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	<title>Socio Political News &#187; Layer by Layer</title>
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	<description>News Articles and Reactions</description>
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		<title>कांग्रेस खुद बढ़ेगी, पर यूपीए को होगा नुकसान</title>
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		<pubDate>Fri, 16 Jan 2009 05:42:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[कांग्रेस को मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, उड़ीसा, केरल और छत्तीसगढ़ में फायदा होगा। लेकिन असम, गुजरात, तमिलनाडु, हरियाणा में नुकसान होगा। सपा, राजद और द्रमुक को भी होगा अच्छा-खासा नुकसान।
भाजपा को गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार में बढ़ोत्तरी मिलेगी। वक्त देखकर जयललिता, मायावती दे सकती हैं एनडीए को समर्थन। पलड़ा किसी का भारी नहीं, टक्कर कांटे की।
यूपीए [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>कांग्रेस को मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, उड़ीसा, केरल और छत्तीसगढ़ में फायदा होगा। लेकिन असम, गुजरात, तमिलनाडु, हरियाणा में नुकसान होगा। सपा, राजद और द्रमुक को भी होगा अच्छा-खासा नुकसान।</strong></p>
<p><strong>भाजपा को गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार में बढ़ोत्तरी मिलेगी। वक्त देखकर जयललिता, मायावती दे सकती हैं एनडीए को समर्थन। पलड़ा किसी का भारी नहीं, टक्कर कांटे की।</strong></p></blockquote>
<p>यूपीए सरकार ने अल्पमत में होते हुए अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है। यूपीए लोकसभा में पहले वामपंथी दलों के समर्थन से और बाद में समाजवादी पार्टी के समर्थन से बहुमत में है। हालांकि यूपीए की सरकार कभी भी बहुमत की सरकार नहीं थी क्योंकि मंत्रिमंडल बाहरी समर्थन पर टिका हुआ था। इसीलिए विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी चार साल तक सरकार के कार्यकाल पूरा नहीं होने की उम्मीद लगाए रहे। दूसरी तरफ एनडीए सरकार 1999 के बाद आखिर तक पूरी तरह बहुमत में थी मई 2004 में यूपीए सरकार बनने का कारण दक्षिण के दो बड़े राज्य आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु थे। आंध्र प्रदेश की 42 में से 29 सीटें जीतकर कांग्रेस देश की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभर आई थी और तमिलनाडु में कांग्रेस खुद दस और उसका सहयोगी द्रमुक गठबंधन बाकी की सभी 29 सीटें जीत गया था। इस तरह यूपीए को मिली 211 सीटों में से 68 यानी करीब तिहाई सीटें तो इन्हीं दो राज्यों की थी।</p>
<p>अब जबकि लोकसभा चुनाव सिर पर आ गए हैं तो राजग और यूपीए में टिकटों का बंटवारा शुरू हो चुका है। पिछले तीन लोकसभा चुनावों की तरह मुकाबला इस बार भी दोनों बड़े गठबंधनों के बीच होगा। यूपीए और एनडीए क्षेत्रीय दलों को अपने-अपने साथ लाने की कोशिशों में जुट गए हैं। पिछले छह महीनों में चार क्षेत्रीय दलों ने गठबंधनों के साथ अपनी निष्ठाएं नए सिरे से तय की हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 में से 35 सीटें और उत्तराखंड की एक सीट जीतने वाली समाजवादी पार्टी ने इस बार यूपीए में शामिल होकर कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। पिछले लोकसभा चुनाव से ठीक पहले तक एनडीए सरकार में शामिल नेशनल कांफ्रेंस ने भी जम्मू कश्मीर में कांग्रेस के समर्थन की एवज में यूपीए से चुनावी गठबंधन का ऐलान किया है। पिछले चार-साढ़े चार साल से एनडीए से अलग होकर तीसरे मोर्चे का हिस्सा बने रहे हरियाणा के इनलोद और असम के असमगण परिषद ने एनडीए में फिर से प्रवेश कर लिया है। उत्तर प्रदेश के एक अन्य छोटे दल अजित सिंह के लोकदल की एनडीए से सीटों के बंटवारे पर बात चल रही है, लेकिन वह आखिरी समय में किस तरफ जाएंगे, कोई दावे के साथ नहीं कह सकता। अजित सिंह मौसम के साथ-साथ साथी बदलने में माहिर हैं, वह भाजपा से दस लोकसभा सीटें मांग रहे हैं, जबकि अरुण जेटली सात देने को राजी हुए हैं।</p>
<p>बड़ा सवाल यह है कि क्या यूपीए-एनडीए के अलावा तीसरे मोर्चे की भी कोई संभावना बनती है। पिछले लोकसभा चुनावों के वक्त वामपंथी दलों और उत्तर प्रदेश के समाजवादी दल ने मिलकर चुनाव तो नहीं लड़ा था लेकिन दोनों दल एक-दूसरे के काफी करीब थे। चारों वामपंथी दल और समाजवादी पार्टी मिलकर 96 सीटें ले गए थे। पांच सीटें जीतने वाली आंध्र प्रदेश की तेलगूदेशम भी इन्हीं के साथ थी। यानी तीसरे मोर्चे को 101 सीटें हासिल हुई थी और उनके समर्थन के बिना कोई सरकार नहीं बन सकती थी। माकपा के महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत ने चुनाव नतीजों के फौरन बाद सोनिया गांधी को समर्थन देकर तीसरे मोर्चे की ताकत को फ्यूज कर दिया था। कांग्रेस ने उसका भरपूर फायदा उठाते हुए तीसरे मोर्चे को पहले ही दिन तोड़ दिया। वामपंथी दलों ने समाजवादी पार्टी को धोखा देकर बीच मझधार में छोड़ दिया था। कांग्रेस ने अपनी परंपरा का पालन करते हुए दोनों दलों में फूट डाले रखी। पहले चार साल माकपा का इस्तेमाल किया और आखिरी साल उनको ठोकर मारकर समाजवादी पार्टी को अपने साथ जोड़ लिया। पिछले साल एटमी करार के मुद्दे पर जब गठबंधन नए सिरे से बन और बिगड़ रहे थे तो तीसरे मोर्चे में समाजवादी पार्टी की जगह बहुजन समाज पार्टी ने ले ली थी। केंद्र की एनडीए सरकार को समर्थन दे चुके अन्ना द्रमुक, बसपा, इनलोद, तेलगूदेशम, असमगण परिषद और पिछले लोकसभा चुनाव में ही उभरे टीआरएस ने मिलकर तीसरा मोर्चा गठित किया। समाजवादी पार्टी जब यूपीए सरकार बचाने के लिए तीसरा मोर्चा छोड़ गई तो इस नए तीसरे मोर्चे ने वामपंथी दलों के साथ मिलकर यूपीए सरकार गिराने का बीड़ा उठाया था। लेकिन मायावती की रहनुमाई वाला तीसरा मोर्चा सरकार गिराने में विफल रहा तो खुद ही रेत के महल की तरह बिखरने लगा। जयललिता को पहले मुलायम की रहनुमाई मंजूर नहीं थी और बाद में मायावती की मंजूर नहीं हुई। मायावती इस समय न तो एनडीए में है, न यूपीए में और न ही तीसरे मोर्चे में। इस बीच तीसरे मोर्चे के इनलोद और अगप वापस एनडीए में लौट चुके हैं वामपंथी दलों ने एनडीए के दो पूर्व सहयोगी दलों तेलगूदेशम और अन्नाद्रमुक के अलावा यूपीए के सहयोगी टीआरएस को अपने साथ जोड़ा है। लेकिन इस बार तीसरे मोर्चे की हालत पिछली बार जैसी मजबूत नहीं है। वामपंथी दलों की हालत केरल में बेहद पतली है और बंगाल में भी वैसी मजबूती नहीं रही। पिछली बार केरल की बीस में से 18 सीटें वामपंथी गठबंधन जीता था। बंगाल में भी 42 में से 35 सीटें वामपंथी जीते थे अब इन  दोनों राज्यों में कम से कम दस सीटों का नुकसान तय है। इसकी भरपाई कहीं से होती दिखाई नहीं देती। वामपंथी दलों के नए साथी अन्ना द्रमुक की हालत में जरूर सुधार होगा। पिछली बार तो अन्ना द्रमुक लोकसभा में एक भी सीट नहीं जीत पाई थी, इस बार उसका खाता जरूर खुलेगा लेकिन द्रमुक की हालत इतनी पतली भी नहीं। इसी तरह आंध्र प्रदेश में नए बनी चिरंजीवी की पार्टी प्रजा रायम ने तेलगूदेशम की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। कुल मिलाकर तीसरा मोर्चा कोई रूप लेता दिखाई नहीं देता। देखना होगा कि मायावती और जयललिता की सीटें कितनी आती हैं, लेकिन ये दोनों ही पहले एनडीए सरकार का समर्थन कर चुकी हैं। मुलायम अगर कांग्रेस के साथ रहेंगे तो मायावती मजबूरी में आडवाणी का साथ देंगी। करुणानिधि अगर सोनिया के साथ रहेंगे तो जयललिता भी आडवाणी का समर्थन कर देंगी।</p>
<p>जहां एक तरफ मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ ने कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। बिहार, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में यूपीए की ताकत बढ़ने के बजाए घटने जा रही है। वहां चिरंजीवी आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के लिए संजीवनी बनकर प्रकट हुए हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को सर्वाधिक 29 सीटें मिली थी, इस बार अगर आंध्र प्रदेश में सीटें घटीं तो कांग्रेस का सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरना आसान नहीं। तेलगूदेशम के प्रभाव वाले क्षेत्र में प्रजा रायम के प्रभावशाली ढंग से उभरने का सीधा फायदा कांग्रेस को होगा। प्रजा रायम बनने के बाद आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी सर्वाधिक खुश हैं। आंध्रप्रदेश विधानसभा का चुनाव भी लोकसभा के साथ होगा और कांग्रेस का पलड़ा अभी से भारी दिखाई देने लगा है। कांग्रेस का असम में 9, गुजरात में 12, तमिलनाडु में 10 सीटें, हरियाणा में 9 सीटें बरकरार रहना आसान नहीं है। आंध्र प्रदेश समेत इन सभी पांचों राज्यों में कांग्रेस की कम से कम 20 सीटें घट रही हैं। कांग्रेस को मौजूदा 145 सीटें बनाए रखने के लिए मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, उड़ीसा, केरल और छत्तीसगढ़ से इसकी भरपाई करनी पड़ेगी। हालांकि कांग्रेस इन छह राज्यों में अपनी ताकत दोगुनी से तिगुनी कर सकती है। इस समय इन छह राज्यों की 133 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस के पास सिर्फ 20 सीटें हैं और कांग्रेस की रणनीति इसे 50 तक ले जाने की है। छह में से पांच राज्यों में भाजपा की सीटें घटेंगी और छटे केरल में वामपंथी दलों की। कांग्रेस अगर अपनी रणनीति में कामयाब रही तो वह अपनी ताकत 175 सीटों की बना सकती है। लेकिन कांग्रेस को तमिलनाडु, बिहार और उत्तर प्रदेश में अपने प्रमुख सहयोगियों द्रमुक और राजद को होने वाले नुकसान की भरपाई का रास्ता भी निकालना होगा। द्रमुक, राजद और सपा की मौजूदा 76 सीटें घटकर आधी तक हो जाएंगी। यानी कांग्रेस अगर 30 सीटों की अपनी ताकत बढ़ाएगी तो उसे सहयोगियों की 40 सीटों का नुकसान होगा। आम धारणा के विपरीत गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा में भाजपा की ताकत में बढ़ोत्तरी हो रही है। अगर वह 20 सीटें मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ में घटाएगी, तो उसकी भरपाई इन चारों राज्यों से कर लेगी। इसलिए इस बार भी लड़ाई कांटे की ही है, पलड़ा किसी का भारी नहीं है।</p>
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		<title>भाजपा लोकसभा चुनाव में भी हिट विकेट को तैयार</title>
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		<pubDate>Fri, 09 Jan 2009 19:06:52 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[देश की सियासत में इस हफ्ते की दो बड़ी घटनाएं रही झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का विधानसभा उप चुनाव हारना और पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत का सक्रिय राजनीति में लौटने का ऐलान। इन दोनों घटनाओं को हाल ही के विधानसभा चुनाव नतीजों की दूसरी कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। जम्मू कश्मीर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>देश की सियासत में इस हफ्ते की दो बड़ी घटनाएं रही झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का विधानसभा उप चुनाव हारना और पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत का सक्रिय राजनीति में लौटने का ऐलान। इन दोनों घटनाओं को हाल ही के विधानसभा चुनाव नतीजों की दूसरी कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। जम्मू कश्मीर और मिजोरम विधानसभाओं के चुनाव नतीजे उम्मीद के मुताबिक ही रहे थे। असल में महत्वपूर्ण रहे चार हिंदी भाषी राज्यों के नतीजे। इनमें से दो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा का फिर से जीतना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका है, तो राजस्थान में हारना और दिल्ली नहीं जीत पाना भाजपा के लिए बड़ा झटका है। भाजपा चार में से तीन राज्य जीत जाती तो इसे लोकसभा चुनाव नतीजों का संकेत बताकर फूली नहीं समाती। इसी तरह कांग्रेस चार में से तीन राज्य जीत जाती तो अगली लोकसभा का स्वरूप उसके पक्ष में स्पष्ट दिखाई देता। सो जैसी स्थिति विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद दोनों राजनीतिक दलों के लिए बनी थी। <span id="more-672"></span>उसी की दूसरी कड़ी पिछले हफ्ते की दोनों बड़ी राजनीतिक घटनाएं हुई हैं। शिबू सोरेन की विधानसभा चुनाव में हार से यूपीए की नींद उड़ गई है तो भैरोंसिंह शेखावत के तेवरों ने भाजपा और एनडीए की नींद उड़ा दी है। लगातार ऐसी घटनाएं हो रही हैं जिससे किसी एक का पलड़ा भारी दिखाई नहीं पड़ रहा।</p>
<p>यूपीए का पलड़ा इस हिसाब से भारी कहा जा सकता है कि साढे चार साल का शासन करने के बावजूद उसकी लोकप्रियता में वैसी गिरावट नहीं दिख रही, जो भाजपा की खुशी का कारण बने। टीआरएस जैसे छिटपुट दलों को छोड़ दें तो यूपीए कुनबे में किसी तरह का बिखराव दिखाई नहीं दे रहा, जो उसके लिए अच्छा लक्षण है जबकि 2004 के लोकसभा से पहले वाजपेयी जैसी शख्सियत के बावजूद राजग में बिखराव शुरू हो गया था। यूपीए इस समय 2004 से भी ज्यादा ताकतवर है क्योंकि उसमें कांग्रेस विरोध की राजनीति करने वाले मुलायम सिंह और फारुख अब्दुल्ला के दलों का प्रवेश हुआ है। दूसरी  तरफ अटल बिहारी वाजपेयी के बिना राजग खुद को काफी कमजोर पा रहा है। लालकृष्ण आडवाणी को भावी प्रधानमंत्री घोषित किए अब एक साल पूरा हो चुका है। इस एक साल में राजग परिवार में कोई उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। ओम प्रकाश चौटाला के पास राजग में लौटने के सिवा कोई चारा भी नहीं था। वह बाकायदा अपने पक्ष में लॉबिंग करवाकर राजग में लौटे हैं। इसी तरह असमगण परिषद के पास भी राजग में लौटने के सिवा कोई चारा नहीं था। उसके लिए लालकृष्ण आडवाणी को कोई मेहनत नहीं करनी पड़ी। लालकृष्ण आडवाणी को पिछले एक साल में आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में कोई सफलता नहीं मिली है। मौजूदा हालात में इन दोनों राज्यों में जहां लोकसभा की 81 सीटें हैं, भाजपा या राजग का कोई नाम लेवा ही नहीं है। यही हालत 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में है, जहां उसका अपना आधार काफी घट चुका है और अजित सिंह के सिवा कोई सहयोगी नहीं। अजित सिंह का आधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बहुत छोटे क्षेत्र में सीमित है, जिसमें दस सीटें ही प्रभावित होती हैं।</p>
<p>कांग्रेस ने राजग के 82 वर्षीय प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी को मात देने के लिए 80 वर्षीय मनमोहन सिंह को आगे करने की रणनीति छोड़ दी है। सोनिया गांधी के नए विश्वासपात्र प्रणव मुखर्जी पर भरोसा किया जाए तो राहुल गांधी को जल्दी लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट किया जाएगा। प्रणव मुखर्जी ने आठ जनवरी को यह कहकर बहुतेरे लोगों को चौंकाया होगा कि राहुल गांधी जल्द ही प्रधानमंत्री बन सकते हैं। ठीक एक महीना पहले 8 दिसंबर को जब विधानसभा के चुनाव नतीजे आ रहे थे और मैं न्यूज 24 पर प्रभाष जोशी के साथ चुनाव नतीजों की समीक्षा कर रहा था तो यही संभावना मैंने भी जताई थी। पिछले साल जुलाई में सहारा टीवी पर एक परिचर्चा में जब मैंने यह बात कही थी कि 2009 के लोकसभा चुनाव में ही राहुल को प्रोजेक्ट किया जाएगा, तो इंटरव्यू करने वाला चौंक गया था। राहुल गांधी को प्रोजेक्ट किए जाने के आसार पिछले एक साल से दिखने शुरू हो गए थे। हालांकि अर्जुन सिंह ने यह बात कहकर जरा जल्दबाजी कर दी थी, जिस कारण उन्हें सोनिया गांधी की फटकार सहनी पड़ी थी। सियासत में हर बात कहने का समय और सलीका होता है। अर्जुन सिंह स्वामिभक्ति में यह दोनों ही बातें भूल गए थे। उनके ऐलान को परिवार भक्ति के अलावा मनमोहन विरोध भी देखा गया। अब इसमें कोई संदेह नहीं रहा कि 2009 के लोकसभा चुनाव में बिना ऐलान किए ही राहुल गांधी को प्रोजेक्ट कर दिया जाएगा। कांग्रेस के सभी विज्ञापनों और कार्यक्रमों में सोनिया-मनमोहन के साथ राहुल गांधी के फोटो दिखाई देने शुरू हो चुके हैं। अलबत्ता कई जगह पर मनमोहन सिंह के फोटो गायब हैं। पंद्रहवीं लोकसभा का चुनाव इस लिहाज से बहुत अहम होगा कि इस बार 50 फीसदी वोट 35 साल से कम उम्र के होंगे और उनका मतदान 80 फीसदी होने का अनुमान है, चुनावी गणित के हिसाब से तीन मुद्दे लालकृष्ण के पक्ष में नहीं जा रहे और कांग्रेस उन्हीं को भुनाने की रणनीति अपना रही है। पहला आडवाणी की उम्र, दूसरा क्षेत्रीय दलों में उनकी अस्वीकार्यता और तीसरा पार्टी में सबको साथ लेकर चलने की विफलता। ये तीनों ही मुद्दे राहुल गांधी के पक्ष में भुनाए जाएंगे। राहुल की उम्र, पार्टी में उनकी स्वीकार्यता और सहयोगी दलों का भी उनके प्रति आकर्षण।</p>
<p>राजस्थान और दिल्ली में चुनाव हारने के बाद भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी ने हार की वजह हिट विकेट कहा था। वह यह मानने को तैयार नहीं हैं कि इन दोनों राज्यों में भाजपा को कांग्रेस ने हराया। अगर लालकृष्ण आडवाणी का विश्लेषण ही मान लिया जाए तो दिल्ली में हार की वजह युवा मतदाताओं के सामने 80 साल के विजय कुमार मल्होत्रा को पेश करना था। दिल्ली की जनता को दो बूढ़ों शीला दीक्षित और विजय कुमार मल्होत्रा में से एक चुनना था और उन्होंने सोम्य दीक्षित और घमंडी मल्होत्रा में से सोम्य दीक्षित को चुना। भाजपा का प्रोजैक्शन गलत था, इसी को आडवाणी ने हिट विकेट कहा। राजस्थान में भाजपाई बागियों और मुख्यमंत्री-प्रदेश अध्यक्ष की लड़ाई ने पार्टी को हरवाया। भाजपा का अपना विश्लेषण कहता है कि राजस्थान में भाजपा वसुंधरा के घमंड के कारण हारी। जिसे आडवाणी खुद पहले हवा दे रहे थे और अब हिट विकेट बता रहे हैं। अपनी गलती को सुधारने को बजाए आडवाणी अब लोकसभा चुनाव में हिट विकेट की तैयारी कर रहे हैं। भैरोंसिंह शेखावत ने भाजपा के हिट विकेट होने की जमीन तैयार कर दी है। वह भले ही औपचारिक तौर पर भाजपा के सदस्य नहीं हैं, लेकिन भाजपा के मौजूदा जीवित नेताओं में सबसे पुराने नेता हैं, अटल बिहारी वाजपेयी से दो साल और लालकृष्ण आडवाणी से चार साल बड़े तो हैं ही, राजनीति में इन दोनों से कहीं ज्यादा अनुभवी हैं। राष्ट्रपति पद का चुनाव हारने के बाद भाजपा ने उन्हें जिस तरह अलग-थलग कर दिया था, उससे वह कम आहत थे। लेकिन उन्हीं के गृहराज्य में वसुंधरा राजे ने जिस तरह उनके समर्थकों को चुन-चुनकर राजनीति से अलग किया उससे वह ज्यादा आहत हैं। उन्होंने अपनी ताकत दिखाने का ऐसा वक्त चुना है जब भाजपा लालकृष्ण आडवाणी को आगे करके सत्ता का तानाबाना बुन रही है।</p>
<p>राहुल गांधी के मुकाबले में लालकृष्ण आडवाणी पहले ही कमजोर पड़ रहे हैं, इस बात का अहसास उनके समर्थकों को भी हो गया है। इसी हफ्ते देशभर के भाजपा प्रवक्ताओं के एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में आडवाणी के सिपाहसलार सुधींद्र कुलकर्णी ने चुनावों में उठने वाले इस सवाल से निपटने की तैयारी करने को कहा है। कांग्रेस अगर युवा मतदाताओं को लुभाने के लिए अमेरिकी तर्ज पर राहुल गांधी को आगे करती है तो आडवाणी के विकल्प नरेन्द्र मोदी हो सकते हैं। लेकिन क्या भाजपा, राजग और संघ परिवार अपने फैसले पर पुनर्विचार कर उन्हें स्वीकर करेगा। आज के हालात में भाजपा और राजग की तुलना अमेरिकी रिब्लिकन पार्टी से की जा सकती है, जिसने युवा नेतृत्व देने की बजाए 72 वर्ष के मैककेन को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर चुनाव हारा। कांग्रेस की तुलना अमेरिकी डेमोक्रेट पार्टी से की जा सकती है, जो 47 वर्षीय बाराक ओबामा को आगे करके चुनाव जीत गई। अब 82 साल के आडवाणी का विकल्प 86 साल के भैरोंसिंह शेखावत नहीं हो सकते। आडवाणी को संघ, भाजपा और राजग का समर्थन हासिल हो चुका है। मोदी को भाजपा पूरी तरह स्वीकार करेगी, लेकिन संघ और राजग पूरी तरह स्वीकार नहीं करेगा। भैरोंसिंह शेखावत को भाजपा और राजग पूरी तरह स्वीकार करेगा लेकिन संघ स्वीकार नहीं करेगा। इसलिए अब प्रधानमंत्री की दावेदारी पर पुनर्विचार करने का जोखिम भी नहीं उठा सकता भाजपा-राजग। हां चुनावों के बाद हालात बने तो शेखावत की स्वीकार्यता आडवाणी से ज्यादा हो सकती है, इसलिए शेखावत को चुनाव नतीजों का इंतजार करना चाहिए।</p>
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		<title>फूट से जितनी दु:खी सोनिया, उतने ही आडवाणी</title>
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		<pubDate>Thu, 18 Dec 2008 19:14:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[छत्तीसगढ़ में हार के बाद सोनिया गांधी के दरबार में जोगी का रुतबा घटा। मध्यप्रदेश की हार ने दिग्गज नेताओं की चमक घटा दी। राजस्थान की हार के बाद भाजपा की फूट विस्फोटक होकर सामने आई।
दिल्ली और राजस्थान की हार से भारतीय जनता पार्टी में मायूसी छाई हुई है। उतनी ही मायूसी कांग्रेसी हलकों में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>छत्तीसगढ़ में हार के बाद सोनिया गांधी के दरबार में जोगी का रुतबा घटा। मध्यप्रदेश की हार ने दिग्गज नेताओं की चमक घटा दी। राजस्थान की हार के बाद भाजपा की फूट विस्फोटक होकर सामने आई।</strong></p></blockquote>
<p>दिल्ली और राजस्थान की हार से भारतीय जनता पार्टी में मायूसी छाई हुई है। उतनी ही मायूसी कांग्रेसी हलकों में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की हार पर भी है। लालकृष्ण आडवाणी ने राजस्थान की हार का कारण गुटबाजी बताया है और दिल्ली की हार का कारण टिकटों का गलत बंटवारा बताया है। सोनिया गांधी ने छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश दोनों ही राज्यों में पार्टी की हार का कारण स्थानीय नेताओं की गुटबाजी बताया है।  दोनों ही बड़े नेताओं ने अपनी-अपनी राय अपने-अपने संसदीय दल की बैठक में पेश की।</p>
<p>कांग्रेस ने दिल्ली को छोड़कर किसी राज्य में मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं किया था। हालांकि छत्तीसगढ़ में अजित जोगी को सांसद होने के बावजूद विधानसभा का टिकट देकर संकेत कर दिया था और मिजोरम में ललथनहवला को मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक उम्मीदवार माना जाता था। राजस्थान में मुख्यमंत्री का फैसला करने में कांग्रेस को उतनी देर नहीं लगी, जितना छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में विधायक दल का नेता चुनने में लगी। <span id="more-630"></span>कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में सोनिया गांधी ने दो टूक शब्दों में कहा कि दिल्ली और राजस्थान में पार्टी एकजुट होकर लड़ी, इसलिए जीती जबकि छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में नेता एकजुट नहीं थे। उनके कहने का मतलब यह था कि इन दोनों ही राज्यों में नेता आपस में ही लड़ रहे थे। सोनिया गांधी ने छत्तीसगढ़ की हार का ठीकरा एक तरह से अजित जोगी के सिर पर फोड़ दिया है। जोगी सांसद होने के बावजूद यह कहकर विधानसभा का चुनाव लड़े थे कि उन्हें एक मौका और दिया जाए। सोनिया गांधी ने राज्य में जोगी का विरोध होने के बावजूद उन्हें यह मौका इस भरोसे पर दिया था कि वह सबको साथ लेकर चलेंगे और पार्टी को जिताकर लाएंगे। लेकिन वह दोनों ही मोर्चों पर विफल हुए। चुनाव के दौरान और नतीजों के बाद भी सोनिया गांधी के पास रिपोर्ट पहुंची कि अजित जोगी अपने विरोधी खेमे के उम्मीदवारों को हराने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। इन्हीं रिपोर्टों के आधार पर सोनिया गांधी ने रवीन्द्र चौबे को छत्तीसगढ़ कांग्रेस विधायक दल का नेता मनोनीत कर दिया। रवीन्द्र चौबे विधानसभा चुनावों से पहले तक अजित जोगी खेमे में ही थे, लेकिन चुनाव नतीजों के बाद विद्याचरण शुक्ल ने उन्हें बड़ी सफाई से जोगी के खिलाफ खड़ा कर दिया। वैसे चौबे राजनीति में अजित जोगी से सीनियर हैं, जोगी 1986 में अपने राजनीतिक गुरु अर्जुन सिंह की कृपा से पहली बार राज्यसभा में पहुंचे थे, जबकि रवीन्द्र चौबे 1985 में विधायक बन चुके थे। काफी लंबे समय तक इधर-उधर भटकने के बाद विद्याचरण शुक्ल ने अब पहली बार छत्तीसगढ़ की राजनीति के माध्यम से कांग्रेस में अपनी  स्थिति मजबूत बनाना शुरू कर दिया है। रवीन्द्र चौबे का विधायक दल का नेता मनोनीत होना अजित जोगी पर सोनिया गांधी के विश्वास का अंत माना जा रहा है। जिस तरह विद्याचरण शुक्ल अपने साथ चौबे को लेकर दिल्ली आए और उसके बाद जिस तरह उनकी तैनाती हुई, उससे छत्तीसगढ़ कांग्रेस में शुक्ल की स्थिति मजबूत होने के संकेत हैं। रवीन्द्र चौबे ने भी अपनी नियुक्ति पर जिन लोगों का आभार व्यक्त किया, उनमें विद्याचरण शुक्ल का नाम खास तौर पर लिया, जबकि हाल ही तक वह हाशिए पर थे। सोनिया गांधी को मध्यप्रदेश में नेता चुनने में छत्तीसगढ़ से भी ज्यादा देर लग रही है। विधानसभा चुनावों में मध्यप्रदेश में गुटबाजी सबसे ज्यादा रही। सोनिया गांधी मध्यप्रदेश के सभी नेताओं से काफी खफा हैं। कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में उनका गुस्सा फूटना इसका साफ संकेत है। सोनिया गांधी के निशाने पर दिग्विजय सिंह, कमलनाथ के साथ सुरेश पचौरी भी होंगे, जिन्हें सबको साथ लेकर चलने के लिए मध्यप्रदेश भेजा गया था। मध्यप्रदेश की हार के बाद सोनिया गांधी के दरबार में अर्जुन सिंह का कद पहले से भी घटेगा, क्योंकि उनके गृह जिले में कांग्रेस सबसे कमजोर होकर उभरी है। इस नाते अर्जुन सिंह के बेटे राहुल सिंह की स्थिति भी कमजोर हुई है, जबकि वह मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे थे। हालांकि अभी भी कोशिश हो रही है कि राहुल सिंह को विधायक दल का नेता बना दिया जाए, लेकिन भाजपा के लगातार दो बार ओबीसी को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करके जीतने से उनका गणित गड़बड़ा रहा है।</p>
<p>जैसे सोनिया गांधी को हारे हुए राज्यों मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधायक दल का नेता चुनने में देरी लगी, वैसे ही भारतीय जनता पार्टी को हारे हुए राजस्थान में हार के बाद सामने आई फूट ने मुसीबत में डाल दिया है। राजस्थान की फूट चुनावों से पहले टिकटों के बंटवारे के समय ही सामने आ गई थी, जब कम से कम चालीस सीटों पर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और प्रदेश अध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर में सीधा टकराव हुआ। प्रदेश के संगठन महासचिव प्रकाश चंद्र ने वसुंधरा राजे का साथ देकर प्रदेश अध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर को अलग-थलग और लाचार बना दिया था। माथुर ने वसुंधरा और प्रकाश चंद्र गुट के सामने घुटने टेकने के बजाए अपना विरोध जताने के लिए बैठक से वाकआउट भी किया था। बाद में जब 55 बागी उम्मीदवार खड़े हो गए, तो पार्टी आलाकमान के होश फाख्ता हो गए थे। ठीक चुनाव के वक्त इतनी बड़ी तादाद में बागियों का खड़ा होना भारतीय जनता पार्टी की हार का कारण बना। भाजपा के सिर्फ तीन बागी ही चुनाव में जीत पाए, लेकिन 33 बागियों ने पार्टी को कांग्रेस के हाथों हार दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। ओमप्रकाश माथुर ने पार्टी आलाकमान को अपना इस्तीफा देते हुए यह याद भी दिला दिया है कि जिन चालीस उम्मीदवारों पर उन्होंने विरोध जताया था, उनमें से सिर्फ तीन ही जीते हैं। ठीक चुनाव के वक्त वसुंधरा सरकार में मंत्री रहे किरोड़ीलाल मीणा का बागी होकर चुनाव लड़ना भारतीय जनता पार्टी के लिए अंतिम कील साबित हुआ। किरोड़ी लाल मीणा ने अपनी सीट के अलावा तीन और सीटों पर अपनी इच्छा के उम्मीदवार खड़े करने की मांग की थी। लेकिन वसुंधरा राजे उन्हें उनकी सीट के अलावा एक भी सीट देने को तैयार नहीं हुई। वसुंधरा राजे जितने अड़ियल किरोड़ीलाल मीणा भी हैं, आलाकमान इसे जानते हुए भी सही वक्त पर सही फैसला नहीं ले सका। किरोड़ीलाल मीणा का अपने इलाके में अच्छा प्रभाव है और इसी नाते वह भैरोंसिंह शेखावत से भी टक्कर लिया करते थे। टिकट बंटवारे से ठीक पहले किरोड़ीलाल मीणा ने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से मुलाकात करके अपने तर्क पेश कर दिए थे। लेकिन उन्होंने यह भी साफ कर दिया था कि अगर उनकी मर्जी के चार उम्मीदवार नहीं बनाए गए, तो वह चुनाव नहीं लड़ेंगे। भाजपा ने दूसरी गलती यह की कि वसुंधरा राजे के दबाव में आकर किरोड़ीलाल मीणा का नाम भी सूची से गायब कर दिया। नतीजा यह निकला कि उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार खड़े किए, अपने समेत चार उम्मीदवार जिताने में कामयाब रहे, जबकि भाजपा को सात सीटों पर कांग्रेस के हाथों हरवा दिया। किरोड़ीलाल मीणा संघ नेताओं के संपर्क में हैं और वसुंधरा राजे को दरकिनार किए जाने पर पार्टी में लौटने को तैयार हैं, अब भाजपा आलाकमान के सामने संकट यह है कि किरोड़ीलाल मीणा और पार्टी में वसुंधरा विरोधियों के दबाव में आकर फैसला करे, या विपरीत परिस्थितियों में भी 76 सीटें दिलाने का श्रेय देकर वसुंधरा राजे को ही विपक्ष के नेता की कुर्सी सौंपे। भारतीय जनता पार्टी एक तरफ विधायक दल का नेता चुनने की मुश्किल में फंसी है, तो दूसरी तरफ ओमप्रकाश माथुर ने भी मौजूदा संगठन मंत्री के रहते अध्यक्ष पद पर बने रहने में असमर्थता जता दी है। सोनिया गांधी को हारे हुए राज्यों में विधायक दल का नेता चुनने में उतनी मुश्किल नहीं आई, जितना राजस्थान में चुनाव हारने के बाद भाजपा आलाकमान के सामने खड़ी है।</p>
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		<title>राहुल का ट्रायल था मध्यप्रदेश</title>
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		<pubDate>Thu, 11 Dec 2008 19:13:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश के बाद गुजरात और कर्नाटक में कांग्रेस लगातार हारी। अब उसमें मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ भी जुड़ गया। पंद्रहवीं लोकसभा के लिए कांग्रेस की सारी उम्मीद मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान पर टिकी थी। अब कांग्रेसी नेताओं के माथे पर परेशानी की लकीरें दिखने लगीं।
पांच राज्यों के चुनाव नतीजों से कांग्रेस और भाजपा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश के बाद गुजरात और कर्नाटक में कांग्रेस लगातार हारी। अब उसमें मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ भी जुड़ गया। पंद्रहवीं लोकसभा के लिए कांग्रेस की सारी उम्मीद मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान पर टिकी थी। अब कांग्रेसी नेताओं के माथे पर परेशानी की लकीरें दिखने लगीं।</strong></p></blockquote>
<p>पांच राज्यों के चुनाव नतीजों से कांग्रेस और भाजपा में आत्ममंथन शुरू हो गया है। विधानसभा चुनावों को सेमीफाइनल मानकर चलने वाली दोनों ही पार्टियों को चुनाव नतीजों ने परेशानी में डाल दिया है। भारतीय जनता पार्टी राजस्थान की हार को लेकर उतनी चिंतित नहीं है, जितनी दिल्ली की हार को लेकर है। दूसरी तरफ कांग्रेस दिल्ली, मिजोरम और राजस्थान हासिल करने से उतनी खुश नहीं है, जितनी मध्यप्रदेश में हार से परेशान है। अगली लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने के लिए कांग्रेस की निगाह मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान पर ही टिकी हुई थी। तीनों ही राज्यों के चुनाव नतीजे कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेरने वाले हैं। <span id="more-610"></span>राजस्थान में सरकार बनने के बावजूद कांग्रेस लोकसभा चुनावों की दृष्टि से ज्यादा उत्साहित नहीं है। भारतीय जनता पार्टी यह मानकर चल रही है कि राजस्थान में उसकी हार मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार वसुंधरा राजे के सामंती व्यवहार के कारण हुई है। पार्टी का एक खेमा यह भी मानता है कि आलाकमान को टिकट बंटवारे के समय वसुंधरा राजे पर अंकुश लगाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं करके पार्टी ने बहुत बड़ी भूल की थी। इसका ठीकरा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी पर फोड़ा जा रहा है, जिन्होंने संगठन से लगातार मिल रही चेतावनियों के बावजूद वसुंधरा राजे को टिकटों पर फैसले में खुला हाथ देने का समर्थन किया था। भारतीय जनता पार्टी राजस्थान में हुई अपनी गलती को सुधारने की तैयारियों में जुट चुकी है, जिसका संकेत खुद लालकृष्ण आडवाणी ने गुरुवार को लोकसभा में आतंकवाद पर बहस में हिस्सा लेते हुए दिया। जब उन्होंने कहा- &#8216;हम अगर राजस्थान और दिल्ली में हार गए हैं, तो इसका यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि आतंकवाद देश के सामने मुद्दा नहीं है। इन दोनों ही राज्यों में हम अपनी गलतियों से हारे हैं, कांग्रेस की वजह से नहीं।&#8217; दिल्ली में हार की वजह भी भाजपा को समझ आने लगी है, पार्टी के नेता यह मानते हैं कि विजय कुमार मल्होत्रा को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करना पहली गलती थी और अति उत्साह में टिकटों का ऊल-जलूल बंटवारा दूसरी गलती थी। यह दोनों ही गलतियां लोकसभा चुनावों में सुधारी जाएंगी।</p>
<p>कांग्रेस को दिल्ली, मिजोरम और राजस्थान में सरकार बनाने पर संतोष जाहिर करना चाहिए। आखिर दिल्ली बचाकर कांग्रेस ने मिजोरम और राजस्थान भी हासिल किया है लेकिन कांग्रेस आलाकमान की पेशानी पर इन चुनाव नतीजों से बल पड़ गया है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की हार तीन राज्यों में जीत पर भारी पड़ रही है। इन दोनों राज्यों की हार कांग्रेस के लिए सचमुच चिंता का विषय है, क्योंकि इससे पहले तो सिर्फ यह माना जाता था कि देश के किसी भी राज्य में कांग्रेस अगर एक बार हार भी जाए तो अगली बार लौट आती है। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ही ऐसे उदाहरण थे, जहां कांग्रेस लंबे समय से सत्ता से विमुख थी, दो दशक पहले उसमें उत्तर प्रदेश जुड़ गया था तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश तीनों ऐसे राज्य हैं, जहां गैर कांग्रेस-गैर भाजपा दलों ने अपना दबदबा कायम किया था, लेकिन भारतीय राजनीति का अब दूसरा दौर शुरू हो गया है जिसमें भारतीय जनता पार्टी भी दूसरे राज्यों में अपनी जड़ें जमाने लगी है। गुजरात और कर्नाटक हाल ही के उदाहरण थे, जहां पिछले दस साल से भारतीय जनता पार्टी का पलड़ा कांग्रेस पर भारी था। गुजरात में तो भाजपा अपनी जीत की हेटट्रिक बना चुकी है, कर्नाटक में पिछली बार उसकी सीटें कांग्रेस से ज्यादा थी लेकिन इस बार वह खुद की सरकार बनाने में कामयाब हो गई। अब मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में लगातार दूसरी बार जीत से यह दायरा बढ़ गया है। गुजरात-कर्नाटक-मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ देश के चार ऐसे राज्य बन गए हैं, जहां भाजपा ने अपनी जड़ें मजबूत करने के संकेत दे दिए हैं, जो कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी है।</p>
<p>पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में अगर बिहार भी जोड़ लिया जाए, तो इन आठ राज्यों में लोकसभा की 294 सीटें बनती हैं। केरल, त्रिपुरा, पंजाब, उड़ीसा, उत्तराखंड, हिमाचल और मेघालय में भी गैर कांग्रेसी सरकारें हैं। उपरोक्त पंद्रह राज्यों की कुल लोकसभा सीटें 361 हैं। कांग्रेस के पास इस समय सिर्फ महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश ही दो बड़े राज्य हैं, असम-झारखंड में राजस्थान और दिल्ली को जोड़कर कांग्रेस डेढ़ सौ पर ही पहुंचती है। अगला लोकसभा चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस की निगाह राजस्थान के अलावा मध्यप्रदेश पर सबसे ज्यादा टिकी थी। राजस्थान में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है और विधानसभा चुनाव नतीजों के हिसाब से अंदाज लगाया जाए तो दोनों दलों को आधी-आधी सीटें मिल सकती हैं। कांग्रेस अगले लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, असम में होने वाले नुकसान की भरपाई राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से करने की उम्मीद पाले हुए थी। अब जबकि लोकसभा चुनाव में सिर्फ छह महीने बाकी रह गए हैं, तो कांग्रेस की मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान से होने वाले फायदे की उम्मीद पर पानी फिर गया है।</p>
<p>यही वजह है कि दिल्ली, मिजोरम में जीत और राजस्थान में सत्ता कांग्रेस नेताओं के चेहरे पर रौनक नहीं ला सकी है, अलबत्ता कांग्रेस मुख्यालय में खतरे की घंटी बजनी शुरू हो गई है। कांग्रेस ने पहली बार सोनिया गांधी से ज्यादा राहुल गांधी को चुनाव मैदान में उतारा था, कांग्रेस को उम्मीद थी कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में इसके सकारात्मक नतीजे निकलेंगे। पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में पचास फीसदी मतदाताओं की उम्र चालीस साल से नीचे होने के कारण कांग्रेस की रणनीति लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को युवा मुखौटे की तरह पेश करने की है। राहुल गांधी को लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के वोट कैचर के तौर पर पेश किया जाना है, इसलिए कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में सोनिया गांधी को उतारने की बजाए राहुल को ट्रायल के तौर पर आजमाया था। भाजपा शासित इन तीनों ही राज्यों में सकारात्मक नतीजे नहीं निकलने से राहुल गांधी सबसे ज्यादा हताश बताए जाते हैं। खासकर मध्यप्रदेश को लेकर बेहद क्षुब्ध हैं। मध्यप्रदेश में कांग्रेस के पास नेताओं की कमी नहीं है, अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, ज्योतिरादित्या सिंधिया और सुरेश पचौरी कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में से हैं। अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह दो-दो बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। कमलनाथ और सुरेश पचौरी कम से कम आठ-दस साल केंद्र में मंत्री रहे हैं। ज्योतिरादित्य के पास राजनीति की पारिवारिक विरासत है। इसके बावजूद कांग्रेस लगातार दूसरी बार चुनाव हार गई है। छत्तीसगढ़ में विद्याचरण शुक्ला चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस में लौट आए थे, इसलिए कांग्रेस की ताकत दुगुनी हो जानी चाहिए थी। मोती लाल वोरा और अजित जोगी जैसे दो पूर्व मुख्यमंत्रियों ने भी अपनी पूरी ताकत झोंकी थी, इसके बावजूद वहां कांग्रेस लगातार दूसरी बार हार गई। राहुल गांधी के ताजा नेतृत्व ने कांग्रेस को यह कड़वा घूंट पीने पर मजबूर कर दिया है, इसलिए लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेसी नेताओं की धड़कनें तेज हो गई हैं।</p>
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		<title>मुंबई का असर मतदान केन्द्रों में भी पड़ेगा</title>
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		<pubDate>Fri, 28 Nov 2008 18:39:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मध्यप्रदेश, दिल्ली, राजस्थान विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुई मुंबई की आतंकवादी वारदात ने कांग्रेसियों के माथे पर  पसीने की बूंदें झलका दी। कांग्रेस पर आतंकवाद के प्रति नरम होने का आरोप लगा रही भाजपा को इन तीनों राज्यों में फायदा होगा।
छह विधानसभाओं के चुनावों का ऐलान होने से पहले भाजपा दिल्ली को लेकर सबसे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>मध्यप्रदेश, दिल्ली, राजस्थान विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुई मुंबई की आतंकवादी वारदात ने कांग्रेसियों के माथे पर  पसीने की बूंदें झलका दी। कांग्रेस पर आतंकवाद के प्रति नरम होने का आरोप लगा रही भाजपा को इन तीनों राज्यों में फायदा होगा।</strong></p></blockquote>
<p>छह विधानसभाओं के चुनावों का ऐलान होने से पहले भाजपा दिल्ली को लेकर सबसे ज्यादा आश्वस्त थी। भाजपा यह मानकर चल रही थी कि दिल्ली तो उसे मिलेगा ही, कम से कम छत्तीसगढ़ और  मिल जाए, तो लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी की नाक बच जाएगी। मध्यप्रदेश को भाजपा हारा हुआ मानकर चल रही थी, राजस्थान को लेकर भी आश्वस्त नहीं थी। लेकिन जैसे-जैसे चुनावी शतरंज बिछनी शुरू हुई, भाजपा आलाकमान यह देखकर दंग रह गया कि मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान उम्मीद से ज्यादा नतीजा दिखा रहे थे, जबकि दिल्ली में विजय कुमार मल्होत्रा की उम्मीदवारी का ऐलान होते ही हालात ने नया मोड़ ले लिया। <span id="more-578"></span>भाजपा मध्यप्रदेश से ज्यादा राजस्थान पर आश्वस्त था, लेकिन चुनाव की घड़ी नजदीक आते-आते मध्यप्रदेश पार्टी की झोली में आता हुआ दिखाई देने लगा, तो राजस्थान उतना ही दूर जाता दिखाई देने लगा। दूसरी तरफ कांग्रेस चुनाव से पहले मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ को लेकर सबसे ज्यादा आश्वस्त थी, पार्टी आलाकमान का मत था कि ये दोनों राज्य तो कांग्रेस के खाते में आ ही रहे हैं, राजस्थान में भी अच्छी संभावना है। दिल्ली को लेकर जिस तरह भाजपा पूरी तरह आश्वस्त थी, उस तरह कांग्रेस भी हारा हुआ राज्य मानकर चल रही थी। लगातार दस साल तक दिल्ली पर राज करने के बाद कांग्रेस के कई नेताओं को लग रहा था कि इस बार एंटीइनकंबेंसी उसकी हार की वजह बनेगी। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के चुनाव हो चुके हैं, दिल्ली का चुनाव आज है और राजस्थान में चार दिसंबर को वोट पड़ेंगे।</p>
<p>चुनावी डुगडुगी बज जाने के बाद राजनीतिक हालात ने एकदम पलटी खाई और छत्तीसगढ़ में भाजपा पहले ही दिन से हावी दिखाई देने लगी। चुनाव हो जाने के बाद भाजपा आलाकमान कम से कम पहले जितना बहुमत लाने पर पूरी तरह आश्वस्त है, लेकिन कांग्रेस के नेता अब उतने उत्साही दिखाई नहीं देते, जितने चुनावों से पहले थे। कांग्रेस का एक वर्ग तो यह मानकर चल रहा है कि छत्तीसगढ़ उसके हाथ से निकल चुका है। अगर भाजपा छत्तीसगढ़ दुबारा जीत जाती है तो अजीत जोगी का कांग्रेस में कद घटेगा, जबकि उनके विरोधियों मोती लाल वोरा और विद्याचरण शुक्ल का कद बढ़ेगा। दूसरी तरफ भाजपा में भी रमण सिंह विरोधियों को और पांच साल का वनवास मिल जाएगा। मध्यप्रदेश में भाजपा अगर दूसरी बार सरकार बनाने में कामयाब हो गई, तो उसका श्रेय शिवराज चौहान को दिया जाएगा। एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार लालकृष्ण आडवाणी ने मध्यप्रदेश के चुनावी दौरे से लौटने के बाद निजी बातचीत में कहा कि वह तो शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में आए उभार को देखकर हतप्रभ रह गए। विधानसभा उपचुनावों में हार और डंपर कांड के बाद भाजपा आलाकमान मध्यप्रदेश को लेकर उदासीन हो गया था, लेकिन पिछले दो सालों में शिवराज सिंह चौहान ने न सिर्फ उपचुनाव जिताने शुरू किए, अलबत्ता डंपर कांड से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों का भी डटकर मुकाबला किया। शिवराज सिंह चौहान चुनावों से पहले-पहले अपनी ईमानदार छवि बनाने में कामयाब रहे। इसलिए अगर मध्यप्रदेश में भाजपा जीती, तो उसका सेहरा शिवराज सिंह चौहान के सिर ही बंधेगा। दूसरी तरफ सबसे आसान राज्य होने के बावजूद कांग्रेस चुनाव हार गई तो उसका ठीकरा सुरेश पचौरी की बजाए कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के सिर फूटेगा। इन दोनों नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से सलाह-मशविरा किए बिना मुख्यमंत्री पद के लिए कमलनाथ की दावेदारी ठोक दी। लेकिन अगर कांग्रेस जीतती है तो यह सोनिया गांधी तय करेंगी की उसका सेहरा किसके सिर बांधा जाए क्योंकि उन्होंने तो सूबे का सरदार सुरेश पचौरी को बनाकर भेजा था।</p>
<p>राजस्थान में चुनावी डुगडुगी बजने से पहले भाजपा उम्मीद से ज्यादा उत्साहित थी। भाजपा का कहना था कि कांग्रेस बिना दूल्हे की बारात है, जिसका फायदा भाजपा को मिलेगा। वसुंधरा राजे ने अपने पांच साल के शासन में महिलाओं में खास तौर पर अपनी छवि बनाई थी, भाजपा को उम्मीद थी कि उसी छवि के बूते महिलाओं का 75 फीसदी वोट बटोरा जा सकता है। इसी रणनीति के तहत भाजपा ने 31 महिलाओं को चुनाव मैदान में उताकर महिलाओं को सबसे ज्यादा टिकट देने का रिकार्ड बनाया। कांग्रेस भी वसुंधरा के मुकाबले पार्टी को काफी कमजोर मानती थी, आलाकमान पार्टी के नेताओं की जातीय आधारित महत्वाकांक्षाओं से भी काफी आशंकित थी। लेकिन टिकट बंटवारे के बाद दोनों ही राजनीतिक दलों की स्थिति अचानक बदल गई। भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही बड़े पैमाने पर बगावत का सामना करना पड़ा। भाजपा को कांग्रेस से कुछ ज्यादा बगावत का सामना करना पड़ा, इसकी वजह वसुंधरा राजे सिंधिया की ओर से टिकटों के बंटवारे में जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप बताया गया। ललित किशोर चतुर्वेदी, भैरोंसिंह शेखावत, हरिशंकर भाभड़ा जैसे दिग्गज नेता टिकटों के बंटवारे से नाखुश होकर घर बैठ गए। दिल्ली में स्थिति राजस्थान से एकदम विपरीत रही। मुख्यमंत्री पद की दौड़ से पहले भाजपा बल्ले-बल्ले थी। लेकिन जैसे ही विजय कुमार मल्होत्रा का नाम तय हुआ, पार्टी कैडर का उत्साह काफूर हो गया। भाजपा के पास तीन विकल्प थे- अरुण जेटली, डाक्टर हर्ष वर्धन और विजय कुमार मल्होत्रा। अरुण जेटली प्रदेश की राजनीति में कूदना नहीं चाहते थे, हालांकि वह राजी होते, तो भाजपा को चुनाव जीतने के लिए पापड़ नहीं बेलने पड़ते। डाक्टर हर्ष वर्धन के नाम पर सहमति नहीं बनी, हालांकि अरुण जेटली उन्हें ही उम्मीदवार बनाने के पक्ष में थे। तीसरी पसंद विजय कुमार मल्होत्रा के सिवा कोई चारा नहीं था, लेकिन वह शीला दीक्षित पर वैसे भारी नहीं पड़े जैसे बाकी दोनों पड़ते। वैसे भी पिछले बीस साल में दिल्ली का राजनीतिक चरित्र बदल चुका है, अब दिल्ली में पंजाबियों और बनियों का वर्चस्व नहीं रहा। अलबत्ता बिहार और उत्तर प्रदेश से आए प्रवासियों का वर्चस्व हो गया है, जिसे कांग्रेस ने दस साल पहले ही पहचान लिया था और उत्तर प्रदेश मूल की शीला दीक्षित को नेता बना दिया था जबकि भाजपा दस साल बाद भी हकीकत से वाकिफ नहीं।</p>
<p>मध्यप्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के चुनावों पर मुंबई की आतंकी वारदात का असर होने के आसार हैं। मध्यप्रदेश में ठीक उस दिन मतदान हुआ, जिस दिन अखबारों में आतंकी वारदात की सुर्खी छपी थी। इसलिए वोटरों के मस्तिष्क पर आतंकवाद के खिलाफ कांग्रेस की लुंज-पुंज नीति का गुस्सा मतदान केन्द्रों में प्रकट हुआ होगा। वैसे भी मतदान से पहले भाजपा की स्थिति मजबूत हो गई थी। दिल्ली में कमजोर कंधों पर नेतृत्व सौँपने और टिकटों के गलत बंटवारे का असर चुनाव नतीजे में दिखाई देने से पहले ही मुंबई में हुई आतंकवादी वारदात ने कांग्रेस पर वोटरों का गुस्सा बढ़ा दिया। कांग्रेस का मानना है कि मुंबई की आतंकवादी वारदात का तीनों राज्यों के चुनावों पर विपरीत असर पड़ेगा। दिल्ली में अगर भाजपा जीती, तो उसका कुछ कारण मुंबई में हुई आतंकी वारदात भी होगी। राजस्थान में जहां कांग्रेस खुद का पलड़ा भारी समझकर चल रही है, वहां कांग्रेस के नेताओं के माथे पर पसीने की बूंदें उभर आई हैं।</p>
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		<title>एटीएस जांच को लोकसभा चुनाव तक खींचने की सियासत</title>
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		<pubDate>Thu, 20 Nov 2008 18:44:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड ने पलटी खाकर कांग्रेस का समर्थन शुरू कर दिया है, लेकिन कांग्रेस की निगाह मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान पर ज्यादा टिकी है, जहां 65 में से 56 लोकसभा सीटें भाजपा के पास हैं।
जिन छह राज्यों के विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उनमें से दो जम्मू कश्मीर और मिजोरम अत्यंत संवेदनशील राज्य हैं, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड ने पलटी खाकर कांग्रेस का समर्थन शुरू कर दिया है, लेकिन कांग्रेस की निगाह मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान पर ज्यादा टिकी है, जहां 65 में से 56 लोकसभा सीटें भाजपा के पास हैं।</strong></p></blockquote>
<p>जिन छह राज्यों के विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उनमें से दो जम्मू कश्मीर और मिजोरम अत्यंत संवेदनशील राज्य हैं, लेकिन देशवासियों की निगाह इन दोनों राज्यों पर कम, बाकी चार राज्यों पर ज्यादा टिकी है। मिजोरम में सत्ता परिवर्तन के कोई आसार नहीं दिखते, लेकिन जम्मू कश्मीर में नए गठबंधन पैदा होने के आसार दिखाई देने लगे हैं। हालांकि नेशनल कांफ्रेंस का पलड़ा भारी है, लेकिन ऐसा नहीं दिखता कि वह अपने बूते पर सरकार बना पाएगी। पिछले विधानसभा चुनाव में भी नेशनल कांफ्रेंस की सीटें सबसे ज्यादा आई थी, लेकिन कांग्रेस और पीडीपी ने मिलकर सरकार बना ली थी। <span id="more-553"></span>पीडीपी को सिर्फ 17 सीटें मिली थी, इसके बावजूद पहले तीन साल तक पीडीपी के मुफ्ती मोहम्मद मुख्यमंत्री बनने में कामयाब हो गए थे। हालांकि पीडीपी नें बाकी के तीन साल कांग्रेस को समर्थन नहीं दिया, और वक्त से पहले विधानसभा भंग हो गई। विधानसभा भंग होने की वजह श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को यात्रा के लिए जमीन अलाट करना बना। वैसे जमीन अलाट करने में पीडीपी के जंगलात विभाग के मंत्री की अहम भूमिका थी, लेकिन पीडीपी ने ही समर्थन वापस ले लिया। इसलिए अब पीडीपी की हालत खस्ता है। पीडीपी के दबाव में आकर कांग्रेसी मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने जमीन के अलाटमेंट रद्द कर दी थी, इसके खिलाफ चले आंदोलन ने कांग्रेस की हालत इतनी पतली कर दी थी, कि भाजपा फूली नहीं समा रही थी। ऐसा लग रहा था कि जम्मू की कम से कम पंद्रह सीटों पर भाजपा का कब्जा हो जाएगा, लेकिन चुनाव में स्थिति बदल गई है। श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड के नेता अंदर ही अंदर कांग्रेसी उम्मीदवारों को समर्थन दे रहे हैं, इसकी वजह यह है कि भाजपा जम्मू कश्मीर में सरकार बना नहीं सकती, जबकि कांग्रेस-नेशनल कांफ्रेंस में आधे-आधे समय सरकार बनाने का समझौता हो सकता है। जम्मू कश्मीर के हिंदुओं को लगने लगा है कि उनका फायदा कांग्रेस को जिताने से है, भाजपा को जिताने से नहीं। जहां तक कश्मीरी पंडितों का सवाल है, वह अपने अधिकार के लिए शोर भले जितना मचाएं, लेकिन चुनावों में हिस्सा लेने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। हालांकि इस बार चुनावों में 33 कश्मीरी पंडित खड़े हुए हैं, लेकिन विस्थापित कश्मीरी पंडितों की मतदान करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। पहले दौर में दस सीटों के चुनाव हुए हैं, दिल्ली में रह रहे कश्मीरी पंडितों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। जबकि गुरेज, बांदीपुर और सोनवारी तीन ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां से विस्थापित कश्मीरी पंडित बड़ी तादाद में दिल्ली में रहते हैं, और उन्हें यहां मतदान करने का अधिकार है।</p>
<p>मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भले ही भाजपा का पलड़ा भारी हो, लेकिन कांटे की लड़ाई बनाने में कांग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ रही है। चुनाव भले ही छह राज्यों में हो रहे हैं, लेकिन सबकी निगाह इन तीनों राज्यों पर टिकी हुई है। इसकी वजह यह है कि इन तीनों राज्यों में लोकसभा की 65 सीटें हैं, जिनमें से 56 इस समय भाजपा के पास हैं। इन तीनों विधानसभाओं के चुनाव अगली लोकसभा की ओर इशारा कर देंगे। भाजपा नाक का सवाल बनाकर इन तीनों राज्यों में अपनी सरकारें बनाए रखने की कोशिश में जुटी है। अगर भाजपा इसमें कामयाब हो जाती है, तो केंद्र में अगली सरकार बनाने का कांग्रेसी ख्वाब टूटना शुरू हो जाएगा। कांग्रेस की निगाह इन तीनों राज्यों में भाजपा की लोकसभा सीटें घटने पर टिकी हुई है। केंद्र की मौजूदा यूपीए सरकार सिर्फ आंध्र प्रदेश की बदौलत बनी थी, जहां कांग्रेस को 42 में से 29 सीटें मिल गई थी। अगर आंध्र प्रदेश में भाजपा-तेलुगूदेशम का बंटाधार न होता, तो केंद्र में यूपीए सरकार कतई नहीं बन सकती थी। यूपीए सरकार बनने की दूसरी वजह बिहार थी, जहां कांग्रेस के समर्थक दल आरजेडी को 22 सीटें मिल गई थी। यूपीए सरकार बनने की तीसरी वजह तमिलनाडु थी, जहां कांग्रेस के सहयोगी डीएमके को 16 और खुद कांग्रेस को 10 सीटें मिली थी। अब इन तीनों ही राज्यों में पासां पलट चुका है। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और बिहार में यूपीए की स्थिति बेहद खराब हो चुकी है और कांग्रेस की निगाह इन तीनों राज्यों की भरपाई भाजपा प्रभाव वाले मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ पर टिकी है। अगर विधानसभा चुनावों में भाजपा इन तीनों राज्यों में अपनी सरकार बचाने में कामयाब हो गई, तो अगली लोकसभा की इबारत लिख दी जाएगी।</p>
<p>कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों के समय मध्यप्रदेश से जुड़ी साध्वी प्रज्ञा को मालेगांव बम धमाकों में फंसाकर बड़ा दांव चला है। हालांकि कांग्रेस बिहार विधानसभा चुनावों से ठीक पहले गोधरा ट्रेन पर हुए हमले की जस्टिस बनर्जी से न्यायिक जांच करवाकर हू-ब-हू ऐसा ही खेल पहले भी खेल चुकी है। जस्टिस बनर्जी ने कहा था कि ट्रेन  पर पेट्रोल छिड़ककर आग नहीं लगाई गई थी, अलबत्ता ट्रेन के अंदर से ही आग लगी थी। लब्बोलुबाब यह था कि गोधरा में ट्रेन के डिब्बे में आग खुद संघ परिवार से जुड़े संगठनों ने लगाई थी। लालू प्रसाद यादव और मनमोहन सिंह का यह दांव भी कांग्रेस और राजद को हार से नहीं बचा पाया था। हिंदुओं को मालेगांव बम धमाकों में एटीएस की भूमिका भी जस्टिस बनर्जी जैसी दिखाई दी, तो इन तीनों राज्यों में भी चुनाव नतीजे बिहार जैसे ही आएंगे। कांग्रेस संभवत: हिंदू वोट बैंक के लिए उतनी चिंतित नहीं है, जितनी मुस्लिम वोट बैंक के लिए चिंतित है। मुस्लिम समाज ने बाटला हाऊस मुठभेड़ पर सवाल उठाकर अल्पसंख्यकों में यूपीए की स्थिति बेहद खराब कर दी थी। मालेगांव बम धमाकों में साध्वी प्रज्ञा और लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित के अलावा अभिनव भारत से जुड़े लोगों की गिरफ्तारी से बाटला हाऊस मुठभेड़ की जांच की मांग खत्म हो गई है। पहले ऐसा लगता था कि कांग्रेस तीनों विधानसभा चुनावों के नतीजे देखकर एटीएस की जांच का रुख तय करेगी, लेकिन  अब ऐसा लगने लगा है कि कांग्रेस अल्पसंख्यकों का सकारात्मक रुख  बनाए रखने के लिए एटीएस की जांच के मौजूदा रुख को लोकसभा चुनाव तक बनाए रखने का मन बना चुकी है। एटीएस के सभी आठ आरोपियों को मकोका में गिरफ्तार करना इसी रणनीति की ओर इशारा करता है। साध्वी प्रज्ञा के हल्फिया बयान और लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित के अदालत में दिए गए बयान से एटीएस की सारी रणनीति बर्बाद होती देखकर मकोका लगाने का फैसला किया गया है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख 19 नवम्बर को दिल्ली से मकोका लगाने का आदेश लेकर लौटे थे।</p>
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		<title>टिकटों की बिक्री लोकतंत्र के लिए खतरा</title>
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		<pubDate>Thu, 13 Nov 2008 18:44:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[चुनाव आयोग को चाहिए कि टिकटों की बिक्री के आरोपों की सीबीआई से जांच करवाए। आरोप सही पाए जाने पर राजनीतिक दल की मान्यता खत्म होनी चाहिए।
परिवारवाद न तो कांग्रेस में कोई अजूबा है और न ही अन्य राजनीतिक दलों में कोई नई बात। जिस तरह वकील का बेटा बड़ा होकर वकील बनने की सोचता [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>चुनाव आयोग को चाहिए कि टिकटों की बिक्री के आरोपों की सीबीआई से जांच करवाए। आरोप सही पाए जाने पर राजनीतिक दल की मान्यता खत्म होनी चाहिए।</strong></p></blockquote>
<p>परिवारवाद न तो कांग्रेस में कोई अजूबा है और न ही अन्य राजनीतिक दलों में कोई नई बात। जिस तरह वकील का बेटा बड़ा होकर वकील बनने की सोचता है और डाक्टर का बेटा डाक्टर बनने की सोचता है उसी तरह सांसदों, विधायकों के बेटे भी अपने परिवेश में राजनीति की शिक्षा-दीक्षा हासिल करते हैं, इसलिए वे भी वैसा ही सोचते हैं। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी या उनकी मां सोनिया गांधी कतई राजनीति में नहीं होते अगर राजीव गांधी राजनीति में न होते। <span id="more-536"></span>इंदिरा गांधी ने अपने छोटे बेटे संजय गांधी को राजनीति के लिए तैयार किया था, लेकिन जब उनकी आकस्मिक मौत हो गई तो इंदिरा गांधी ने अपनी राजनीतिक विरासत किसी अन्य कांग्रेसी नेता को सौंपने का सोचा भी नहीं। उन्होंने राजनीति से दूर रहने वाले अपने बड़े बेटे राजीव को जबरदस्ती राजनीति में घसीटा था। इसलिए अगर मारग्रेट अल्वा ने अपने बेटे निवेदित के लिए कर्नाटक विधानसभा का टिकट मांगा तो कोई गलत काम नहीं किया था। आखिर वह भी अपने सास-ससुर की राजनीतिक वारिस बनकर राजनीति में हैं। मारग्रेट अल्वा की सास वायोलेट अल्वा कांग्रेस की सांसद थी। मारग्रेट के ससुर जोएकिम भी कांग्रेस के सांसद थे। जिन पृथ्वीराज चौहान और दिग्विजय सिंह ने मारग्रेट अल्वा के बेटे का टिकट कटवाने के लिए &#8216;एक परिवार एक टिकट&#8217; का सिध्दांत बनवाया था उनका अपना रिकार्ड भी देखने लायक है। दिग्विजय सिंह जब खुद मुख्यमंत्री बन गए तो उन्होंने अपनी लोकसभा सीट कांग्रेस के किसी कार्यकर्ता को सौंपने की बजाए अपने छोटे भाई लक्ष्मण सिंह को टिकट दिलाया था, जो अब भाजपा में हैं। पृथ्वीराज चव्हाण भी अपने पिता और मां की बदौलत ही राजनीति में हैं। पृथ्वीराज की मां प्रेमल ताई महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष और सांसद थी। पृथ्वीराज के पिता आनंद राव चव्हाण कांग्रेस के सांसद के साथ-साथ केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे हैं। राहुल गांधी ने यह गलत नहीं कहा है कि नए लोगों का राजनीति में आना और टिकट पाना आसान नहीं होता। राजनीति में आकर कार्यकर्ता बनना तो बहुत आसान है। राजनेताओं को मुफ्त के काम करने वाले चाहिए होते हैं, लेकिन राजनीति में आकर टिकट हासिल करना आसान नहीं होता। राघोगढ़ इसका उदाहरण है, जहां दिग्विजय सिंह ने अपनी सीट अपने भाई को ही थमाई थी।</p>
<p>राजस्थान में दस, मध्यप्रदेश में आठ, छत्तीसगढ़ में कांग्रेसी नेताओं के नौ बेटे-बेटियां चुनाव मैदान में हैं। इसलिए मारग्रेट अल्वा का यह सवाल उठाना स्वाभाविक है। सवाल यह भी है कि मारग्रेट अल्वा के बेटे को टिकट नहीं देने का कारण क्या था। क्या उस सीट पर ज्यादा पैसा लगाने वाला उम्मीदवार आ गया था। क्या वह टिकटार्थी स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष को रिश्वत देकर टिकट हासिल कर पाया। क्या मोटी रकम को देखकर एक परिवार- एक टिकट का सिध्दांत बनाया गया था। क्या वह पैसा सिर्फ स्क्रीनिंक कमेटी के अध्यक्ष और प्रदेश के प्रभारी महासचिव ही खा गए या कांग्रेस पार्टी के फंड में भी पैसा पहुंचा। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जिस तरह मारग्रेट अल्वा के आरोप को पहले छह महीने तक दबाए रखा और जब वह राजस्थान में टिकट बिकने की खबर आने पर फूट पड़ी तो उन्हें निकाल बाहर किया गया। कांग्रेस पाटी की महासचिव के आरोप को बिना जांच के खारिज करके उनके खिलाफ अभियान चलाकर बाहर निकाल देना कई तरह के शक पैदा करता है।</p>
<p>अगर चुनाव आयोग लालच से वोट हासिल करने पर कार्रवाई करता है, अगर वोटर को पांच-पांच सौ के नोट देने पर कांग्रेस के उम्मीदवार महेंद्र कर्मा के खिलाफ चुनाव आयोग केस दर्ज करता है, तो क्या चुनाव आयोग का यह फर्ज नहीं बनता कि वह टिकट बांटने वाले राजनीतिक दलों पर भी निगरानी रखे। राजनीतिक दल देश में भ्रष्टाचार के सबसे बड़े गिरोह बन गए हैं। सीबीआई ने हाल ही में अखबारों में विज्ञापन देकर भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ सुराग देने की गुहार लगाई है, लेकिन भ्रष्टाचार की गंगोत्री तो सीबीआई की आंखों के सामने बह रही है। मारग्रेट अल्वा के बाद योगेन्द्र मकवाना को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है, जिन्होंने अल्वा के आरोपों को सही बताते हुए कहा था कि उनके पास राजस्थान से कांग्रेस के टिकट चालीस लाख रुपयों से लेकर डेढ़ करोड़ रुपए तक में बिकने की शिकायत मिली हैं। जालप्पा अभी भी कांग्रेस में हैं, उन्होंने तो यहां तक कहा है कि उनके पास टिकट बिकने के सबूत मौजूद हैं। चुनाव आयोग को चाहिए कि वह इन जन प्रतिनिधियों के बयानों को आधार बनाकर सीबीआई को जांच का आदेश दे। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने राजनीतिक दलों के नेताओं को पैसा देने वाले हवाला किंग सुरेंद्र कुमार जैन की डायरी के आधार पर सभी राजनीतिक दलों के नेताओं पर जांच की तलवार चला दी थी। यह देश का दुर्भाग्य है कि नरसिंह राव दुबारा प्रधानमंत्री नहीं बने और उनकी हार के बाद सीबीआई ने केस को नकारा बना दिया। शरद यादव ने कबूल किया था कि उन्होंने जैन से पांच लाख रुपया चुनाव फंड के लिए हासिल किया था। यह कैसे हो सकता है कि एक नेता का नाम तो सही हो और बाकियों का गलत हो। नरसिंह राव ने राजनीति को साफ सुथरा करने की कोशिश की थी, इसके तहत उन्होंने अपनों-पराओं में कोई भेद नहीं किया। उन्होंने यह नहीं देखा कि लिस्ट में उन्हीं की सरकार के मंत्रियों बलराम जाखड़, विद्या चरण शुक्ल, कमलनाथ, आरके धवन, अरविंद नेताम, प्रणव मुखर्जी, एआर अंतुले, राजेश पायलट, बूटा सिंह, माधवराव सिंधिया, कृष्णा साही के साथ-साथ कांग्रेस के दिग्गज नेताओं जाफर शरीफ, एनडी तिवारी, नटवर सिंह, जी शिव शंकर, मोती लाल वोरा, अर्जुन सिंह, श्यामा चरण शुक्ल, जगन्नाथ पहाड़िया और चंदूलाल चंद्राकर के साथ-साथ स्वर्गीय राजीव गांधी का नाम भी था।</p>
<p>राजनीति और राजनीतिक दलों में पारदर्शिता के लिए जरूरी है कि उन्हें मिलने वाले चंदे और खर्चों पर निगाह रखने के लिए चुनाव आयोग में स्थाई प्रकोष्ट बनाया जाए। इस प्रकोष्ट को सीबीआई से मदद लेने का संवैधानिक हक होना चाहिए और टिकटों की बिक्री के आरोप लगने पर फौरन जांच के आदेश दिए जाएं। टिकटों की बिक्री करने वाले राजनीतिक दलों पर शिकंजा कसा जाना चाहिए और आरोप सही पाए जाने पर राजनीतिक दल की मान्यता खत्म होनी चाहिए। राजनीतिक दल अगर टिकट बेचने का धंधा करने लगेंगे तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। टिकट खरीद कर लोकसभा और विधानसभाओं में पहुंचने वाले सांसद-विधायक हर तरीके से पैसा कमाने के रास्ते निकालेंगे।  जब तक टिकटों की बिक्री पर निगरानी का कानूनी ढांचा तैयार नहीं होता तब तक राजनीतिक दलों को इस तरह के आरोपों की जांच करवानी चाहिए। मारग्रेट अल्वा को पार्टी के पदों से हटाकर उनकी जुबान बंद की जा सकती है लेकिन आवाम की आशंकाएं खत्म नहीं की जा सकती। अलबत्ता अनुशासन के नाम पर मारग्रेट अल्वा के खिलाफ कार्रवाई से खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कटघरे में खड़ी हो गई हैं क्योंकि ऐसा करके उन्होंने पार्टी के भ्रष्ट नेताओं को बचाने का प्रयास किया है। कांग्रेस पार्टी राजनीतिक दल के नाते कटघरे में है क्योंकि हवाला कांड से लेकर बोफोर्स घोटाले तक, यूरिया घोटाले से लेकर तेल के बदले अनाज घोटाले तक, झामुमो सांसदों की खरीद-फरोख्त से नरसिंह राव की सरकार बचाने से लेकर हाल ही में सांसदों को खरीदकर मनमोहन सिंह की सरकार बचाने तक अनेक ऐसे सबूत सामने आ चुके हैं जिनसे साबित होता है कि कांग्रेस के लिए सत्ता और राजनीति अब सेवा का माध्यम नहीं अलबत्ता धंधा बन गया है।</p>
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		<title>एक बार जो सत्ता का स्वाद चख ले</title>
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		<pubDate>Thu, 06 Nov 2008 18:47:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[दल-बदल की बीमारी ऐसे लोगों में ज्यादा पाई जाती है, जो सत्ता का स्वाद एक बार चख चुके होते हैं। चुनाव के मौके पर दल-बदल की बीमारी का मौसम आ जाता है। भाजपा ने टिकटों का ऐलान करने से पहले पार्टी के लिए काम करने की शपथ दिलाने का रास्ता ईजाद किया है। यह कितना [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>दल-बदल की बीमारी ऐसे लोगों में ज्यादा पाई जाती है, जो सत्ता का स्वाद एक बार चख चुके होते हैं। चुनाव के मौके पर दल-बदल की बीमारी का मौसम आ जाता है। भाजपा ने टिकटों का ऐलान करने से पहले पार्टी के लिए काम करने की शपथ दिलाने का रास्ता ईजाद किया है। यह कितना कारगर होगा?</strong></p></blockquote>
<p>जिन छह राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, उनमें टिकट बंटवारे का काम अब करीब-करीब खत्म हो गया है। टिकट बंटवारे के बाद पार्टियों के दफ्तरों में तोड़फोड़ और बगावतों का सिलसिला भी थमने लगा है। चुनाव लड़ने की टिकट न मिलने के बाद अपनी ही पार्टी  के खिलाफ नारे लगाने, जिन नेताओं के पांव छूकर टिकट मांग रहे थे, उन्हीं के पुतले फूंकने और आखिर में अपनी ही पार्टी को हराने के लिए दूसरी पार्टी में छलांग लगाने या बगावती होकर चुनाव लड़ने की बात अब आम हो गई है। भारतीय जनता पार्टी हो या कांग्रेस, इस मामले में एक उन्नीस है तो दूसरी इक्कीस। सत्ता हासिल करने की लालसा सत्ता मिलने के बाद होने वाले फायदों के साथ जुड़ी हुई है। एक बार एमएलए या एमपी बनने वाले नेताओं में यह बीमारी ज्यादा पाई जाती है। इसकी वजह यह है कि वे सत्ता का स्वाद चख चुके होते हैं और बागी होकर चुनाव लड़ने की हैसियत बना चुके होते हैं। दिल्ली में भाजपा के एक टिकटार्थी ने अपने आवेदन में लिखा कि अगर उसे टिकट दिया जाता है, तो वह पार्टी से चुनाव लड़ने के लिए फंड नहीं मांगेगा, अलबत्ता अगल-बगल की सीटों में भी मदद करेगा। विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए अब कम से कम एक करोड़ रुपया खर्च होता है, कोई व्यक्ति इतना पैसा चुनाव लड़ने के लिए खर्च करेगा, तो वह चुनाव जीतने पर अपने स्वार्थों की पूर्ति भी करेगा। राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव लड़ने का फायदा यह होता है कि पार्टियां खुद अपने उम्मीदवारों को फंड मुहैया करवाती हैं और पार्टियों की ओर से खर्च किया गया पैसा उम्मीदवार के खर्चे में शामिल नहीं होता। इसलिए हर कोई राजनीतिक दल का टिकट पाने की कोशिशों में जुट जाता है।</p>
<p>एमएलए-एमपी रहे नेता की सत्ता की भूख इतनी ज्यादा हो जाती है कि फिर उसके सामने देशहित, राज्यहित, सिध्दांत, विचारधारा का कोई मतलब नहीं रहता। कांग्रेस में रहकर भाजपा को सांप्रदायिक कहने वाले अचानक भाजपा की डयोढ़ी पर पहुंच जाते हैं, भाजपा में रहकर कांग्रेस को एक परिवार की पार्टी बताने वाले दस जनपथ जाकर नाक रगड़ना शुरू कर देते हैं। चुनावों के मौके पर दल-बदल का मौसम शुरू हो जाता है। उसी दौरान अनुशासन का डंडा भी चलने लगता है। मध्यप्रदेश में चुनाव के मौके पर दल-बदल की एक अजीब घटना देखने को मिली। पूर्व सांसद दिलीप सिंह भूरिया कांग्रेस की टिकट पाने में विफल रहने के बाद अचानक भाजपा मुख्यालय पहुंच गए। दिलीप सिंह भूरिया झाबुआ के अविवादित लोकप्रिय नेता थे। चार बार लगातार लोकसभा चुनाव जीतने वाले भूरिया धनबल की राजनीति से कोसों दूर रहे। लेकिन कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का शिकार हो गए। अर्जुन सिंह और विद्याचरण शुक्ल दोनों खेमों को नाराज कर लिया। नतीजा यह निकला कि दोनों ने मिलकर भूरिया का पत्ता काटकर कांतिलाल भूरिया को लोकसभा टिकट दिला दिया। इससे खफा होकर दिलीप सिंह तीस साल का कांग्रेस का साथ छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा ने उन्हें टिकट तो दिया लेकिन वह जीत नहीं पाए। इसके बावजूद भाजपा ने उन्हें अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग का अध्यक्ष बनाकर केबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया, जो कांग्रेस ने तीस साल तक उन्हें नहीं दिया था। दिलीप सिंह भूरिया की बेटी कांग्रेस की विधायक हुआ करती थी, भाजपा ने उन्हें भी विधानसभा का टिकट देने के बाद मध्यप्रदेश में मंत्री  बना दिया, जो कांग्रेस ने कभी नहीं बनाया था। लेकिन भाजपा ने दिलीप सिंह भूरिया को 2004 के लोकसभा चुनाव में टिकट नहीं दिया, तो वह खफा होकर गोंडवाना पार्टी में शामिल हो गए। थोड़े दिनों बाद ही उन्हें राष्ट्रीय पार्टी और क्षेत्रीय पार्टी में फर्क समझ आने लगा, तो कांग्रेस में लौटने की फिराक में जुट गए। आखिर विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले उन्हें कांग्रेस में प्रवेश मिल गया। कांग्रेस में आते ही उन्होंने खुद विधानसभा का चुनाव लड़ने और अपनी बेटी को भी कांग्रेस का टिकट दिलाने की कोशिशें शुरू कर दी। लेकिन भूरिया के पुराने विरोधी फिर से सक्रिय हो गए और उन्होंने टिकट नहीं मिलने दिया, अब भूरिया फिर से भाजपा में शामिल हो गए हैं और उनकी बेटी पहले से भाजपा में है। यह तो है सत्ता का स्वाद चख लेने के बाद टिकट की मारामारी का उदाहरण। जिसे एक बार भी टिकट न मिला हो, वह हर चुनाव में अपनी पार्टी की डयोढ़ी पर टिकटार्थी बनकर पहुंचता है और टिकट नहीं मिलने पर ज्यादा निराश हो तो अपने घर बैठ जाता है। निराशा पर काबू पा ले तो जिसे टिकट मिले उसी के लिए काम करने में जुट जाता है। मध्यप्रदेश भाजपा के एक ऐसे ही कार्यकर्ता ने टिकट के लिए अपने आवेदन में लिखा कि अगर उसे टिकट नहीं दिया गया तो वह उसी के लिए काम करेगा जिसे टिकट दिया जाएगा।</p>
<p>टिकट नहीं मिलने पर बगावती हो जाने और चुनाव के मौके पर पार्टी बदलने की इस बीमारी से वाकिफ भारतीय जनता पार्टी ने अब एक नया नुस्खा निकाला है। भाजपा के अध्यक्ष कार्यकर्ताओं की बैठकों में शपथ दिलाते हैं कि अगर उन्हें टिकट न मिले तो भी वे जी-जान से पार्टी के लिए काम करेंगे। राजस्थान में इस बार टिकटों का ऐलान होने के बाद ज्यादा बगावत की आशंका है, इसलिए पार्टी ने ज्यादातर सीटों पर फैसला कर लेने के बावजूद छह नवंबर को जयपुर में हुई बूथ प्रबंधकों के सम्मेलन से पहले टिकटों का ऐलान नहीं किया। करीब तीन घंटे चले सम्मेलन की समाप्ति पर जब राजनाथ सिंह अचानक अपने हाथ में कागज लेकर दुबारा मंच पर आए और अनाउंस  किया गया कि वह कुछ घोषणा करेंगे, तो मीडिया को ऐसा लगा कि भाजपा अपनी टिकटों का ऐलान करने का नया तरीका अख्तियार कर रही है। जबकि राजनाथ सिंह ने माइक पर पहुंचते ही सम्मेलन में मौजूद हजारों कार्यकर्ताओं को एक हाथ खड़ा करके शपथ दिलानी शुरू कर दी। संभवत: भाजपा दिल्ली प्रदेश के दफ्तर और पार्टी मुख्यालय में हुई नारेबाजी और तोड़फोड़ से भयभीत है। पति-पत्नी कीर्ति आजाद और पूनम आजाद दोनों ही एक-एक बार दिल्ली विधानसभा का चुनाव हार चुके हैं। इस बार पूनम आजाद नई दिल्ली की सीट पर शीला दीक्षित के सामने चुनाव लड़ने के बजाए पूर्वी दिल्ली से टिकट की इच्छुक थी। भाजपा अपने पुराने उम्मीदवार का टिकट काटकर पूनम आजाद को टिकट नहीं दे पाई, तो पूनम आजाद ने बगावत का बिगुल बजा दिया। चुनावों के मौके पर टिकट नहीं मिलने पर दल-बदल की बीमारी से जम्मू कश्मीर भी अछूता नहीं। जम्मू कश्मीर में हालांकि कांग्रेस की हालत काफी खस्ता है, इसके बावजूद कम से कम आधा दर्जन सीटों पर बगावती उम्मीदवारों का सामना करना पड़ रहा है।</p>
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		<title>प्रज्ञा ठाकुर को कौन बनाएगा मुद्दा</title>
		<link>http://indiagatenews.com/india-news/505.php</link>
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		<pubDate>Fri, 31 Oct 2008 04:18:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[प्रज्ञा को मोहरा बनाकर कांग्रेस पूरे देश में हिंदुओं को आतंकवादी बता रही है, लेकिन मध्यप्रदेश में खुद बचाव की मुद्रा में। कांग्रेस को डर है कहीं यह मुद्दा उल्टा ही न पड़ जाए।
कांग्रेस के लिए सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने वाली बात हुई। प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी सात के अंक को अपने लिए शुभ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>प्रज्ञा को मोहरा बनाकर कांग्रेस पूरे देश में हिंदुओं को आतंकवादी बता रही है, लेकिन मध्यप्रदेश में खुद बचाव की मुद्रा में। कांग्रेस को डर है कहीं यह मुद्दा उल्टा ही न पड़ जाए।</strong></p></blockquote>
<p>कांग्रेस के लिए सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने वाली बात हुई। प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी सात के अंक को अपने लिए शुभ मानते हैं, इसलिए वह समझ रहे थे कि पच्चीस नवंबर उनके लिए शुभ होगा। <span id="more-505"></span>पच्चीस का योग भी सात होता है, लेकिन चुनाव आयोग ने मतदान की तारीख पच्चीस के बजाए सत्ताईस नवंबर कर दी है।</p>
<p>एंटनी कमेटी की सिफारिशें धरी रह गई। एंटनी कमेटी ने लोकसभा उम्मीदवारों का ऐलान चुनाव से छह महीने पहले करने और विधानसभा उम्मीदवारों का ऐलान तीन महीने पहले करने की सिफारिश की थी। विधानसभा चुनावों में अब पच्चीस दिन बचे हैं, टिकटों की बंदरबांट अभी भी जारी है। कांग्रेस के चार बड़े नेता अभी भी अपने-अपने खेमे के ज्यादा से ज्यादा उम्मीदवार उतारने की कोशिशों में जुटे हुए हैं, ताकि सत्ता हाथ आने पर मुख्यमंत्री पद की कुर्सी झपटी जा सके। दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, सुरेश पचौरी और अजय सिंह के अलावा ज्योतिरादित्य भी अपने समर्थकों को टिकट दिलाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। एक-एक सीट पर मारामारी चल रही है। यही वजह है कि मध्यप्रदेश की स्क्रीनिंग कमेटी का काम बुधवार को निपट जाने का दावा किए जाने के बावजूद सभी सीटों का फैसला नहीं हुआ है। भोपाल की चार सीटों पर तो भाजपा का पलड़ा भारी है ही, कांग्रेस सिर्फ नई बनी भोपाल मध्य सीट जीत सकती है। जीत की संभावना देखते हुए कांग्रेस में एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति पैदा हो गई है। अर्जुन सिंह और कमलनाथ इस आसान सीट पर अजीज कुरैशी को मैदान-ए-जंग में उतारने में जुटे हुए थे, तो गुफराने आजम ने भी मैदान ठोकना शुरू कर दिया। वह पहले अर्जुन सिंह और बाद में दिग्विजय सिंह के खास रहे हैं। गुफराने आजम का नाम मैदान में आते ही सुरेश पचौरी खेमे ने नए नाम की तलाश शुरू कर दी और उनकी निगाह जल्द ही असलम शेर खान पर पड़ गई। पेनाल्टी कार्नर से गोल ठोकने के माहिर असलम शेर खान बेतूल से लोकसभा चुनाव जीतकर नरसिंह राव के जमाने में केंद्र में मंत्री रह चुके हैं। भाजपा और एनसीपी का चक्कर लगाकर कांग्रेस में लौटे असलम शेर खान मूल रूप से भोपाली हैं। इसलिए असलम शेर खान का दावा सबसे मजबूत होता है, लेकिन लंबे अर्से से भोपाल से दूर रहने के कारण अर्जुन खेमे को उनके विरोध का मुद्दा मिला हुआ है। हालांकि असलम शेर खान के लिए यह सीट अजीज कुरैशी और गुफराने आजम के मुकाबले ज्यादा आसान है, क्योंकि उन्हें मुसलमानों के साथ-साथ हिंदू वोटरों का भी समर्थन मिल सकता है। यह तो रही एक सीट की बात, मध्यप्रदेश की हर सीट पर इस तरह की खेमेबाजी चल रही है। हालांकि कमलनाथ और सुरेश पचौरी को कई जगहों पर अपने खेमे के उम्मीदवार ढूंढने पड रहे हैं, जबकि दिग्विजय सिंह के पास एक-एक सीट पर कई-कई वफादार लाइन में लगे हुए हैं। सर्वाधिक आधार होने के बावजूद दिग्विजय सिंह मैदान ठोकने की स्थिति में आज भी नहीं हैं। इसकी एक वजह तो दस साल तक सत्ता की राजनीति से दूर रहने का ऐलान करने की गलती, और दूसरा सोनिया गांधी का आशीर्वाद हासिल नहीं होना है। कांग्रेस आलाकमान यह तो मानता है कि मध्यप्रदेश में भाजपा को बराबरी की टक्कर देने के लिए दिग्विजय सिंह को भेजने की जरूरत है, लेकिन आलाकमान को यह भी खटका है कि कहीं दिग्विजय सिंह के ताल ठोकते ही चुनाव एक तरफा भाजपा के पक्ष में न हो जाए।</p>
<p>मध्यप्रदेश में भाजपा का पांच साल शासन और तीन मुख्यमंत्री होने के बावजूद कांग्रेस को भाजपा के खिलाफ कोई ठोस मुद्दा नहीं मिल रहा है। मध्यप्रदेश की प्रज्ञा ठाकुर को मालेगांव बम विस्फोट में गिरफ्तार करके कांग्रेस सारे देश में अपनी पीठ ठोक रही है और भाजपा को आतंकवादी संगठन साबित करने की कोशिश कर रही है, क्योंकि प्रज्ञा का संघ परिवार से जुड़े छात्र संगठन एबीबीपी से ताल्लुक रहा है। लेकिन मध्यप्रदेश में कांग्रेस प्रज्ञा ठाकुर की गिरफ्तारी को मुद्दा बनाने से बच रही है। इसकी वजह यह है कि प्रज्ञा ठाकुर का भूतकाल भले ही संघ परिवार से जुड़े किसी संगठन से रहा हो, लेकिन वर्तमान कांग्रेस से जुड़े आध्यात्मिक गुरु के साथ है। वह अर्जुन सिंह के आध्यात्मिक गुरु अवधेशानंद गिरी की शिष्या है। अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह ने बयान दिया है कि अवधेशानंद गिरी का प्रज्ञा ठाकुर से लेना-देना नहीं है, लेकिन खुद अवधेशानंद गिरी ने खंडन नहीं किया है। दूसरे मध्यप्रदेश के कांग्रेसी नेता यह जानते हैं कि उसका आलाकमान यूपीए घटक दलों के दबाव में आकर प्रज्ञा ठाकुर या सैन्य अधिकारियों को बम विस्फोटों में फंसाने की कोशिश कर रहा है, जो आम जनता के गले नहीं उतर रहा है। कांग्रेसी नेताओं को यह भी डर है कि कहीं यह मुद्दा उल्टा ही न पड़ जाए। भाजपा नेताओं ने भी शुरूआती झिझक के बाद प्रज्ञा ठाकुर के पक्ष में बयान देना शुरू कर दिया है। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने खुद बयान देकर अपने कैडर को साफ संकेत दे दिया है कि बचाव की मुद्रा में आने की जरूरत नहीं है। राजनाथ सिंह ने कहा है कि वह प्रज्ञा ठाकुर को आतंकवादी मानने को तैयार नहीं। उनने कहा है कि जो भी व्यक्ति सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में विश्वास रखता हो, वह आतंकवादी नहीं हो सकता। उन्होंने प्रज्ञा ठाकुर की गिरफ्तारी की तुलना आरुषि तलवार के पिता से की है, जिन्हें पुलिस ने न सिर्फ अपनी ही बेटी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था अलबत्ता हर रोज पुख्ता सबूत होने का दावा कर रही थी। जबकि डाक्टर तलवार पुलिस के सारे दांवों को मनगढ़ंत और झूठा बता रही थी, आज प्रज्ञा ठाकुर का कोई बयान सामने नहीं आ रहा, लेकिन वह पुलिस हिरासत में अनशन पर हैं, और खुद पर लगे आरोपों को बेबुनियाद बता रही हैं। कांग्रेस आलाकमान को भी डर है कि कहीं विधानसभा चुनावों के दौरान ही पासा उल्टा न पड़ जाए। मध्यप्रदेश के कांग्रेसी हलकों में कहीं भी चुनाव की रौनक दिखाई नहीं दे रही, ऐसा लग ही नहीं रहा है कि कांग्रेस जीतने के लिए चुनाव मैदान में है। अब जबकि चुनाव में सिर्फ चार हफ्ते ही बाकी रह गए हैं, कांग्रेस के नेता गुटबाजी से ऊपर नहीं उठ पाए हैं। जबकि भाजपा को अपनी गुटबाजी के बावजूद नेता तय होने का फायदा मिलने की उम्मीद है। भाजपा को कांग्रेस की बजाए अपनी ही पुरानी नेता उमा भारती से खतरा ज्यादा है। उमा भारती भाजपा को कटघरे में खड़ा करने का कोई मौका नहीं चूक रही है, भाजपा जब प्रज्ञा को लेकर दुविधा में फंसी हुई थी, तो उन्होंने प्रज्ञा को भाजपा के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरने का न्यौता दे डाला। उमा भारती भी इस बात से डरी हुई हैं कि भाजपा ने प्रज्ञा को अपना लिया और वह छूटकर आ गई तो भाजपा मे उनकी विकल्प बन जाएंगी। उमा भारती बुंदेलखंड में भाजपा को उन-उन सीटों पर नुकसान पहुंचाने की स्थिति में हैं जहां-जहां लोध वोटरों की तादाद बीस हजार से ज्यादा है। भाजपा को बुंदेलखंड और महाकौशल से ही खतरा है, बाकी जगह तो उसकी स्थिति मजबूत ही है। वैसे कांग्रेस की तरह भाजपा भी उम्मीदवार तय करने में फिसड्डी रही है, लेकिन पार्टी ने अपने तय कार्यक्रम में कोई देरी नहीं की है। भाजपा ने कांग्रेस जैसी कोई एंटनी कमेटी तो नहीं बनाई थी, लेकिन समय से पहले उम्मीदवारों का ऐलान करने की बात बार-बार उठती रही। भाजपा ने लोकसभा चुनावों के उम्मीदवारों का चयन करने की प्रक्रिया तो अगस्त में ही शुरू कर दी थी, जबकि विधानसभा उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया बाद में शुरू हुई। हालांकि भाजपा की चयन प्रक्रिया कांग्रेस से काफी बेहतर साबित होती दिखाई दे रही है, क्योंकि पार्टी ने निचले स्तर तक सर्वेक्षण करके उम्मीदवारों के बारे में आलाकमान को सिफारिशें भेजी। पहले से तैयारी होने के बावजूद 27 नवंबर को होने वाली मध्यप्रदेश विधानसभा सीटों के उम्मीदवारों का ऐलान ऐन नोटिफिकेशन के वक्त हुआ है। वह तो चुनाव आयोग ने चुनाव की तारीख दो दिन आगे खिसका दी, वरना नोटिफिकेशन के बाद ही केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक होती। गुरुवार को भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं लालकृष्ण आडवाणी और राजनाथ सिंह की संघ अधिकारियों के साथ बैठक के बाद शुक्रवार को चुनाव समिति की बैठक हुई। इससे स्पष्ट है कि संघ ने भाजपा को टिकट बंटवारे के बारे में कुछ मार्गदर्शन जरूर दिया होगा। हालांकि यह बैठक करीब दो महीने पहले ही तय हो गई थी, लेकिन भाजपा ने अपनी केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक संघ नेताओं के साथ होने वाली बैठक के बाद ही तय की।</p>
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		<title>सोनिया का आशीर्वाद फिर जोगी को</title>
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		<pubDate>Thu, 16 Oct 2008 18:43:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[विरोधियों को पछाड़ने के बाद खुद की रमण सिंह के मुकाबले चुनाव लड़ने की तैयारी। पत्नी और बेटे को भी टिकट दिलाने में जुटे। पहली ही नजर में कांग्रेस का पलड़ा भारी।
पूर्वोत्तर के मिजोरम और देश की राजधानी दिल्ली समेत पांच  हिन्दी भाषी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव की घोषणा हो चुकी है। इनमें से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>विरोधियों को पछाड़ने के बाद खुद की रमण सिंह के मुकाबले चुनाव लड़ने की तैयारी। पत्नी और बेटे को भी टिकट दिलाने में जुटे। पहली ही नजर में कांग्रेस का पलड़ा भारी।</strong></p></blockquote>
<p>पूर्वोत्तर के मिजोरम और देश की राजधानी दिल्ली समेत पांच  हिन्दी भाषी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव की घोषणा हो चुकी है। इनमें से सबसे पहले छत्तीसगढ़ विधानसभा का चुनाव होगा। छत्तीसगढ़ का गठन पहली नवंबर 2000 को एनडीए शासनकाल के समय हुआ, हालांकि छत्तीसगढ़ अलग राज्य के लिए संघर्ष दो दशकों से चल रहा था। कांग्रेस ने हमेशा अलग छत्तीसगढ़ राज्य का विरोध किया, लेकिन जब राज्य का गठन हुआ, तो पहली सरकार उसी की बनी। <span id="more-483"></span>इसकी वजह यह थी कि उस समय मध्यप्रदेश की नब्बे विधानसभा सीटों वाली इस क्षेत्र में कांग्रेस के 48 विधायक थे, जबकि भाजपा के 36 विधायक थे। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के लिए कांग्रेस में एक महीने तक घमासान हुआ। ज्यादातर विधायक विद्याचरण शुक्ल के पक्ष में थे, लेकिन तब के कांग्रेस के प्रवक्ता अजीत जोगी ने बाजी मार ली। उस समय अजीत जोगी के पक्ष में सिर्फ एक विधायक ही था। अजीत जोगी को सोनिया गांधी के नजदीक होने और इसाई होने का फायदा मिला। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के लिए मुश्किल यह थी कि राज्य के विधायक उन्हें कबूल करने को तैयार नहीं थे। सोनिया गांधी ने यह जिम्मा दिग्विजय सिंह को सौंपा, जो उस समय मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। वैसे तो दिग्विजय सिंह और अजीत जोगी दोनों ही अर्जुन सिंह खेमे के माने जाते थे, लेकिन दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में दोनों का छत्तीस का आंकड़ा बन चुका था। एक बार तो भोपाल में हुई प्रदेश कांग्रेस की बैठक में जूतमपैजार के बाद बम फोड़ने की नौबत भी आ चुकी थी। इसके बावजूद दिग्विजय सिंह को सोनिया गांधी के निर्देश का पालन करना पड़ा। असल में कांग्रेस के 48 विधायकों में से ज्यादातर विधायक दिग्विजय सिंह के करीबी थे। हालांकि विद्याचरण शुक्ल और श्यामाचरण शुक्ल हमेशा अर्जुन सिंह विरोधी खेमे का नेतृत्व करते रहे थे, लेकिन छत्तीसगढ़ के विधायक अर्जुन सिंह के ही चेले अजीत जोगी को पसंद नहीं करते थे, इसलिए उनके पास विद्याचरण शुक्ल के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। सोनिया गांधी ने जब अजीत जोगी के सिर पर हाथ रख दिया, तो उनके सारे विरोधियों को शांत होना पडा। विद्याचरण शुक्ल को लगा कि अब उनका कांग्रेस में कोई भविष्य नहीं है, इसलिए उन्होंने पहले एनसीपी, फिर भाजपा, फिर एनसीपी की राह पकड़ ली। सब जगह से होकर विद्याचरण शुक्ल अब फिर इस उम्मीद से कांग्रेस में आए थे कि अजीत जोगी का सितारा डूब रहा है, इसलिए छत्तीसगढ़ की राजनीति में उनका दबदबा हो जाएगा। लेकिन ऐसा लगता है कि अजीत जोगी को एक बार फिर सोनिया का आशीर्वाद हासिल हो गया है और वही मुख्यमंत्री पद के दावेदार होकर उभर रहे हैं। टिकटों का बंटवारा एक-दो दिनों में होने वाला है, स्क्रीनिंग कमेटी अपना काम निपटा चुकी है, जिसमें अजीत जोगी अपने समर्थकों को टिकट दिलाने में कामयाब होते दिखाई दे रहे हैं। अजीत जोगी इस बार अपनी विधायक पत्नी, बेटे अमित के साथ-साथ खुद भी चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं। देखना यह है कि क्या सोनिया गांधी एक ही परिवार के तीन सदस्यों को टिकट देने की हरी झंडी देंगी।</p>
<p>अजीत जोगी के मुख्यमंत्रित्व काल में छत्तीसगढ़ के पहले चुनाव 2003 में हुए, तो विद्याचरण शुक्ल एनसीपी की तरफ से नेता थे। विधानसभा चुनावों में भाजपा को 50 और कांग्रेस को 37 सीटें मिली, बहुजन समाजपार्टी को दो और एनसीपी को सिर्फ एक सीट मिली। विद्याचरण शुक्ल इस बीच भाजपा और एनसीपी के चक्कर काटते हुए कांग्रेस में लौट चुके हैं और राज्य की स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्यों में से एक थे। स्क्रीनिंग कमेटी में अजीत जोगी विरोधियों की भरमार होने के बावजूद बीच-बीच में दस जनपथ के दखल के कारण वे जोगी का कुछ नहीं बिगाड़ पाए। सोनिया गांधी ने अजीत जोगी को छत्तीसगढ़ की चुनाव अभियान समिति के साथ-साथ चंदा इकट्ठा करने की जिम्मेदारी भी सौंप दी है। इससे सोनिया गांधी का अजीत जोगी के प्रति रुख साफ हो गया है और उनके विरोधी स्क्रीनिंग कमेटी की बैठकों के दौरान ही पस्त हो गए हैं। टिकटों के लिए शुरू में जो पैनल बना था उसमें जोगी खेमे के सभी विधायकों की सीटों पर दो या तीन टिकटार्थियों का नाम था। सीधे सोनिया गांधी से मुलाकात कर जोगी ने अपने समर्थक विधायकों के पैनल ठीक करवा लिए। स्क्रीनिंग कमेटी को मजबूर होकर जोगी खेमे के सभी विधायकों की सीटों पर सिर्फ उन्हीं के नाम की सिफारिश की है। अब सवाल यह है कि क्या सोनिया गांधी उन्हें विधानसभा चुनाव लड़ने की इजाजत दे रही हैं। जोगी खेमे का कहना है कि सोनिया गांधी इजाजत दे चुकी हैं। इतना ही नहीं बिना कांग्रेस हाईकमान से पूछे जोगी मुख्यमंत्री रमण सिंह के मुकाबले चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुके हैं। हालांकि अजीत जोगी का अपना निर्वाचन क्षेत्र मरवाही है और कांग्रेस की प्रदेश स्क्रीनिंग कमेटी ने वहीं से उनके नाम की सिफारिश की है। मरवाही से सिर्फ अजीत जोगी का नाम होने से लगता है कि सोनिया गांधी उन्हें चुनाव लड़ने की इजाजत दे चुकी हैं जिसकी जानकारी स्क्रीनिंग कमेटी को भी होगी। तो क्या अजीत जोगी की पत्नी और बेटे के साथ-साथ उन्हें खुद को दो सीटों पर चुनाव लड़ने की इजाजत मिलेगी। उनकी पत्नी तो अभी भी विधायक हैं, वह अपने बेटे अमित को राजनीति में स्थापित करने के लिए ज्यादा उतावले हैं, इसलिए अगर केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में ऐतराज हुआ, तो वह अपने बेटे के लिए खुद चुनाव मैदान से बाहर भी हो सकते हैं। अर्जुन सिंह के चेले अजीत जोगी को पता है कि बहुमत मिलने पर सोनिया गांधी उन्हीं को नेतृत्व सौँपेंगी और ऐसा होने पर वह किसी भी सीट से उपचुनाव लड़ लेंगे। मौजूदा स्थितियों के मुताबिक कांग्रेस का पलड़ा भारी दिखाई देता है, इसकी वजह यह है कि 2003 के विधानसभा चुनावों में सभी 90 सीटों पर भाजपा को राज्य में सिर्फ ढाई लाख वोट ज्यादा मिले थे। जबकि 2008 के विधानसभा चुनावों में साढ़े सोलह लाख नए वोटर हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस को भी सात फीसदी वोट मिले थे, जो अब कांग्रेस को मिलेंगे, इसके अलावा पांच साल के शासनकाल के बाद भाजपा के खिलाफ एंटीइनकंबेंसी का असर भी होगा।</p>
<p>हालांकि राजनीतिक पंडितों का अनुमान यह है कि पार्टी अजीत जोगी, उनकी पत्नी और बेटे तीनों को चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं देगी, इसके बावजूद अजीत जोगी दो जगहों से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। उनकी नजर मरवाही के अलावा रमण सिंह की सीट पर भी है। हालांकि रमण सिंह ने अभी ऐलान नहीं किया है, कि वह कहां से चुनाव लड़ेंगे। माना यह जा रहा है कि वह राजनंदगांव से चुनाव लड़ेंगे। बुधवार को अपने जन्मदिन पर रमण सिंह ने राजनंदगांव में रोड शो करके वहां से चुनाव लड़ने के संकेत दे दिए हैं। मजेदार बात यह है कि 2003 के विधानसभा चुनावों में भाजपा यह सीट 40 वोटों से हार गई थी। लेकिन आश्चर्यजनक यह है कि प्रदीप गांधी की बर्खास्तगी के बाद लोकसभा का उपचुनाव होने पर जीते कांग्रेस के देवव्रत सिंह राजनंदगांव विधानसभा हल्के में बुरी तरह हारे। वैसे रमण सिंह फिलहाल  डोंगरगांव से विधायक हैं, जहां से प्रदीप गांधी ने अपनी सीट खाली करके सौंपी थी। रमण सिंह 1993 में अपनी कर्मस्थली कवर्धा से जीते थे, लेकिन 1998 में वहां हार गए, 2003 में भी वहां कांग्रेस जीती। इसलिए रमण सिंह वहां जाने की हिम्मत नहीं कर सकते। जहां तक उनके जन्मस्थल पंडरिया विधानसभा सीट का सवाल है तो पिछले तीन-चार बार से वहां कांग्रेस ही जीत रही है।</p>
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		<title>एंटी इनकंबेंसी तो दोनों दलों के खिलाफ</title>
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		<pubDate>Fri, 10 Oct 2008 05:19:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इतना जोरदार झटका लगा था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने दस साल तक कोई पद नहीं लेने का एलान कर दिया था। यह अलग बात है कि सोनिया गांधी ने जब उन्हें महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी तो वह ठुकरा नहीं सके। कांग्रेस आलाकमान ने उत्तर प्रदेश विधानसभा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इतना जोरदार झटका लगा था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने दस साल तक कोई पद नहीं लेने का एलान कर दिया था। यह अलग बात है कि सोनिया गांधी ने जब उन्हें महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी तो वह ठुकरा नहीं सके। कांग्रेस आलाकमान ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उन्हें जिम्मेदारी दी तो वह भी उन्होंने मध्यप्रदेश की तरह बाखूबी निभाई। कांग्रेस आलाकमान ने शायद अभी तक 2003 की हार का सलीके से विश्लेषण नहीं किया। <span id="more-468"></span>कांग्रेस महाकौशल में बुरी तरह हार गई थी, जहां हमेशा उसका गढ़ रहा था। कांग्रेस महाकौशल की 57 में से सिर्फ 11 सीटें जीत पाई थी। भाजपा की मालवा में भी वापसी हो गई थी, जो पहले हमेशा उसका गढ़ रहा था लेकिन 1993 के बाद से कांग्रेस का गढ़ बनना शुरू हो गया था। कांग्रेस को अगर कहीं थोड़ी बहुत सफलता मिली थी तो वह सिर्फ चम्बल के क्षेत्र में। इसका श्रेय दिग्विजय सिंह को कम माधवराव सिंधिया की विरासत को ज्यादा दिया जा सकता है। चार जिलों को छोड़कर बाकी सारे प्रदेश में कांग्रेस का वोट बैंक खिसक गया था। नतीजा यह निकला कि जहां कांग्रेस और भाजपा में सिर्फ डेढ़-दो फीसदी वोटों का फर्क रहता था वह 2003 में बढ़कर दस फीसदी हो गया था। कांग्रेस ने 1998 के विधानसभा चुनावों में जिन वोटरों को अपने पक्ष में किया था उनमें से सिर्फ 59 फीसदी ही 2003 में कांग्रेस के पक्ष में रह गए थे। अपने 41 फीसदी वोटरों को खफा करके कोई भी राजनीतिक दल दुबारा जनादेश हासिल नहीं कर सकता। राजनीतिक दलों को एक बात का हमेशा ख्याल रखना चाहिए कि अस्सी-पिचासी फीसदी मतदाता उम्मीदवार, जातीय समीकरण और मौजूदा विधायक या सांसद का काम-व्यवहार देखकर अपने वोट का फैसला करता था। सिर्फ पंद्रह-बीस फीसदी वोटर ही पार्टी के प्रति प्रतिबध्द होता था। यानी एंटी इनकंबेंसी सिर्फ सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ नहीं होती बल्कि विधायक और सांसद के खिलाफ उससे कहीं ज्यादा होती है। मध्य प्रदेश में दस साल तक कांग्रेस का राज रहा था, 2003 में पूरे प्रदेश में कांग्रेस के खिलाफ हवा थी, लेकिन उसका मतलब यह नहीं था कि भाजपाई विधायकों के खिलाफ हवा नहीं थी। कांग्रेस के खिलाफ और भाजपा के पक्ष में हवा होने के बावजूद 1998 में भाजपा को वोट देने वाले 14 फीसदी वोटरों ने अपना मन बदल लिया था। यानी भाजपा 1998 के हासिल मतदाताओं में से 86 फीसदी अपना पक्ष में रख सकी थी। यह दर्शाता है कि पार्टी के पक्ष में हवा होने के बावजूद कई जगहों पर मतदाता अपने विधायकों से नाराज थे।</p>
<p>नरेंद्र मोदी ने गुजरात विधानसभा चुनाव में बड़े पैमाने पर विधायकों के टिकट काटकर सरकार के खिलाफ बनी एंटी इनकंबेंसी की हवा का मुंह मोड़ने में सफलता हासिल करके नया रास्ता दिखाया है। इसलिए भाजपा की पिछली संसदीय बोर्ड बैठक में लालकृष्ण आडवाणी ने मध्यप्रदेश की एंटी इनकंबेंसी का जिक्र करते हुए सीटिंग-गेटिंग के फार्मूले को सहज मंजूर न करने की बात कही थी। भाजपा मध्य प्रदेश और राजस्थान में खासकर गुजरात फार्मूला अपनाना चाहती है। इसलिए इन दोनों राज्यों में पचास फीसदी तक मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर एंटी इनकंबेंसी का मुकाबला किया जा सकता है लेकिन यह बात व्यवहारिक रूप से कितनी कामयाब होती है, यह देखना होगा। राजस्थान में तो 40 से 50 फीसदी तक टिकटें बदली जा सकती हैं, लेकिन मध्यप्रदेश में यह इतना आसान नहीं होगा। मध्यप्रदेश में जीतने वाले उम्मीदवार का पैमाना बनाया गया तो बुधनी के वोटर मुख्यमंत्री शिवराज चौहान से कम खफा नहीं हैं। शिवराज सिंह के भाई और पत्नी के बिजनेस ने उनकी छवि को तो नुकसान पहुंचाया ही है, उनके वोट बैंक को भी खफा किया है। हालांकि भाजपा आलाकमान में अरुण जेटली जैसे नेता भी हैं, जिनका मानना है कि शुरू में ही उमा भारती की जगह शिवराज चौहान को मुख्यमंत्री बनाया जाता तो मध्यप्रदेश आदर्श राज्य बन सकता था। बाबू लाल गौड़ के प्रयोग को भाजपा अपनी ऐसी मजबूरी बताती है जिसे उमा भारती की जिद्द के चलते टालना मुश्किल हो गया था। उमा भारती आज भी भाजपा का बड़ा संकट है, व्यक्तिगत एंटी इनकंबेंसी के बावजूद भाजपा के विधायक टिकट बचाने में कामयाब हो जाएंगे तो उसकी वजह भी उमा भारती होंगी क्योंकि भाजपा आलाकमान को डर है कि टिकट कटने वाले उमा भारती के पाले में जाकर भाजपा को नुकसान पहुंचाएंगे।</p>
<p>पिछले विधानसभा चुनावो में उमा भारती को प्रोजेक्ट करने का भाजपा को फायदा हुआ था। उमा भारती ओबीसी से ताल्लुक रखती हैं और अपनी जाति का मुख्यमंत्री बनाने की लालसा में मूल रूप से कांग्रेस का वोट बैंक खिसक कर भाजपा की झोली में चला गया था। चुनावी विश्लेषण यह था कि करीब 50 फीसदी ओबीसी वोट भाजपा के पाले में चला गया था और कांग्रेस को सिर्फ 26 फीसदी ओबीसी वोट ही मिले थे। उमा भारती इस समय भाजपा के खिलाफ हैं, लेकिन वह ओबीसी वोट बैंक पर दावा नहीं कर सकती क्योंकि भाजपा का मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी ओबीसी है और भाजपा इस बार भी ओबीसी मुख्यमंत्री को प्रोजेक्ट करके चुनाव मैदान में उतर रही है। इस बार उमा भारती का मुख्य लक्ष्य भाजपा को हराकर कांग्रेस को सत्ता सौंपना है ताकि वह भाजपा से बदला ले सके। भाजपा से बदला लेने के लिए वह मायावती से हाथ मिलाने को तैयार हो गई है। पिछले दिनों उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी के बजाए मायावती को प्रधानमंत्री बनवाने का बीड़ा उठाने का बयान दिया है। जहां तक मायावती की बसपा का सवाल है तो वह दिल्ली और राजस्थान में भले ही कांग्रेस को नुकसान पहुंचाएगी, लेकिन मध्य प्रदेश में उसका वोट बैंक बढ़ने से भाजपा को ही नुकसान होगा। उमा भारती और मायावती दोनों ही भाजपा को नुकसान पहुंचाने और कांग्रेस को फायदा पहुंचाने का काम कर सकती हैं। उमा भारती का पिछड़े वोट बैंक पर आज भी प्रभाव है तो मायावती अनुसूचित जाति के साथ-साथ मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजाति में पैठ बना रही है। मध्य प्रदेश का आदिवासी बसपा की तरफ मुंह कर रहा है। यहां महत्वपूर्ण यह है कि मध्यप्रदेश की 39 आदिवासी और 16-17 दलित सीटें भाजपा के पास हैं। मायावती की दलितों के साथ-साथ आदिवासियों में घुसपैठ कामयाब हो गई तो सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा का ही होगा। चुनाव आते-आते मायावती को बसपा के प्रभाव से कांग्रेस की लाटरी खुलने का आभास हो गया और उसने अंदरखाने कुछ सीटों पर भाजपा से तालमेल कर लिया तो स्थिति एकदम बदल जाएगी, लेकिन फिलहाल तो ऐसी कहीं कोई बात नहीं है।</p>
<p>भाजपा ने अपने दो चुनावी सर्वेक्षणों में पाया है कि उसकी सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी उतनी नहीं है जितनी उसके विधायकों और कुछ मंत्रियों के खिलाफ है। भाजपा को अपने विधायकों-मंत्रियों की एंटी इनकंबेंसी के साथ-साथ अपने दलित-आदिवासी वोट बैंक की एंटी इनकंबेंसी का संतुलन भी बनाना पड़ेगा जबकि कांग्रेस के नेता एंटी इनकंबेंसी का मतलब समझने में अभी राजनीतिक तौर पर काफी पिछड़े हुए हैं। कांग्रेस ने गोपाल सिंह चौहान, श्रीमती सुनीता बेले और उम्मेद सिंह बना को छोड़कर बाकी सभी विधायकों को टिकट देने का मोटे तौर पर फैसला कर लिया है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के अपने 1998 के वोट बैंक में 14 फीसदी की गिरावट इस बात का सबूत है कि एंटी इनकंबेंसी सिर्फ सत्ताधारी विधायकों के खिलाफ ही नहीं अलबत्ता विपक्षी दलों के खिलाफ भी काम करती है। मौजूदा विधायकों को टिकट दिलाने में दिग्विजय सिंह की अहम भूमिका रही है, अब उनके विरोधी इस पर सवाल उठा रहे हैं। असल में कांग्रेस के मौजूदा 40 विधायकों में से 22 ठाकुर हैं, दिग्विजय सिंह के एक तीर से 22 ठाकुरों को तो टिकट मिल ही गया है, अब नेताओं के कोटे में 10-12 ठाकुर और टिकट लेने में कामयाब रहे तो ठाकुर मुख्यमंत्री बनाने में आसानी रहेगी। लेकिन विधायकों के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी का इतिहास देखा जाए तो कांग्रेस के मौजूदा विधायकों में से आधे ही मुश्किल से जीत पाएंगे। कांग्रेस को अपने विधायकों की एंटी इनकंबेंसी के साथ-साथ केंद्र सरकार की एंटी इनकंबेंसी का सामना भी करना पड़ेगा। आतंकवाद पर कांग्रेस पार्टी के नेताओं के रुख से भी जनता उससे बेहद खफा है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले बाटला हाऊस मुठभेड़ की जांच की मांग करने से मध्यप्रदेश के कांग्रेसी नेता हतप्रद हैं। मध्यप्रदेश में उन्हीं के कार्यकाल में सिमी ने अपने सलीपिंग सेल बना लिए थे, जिसका भंडाफोड़ शिवराज चौहान सरकार में हुआ है। आतंकवाद पर कांग्रेस के रुख की एंटी इनकंबेंसी का खामियाजा विधानसभा चुनावों में कांग्रेसी उम्मीदवारों को भुगतना पड़ेगा। साथ में महंगाई का ठीकरा भी कांग्रेसी उम्मीदवारों के सिर पर फूटेगा।</p>
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		<title>(संशोधित&#8230;.)चुनाव टालने की कांग्रेसी सियासत विफल</title>
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		<pubDate>Fri, 03 Oct 2008 18:39:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[जम्मू में हिंदुओं के विरोध में आ जाने से भयभीत कांग्रेस शुरू में विधानसभा के चुनाव टलवाने की कोशिश में जुटी थी, लेकिन चुनाव आयोग के सामने एक नहीं चली, तो जल्द चुनाव की वकालत शुरू कर दी।
यूपीए सरकार अलगाववादियों के दबाव में आकर जम्मू कश्मीर के चुनाव टालने की कोशिश कर रही थी, लेकिन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>जम्मू में हिंदुओं के विरोध में आ जाने से भयभीत कांग्रेस शुरू में विधानसभा के चुनाव टलवाने की कोशिश में जुटी थी, लेकिन चुनाव आयोग के सामने एक नहीं चली, तो जल्द चुनाव की वकालत शुरू कर दी।</strong></p></blockquote>
<p>यूपीए सरकार अलगाववादियों के दबाव में आकर जम्मू कश्मीर के चुनाव टालने की कोशिश कर रही थी, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी के तेवरों को देखकर अब केंद्र सरकार ने घुटने टेक दिए हैं। केंद्र सरकार ने अब चुनाव आयोग से आग्रह किया है कि चुनावों को इस साल होने वाले बाकी विधानसभाओं के चुनावों से अलग किया जाए क्योंकि जम्मू कश्मीर के लिए सुरक्षा एजेंसियों की ज्यादा जरूरत पड़ती है। <span id="more-454"></span>चुनाव आयोग को इस पर कोई ऐतराज नहीं होगा, हालांकि जम्मू कश्मीर में लागू गवर्नर राज की अवधि दस जनवरी तक है, लेकिन  अब संभावना यह बन रही है कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली से पहले ही जम्मू कश्मीर  के चुनाव करवा लिए जाएं। जबकि इन चारों विधानसभाओं का कार्यकाल जम्मू कश्मीर के गवर्नर राज की अवधि खत्म होने से पंद्रह-बीस दिन पहले ही खत्म हो रही है। चुनाव आयोग ने पूर्वोत्तर की एक विधानसभा समेत सभी छह राज्यों में चुनाव करवाने पर विचार करने के लिए बैठकों का दौर शुरू कर दिया है। शुक्रवार को जम्मू कश्मीर के बारे में मीटिंग बुलाई गई थी, मुख्य चुनाव अधिकारी दिल्ली पहुंच गए थे, लेकिन उन्हीं की गुहार पर मीटिंग दस अक्टूबर को रखी गई है। इसकी वजह यह है कि छह अक्टूबर को जम्मू में होने वाली रैली तक गवर्नर ने चुनाव के बारे में अपनी हरी झंडी देने में असमर्थता जाहिर की है। वैसे चुनावी तैयारियां और तारीखों का फैसला करने के लिए बैठक पिछले हफ्ते ही हो जाती लेकिन एक चुनाव आयुक्त एमआई कुरैशी उमरा करने के लिए सऊदी अरब गए हुए थे। एक अन्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला ने चुनाव आयोग की पहली बैठक में जम्मू कश्मीर के चुनाव फौरन करवाने की मुखालफत की थी, लेकिन अब केंद्र सरकार और कांग्रेस के रुख में काफी बदलाव आ गया है। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने अपने पुराने रुख में परिवर्तन करते हुए कहा है कि कांग्रेस पार्टी नवंबर-दिसंबर में ही चुनावों के पक्ष में है। साफ है कि कांग्रेस के रुख में बदलाव मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी के तेवरों को देखते हुए आया है। वरना कांग्रेस भी नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी की तरह मार्च-अप्रेल में चुनाव करवाने के पक्ष में थी।</p>
<p>कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पिछले महीने पार्टी की कोर कमेटी की बैठक बुलाई तो उसमें उनके सामने फरवरी-मार्च में चुनाव करवाने की राय रखी गई थी। कांग्रेस अध्यक्ष को बताया गया था कि चुनाव आयोग को इसके लिए तैयार किया जा सकता है और राज्यपाल प्रशासन का मौजूदा कार्यकाल छह महीने और बढ़ाया जा सकता है। सोनिया गांधी कोर कमेटी की राय से सहमत नहीं हुई, क्योंकि इससे पहले हिमाचल विधानसभा के चुनावों और कर्नाटक विधानसभा के चुनावों में चुनाव आयोग ने कांग्रेस की एक नहीं चलने दी थी। चुनाव आयोग ने हिमाचल विधानसभा के चुनाव पहली विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने से दो महीने पहले ही करवा दिए थे। जबकि कर्नाटक में भी कांग्रेस छह महीने और राष्ट्रपति राज लगाकर येदुरप्पा के पक्ष में बनी हवा को ठंडा पड़ जाने देना चाहती थी। विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज ने चुनाव आयोग से चुनाव टालने की गुहार भी लगाई थी लेकिन पूर्व विधि मंत्री अरुण जेटली ने मुख्य चुनाव आयुक्त को साफ-साफ बता दिया कि अगर फौरन चुनाव करवाने में आना-कानी की गई तो पार्टी अदालत का दरवाजा खटखटाएगी। मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी खुद भी बिना वजह राष्ट्रपति राज का कार्यकाल बढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। कांग्रेस का अनुमान था कि अगर जल्दी चुनाव हो गए तो उसकी लुटिया डूब जाएगी। कांग्रेस का अनुमान सही निकला और दक्षिण में पहली बार भगवा फहरा गया। पिछले अनुभवों से सबक लेते हुए सोनिया गांधी ने कांग्रेस कोर कमेटी की बैठक में कहा कि पार्टी को चुनाव आयोग पर ज्यादा भरोसा करने की बजाए नवंबर-दिसंबर में ही जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनावों की तैयारी करनी चाहिए।</p>
<p>सोनिया गांधी की हिदायत के बावजूद कांग्रेस ने अपनी तरफ से चुनाव आयोग को समझाने-बुझाने की पूरी कोशिश जारी रखी कि राज्य में हालात चुनाव करवाने लायक नहीं। एक तरफ जम्मू और कश्मीर में सांप्रदायिक धु्रवीकरण का माहौल है, तो दूसरी तरफ अलगाववादी चुनाव का विरोध कर रहे हैं। असल में कांग्रेस को जम्मू में ही सीटें मिलने की संभावना बनती है, लेकिन वहां श्री अमरनाथ यात्रा के लिए आवंटित की गई जमीन रद्द करने के कारण कांग्रेस अपनी साख गंवा चुकी है, इसलिए कांग्रेस अपने खिलाफ बनी हवा को ठंडा हो जाने देना चाहती है। जहां तक घाटी का सवाल है तो वहां कांग्रेस की स्थिति पहले से ही नाजुक है। घाटी में पिछली बार पीडीपी को अच्छीखासी सीटें मिल गई थी, लेकिन तीन साल शासन करने के बाद वहां पीडीपी की हालत खराब हो चुकी है। वह कांग्रेस से गठबंधन तोड़ने का बहाना ढूंढ ही रही थी कि मुख्यमंत्री गुलामनबी ने श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देकर पीडीपी को रिश्ते तोड़ने का बहाना दे दिया। इससे पीडीपी को घाटी में सांप्रदायिकता उभारकर अपना वोट बैंक फिर से मजबूत करने का मौका मिल गया। छह साल में पीडीपी की साख गिरने का सीधा फायदा नेशनल कांफ्रेंस को होने वाला था, लेकिन जब पीडीपी ने श्राइन बोर्ड को जमीन देने का विरोध करके समर्थन वापस लिया तो नेशनल कांफ्रेंस को अपनी जमीन खिसकती नजर आई। इसलिए नेशनल कांफ्रेंस ने भी श्राइन बोर्ड को जमीन देने की मुखालफत शुरू कर दी थी। तब किसी भी राजनीतिक दल ने यह नहीं सोचा था कि जम्मू में आंदोलन इतना तीव्र रूप ले लेगा।</p>
<p>अब बदले हालात में पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस फौरन चुनाव की मुखालफत कर रहे हैं। जबकि कांग्रेस ने अपने स्टेंड में परिवर्तन कर लिया है, हालांकि चुनावों में सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को ही होने का अनुमान है। जम्मू कश्मीर तीन हिस्सों में बंटा हुआ है, जम्मू में 37, घाटी में 45 और लद्दाख में चार सीटें हैं। जम्मू की 37 सीटों में से करीब 20 सीटें हिंदू बहुल हैं जिनमें से 14 पिछली बार कांग्रेस जीत गई थी जबकि अब वहां हालात कांग्रेस के खिलाफ हैं। इसके बावजूद चुनाव टालने से होने वाले नुकसान को देखते हुए कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर फैसला छोड़ने की बात कही थी। हालांकि भीतर ही भीतर कांग्रेस चुनाव टालने की कोशिश करती रही। गृहमंत्रालय से चुनाव आयोग पर दबाव भी बनवाया गया, लेकिन गृह मंत्रालय चुनाव आयोग को चुनाव टालने के पक्ष में माकूल जवाब नहीं दे सका है। आयोग ने गृहमंत्रालय से 2002 में हुए चुनावों के समय के हालात की आज के हालात से तुलना करके देने को कहा था। गृह मंत्रालय ने तुलनात्मक चार्ट आयोग को उपलब्ध करवा दिया है, जिसमें साफ है कि हालात पहले से बेहतर हैं। अब केंद्र सरकार ने भी यह मन बना लिया है कि चुनाव टालने की बजाए नवंबर-दिसंबर में चुनाव करवाना बेहतर होगा। क्योंकि अलगाववादियों के तेवरों और जम्मू में हिंदुओं के आक्रोश में चार महीने बाद भी कोई बदलाव आने की संभावना नहीं है। वैसे जम्मू कश्मीर में इस बार भी 38-40 फीसदी तक ही मतदान रहने के आसार हैं। पिछली बार अलगाववादियों के बायकाट के बावजूद घाटी के ग्रामीण इलाकों में 25 से 30 फीसदी तक मतदान हो गया था हालांकि श्रीनगर में नौ फीसदी और सोपोर-बारामूला में पांच से सात फीसदी तक ही मतदान हुआ था। जम्मू और लद्दाख में अच्छे-खासे मतदान की वजह से राज्य का मतदान 38 से 40 फीसदी तक चला गया था।</p>
<p>अनुमान यह है कि दो-चार दिन में जम्मू कश्मीर विधानसभा के चुनावों का ऐलान हो जाएगा। अलगाववादियों की ओर से चुनाव का बायकाट करने की आशंका को देखते हुए पिछली बार की तरह इस बार भी ऐलान, अधिसूचना और मतदान की अवधि को कम से कम रखे जाने के आसार हैं। पिछली बार चुनाव आयोग ने अधिसूचना और चुनाव की अवधि बाईस दिन से घटाकर पंद्रह दिन कर दी थी, ताकि आतंकवादियों को ज्यादा हिंसा फैलाने का मौका न मिले। इस बार भी ऐसा ही किए जाने के आसार हैं। वैसे जम्मू कश्मीर के हालात को देखते हुए वहां चार या पांच दौर में चुनाव हो सकते हैं। जबकि बाकी राज्यों में चुनावों की घोषणा भी जम्मू कश्मीर के साथ हो सकती है, लेकिन चुनाव वक्त पर ही होंगे। राजनीतिक दलों में बनी आम सहमति के मुताबिक चुनाव आचार संहिता की अवधि 55 दिन के आसपास रहनी चाहिए। आचार संहिता चुनावों का ऐलान होते ही लागू हो जाती है।</p>
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		<title>चुनाव टालने की कांग्रेसी सियासत विफल</title>
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		<pubDate>Thu, 02 Oct 2008 18:45:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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यूपीए सरकार अलगाववादियों के दबाव में आकर जम्मू कश्मीर के चुनाव टालने की कोशिश कर रही थी, लेकिन [...]]]></description>
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<p>यूपीए सरकार अलगाववादियों के दबाव में आकर जम्मू कश्मीर के चुनाव टालने की कोशिश कर रही थी, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी के तेवरों को देखकर अब केंद्र सरकार ने घुटने टेक दिए हैं। केंद्र सरकार ने अब चुनाव आयोग से आग्रह किया है कि चुनावों को इस साल होने वाले बाकी विधानसभाओं के चुनावों से अलग किया जाए क्योंकि जम्मू कश्मीर के लिए सुरक्षा एजेंसियों की ज्यादा जरूरत पड़ती है। <span id="more-452"></span>चुनाव आयोग को इस पर कोई ऐतराज नहीं होगा, हालांकि जम्मू कश्मीर में लागू गवर्नर राज की अवधि दस जनवरी तक है, लेकिन  अब संभावना यह बन रही है कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली से पहले ही जम्मू कश्मीर  के चुनाव करवा लिए जाएं। जबकि इन चारों विधानसभाओं का कार्यकाल जम्मू कश्मीर के गवर्नर राज की अवधि खत्म होने से पंद्रह-बीस दिन पहले ही खत्म हो रही है। शुक्रवार से चुनाव आयोग ने पूर्वोत्तर की एक विधानसभा समेत सभी छह राज्यों में चुनाव करवाने पर विचार करने के लिए बैठकों का दौर शुरू कर दिया है। वैसे चुनावी तैयारियां और तारीखों का फैसला करने के लिए बैठक पिछले हफ्ते ही हो जाती लेकिन एक चुनाव आयुक्त एमआई कुरैशी उमरा करने के लिए सऊदी अरब गए हुए थे। एक अन्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला ने चुनाव आयोग की पहली बैठक में जम्मू कश्मीर के चुनाव फौरन करवाने की मुखालफत की थी, लेकिन अब केंद्र सरकार और कांग्रेस के रुख में काफी बदलाव आ गया है। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने अपने पुराने रुख में परिवर्तन करते हुए कहा है कि कांग्रेस पार्टी नवंबर-दिसंबर में ही चुनावों के पक्ष में है। साफ है कि कांग्रेस के रुख में बदलाव मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी के तेवरों को देखते हुए आया है। वरना कांग्रेस भी नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी की तरह मार्च-अप्रेल में चुनाव करवाने के पक्ष में थी।</p>
