लादेन के बाद भारत-अफगानिस्तान

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ओसामा बिन लादेन के मारे जाने से ३६ घंटे पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिह ने अपना अफगानिस्तान दौरा स्थगित किया। मनमोहन सिंह के दौरे की तारीख तय नहीं हुई थी, पर यह तय था कि वह मई महीने में अफगानिस्तान जाएंगे। शनिवार को नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय सूत्रों ने प्रधानमंत्री का दौरा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने की बात कही। रविवार को अमेरिकी ऑप्रेशन में ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर एबोटाबाद में मारा गया। अमेरिका ने दावा किया है कि ओसामा बिन लादेन की खोज अगस्त २०१० में कर ली गई थी। स्वाभाविक है कि पाकिस्तान को अमेरिका ने इसकी जानकारी नहीं दी होगी। अन्यथा जिस प्रकार पहले ओसामा बिन लादेन तौरा-बोरा से भाग जाने में सफल हुए थे, वैसे ही अब भी सफल हो जाते। यह कोई भी मानने को तैयार नहीं हो सकता था कि लादेन के इस्लामाबाद से सिर्फ १५० किलोमीटर पर एक कस्बे में रहने की पाक खुफिया एजेंसियों को पहले से जानकारी नहीं होगी।

यह तथ्य अमेरिका खुद कई बार उजागर कर चुका है कि पाकिस्तान सरकार और आईएसआई का अलकायदा और तालिबान से संपर्क बना हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा ने ओसामा बिन लादेन के मारे जाने का ऐलान करते समय यह भी बताया कि उन्होंने शुक्रवार को ऑप्रेशन की इजाजत दी थी। इन कड़ियों को मिलाकर देखें, तो साफ है कि अमेरिका ने भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को फिलहाल अफगानिस्तान दौरा स्थगित करने की सलाह दी होगी। हालांकि अमेरिका की तरफ से कहा गया है कि अमेरिकी सैन्य सहयोग से लादेन ऑप्रेशन किया गया, लेकिन भारतीय कूटनीतिक इस खबर को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। यह बात सही है कि कुछ दिन पहले पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आईएसआई प्रमुख अमेरिका के दौरे पर गए थे। पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल कियानी भी हाल ही में अमेरिका से लौटे हैं। लेकिन भारत में इस थ्योरी पर भरोसा नहीं किया जा रहा कि पाकिस्तान ने ओसामा बिन लादेन को मारने में अमेरिका की मदद की होगी। लादेन के पाक में मारे जाने से यह साबित हो गया है कि पाक नाटो-अमेरिकी फौजों के साथ भीतरघात करता रहा है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी मार्च में अफगानिस्तान का दौरा कर लौटे हैं। उनके दौरे के फौरन बाद वाशिंगटन पोस्ट ने काबुल डेटलाइन से एक अमेरिकी पत्रिका के हवाले से खबर छपी। जिसमें कहा गया कि गिलानी ने सार्वजनिक तौर पर तो तालिबान से लड़ने में अफगानिस्तान को पूरा सहयोग देने की बात कही लेकिन गोपनीय बातचीत में अमेरिकी फौजों को सबक सिखाने के लिए उकसाया। गिलानी के साथ मौजूद पाक फौजी अफसर ने यहां तक कहा कि अफगानिस्तान को अमेरिका और भारत दोनों को अपना मित्र नहीं मानना चाहिए। अलबत्ता पाकिस्तान और चीन के साथ नया गठबंधन करना चाहिए।

