संसद की अनदेखी

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जनसत्ता, 1 दिसंबर, 2011 : वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने चौबीस नवंबर को उपभोक्ता क्षेत्र में विदेशी निवेश संबंधी मंत्रिमंडल के फैसले का एलान किया। उन्होंने कहा कि जनता ने यूपीए को बहुमत दिया है, इसलिए उन्हें फैसले करने का अधिकार है। अगर संविधान में ऐसा होता तो संसद की जरूरत ही क्या थी। अमेरिका की तरह यहां प्रधानमंत्री का सीधा चुनाव नहीं होता। सरकार अपने फैसलों के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी है और उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का भी प्रावधान है। रहा चुनाव में बहुमत का सवाल, तो वह भी जनता ने न कांग्रेस को दिया न यूपीए को।

यह तो जोड़तोड़ से बनी हुई सरकार है, जिसे इस तरह तानाशाहीपूर्ण फैसले लेने का अधिकार नहीं। आनंद शर्मा ने तो यहां तक कहा कि मंत्रिमंडल के इस फैसले पर संसद में चर्चा नहीं होगी। क्या यह एक तरह से संसद की अवमानना नहीं है? संसद में चर्चा हो या न हो, यह फैसला लेने का अधिकार खुद संसद और लोकसभा के अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति को है। मंत्री या प्रधानमंत्री इस तरह के फैसले नहीं करते।

सरकार को खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के मुद्दे पर संसद का समर्थन हासिल नहीं है। वरना वाणिज्यमंत्री आनंद शर्मा इस तरह का बयान ही नहीं देते। यूपीए वैसे भी लोकसभा में बहुमत खोता जा रहा है। अब जबकि उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव सिर पर हैं, बाहर से समर्थन करने वाली सपा और बसपा विपक्ष के सुर में सुर मिला रही हैं। खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के मसले पर इन दोनों दलों ने सार्वजनिक तौर पर केंद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले का विरोध किया है। मायावती ने तो इस फैसले को राहुल गांधी के विदेशी दोस्तों को फायदा पहुंचाने वाला करार दिया है। लोकसभा में सपा नेता मोहन सिंह ने यह तक कहा आज दूसरी आजादी के संघर्ष की जरूरत है। इन दोनों दलों के समर्थन के बिना वैसे भी सरकार अल्पमत में है।

सनद रहे सो बताना जरूरी है कि कांग्रेस जिन समर्थक घटक दलों के साथ यूपीए के बैनर तले चुनाव लड़ रही थी, उसे कुल मिलाकर 261 सीटें मिली थीं। कांग्रेस को 206 सीटें, तृणमूल को उन्नीस, द्रमुक अठारह, झारखंड मुक्तिमोर्चा दो, राष्ट्रवादी कांग्रेस नौ, नेशनल कॉन्फ्रेंस तीन, मुसलिम लीग दो, वीएलके एक और केरल कांग्रेस एक। इनमें से भी तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक बहुब्रांड उपभोक्ता क्षेत्र में सौ फीसद और एकल ब्रांड में इक्यावन फीसद विदेशी निवेश के खिलाफ खड़ी हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा अब यूपीए में नहीं है।

इस तरह कुल मिला कर यूपीए 232 सदस्यों का है। यह बताना भी जरूरी है कि सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले सपा के बाईस, बसपा के इक्कीस और राष्ट्रीय जनता दल के चार सांसद भी इस मुद्दे पर सरकार के साथ नहीं हैं। संसद का बहुमत मंत्रिमंडल के इस फैसले के खिलाफ है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उपभोक्ता क्षेत्र में विदेशी निवेश के मुद्दे पर न संसद का समर्थन है न कांग्रेस के भीतर इस पर आम सहमति है। मंत्रिमंडल में फैसले सर्वसम्मति से होने चाहिए, बहुमत के आधार पर नहीं। अगर बहुमत के आधार पर फैसला हो भी, तो किसी मंत्री को उसका सार्वजनिक विरोध करने का अधिकार नहीं होता। लेकिन कैबिनेट मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने सार्वजनिक तौर पर इस फैसले का विरोध किया है।

प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे मंत्रिमंडल के फैसले का विरोध करने पर अपने मंत्री को हटाएं या अपना फैसला बदलें। क्योंकि संसदीय प्रणाली में मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी होती है। दिनेश त्रिवेदी ने खुलेआम मंत्रिमंडल के इस फैसले का विरोध किया है, जबकि कांग्रेस के तीन मंत्रियों- एके एंटनी, वीरप्पा मोइली और मुकुल वासनिक की ओर से भी विरोध के स्वर उठने की खबरें हैं। इसका मतलब यह है कि इस मसले पर मनमोहन सिंह को यूपीए के बचे-खुचे 232 सांसदों का भी समर्थन नहीं है। जबकि इस फैसले से ठीक पहले योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा था कि सरकार आम सहमति बनाने की कोशिश कर रही है।

इन तथ्यों को देखें तो स्पष्ट है कि मंत्रिमंडल का यह फैसला आम सहमति से नहीं हुआ। इसकी पृष्ठभूमि में जाना जरूरी है। पिछले साल नवंबर में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आए थे। उपभोक्ता क्षेत्र में भारत के दरवाजे खुलवाने के लिए उन्होंने खुलेआम लॉबिंग की थी। जिस तरह संसद सत्र के दौरान जल्दबाजी में मंत्रिमंडल ने यह फैसला किया है, उससे ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ओबामा को एक साल के भीतर दरवाजे खोलने का आश्वासन दिया था।

मीडिया देश भर में एक और गलत धारणा फैलाता रहता है कि हंगामे में देश का पैसा बर्बाद होता है। हंगामे का ठीकरा विपक्ष के सिर फोड़ा जाता है। जाने-अनजाने में इस तरह की दलीलें देकर मीडिया सरकार का समर्थन करता है। जनता को बताया जाता है कि संसद का मकसद कानून बनाना है। ऐसी धारणा बना कर मीडिया संसद के महत्त्व को कम करता है। संसद देश की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था है और देश को प्रभावित करने वाले हर मुद्दे पर वहां बहस होनी चाहिए।

जनप्रतिनिधियों की आकांक्षा के मुताबिक उन मुद्दों पर फैसले होने चाहिए। संसद में बहुमत का मतलब हर मुद्दे पर मनमानी नहीं होता। संसद का सत्र हर मुद्दे पर सांसदों की राय लेने के लिए बुलाया जाता है। जनता को उद्वेलित करने वाले मुद्दे उठाने का विपक्ष को पूरा अधिकार है।  लेकिन सरकार अगर उन मुद्दों पर बहस करने से ही किनारा कर ले, घमंड से कहे कि हम इस मुद्दे पर बहस नहीं करेंगे, तो यह संसद के महत्त्व को कम करके आंकना है और विपक्ष को पूरा अधिकार है कि वह सरकार को मजबूर करे, भले ही इसके लिए हंगामा करना पडे।

सरकार ने जिस तरह उपभोक्ता क्षेत्र में विदेशी निवेश का फैसला किया है, उसके खिलाफ पिछले हफ्ते संसद नहीं चली। सरकार अगर इस मुद्दे पर संसद में बहस करवा भी ले, तो भी अपने फैसले को बदलने से रही। सरकार का यह फैसला निश्चित रूप से अमेरिका के दबाव में हुआ है। जिस तरह अपनी सरकार को दांव पर लगा कर मनमोहन सिंह ने अपने पिछले कार्यकाल में अमेरिकी दबाव  में परमाणु समझौता किया, उसी तरह इस मुद्दे पर भी वे उस हद तक जाएंगे।

रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव की दलील है कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश से महंगाई पर काबू पाने में मदद मिलेगी। मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह अहलूवालिया, प्रणब मुखर्जी और डी सुब्बाराव का यह दावा पूरी तरह खोखला साबित हुआ है कि ब्याज दरें बढ़ने से महंगाई कम होगी। पिछले तीन साल से हम महंगाई पर इन आर्थिक महापंडितों के कोरे आश्वासन सुनते आए हैं। इसलिए खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को लेकर उनकी दलील किसी के गले उतरने वाली नहीं। अलबत्ता सदियों से चली आ रही भारत की उत्पादक, आढ़ती, दुकानदार और उपभोक्ता की व्यवस्था तहस-नहस हो जाएगी, जिससे शहरों, कस्बों और गांवों में बडे पैमाने पर बेरोजगारी फैलेगी।

सरकार की यह दलील पूरी तरह खोखली है कि दस लाख से ज्यादा आबादी वाले देश के सिर्फ तिरपन शहरों में सौ फीसद विदेशी निवेश वाले एकल ब्रांड के स्टोर और इक्यावन फीसद विदेशी निवेश वाले बहुब्रांड स्टोर खुलेंगे। क्या इसका असर सिर्फ इन तिरपन शहरों तक सीमित होगा? सरकार क्या इस चलन से नावाकिफ है कि आजकल गांव के लोग भी निकट के बड़े शहर में जाकर खरीददारी करते हैं। स्वाभाविक है कि इसका असर गांवों और कस्बों के भी छोटे-मझोले दुकानदारों पर पड़ेगा।

