट में सोनिया गांधी और कांग्रेस को पूरी तरह बरी किया गया है। रपट का लबोलुबाब यह है कि सद्दाम हुसैन की ओर से कांग्रेस के नाम पर दिए गए तेल के कूपनों को भी नटवर सिंह ने बेच खाया। अब एटीआर उसी तरह की बन सकती है, जिस तरह कि नटवर सिंह चाहेंगे। देश की राजनीतिक व्यवस्था का सबसे बड़ा खोट यही है कि न्यायाधीश भी नेताओं की इच्छा के मुताबिक द्विअर्थी फैसले लिखने लग जाते हैं। भ्रष्टाचार का पैसा लोकतंत्र की जड़ें खोद रहा है। चुनाव लड़कर जीतना अब भ्रष्टाचारियों और गुंडों के बस में ही रह गया है। आम आदमी न तो चुनाव लड़ने की हिम्मत कर सकता है, और न ही गुंडों और भ्रष्टाचारियों का मुकाबला कर सकता है। फिर भी यदा-कदा कहीं-कहीं किसी गरीब के चुनाव जीतने की खबर आती है। तो लोकतंत्र के जिंदा होने की खुशी महसूस होती है। हाल ही में आंध्र प्रदेश में एक भिखारिन 15 दिन तक रोजमर्रा का भीख मांगने का तरीका छोड़कर सिर्फ वोट की भीख मांगती रही और चौंकाने वाला नतीजा निकला। वह गांव की सरपंच बन गई। ऐसे उदाहरण देखकर लोकतंत्र के प्रति आस्था प्रकट होती है। वरना लोकतंत्र को कमजोर होता हर रोज देखा जा सकता है।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट