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	<title>Socio Political News &#187; Terrorism</title>
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	<description>News Articles and Reactions</description>
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		<title>मुंबई से भी सबक लेंगे, या नहीं</title>
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		<pubDate>Tue, 02 Dec 2008 00:45:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[देश बचाना है, तो आतंकवादी का धर्म देखकर कार्रवाई करने की नीति छोड़नी होगी। बोट पर आने वालों से तो एनएसजी ने निपट लिया, वोट वालों से कैसे निपटेगा देश।
आतंकवादी और आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले फ्रांस की क्रांति के बाद 1795 में हुआ। क्रांतिकारी सरकार की आतंक की नीतियां लागू करने वाली जन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>देश बचाना है, तो आतंकवादी का धर्म देखकर कार्रवाई करने की नीति छोड़नी होगी। बोट पर आने वालों से तो एनएसजी ने निपट लिया, वोट वालों से कैसे निपटेगा देश।</strong></p></blockquote>
<p>आतंकवादी और आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले फ्रांस की क्रांति के बाद 1795 में हुआ। क्रांतिकारी सरकार की आतंक की नीतियां लागू करने वाली जन सुरक्षा और राष्ट्रीय कंवेशन कमेटी को आतंकवादी कहा गया। इस तरह आतंकवाद का अर्थ तब मौजूदा अर्थ से बिल्कुल भिन्न और सकारात्मक था। वैसे आतंकवाद की शुरुआत पहली ही सदी में हो गई थी, जब रोमनो ने खाड़ी में यहूदियों की जमीन पर कब्जा कर लिया था। यहूदियों के दो गुट खड़े हुए, जो रोमनो और उनका समर्थन करने वाले यहूदियों की भी हत्या करते थे। ग्यारहवीं सदी से लेकर तेरहवीं सदी के बीच ईरान और सीरिया में एसेसिन नामक इस्लामिक गुट सक्रिय थे, जो राजनीतिक हत्याएं करते थे। सोलहवीं सदी की शुरू में गे फाक्स ने अंग्रेजी राजशाही के खिलाफ विद्रोह कर किया था, इंग्लिश इतिहासकार उसे पहला आतंकवादी मानते हैं। <span id="more-592"></span>लेकिन आतंकवाद और आतंकवादी शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल 1795 में फ्रांसीसी क्रांति के बाद ही हुआ, हालांकि तब उसका इस्तेमाल सकारात्मक रूप में लिया गया।</p>
<p>उन्नीसवीं सदी में दुनिया के कई कोनों में राष्ट्रवादी भावनाएं पैदा हुई, जिससे गुरिल्ला युध्द शुरू हुए। दुनिया के बड़े हिस्से में ब्रिटिश हुकूमत थी। ब्रिटिश, फ्रांस और अन्य साम्राज्यों के खिलाफ जगह-जगह शुरू हुए आंदोलनों में अनेक स्थानों पर गुरिल्ला युध्द भी आक्रोश का एक हिस्सा बना। दुनिया के हर हिस्से में राष्ट्रवादी एजेंडे को सामने रखकर आतंकवादी गुट खड़े हुए। ग्रेट ब्रिटेन से अलग होने के लिए आयरिश रिपब्लिकन आर्मी का गठन हुआ। भारत में भी आजाद हिंद फौज का गठन हुआ। बीसवीं सदी की शुरुआत में टर्की, सीरिया, ईरान और इराक में कुर्दों ने राष्ट्रीय स्वायतता के लिए संगठन खड़े किए। कुर्दिश राज्य का गठन करने के लिए 1970 में कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी का गठन हुआ, जिसने अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए आतंकवादी तरीके अख्तियार किए। इराक में कुर्दों की तादाद सबसे ज्यादा थी, जहां सुन्नी शासक सद्दाम हुसैन ने उन्हें कुचल दिया। साठ के दशक में आतंकवादियों ने अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए नए-नए तौर-तरीके अपनाने शुरू कर दिए। जिसके तहत 1968 में फिलिस्तीनी लिबरेशन आर्मी ने विमान अपहरण किया। चार साल बाद 1972 के म्यूनिक ओलंपिक में एक फिलिस्तीनी संगठन ने बंदियों की रिहाई के लिए इजराइली एथलीट की हत्या कर दी। शीत युध्द के समय सोवियत यूनियन ने अफगानिस्तान पर कब्जा करने की कोशिश की, तो अलकायदा नाम से आतंकवादी संगठन खड़ा हुआ, जिसने बाद में लंबे समय तक अफगानिस्तान पर शासन भी किया। सोवियत संघ टूटने के बाद सोवियत निर्मित हथियार सस्ते में आतंकवादियों के हाथ लगने लगे, इसके साथ ही एके-47 जैसी राइफल आतंकवादियों के हाथ आ गई। जिसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया गया। पाकिस्तान के बटवारे के बाद भारत से बदला लेने के लिए पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिया उल हक ने भारत के टुकडे क़रवाने के लिए आप्रेशन टोपाज शुरू किया। जिसके तहत कश्मीर में आतंकवादी संगठन खड़े किए गए और पंजाब को भारत से अलग करवाकर खालिस्तान नाम से सिखों का अलग देश बनवाने के लिए कई आतंकवादी संगठन खड़े किए। कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए आतंकवादियों ने कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से बाहर निकाल दिया है, इसके बावजूद आतंकवादियों को वहां की जनता का पूरा समर्थन नहीं मिल रहा, आंदोलन अब भी जारी है। खालिस्तान को पंजाब की सिख जनता का समर्थन नहीं था, इसलिए वह आंदोलन भी अपनी मौत खुद मर गया। लेकिन हिंसक आंदोलन को कुचलने के लिए हुए आप्रेशन  ब्लू स्टार के कारण भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। श्रीलंका में अल्पसंख्यक तमिलों ने अलग से तमिल राज्य बनाने के लिए लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम का गठन किया, इस आंदोलन को कुचलने के लिए श्रीलंका में भारतीय सेना भेजे जाने के खिलाफ भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मानव बम से हत्या कर दी गई।</p>
<p>इक्कीसवीं सदी में अब हम मानव बमों से होने वाले फिदायीन हमले के युग में जी रहे हैं। यह आतंकवाद का सबसे वीभत्स रूप है, जिसमें इंसान के जेहन में इतना जहर घोल दिया जाता है कि वह हत्या करने के लिए अपनी जान पर खेलने को तैयार हो जाता है। मानव बम से राजीव गांधी की हत्या के बाद पाकिस्तान में ट्रेंड आतंकवादियों ने भी वही तरीका अख्तियार किया है। एक तरफ टाइम बम रखकर आतंकवादी वारदातें करने का सिलसिला जारी है, तो दूसरी ओर दुनियाभर में फिदायीन हमले भी बढ़ रहे हैं। फिदायीन हमलावर यह सोचकर ही आते हैं कि उन्हें जिंदा वापस नहीं जाना है। बीसवीं सदी के आखिरी हफ्ते में भारतीय विमान का अपहरण करके कंधार ले जाया गया। उस समय भारत सरकार ने अमेरिका से मदद मांगी थी, जिसे अमेरिका ने अनसुना कर दिया, लेकिन ग्यारह सितंबर 2001 को अलकायदा के उन्नीस आतंकवादियों ने अमेरिका में चार हवाई जहाजों का अपहरण किया और उनकी न्यूयार्क, वाशिंगटन और पेनसिल्वानिया में महत्वपूर्ण अमेरिकी इमारतों के साथ भिड़ंत करके इस सदी का सबसे भीषण आतंकवादी वारदात की। तो अमेरिका ने इस घटना के फौरन बाद संयुक्त राष्ट्र की बैठक बुलाकर पूरी दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने की मुहिम छेड़ी। सुयंक्त राष्ट्र की अपील के बाद पूरी दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ कड़े कानून बनाए गए, भारत में भी आतंकवाद निरोधक कानून पोटा लागू किया गया, लेकिन उसके संसद से पास होने से पहले ही तेरह दिसंबर 2001 को सात आतंकवादियों ने भारतीय संसद में घुसकर फिदायीन हमला कर दिया। जहां एक तरफ पूरी दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया जा रहा है, वहां भारत में आतंकवादी कानून को लेकर राजनीति हुई और 2004 में कांग्रेस ने सत्ता में आते ही पोटा कानून को रद्द कर दिया। संसद पर हमला करने की साजिश रचने वाले अफजल की फांसी पर अनिश्चित कालीन रोक लगा दी गई है। भारत की आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की अनिच्छा से आतंकवादियों के हौसले बढ़ गए हैं। पिछले चार सालों में आतंकवादी वारदातों के रिकार्ड टूट गए हैं। सबसे ताजा उदाहरण मुंबई में हुआ फिदायीन हमला है। जिसमें समुद्र के रास्ते पाकिस्तान से आए सिर्फ दस आतंकवादियों ने मुंबई के दक्षिणी छोर से प्रवेश करके कुछ घंटों के भीतर होटल ताज, होटल ओबराय, छत्रपति शिवाजी टर्मिनल रेलवे स्टेशन और भारत में यहूदियों की इमारत छाबड़ सेंटर नरीमन पाइंट पर कब्जा कर लिया। साठ घंटे तक चली मुठभेड़ में सभी दस फिदायीन आतंकवादी तो मारे गए, लेकिन बीस विदेशी मेहमानों समेत कम से कम दो सौ लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। शुरुआती छानबीन में पता चला है कि आतंकवादियों को पाक अधिकृत कश्मीर और कराची में ट्रेनिंग दी गई थी। पाकिस्तानी जहाज आतंकवादियों को भारतीय सीमा तक छोड़ने आया था। भारतीय सीमा में घुसने के बाद आतंकवादियों ने भारतीय मछुआरे की बोट पर कब्जा किया और कोलाबा के सूसोन डाक से तट पर उतर गए। अब एक नई बहस शुरू हो गई है, खुफिया एजेंसियों ने समय रहते सूचना दी थी या नहीं। राज्य सरकार और खुफिया एजेंसियां एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं।</p>
<p>क्या भारत में आतंकवाद का राजनीतिकरण हो गया है? क्या ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि ज्यादातर वारदातों में एक ही समुदाय के विदेशी आतंकवादी शामिल हैं? क्या कुछ भारतीय राजनीतिक दल उस समुदाय के भारतीय नागरिकों का वोट हासिल करने के लिए आतंकवाद पर नरम रुख अपना रहे हैं? अगर ऐसा है, तो क्या वे राजनीतिक दल उस समुदाय के भारतीय नागरिकों की राष्ट्रभक्ति पर संदेह नहीं कर रहे हैं? क्या आतंकवाद को किसी धर्म के साथ जोड़कर देखना राष्ट्र के प्रति अपराध नहीं? जिन लोगों ने बटवारे के समय भारत चुना था, अब उनकी निष्ठा पर सवाल क्यों उठाया जा रहा है? क्या नेताओं के लिए देश से बड़ा वोट हो गया है? बोट से घुसपैठ करने वालों से तो एनएसजी ने निपट लिया, अब वोट से सत्ता हासिल करने वालों से निपटना बाकी है।</p>
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		<title>आतंकवाद से लड़ने की इच्छाशक्ति चाहिए</title>
		<link>http://indiagatenews.com/india-news/580.php</link>
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		<pubDate>Fri, 28 Nov 2008 04:42:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[समुद्री रास्ते से आतंकवाद की आशंका भी सही साबित हो गई है। राजनेता सुरक्षा एजेंसियों की सलाहों को दरकिनार करके आतंकवाद पर राजनीतिक नजरिया अपनाएंगे, तो आतंकवाद से नहीं लड़ा जा सकता।
करीब दो साल पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने पहली बार समुद्री रास्ते से आतंकवादियों के प्रवेश की आशंका जाहिर करके देश को [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>समुद्री रास्ते से आतंकवाद की आशंका भी सही साबित हो गई है। राजनेता सुरक्षा एजेंसियों की सलाहों को दरकिनार करके आतंकवाद पर राजनीतिक नजरिया अपनाएंगे, तो आतंकवाद से नहीं लड़ा जा सकता।</strong></p></blockquote>
<p>करीब दो साल पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने पहली बार समुद्री रास्ते से आतंकवादियों के प्रवेश की आशंका जाहिर करके देश को चौंका दिया था। इसके करीब एक साल बाद तीस जून 2007 को संसद पटल पर रखी आतंरिक सुरक्षा की बाबत रपट में कहा गया था कि समुद्री मार्गों से खतरे की संभावना को देखते हुए तटीय क्षेत्रों की गश्त और निगरानी के लिए तटीय सुरक्षा योजना शुरू की गई है। तटीय पुलिस थानों को 204 नौकाओं, 149 जीपों और 318 मोटरसाईकिलों से सुसज्जित किया जा रहा है। गृहमंत्रालय की इस रिपोर्ट में महाराष्ट्र और गुजरात की तटीय सीमा से आतंकवादियों की घुसपैठ की आशंका को देखते हुए &#8216;आपरेशन स्वान&#8217; नाम से एक योजना का जिक्र है। छब्बीस नवम्बर 2008 को वह घटना हो गई, जिसकी आशंका इस रिपोर्ट में जाहिर की गई थी। <span id="more-580"></span>आतंकवादी मुंबई के कोलाबा तटीय इलाके के सूसोन डाक में वोट के जरिए दाखिल हुए। यह वह तटीय इलाका है जहां पर कोली जाति के समुद्री मछुवारे रहते हैं। इस तटीय क्षेत्र को मछुवारों के अलावा कोई इस्तेमाल नहीं करता। इसलिए जब मछुवारों ने रॉफ्टिंग के लिए इस्तेमाल की जाने वाली नाव पर दस आतंकवादियों को उतरते हुए देखा, तो फौरन पुलिस को सूचित किया। लेकिन संसद में 30 जून 2007 को रखे गए स्थिति दस्तावेज में जिस तटीय सुरक्षा योजना को लागू करने का दावा किया गया था, वह वहां मौजूद नहीं थी, अलबत्ता निकटवर्ती पुलिस ने सूचना मिलने के बाद भी तत्परता नहीं दिखाई।</p>
<p>राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन की ओर से दो साल पहले जाहिर की गई आशंका सच साबित हो गई है। सिर्फ इतना नहीं, बल्कि समुद्र के जरिए मुंबई के दक्षिणी हिस्से में प्रवेश करने वाले आतंकवादियों ने भारत में अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला करके पिछले चार साल से आतंकवाद से लड़ने के लिए अपनाई जा रही लुंज-पुंज नीति पर कड़ा प्रहार किया है। आतंकवादियों ने छब्बीस नवम्बर को रात करीब साढ़े आठ बजे बोट से उतरकर एक घंटे के भीतर दक्षिणी मुंबई के कम से कम पांच जगहों पर गोलीबारी शुरू कर दी थी। इससे साफ है कि यह तैयारी एक घंटे मात्र की नहीं थी, अलबत्ता आतंकवादी खुद पहले भी इस पूरे इलाके का मुआइना कर चुके थे, या जिन-जिन जगहों पर आतंकवादियों को हमला करना था, वहां-वहां उनके स्थानीय सैल पहले से मौजूद थे। बाहर से आकर आतंकवादियों का कोई गिरोह इस तरह एक घंटे के भीतर इतना बड़ा आपरेशन नहीं कर सकता। इससे स्पष्ट है कि लंबे अर्से से तैयारी चल रही थी, लेकिन खुफिया तंत्र और तटीय सुरक्षा प्रणाली पूरी तरह विफल हो गई। सूसोन डाक पर उतरने के लिए जिस बोट का इस्तेमाल किया गया था, वह बहुत ज्यादा दूर से नहीं आई होगी, इसलिए संभव है कि मुंबई के ही किसी दूसरे हिस्से से आतंकवाद की वारदात के ठिकाने पर पहुंचने के लिए इस रास्ते का इस्तेमाल किया गया होगा। अगर यह नहीं, तो निश्चित रूप से आतंकवादी किसी बड़ी बोट या समुद्री जहाज से मुंबई के इर्द-गिर्द पहुंचे होंगे और बाद में उन्होंने रॉफ्टिंग बोट का इस्तेमाल किया होगा।</p>
<p>सवाल पैदा होता है कि बार-बार हो रहे आतंकवादी हमलों के बावजूद खुफिया तंत्र सक्रिय क्यों नहीं हो रहा। क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति में कमी की वजह से खुफिया तंत्र और सुरक्षा एजेंसियां उतने उत्साह से काम नहीं कर रही, जितने उत्साह से करना चाहिए। ग्यारह सितंबर 2001 को न्यूयार्क में हुए आतंकवादी हमले के बाद से अब तक अमेरिका में कोई बड़ा आतंकवादी हमला नहीं हुआ। ब्रिटेन की भूमिगत मेट्रो ट्रेनों में आतंकी वारदात के बाद पिछले चार साल से कोई बड़ी आतंकी वारदात नहीं हुई है। फिर क्या वजह है कि भारत में हर दूसरे-तीसरे महीने एक बड़ी आतंकवादी वारदात हो जाती है। अमेरिका ने न्यूयार्क पर हुए आतंकवादी हमले के सत्रह दिन बाद ही संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाकर आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम उठाने का फैसला करवा लिया था। अट्ठाईस सितंबर 2001 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव संख्या 1373 पास करके दुनियाभर से आग्रह किया था कि सभी देशों में आतंकवाद के खिलाफ कड़े कानून बनाए जाएं। इसी का अनुपालन करते हुए तत्कालीन भारत सरकार ने भी तत्परता दिखाते हुए तीस दिनों के भीतर पच्चीस अक्टूबर 2001 को आतंकवाद के खिलाफ अध्यादेश के जरिए कड़ा कानून लागू कर दिया था, जिसे संसद के दोनों सदनों की साझा बैठक बुलाकर &#8216;पोटा&#8217; नाम से पास किया गया। संसद की साझा बैठक इसलिए बुलानी पड़ी थी, क्योंकि आतंकवाद के खिलाफ कड़े कानून के लिए राजनीतिक आम सहमति नहीं थी।</p>
<p>कुछ राजनीतिक दलों ने आतंकवाद विरोधी कानून को एक समुदाय विशेष के खिलाफ बताकर उनकी सहानुभूति हासिल करने की कोशिश की और चुनावों में उनसे कड़ा कानून हटाने का वादा किया। मौजूदा सरकार ने सत्ता में आते ही आतंकवाद के साथ पहला समझौता यह किया कि बहुमत का फायदा उठाते हुए &#8216;पोटा&#8217; कानून रद्द कर दिया। क्या मौजूदा सरकार की आतंकवाद के खिलाफ कड़ा कदम उठाने की अनिच्छा और कड़े कानून पर राजनीतिक आम सहमति का अभाव खुफिया तंत्र और सुरक्षा एजेंसियों की मुस्तैदी को प्रभावित नहीं कर रहा है? पिछले चार सालों से आतंकवादी वारदातों में लगातार इजाफा हो रहा है, अलबत्ता पहले से भीषण वारदातें हो रही हैं और मरने वालों की तादाद भी बढ़ रही है। राजनीतिक नेता मौका-मुआइना करके आतंकवाद से मिल जुलकर लड़ने और सख्त कदम उठाने के वादे करते हैं, इसके बावजूद कोई सख्त कदम नहीं उठाया जाता। आतंकवादी वारदातों के बाद गृहमंत्रालय आतंरिक सुरक्षा पर राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों की बैठक बुलाकर आतंरिक सुरक्षा पर नई रणनीति पर विचार-विमर्श करता है। पुलिस महानिदेशक इन बैठकों में कड़े कानून की मांग करते रहे हैं, लेकिन सरकार में राजनीतिक इच्छाशक्ति न होने के कारण सुरक्षा एजेंसियों को सख्त कानून से लैस नहीं किया जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों से कहा जाता है कि &#8216;पोटा&#8217; होने के बावजूद संसद पर हमला हो गया था, इसलिए आतंकवाद से लड़ने के लिए सख्त कानून की जरूरत नहीं। जब पुलिस महानिदेशक सख्त कानून के जरिए वारदात की गुत्थी सुलझाने में मददगार होने और सख्त कानून के कारण अमेरिका और ब्रिटेन में आतंकवाद पर काबू पा लिए जाने का उदाहरण देते हैं, तो उनकी अनदेखी कर दी जाती है। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सुरक्षा एजेंसियों को ज्यादा मुस्तैद होने और आपसी तालमेल बढ़ाने पर जोर देते हैं।</p>