हमारे लिए अहम सवाल यह है कि ओसामा बिन लादेन के बाद भारत के अफगानिस्तान के साथ रिश्ते कैसे होंगे। एक अमेरिकी कूटनीतिज्ञ क्रिस्टन फेयर ने लिखा है कि अफगानिस्तान में भारत और पाकिस्तान का शक्ति संघर्ष चल रहा है। अफगानिस्तान पर नाटो हमलों के बाद से वहां के मौजूदा निजाम पर भारत का प्रभाव बढ़ा है। जबकि नाटो हमले का सबसे दुष्प्रभाव पाकिस्तान पर पड़ा है क्योंकि पाक पोषित तालिबान सरकार का खात्मा हो गया है। पाकिस्तान की कसमसाहट बार-बार जाहिर होती रही है। ताजा सबूत तो वाशिंगटन पोस्ट की यह खबर ही है जिसका ऊपर जिक्र किया गया है। भले ही पाकिस्तान सरकार ने ओसामा बिन लादेन को खत्म करने में अमेरिका का साथ नहीं दिया हो, तो भी पाकिस्तान में इस घटना के दुष्परिणाम की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन के समर्थकों की कमी नहीं है। आतंकवादी वहां बड़ी आतंकवादी वारदातें सरअंजाम दे सकते हैं। नाटो फौजों के अफगानिस्तान पर हमले में पाकिस्तानी सहयोग के बाद से वहां आतंकवादी  वारदातों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई थी। संभवतः अमेरिका ने इस्लामिक दुनिया को संदेश देने के लिए ही लादेन की मौत में पाकिस्तान का सहयोग मिलने की बात कही होगी। बाराक ओबामा ने लादेन के मारे जाने का ऐलान करते समय यह भी कहा कि लादेन का मारा जाना इस्लाम के खिलाफ नहीं, क्योंकि लादेन इस्लामिक लीडर नहीं था। अलबत्ता उनके आतंकवादी अलकायदा ने हजारों, लाखों मुसलमानों को आतंकवाद का शिकार बनाया। पाकिस्तान के लिए शर्मसार होने वाली बात यह है कि ओसामा बिन लादेन तौरा-बोरा जैसे किसी निर्जन पहाड़ी क्षेत्र में नहीं, अलबत्ता घनी आबादी वाले उस एबोटाबाद में मारा गया, जहां पाकिस्तान की फौजी छावनी हैं। पाकिस्तान के तालिबान के साथ लगातार संपर्क का सबूत यह भी है कि पिछले साल पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने बू्रसल्स में दिए गए बयान में करजई सरकार और तालिबान में मध्यस्थता की पेशकश की थी। अब यह अमेरिका को देखना है कि वह पाकिस्तान को आतंकवाद की धुरी (एपिक सेंटर) मानता है या नहीं। अमेरिका की पाक के सहयोग संबंधी ताजा घोषणा से तो नहीं लगता कि वह पाकिस्तान को अभी भी आतंकवाद की धुरी मानने को तैयार है।

अब दो अहम सवाल हैं, क्या नाटो फौजें अफगानिस्तान से रुख्सत होना शुरू हो जाएंगी और दूसरा सवाल यह कि नाटो फौजों के हटने से अफगानिस्तान में भारत का मौजूदा प्रभाव बना रहेगा या पाकिस्तान तालिबान शासन के समय वाला अपना प्रभाव फिर से कायम करने में कामयाब हो जाएगा। इसकी आशंका इसलिए भी पैदा होती है क्योंकि पिछले साल अमेरिका ने भी करजई सरकार और तालिबान में समझौते की थ्योरी को समर्थन दिया था। इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि बाकी बचे तालिबानों को अलकायदा के प्रभाव से मुक्त बताकर करजई सरकार से समझौते का मार्ग तैयार किया जाए। अगर अमेरिका इस लाइन को अपनाता है, तो निश्चित रूप से भारत के लिए खतरे की घंटी होगी। पाकिस्तान दक्षिण एशिया में चीन, अफगानिस्तान, पाक, नेपाल का ऐसा गठजोड़ चाहता है, जिससे भारत को घेरा जा सके। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कंधार विमान अपहरण कांड की शुरूआत नेपाल से और समाप्ति अफगानिस्तान से हुई थी। उसके बाद से तो नेपाल कहीं ज्यादा चीन के प्रभाव में आ चुका है। पाकिस्तान ने बलात कब्जे वाली कश्मीर की कराकोरम पहाड़ियां चीन को उपहार स्वरूप देकर भारत और अफगानिस्तान की सीमा में चीन को पहले ही ला खड़ा किया हुआ है।

