India Gate se Sanjay Uvach
कौन से सुरखाब के पर लगे होते हैं अमेरिकी राष्ट्रपति को
Sat, 10-Oct-2009तो नोबेल शांति पुरस्कार का ऐलान हो गया। लाटरी निकली बाराक ओबामा के नाम। यों किसी भारतीय को मिलने की अपन को उम्मीद नहीं थी। जो अपन तिलमिलाएं। पांच-सात साल पहले जरूर वाजपेयी को मिलने की उम्मीद थी। पर अपनी उम्मीदों पर पानी फिरा। वैसे भी जब महात्मा गांधी को शांति पुरस्कार नहीं मिला। तो वाजपेयी क्या चीज। वाजपेयी को तो अब 'भारत रत्न' की भी उम्मीद नहीं। इंदिरा गांधी ने खुद ही 'भारत रत्न' ले लिया था। इस साल जब वाजपेयी को 'भारत रत्न' की मांग उठी। तो अपन को फिजूल की मांग लगी।
काबुल में अपन ही क्यों 'आतंकियों' का निशाना
Fri, 09-Oct-2009अफगानिस्तान की राजधानी काबुल। काबुल में अपना दूतावास फिर बना आतंकियों का निशाना। आईएसआई का हाथ बताना अभी जल्दबाजी होगा। वरना पाकिस्तान फिर कहेगा- 'जांच से पहले पाक पर तोहमत की अपनी आदत।' पर काबुल में कोई और भारतीय दूतावास को निशाना बनाएगा ही क्यों। अपन तो 42 देशों की नाटो फोर्स में भी शामिल नहीं। जो अफगानिस्तान में तालिबान से लड़ रहीं। अपना रोल तो सिर्फ अफगानिस्तान के नव निर्माण का। सड़कों का निर्माण। अस्पतालों-स्कूलों-इमारतों का निर्माण। अपन आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई से सीधे नहीं जुडे। सीधा जुड़ा है पाकिस्तान। फिर बार-बार भारतीय दूतावास पर हमले क्यों। समझना मुश्किल नहीं। अफगानिस्तान में अपनी मौजूदगी से जली-भुनी बैठी है आईएसआई।
पाकिस्तान को लेकर उलझन में अपने मंत्री
Thu, 08-Oct-2009लोक दिखावे और असलियत का फर्क अब दिखने लगा। सताईस सितंबर को एसएम कृष्णा और कुरैशी की मुलाकात हुई। तो अपन को खबर दी गई- 'सख्त कार्रवाई के बिना बात नहीं।' पर कुरैशी ने बुधवार को इस्लामाबाद में कहा- 'सकारात्मक रुख दिखाई दिया।' अपन को पहले से ही आशंका थी। महाराष्ट्र का चुनाव हो जाने दीजिए। मनमोहन की याद धुंधली हो जाएगी। मुंबई का हमला महत्वहीन तो नहीं होगा। पर पाक से बातचीत में अड़चन भी नहीं होगा। अपन ने 23 सितंबर को लिखा था- 'महाराष्ट्र चुनाव के बाद मिलेंगे मनमोहन-गिलानी।' सो अब नवंबर के तीसरे हफ्ते की मुलाकात तय।
कामनवेल्थ फैडरेशन पहुंची तो पीएम के होश हुए फाख्ता
Wed, 07-Oct-2009जिनने 1984 का चुनाव नहीं देखा। उनने चुनावों में सांपों-बिच्छुओं का इस्तेमाल नहीं देखा। अपन यहां लाहौर की कहावत का इस्तेमाल मुनासिब नहीं समझते। पर लाहौर की कहावत बताना वक्त की जरूरत। वहां एक कहावत है- 'जिन्ने लाहौर नहीं वेख्या, ओ जाम्या ही नहीं।' यानी जिसने लाहौर नहीं देखा, वह पैदा ही नहीं हुआ। आजादी के बाद दूर दराज के कस्बों-गांवों में जितना मोह दिल्ली देखने का। उतना आजादी से पहले लाहौर देखने का था। कम से कम उत्तर भारत में तो था ही। पर अपन बात कर रहे थे चुनाव की। महाराष्ट्र के चुनावों में चूहों-बिल्लियों-सांपों-मेढकों का इस्तेमाल हुआ। तो अपन को 1984 के चुनाव याद आए। जब कांग्रेस ने इश्तिहारों में अपने विरोधियों को कहीं बिच्छू। तो कहीं सांप दिखाया था। अब महाराष्ट्र के चुनाव में वही आलम।
मंदी में थरूर का नया टि्वटर मंत्र
Sat, 03-Oct-2009गांधी जयंती पर यों तो खबरों का अकाल सा था। सिवा दो खबरों के। एक तो कर्नाटक-आंध्र में बाढ़ की। दूसरी बिहार में नक्सली हिंसा पर लालू के राजनीतिक तीरों की। पर दिन गांधी जयंती का था। सो अपन गांधी की ही बात करें। तो सरकार को भी गांधी की याद आ ही गई। ग्रामीण रोजगार योजना अब गांधी के नाम होगी। वरना तो गांधी के नाम पर इंदिरा, राजीव, सोनिया, प्रियंका और राहुल ही थे। अपन पक्के तौर पर तो नहीं कह सकते। पर कनाट प्लेस का नाम महात्मा गांधी के नाम पर होता। तो शायद चल निकलता। वैसे भी देशभर के हर कस्बे में एक गांधी मैदान। एक गांधी चौक। पर दिल्ली में गांधी के नाम पर एक गांधी समाधि। दूसरा पूर्वी दिल्ली का गांधी नगर।