<p>कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पिछले महीने पार्टी की कोर कमेटी की बैठक बुलाई तो उसमें उनके सामने फरवरी-मार्च में चुनाव करवाने की राय रखी गई थी। कांग्रेस अध्यक्ष को बताया गया था कि चुनाव आयोग को इसके लिए तैयार किया जा सकता है और राज्यपाल प्रशासन का मौजूदा कार्यकाल छह महीने और बढ़ाया जा सकता है। सोनिया गांधी कोर कमेटी की राय से सहमत नहीं हुई, क्योंकि इससे पहले हिमाचल विधानसभा के चुनावों और कर्नाटक विधानसभा के चुनावों में चुनाव आयोग ने कांग्रेस की एक नहीं चलने दी थी। चुनाव आयोग ने हिमाचल विधानसभा के चुनाव पहली विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने से दो महीने पहले ही करवा दिए थे। जबकि कर्नाटक में भी कांग्रेस छह महीने और राष्ट्रपति राज लगाकर येदुरप्पा के पक्ष में बनी हवा को ठंडा पड़ जाने देना चाहती थी। विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज ने चुनाव आयोग से चुनाव टालने की गुहार भी लगाई थी लेकिन पूर्व विधि मंत्री अरुण जेटली ने मुख्य चुनाव आयुक्त को साफ-साफ बता दिया कि अगर फौरन चुनाव करवाने में आना-कानी की गई तो पार्टी अदालत का दरवाजा खटखटाएगी। मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी खुद भी बिना वजह राष्ट्रपति राज का कार्यकाल बढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। कांग्रेस का अनुमान था कि अगर जल्दी चुनाव हो गए तो उसकी लुटिया डूब जाएगी। कांग्रेस का अनुमान सही निकला और दक्षिण में पहली बार भगवा फहरा गया। पिछले अनुभवों से सबक लेते हुए सोनिया गांधी ने कांग्रेस कोर कमेटी की बैठक में कहा कि पार्टी को चुनाव आयोग पर ज्यादा भरोसा करने की बजाए नवंबर-दिसंबर में ही जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनावों की तैयारी करनी चाहिए।</p>
<p>सोनिया गांधी की हिदायत के बावजूद कांग्रेस ने अपनी तरफ से चुनाव आयोग को समझाने-बुझाने की पूरी कोशिश जारी रखी कि राज्य में हालात चुनाव करवाने लायक नहीं। एक तरफ जम्मू और कश्मीर में सांप्रदायिक धु्रवीकरण का माहौल है, तो दूसरी तरफ अलगाववादी चुनाव का विरोध कर रहे हैं। असल में कांग्रेस को जम्मू में ही सीटें मिलने की संभावना बनती है, लेकिन वहां श्री अमरनाथ यात्रा के लिए आवंटित की गई जमीन रद्द करने के कारण कांग्रेस अपनी साख गंवा चुकी है, इसलिए कांग्रेस अपने खिलाफ बनी हवा को ठंडा हो जाने देना चाहती है। जहां तक घाटी का सवाल है तो वहां कांग्रेस की स्थिति पहले से ही नाजुक है। घाटी में पिछली बार पीडीपी को अच्छी खासी सीटें मिल गई थी, लेकिन तीन साल शासन करने के बाद वहां पीडीपी की हालत खराब हो चुकी है। वह कांग्रेस से गठबंधन तोड़ने का बहाना ढूंढ ही रही थी कि मुख्यमंत्री गुलामनबी ने श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देकर पीडीपी को रिश्ते तोड़ने का बहाना दे दिया। इससे पीडीपी को घाटी में सांप्रदायिकता उभारकर अपना वोट बैंक फिर से मजबूत करने का मौका मिल गया। छह साल में पीडीपी की साख गिरने का सीधा फायदा नेशनल कांफ्रेंस को होने वाला था, लेकिन जब पीडीपी ने श्राइन बोर्ड को जमीन देने का विरोध करके समर्थन वापस लिया तो नेशनल कांफ्रेंस को अपनी जमीन खिसकती नजर आई। इसलिए नेशनल कांफ्रेंस ने भी श्राइन बोर्ड को जमीन देने की मुखालफत शुरू कर दी थी। तब किसी भी राजनीतिक दल ने यह नहीं सोचा था कि जम्मू में आंदोलन इतना तीव्र रूप ले लेगा।</p>
<p>अब बदले हालात में पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस फौरन चुनाव की मुखालफत कर रहे हैं। जबकि कांग्रेस ने अपने स्टेंड में परिवर्तन कर लिया है, हालांकि चुनावों में सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को ही होने का अनुमान है। जम्मू कश्मीर तीन हिस्सों में बंटा हुआ है, जम्मू में 37, घाटी में 45 और लद्दाख में चार सीटें हैं। जम्मू की 37 सीटों में से करीब 20 सीटें हिंदू बहुल हैं जिनमें से 14 पिछली बार कांग्रेस जीत गई थी जबकि अब वहां हालात कांग्रेस के खिलाफ हैं। इसके बावजूद चुनाव टालने से होने वाले नुकसान को देखते हुए कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर फैसला छोड़ने की बात कही थी। हालांकि भीतर ही भीतर कांग्रेस चुनाव टालने की कोशिश करती रही। गृहमंत्रालय से चुनाव आयोग पर दबाव भी बनवाया गया, लेकिन गृह मंत्रालय चुनाव आयोग को चुनाव टालने के पक्ष में माकूल जवाब नहीं दे सका है। आयोग ने गृहमंत्रालय से 2002 में हुए चुनावों के समय के हालात की आज के हालात से तुलना करके देने को कहा था। गृह मंत्रालय ने तुलनात्मक चार्ट आयोग को उपलब्ध करवा दिया है, जिसमें साफ है कि हालात पहले से बेहतर हैं। अब केंद्र सरकार ने भी यह मन बना लिया है कि चुनाव टालने की बजाए नवंबर-दिसंबर में चुनाव करवाना बेहतर होगा। क्योंकि अलगाववादियों के तेवरों और जम्मू में हिंदुओं के आक्रोश में चार महीने बाद भी कोई बदलाव आने की संभावना नहीं है। वैसे जम्मू कश्मीर में इस बार भी 38-40 फीसदी तक ही मतदान रहने के आसार हैं। पिछली बार अलगाववादियों के बायकाट के बावजूद घाटी के ग्रामीण इलाकों में 25 से 30 फीसदी तक मतदान हो गया था हालांकि श्रीनगर में नौ फीसदी और सोपोर-बारामूला में पांच से सात फीसदी तक ही मतदान हुआ था। जम्मू और लद्दाख में अच्छे-खासे मतदान की वजह से राज्य का मतदान 38 से 40 फीसदी तक चला गया था।</p>
<p>अनुमान यह है कि दो-चार दिन में जम्मू कश्मीर विधानसभा के चुनावों का ऐलान हो जाएगा। अलगाववादियों की ओर से चुनाव का बायकाट करने की आशंका को देखते हुए पिछली बार की तरह इस बार भी ऐलान, अधिसूचना और मतदान की अवधि को कम से कम रखे जाने के आसार हैं। पिछली बार चुनाव आयोग ने अधिसूचना और चुनाव की अवधि बाईस दिन से घटाकर पंद्रह दिन कर दी थी, ताकि आतंकवादियों को ज्यादा हिंसा फैलाने का मौका न मिले। इस बार भी ऐसा ही किए जाने के आसार हैं। वैसे जम्मू कश्मीर के हालात को देखते हुए वहां चार या पांच दौर में चुनाव हो सकते हैं। जबकि बाकी राज्यों में चुनावों की घोषणा भी जम्मू कश्मीर के साथ हो सकती है, लेकिन चुनाव वक्त पर ही होंगे। राजनीतिक दलों में बनी आम सहमति के मुताबिक चुनाव आचार संहिता की अवधि 55 दिन के आसपास रहनी चाहिए। आचार संहिता चुनावों का ऐलान होते ही लागू हो जाती है।</p>
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		<title>कांग्रेस उलझी टिकटों की बंदरबांट में</title>
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		<pubDate>Thu, 25 Sep 2008 19:06:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य और सुरेश पचौरी अपने-अपने समर्थकों को ज्यादा से ज्यादा टिकटें दिलवाने में मशगूल। अर्जुन सिंह टिकटों की बंदरबांट से दूर रहकर तमाशा देख रहे हैं, वह अपना खेल आखिर में शुरू करेंगे। मध्यप्रदेश में भाजपा को हराना खाला जी का घर नहीं। पिछले चार विधानसभा चुनावों में भाजपा हमेशा 39 फीसदी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य और सुरेश पचौरी अपने-अपने समर्थकों को ज्यादा से ज्यादा टिकटें दिलवाने में मशगूल। अर्जुन सिंह टिकटों की बंदरबांट से दूर रहकर तमाशा देख रहे हैं, वह अपना खेल आखिर में शुरू करेंगे। मध्यप्रदेश में भाजपा को हराना खाला जी का घर नहीं। पिछले चार विधानसभा चुनावों में भाजपा हमेशा 39 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करती रही है जबकि कांग्रेस 1990 और 2003 में 31-32 फीसदी वोटों तक लुढ़क चुकी है।</strong></p></blockquote>
<p>मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा में हमेशा कांटे की टक्कर रही है। लगातार कई साल तक दोनों पार्टियों में करीब दो फीसदी का वोट अंतर रहता था। जिसके वोट दो फीसदी ज्यादा हो जाते थे, वह सरकार बना लेता था। <span id="more-432"></span>लेकिन जब जनता किसी एक पार्टी से नाराज हो जाती थी, तो जीतने वाली पार्टी से उसका अंतर आठ-दस फीसदी तक जा पहुंचता था। ऐसा 1990 और 2003 के चुनाव में देखने को मिला जब प्रदेश की जनता कांग्रेस से बेहद नाराज हो गई तो उसका वोट गिरकर 32 फीसदी के आसपास आ अटका। बाबरी ढांचा टूटने के बाद नरसिंह राव ने भाजपा की मध्यप्रदेश, दिल्ली, हिमाचल, राजस्थान सरकारें गिराकर विधानसभाएं भंग कर दी थी। उस समय मध्यप्रदेश में भाजपा और कांग्रेस में दस फीसदी वोट का फर्क था। कांग्रेस को 32.67 फीसदी वोटों के साथ सिर्फ 33 सीटें मिली थीं जबकि भाजपा को 42.05 फीसदी वोटों के साथ 169 सीटें मिल गई थी। बाबरी ढांचा टूटने के करीब एक साल बाद हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट सिर्फ सवा दो फीसदी घटा था, लेकिन सीटें आधी घटकर सिर्फ 87 रह गई थी। कांग्रेस ने 1993 का लोकसभा चुनाव प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दिग्विजय सिंह की रहनुमाई में लड़ा था। कांग्रेस को 40.60 फीसदी वोटों के साथ 120 सीटें मिली थी जबकि भाजपा को 39.81 फीसदी वोटों के साथ सिर्फ 87 सीटें मिली। पांच साल बाद 1998 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की चार सीटें और 0.16 फीसदी वोट में बढ़ोत्तरी हुई। दिग्विजय सिंह की लोकप्रियता तब शिखर पर थी। भाजपा का वोट आधा फीसदी घटा था और चार सीटें भी घट गई थी। तब तक बसपा अपना प्रभाव बढ़ा रही थी, 1993 के चुनाव में बसपा ने मध्यप्रदेश में दस सीटें हासिल कर ली थी और 1998 के चुनाव में भी आठ सीटें हासिल कर ली थी। दस साल के शासनकाल के बाद दिग्विजय सिंह की लोकप्रियता घटने लगी थी और चुनाव का मुद्दा बसपा बन रहा था। भाजपा ने ब-बिजली, स-सड़क, प- पानी को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा, तो दिग्विजय सिंह ने हालात का सामना करने के लिए बसपा से अंदरखाते चुनावी गठबंधन किया। भाजपा की बसपा दिग्विजय सिंह की बसपा पर भारी पड़ गई और चुनावों में कांग्रेस और बसपा दोनों को ही नुकसान हुआ।</p>
<p>2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 41.59 फीसदी से घटकर 31.60 फीसदी वोटों और 38 सीटों पर आ गिरी। जबकि भाजपा के वोटों में तीन फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई, जबकि उसकी सीटें दुगुनी से भी ज्यादा हो गई। भाजपा के वोट 39.28 से बढ़कर 42.49 फीसदी हुए थे लेकिन उसकी सीटें 83 से बढ़कर 173 हो गई। लब्बोलुवाब यह है कि दो फीसदी वोट का अंतर मध्यप्रदेश में हार-जीत तय करता था। हालांकि यह बात अलग है कि मध्यप्रदेश की जनता जब कांग्रेस से नाराज हुई, तो उसका वोट 31-32 फीसदी तक जा गिरता है, लेकिन भाजपा ने 1990 से लेकर 2003 तक के चार विधानसभा चुनावों में कभी भी 39 वोटों से कम हासिल नहीं किए। सवा चार साल पहले हुए लोकसभा चुनावों में भी जब सारे देश में भाजपा को नुकसान हुआ, मध्यप्रदेश में फायदा ही हुआ। इसलिए मध्यप्रदेश कांग्रेस के लिए आसान खेल नहीं है। छह महीने पहले तक दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में मध्यप्रदेश भाजपा की डूबती हुई नाव समझी जा रही थी, लेकिन पिछले छह महीनों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राजनीतिक गलियारों की धारणा को बदलना शुरू कर दिया है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, भाजपा की स्थिति मजबूत और कांग्रेस की कमजोर होती जा रही है।</p>
<p>1993 में कांग्रेस ने सिर्फ तीन साल के अंतर में अपने वोटों में आठ फीसदी की बढ़ोत्तरी करके सत्ता हासिल की थी, जबकि भाजपा के वोट में सिर्फ दो फीसदी की गिरावट आई थी। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और अपनी पार्टी को फायदा पहुंचाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने एक साल तक राज्यपाल शासन लगाकर प्रशासन को कांग्रेस के अनुकूल किया। सिर्फ इतना ही नहीं, अलबत्ता नरसिंह राव की पार्टी नेताओं को एकजुट करने की रणनीति भी कामयाब रही थी। नरसिंह राव के निर्देश पर माधव राव सिंधिया ने डबरा में पार्टी की एकता रैली करके कई गुटों में बंटे सभी नेताओं को एक मंच पर ला खड़ा किया था। कांग्रेस को विधानसभा चुनावों में जीत दिलाने में नरसिंह राव की रणनीति की महत्वपूर्ण भूमिका थी। जबकि अब कांग्रेस के पास नरसिंह राव जैसा कोई रणनीतिकार नहीं है। जहां तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का सवाल है तो साढ़े चार साल प्रधानमंत्री और पांच साल वित्त मंत्री रहने के बावजूद वह चुनावी राजनीति में अनाड़ी ही हैं। गुटीय राजनीति को समझना और हालात को पार्टी के अनुकूल करना उनके बस का रोग नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का ज्यादातर समय पार्टी नेताओं की गुटबाजी को समझने और समझाने-बुझाने में ही बीत रहा है। नतीजा सबके सामने है, नरसिंह राव के समय डबरा रैली ने कांग्रेस को एकजुट करके जीत हासिल दिला दी थी, तो सोनिया गांधी के वक्त कांग्रेस एकता के लिए की गई छिंदवाड़ा रैली नेताओं में फूट बढ़ाने का कारण बन गई।</p>
<p>आज हालात यह हैं कि कांग्रेस के पांच बड़े नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी को सामने देखकर अपने-अपने समर्थकों को ज्यादा से ज्यादा टिकट दिलाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। कमलनाथ का पलड़ा इस समय सोनिया गांधी के दरबार में सबसे ज्यादा भारी है। इसकी वजह वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के माध्यम से जुट रही भारी भरकम राशि है। हालांकि कमलनाथ इटली के पत्थर आयात की नीति बदलने के मामले में विवादों में घिरे हुए हैं, लेकिन उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं, क्योंकि सब कुछ कांग्रेस पार्टी को फायदा पहुंचाने के लिए हो रहा है।  इससे सोनिया गांधी की निगाह में कमलनाथ का राजनीतिक कद भी ऊंचा हुआ है। इसलिए माना जा रहा है कि टिकटों के बंटवारे में कमलनाथ का पलड़ा ही भारी रहेगा, दिग्विजय सिंह भी उन्हीं के समर्थन में। दोनों अर्जुन सिंह के पुराने शागिर्द, भले ही लोक दिखावे के लिए दिग्विजय सिंह खुद को तटस्थ घोषित कर दें, लेकिन यह रणनीति का हिस्सा ही होगा। कमलनाथ-दिग्विजय सिंह के बाद तीसरे नंबर पर ज्योतिरादित्य हैं, जिनकी सोनिया गांधी तक सीधी पहुंच है, लेकिन उनका दायरा ग्वालियर के आसपास तक ही सीमित है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी चौथे नंबर पर आ रहे हैं, इसकी वजह यह है कि वह पहली बार प्रदेश की राजनीति में हिस्सा ले रहे हैं। इससे पहले उनकी दिलचस्पी केंद्रीय राजनीति में ही रही है, प्रदेश में उनका अपना मजबूत खेमा भी नहीं है। इसलिए कांग्रेस को बहुमत मिलने के बावजूद सोनिया गांधी की व्यक्तिगत इच्छा होने पर ही वह मुख्यमंत्री बन पाएंगे। टिकटों के बंटवारे में अर्जुन सिंह की चुप्पी कांग्रेसी हलकों में आश्चर्य से देखी जा रही है। हालांकि उनका बेटा अजय सिंह टिकटों के बंटवारे में दिलचस्पी ले रहे हैं, लेकिन उनका दायरा भी अर्जुन सिंह के मुकाबले बहुत कम है। अर्जुन सिंह को जानने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि वह अपना आखिरी दांव आखिरी समय पर ही चलते हैं। इसलिए आखिर में दस-पंद्रह टिकटें बदलवाकर वह सबका संतुलन बिगाड़ सकते हैं। कांग्रेस विधानसभा चुनाव जीत गई, तो कमलनाथ और सुरेश पचौरी की दावेदारी में अजय सिंह की लाटरी खुलने की उम्मीद रखने वाले भी कम नहीं।</p>
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		<title>यूपीए सियासत की देन है इंडियन मुजाहिद्दीन</title>
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		<pubDate>Thu, 18 Sep 2008 18:41:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[कांग्रेस को आतंकवाद पर अपनी गलत नीतियों का अहसास हो चुका है, लेकिन चुनावों से ठीक पहले नीतियों में यू टर्न से भाजपा को फायदा पहुंचने के डर से ठिठकी हुई है। देश की सियासत वोट बैंक का शिकार हो गई है।
यूपीए सरकार और खासकर उसकी सबसे बड़ी घटक कांग्रेस संकट से जूझ रही है। [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>कांग्रेस को आतंकवाद पर अपनी गलत नीतियों का अहसास हो चुका है, लेकिन चुनावों से ठीक पहले नीतियों में यू टर्न से भाजपा को फायदा पहुंचने के डर से ठिठकी हुई है। देश की सियासत वोट बैंक का शिकार हो गई है।</strong></p></blockquote>
<p>यूपीए सरकार और खासकर उसकी सबसे बड़ी घटक कांग्रेस संकट से जूझ रही है। कांग्रेस ने अंदाज भी नहीं लगाया था कि उसकी तुष्टिकरण की नीति उसके गले की हड्डी बन जाएगी। पिछले चार साल तक वामपंथी दल यूपीए सरकार की अल्पसंख्यक तुष्टिकरण और आतंकवादी तुष्टिकरण नीति के भागीदार थे। <span id="more-416"></span>अब जबकि वे सरकार से समर्थन वापस ले चुके हैं, तो उन्होंने आतंकवाद के प्रति नरम रुख का आरोप लगाना शुरू कर दिया है। भाजपा जब संसद में अफजल गुरु को फांसी का मुद्दा उठाती थी तो वामपंथी सांसद मोहम्मद सलीम भाजपा पर पलटवार कर सरकार का बचाव करते थे। अब माकपा महासचिव प्रकाश करात ने सरकार पर आतंकवाद से निपटने में नाकामी का आरोप लगाना शुरू कर दिया है। सरकार का साथ छोड़ चुके वामपंथी ही नहीं, अलबत्ता सरकार के भीतर से भी सरकार की आलोचना शुरू हो गई है। कांग्रेस में इस बात पर हैरानी प्रकट की जा रही है कि सिमी का समर्थन करने वाले दो केंद्रीय मंत्री लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान ही आतंकवादी घटनाओं पर सरकार के खिलाफ बोलने शुरू हो गए हैं।</p>