<p>बारह सितंबर 2008 को दिल्ली में हुए बम धमाकों के बाद सरकार ने कुछ ज्यादा गंभीरता दिखाई थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर से बनाई गई प्रशासनिक सुधार कमेटी के अध्यक्ष वीरप्पा मोइली ने हाथों हाथ एक रिपोर्ट सौंप दी थी जिसमें आतंकवाद के खिलाफ कड़ा कानून बनाने की सिफारिश की गई थी। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन भी कड़े कानून के पक्ष में थे, खुद प्रधानमंत्री ने भी कड़े कदम उठाने की बात कही थी, इसके बावजूद सरकार आम सहमति पर नहीं पहुंच सकी। केबिनेट बैठक के बाद बताया गया कि सरकार आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम उठाएगी लेकिन सख्त कानून बनाने पर कोई विचार नहीं हुआ। उनतीस सितंबर 2008 को मालेगांव में हुए बम धमाकों में छह लोग मारे गए। मुंबई की एटीएस ने मौका-ए-वारदात से मिले मोटर साईकिल को निशानदेही मानकर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को गिरफ्तार किया, जबकि वह अपना मोटर साईकिल 2004 में बेच चुकी थी। प्रज्ञा ठाकुर का संबंध प्रखर हिंदुवादी &#8216;अभिनव भारत&#8217; नाम के संगठन के साथ था, इसलिए इस संगठन से जुड़े सभी नेताओं की धर पकड़ शुरू करके देश में आतंकवाद की नई राजनीति शुरू हो गई। तेईस नवंबर को ही राष्ट्रीय सुरक्षा पर दिल्ली में हुई देशभर के पुलिस महानिदेशकों की बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दिल्ली बम धमाकों के बाद दिए गए सख्त कदम के बयान को दोहराते हुए सौ दिनों में आतंकवाद के खिलाफ &#8216;रोड मैप&#8217; बनाने की बात कही थी। प्रधानमंत्री के इस बयान की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि आतंकवादियों ने मुंबई में इतना बड़ा हमला किया कि अब तक के सबसे बड़े संसद पर हुए हमले को भी भुला दिया।</p>
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		<title>आतंकवाद नहीं, सिर्फ मुद्दे से निजात की कोशिश</title>
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		<pubDate>Mon, 27 Oct 2008 18:35:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[India Gate se Sanjay Uvach]]></category>
		<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी पर कई सवाल। क्या सचमुच हिंदुओं के सब्र का प्याला भर चुका। क्या रिटायर्ड फौजी भी आतंकवाद के तुष्टिकरण की नीति से खफा। पर इन दो सवालों से पहले एक मूल सवाल। सवाल पुलिस एफआईआर की विश्वसनीयता का। अदालत में आधे केस ठहरते ही नहीं। इमरजेंसी में इसी पुलिस ने कितने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी पर कई सवाल। क्या सचमुच हिंदुओं के सब्र का प्याला भर चुका। क्या रिटायर्ड फौजी भी आतंकवाद के तुष्टिकरण की नीति से खफा। पर इन दो सवालों से पहले एक मूल सवाल। सवाल पुलिस एफआईआर की विश्वसनीयता का। अदालत में आधे केस ठहरते ही नहीं। इमरजेंसी में इसी पुलिस ने कितने मनघढ़ंत केस बनाए। संघ के अधिकारियों पर भैंस चोरी तक के केस बने। बर्तन चोरी तक के केस बनाए गए। अपने पास ऐसे एक-आध नहीं। दर्जनों केसों के सबूत मौजूद। <span id="more-501"></span>पुलिस आकाओं के इशारे पर काम करने में माहिर। सो पहला अंदेशा राजनीतिक दखल का। आखिर राजनीतिक दखल से ही अफजल की फांसी अब तक नहीं हुई। अगर यह केस राजनीतिक दखल से नहीं बना। तब भी एक तकनीकी सवाल बाकी। क्या मोटर साईकिल का चेसी नंबर ही प्रज्ञा को आतंकी साबित कर देगा? अगर ऐसा संभव। तो दिल्ली के जामा मस्जिद के पीछे जितनी चाहे चेसियां खरीद लो। मोटर साईकिलों की या कारों की भी। अपन को नहीं लगता। कोर्ट में इतना सबूत ही काफी होगा। दिल्ली के करोलबाग में सेकिंडहैंड मोटर साईकिलों का बाजार। हर रोज दर्जनों मोटर साईकिलों की खरीद-फरोख्त। आधे सिर्फ स्टांप पेपर पर बिक जाते हैं। रजिस्ट्री तक नहीं होती। रजिस्ट्री के मामले में कानून में ही सुराख। बेचने वाले की कोई जिम्मेदारी नहीं। रजिस्ट्री करवाना खरीदने वाले की जिम्मेदारी। अपन दो कारें बेच चुके। किसी की रजिस्ट्री करवाने नहीं गए। पर इससे गंभीर किस्सा स्कूटर का। अपन जब चंडीगढ़ में हुआ करते थे। तो अपन ने बजाज का चेतक स्कूटर खरीदा। दिल्ली में जब अपन ने कार ले ली। तो स्कूटर कई महीने गैराज में धूल फांकता रहा। इनकम टेक्स में अपने एक मित्र हुआ करते थे बीबी सिंह। उनने अपने दामाद को देने के लिए अपन से स्कूटर मांगा। तो अपन ने फौरन हां कर दी। खरीद-फरोख्त की बात ही नहीं थी। पर कुछ महीने बाद उनने लिफाफे में रखकर कुछ पैसे थमा दिए। पैसे स्कूटर की कीमत से ज्यादा थे। सो बातचीत की गुंजाइश नहीं बची। बीबी सिंह अब इस दुनिया में नहीं। उनके दामाद का अपन को अता-पता नहीं। कबाड़ में बिका हुआ स्कूटर किसी दिन अपन को आतंकी न बना दे। दुनियादारी में ऐसे सेकड़ों-हजारों किस्से मिलेंगे। कानूनदानों की नजर में प्रज्ञा का मोटर साईकिल सबूत नहीं। तो क्या पुलिस के पास कुछ और भी सबूत। अपन ने आईबी के एक अफसर से पूछा। तो वह बोला- &#8216;फिलहाल नहीं।&#8217; अब सवाल पुलिस की एफआईआर का। कहीं आतंकवाद का मुद्दा खत्म करने की रणनीति तो नहीं? आतंकवाद की गंभीरता कम करने की साजिश तो नहीं? आखिर बीजेपी वाले कहने लगे थे- &#8216;हर मुसलमान आतंकी नहीं। पर पकड़ा गया हर आतंकी मुसलमान।&#8217; इस आरोप की हवा निकालने की साजिश तो नहीं? कांग्रेस और यूपीए आतंकवाद का तुष्टिकरण करते पकड़े जा चुके। आतंकवाद के तुष्टिकरण से निजात पाने की कोशिश तो नहीं? सरकार जरा इस पर गंभीरता से सोच ले। हिंदुओं और मुसलमानों में खाई बढ़ा देगी यह साजिश। पर अगर यह सब नहीं। तो क्या सचमुच हिंदुओं के सब्र का प्याला भर चुका। क्या आतंकवादियों के हाथों जान गंवाने वाले फौजियों का शासन से भरोसा उठ चुका? अगर सचमुच प्रज्ञा ने बदला लेने की ठानी? अगर सचमुच रिटायर्ड फौजियों ने प्रज्ञा का साथ दिया? जैसा कि पुलिस की थ्योरी ने कहा। तो सचमुच देश की जनता का हुकमरानों से मोह भंग हो चुका। मोह भंग हो चुका- कि मौजूदा शासक आतंकवाद से निजात दिला सकते हैं। दीपावली पर सरकार को भी रोशनी मिले। तो मुद्दे से नहीं, आतंकवाद से निपटने की कोशिश शुरू हो।</p>
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		<title>देश के साथ विश्वासघात</title>
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		<pubDate>Sat, 27 Sep 2008 20:10:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>
		<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[एटमी करार से देश का परमाणु शक्तिसंपन्न होने और सुरक्षा परिषद सीट का दावा हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो गया। मनमोहन सिंह एटमी ऊर्जा के लिए देश की सुरक्षा को गिरवी रखने के साथ-साथ आतंकवाद के लिए देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए भी याद किए जाएंगे।
एटमी करार के कारण भारत-अमेरिका के रिश्तों में व्यापक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>एटमी करार से देश का परमाणु शक्तिसंपन्न होने और सुरक्षा परिषद सीट का दावा हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो गया। मनमोहन सिंह एटमी ऊर्जा के लिए देश की सुरक्षा को गिरवी रखने के साथ-साथ आतंकवाद के लिए देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए भी याद किए जाएंगे।</strong></p></blockquote>
<p>एटमी करार के कारण भारत-अमेरिका के रिश्तों में व्यापक बदलाव आ रहा है। पाकिस्तान में भी निजाम बदलने से अमेरिका के साथ उसके रिश्तों में बदलाव आ रहा है। परवेज मुशर्रफ के परिदृश्य से हटने को अलकायदा अपनी जीत मान रहा है। <span id="more-434"></span>नतीजतन अफगानिस्तान से लगते पाकिस्तानी हलकों में अलकायदा की गतिविधियां बढ़ी हैं। अलकायदा ने अपनी जीत का जश्न पिछले हफ्ते इस्लामाबाद के मैरियट होटल में भी मनाया। अफगानिस्तान से लगते पाकिस्तानी इलाकों में अलकायदा ने नए अड्डे बना लिए हैं। इसलिए आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका को इस समय पाकिस्तान की ज्यादा जरूरत है। परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल में पाकिस्तानी सरकार अमेरिकी फौजों को खुफिया जानकारियां और मदद पहुंचा रही थीं। जबकि निजाम बदलने के बाद नई सरकार अमेरिका के साथ सहयोग में फूंक-फूंककर कदम रख रही है। नतीजा यह निकला है कि अफगानिस्तान में तैनात अमेरिकी फौजों को पाकिस्तान में घुसकर आतंकी ठिकाने नष्ट करने पड रहे हैं। पिछले हफ्ते पाकिस्तानी फौज ने अमेरिकी हेलीकाप्टर पर निशाना साधकर अपने क्षेत्र की संप्रभुता को चुनौती अस्वीकार कर दी। टि्वन टावर पर आतंकी हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का ऐलान किया था। तब भारत के विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने अफगानिस्तान में अलकायदा के खिलाफ कार्रवाई के लिए सहयोग का एक तरफा ऐलान कर दिया था। जबकि अमेरिका ने उस समय भारत की बजाए पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अपने सहयोगी के रूप में चुना। अब हालात बदल चुके हैं। अमेरिका को अपना पहले नंबर का दुश्मन मानने वाले मुस्लिम कट्टरपंथी पाकिस्तान को भी अपने निशाने पर ले चुके हैं। परवेज मुशर्रफ अमेरिका का सहयोग करने का खामियाजा भुगत चुके हैं। इसलिए मरहूम बेनजीर भुट्टो की पार्टी पीपीपी अमेरिका के बारे में फूंक-फूंककर कदम उठा रही है। बदले हालात में अमेरिका अब भारत को अपने नए दोस्त के तौर पर मान रहा है, जबकि पाकिस्तान को आतंकवादियों के नए अड्डे के रूप में मानने लगा है।</p>
<p>पाकिस्तान की सरकार अमेरिका से अपने रिश्तों और घरेलू आतंकवाद के बीच झूल रही है। ठीक उसी तरह भारत भी अमेरिका से नए रिश्तों और घरेलू आतंकवाद के बीच झूल रहा है। पिछले चार-पांच साल में भारत और पाकिस्तान में विदेश नीति और आतंकवाद के मुद्दे पर बड़ा बदलाव हुआ है। भारत सभी आतंकवादी वारदातों का ठीकरा पाकिस्तान में बैठे आतंकवादियों के सिर फोड़ता रहा था। साढ़े चार साल पहले भारत में निजाम बदलने के बाद नई सरकार की आतंकवाद के प्रति नीति में व्यापक बदलाव आया। नतीजा यह निकला कि आतंकवाद के प्रति यूपीए सरकार की नरम नीति का फायदा उठाकर पाकिस्तान आधारित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तोएबा आदि ने भारतीय मुसलमानों को  फुसलाकर इंडियन मुजाहिदीन खड़ी कर ली। अब पाकिस्तान और भारत दोनों ही देशों में घरेलू आतंकवादी संगठन काम कर रहे हैं। यूपीए सरकार की नई नीति ने पाकिस्तान को आतंकवाद पनपाने के आरोप से बरी कर दिया है। पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिका के इशारे पर कहते थे कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही आतंकवाद के शिकार हैं। जबकि अब उन्हें मजबूरी में यही बात कहनी पड़ेगी। काबुल में भारतीय दूतावास पर आतंकी हमले के बाद मनमोहन सिंह ने जरूर कहा था कि वारदात में आईएसआई का हाथ है। लेकिन इस्लामाबाद के मैरियट होटल पर हुए आतंकी हमले के बाद 24 सितम्बर को न्यूयार्क में आसिफ अली जरदारी से मुलाकात के दौरान मनमोहन सिंह ने वही पुराना बयान दोहरा दिया कि दोनों देश आतंकवाद के शिकार हैं।</p>
<p>मनमोहन सिंह दो बातों के लिए निश्चित रूप से याद किए जाएंगे। पहली बात यह कि उन्होंने एटमी करार करके देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए भारत को अमेरिका का मोहताज बना दिया। दूसरी बात यह कि उन्होंने भारत को आतंकवाद के मामले में आत्मनिर्भर बना दिया। यह यूपीए सरकार की नीतियों का ही नतीजा है कि नई दिल्ली के जामिया इलाके में इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादियों से हुई लाइव मुठभेड़ पर भारतीय मुसलमान सवालिया निशान लगा रहे हैं। यह भी यूपीए सरकार की आतंकवाद के प्रति नरम रुख अपनाने की नीति का ही नतीजा है कि सरकारी अनुदान पर चलने वाली जामिया यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर पकड़े गए आतंकवादियों को वकील मुहैया करवाने का ऐलान करते हैं। दिल्ली में संभवत: यह पहला मौका था जब खबरिया चैनलों पर मुठभेड़ का सीधा प्रसारण हो रहा था। लाशों को उठाकर ले जाते और एक आतंकवादी को गिरफ्तार किए जाने की घटना को लाखों लोगों ने सीधे प्रसारण के जरिए देखा। बाटला हाऊस इलाके में दोनों तरफ से चली गोलियों की आवाजें सुनने वाले दर्जनों गवाह मौजूद हैं। इसके बावजूद भारतीय मुसलमानों की समन्वय समिति ने मुठभेड़ और मुठभेड़ के तौर-तरीकों पर सवालिया निशान लगाया है। कोई छोटी-मोटी संस्था इस तरह का सवाल खड़ा करती, तो उसकी अनदेखी की जा सकती थी। मुसलमानों की समन्वय समिति में जमायत-ए-इस्लामी हिंद, ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशवारत, जमायत उलमा-ए-हिंद, ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल, जमायत अहल-ए-हदीस, मुस्लिम पालिटिकल काउंसिल, मजलिस-ए-फिक्र-ओ-अमल, जामिया नगर कोआर्डिनेशन कमेटी, मजलिस-ए-उलेमा-ए-इस्लाम जैसे मुस्लिम संगठन शामिल हैं। कुल मिलाकर पूरे मुस्लिम समुदाय ने मुठभेड़ पर सवाल उठाया है। इसलिए यह देश के लिए सोचने का एक गंभीर मुद्दा बन गया है।</p>
<p>हिंदुओं और मुसलमानों में आजादी से पहले जैसे परस्पर विरोधी बयानबाजी शुरू हो गई है। इन सभी मुस्लिम संगठनों ने विश्व हिंदूपरिषद, बजरंग दल, श्रीराम सेना, हिंदू मुन्नानी, हिंदू जागरण मंच, युवा हिंदू वाहिनी, हिंदू जन जागृति समिति और दुर्गावाहिनी को आतंकवादी संगठन करार देते हुए प्रतिबंध लगाने की मांग की है। जबकि हिंदू धर्मावलंबी कर्नाटक में धर्मांतरण और हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ छपी किताबों की प्रतिक्रिया में हुई हिंदू हिंसा के समर्थन में बयानबाजी कर रहे हैं। हिंदू संगठन आतंकवाद के खिलाफ सख्त कानून बनाने और उसमें जमानत को मुश्किल करने, आतंकवादी के पुलिस हिरासत में आईपीएस अफसर की ओर से लिए गए बयान को सबूत के तौर पर मानने की मांग कर रहे हैं, तो मुसलमान ऐसे सख्त कानून के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं जिसमें ये सब प्रावधान हों। अभी तक सभी दलों के राजनीतिक दल नेता यही कहते थे कि आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। खासतौर पर आजमगढ़ के आतंकवादियों की देशभर में कई जगहों पर गिरफ्तारियों के बाद भाजपा महासचिव गोपीनाथ मुंडे ने कहा है कि सब मुसलमान आतंकवादी नहीं, जबकि पकड़े गए सब आतंकवादी मुसलमान हैं। इस असलियत से मुंह छुपाने का कोई फायदा नहीं होगा कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अविश्वास की खाई बढ़ रही है।</p>
<p>इस असलियत से भी मुंह छुपाने का कोई फायदा नहीं कि अमेरिका से एटमी करार ने भी भारतीय मुसलमानों को आक्रोशित किया है। अमेरिका की नीतियों ने पहले पाकिस्तानी मुसलमानों को खफा किया और अब भारतीय मुसलमान खफा हो रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने सोची समझी रणनीति के तहत मनमोहन सिंह के साथ एटमी करार किया। हालांकि एटमी ऊर्जा ईंधन कानून की धारा 123 के तहत भारत से एटमी करार के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश को अपने देश का समर्थन हासिल नहीं है। इसलिए अमेरिकी कांग्रेस ने बाकायदा शर्त लगाई है कि भारत के परमाणु परीक्षण करने पर अमेरिका ही नहीं, अलबत्ता एटमी ऊर्जा ईंधन सप्लाई करने वाले सभी पैंतालीस देश ईंधन की सप्लाई रोक दें। भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी अमेरिका के साथ एटमी करार के लिए देश की जनता का समर्थन हासिल नहीं है। सांसदों की खरीद-फरोख्त करके उन्होंने अपनी सरकार बचाई है। खरीद-फरोख्त से बची सरकार को अंतरराष्ट्रीय समझौतों का नैतिक और संवैधानिक हक नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने करार पर बहस के समय संसद के माध्यम से देश से वायदा किया था कि करार के बाद भारत एटमी परीक्षण करने के हक से वंचित नहीं होगा। अमेरिकी कांग्रेस ने साफ-साफ कह दिया है कि भारत ने एटमी करार किया तो अमेरिकी कानूनों के मुताबिक करार खत्म हो जाएगा और एनएसजी देशों को भी अपना करार खत्म करने के लिए कहा जाएगा। मनमोहन सिंह यह तो अच्छी तरह जानते ही होंगे कि अमेरिका के कहने पर एनएसजी देश एटमी ऊर्जा ईंधन की सप्लाई करने को तैयार हो सकते हैं, तो उसके दबाव में सप्लाई बंद करने को भी बाध्य होंगे।  इस हालत में किया गया करार देश से किए गए वायदे का उल्लंघन ही नहीं अलबत्ता विश्वासघात है। अमेरिका से एटमी करार के बाद भारत सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट के दावे से बाहर हो जाएगा, भविष्य में कभी परमाणु परीक्षण नहीं कर पाएगा। ईंधन के लिए अमेरिका और बाकी 44 एनएसजी देशों का मोहताज हो जाएगा।</p>
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		<title>दो आतंकी भाग गए तो पाटिल का क्या कसूर</title>
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		<pubDate>Fri, 19 Sep 2008 18:39:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[India Gate se Sanjay Uvach]]></category>
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		<description><![CDATA[अपने मीडिया में भी तिस्ता सीतलवाड़ों, पीयूडीआर, पीयूसीएल जैसों की कमी नहीं। कहीं मुठभेड़ हुई नहीं। लगेंगे फर्जी बताने। इस बार तो इलाके की मुस्लिम जनता को भी भड़काया। ठीक उसी तरह, जैसे 1999 में विमान अपहरण के समय भड़काया था। शुक्रवार को दिल्ली के जामिया इलाके में आतंकियों से मुठभेड़ हुई। मुठभेड़ खत्म भी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>अपने मीडिया में भी तिस्ता सीतलवाड़ों, पीयूडीआर, पीयूसीएल जैसों की कमी नहीं। कहीं मुठभेड़ हुई नहीं। लगेंगे फर्जी बताने। इस बार तो इलाके की मुस्लिम जनता को भी भड़काया। ठीक उसी तरह, जैसे 1999 में विमान अपहरण के समय भड़काया था। शुक्रवार को दिल्ली के जामिया इलाके में आतंकियों से मुठभेड़ हुई। मुठभेड़ खत्म भी नहीं हुई थी। सबसे तेज चैनल के मानवाधिकारी खबरची ने कांग्रेस  ब्रीफिंग में पूछा- &#8216;मुठभेड़ को फर्जी बताया जा रहा है। कांग्रेस का क्या कहना है?&#8217; <span id="more-418"></span>उसने यह भी नहीं सोचा- आतंकियों की गोली से जख्मी दो पुलिसिए मौत से जूझ रहे थे। शाम होते-होते इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हो गए। शुक्रवार की मुठभेड़ से कांग्रेस बेहद खुश। अभिषेक मनु सिंघवी फूले नहीं समाए। अहमदाबाद से लाए गए अब्दुल बशीर से मिले सुराग पर मुठभेड़ हुई। पर पाटिल, पुलिस, सिंघवी अपनी पीठ थपथपाने लगे। लगे अब्दुल बशीर से मिले सुराग का खंडन करने। पर सब जानते हैं- आतंकियों तक पहुंची मोदी की गुजरात पुलिस। वहीं से मिला सुराग, तो दिल्ली पुलिस पहुंची जामिया। मुठभेड़ की सफलता से सिंघवी के नुथने फूल गए। लगते हाथों धर्मांतरण के खिलाफ हुई हिंसा पर येदुरप्पा को धमकी देते हुए बोले- &#8216;कर्नाटक और उड़ीसा सरकारें केंद्र को लाचार न समझें।&#8217; यह सीधा-सीधा बर्खास्तगी की धमकी। चर्च और क्रिश्चियन कांग्रेसियों की सबसे बड़ी कमजोरी। सो मनमोहन सरकार ने पहले 355 के तहत कर्नाटक, उड़ीसा सरकारों को नोटिस दिया। मध्यप्रदेश के कांग्रेसियों का दबाव पड़ा। तो शिवराज सरकार को भी नोटिस। बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- &#8216;356 से पहले 355 के तहत नोटिस देना चाहिए।&#8217; यानी कांग्रेस गैर कांग्रेसी सरकारों को बर्खास्त करने की पुरानी करतूतों पर उतारू। 356 यानी सरकार की बर्खास्तगी। 355 यानी बर्खास्तगी से पहले चेतावनी। सोनिया मैनो गांधी को खुश करने का मौका क्यों चूकते मनमोहन। सिंघवी ने भी वही किया। पर नरेंद्र मोदी केंद्र की इस चेतावनी से भड़के। उनने कुछ तीखे सवाल किए- &#8216;असम में हिंदी भाषियों का कत्लेआम हुआ। तो आपने 355 का नोटिस क्यों नहीं दिया? नंदीग्राम में लोगों के मानवाधिकार का हनन हुआ। तो आपने बंगाल सरकार को नोटिस क्यों नहीं दिया? कश्मीर को हिंदू रहित किया जा रहा था। तो कांग्रेस सरकार क्यों सोई थी?&#8217; गुजरात का सीएम बनने के बाद मोदी पहली बार दिल्ली में गरजे। वह उसी जगह पर रैली में गरजे। जहां तेरह सितंबर को आतंकियों ने बम फोड़े थे। उनने सीधा मनमोहन-पाटिल पर हमला किया। बात एचएम की चली। तो बताते जाएं- यह शिवराज पाटिल की छवि का ही नतीजा। जो लोग उनके पुलिस हेडक्वार्टर पहुंचने पर ऊंगली उठाने लगे। दिल्ली के जामिया इलाके में जब मुठभेड़ चल रही थी। तब पाटिल आनन-फानन में पुलिस हेड क्वार्टर पहुंचे। उसी समय मुठभेड़ बंद हो गई। दो आतंकियों का फरार हो जाना। पाटिल ने पहले सिमी पर बैन हट जाने दिया। बवाल मचा, तो नए सिरे से बैन लगाया। इस बार बैन की हिमायत में अदालत को सबूत नहीं दिए। कोर्ट ने बैन हटा दिया। तो बवाल मचते ही सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा। अफजल की फांसी पर सिर्फ कुंडली मारकर नहीं बैठे। अलबत्ता अफजल के पक्ष में दलील दी- &#8216;सरबजीत की रिहाई मांगने वाले अफजल की फांसी कैसे मांग सकते हैं।&#8217; ऐसे रिकार्ड वाले पाटिल पुलिस हेडक्वार्टर जाएं। मुठभेड़ रुक जाए। दो आतंकी भाग जाएं। तो शक होना ही था। सो लोगों ने ऊंगली उठाई। पुलिस प्रमुख डडवाल खंडन न करते। तो बर्खास्त होते। सो उनने फौरन अपनी नौकरी बचाई। वैसे भी पाटिल ने किसी को भगाने के लिए तो कहा नहीं होगा। उनने तो कहा होगा- महात्मा गांधी खून खराबे के खिलाफ थे। अगर यह नहीं कहा हो, तो कहा होगा- मुर्दा नहीं जिंदा पकड़ो। अब वे भाग गए, तो उसमें पाटिल का क्या कसूर।</p>
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		<title>&#8216;पाटिल&#8217; नहीं, देश को चाहिए &#8216;पोटा&#8217;-&#039;पटेल&#8217;</title>
		<link>http://indiagatenews.com/india-news/410.php</link>
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		<pubDate>Thu, 18 Sep 2008 04:27:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[India Gate se Sanjay Uvach]]></category>
		<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[कोई मां नहीं चाहती, उसका बेटा आतंकवादी बने। बेटा हत्यारा हो जाए। तो कोई मां जल्दी से भरोसा नहीं करती। सो अब्दुस सुभान कुरैशी उर्फ तौकीर की मां जुबैदा भी कैसे भरोसा करे। अपन ने सोलह सितंबर को तौकीर का जिक्र किया। विप्रो में कम्प्यूटर इंजीनियर था। इस्तीफा देकर अचानक गायब हो गया। इस्तीफे की [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कोई मां नहीं चाहती, उसका बेटा आतंकवादी बने। बेटा हत्यारा हो जाए। तो कोई मां जल्दी से भरोसा नहीं करती। सो अब्दुस सुभान कुरैशी उर्फ तौकीर की मां जुबैदा भी कैसे भरोसा करे। अपन ने सोलह सितंबर को तौकीर का जिक्र किया। विप्रो में कम्प्यूटर इंजीनियर था। इस्तीफा देकर अचानक गायब हो गया। इस्तीफे की वजह लिखी- &#8216;धार्मिक स्टडी करना चाहता हूं।&#8217; <span id="more-410"></span>बाद में पता चली उसकी धार्मिक स्टडी। यों तो शिवराज पाटिल ने खुफिया एजेंसियां भरोसे लायक नहीं छोड़ी। सारा ढांचा तहस-नहस कर दिया। पर टूटी-फूटी एजेंसियों का कहना है- &#8216;तौकीर ने पाकिस्तान जाकर ट्रेनिंग ली।&#8217; यों तौकीर के बारे में पहले खुफिया तंत्र बेखबर था। गुजरात पुलिस ने सबसे पहले इस नाम का खुलासा किया। पाकिस्तानी ट्रेनिंग की बात अपन बाद में करेंगे। शिवराज पाटिल की बात चल पड़ी। तो पहले पाटिल की ही बात। उनने कहा है- &#8216;मैं तेरह घंटे बाद नहा लेता हूं। कपड़े बदल लेता हूं, कोई गुनाह तो नहीं करता।&#8217; झूठ बोलने की भी हद। उस दिन जब बम धमाकों से लोग कराह रहे थे। आपने तीन घंटे में तीन सूट बदले। आप चाहें तो दिन में तीस बदलिए। सफेद, भूरा, सलेटी, काला, कोई भी बदलिए। हर सूट पर खून के घब्बे हैं। अब बात तौकीर की मां जुबैदा की। बुधवार को मुंबई में मीडिया के सामने आई। आजकल उतने लोग आतंकियों के खिलाफ सामने नहीं आते। जितने आतंकियों के समर्थन में सामने आने लगे। तीस्ता सीतलवाड से लेकर माजिद मेनन तक। पीयूसीएल से लेकर पीयूडीआर तक न जाने कितने संगठन। आतंकियों के ऐसे ही हमदर्दों ने जुबैदा की प्रेस कांफ्रेंस करवाई। वह बोली- &#8216;मेरा बेटा बेगुनाह। हमारी अच्छी बेकग्राउंड। वह ऐसा काम नहीं कर सकता। सात साल से वह घर नहीं आया। तीन साल से पत्नी को नहीं मिला।&#8217; कितना कांट्राडिक्ट्री है बयान। जुबैदा को पता है- उसका बेटा गुनाहगार है। तभी तो सात साल से अंडरग्राउंड। पर आतंकवादियों के हमदर्द बेगुनाह बताने पर उतारू। इसरत जहां का किस्सा कौन भूलेगा। पंद्रह जून 2004 को गुजरात में नरेंद्र मोदी को मारने आई थी। मुंबई की वह कालेजिएट लड़की मुठभेड़ में मारी गई। एनसीपी-एसपी के नेताओं ने इसरत जहां की मां को एक-एक लाख दिया। पीयूडीआर, पीयूसीएल जैसों ने जांच कर के मुठभेड़ को फर्जी बताया। पर लश्कर-ए-तोएबा का पाकिस्तान से बयान आया- &#8216;इसरत हमारे लिए काम करती थी।&#8217; अब तौकीर की हमदर्दी भी ठीक उसी तरह। पर अपन बात कर रहे थे तौकीर की पाकिस्तान से ट्रेनिंग की। अपन ने अमेरिका को पाक ट्रेनिंग कैंपों के दर्जनों सबूत दिए। पर मनमोहन ने सब गुड़ गोबर कर दिया। कहा- &#8216;पाकिस्तान भी भारत की तरह आतंकवाद का शिकार।&#8217; ऐसी चापलूसी नेहरू ने भी चीन की नहीं की थी। शुकर है मनमोहन को अब गलतियों का एहसास होने लगा। &#8216;पाटिल&#8217; की जगह &#8216;पटेल&#8217; और &#8216;पोटा&#8217; की जरूरत महसूस होने लगी। आतंकियों को पाकिस्तान की शह दिखने लगी। गवर्नरों के सम्मेलन में बुधवार को बोले- &#8216;पाकिस्तानी आतंकी भारत में गड़बड़ियां कर रहे हैं। ताजा बम धमाकों में लोकल आतंकी भी शामिल। यह खतरे का नया मोड़।&#8217; देर से ही सही। पीएम ने यह बात कबूल कर ली। पर पर इसका जिम्मेदार कौन। आप आतंकियों का तुष्टिकरण करेंगे। तो वे क्यों नहीं फले-फूलेंगे। नरेंद्र मोदी बता रहे थे- &#8216;सरकार सिमी पर नरम रही। सो सिमी ने इंडियन मुजाहिद्दीन बना ली।&#8217; जो काम लश्कर-ए-तोएबा 25 साल में नहीं कर सकी। मनमोहन की तुष्टिकरण नीति ने चार साल में कर दिया। अब खुफिया एजेंसियों पर नजला उतारने का क्या फायदा। बोए पेड़ बबूल का, तो आम कहां से होय। जेसी नीति अपनाई, जैसा होम मिनिस्टर बनाया। खुफिया एजेंसी भी वैसी ही बन गई। मनमोहन बोले- &#8216;खुफिया एजेंसियों में तालमेल नहीं। खुफिया तंत्र फेल हो गया।&#8217; पर खुफिया तंत्र को तो बेमौत मारा खुद होम मिनिस्टर पाटिल ने। अपन ने 15 सितम्बर को लिखा था- &#8216;अपना खुफिया विभाग बेमौत मर गया। जब सरकार का इरादा खुफिया जानकारियों के इस्तेमाल का ही न हो। तो बेचारे खुफिया कर्मचारी क्या करें। अपन को एक खुफिया अफसर बता रहा था- खुफिया रपटों पर गंभीर चर्चा अब बंद हो चुकी।&#8217;</p>
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		<title>सौ दिन में आतंकवाद विरोधी &#8216;पोटा&#8217; का वादा</title>
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		<pubDate>Mon, 15 Sep 2008 04:22:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[यूपीए सरकार आतंकवादियों के प्रति शुरू से नरम रही। अलबता आतंकवादियों से नरमी यूपीए का चुनावी वादा था। यूपीए और कांग्रेस की तारीफ करनी चाहिए। उनने चुनावों में किया वादा निभाया। सत्ता में आते ही आतंकवादियों को राहत दी। पहला कदम उठाया पोटा हटाने का। दूसरा कदम उठाया आतंकवादी की फांसी रुकवाने का। चुनावी वादा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>यूपीए सरकार आतंकवादियों के प्रति शुरू से नरम रही। अलबता आतंकवादियों से नरमी यूपीए का चुनावी वादा था। यूपीए और कांग्रेस की तारीफ करनी चाहिए। उनने चुनावों में किया वादा निभाया। सत्ता में आते ही आतंकवादियों को राहत दी। पहला कदम उठाया पोटा हटाने का। दूसरा कदम उठाया आतंकवादी की फांसी रुकवाने का। चुनावी वादा निभाने के लिए कांग्रेस की तारीफ करनी चाहिए। अपन तो आतंकवाद के प्रति बेवजह ही इतने गंभीर। एक दर्जन वारदातें ही तो हुई। एक हजार से ज्यादा लोग तो नहीं मरे होंगे। <span id="more-404"></span>अपन जब कभी आतंकी वारदात के बाद शिवराज पाटिल को टीवी पर देखते हैं। अपन को लगता है पाटिल ऊपर वाली दोनों  लाइनें कहेंगे। पाटिल के होम मिनिस्टर रहते एक बड़ा काम और हुआ। अपना खुफिया विभाग बेमौत मर गया। जब सरकार का इरादा खुफिया जानकारियों के इस्तेमाल का ही न हो। तो बेचारे खुफिया कर्मचारी क्या करें। अपन को एक खुफिया अफसर बता रहा था- खुफिया रपटों  पर गंभीर चर्चा अब बंद हो चुकी।&#8217; हर आतंकी हमले के बाद ही होम मिनिस्ट्री में मीटिंग होती है। खुफिया रपटों पर यूपीए गंभीर होती। तो उसके राज में दो बार सिमी पर रोक न हटती। यूपीए राज में सिमी की जड़े मजबूत हो गई। उसने &#8216;इंडियन मुजाहिद्दीन&#8217; बना लिया। जिसमें सारे मैंबर भारतीय। कुछ सीधे आतंकवादी वारदातों में शामिल। कुछ वारदात करने वालों को रहने-खाने पीने की मदद देंगे। लालू-पासवान-मुलायम की अब दोहरी वफादारी। एक वफादारी भारतीय संविधान के साथ। दूसरी वफादारी देश विरोधी सिमी-इंडियन मुजाहिद्दीन के साथ। कांग्रेस वही करने को मजबूर जो लालू-पासवान-मुलायम चाहें। नरेंद्र मोदी ने शनिवार को बीजेपी वर्किंग कमेटी में सही कहा- &#8216;लैफ्ट-मुसलिम लीग कभी राष्ट्रवादी नहीं रहे। बीजेपी घोर राष्ट्रवादी थी। कांग्रेस बीच का रास्ता अपनाती थी। अब कांग्रेस भी लैफ्ट-मुसलिम लीग जैसी हो गई।&#8217; बात मोदी की चली तो याद करा दें। पांच सितंबर को मोदी दिल्ली आकर पीएम से मिले थे। उनने बाद में अपन लोगों से भी बात की। उनने अपन को बताया था- &#8216;गुजरात ने अहमदाबाद विस्फोटों के सारे तार खोल निकाले। सब काबू हो चुके। सिमी की ही सीनियर शाखा है- इंडियन मुजाहिद्दीन। पीएम को यह भी बताया- इंडियन मुजाहिद्दीन का अगला निशाना दिल्ली।&#8217; आखिर शनिवार को बम फटे। तो उनने याद कराया। क्या पीएम की खंडन करने की हिम्मत है। अपन खुफिया तंत्र की बात ही छोड़ दें। सीएम ने पीएम को बताया। होम मिनिस्ट्री फिर भी सोई रही। सीएम-पीएम मुलाकात के वक्त एनएसए नारायणन भी थे। इतवार को बीजेपी की वर्किंग कमेटी खत्म हुई। तो आडवाणी गुस्से में थे। पीएम इन वेटिंग के नाते उनने एलान कर दिया- &#8216; हमारी सरकार बनी, तो सौ दिन में पोटा दुबारा लाएं। गुजरात-मध्य प्रदेश-राजस्थान के बिल भी राष्ट्रपति को भेज देंगे।&#8217; पिछले चुनाव में कांग्रेस का वादा इससे उलटा था। जिस पर अपन ने शुरू से यूपीए-कांग्रेस को बधाई दी। भले ही दर्जन भर से ज्यादा वारदातें हो गई। भले ही एक हजार से ज्यादा बेकसूर मारे गए। यूपीए ने वादा तो निभाया। आडवाणी ने सही कहा- &#8216;आतंकवादियों को डर नहीं, क्योंकि डर तो कांग्रेस को वोट बैंक का है।&#8217; आडवाणी ने बीजेपी वर्किंग कमेटी को चुनाव जीतने के पाच मंत्र दिए। पहला- जीतने की जिद्द करो। दूसरा- गठबंधन करके देखो। तीसरा- टीम वर्क होना चाहिए। कम बोलो। गठबंधनों पर मीन मेख बंद करो। चुनावी रणनीति पर जुबान बंद रखो। साफ साफ कल्याण-कलराज-विनय कटियार को नसीहत। चौथा- सुशासन, विकास और सुरक्षा का एजेंडा बनाओ। पांचवां- युवा वर्ग को जोड़ो। उनने आतंकवाद के अलावा भी यूपीए की पोल खोली। आम आदमी से धोखे की पोल। एटमी करार से देश को धोखे की पोल।</p>
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		<title>बमों के तार कहीं दाऊद इब्राहिम से तो नहीं जुड़े</title>
