वी पी सिंह की सचाई

वीपी सिंह से इंटरव्यू के आधार पर लिखी गई रामबहादुर राय की किताब मार्केट में नहीं आई। मार्केट में आने से पहले ही किताब के परखचे उड़ गए। इसलिए किताब की भूमिका को उसके लेखक वरिष्ठ पत्रकार आदरणीय प्रभाष जोशी ने जनसता में छाप दिया है, ताकि लोग कम से कम भूमिका तो पढ़ सकें। दो टुकड़ों में छपी इस भूमिका में मांडा के राजा वीपी सिंह को राजनीति में साधु के तौर पर परिभाषित किया गया है। हालांकि पूरी किताब किसी के पढ़ने में नहीं आई, क्योंकि वह मार्केट में आई ही नहीं। टुकड़ों-टुकड़ों में जहां-जहां छपी, उसे ही पढ़ पाए हैं। उसी का एक टुकड़ा किताब की वह भूमिका भी माना जा सकता है, जो अब छप चुकी है। किताब के परखचे उड़ाने वालों में अटल बिहारी वाजपेयी, जसवंत सिंह, माखनलाल फोतेदार, अरुण नेहरू, लालू प्रसाद यादव, ज्ञानी जैल सिंह की बेटी गुरेंद्र कौर और मुलायम सिंह प्रमुख हैं। सोनिया गांधी के हवाले से भी इस बात का खंडन किया जा चुका है कि उन्होंने जान को खतरे के कारण प्रधानमंत्री बनने से इनकार किया था। इतने खंडनों के बावजूद किताब की भूमिका के लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने पहले वीपी सिंह की ओर से कही गई बातों को इतिहास के साक्षी के तौर पर पुष्टि में लेख लिखा और अब विवादों के कारण किताब के मार्केट में नहीं आने के कारण अपनी लिखी भूमिका को लेख के तौर पर छाप दिया। भूमिका में वीपी सिंह के हवाले से इस बात का जोरदार ढंग से खंडन किया गया है कि उन्होंने देवीलाल से डरकर मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की थी। लेकिन इतिहास की सचाई इसके ठीक उलट है कि देवीलाल ने जब मेहम कांड के कारण वीपी सिंह की सरकार से इस्तीफा दे दिया था तो रामविलास पासवान और शरद यादव उनके साथ जाने को तैयार खड़े थे। अपनी सरकार को गिरता देखकर वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया था। भले ही यह भी सच है कि वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद जनवरी 1990 में ही मंडल आयोग की सिफारिशों पर एक कमेटी बनाई थी। लेकिन इस कमेटी का श्रेय वीपी सिंह को देना और यह कहना कि वह पिछड़े वर्ग के लिए फरिश्ता बनकर आए थे, सचाई के साथ भयंकर छेड़छाड़ होगा, क्योंकि मंडल आयोग की सिफारिशों पर कमेटी वीपी सिंह के दिमाग की उपज नहीं अलबता देवीलाल, शरद यादव और रामविलास पासवान की मांग पर बनाई गई थी। किताब में यह भी साबित करने की कोशिश की गई है कि वीपी सिंह सता के भूखे नहीं थे। लेकिन अगर वह सता के भूखे न होते, तो राजनीति में इतनी उखाड़-पछाड़ करते ही नहीं। उन्होंने घोर वामपंथी दलों कम्युनिस्टों और घोर दक्षिणपंथी दल भाजपा के साथ मिलकर किसी तरह प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल करने की कोशिश की थी। अगर वह सता के भूखे नहीं थे और इतने ही सेक्युलर थे, तो उन्होंने उस भाजपा का समर्थन हासिल क्यों किया जो राम जन्मभूमि आंदोलन की हवा बनाकर 1989 में 86 सीटें जीतकर आई थी। इस एतिहासिक तथ्य को भी छुपाया जाना ठीक नहीं होगा कि जनमोर्चे ने वीपी सिंह को नहीं, अलबता देवीलाल को अपना नेता चुना था और देवीलाल ने अपना ताज वीपी सिंह के सिर पर रखा था। उसी देवीलाल के साथ बाद में वीपी सिंह ने धोखा किया। अगर वीपी सिंह पद के लालची नहीं थे, तो उन्होंने मतभेद पैदा होने पर देवीलाल को वह पद लौटाया क्यों