वाणिज्य मंत्री ने एक करोड़ नए रोजगार सृजित होने का दावा किया है। जबकि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश आने से जितने रोजगार पैदा होंगे उससे दुगुने लोग बेरोजगार होंगे। दावा यह भी किया जा रहा है कि विदेशी कंपनियां किसानों और कारखानों से सीधे माल खरीदेंगी, इससे उत्पादकों को ज्यादा पैसा मिलेगा, बिचौलिए का मुनाफा गायब हो जाने से उपभोक्ता को सस्ता सामान मिलेगा। उत्पादक और उपभोक्ता, दोनों को चांद दिखाया जा रहा है। बिचौलिए को खलनायक के तौर पर पेश किया जा रहा है, जो सदियों-सदियों से हमारी व्यवस्था की रीढ़ रहे हैं।

हम इस नई व्यवस्था से बिचौलिए खत्म करके देश में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ाएंगे। यह देश के मध्यवर्ग पर ऐसी चोट होगी, जिसकी भरपाई वे अपने जीवन में नहीं कर पाएंगे। जबकि विदेशी कंपनियां बडे बिचौलिए के तौर पर मुनाफा कमा कर विदेश ले जाएंगी। हम अपने करोड़ों बिचौलियों के पेट पर लात मार कर ोट्रो, टेस्को जैसी विदेशी कंपनियों का पेट भरेंगे। इसका मतलब है कि देश की अर्थव्यवस्था पर पूरी तरह से विदेशी पूंजीपतियों का एकाधिकार हो जाएगा।

सेना में ब्रिगेडियर रहे आंध्र प्रदेश के एक किसान जीबी रेड्डी ने एक अंग्रेजी अखबार में संपादक के नाम लिखे पत्र में लिखा है कि किसान अगर कस्बे में दुकानदार को आकर सीधा सुपरफाइन चावल बेचे तो बाईस सौ रुपए क्विंटल बिकता है। सुपरफाइन उस क्वालिटी को कहते हैं जो कम से कम एक साल पुराना हो, जो कि बाजार में बत्तीस से पैंतीस रुपए किलो के हिसाब से उपभोक्ता को उपलब्ध होता है। जीबी रेड्डी ने अपना सुपरफाइन क्वालिटी का चावल शहरों में खुले बडेÞ डिपार्टमेंटल स्टोर को बेचने की कोशिश की, उसने बाजार से थोड़ी कम कीमत, चौबीस सौ रुपए चावल का दाम बताया, जिसकी वह पैकिंग करके देने को तैयार था।

इसका मतलब हुआ कि दो रुपए पैकिंग के जोडे जा रहे थे। लेकिन वह अपना चावल डिपार्टमेंटल स्टोर को बेचने में पूरी तरह नाकाम हो गया। इसका मतलब साफ है कि डिपार्टमेंटल स्टोर किसानों को वह कीमत अदा करने को तैयार नहीं, जो वह आम दुकानदार को बेच कर हासिल कर रहा है। अगर हम इसे व्यापक नजरिए से देखें तो वालमार्ट, मेट्रो टेस्को जैसी विदेशी कंपनियां बडे-बडे किसानों से सीधी बात करेंगी। छोटे किसानों को उसका कोई फायदा नहीं होगा। सारा लाभ (अगर मिलेगा भी) तो पंजाब, हरियाणा  के बडे किसानों को ही होगा।

देश भर में फैले छोटे-छोटे किसानों को इसका कोई फायदा नहीं होगा। अलबत्ता बडे किसान बडे विदेशी व्यापारी को माल उपलब्ध करवाने के लिए छोटे किसानों की जमीन खरीदने की कोशिश करेंगे। छोटे किसान अपनी जमीन बेच कर बेरोजगार होकर घूमेंगे। यह आलम हमने रीयल स्टेट में विदेशी निवेश के नतीजे के तौर पर देख भी लिया है। राज्य सरकारें रीयल स्टेट को फायदा पहुंचाने के लिए किसानों को कम कीमत पर जमीन बेचने के लिए मजबूर करती रही हैं। कृषि का रकबा लगातार घट रहा है और कृषक परिवारों में बेरोजगारी बढ़ रही है। यूपीए सरकार पिछले छह सालों में बार-बार वादा करके भी, नया भू अधिग्रहण विधेयक संसद में पेश नहीं कर रही है, जबकि उपभोक्ता क्षेत्र में विदेशी निवेश का फैसला करने में उसने गजब की फुर्ती दिखाई! अपने सहयोगी दलों को भी विश्वास में नहीं लिया।

देश में चारों तरफ आक्रोश है। देश की जनता की मौजूदा या आने वाली समस्याओं पर संसद में हंगामा खड़ा करना विपक्ष की जिम्मेदारी और हक है। इसे मीडिया को इसी संदर्भ में देखना चाहिए।