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		<pubDate>Wed, 30 Jul 2008 18:44:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[गुजरात में बमों का मिलना अभी जारी। बुधवार रात तक सूरत में सत्ताईस बम मिल चुके। हैरानी की बात। अहमदाबाद के सभी बम फट गए। सूरत का एक भी नहीं फटा। बुधवार को अपने नरेंद्र भाई मोदी सूरत पहुंचे। वह लबेश्वर चौक गए। जहां मंगलवार को अच्छे-खासे बम मिले। मोदी बड़ोदा प्रेसटीज मार्किट से सिर्फ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>गुजरात में बमों का मिलना अभी जारी। बुधवार रात तक सूरत में सत्ताईस बम मिल चुके। हैरानी की बात। अहमदाबाद के सभी बम फट गए। सूरत का एक भी नहीं फटा। बुधवार को अपने नरेंद्र भाई मोदी सूरत पहुंचे। वह लबेश्वर चौक गए। जहां मंगलवार को अच्छे-खासे बम मिले। मोदी बड़ोदा प्रेसटीज मार्किट से सिर्फ पांच सौ मीटर दूर थे। जहां बुधवार को भी बम मिला। अपन गुजरात में आतंकवाद की जड़ में जाएं। उससे पहले जरा सांसदों की खरीद-फरोख्त का आतंकवाद देख लें। <span id="more-329"></span>दिग्गी राजा का दावा तो हवा हो गया। बुधवार को नोटों की गड्डियां जांच कमेटी के सामने आई। तो किसी गड्डी पर इंदौर के बैंक की मुहर नहीं थी। दिग्गी राजा ने शक की सुई शिवराज सिंह चौहान पर टिका दी थी। अब शक की सुई भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर टिकेगी। अहमद पटेल के काफी करीब हैं भूपेंद्र सिंह हुड्डा। नोटों की गड्डियों पर गुड़गांव-फरीदाबाद के बैंकों की मुहर। सुषमा स्वराज के आतंकवाद वाले बयान से अपन सहमत नहीं थे। पर दिग्गी राजा को चुनौती दमदार रही। यों अपन को किशोर चंद्र देव की कमेटी से ज्यादा उम्मीद नहीं। सात मेंबरी कमेटी में चार मेंबर सरकारी बेंचों के। सो अपना अंदेशा- वह बी. शंकरानंद साबित होंगे। बोफोर्स कांड की जेपीसी के अध्यक्ष थे बी. शंकरानंद। इस कमेटी की रपट थी- &#8216;कोई घोटाला नहीं हुआ।&#8217; पर बाद में क्वात्रोची के घूसखोरी वाले खाते सील हुए। तो कांग्रेस बुरी तरह फंस गई थी। अब जब यूपीए सरकार बनी। तो अपने हंसराज भारद्वाज ने क्वात्रोची के सील खाते खुलवाए। खैर बुधवार को किशोर चंद्र कमेटी ने जांच शुरू की। कमेटी अब चार अगस्त को बैठेगी। अपने एमपी के अर्गल-कुलस्ते बुला लिए गए। अपने राजस्थान के महावीर भगोरा भी। भगोरा की बात चली। तो बताते जाएं- भगोरा को हार्ट अटैक हो गया। अहमदाबाद के अस्पताल में आपरेशन। इधर बुधवार को कैश फार वोट की जांच शुरू हुई। उधर बीजेपी ने तीनों सांसदों की शिकायत जग जाहिर की। शिकायत में लिखा है- &#8216;हमें सीधे अपरोच किया गया। तो हमने भंडाफोड़ करने का फैसला किया। हमने सीएनएन-आईबीएन से संपर्क साधा। चैनल ने सिध्दार्थ गौतम को काम पर लगाया। इक्कीस की रात को रेवती रमण सिंह का संदेश आया। वह आधी रात के बाद मिलने आए। सीएनएन-आईबीएन ने सारी बात रिकार्ड की। सुबह हमें अमर सिंह से मिलाने ले जाया गया। सीएनएन-आईबीएन की कार हमारे पीछे थी।&#8217; तीन पेज की लंबी-चौड़ी चिट्ठी में कई खुलासे। पर बात फिलहाल सीएनएन-आईबीएन चैनल की। मीटिंग से निकलते हुए किशोर चंद्र ने कहा- &#8216;हमने चैनल पर कोई रोक नहीं लगाई। वह चाहे तो स्टिंग आपरेशन दिखाए।&#8217; अब कटघरे में पद्मश्री राजदीप सरदेसाई भी। पिछले दिनों एक अखबार के फंक्शन में नरेंद्र मोदी दिल्ली आए। तो राजदीप सरदेसाई मंच संचालन कर रहे थे। मोदी देखकर आग बबूला हो गए। राजदीप-मोदी में छत्तीस का आंकड़ा दंगों के वक्त से। गुजरात में हालात अब भी दंगों के। आतंकियों ने जिस तरह गुजरात को जगह-जगह छलनी किया। जनता का सब्र कब टूट जाए। कहना मुश्किल। <strong><a title="आतंकियों को अपनी सी लगती है यूपीए सरकार" href="http://indiagatenews.com/india-news/terrorists-feel-at-home-with-upa-government.php/" target="_blank">अपन ने कल लिखा था</a></strong>- &#8216;यूपीए सरकार की नीतियों से आतंकियों के हौंसले बढ़े। आतंक फैलाने वालों को यूपीए सरकार अपनी सी लगी।&#8217; सूरत में बम भले नहीं फटे। सूरत के बम डेटोनेटर बैटरी से जुड़े थे। अहमदाबाद के बमों में टाइमर डिवाइस लगी थी। बनाने में जरूर कोई तकनीकी खामी रही होगी। वरना बेंगलुरु-अहमदाबाद-सूरत के बम एक जैसे। बमों का रिश्ता वड़ोदरा से भी। कारों पर नंबर वड़ोदरा के थे। बमों पर लिपटे अखबार वड़ोदरा के थे। बम बनाने-लगाने में सौ से ज्यादा लोग लगे होंगे। इतने लोग पाकिस्तान से तो नहीं आए होंगे। तीनों शहरों में बम लगाने का तरीका 1993 में मुंबई में लगाए बमों जैसा। जयपुर में भी यही तरीका अपनाया गया। तो क्या- आतंकवाद की मौजूदा आंधी के पीछे कराची बैठे दाऊद का हाथ। सुरक्षा एजेंसियों के माहिर बी रमन को भी यही शक। काबिल-ए-गौर है- आतंकवाद की आंधी मुंबई बम धमाकों के अदालती फैसले के बाद चली।</p>
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		<title>आतंकियों को अपनी सी लगती है यूपीए सरकार</title>
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		<pubDate>Tue, 29 Jul 2008 18:39:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[अपन ने कल सुषमा की आतंकी थ्योरी बताई थी। जिसमें उनने केंद्र सरकार को घसीटा था। सद्दाम हुसैन ने अपनी कुर्सी के लिए हजारों कुर्दो को मरवाया था। अपनी यूपीए सरकार सद्दाम हुसैन के रास्ते पर तो नहीं चलेगी। सो सुषमा की बात किसी के गले नहीं उतरी। एनडीए के बाकी दलों के गले भी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>अपन ने कल सुषमा की आतंकी थ्योरी बताई थी। जिसमें उनने केंद्र सरकार को घसीटा था। सद्दाम हुसैन ने अपनी कुर्सी के लिए हजारों कुर्दो को मरवाया था। अपनी यूपीए सरकार सद्दाम हुसैन के रास्ते पर तो नहीं चलेगी। सो सुषमा की बात किसी के गले नहीं उतरी। एनडीए के बाकी दलों के गले भी नहीं उतरी। गले उतरने वाली बात ही नहीं थी।  सुषमा ने आतंकवाद को सांसदों की खरीद-फरोख्त से जोड़ा। बोली- &#8216;विस्फोट लोकसभा में विश्वासमत के फौरन बाद हुए। विश्वासमत में सरकार खरीद-फरोख्त से नंगी हुई। <span id="more-328"></span>आतंकी वारदातों से कैश फार वोट से जनता का ध्यान हटेगा।&#8217; वैसे सुषमा की बात गले जरा नहीं उतरती। पर कुर्सी के लिए राजनीतिबाज क्या-क्या नहीं करते। अपन ने सद्दाम हुसैन का उदाहरण तो दिया ही। ताकि सनद रहे सो बता दें- इराक मे भी जमहूरियत थी। पर दूर क्यों जाएं। अपन अपना ही उदाहरण बता दें। अट्ठाईस फरवरी 1983 की बात। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। मधु दंडवते बोल रहे थे। उनने कहा- &#8216;उम्मीदवार की हत्या के लिए रिवाल्वर दी गई है। मैं इसे आपको सौंपना चाहता हूं।&#8217; यह अलग बात। जो स्पीकर ने ऐसा होने नहीं दिया। अपन लगते हाथों कैश फार वोट का पुराना किस्सा भी बताते जाएं। बात नौ मार्च 1988 की। डीएमके के थंगाबालू ने सदन में ब्रीफकेस उछाला। बोले- &#8216;इसमें दो लाख रुपए के करेंसी नोट हैं। मुझे पाला बदलने के लिए रिश्वत दी गई है।&#8217; सो नोटों की गड्डियां तो पहले भी सदन में आ चुकी। अबके तीन सांसद नोटों की गड्डियां लेकर आए। सवाल पूछने के बदले रिश्वत के मामले में ग्यारह सांसदों की मेंबरी गई। तब सवाल सिर्फ पच्चीस हजार का था। अब लोकसभा में वोट देने के लिए करोड़ों का सौदा हुआ। दोनों मामलों में स्टिंग ऑपरेशन हुआ। पहले मामले में स्टिंग ऑपरेशन चैनल पर दिखा। पर दूसरे मामले में चैनल दगा दे गया। अब तीनों सांसदों का चैनल दफ्तर के बाहर धरने का इरादा। रिश्वत कांड को मुद्दा बनाने के लिए आडवाणी खुद सामने आएं। तो बेहतर होगा। राव के जमाने में खरीद-फरोख्त का भंडाफोड़ वाजपेयी ने किया था। अपन को कल्याण सरकार की बर्खास्तगी पर वाजपेयी का धरना भी याद। मनमोहन सरकार को हिलाना हो। तो आडवाणी को वाजपेयी के पद्चिन्हों पर चलना होगा। फिर भले 1989 की तरह सांसदों को इस्तीफा देना पड़े। रिश्वत कांड को नतीजे तक पहुंचाना होगा। पर अपन बात कर रहे थे आतंकी वारदातों पर सुषम उवाच की। केंद्र की गलत नीतियों से आतंकवाद को बढ़ावा मिला। सुषमा सिर्फ इतना कहती। तो गले उतर जाता। इसमें तो कोई शक भी नहीं। मनमोहन सरकार ने आतंकवाद से लड़ने की हिम्मत कभी नहीं दिखाई। हिम्मत दिखाना तो दूर की बात। अलबत्ता आतंकवादियों के प्रति नरम रवैया अपनाया। फर्क सिर्फ इतना- मुफ्ती मोहम्मद सईद ने खुल्लम-खुल्ला &#8216;हिलिंग टच&#8217; की नीति अपनाई। पर मनमोहन सिंह ने बिना कहे आतंकियों का हिलिंग टच किया। संसद पर हमला करने वाले को फांसी न देना और क्या है। आतंकवाद विरोधी सख्त कानून पोटा हटाना और क्या है। ये दोनों सबूत काफी न हों। तो आप बताइए। मुंबई लोकल ट्रेनों में फटे बमों का कोई सुराग अब तक हाथ क्यों नहीं लगा। माले गांव के विस्फोटों का सुराग अब तक क्यों नहीं मिला। संकट मोचक मंदिर के हमलावर कहां पकड़े गए। मक्का मस्जिद में विस्फोट करने वालों का कोई सुराग क्यों नहीं। जयपुर धमाकों का भंडाफोड़ करने में केंद्र ने क्या मदद की? अब इसमें तो कोई शक नहीं। यूपीए सरकार की नीतियों से आतंकियों के हौंसले बढ़े। आतंक फैलाने वालों को यूपीए सरकार अपनी सी लगी। इसीलिए आतंकियों के निशाने पर बीजेपी शासित प्रदेश। गुजरात तो खासकर। यह सबूत है- देशभर में बड़े पैमाने पर आतंकियों की भर्ती का। इसका सबूत मंगलवार को भी मिला। सूरत में सुबह से बम मिलने शुरू हुए। शाम आते-आते अट्ठारह बम मिल चुके थे। शुकर है कोई फटा नहीं।</p>
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		<title>संसद के बाद भारत की जम्हूरियत पर हमला</title>
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		<pubDate>Tue, 29 Jul 2008 05:25:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[एनडीए-यूपीए में अब दोहरी जंग। पहली जंग कैश फॉर वोट के मोर्चे पर। दूसरी जंग आतंकवाद के मोर्चे पर। अपन दो दिन की छुट्टी पर गए। इसी बीच बंगलुरु-अहमदाबाद में बम धमाके हो गए। अब आतंकवाद पर कांग्रेस-बीजेपी में छीछालेदर। अपन छीछालेदर की बात बाद में करेंगे। पहले बात कैश फॉर वोट के मोर्चे पर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>एनडीए-यूपीए में अब दोहरी जंग। पहली जंग कैश फॉर वोट के मोर्चे पर। दूसरी जंग आतंकवाद के मोर्चे पर। अपन दो दिन की छुट्टी पर गए। इसी बीच बंगलुरु-अहमदाबाद में बम धमाके हो गए। अब आतंकवाद पर कांग्रेस-बीजेपी में छीछालेदर। अपन छीछालेदर की बात बाद में करेंगे। पहले बात कैश फॉर वोट के मोर्चे पर यूपीए-एनडीए जंग की। अपने दिग्गी राजा ने आरोप लगाया था- &#8216;एक करोड़ रुपया इंदौर के बैंक से निकाला गया। सीएम शिवराज की पत्नी के पार्टनर के खाते से पैसा निकला। <span id="more-327"></span>नोटों की गङ्ढियों पर बैंक की स्टैंप मौजूद।&#8217; एनडीए मीटिंग के बाद सुषमा स्वराज बोली- &#8216;संसदीय कमेटी दिग्विजय सिंह को तलब करके पूछताछ करे। आखिर उन्हें गङ्ढियों पर बैंक की स्टैंप का कैसे पता चला। यह तो नोट देने वाले, नोट लेने वाले और स्पीकर को ही मालूम।&#8217; कैश फार वोट कांड की बात चली। तो बतातें जाएं- पदमश्री राजदीप सरदेसाई के सीएनएन-आईबीएन ने भले ही घूसखोरी की सीडी छुपा ली हो। बड़े पर्दे पर फिल्म के लिए &#8216;भागम भाग&#8217; की स्क्रिप्ट तैयार। स्क्रिप्ट लिखी है मुख्तार अब्बास नकवी ने। फिल्म बनाएंगे नितिन मवानी। निर्देशक होंगे- विजय गोखले। दिग्गी राजा भले कहें- &#8216;कांड की स्क्रिप्ट इंदौर में लिखी गई।&#8217; पर &#8216;भागम भाग&#8217; की शूटिंग कोल्हापुर में शुरू हो चुकी। बताते जाएं- मधुर भंडारकर की &#8216;कार्पोरेट&#8217; के स्क्रिप्ट राईटर भी नकवी थे। नकवी सौ से ज्यादा फिल्मों का स्क्रिप्ट लिख चुके। बात सुषमा की। बोली- &#8216;किशोर चंद्र देव की सात मेंबरी कमेटी को ग्यारह मेंबरी किया जाए। शिव सेना, बीजेडी के मेंबर भी शामिल हों। सवाल के बदले घूस कांड में ग्यारह मेंबर कमेटी थी।&#8217; सुषमा की बातों से लगा- एनडीए स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भले न लाए। सरकार के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव भले न लाए। पर जंग होगी जमकर। सरकार भी बेखबर नहीं। सो, मानसून सत्र टले, तो अपन को हैरानी नहीं होगी। ग्यारह अगस्त से होना होता। तो अब तक नोटिफिकेशन हो जाता। यों सत्र से पहले जंग आतंकवाद के मोर्चे पर शुरू हो चुकी। सुषमा ने जंग का ऐलान कैसे किया। अपन वह भी बताएंगे। पर पहले बात वारदातों की। जिन दो शहरों में बम फटे। दोनों बीजेपी रूल राज्यों में। इससे पहले जयपुर में बम फटे थे। वह भी बीजेपी रूल स्टेट में। तो क्या अब बीजेपी रूल स्टेट आतंकियों के निशाने पर? संसद पर हमले के बाद अब अपनी जम्हूरियत पर हमला। बीजेपी को चुनने वाले वोटर आतंकियों के निशाने पर।  अपने पीएम मनमोहन ने फिर वही पुराना राग अलापा। अहमदाबाद जाकर बोले- &#8216;आतंकवादियों के मंसूबे कामयाब नहीं होने देंगे।&#8217; अपन ने मनमोहन के मुंह से यह बात बारहवीं बार सुनी। पर आतंकवादी वारदातें नहीं रुकी। बात अहमदाबाद की। पीएम के साथ सोनिया गई थी या सोनिया के साथ पीएम। यह तो सरकार भी नहीं बता पाती। बात सरकार की चली। तो सरकार का ताजा शगूफा बताएं। शिवराज पाटिल अब फिर संघीय एजेंसी की जरूरत बताने लगे। मनीष तिवारी ने भी चौबीस अकबर रोड पर साऊथ ब्लॉक वाला रिकार्ड बजाया। जयपुर धमाकों के बाद भी राग संघीय एजेंसी बजा था। अपन को एक बात समझ नहीं आई। कांग्रेस ने एनडीए राज में संघीय जांच एजेंसी की मुखालफत क्यों की थी। तब आडवाणी ने सीएम मीटिंग बुलाई थी। कांग्रेसी और वामपंथी मुख्यमंत्रियों ने मुखालफत की। अब पोटा हटाने वाली सरकार को संघीय जांच एजेंसी की क्या जरूरत। आतंकवाद विरोधी कानून के बिना जांच एजेंसी करेगी भी क्या। सिर्फ राज्य सरकारों पर कीचड़ उछालने के काम आएगी। बात कीचड़ उछालने की चली। तो अब के पहला पत्थर बीजेपी ने मारा। सुषमा बोली- &#8216;केंद्र सरकार ही आतंकी वारदातें करा रही है।&#8217; इतना बड़ा पत्थर मुंह पर पड़े। तो कांग्रेस कैसे चुप रहती। सो मनीष तिवारी ने भी मुंह तोड़ जवाब दिया। बोले- &#8216;यह बीजेपी की घटिया स्तर की राजनीति का सबूत।&#8217;</p>
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		<title>आतंकवाद राष्ट्रीय मुद्दा घोषित किया जाए</title>
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		<pubDate>Sun, 25 May 2008 12:12:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Politicking]]></category>
		<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[
फैडरल जांच एजेंसी ही नहीं, फैडरल कानून और फैडरल अदालत की भी जरूरत। आतंकवाद से लड़ने के लिए राज्यों और राजनीतिक दलों को तुच्छ राजनीति छोड़नी होगी।

इसी पखवाड़े राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के नोएडा में डा. राजेश तलवार और डा. नूपुर तलवार की चौदह साल की बेटी आरुषि की हत्या हो गई। नोएडा पुलिस ने पहले [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div><span style="font-size: small;"></p>
<blockquote><p>फैडरल जांच एजेंसी ही नहीं, फैडरल कानून और फैडरल अदालत की भी जरूरत। आतंकवाद से लड़ने के लिए राज्यों और राजनीतिक दलों को तुच्छ राजनीति छोड़नी होगी।</p></blockquote>
<p></span></div>
<p><span style="font-size: small;"><span style="font-size: small;">इसी पखवाड़े राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के नोएडा में डा. राजेश तलवार और डा. नूपुर तलवार की चौदह साल की बेटी आरुषि की हत्या हो गई। नोएडा पुलिस ने पहले दिन हत्या के फौरन बाद से गायब घरेलू नौकर हेमराज पर शक किया। हेमराज की तलाश में पुलिस टीम नेपाल भेज दी गई। अगले दिन डा. तलवार के घर की छत पर हेमराज की लाश मिली, तो पुलिस के होश उड़ गए। नोएडा पुलिस लगातार सात दिन तक हवा में तीर मारती रही और अफवाहों को हवा देती रही। <span id="more-265"></span>अखबारों में तरह-तरह की थ्योरियां प्लांट करती रही। आखिर तेईस मई को पुलिस ने एक पोते के दादा पैंतालीस साल के हेमराज और चौदह साल की आरुषि के प्रेम संबंधों की विस्फोटक थ्योरी प्रकट की। थ्योरी का दूसरा हिस्सा था- डा. राजेश तलवार के डा. अनीता दुर्रानी के साथ नाजायज संबंध। पुलिस की थ्योरी यह थी कि बेटी आरुषि और नौकर हेमराज को राजेश तलवार के अनीता दुर्रानी के साथ नाजायज संबंधों का पता चला तो वे दोनों एक-दूसरे के करीब आ गए। डा. तलवार ने अपनी बेटी आरुषि को नौकर के साथ नाजायज हरकतें करते देखा और गुस्से में दोनों की हत्या कर दी। यह थ्योरी प्रकट करते हुए नोएडा पुलिस ने डा. राजेश तलवार को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन अगले ही दिन आरुषि की मां नूपुर तलवार ने पुलिस के सारे आरोपों को बेहूदा, बेवकूफीभरा और झूठा करार देते हुए कहा कि हत्यारे खुले घूम रहे हैं और पुलिस उन्हीं के खिलाफ षड़यंत्र रच रही है।</span></p>
<p><span style="font-size: small;">हत्या के इस मामूली किस्से ने यह जाहिर कर दिया है कि हमारे राज्यों की पुलिस जांच के मामले में कितनी निकम्मी और कमजोर है। राज्यों की ऐसी पुलिस से अंतरराष्ट्रीय साजिश वाली आतंकवादी वारदातों की तह तक जाने की उम्मीद रखना इस देश की भारी भूल होगी। आतंकवाद कोई सामान्य आपराधिक वारदात नहीं है, जिसकी जांच चोरी चकारी रोकने वाली पुलिस के हवाले कर दी जाए। पिछले तीन दशक से आतंकवाद दुनियाभर में बड़ी गंभीर समस्या बना हुआ है और यह स्थानीय स्तर पर काम नहीं कर रहा, अलबत्ता दुनियाभर के आतंकवादी संगठन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, एक-दूसरे को अस्त्र-शस्त्र, आर्थिक मदद और संपर्क मुहैया करवा रहे हैं। कुल मिलाकर आतंकवाद देश पर बाहरी आक्रमण है और संविधान के अनुच्छेद 355 में यह खास प्रावधान किया गया है कि बाहरी आक्रमण से राज्यों की सुरक्षा करना केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है। आतंकवाद को राजनीतिक चश्मे से देखना या आतंकवाद को कानून व्यवस्था का सामान्य समस्या बताना या आतंकवाद को अपराध की सामान्य घटना समझना नादानी ही है। लेकिन अफसोस यह है कि देश के राजनीतिक दल आतंकवाद को राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं, राज्यों की सरकारें आतंकवाद को कानून व्यवस्था का सामान्य मामला बताकर केंद्र सरकार को दखल देने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक दलों और राज्य सरकारों के ये तर्क तब तक ठीक थे जब तक आतंकवाद सिर्फ जम्मू कश्मीर की समस्या थी।</span></p>