नहीं। किताब की भूमिका में यह भी कहा गया है कि वीपी सिंह ने पद से दो-दो बार इस्तीफा दिया। पहली बार तब, जब उनके भाई सीपीएन सिंह की डाकुओं ने हत्या कर दी और दूसरी बार तब, जब उन्होंने कुर्सी की परवाह किए बिना लालकृष्ण आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ्तार करवा कर प्रधानमंत्री पद को दांव पर लगाया। लेकिन ये दोनों ही उदाहरण तथ्यों के विपरीत हैं। जब डाकुओं ने वीपी सिंह के भाई सीपीएन सिंह की हत्या की तो उन्होंने हालात का मुकाबला करने की बजाए हथियार डाल दिए। उन्होंने इंदिरा गांधी से डरकर इस्तीफे की पेशकश की थी, लेकिन इंदिरा गांधी ने तब उन्हें बख्श दिया। इंदिरा गांधी ने उतर प्रदेश की बिगड़ती कानून व्यवस्था को काबू में लाने के लिए बहुत बाद में वीपी सिंह को हटाकर श्रीपति मिश्र को मुख्यमंत्री बनाकर भेजने का फैसला किया था। जहां तक वीपी सिंह का यह कहना है कि उन्होंने कुर्सी की परवाह न करते हुए लालू यादव को यह हिदायत दी थी कि लालकृष्ण आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया जाए, तो उसका खंडन खुद लालू यादव ने कर दिया है। यह कहना बिलकुल गलत होगा कि मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके वीपी सिंह ने आजादी के बाद सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाया था। देश के संविधान में आरक्षण की व्यवस्था पहले से थी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को तय समय के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी, ताकि सदियों-सदियों से पिछड़ी इन जातियों को विकास का ज्यादा मौका मिल सके। समय के साथ इस बात की जरूरत महसूस की गई कि इन दो वर्गों के अलावा कुछ और पिछड़ी जातियां भी हैं, जिन्हें आरक्षण दिया जाना चाहिए। इसीलिए अन्य पिछड़े वर्गों के लिए मंडल आयोग बना था। मंडल आयोग वीपी सिंह ने नहीं बनाया था, अलबता इंदिरा गांधी ने बनाया था। इसलिए क्रांतिकारी कदम वीपी सिंह ने नहीं अलबता उससे बहुत पहले इंदिरा गांधी ने उठाया था। जहां तक वीपी सिंह के दूसरी बार पद त्याग की बात है तो यह बात भूलनी नहीं चाहिए कि जब लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया था तो अल्पमत में आने के बावजूद उन्होंने तब तक इस्तीफा नहीं दिया था, जब तक लोकसभा में हार नहीं हुई। यह किस्सा तो कोई भूल भी नहीं सकता जब वीपी सिंह के गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया का अपहरण हुआ तो उन्होंने अपने गृहमंत्री की बेटी को मुक्त करवाने के लिए आतंकवादियों को रिहा कर दिया था। वीपी सिंह के गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद सार्वजनिक तौर पर रो पड़े थे और उनके मुंह से एक बार भी यह नहीं निकला था कि देश उनकी बेटी से ज्यादा महत्वपूर्ण है। वीपी सिंह को पिछड़ी जातियों का मसीहा बताने वालों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यूपी में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने तिंदवारी से उपचुनाव लड़ने का फैसला इसलिए किया था, क्योंकि यह ठाकुर बहुल सीट है। बाद में उन्होंने फतेहपुर से लोकसभा चुनाव भी इसीलिए लड़ा क्योंकि वह भी ठाकुर बहुल सीट है। जहां तक अमिताभ बच्चन के इस्तीफे के बाद इलाहाबाद से उप चुनाव लड़ने की बात है, तो वह देवीलाल के दिमाग की उपज और उनका दबाव था।

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