भारत के लिए तीन कारणों से अफगानिस्तान के साथ रिश्ते अहम हैं। पहला- नब्बे के दशक में अफगानिस्तान पर तालिबानी शासन स्थापित होने के बाद से भारत को कई तरह की सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। पाकिस्तान ने लश्कर-ए-तोएबा, हरकत-उल-मुजाहिद्दीन, हरकत-उल-अंसार और हरकत-उल-जेहाद-अल-इस्लामी जैसे कई आतंकी संगठनों को भारत में आतंकवाद फैलाने के लिए मदद की। इन सभी आतंकवादी संगठनों को अफगानिस्तान में तालिबान और अलकायदा से ट्रेनिंग मिली थी। इसलिए भारत यह चाहता है कि अफगानिस्तान किसी भी तरह फिर से आतंकवादी धुरी न बने। दूसरा- भारत चाहता है कि अफगानिस्तान उसका मित्र देश बना रहे, ताकि वह वहां से पाकिस्तान की हरकतों पर निगरानी रख सके जबकि पाकिस्तान चाहता है कि भारत के अफगानिस्तान से मौजूदा रिश्तों को किसी भी तरह जल्द से जल्द खत्म किया जाए। संभवतः करजई सरकार की तालिबान से गठबंधन की कोशिशें पाकिस्तान की इसी रणनीति का हिस्सा हैं। ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद अब अफगानिस्तान किस दिशा में जाता है, यह भारत के लिए अहम है। तीसरा- अफगानिस्तान और पाकिस्तान में होने वाली सभी महत्वपूर्ण घटनाएं भारत के घरेलू और सामाजिक ताने-बाने, यहां तक कि आतंरिक सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। वहां होने वाली किसी भी घटना का कश्मीर समस्या पर परोक्ष या अपरोक्ष प्रभाव पड़ता है। सवाल यह है कि भारत अपने इन तीनों लक्ष्यों को कैसे हासिल कर सकता है। भारत आजादी के बाद से ही अफगानिस्तान के साथ अपने बेहतर रिश्तों की कोशिश में लगा रहा है। पचास के दशक की शुरूआत में भारत ने अफगानिस्तान के शासक राजा जहीर शाह के साथ मैत्री संधि की थी। भारत ने अफगानिस्तान में सिंचाई, बिजली परियोजनाओं और औद्योगीकरण में अहम भूमिका निभाई। सोवियत फौजों के लौटने और तालिबान शासन स्थापित होने के बाद भारत को अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति बनाए रखना भी मुश्किल हो गया था। पाकिस्तान के प्रभाव के कारण अफगानिस्तान में भारत विरोधी वातावरण बना रहा, जिसका खात्मा नौ सितम्बर को अमेरिका पर हुए आतंकी हमले के बाद ही हुआ। जब नाटो फौजों ने अफगानिस्तान पर हमला करने के बाद वहां के पुनर्निर्माण में भारत को शामिल किया। तब से भारत वहां विकास की विभिन्न योजनाओं में भागीदार है। अलकायदा और तालिबानी आतंकवादियों ने काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर दो बड़े हमले किए जिनमें बड़ी तादाद में भारतीय मारे गए। भारत के लिए महत्वपूर्ण बात यह है कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान का दखल कम से कम होना चाहिए। अगर ओसामा बिन लादेन के खात्मे को अमेरिका आतंकवाद का अंत मानकर नाटो फौजों की वापसी शुरू करता है तो यह भारत के लिए विकट स्थिति होगी। लादेन के बाद बचे खुचे तालिबान को अच्छा तालिबान मानकर करजई सरकार से समझौता कराने की कोशिश भारत के लिए मुश्किल पैदा करेगी। तालिबानी आतंकवादियों का रुख कश्मीर की तरफ बढ़ेगा, यही पाकिस्तान की मंशा है। अब समय आ गया है कि भारत को अफगानिस्तान के साथ अपने रिश्तों की नए सिरे से रणनीति बनानी होगी।