<p><span style="font-size: small;">पहले पंजाब और बाद में जम्मू कश्मीर में शुरू हुआ आतंकवाद अब राज्यों की सीमाओं से पार जा चुका है। देशभर में आतंकवादियों का जाल बिछ चुका है, जिनमें ज्यादातर विदेशी और न्यूनतम उनके भारतीय समर्थक हैं, जो उन्हें स्थानीय मदद मुहैया करवाते हैं। किसी राज्य की किसी शहर में होने वाली आतंकवादी वारदात की साजिश किसी और राज्य में रची जाती है, विस्फोटक सामग्री किसी तीसरे राज्य से मंगवाई जाती है और ऑप्रेशन को सरअंजाम देने की जिम्मेदारी किसी चौथे राज्य के आतंकवादियों की होती है। ऐसे हालात में किसी भी राज्य की पुलिस किसी आतंकवादी वारदात के बाद कैसे जांच कर सकती है। हमारे यहां एक राज्य की पुलिस दूसरे राज्य में जाकर जांच करने को समर्थ नहीं है, दूसरे देशों में जाने का तो कोई प्रावधान ही नहीं है, फिर किसी वारदात के अंतरराष्ट्रीय सूत्रों तक कैसे पहुंचा जा सकता है। आतंकवादियों की इस अंतरराष्ट्रीय रणनीति को ग्यारह सितंबर 2001 को न्यूयार्क में हुए आतंकवादी हमले के बाद दुनियाभर में महसूस किया गया, जिसे अमेरिका के स्थानीय आतंकवादियों ने सरअंजाम नहीं दिया था। साजिश अफगानिस्तान में रची गई थी, कोई आतंकवादी पाकिस्तान से गया था, तो कोई सूडान से। न्यूयार्क पर आतंकी हमले के फौरन बाद 27-28 सितंबर 2001 में संयुक्तराष्ट्र ने आतंकवाद के इन पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया। लंबे विचार-विमर्श के बाद संयुक्तराष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने आतंकवाद पर प्रस्ताव संख्या 1373 पास किया और दुनियाभर के देशों को सलाह दी कि वे आतंकवादियों की फंडिंग, स्थानीय मदद, शस्त्रों की सप्लाई आदि रोकने के लिए कड़े कदम उठाएं, जिनमें खुफिया एजेंसियों को मजबूत करना और कानूनों को कड़ा करना भी शामिल था। संयुक्तराष्ट्र के इस प्रस्ताव के बाद दुनियाभर में आतंकवाद से निपटने के लिए अपने-अपने देशों की जरूरतों के मुताबिक कानूनों में बदलाव किया गया।</span></p>
<p><span style="font-size: small;">भारत में भी तभी इन बदलावों की जरूरत महसूस की गई और एनडीए सरकार ने अपराधिक न्याय प्रणाली में बदलावों पर विचार करने के लिए जस्टिस वीएस मलिमथ कमेटी का गठन किया। मलिमथ कमेटी ने सिफारिश की कि आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए देश में एक जांच एजेंसी होनी चाहिए और आतंकवाद से जुड़े मुकदमे एक राष्ट्रीय अदालत के हवाले किए जाने चाहिए। जस्टिस मलिमथ ने सरकार को मौजूदा कानूनों में बदलाव कर कानून कड़े करने की सिफारिश भी की। एनडीए सरकार ने दोनों कदम उठाए। सबसे पहले 25 अक्टूबर 2001 को अध्यादेश के जरिए पोटा कानून लागू किया गया। फिर तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने देशभर के पुलिस प्रमुखों और गृहसचिवों की बैठक बुलाकर आतंकवाद से निपटने के लिए फैडरल जांच एजेंसी का सुझाव रखा। लालकृष्ण आडवाणी के इस सुझाव को इस बैठक में उत्साहवर्धक समर्थन मिला। लेकिन जैसा कि पोटा बिल का राजनीतिक आधार पर विरोध किया गया उसी तरह जब मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई गई तो गैर एनडीए मुख्यमंत्रियों ने इस सुझाव को राज्यों के अधिकारों में दखल करार देते हुए ठुकरा दिया। सुझाव ठुकराने वालों में कांग्रेसी और कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री प्रमुख थे।</span></p>
<p><span style="font-size: small;">उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस प्रमुख प्रकाश सिंह ने पुलिस सुधार से जुड़ी एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी। इस मामले की सुनवाई में मदद के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सोली सोराबजी की रहनुमाई में एक कमेटी बनाई जिसका काम था कि वह पुलिस में सुधार के लिए अपने सुझाव दे। बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह महसूस किया कि आतंकवाद जैसी वारदातों से जुड़ी जांच के लिए देश में एक फैडरल एजेंसी का होना जरूरी है। यह बात 2005 की है, अदालत ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, सोली सोराबजी कमेटी, पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो और केंद्र सरकार से अपनी राय प्रकट करने के लिए कहा। करीब ढाई साल बीत चुके हैं, लेकिन यूपीए सरकार ने फैडरल एजेंसी पर अपनी राय प्रकट नहीं की है। अब देश में लगातार बढ़ रही आतंकवादी वारदातों और यूपीए सरकार का गठन होने के बाद हुई किसी भी वारदात की जांच किसी नतीजे पर नहीं पहुंचने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने फैडरल जांच एजेंसी की जरूरत महसूस की है। लेकिन आतंकवाद से निपटने के लिए बनाए गए पोटा कानून को रद्द करने के बाद फैडरल एजेंसी किसी काम की भी नहीं होगी, क्योंकि फैडरल जांच एजेंसी ही नहीं, अलबत्ता फैडरल कड़ा कानून और फैडरल अदालत की भी जरूरत पड़ेगी, तब जाकर आतंकवाद की मांद में घुसकर प्रहार किया जा सकेगा। देश के मौजूदा कानून, मौजूदा खुफिया एजेंसियां, मौजूदा जांच एजेंसियां आतंकवाद के सामने बौनी दिखाई देती हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यह पैदा होता है कि आतंकवाद से लड़ने के फैडरल ढांचे के बिना दुनियाभर के देशों से आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई और खुफिया एजेंसियों के आदान-प्रदान के समझौतों का क्या मतलब। आतंकवाद से लड़ने के लिए ठोस फैडरल ढांचे की जरूरत है, जिसमें आतंकवादियों और उनके स्थानीय संपर्कों का डाटा, आतंकी संगठनों के अंतरराज्यीय-अंतरराष्ट्रीय संबंधों, वारदातों के तौर-तरीकों, आतंकियों के आर्थिक स्रोतों का विश्लेषण करने के बाद खुफिया तंत्र को मजबूत किया जा सके और उनके खिलाफ प्रो-एक्टिव रणनीति बनाकर सरअंजाम दिया जा सके।</span></p>
<p></span></p>
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		<title>पोटा हटाकर फैडरल एजेंसी की वकालत</title>
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		<pubDate>Wed, 14 May 2008 18:35:22 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[India Gate se Sanjay Uvach]]></category>
		<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[अपनी आशंका सही ही निकली। घुसपैठ-धमाकों के तार पाकिस्तानी सियासत से ही जुड़े हैं। अपन ने कल सांभा सेक्टर में घुसपैठ का जिक्र किया। जिस पर एंटनी ने पाक फौज पर ऊंगली उठाई। घुसपैठ और विस्फोट के बाद बुधवार को तंगधार सेक्टर में गोलाबारी हुई। पाकिस्तान ने दूसरी बार सीज फायर का उल्लंघन किया। पाकिस्तानी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>अपनी आशंका सही ही निकली। घुसपैठ-धमाकों के तार पाकिस्तानी सियासत से ही जुड़े हैं। <strong><a title="पाक की सियासत से जुड़े घुसपैठ-धमाकों के तार" href="http://indiagatenews.com/india-news/militant-infiltration-and-blasts-connected-to-paki-politics.php" target="_blank">अपन ने कल सांभा सेक्टर में घुसपैठ का जिक्र किया</a></strong>। जिस पर एंटनी ने पाक फौज पर ऊंगली उठाई। घुसपैठ और विस्फोट के बाद बुधवार को तंगधार सेक्टर में गोलाबारी हुई। पाकिस्तान ने दूसरी बार सीज फायर का उल्लंघन किया। पाकिस्तानी फौज-आतंकवादियों का रिश्ता छुपा नहीं। यह कारगिल के वक्त भी साबित हुआ। जयपुर के विस्फोटों की जांच की सुई भी लश्कर-हूजी की ओर। लश्कर पाकिस्तानी आतंकी संगठन। तो हूजी आईएसआई का बांग्लादेशी आतंकी मॉडल। गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल जयपुर से लौटकर बोले- &#8216;वारदात के पीछे सीमा पार की ताकतें।&#8217; पर जायसवाल के अलावा कोई पाक पर ऊंगली उठाने से बचा। शिवशंकर मेनन को ही लो। पूछा तो बोले- &#8216;अभी किसी पर ऊंगली उठाना ठीक नहीं।&#8217; यह है आतंकवाद से लड़ने की भूल-भुलैया। <span id="more-256"></span>एंटनी ने मंगलवार को पाक पर निशाना साधा। जायसवाल ने गुरुवार को पाक की तरफ ऊंगली उठाई। पर विदेश मंत्रालय अपनी ऊंगली छुपाने लगा। अब शिवराज पाटिल क्या बोलेंगे। अपन को उसका इंतजार। बीजेपी ने तो पाटिल की काबलियत पर सवाल उठा दिया। यूपीए राज में आठ बड़ी आतंकी वारदातें हुई। अब तक एक वारदात की गुत्थी भी नहीं सुलझी। मजा तो तब आया। जब कांग्रेस ने भी पाटिल के बचाव में कन्नी काटी। मनीष तिवारी से पूछा गया। तो वह पाटिल को काबिल कहने से कतराए। पाटिल ने जायसवाल को जयपुर भेजकर खानापूर्ति कर ली थी। पर लालकृष्ण आडवाणी जयपुर पहुंच गए। तो अब गुरुवार को सोनिया भी जाएंगी। तो पाटिल को सरकारी उड़न खटौला ले जाना ही पड़ेगा। पर जयपुर से लौटकर जायसवाल जो बोले। उसने राजनीतिक बवाल खड़ा कर दिया। बोले- &#8216;खुफिया एजेंसियों ने तो जानकारी दे दी थी।&#8217; जब पूछा- &#8216;यह जानकारी कब दी थी?&#8217; तो बगलें झांकने लगे। फौरी जवाब नहीं सूझा। तो बोले- &#8216;अजमेर दरगाह में हुए विस्फोटो के फौरन बाद।&#8217; अपन होम मिनिस्ट्री पर नजर रखने वाले जानते हैं- &#8216;हर बड़ी वारदात के बाद सब जगह ऐसी चेतावनी भेजी ही जाती है।&#8217; जायसवाल के बयान पर अपनी वसुंधरा तो भड़की ही। फौरन खंडन जारी किया ही। बीजेपी को भी केंद्र पर हमले का मौका मिला। सो अटल-आडवाणी-जसवंत-राजनाथ का साझा बयान आया। केंद्र पर फिर वही आतंकियों से सहानुभूति, आतंकवाद से नरमी का आरोप। सबुत के तौर पर अफजल और पोटा तो है ही। कांग्रेस कर्नाटक चुनाव के वक्त अच्छी मुसीबत में फंसी। बीजेपी पर पलटवार से बची। कटघरे में खड़ी खुफिया एजेंसियों ने भी कमाल किया। खबर पेलते रहे- &#8216;एक महीने में तीन बार चेतावनी भेजी गई। पर वसुंधरा सरकार सोई रही।&#8217; किसी ने मनीष तिवारी को यह जानकारी देकर उकसाना चाहा। पर तिवारी पलटवार से बचते रहे। पर बात मौजूदा आतंकवाद से पाक की सियासत से रिश्तों की। भले ही शिवशंकर मेनन पाक पर ऊंगली उठाने से बचे। पर मेनन बोले- &#8216;प्रणव मुखर्जी और मैं बीस मई को इस्लामाबाद जाएंगे। जहां सचिव और मंत्री स्तरीय बातचीत होगी। बातचीत का मुख्य एजेंडा होगा आतंकवाद।&#8217; पर अपने देश में आतंकवाद से लड़ने की नियत नहीं। नियत होती, तो पोटा रद्द न होता। नियत होती, तो आतंकवाद से लड़ने के लिए फैडरल एजेंसी 2003 में बन जाती। जब देशभर के डीआईजी मान गए थे। पर आडवाणी ने तब मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई। तो जिन कांग्रेसियों-कम्युनिस्टों ने पोटा का विरोध किया। उनने फैडरल जांच एजेंसी का भी विरोध किया। अब वही कांग्रेसी फैडरल एजेंसी की जरूरत बताने लगे। कांग्रेस को पोटा की जरूरत अभी भी महसूस नहीं होती। पर शुक्र है बुधवार को कांग्रेस ने फैडरल एजेंसी की जरूरत महसूस की। प्रवक्ता मनीष तिवारी बोले- &#8216;जो मुख्यमंत्री फैडरल एजेंसी का विरोध कर रहे हैं। अब वे विरोध छोड़ें। पिछली मीटिंग में कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने समर्थन किया था।&#8217; पर कांग्रेस ने 2003 में विरोध क्यों किया था। वह तो बताएं।</p>
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		<title>चुनावी बजट में आम आदमी निशाने पर</title>
		<link>http://indiagatenews.com/india-news/181.php</link>
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		<pubDate>Fri, 22 Feb 2008 18:34:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[India Gate se Sanjay Uvach]]></category>
		<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[अपन एंजियो प्लास्टी कराकर लौटे। तो पाकिस्तान में चुनाव नतीजे आ रहे थे। सो तीन दिन अपन ने हाल-ए-पाक बताया। पाक में अब हंगामे से पहले की खामोशी। बुश-मुशर्रफ की जमहूरियत विरोधी साजिश अभी भी जारी। साजिश क्या रुख अख्तियार करेगी? अपन को दिल थामकर इंतजार करना होगा। तब तक अपन अपनी आबो-हवा की पड़ताल [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">अपन एंजियो प्लास्टी कराकर लौटे। तो पाकिस्तान में चुनाव नतीजे आ रहे थे। सो तीन दिन अपन ने हाल-ए-पाक बताया। पाक में अब हंगामे से पहले की खामोशी। बुश-मुशर्रफ की जमहूरियत विरोधी साजिश अभी भी जारी। साजिश क्या रुख अख्तियार करेगी? अपन को दिल थामकर इंतजार करना होगा। तब तक अपन अपनी आबो-हवा की पड़ताल करें। राजनीतिक आबो-हवा की बात तो करेंगे ही। पहले हाल-ए-मौसम बता दें। मौसम ने बहुत डर-डरकर करवट ली। फरवरी का आखिरी हफ्ता आ गया। सर्दी जाने का नाम नहीं ले रही। शुक्रवार को तापमान दस डिग्री से नीचे नहीं गया। तो दिल्ली वालों ने राहत की सांस ली। अब तो एक-आध दिन में स्वाटर उतरेंगे ही। अब बात राजनीतिक आबो-हवा की। <span id="more-181"></span>तो सोनिया-मनमोहन के सामने आतंकवाद का भूत फिर आकर खड़ा हो गया। उधर बेंगलुरु में पढे-लिखे आतंकी पकड़े गए। हुबली फिर गर्म होने लगी। तो इधर एलओसी से घुसपैठ की फिर खबर आई। आफत आतंकवाद के सामने की ही नहीं। आफत अफजल गुरु की भी। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने तो साफ कह दिया- &#8216;हमने तो अफजल गुरु को सजा-ए-मौत दे दी। अब राष्ट्रपति जानें, सरकार जाने।&#8217; राष्ट्रपति की बात चली। तो याद करा दें- बाल ठाकरे ने अब्दुल कलाम का विरोध इसी मुद्दे पर किया। कहना था- &#8216;कलाम ने अफजल गुरु को फांसी नहीं दी।&#8217; अब बाल ठाकरे क्या कहेंगे। अपन को उनके अगले बयान का इंतजार। पर आजकल राजनीतिक आबो-हवा में बजट का शोर ज्यादा। देशभर में बजट तैयारियां शुरू। सारे वित्त मंत्री काम में जुट चुके। पर अपनी निगाह सिर्फ चिदंबरम पर। चिदंबरम किस्मत वाले। जो 29 फरवरी को सातवां बजट पेश करेंगे। हां, इस बार 29 फरवरी को बजट पेश होगा। चौथे साल आता है यह मौका। पर इस बार आठवें साल आया। चार साल पहले बजट आया ही नहीं था। वाजपेयी ने &#8216;मिड टर्म&#8217; चुनाव का फैसला किया। सो जसवंत सिंह अंतरिम बजट पेश कर पाए। बेचारे जसवंत सिंह। वित्त मंत्री तो बने। पर पूरा बजट पेश नहीं कर पाए। यशवंत सिन्हा किस्मत के धनी निकले। जिनने छह पूरे बजट और दो अंतरिम पेश किए। पांच बार वाजपेयी सरकार के। तो एक चंद्रशेखर सरकार का। दोनों के एक-एक अंतरिम बजट भी। पर बात चिदंबरम की। उनने भी दो बजट यूएफ सरकार में पेश किए। अब मनमोहन सरकार का पांचवां। पर सबसे ज्यादा बजट का रिकार्ड अब भी मोरारजी देसाई का। जिनने आठ पूरे और दो अंतरिम बजट पेश किए। मोरारजी भाई की बात चली। तो बता दें- अपने जन्मदिन पर बजट पेश करने वाले वह अकेले। पर बात बजट के अंदर की। यों तो सरकार का आखिरी बजट नहीं। खुदा-न-खास्ता एटमी करार पर न गिरी। तो अगले साल अंतरिम बजट भी होगा। पर वह तो काम चलाऊ ही होगा। असली चुनावी बजट तो इसी साल का। सो दस जनपथ- चौबीस अकबर रोड का डंडा रहेगा इस बार। उस दिन चिदंबरम चौबीस अकबर रोड तलब हुए। तो अपन ने कांग्रेस की फैहरिस्त बताई ही थी। सोनिया ने भी रायबरेली में सबके सामने चिदंबरम को &#8216;आम आदमी&#8217; का ख्याल रखने की बात कह दी। तो कांग्रेसी छुटभईयों को वाह-वाही लूटने का इशारा हो गया। बजट के लिए भी कांग्रेसी शैली शुरू हो गई। रेणुका चौधरी औरतों को लेकर सोनिया के पास पहुंची। तो शमशेर सिंह सूरजेवाला किसानों को लेकर। शुक्रवार को किसान-मजदूर सेल सक्रिय हुआ। प्रभा राव, मुकुल वासनिक, अशोक गहलोत, दीपेंद्र हुड्डा किसान लेकर सोनिया के दरबार में हाजिर हुए। सो महिला, किसान, आम आदमी का चुनावी बजट होगा। यों तो चिदंबरम का हर बजट भूल-भुलैया। सो इस बार भी होगा ही। चिदंबरम का बजट तुरत-फुरत समझ नहीं आता। चिदंबरम की चॉकलेटी लफ्फाजी जल्दी से समझ नहीं आती। पता तो तब चलता है, जब महंगाई धुआं निकाल दे। अब देखो ना, शुक्रवार को ही मुद्रा स्फीति का आंकड़ा आया। महंगाई पिछले छह महीने में सबसे ज्यादा। सोचो, कितना आम आदमी का ख्याल रखा।</font></p>
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		<title>बेनजीर से सबक लेकर ही रैलियां करेंगे लाल जी</title>
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		<pubDate>Tue, 05 Feb 2008 18:34:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[India Gate se Sanjay Uvach]]></category>