नेहरू-पटेल पर मोदी सोनिया में कहा-सुनी
Fri, 02-Oct-2009दिनशा पटेल अपनी जिद्द पर अड़े न रह सके। सरदार पटेल मेमोरियल ट्रस्ट के फंक्शन में मोदी को बुलाना पड़ा। मोदी पहुंचे। तो फिर वही हुआ। जिसका दिनशा पटेल को अंदेशा था। यों मोदी न बुलाए जाते। तो कोई सोनिया को जवाब देने वाला न होता। यों फंक्शन तो ट्रस्ट का था। पर दिनशा पटेल चाहते थे- कांग्रेस का मुशायरा हो जाए। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील को बुलाया। गवर्नर एससी जमीर को बुलाया। पर बात सीएम की चली। तो बोले- 'यह तो प्राइवेट फंक्शन, सरकारी नहीं।' पर ना-ना करते न्योता दिया। तो कार्ड में सीएम का नाम नहीं छापा। चाहते थे सीएम का भाषण ही न हो। पर सोनिया गांधी का भाषण लिखा कर ले गए।
किसी के पास बेटी है तो किसी के पास मां
Thu, 01-Oct-2009कलावती के घर रात बिताना आसान। पर जेएनयू में एक घंटा बिताना भी मुश्किल होगा। राहुल गांधी ने ऐसा सोचा नहीं था। जेएनयू के नौजवानों ने राहुल के छक्के छुड़ा दिए। पहले तो अंदर घुसते ही काले झंडों का सामना हुआ। पर तनाव में नहीं आए राहुल। पर जब सवालों का सिलसिला शुरू हुआ। तो पसीने छूट गए। सवाल हुआ- 'कार्पोरेट घरानों को सब्सिडी। पर हायर एजुकेशन के लिए पैसा नहीं?' राहुल को जवाब नहीं सूझा। वह बोले- 'लगता है आप वामपंथी विचारधारा को मानते हैं।' यह सच भी। जेएनयू पर शुरू से ही वामपंथियों का कब्जा। प्रकाश करात से लेकर सीताराम येचुरी तक जेएनयू की देन। पर बात राहुल के फंसने की। इस सवाल ने तो राहुल के बारह बजा दिए।
भ्रष्टाचार में सिर्फ बाबू धरे जाएंगे, कोई क्वात्रोची नहीं
Wed, 30-Sep-2009संसद में घोटाला कबूल हो चुका। कबूल हो चुका- बोफोर्स तोपों की खरीद में दलाली हुई थी। पर कांग्रेस शुरू से पर्दा डाल रही थी। यही करना था एक दिन। यूपीए की पिछली सरकार ने क्वात्रोची की मदद की। क्वात्रोची के सील खाते खुलवाना शुरूआत थी। लेफ्ट की मदद से किया यह कांग्रेस ने। अब दूसरी बार सरकार बनी। तो बैसाखियां लेफ्ट से भी ज्यादा लाचार। सो सरकार ने तय कर लिया- 'क्वात्रोची के खिलाफ मुकदमे हटा लिए जाएं।' मंगलवार को कोर्ट में बता दिया। तीन अक्टूबर को मुकदमे हटा लेंगे। यह होना ही था। दलाली का आरोप विपक्ष का नहीं था। भारतीय मीडिया का भी नहीं।
तो नेता पुत्रों ने बाजी मार ली दस जनपथ पर
Sat, 26-Sep-2009तो वही हुआ। जिसका सभी को अंदेशा था। सोनिया गांधी नेता पुत्रों के आगे झुक गई। वाईएसआर के बेटे जगनमोहन पर कड़ा रुख अपनाया। तो अपन को लगता था- एसेंबली चुनावों में भी नेता पुत्रों की शामत आएगी। सोनिया के करीबी बता रहे थे- आंध्र से सबक लिया है आलाकमान ने। अब नेता पुत्रों को टिकट देने से पहले दस बार सोचेंगे। दस जनपथ से छन-छनकर खबरें छपती रही- 'हरियाणा-महाराष्ट्र में नेता पुत्रों को टिकट नहीं दिया जाएगा।' हरियाणा में तो सोनिया की घुड़की काफी हद तक काम की। पर महाराष्ट्र में नेताओं की घुड़की ज्यादा काम कर गई।
एटमी पनडुब्बी तैयार अग्नि-5 की भी तैयारी
Fri, 25-Sep-2009माना अपनी सैन्य तैयारियां पूरी नहीं। अपने सैनिकों की हिम्मत में कोई कमी नहीं। पर अपने सैनिक घुड़सवार तो नहीं। जो तलवार भांजते हुए दुश्मनों की छाती पर चढ़ दौड़ेंगे। इक्कसवीं सदी की जंग जहां आधुनिक हथियार मांगेगी। वहां अब कूटनीतिक जंग भी अहम हो चुकी। पहले बात हथियारों की। अपन एयर फोर्स और नेवी प्रमुखों से सहमत। हथियारों की तैयारियां चीन के बराबर नहीं। अपने हथियार सत्तर और अस्सी दशक के। पुराने हथियारों को बदलने की सख्त जरूरत। जरा गौर करिए। चीनी बार्डर पर तैनात हथियार 1974 की खरीद। हथियारों की मारक क्षमता सिर्फ पांच हजार फुट। जमीन से जमीन मारक क्षमता वाले हथियारों की बात करें। अपन ने पहली खरीद अस्सी के दशक में की। दूसरी नब्बे के दशक में। अग्रिम मार वाली तोपों की बात। तो अपन ने आखिरी खरीददारी 1995 में की। पहले बोफोर्स तोप घोटाले ने खरीददारी पर ब्रेक लगाई।