		<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[वैसे इतनी जल्दी भी क्या थी। चौदहवीं लोकसभा का अभी सवा साल बाकी। सवा साल आडवाणी घूमते रहे। तो चुनाव आते-आते यों भी थक जाएंगे। अपन को तो पहले ही अंदेशा था। पता नहीं किस अनाड़ी ने सलाह दी होगी। पीएम-इन-वेटिंग को जरा इंतजार तो करना चाहिए। रैलियां जल्दी हो जाएंगी। तो जल्दी पीएम नहीं [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">वैसे इतनी जल्दी भी क्या थी। चौदहवीं लोकसभा का अभी सवा साल बाकी। सवा साल आडवाणी घूमते रहे। तो चुनाव आते</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">आते यों भी थक जाएंगे। अपन को तो पहले ही अंदेशा था। पता नहीं किस अनाड़ी ने सलाह दी होगी। पीएम</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">इन</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">वेटिंग को जरा इंतजार तो करना चाहिए। रैलियां जल्दी हो जाएंगी। तो जल्दी पीएम नहीं बन जाएंगे। अपन ने पाकिस्तान की पीएम</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">इन</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">वेटिंग का हाल तो देखा ही। मुशर्रफ भी बेनजीर को समझा</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">समझाकर थक गए। पर बेनजीर नहीं मानी। रैलियों पर रैलियां करती गई। यह संयोग ही</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जो बेनजीर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">आडवाणी दोनों सिंधी। दोनों कराची में पैदा हुए। यह भी संयोग। जो दोनों एक ही वक्त पीएम इन</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">वेटिंग बने। <span id="more-171"></span>बेनजीर को जब गोली लगी। तो अपना मन कहता था</font><font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3">बेनजीर बच जाएंगी। आडवाणी भी तब मिनट</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">मिनट की खबर लेते रहे। आडवाणी को भी लगता था</font><font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3" face="Mangal">&#8216;</font><font size="3">बेनजीर बच जाएंगी।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">पर यह अपन सब की दिली इच्छा थी। जो पूरी नहीं हुई। शायद आडवाणी ने बेनजीर से सबक लिया। वरना </font><font size="3" face="Mangal">1998 </font><font size="3">में जब कोयंबटूर में धमाके हुए। तो आडवाणी ने अपना रैली अभियान नहीं छोड़ा था। पर </font><font size="3" face="Mangal">1998 </font><font size="3">और </font><font size="3" face="Mangal">2008 </font><font size="3">में दस साल का फर्क। इन दस सालों में दुनिया बदल चुकी। न्यूयार्क के नाईन</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">इलेवन ने दुनिया बदल दी। अपनी संसद पर आतंकी हमला हो चुका। अफगानिस्तान</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">इराक पर अमेरिका का कब्जा हो चुका। जो पाकिस्तान अपने यहां आतंकी भेज रहा था। वह खुद आतंकवाद का शिकार। सो सोमवार की शाम जब अपने एमपी नारायणन ने आडवाणी को समझाया। तो आडवाणी की बात पल्ले पड़ गई। पर आडवाणी और सोनिया में बहुत फर्क। सोचो</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">नारायणन सुरक्षा का खतरा सोनिया को बताने जाते। तो वह फौरन रैलियां रद्द कर देती। पर आडवाणी ने ऐसा नहीं किया। उनने मंगलवार सुबह कोर कमेटी बुलाई। कोर कमेटी में वही लोग जो अपन </font><font size="3" face="Mangal">29 </font><font size="3">दिसंबर को बता चुके। राजनाथ सिंह समेत जो दिल्ली में थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">सब पहुंचे। आडवाणी ने फैसला पंचों पर छोड़ दिया। पंचों ने फैसला किया</font><font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3" face="Mangal">&#8216;</font><font size="3">आज की जबलपुर की रैली तो हो। रामपुर की रैली रद्द की जाए। बाकी का फैसला फिर करेंगे।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">अपने वेंकैया नायडू खंडन के मास्टर। उनने आव देखा न ताव। कलकत्ते में कह दिया</font><font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3" face="Mangal">&#8216;</font><font size="3">रैलियां जस की तस रहेंगी।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216;</font><font size="3">अपन बताते जाएं। रैलियां देवनगिरे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">दिल्ली</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">रांची</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">वाराणसी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लखनऊ</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">बरीपाड़ा</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">हैदराबाद</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">चेन्नई</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">पुणे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">रोहतक और जम्मू में तय थी। यों रैलियां तो होंगी। पर एमके नारायणन की सलाह भी नजरअंदाज नहीं होगी। चलते</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">चलते नारायणन की सलाह बताते जाएं। उनने आडवाणी से कहा</font><font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3" face="Mangal">&#8216;</font><font size="3">एक महीना एहतियात बरतें।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">अपन याद करा दें</font><font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3">पिछले हफ्ते ही आडवाणी</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">मोदी को उड़ाने की नया सुराग मिला। अपने इंटेलीजेंस ब्यूरो ने होममिनिस्ट्री को रपट दी</font><font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3" face="Mangal">&#8216;</font><font size="3">आईएसआई ने दाऊद को आडवाणी</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">मोदी को उड़ाने की सुपारी दी है।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">यों अपने शिवराज पाटिल फाइल दबाकर बैठ जाते</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो बैठ ही जाते। पता नहीं इस बार कैसे मुस्तैदी दिखाई। यों राजनीतिक गलियारों में अलग तरह की चुहलबाजी। कहीं एनडीए के बढ़ते प्रभाव को रोकने की रणनीति तो नहीं। जो नारायणन को आगे कर आडवाणी को रोका। यों आडवाणी से ज्यादा जल्दी अपने मुख्तार अब्बास नकवी को। नकवी ने बाकायदा बीजेपी दफ्तर से रामपुर रथ रवाना किया। अब उस रथ पर फिलहाल आडवाणी तो नहीं चलेंगे। राजनाथ सिंह भले ही चल दें। सुनते हैं रामपुर की रैली रद्द होने से नकवी बेहद खफा। अब भाई लोग नकवी को राजनाथ खेमे से जोड़कर देखें। तो अपन क्या करें। जिस मीटिंग में रामपुर की रैली रद्द हुई। वहां राजनाथ सिंह भी थे। आखिर आडवाणी की सुरक्षा से महत्वपूर्ण कोई चीज नहीं। नकवी की अपनी जयाप्रदा को हराने की हसरत भी। आखिर बेनजीर का उदाहरण बीजेपी आलाकमान के सामने।</font></p>
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		<title>मिस्टर ब्राउन यह दर्द तो आपका दिया है</title>
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		<pubDate>Mon, 21 Jan 2008 18:29:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[India Gate se Sanjay Uvach]]></category>
		<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[
पाकिस्तान में अपने एक अजीज दोस्त हैं- शाहिद अब्दुल कयूम। वहां के एक टीवी चैनल में सीनियर सब एडिटर। चार साल पहले अपन जब पाक गए। तो कयूम से दोस्ती हुई। फिर गाहे-ब-गाहे बजरिया ई-मेल बातचीत होती रही। कभी कभार एसएमएस भी। कयूम से हुई ताजा चर्चा पर आप भी गौर फरमाएं। लिखते हैं- &#8216;मेरा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"></p>
<p align="justify">पाकिस्तान में अपने एक अजीज दोस्त हैं<font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3">शाहिद अब्दुल कयूम। वहां के एक टीवी चैनल में सीनियर सब एडिटर। चार साल पहले अपन जब पाक गए। तो कयूम से दोस्ती हुई। फिर गाहे</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">ब</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">गाहे बजरिया ई</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">मेल बातचीत होती रही। कभी कभार एसएमएस भी। कयूम से हुई ताजा चर्चा पर आप भी गौर फरमाएं। लिखते हैं</font><font size="3" face="Mangal">- &#8216;</font><font size="3">मेरा देश जल रहा है। हालात बद से बदतर हो रहे हैं। आपने भी सीमा पार की बुरी खबरें सुनी होंगी। फिदायिन हमले</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">विद्रोही गतिविधियां। भुट्टो की हत्या के बाद राजनीतिक संकट। हमारी सीमाओं में जंग छेड़ने की अमेरिकी धमकियां। हमारे परमाणु बम की सुरक्षा का सवाल। आप क्या सोचते हैं</font><font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3">इस सबके लिए कौन जिम्मेदार है</font><font size="3" face="Mangal">?&#8217; <span id="more-157"></span></font><font size="3">अपन ने छोटा सा जवाब भेजा</font><font size="3" face="Mangal">- &#8216;</font><font size="3">खुद पाकिस्तान</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जिसमें लोकतंत्र मजबूत नहीं हुआ और अमेरिका भी। जिसकी शह पर पाक कूदता रहा। अपन पाकिस्तान की इस दशा पर फिक्रमंद हैं। पड़ोसी की झोपड़ी जलने की आंच हमें भी पहुंचेगी। आपकी याद आती है। छोटे भाई को प्यार।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">कयूम का जवाब आया</font><font size="3" face="Mangal">- &#8216;</font><font size="3">प्रिय</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">आपकी सहानुभूति के लिए शुक्रगुजार हूं। मेरे और मेरे देश के लिए फिक्रमंद होने पर आभार। मैं ई</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">मेल भेजूंगा। शुभ रात्रि</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">शब</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">ए</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">खैर।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">कयूम का ई</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">मेल आया। उनने चार साल पहले कही अपन की बातों को सही माना। अपन ने तब कयूम से कहा था</font><font size="3" face="Mangal">- &#8216;</font><font size="3">पाकिस्तान को भी आतंकवाद की आंच सहनी पड़ेगी। पाकिस्तानी सेना ने जमहूरियत पनपने नहीं दी। वही है भारत</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पाक के रिश्तों में बड़ी अड़चन।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">कयूम ने अपने जवाब में वह बात याद की। उनने माना</font><font size="3" face="Mangal">- &#8216;</font><font size="3">अपन तब सही थे।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">कयूम के ई</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">मेल का अपन ने फौरन जवाब भेजा। अपने लंबे जवाब में अपन ने कहा</font><font size="3" face="Mangal">- &#8216;</font><font size="3">पाकिस्तान में हो रहे फिदायिन हमलों पर अपन को अफसोस। पर भारत तीन दशक से ऐसे आतंकी हमले झेल रहा था। तो आपका रेडियो आतंकियों को आजादी के दीवाने कहता रहा।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">याद है</font><font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3">इसी बात पर तो मुशर्रफ की आगरा बात टूटी। खैर अपने ई</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">मेल पर कयूम का जवाब आया</font><font size="3" face="Mangal">- &#8216;</font><font size="3">आभार। आपके जज्बात ने मेरे दिल को छू लिया। आपसे मित्रता पर मुझे गर्व है। मेरे देश के प्रति आपकी भावनाओं की मैं कद्र करता हूं। आप सही थे। भारत</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पाक प्रतिद्वंदी नहीं। मेरी समझ गलत थी।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">कयूम से अपनी खत</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">ओ</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">खिताबत ठीक उस वक्त हुई। जब स्पेन में चौदह आतंकी पकड़े गए। इनमें बारह पाकिस्तानी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">दो हिंदुस्तानी। पाक के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ स्पेन पहुंचने वाले थे। आतंकियों का इरादा बार्सिलोना में हमले का था। स्पेनिस खोज</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">खबर से खबर निकली</font><font size="3" face="Mangal">- &#8216;</font><font size="3">आतंकियों का रिश्ता अल कायदा से। यों ज्यादातर आतंकी पाकिस्तानी लश्कर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">ए</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">तोएबा के मरजीवड़े।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">स्पेनिस अखबार </font><font size="3" face="Mangal">&#8216;</font><font size="3">एल पेरियोडिको ड कैटालूनिया</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">लिखता है</font><font size="3" face="Mangal">- &#8216;</font><font size="3">लश्कर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">ए</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">तोएबा भारत में आतंकी हमलों का जिम्मेदार। बाकी आतंकी मिस्र के आतंकी ग्रुप तकफीर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">उल</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">हियरा के मेंबर।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">स्पेनिस पुलिसिया छानबीन से खुलासा हुआ</font><font size="3" face="Mangal">- &#8216;</font><font size="3">पकड़े गए सभी कट्टरपंथी मुस्लिम हाल ही में पाक गए थे। जहां वजीरीस्तान में उनने आतंकी टे्रनिंग ली।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">आतंकियों का टारगेट था</font><font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3">मुशर्रफ। एक ऐसी मस्जिद भी जहां बेनजीर समर्थक जाते हैं। बात मुशर्रफ की चली। तो बताते जाएं</font><font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3">जो दूसरों के लिए कुआं खोदता है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">खुद उसी में गिरता है। मुशर्रफ पर हो रहे आतंकी हमले इसका सबूत। अपने पास और भी ऐसे उदाहरण। राजीव शासन की लिट्टे आतंकियों को टे्रनिंग। अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ अमेरिका का ओसामा बिन लादेन को खड़ा करना। पर बात पाकिस्तान के आतंकवाद को पालने की। जिसका जिक्र अपन ने कयूम से किया। सोमवार को ब्रिटिश पीएम गार्डन ब्राउन दिल्ली में थे। उद्योगपतियों से मीटिंग में बोले</font><font size="3" face="Mangal">- &#8216;</font><font size="3">फेल और फेल हो रहे देशों के कारण दुनियाभर में आतंकवाद का खतरा।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">इशारा जरूर पाक की तरफ ही था। पर मौजूदा आतंकवाद की वजह सिर्फ पाक नहीं। ब्रिटेन भी। ब्रिटेन ने हिंदुस्तान का बंटवारा कराकर आतंकवाद के बीज बोए। इराक पर अमेरिकी</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">ब्रिटिश हमला दुनियाभर में आतंकवाद की ताजा वजह।</font></p>
<p></font></p>
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		<title>शोले बन गये आग, बेनजीर की हत्या (संशोधित)</title>
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		<pubDate>Sat, 29 Dec 2007 15:12:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Diplomacy]]></category>
		<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[पाकिस्तान की मशहूर लेखिका सादिका ने हाल ही में अपने एक लेख में लिखा था कि पाकिस्तान में शोले दहक रहे हैं और कभी भी आग भड़क उठेगी। इसका अंदाज पिछले हफ्ते 21 दिसम्बर को भी लगा था जब आफताब अहमद खान शेरपाओ पर उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में उस समय गोली मारी गई थी, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font size="3">पाकिस्तान की मशहूर लेखिका सादिका ने हाल ही में अपने एक लेख में लिखा था कि पाकिस्तान में शोले दहक रहे हैं और कभी भी आग भड़क उठेगी। इसका अंदाज पिछले हफ्ते </font><font size="3" face="Mangal">21 </font><font size="3">दिसम्बर को भी लगा था जब आफताब अहमद खान शेरपाओ पर उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में उस समय गोली मारी गई थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जब वह मस्जिद में बकरीद की नमाज पढ़ रहे थे। बाल</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बाल बच गए आफताब अहमद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बड़े नेता थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन बेनजीर भुट्टो के पाकिस्तान छोड़कर इंग्लैंड में जा बसने के बाद परवेज मुशर्रफ से जा मिले थे और हाल ही तक पाकिस्तान के गृहमंत्री थे। अभी एक हफ्ता भी नहीं बीता कि पीपीपी की अध्यक्ष बेनजीर भुट्टो को गोली मार दी गई। दोनों ही आतंकी वारदातों के पीछे स्वात घाटी में सक्रिय अल कायदा से जुड़े तालिबान कमांडर बेतुल्लाह मसूद का हाथ होने का शक है। असल में बेतुल्लाह मसूद अमेरिका समर्थक पाकिस्तानी नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है। पाकिस्तान के एक बड़े वर्ग का मानना है कि राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ और बेनजीर भुट्टो अमेरिका के हितों की रक्षा कर रहे हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जिससे इस्लाम का नुकसान हो रहा है। इसलिए बार</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बार मुशर्रफ और बेनजीर पर आतंकवादी हमले हो रहे थे।<span id="more-134"></span> असल में पाकिस्तान की राजनीति समझने वाले जानते हैं कि वहां पर तालिबान और आईएसआई का अमेरिका के खिलाफ गठजोड़ हो चुका है। बेनजीर भुट्टो दो साल बाद </font><font size="3" face="Mangal">18 </font><font size="3">अक्टूबर को पाकिस्तान लौटीं तो करांची में ही उन पर जानलेवा हमला हुआ लेकिन तब वह बाल</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बाल बच गई थीं। तब से ही आशंका जताई जा रही थी कि आने वाले समय में बेनजीर पर फिर हमला होगा।</font></p>
<p align="justify"><font size="3">बेनजीर भुट्टो के परिवार की तुलना काफी हद तक इंदिरा गांधी के परिवार से की जा सकती है। बेनजीर भुट्टो के दादा सर शाहनवाज भुट्टो की भी गोली मारकर हत्या की गई थी। बेनजीर के पिता जुल्फिकार अली भुट्टो को जिया उल हक ने फांसी पर चढ़ा दिया था। बेनजीर के एक भाई शाहनवाज फ्रांस में मरे पाए गए थे और दूसरे भाई मुर्तजा की </font><font size="3" face="Mangal">1996 </font><font size="3">में हत्या हो गई थी। पाकिस्तान की राजनीति के जानकार मानते हैं कि बेनजीर भुट्टो के दोनों भाईयों की हत्या वहीं की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई ने करवाई थी। पाकिस्तानी फौज और आईएसआई हमेशा से ही भुट्टो परिवार के खिलाफ रहीं हैं और बेनजीर की हत्या में भी आईएसआई और तालिबान के गठजोड़ को नकारा नहीं जा सकता। आजादी के बाद से पाकिस्तान में राजनीतिक हत्याएं होती रहीं हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">यह सिलसिला थमने की बजाए और तेज हो गया है। खासकर अफगानिस्तान से लगते उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में साठ साल से राजनीतिक हिंसा जारी है। पिछले साल उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत के पूर्व मुख्यमंत्री बगूती को पाकिस्तानी फौज ने मुठभेड़ में मार गिराया था। माना जाता है कि बगूती की हत्या राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने करवाई थी। बत्तीस साल पहले फरवरी </font><font size="3" face="Mangal">1975 </font><font size="3">में हयात मोहम्मद खान शेरपाओ भी उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में आतंकवाद का शिकार हुए। बत्तीस साल बाद पिछले हफ्ते </font><font size="3" face="Mangal">21 </font><font size="3">दिसम्बर </font><font size="3" face="Mangal">2007 </font><font size="3">को मोहम्मद खान शेरपाओ के बेटे आफताब अहमद खान शेरपाओ को भी मारने की कोशिश की गई। आफताब तो बाल</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बाल बच गए लेकिन पचास से ज्यादा नमाजी मारे गए। इस घटना से ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अनुमान लगाया जा रहा था कि अब आतंकवाद का निशाना पाकिस्तान बनेगा। अमेरिकी रक्षा मंत्री राबर्ट गेट््स ने पिछले हफ्ते ही पाकिस्तान को चेतावनी दी थी कि आने वाले समय में अल कायदा के हमले तेज होंगे। अल कायदा के निशाने पर बेनजीर भुट्टो और परवेज मुशर्रफ के अलावा इन दोनों के समर्थक भी होंगे।</font><font size="3"> </font><font size="3"></p>
<p align="justify">सच यह है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में जब तक परवेज मुशर्रफ घरेलू कट्टरपंथियों को निशाना बनाए बिना अमेरिका का साथ दे रहे थे<font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तब तक पाक के कट्टरपंथी आतंकवादियों को कोई ज्यादा लेना</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">देना नहीं था। लेकिन अमेरिका के दबाव में मुशर्रफ ने जब अफगानिस्तान से लगते उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में आतंकवादियों पर शिकंजा कसा</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो मुशर्रफ ही नहीं बल्कि उनके सभी समर्थक अलकायदा के निशाने पर आ गए हैं। बेनजीर भुट्टो भी इसीलिए आतंकवादियों के निशाने पर आई क्योंकि उन्होंने अमेरिका और परवेज मुशर्रफ से समझौता करके पाकिस्तान में प्रवेश किया। दूसरी तरफ नवाज शरीफ के साथ ऐसी हालत नहीं है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">उन पर आतंकवादी हमले होने की आशंका नहीं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">क्योंकि वह लगातार अमेरिका के खिलाफ बोल रहे हैं। भारत और अमेरिका में ऐसा मानने वालों की अच्छी</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">खासी तादाद है कि परवेज मुशर्रफ आतंकवाद के खिलाफ ईमानदारी से लडने की बजाए सिर्फ अपनी कुर्सी की रक्षा कर रहे थे। हाल ही में इस खुलासे ने इस आशंका को बल दिया है कि अमेरिका की तरफ से भेजी गई आर्थिक मदद का इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल किया गया। यह खुलासा अमेरिकी एजेंसी ने ही किया है। परवेज मुशर्रफ की आतंकवाद के खिलाफ चल रही अंतरराष्ट्रीय लड़ाई में प्रतिबध्दता के बावजूद अफगानिस्तान से जुड़े पाकिस्तानी इलाकों में अलकायदा की जड़ें मजबूत हुई हैं। अमेरिका दुनियाभर में लोकतंत्र की दुहाई देता है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ ने जब सुप्रीम कोर्ट का गला घोंटा तो अमेरिकी राष्ट्रपति बुश की तरफ से कोई धमकी नहीं आई जबकि दुनिया के बाकी देशों में इस तरह की स्थिति पैदा होने पर अमेरिका का दबाव बढ़ जाता है। अब पाकिस्तान के वकील भी अमेरिका से मांग कर रहे हैं कि वह परवेज मुशर्रफ की आतंकवाद के खिलाफ जंग की असलियत को समझें। अमेरिका की कई खुफिया एजेंसियां भी ओसामा बिन लादेन और उनके समर्थकों के उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में छिपे होने की रिपोर्टे देते रहते हैं। भारतीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि अगर पाकिस्तान की सरकार ईमानदार हो</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो ओसामा बिन लादेन और उनके समर्थकों का पता लगाना कोई मुश्किल काम नहीं। परवेज मुशर्रफ भी यह कह चुके हैं कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में हो सकते हैं। अगर अमेरिकी गुप्तचर एजेंसियों की इस रिपोर्ट पर भरोसा किया जाए कि परवेज मुशर्रफ एक तरफ अमेरिका के साथ हैं तो दूसरी तरफ ओसामा बिन लादेन के हितों की भी रक्षा कर रहे हैं तो यह आशंका भी पैदा होगी कि कहीं बेनजीर भुट्टो की हत्या में भी परवेज मुशर्रफ का हाथ तो नहीं। क्योंकि दुनियाभर में ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है कि अमेरिका अब पाकिस्तान में अपना मोहरा बदलने की फिराक में था और इसी रणनीति के तहत बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तानी वापसी का समझौता करवाया गया था। परवेज मुशर्रफ उन सबको रास्ते से हटाते रहे हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जो उनके रास्ते में आने की हिमाकत करते रहे हैं।</font></p>
<p></font></p>
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		<title>शोले बन गये आग, बेनजीर की हत्या</title>
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		<pubDate>Thu, 27 Dec 2007 18:35:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Diplomacy]]></category>
		<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[पाकिस्तान की मशहूर लेखिका सादिका ने हाल ही में अपने एक लेख में लिखा था कि पाकिस्तान में शोले दहक रहे हैं और कभी भी आग भड़क उठेगी। इसका अंदाज पिछले हफ्ते 21 दिसम्बर को भी लगा था जब आफताब अहमद खान शेरपाओ पर उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में उस समय गोली मारी गई थी, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font size="3">पाकिस्तान की मशहूर लेखिका सादिका ने हाल ही में अपने एक लेख में लिखा था कि पाकिस्तान में शोले दहक रहे हैं और कभी <a target="_blank" href="http://indiagatese.com/wpfiles/wp-content/uploads/benazir.jpg" title="Ex Prime Minister of Pakistan Benazir Bhutto"><img border="1" vspace="1" align="left" width="100" src="http://indiagatese.com/wpfiles/wp-content/uploads/benazir.thumbnail.jpg" hspace="3" alt="Benazir Bhutto" height="125" /></a>भी आग भड़क उठेगी। इसका अंदाज पिछले हफ्ते </font><font size="3" face="Mangal">21 </font><font size="3">दिसम्बर को भी लगा था जब आफताब अहमद खान शेरपाओ पर उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में उस समय गोली मारी गई थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जब वह मस्जिद में बकरीद की नमाज पढ़ रहे थे। आफताब अहमद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बड़े नेता थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन बेनजीर भुट्टो के पाकिस्तान छोड़कर इंग्लैंड में जा बसने के बाद परवेज मुशर्रफ से जा मिले थे और हाल ही तक पाकिस्तान के गृहमंत्री थे। अभी एक <a href="http://indiagatese.com/wpfiles/wp-content/uploads/benazir.jpg" title="Benazir Bhutto"><img border="0" align="left" width="1" src="http://indiagatese.com/wpfiles/wp-content/uploads/benazir.thumbnail.jpg" alt="Benazir Bhutto" height="1" /></a>हफ्ता भी नहीं बीता कि पीपीपी की अध्यक्ष बेनजीर भुट्टो को गोली मार दी गई। दोनों ही बड़े नेताओं की हत्याओं के पीछे स्वात घाटी में सक्रिय अल कायदा से जुड़े तालिबान कमांडर बेतुल्लाह मसूद का हाथ होने का शक है। असल में बेतुल्लाह मसूद अमेरिका समर्थक पाकिस्तानी नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है। पाकिस्तान के एक बड़े वर्ग का मानना है कि राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ और बेनजीर भुट्टो अमेरिका के हितों की रक्षा कर रहे हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जिससे इस्लाम का नुकसान हो रहा है। इसलिए बार</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बार मुशर्रफ और बेनजीर पर आतंकवादी हमले हो रहे थे। <span id="more-130"></span>असल में पाकिस्तान की राजनीति समझने वाले जानते हैं कि वहां पर तालिबान और आईएसआई का अमेरिका के खिलाफ गठजोड़ हो चुका है। बेनजीर भुट्टो दो साल बाद </font><font size="3" face="Mangal">18 </font><font size="3">अक्टूबर को पाकिस्तान लौटीं तो करांची में ही उन पर जानलेवा हमला हुआ लेकिन तब वह बाल</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बाल बच गई थीं। तब से ही आशंका जताई जा रही थी कि आने वाले समय में बेनजीर पर फिर हमला होगा। </font></p>
<p align="justify"><font size="3">बेनजीर भुट्टो के परिवार की तुलना काफी हद तक इंदिरा गांधी के परिवार से की जा सकती है। बेनजीर भुट्टो के दादा सर शाहनवाज भुट्टो की भी गोली मारकर हत्या की गई थी। बेनजीर के पिता जुल्फिकार अली भुट्टो को जिया उल हक ने फांसी पर चढ़ा दिया था। बेनजीर के दोनों भाई फ्रांस में मारे गए थे और इस बात का राज अब तक नहीं खुला है कि उन दोनों की हत्या किसने करवाई। पाकिस्तान की राजनीति के जानकार मानते हैं कि बेनजीर भुट्टो के दोनों भाईयों की हत्या वहीं की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई ने करवाई थी। पाकिस्तानी फौज और आईएसआई हमेशा से ही भुट्टो परिवार के खिलाफ रहीं हैं और बेनजीर की हत्या में भी आईएसआई और तालिबान के गठजोड़ को नकारा नहीं जा सकता। आजादी के बाद से पाकिस्तान में राजनीतिक हत्याएं होती रहीं हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">यह सिलसिला थमने की बजाए और तेज हो गया है। खासकर अफगानिस्तान से लगते उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में साठ साल से राजनीतिक हिंसा जारी है। पिछले साल उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत के पूर्व मुख्यमंत्री बगूती को पाकिस्तानी फौज ने मुठभेड़ में मार गिराया था। माना जाता है कि बगूती की हत्या राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने करवाई थी। बत्तीस साल पहले फरवरी </font><font size="3" face="Mangal">1975 </font><font size="3">में हयात मोहम्मद खान शेरपाओ भी उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में आतंकवाद का शिकार हुए। बत्तीस साल बाद पिछले हफ्ते </font><font size="3" face="Mangal">21 </font><font size="3">दिसम्बर </font><font size="3" face="Mangal">2007 </font><font size="3">को मोहम्मद खान शेरपाओ के बेटे आफताब अहमद खान शेरपाओ पर जामियां मस्जिद में गोली मारी गई। आफताब तो बाल</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बाल बच गए लेकिन पचास से ज्यादा नमाजी मारे गए। इस घटना से ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अनुमान लगाया जा रहा था कि अब आतंकवाद का निशाना पाकिस्तान बनेगा। अमेरिकी रक्षा मंत्री राबर्ट गेट्स ने पिछले हफ्ते ही पाकिस्तान को चेतावनी दी थी कि आने वाले समय में अल कायदा के हमले तेज होंगे। अल कायदा के निशाने पर बेनजीर भुट्टो और परवेज मुशर्रफ के अलावा इन दोनों के समर्थक भी होंगे।</font><font size="3"></p>
<p align="justify">सच यह है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में जब तक परवेज मुशर्रफ घरेलू कट्टरपंथियों को निशाना बनाए बिना अमेरिका का साथ दे रहे थे<font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तब तक पाक के कट्टरपंथी आतंकवादियों को कोई ज्यादा लेना</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">देना नहीं था। लेकिन अमेरिका के दबाव में मुशर्रफ ने जब अफगानिस्तान से लगते उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में आतंकवादियों पर शिकंजा कसा</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो मुशर्रफ ही नहीं बल्कि उनके सभी समर्थक अलकायदा के निशाने पर आ गए हैं। बेनजीर भुट्टो भी इसीलिए आतंकवादियों के निशाने पर आई क्योंकि उन्होंने अमेरिका और परवेज मुशर्रफ से समझौता करके पाकिस्तान में प्रवेश किया। दूसरी तरफ नवाज शरीफ के साथ ऐसी हालत नहीं है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">उन पर आतंकवादी हमले होने की आशंका नहीं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">क्योंकि वह लगातार अमेरिका के खिलाफ बोल रहे हैं। भारत और अमेरिका में ऐसा मानने वालों की अच्छी</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">खासी तादाद है कि परवेज मुशर्रफ आतंकवाद के खिलाफ ईमानदारी से लडने की बजाए सिर्फ अपनी कुर्सी की रक्षा कर रहे थे। हाल ही में इस खुलासे ने इस आशंका को बल दिया है कि अमेरिका की तरफ से भेजी गई आर्थिक मदद का इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल किया गया। यह खुलासा अमेरिकी एजेंसी ने ही किया है। परवेज मुशर्रफ की आतंकवाद के खिलाफ चल रही अंतरराष्ट्रीय लड़ाई में प्रतिबध्दता के बावजूद अफगानिस्तान से जुड़े पाकिस्तानी इलाकों में अलकायदा की जड़ें मजबूत हुई हैं। अमेरिका दुनियाभर में लोकतंत्र की दुहाई देता है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ ने जब सुप्रीम कोर्ट का गला घोंटा तो अमेरिकी राष्ट्रपति बुश की तरफ से कोई धमकी नहीं आई जबकि दुनिया के बाकी देशों में इस तरह की स्थिति पैदा होने पर अमेरिका का दबाव बढ़ जाता है। अब पाकिस्तान के वकील भी अमेरिका से मांग कर रहे हैं कि वह परवेज मुशर्रफ की आतंकवाद के खिलाफ जंग की असलियत को समझें। अमेरिका की कई खुफिया एजेंसियां भी ओसामा बिन लादेन और उनके समर्थकों के उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में छिपे होने की रिपोर्टे देते रहते हैं। भारतीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि अगर पाकिस्तान की सरकार ईमानदार हो</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो ओसामा बिन लादेन और उनके समर्थकों का पता लगाना कोई मुश्किल काम नहीं। परवेज मुशर्रफ भी यह कह चुके हैं कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में हो सकते हैं। अगर अमेरिकी गुप्तचर एजेंसियों की इस रिपोर्ट पर भरोसा किया जाए कि परवेज मुशर्रफ एक तरफ अमेरिका के साथ हैं तो दूसरी तरफ ओसामा बिन लादेन के हितों की भी रक्षा कर रहे हैं तो यह आशंका भी पैदा होगी कि कहीं बेनजीर भुट्टो की हत्या में भी परवेज मुशर्रफ का हाथ तो नहीं। क्योंकि दुनियाभर में ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है कि अमेरिका अब पाकिस्तान में अपना मोहरा बदलने की फिराक में था और इसी रणनीति के तहत बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तानी वापसी का समझौता करवाया गया था। परवेज मुशर्रफ उन सबको रास्ते से हटाते रहे हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जो उनके रास्ते में आने की हिमाकत करते रहे हैं।</font></p>
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		<title>अमेरिकापरस्ती बनी बेनजीर की मौत</title>
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		<pubDate>Thu, 27 Dec 2007 18:33:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[India Gate se Sanjay Uvach]]></category>
		<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[
बहादुर शाह जफर को मरते समय भी गम रहा। बर्मा की मांडले जेल में मरे। वहीं पर दफनाए गए। जफर को पता था- हिंद में नहीं दफनाया जाएगा। सो उनने पहले ही लिख दिया- &#8216;दो गज जमीं न मिली, कु-ए-यार में।&#8216; पर बेनजीर भुट्टो को मौत ही पाकिस्तान ले आई। वरना आठ साल बाद वतन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"></p>
<p align="justify">बहादुर शाह जफर को मरते समय भी गम रहा। बर्मा की मांडले जेल में मरे। वहीं पर दफनाए गए। जफर को पता था<font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3">हिंद में नहीं दफनाया जाएगा। सो उनने पहले ही लिख दिया</font><font size="3" face="Mangal">- &#8216;</font><font size="3">दो गज जमीं न मिली</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">कु</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">ए</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">यार में।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">पर बेनजीर भुट्टो को मौत ही पाकिस्तान ले आई। वरना आठ साल बाद वतन लौटने की न सोचती। बेनजीर लौटते ही आतंकियों के निशाने पर आ गई। अपन ने तब तालिबानी नेता बेतुल्ला महमूद की धमकी लिखी थी। उनने कहा था</font><font size="3" face="Mangal">- &#8216;</font><font size="3">बेनजीर का स्वागत फिदाइन करेंगे।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">आखिर </font><font size="3" face="Mangal">18 </font><font size="3">अक्टूबर की पहली ही रात बेनजीर पर आतंकी हमला हुआ। वह खुद तो बच गई। पर पौने दो सौ बेगुनाह मारे गए। अपन तो क्या</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">सब को आशंका थी</font><font size="3" face="Mangal">- &#8216;</font><font size="3">तालिबान चुपकर के नहीं बैठेंगे।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; <span id="more-129"></span></font><font size="3">आखिर वही हुआ। जब गुरुवार को रावलपिंडी के लियाकत बाग में गोलियों से छलनी कर दिया। लियाकत बाग की बात चली। तो बता दें</font><font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3">अंग्रेजों के जमाने में यही कंपनी बाग था। जहां पाक के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खां को गोली मारी गई। गोली मारने वाला शख्स था</font><font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3">अकबर अली खां। अकबर अली खां को भी फौरन गोली मार दी गई। हत्या की साजिश का राज हाथों</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">हाथ दफन हो गया। सो पाक में हत्या की राजनीति नई बात नहीं। पहले पीएम की भी हत्या हुई। हत्या की राजनीति पर बात शुरू हो ही गई। तो जरा और इतिहास बता दें। बेनजीर भुट्टो के दादा थे सर शाहनवाज भुट्टो। बटवारे से पहले जूनागढ़ के दीवान थे। जूनागढ़ का बादशाह पाक भाग गया। तो शाहनवाज भुट्टो भी भाग गए। पर मौत शाहनवाज को पाक ले गई थी। जाते ही हत्या कर दी गई। शाहनवाज के हत्यारों का आज तक पता नहीं चला। बेनजीर के पिता जुल्फिकार अली का इतिहास पुराना नहीं। जिया उल हक ने </font><font size="3" face="Mangal">1979 </font><font size="3">में जुल्फिकार का तख्ता पलट फांसी पर चढ़ाया। भुट्टो पर आरोप था</font><font size="3" face="Mangal">- &#8216;</font><font size="3">उनने महमूद कसूरी के पिता की हत्या करवाई।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">जिया उल हक ने बेनजीर को भी कई बार जेल में डाला। बेनजीर का पूरा परिवार राजनीतिक साजिश का शिकार। अपन पहले भी लिख चुके। फिर याद करा दें। बेनजीर का बड़ा भाई शाहनवाज </font><font size="3" face="Mangal">1985 </font><font size="3">में फ्रांस में मरा पाया गया। दूसरे भाई मुर्तुजा को </font><font size="3" face="Mangal">1996 </font><font size="3">में राष्ट्रपति फारुख लेघारी ने मरवा दिया। अब बेनजीर की हत्या। बेनजीर की बस एक बहन बची हैं सनद। जो </font><font size="3" face="Mangal">18 </font><font size="3">अक्टूबर को ही बेनजीर के साथ इंग्लैंड से लौटी। बेनजीर ने इसी </font><font size="3" face="Mangal">21 </font><font size="3">जून को </font><font size="3" face="Mangal">54 </font><font size="3">साल पूरे किए। तीन बच्चों की मां बेनजीर ऑक्सफोर्ड और हावर्ड में पढ़ी</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">लिखी। शिमला समझौते के समय पिता के साथ भारत आई। तो सिर्फ </font><font size="3" face="Mangal">18 </font><font size="3">साल की थी। बेनजीर को तब अपने अखबारों में पिंकी लिखा गया। पिंकी बेनजीर का घर का नाम था। बेनजीर अक्टूबर के हमले में बाल</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बाल बचीं। तो लाल कृष्ण आडवाणी ने फोन कर हालचाल पूछा। पर अब का हमला जानलेवा साबित हुआ। बेनजीर की हत्या पर अपन को </font><font size="3" face="Mangal">1991 </font><font size="3">याद आ गया। तब भारत में चुनाव हो रहे थे। राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। अब पाकिस्तान में चुनाव हो रहे हैं। बेनजीर की हत्या कर दी गई। इंदिरा की हत्या राजीव को राजनीति में ले आई। जुल्फिकार की फांसी बेनजीर को राजनीति में ले आई। राजीव और बेनजीर का राजनीतिक उदय भी एक जैसे हालत में हुआ। मौत भी एक जैसे हालात में हुई। बात पाकिस्तान के आतंकी माहौल की। जो आने वाले दिनों में और बिगड़ेगा। अपन को पाकिस्तान की मशहूर लेखिका सादिका का कहा बताना पड़ेगा। उनने पिछले हफ्ते ही लिखा था</font><font size="3" face="Mangal">- &#8216;</font><font size="3">पाक में शोले दहक रहे हैं। कभी भी आग भड़क उठेगी।</font><font size="3" face="Mangal">&#8216;</font></p>
<p></font></p>
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		<title>शोलों पर पाकिस्तान</title>
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		<pubDate>Fri, 21 Dec 2007 18:34:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Diplomacy]]></category>
		<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[
बत्तीस साल पहले फरवरी 1975 में हयात मोहम्मद खान शेरपाओ पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में आतंकवाद का शिकार हुए। उनकी याद में शेरपाओ की जामियां मस्जिद के पास ही एक गुम्बंद बनाया गया। बत्तीस साल बाद 21 दिसम्बर 2007 को मोहम्मद खान शेरपाओ के बेटे आफताब अहमद खान शेरपाओ पर जामियां मस्जिद में उस [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"></p>
<p align="justify">बत्तीस साल पहले फरवरी <font size="3" face="Mangal">1975 </font><font size="3">में हयात मोहम्मद खान शेरपाओ पाकिस्तान के उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में आतंकवाद का शिकार हुए। उनकी याद में शेरपाओ की जामियां मस्जिद के पास ही एक गुम्बंद बनाया गया। बत्तीस साल बाद </font><font size="3" face="Mangal">21 </font><font size="3">दिसम्बर </font><font size="3" face="Mangal">2007 </font><font size="3">को मोहम्मद खान शेरपाओ के बेटे आफताब अहमद खान शेरपाओ पर जामियां मस्जिद में उस समय आत्मघाती हमला हुआ</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जब वह बकरीद की नमाज अदा कर रहे थे। आफताब अहमद हाल ही तक पाकिस्तान के गृह मंत्री थे और राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के बेहद करीबियों में माने जाते हैं। बेनजीर भुट्टो के पाकिस्तान से बाहर चले जाने के बाद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी में फूट पड़ी और एक खेमा परवेज मुशर्रफ के साथ जा मिला था। <span id="more-96"></span>आफताब अहमद पीपीपी के उस खेमे के अध्यक्ष हैं। आफताब तो बाल</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बाल बच गए लेकिन पचास से ज्यादा नमाजी मारे गए। परवेज मुशर्रफ के समर्थकों पर आतंकवादी हमले अब तेज हो चुके हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में जब तक वह घरेलू कट्टरपंथियों को निशाना बनाए बिना अमेरिका का साथ दे रहे थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तब तक पाक के कट्टरपंथी आतंकवादियों को कोई ज्यादा लेना</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">देना नहीं था लेकिन अमेरिका के दबाव में परवेज मुशर्रफ ने जब अफगानिस्तान से लगते उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में आतंकवादियों पर शिकंजा कसा</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो परवेज मुशर्रफ ही नहीं बल्कि उनके सभी समर्थक अलकायदा के निशाने पर आ गए हैं। बेनजीर भुट्टो भी संभवत</font><font size="3" face="Mangal">: </font><font size="3">इसीलिए आतंकवादियों के निशाने पर आई क्योंकि उन्होंने अमेरिका और परवेज मुशर्रफ से समझौता करके पाकिस्तान में प्रवेश किया। </font></p>
<p align="justify"><font size="3">भारत और अमेरिका में ऐसा मानने वालों की अच्छी</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">खासी तादाद है कि परवेज मुशर्रफ आतंकवाद के खिलाफ ईमानदारी से लडने की बजाए सिर्फ अपनी कुर्सी की रक्षा कर रहे थे। परवेज मुशर्रफ की आतंकवाद के खिलाफ चल रही अंतरराष्ट्रीय लड़ाई में प्रतिबध्दता के बावजूद अफगानिस्तान से जुड़े पाकिस्तानी इलाकों में अलकायदा की जड़ें मजबूत हुई हैं। अमेरिका दुनियाभर में लोकतंत्र की दुहाई देता है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ ने जब सुप्रीम कोर्ट का गला घोंटा तो अमेरिकी राष्ट्रपति बुश की तरफ से कोई धमकी नहीं आई जबकि दुनिया के बाकी देशों में इस तरह की स्थिति पैदा होने पर अमेरिका का दबाव बढ़ जाता है। अब पाकिस्तान के वकील भी अमेरिका से मांग कर रहे हैं कि वह परवेज मुशर्रफ की आतंकवाद के खिलाफ जंग की असलियत को समझें। अमेरिका की कई खुफिया एजेंसियां भी ओसामा बिन लादेन और उनके समर्थकों के उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में छिपे होने की रिपोटे देते रहते हैं। भारतीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि अगर पाकिस्तान की सरकार ईमानदार हो</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो ओसामा बिन लादेन और उनके समर्थकों का पता लगाना कोई मुश्किल काम नहीं। परवेज मुशर्रफ भी यह कह चुके हैं कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में हो सकते हैं।</font><font size="3"> </font></p>
<p></font></p>
<p align="justify"><font size="3">पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली के चुनावों का बिगुल बज चुका है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">हालांकि जिस तरह चुनाव करवाए जा रहे हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">उसकी निष्पक्षता पर पाकिस्तान ही नहीं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">अलबत्ता पूरी दुनिया में सवाल उठाया जा रहा है। यूरोपियन यूनियन ने तो निष्पक्षता पर सवाल उठाया ही है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">अमेरिका की मानवाधिकार संस्थाएं भी सवाल उठा रही हैं। जिस तरह पांच साल पहले चुनावों की नौटंकी हुई थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">निष्पक्ष प्रवेक्षकों का मानना है कि इस बार भी चुनावों की नौटंकी ही होगी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जिसमें सरकारी अमला परवेज मुशर्रफ के समर्थकों की जीत सुनिश्चित करेगा। परवेज मुशर्रफ ने वर्दी उतारने के बाद नागरिक राष्ट्रपति की शपथ लेने के बावजूद अपने समर्थकों को जिताने के लिए खुलेआम बयान देकर अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं। इसीलिए परवेज मुशर्रफ के वर्दी उतारने</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">नागरिक राष्ट्रपति के तौर पर शपथ लेने और आपात स्थिति हटाए जाने के बावजूद राष्ट्रमंडल मंत्रिमंडलीय समूह पाकिस्तान का निलंबन रद्द करने के लिए आम सहमति पर नहीं पहुंचा है। परवेज मुशर्रफ ने जब </font><font size="3" face="Mangal">1999 </font><font size="3">में नवाज शरीफ का तख्ता पलटकर सत्ता पर कब्जा किया था तो राष्ट्रमंडल ने पाकिस्तान की सदस्यता निलंबित कर दी थी। पांच साल बाद जब परवेज मुशर्रफ आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में शामिल हुए</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तब जाकर पाकिस्तान की सदस्यता बहाल की गई। अब सुप्रीम कोर्ट के दबाव में परवेज मुशर्रफ ने भले ही अपनी वर्दी उतार दी है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन न्यायपालिका का गला घोंट दिया है। उन्होंने कानून के राज को खत्म कर दिया है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">संविधान में मनमाफिक रद्दोबदल कर दिया है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">सेना को असीमित अधिकार दे दिए हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">मीडिया पर पाबंदियां लगा दी हैं और चुनाव जीतने के हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए हैं। परवेज मुशर्रफ ने जब आपात स्थिति लगाकर सुप्रीम कोर्ट के जजों को नजरबंद कर लिया था तो </font><font size="3" face="Mangal">22 </font><font size="3">नवम्बर को राष्ट्रमंडल से पाकिस्तान को फिर निलंबित कर दिया गया था। हालांकि परवेज मुशर्रफ ने अब आपात स्थिति को हटा दिया है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन इस बीच उन्होंने लोकतंत्र को जितना नुकसान पहुंचाया है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">उससे राष्ट्रमंडल देश पाकिस्तान का निलंबन रद्द करने के पक्ष में दिखाई नहीं देते। अब राष्ट्रमंडल के ज्यादातर देशों की भी राय बन रही है कि परवेज मुशर्रफ की नीतियां लोकतंत्र विरोधी हैं और पाकिस्तान में आतंकवादियों को बढ़ावा दे रही हैं। राष्ट्रमंडल के हरारे सम्मेलन में मानवाधिकारों</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">कानून के राज और मूलभूत राजनीतिक मर्यादाओं पर बल दिया गया था। चार साल पहले अबूजा में हुए राष्ट्रमंडल देशों के सम्मेलन में तय किया गया था कि निष्पक्ष न्यायपालिका लोकतांत्रिक प्रशासन का मूल आधार होंगी। इसलिए मौजूदा हालात में पाकिस्तान की राष्ट्रमंडल में वापसी संभव दिखाई नहीं देती। राष्ट्रमंडल की सदस्यता बहाली या निलंबन से पाकिस्तान की सेहत पर कोई ज्यादा असर तो नहीं पड़ता लेकिन परवेज मुशर्रफ के गैर लोकतांत्रिक तौर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">तरीकों पर अमेरिकी राष्ट्रपति बुश की सहमति जरूर सवालों के घरे में आती है। पाकिस्तान में आठ जनवरी को चुनाव होने वाले हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन इन चुनावों से पहले ही यह हवा बनने लगी है कि चुनाव </font><font size="3" face="Mangal">2002 </font><font size="3">जैसे ही होंगे और परवेज मुशर्रफ बिना बाधा बने रहेंगे। इस आम धारणा के चलते कट्टरपंथियों ने अपने हमले तेज कर दिए हैं और आने वाले समय में आतंकी गतिविधियां और बढ़ जाएंगी। पाकिस्तान की मशहूर लेखिका सादिका ने अपने एक लेख में लिखा है कि पाकिस्तान में शोले दहक रहे हैं और कभी भी आग भड़क उठेगी।</font></p>
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