<p>आतंकवाद की घटनाएं बढ़ने से अपनी पार्टी की अल्पसंख्यकवादी और आतंकवादियों के प्रति नरम रवैये की नीतियों से क्षुब्ध कांग्रेसी अब खुलेआम पार्टी और सरकार की नीतियों की आलोचना करने लगे हैं। पार्टी की एक वरिष्ठ नेता ने कहा है कि वह शुरू से ही इन नीतियों के खिलाफ थी और कई बार सोनिया गांधी को अपनी राय से अवगत करवा चुकी थीं। कांग्रेस की इस वरिष्ठ महिला नेता ने पिछले दिनों दिग्विजय सिंह समेत पार्टी के कई नेताओं से संपर्क करके अल्पसंख्यकवाद से होने वाले नुकसान पर बातचीत की थी। अब कांग्रेस के कई नेता सोनिया गांधी के पास जाकर अपनी राय बेवाक ढंग से प्रकट कर रहे हैं, लेकिन पंद्रह फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले प्रदेशों के कांग्रेसी नेता पार्टी की नीति में परिवर्तन से होने वाले नुकसान गिना रहे हैं। दस जनपथ के निर्देश से अपनी विचारधारा और नीतियां तय करने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस समय सोनिया गांधी से भी ज्यादा दबाव में हैं। मनमोहन सिंह पर अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश का आतंकवादियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने का दबाव है। इसलिए वह संयुक्त राष्ट्र की आमसभा के लिए रवाना होने से पहले अपनी सरकार की ओर से कड़ा रुख अपनाने का संदेश लेकर जाना चाहते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खुद वीरप्पा मोइली को बुलाकर प्रशासनिक सुधार कमेटी की आठवीं रिपोर्ट फौरन  पेश करने को कहा। वीरप्पा मोइली को प्रधानमंत्री ने खुद निर्देश दिया कि वह आतंकवाद के खिलाफ सख्त कदम उठाने और नए कानून बनाने की सिफारिश करें। रिपोर्ट पहले ही तैयार थी और प्रधानमंत्री की हिदायत के मुताबिक सिफारिश जोड़कर कुछ घंटों के भीतर ही प्रिटिंग के लिए भेज दी गई। रिपोर्ट जारी होते ही कांग्रेस के कई नेताओं ने अपना सुर बदल लिया, वे समझ गए थे कि आखिरकार सरकार ने मन बना लिया है। जयंती नटराजन जैसी कांग्रेसी नेताओं ने खुलेआम सख्त कानून की वकालत कर दी। जबकि अब तक अल्पसंख्यकवाद को बढ़ावा दे रहे कांग्रेसी नेताओं ने सोनिया गांधी को फिर जाकर समझाया कि नीतियां बदलने से पार्टी को नुकसान होगा। कांग्रेस के इन नेताओं का मानना है कि चुनाव से ठीक पहले पार्टी की नीतियों में फेरबदल करने से भाजपा को फायदा होगा।</p>
<p>भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी यूपीए सरकार बनने के बाद से ही आतंकवाद पर नरम रुख अपनाने का आरोप लगाते रहे हैं। मनमोहन सिंह के इस बयान को भाजपा ने आड़े हाथों लिया था जिसमें उन्होंने पाकिस्तान को आतंकवादी वारदातों से बरी करते हुए कह दिया था कि वह भी आतंकवाद का शिकार है। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भारत में होने वाली सभी आतंकी वारदातों में पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आईएसआई को आरोपित करते हुए उसे अंतरराष्ट्रीय निगरानी में रखने की मांग की थी। काबुल में भारतीय दूतावास के सामने हुए आतंकी हमले में आईएसआई की भूमिका का आरोप लगाने के बावजूद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का पाक के प्रति रवैया नरम रहा। अमेरिका ने पाकिस्तान को साफ तौर पर कहा कि काबुल की वारदात में आईएसआई का हाथ था। ऐसी परिस्थिति का फायदा उठाते हुए मनमोहन सिंह आईएसआई पर ज्यादा हमलावर हो सकते थे, लेकिन वह अपनी आदत के मुताबिक पाक के प्रति नरम रुख पर कायम रहे। अब अगर यूपीए सरकार चार साल बाद पाक और आतंकवाद के प्रति सख्त रुख अपनाती है तो इसे सरकार का अपनी चार साल की गलतियां सुधारना माना जाएगा और भाजपा का आरोप सही साबित हो जाएगा। रक्षामंत्री एके एंटनी ने पाकिस्तान पर ज्यादा हमलावर रुख अपनाना शुरू कर दिया है, लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस पार्टी अभी भी दस जनपथ से दिशा-निर्देश का इंतजार कर रहे हैं।</p>
<p>पाकिस्तान पर आरोप लगाना अब उतना वजनदार भी नहीं रहेगा क्योंकि यूपीए सरकार के पिछले चार सालों में आईएसआई ने सिमी की मदद से शुध्द भारतीय आतंकवादी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन खड़ा कर दिया है। इंडियन मुजाहिद्दीन अब तक के सभी पाकिस्तानी आतंकी संगठनों से ज्यादा आधुनिक, वैज्ञानिक और तकनीक संपन्न संगठन हैं। इंडियन मुजाहिद्दीन में पाकिस्तानी और अफगानिस्तानी आतंकियों से कहीं ज्यादा पढ़े-लिखे युवक शामिल हैं, जिन्हें बम बनाने के लिए पाकिस्तान के प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा लेने की जरूरत ही नहीं है। कश्मीर घाटी को कश्मीरी पंडितों से मुक्त करके सौ फीसदी मुस्लिम बना देने के बावजूद पाकिस्तान घाटी में घरेलू आतंकवादियों का संगठन और नेटवर्क खड़ा नहीं कर पाया था। घाटी के युवक गुमराह होकर आतंकवाद में शामिल जरूर हुए थे लेकिन उनमें न तो नेतृत्व की क्षमता थी और न ही तकनीक का ज्ञान। घाटी के आतंकी अपने पाकिस्तानी आकाओं के इशारे पर काम करते थे। वे अनपढ़ता और बेरोजगारी के कारण आईएसआई की ओर से दिखाए गए आजादी और खुशहाली के सपनों का शिकार होते थे। जबकि सिमी की मदद से बनाई गई इंडियन मुजाहिद्दीन में शामिल मुस्लिम युवक पढ़े-लिखे, संपन्न परिवारों से जुड़े नेतृत्व क्षमता वाले आधुनिक तकनीक से लैस हैं।</p>
<p>कांग्रेस के महत्वहीन तबके को इस बात का पूरा अहसास है कि हिंदू विरोधी वैसाखियों के सहारे सरकार बनाने से उनकी पार्टी की मध्य मार्ग की रणनीति तहस-नहस हो गई है। अब जबकि हालात नियंत्रण से बाहर हो गए हैं तो बीच रास्ते में नीतियां बदलने से होने वाले खतरे का डर दिखाकर सही रास्ता अपनाने से रोका जा रहा है। लालू यादव के दबाव में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बुधवार को आतंरिक सुरक्षा पर केबिनेट की बैठक बुलाई थी। इस बैठक से ठीक पहले सोनिया गांधी ऐसे ही लोगों के दबाव में आ गई। उन्होंने प्रधानमंत्री से मुलाकात करके नीतियों में यू टर्न लेने से भाजपा को फायदा पहुंचने का डर दिखाकर आगाह कर दिया। आखिर तीन घंटे चली बैठक में फिर वही लोग हावी हो गए जिनके दबाव में पोटा रद्द करने और आतंकवाद के प्रति नरम रुख अपनाने की नीति चल रही थी। फिलहाल कांग्रेस और यूपीए सरकार ने देखो और इंतजार करने की रणनीति अख्तियार की है। इस बीच राष्ट्रीय सुरक्षा कानून को और मजबूत करने का विचार जरूर बना है, लेकिन जब तक &#8216;पोटा&#8217; जैसे जमानत के सख्त प्रावधान, मजिस्ट्रेट के सामने अपराध स्वीकार करने को सबूत, टेलीफोन बातचीत जैसे सबूतों को अदालत में स्वीकार्य करने जैसे प्रावधान नहीं किए जाते तब तक कानून मजबूत नहीं हो सकता। कांग्रेस दो खेमों में बंट गई है और कपिल सिब्बल जैसे लोग आतंकवादियों के खिलाफ सख्ती के खिलाफ हैं।</p>
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		<title>भाषा बनी वोट बैंक की सियासत</title>
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		<pubDate>Fri, 12 Sep 2008 03:58:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[भाषा का आंदोलन तो पंजाब और तमिलनाडु में भी चला था, लेकिन उन आंदोलनों का लक्ष्य संस्कृति और परंपराओं की हिफाजत थी। जबकि राज ठाकरे का मराठी प्रेम अपने भाई उध्दव ठाकरे पर भारी पड़ने के लिए वोट बैंक की सियासत का हिस्सा है।
बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने इस हफ्ते अमिताभ बच्चन परिवार [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>भाषा का आंदोलन तो पंजाब और तमिलनाडु में भी चला था, लेकिन उन आंदोलनों का लक्ष्य संस्कृति और परंपराओं की हिफाजत थी। जबकि राज ठाकरे का मराठी प्रेम अपने भाई उध्दव ठाकरे पर भारी पड़ने के लिए वोट बैंक की सियासत का हिस्सा है।</strong></p></blockquote>
<p>बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने इस हफ्ते अमिताभ बच्चन परिवार को फिर निशाना बनाया। इस बार निशाने पर अमिताभ बच्चन की पत्नी जया बच्चन थी। जया बच्चन मुलत: हिंदी भाषी या उत्तर भारतीय नहीं हैं। भले ही जया बच्चन के पिता तरुण भादुड़ी भोपाल में रहते थे, लेकिन वह थे मुलत: बंगाली। भोपाल में वह स्टेट्समैन के पत्रकार थे, बंगाली होने के बावजूद मध्यप्रदेश में इतना रच-बस गए कि अर्जुन सिंह ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में उन्हें पर्यटन विभाग में जिम्मेदार पद सौंप दिया था। <span id="more-393"></span>भोपाल में बचपन बीतने के कारण जया बच्चन बंगाली और हिंदी अच्छी तरह बोल लेती हैं और अपनी जिंदगी का जरिया मुंबई को बनाकर मराठी पर भी अच्छी खासी पकड़ बना ली है। जया भादुड़ी खुद को हिंदी में सहज बताकर क्या बोली राज ठाकरे को भाषाई सियासत का नया बहाना मिल गया। राज ठाकरे जब से अपने चाचा से अलग होकर राजनीति करने लगे हैं तब से उत्तर भारतीयों और हिंदी के पीछे लठ लेकर पड़े हैं। भाषा और क्षेत्रवाद की यह राजनीति राज ठाकरे को विरासत में मिली है। कार्टूनिस्ट बाल ठाकरे जब पहली बार राजनीतिक अखाड़े में उतरे थे तो उन्होंने भी इन्हीं दो मुद्दों को अपनी सियासत का आधार बनाया था। उन दिनों दक्षिण भारतीय बाल ठाकरे के निशाने पर हुआ करते थे, उत्तर भारतीयों पर उनकी नजर बाद में पड़ी थी। अब मुंबई और बाकी महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों की तादाद दक्षिण भारतीयों से ज्यादा है। इसलिए राज ठाकरे उत्तर भारतीयों के खिलाफ मुद्दों की तलाश में रहते हैं, ताकि अपने चचेरे भाई उध्दव ठाकरे के मराठी वोट बैंक को अपने पाले में ला सकें। वोट बैंक की राजनीति कितनी गंदी, हिंसक और क्रूर होती है यह उसका ताजा उदाहरण है।</p>
<p>वैसे भाषा और क्षेत्रवाद की राजनीति देश में नई बीमारी नहीं है। अलबता जातिवाद की राजनीति ने बहुत बाद में पांव जमाए, भाषा और क्षेत्रवाद की राजनीति बहुत पहले शुरू हो गई थी। तमिलनाडु में हिंदी विरोध का आंदोलन और पंजाब में हिंदी के खिलाफ पंजाबी सूबे का आंदोलन करीब-करीब एक ही समय चरम पर था। शुरू-शुरू में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पंजाबी सूबे के खिलाफ कड़ा स्टैंड लिया था। उन्होंने यह कह कर सिखों को भड़का दिया था कि भले कोई भी नतीजा निकले वह पंजाबी सूबा नहीं बनने देंगे। आखिर उन्हें भारी जनक्रोश का सामना करना पड़ा। नेहरू का जब देहांत हुआ तो पंजाब के हिंदी-पंजाबी की भिड़ंत चल रही थी और तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन चल रहा था। अकाली नेताओं ने पंजाबी सूबे के लिए आंदोलन कर के जेलें भर दीं और भूख हड़तालें शुरू कर दी। मास्टर तारा सिंह उस समय 76 साल के थे। उन्होंने 48 दिन तक भूख हड़ताल की, लेकिन बीच-बचाव में 48वें दिन भूख हड़ताल खत्म की तो सिखों ने उन्हें अपना नेता मानने से इंनकार कर दिया था। पंजाब में जहां अकाली भाषा के आधार पर राज्य बनाने की मांग कर रहे थे वहां हिंदू नेताओं ने हिंदुओं से अपील की कि उन्हें जनगणना में अपनी मातृभाषा पंजाबी की बजाए हिंदी लिखवानी चाहिए। इस तरह हिंदुओं और सिखों में भाषा को लेकर भारी तनाव पैदा हो गया था। इसी दौरान 1965 में जब भारत-पाक जंग हुई तो संत फतेह सिंह ने लाल बहादुर शास्त्री की आंदोलन बंद करने की अपील ठुकरा दी थी। शास्त्री के मांग मानने के आश्वासन के बाद ही फतेह सिंह ने आंदोलन खत्म किया। इंदिरा गांधी ने भाषा के आधार पर पंजाबी आधारित राज्य बनाने के लिए जनगणना करवाई, तो पंजाब के कई हिस्सों में हिंदुओं और सिखों में भाषा के नाम पर तनाव पैदा हो गया। जनसंघी हिंदू वोट बैंक पर कब्जे के लिए आर्य समाजियों के पीछे लगकर हिंदुओं को हिंदी लिखवाने के लिए अभियान चला रहे थे। ठीक उसी समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक गुरु गोलवलकर ने हिंदुओं से कहा कि वे अपनी मातृभाषा वही लिखवाएं जो वे अपने घरों में बोलते हैं, जिस भाषा में उनके शादी-ब्याह के समय गीत गाए जाते हैं। सरसंघ चालक ने दोनों समुदायों में भाईचारे के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाया था। लाल बहादुर शास्त्री के वायदे और इंदिरा गांधी की कोशिशों से भाषा के आधार पर खड़े हुए इस आंदोलन को राज्य का बंटवारा करके खत्म किया गया।  नतीजतन 18 सितंबर 1966 को पंजाब पुर्नगठन करके पंजाबी भाषी पंजाब और हिंदी भाषी हरियाणा बनाया गया। इंदिरा गांधी के समय भाषा की राजनीति शिखर पर थी, लेकिन उनके शासन काल का अस्त होने से पहले खत्म भी हो गई थी।</p>
<p>तमिलनाडु में भाषा का झगड़ा वैसे तो आजादी से पहले ही शुरू हो चुका था, लेकिन पंडित जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्वकाल में अपने उग्र रूप में आ गया। ब्रिटिश शासन के दौरान 1937 में जब मद्रास प्रेजीडेंसी में सी. राजगोपालाचार्य की रहनुमाई में पहली कांग्रेस सरकार बनी तो हिंदी को स्कूलों में लाजमी विषय के तौर पर लागू किया गया। तमिलनाडु के पहले गैर ब्राह्मण बैरिस्टर ए.टी. पेनिरसेलवम और पेरियार के नाम से मशहूर हुए ई.वी. रामास्वामी ने हिंदी विरोधी आंदोलन शुरू कर दिया। बाद में खुद राजा जी कांग्रेस की हिंदी नीति के खिलाफ खड़े हो गए। हालांकि 1940 में हिंदी के लाजिमी विषय के तौर पर हटा दिया गया था, लेकिन आजादी के बाद हिंदी को राजभाषा बनाया गया तो चालीस, पच्चास और साठ के दशक में बार-बार, जगह-जगह हिंदी विरोधी आंदोलन चलते रहे। तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री अन्नादुर्रई ने 1962 में संसद में अपने भाषण के दौरान कहा- &#8216;देश के हर स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाई जाती है। अंग्रेजी हमारी जोड़ने वाली भाषा क्यों नहीं बन सकती। तमिलनाडु के लोगों को बाकी सारी दुनिया से बात करने के लिए अंग्रेजी और भारतीयों से बात करने के लिए हिंदी क्यों पढ़नी पड़ेगी। क्या बड़े कुत्ते के लिए बड़ा दरवाजा बनाना पड़ेगा और छोटे कुत्ते के लिए छोटा दरवाजा। छोटे कुत्ते को भी बड़े कुत्ते वाला दरवाजा इस्तेमाल करना चाहिए।&#8217;</p>
<p>तमिलनाडु में उस समय  ही नहीं आज भी यह धारणा है कि अगर हिंदी उनके घरों में घुस गई तो उनकी सांस्कृतिक भाषा, प्राचीन संस्कृति और परंपराएं नष्ट हो जाएंगी। इस बारे में तमिल मुंबई का उदाहरण देते हैं, जहां मराठी संस्कृति पूरी तरह नष्ट हो गई है। इसी मराठी अस्मिता के नाम पर बाल ठाकरे राष्ट्रपति पद के चुनाव में हिंदी भाषी भैरों सिंह शेखावत के मुकाबले मराठी भाषी प्रतिभा पाटिल को समर्थन दे देते हैं। इसी मराठी अस्मिता के नाम पर राज ठाकरे मुंबई में गुजर-बसर करने वाले बिहारियों के छ्ठ का त्योहार मनाने को मराठी संस्कृति पर हमला बता देते हैं। इसी मराठी के नाम पर राज ठाकरे पहले दुकानों के हिंदी और अंग्रेजी भाषी बोर्डों को काले रंग से पुतवाते हैं और बाद में जया बच्चन के खिलाफ अभियान चला देते हैं। मराठी अस्मिता और मराठी भाषा की संस्कृति का दर्द कितना है यह सब जानते हैं। वोट बैंक की राजनीति मराठी अस्मिता से कहीं ज्यादा है और उससे भी ज्यादा है अपने चाचा बाल ठाकरे और चचेरे भाई उध्दव ठाकरे पर भारी पड़ने की जदोजहद।</p>
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		<title>बढ़ रहा है सत्ता का असंवैधानिक दुरुपयोग</title>
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		<pubDate>Fri, 05 Sep 2008 04:27:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[केंद्रीय मंत्री बेलगाम हो गए हैं, प्रधानमंत्री उनकी लगाम कसने में लाचार हैं। नतीजा यह निकला है कि मंत्री अपनी ही सरकार के फैसले की खुलेआम आलोचना कर रहे हैं और चुनी हुई राज्य सरकारों के खिलाफ अपने मंत्रालय से समानांतर सरकार चलाने लगे हैं।
बिहार में बाढ़ के पानी ने कहर ढाया तो वहां के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>केंद्रीय मंत्री बेलगाम हो गए हैं, प्रधानमंत्री उनकी लगाम कसने में लाचार हैं। नतीजा यह निकला है कि मंत्री अपनी ही सरकार के फैसले की खुलेआम आलोचना कर रहे हैं और चुनी हुई राज्य सरकारों के खिलाफ अपने मंत्रालय से समानांतर सरकार चलाने लगे हैं।</strong></p>
<p>बिहार में बाढ़ के पानी ने कहर ढाया तो वहां के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को राजनीतिक बिसात की याद आ गई। अपने यहां हर मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से देखने की गंभीर बीमारी पैदा हो गई है। <span id="more-382"></span>लालू यादव रेल मंत्रालय को अब उसी तरह अपनी बपोती की तरह चलाने लगे हैं जैसे उन्होंने बिहार के शासन को पारिवारिक बना दिया था। उन्होंने रेल मंत्रालय का बाढ़ की राजनीति के लिए ऐसे भरपूर इस्तेमाल किया जैसे बिहार के समानांतर एक सरकार गठित कर दी हो। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने रेल मंत्री को जिस तरह रेल मंत्रालय का बिहार सरकार के खिलाफ प्रचार करने की इजाजत दी है, वह भी लोकतंत्र में आई गिरावट का उदाहरण है। प्रधानमंत्री ने रेल मंत्रालय को बिहार की सरकार के समानांतर सरकार बनने दिया। इससे पहले कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि केंद्र का कोई मंत्रालय किसी राज्य सरकार के खिलाफ प्रचार अभियान का हथियार बनेगा।</p>
<p>केंद्र-राज्य संबंधों में टकराव की शुरूआत इंदिरा गांधी के जमाने में शुरू हुई थी जब उन्होंने अपनी सत्ता का दुरुपयोग करके अपनी पार्टी के मुख्यमंत्रियों का कठपुतली की तरह इस्तेमाल करना शुरू किया। इससे हुआ यह कि कांग्रेस के क्षत्रप कमजोर हो गए और क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ। क्षेत्रीय दलों का उदय भी इसलिए हो पाया, क्योंकि इंदिरा गांधी ने राज्यों के क्षत्रपों को अपमानित करना शुरू कर दिया था। दक्षिण में कांग्रेस के खिलाफ आक्रोश सबसे पहले पनपा था, दक्षिण में भी तमिलनाडु अव्वल रहा। तमिलनाडु के नए नेताओं ने इंदिरा गांधी की ओर से तमिल नेताओं को अपमानित करने को तमिलनाडु और द्रविड़ अपमान का मुद्दा बना दिया। नतीजा यह निकला कि कांग्रेस तमिलनाडु में बेहद कमजोर हो गई। राजीव गांधी ने नेतृत्व के अहंकार का अवगुण अपनी मां से लिया था और उन्होंने भी आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री टी. अंजैया का बेगमपेट हवाई अड्डे पर अपमान करके आंध्र में एनटीआर को उभरने का मौका दिया। केंद्र को मजबूत करके इंदिरा गांधी और उनके परिवार ने कांग्रेस की जड़ों में ही मट्ठा डाला।</p>
<p>अब बात और निम्न स्तर पर चली गई है। मनमोहन सिंह की सरकार इतनी डावांडोल है कि बिना क्षेत्रीय पार्टियों के समर्थन एक मिनट नहीं चल सकती। यह अलग बात है कि कांग्रेस ने वामपंथी दलों को इस्तेमाल करके पेपर नेपकिन की तरह फेंक दिया है, लेकिन वह क्षेत्रीय दलों के साथ ऐसा नहीं कर सकती। कांग्रेस ने अब यह मान लिया है कि वह अपने बूते पर फिर से सत्ता में नहीं आ सकती इसलिए उसने क्षेत्रीय दलों को अपनी ऐसी मजबूरी मान लिया है, जिसे ढोना ही पड़ेगा। इसलिए क्षेत्रीय दलों को मनमानी करने की छूट दे दी है। भले ही ऐसा करने से संविधान और संविधान की आत्मा को कितना ही आघात लगे। पहले द्रमुक को तमिलनाडु में उसकी प्रतिद्वंदी अन्नाद्रमुक पर असंवैधानिक प्रहार करने दिए। द्रमुक से जुड़े केंद्रीय मंत्री अन्ना द्रमुक की नेता जयललिता के खिलाफ केंद्रीय सत्ता का दुरुपयोग करने में जरा परहेज नहीं करते थे। ऐसा नहीं कि यह बीमारी मनमोहन सिंह के वक्त ही पैदा हुई हो, लेकिन उनके समय इस बीमारी ने विकराल रूप धारण कर लिया है। गठबंधन सरकार तो अटल बिहारी वाजपेयी की भी थी, लेकिन मनमोहन सिंह ऐसे लाचार प्रधानमंत्री बन गए हैं जिनका अपने मंत्रियों पर कोई कंट्रोल नहीं रहा। सत्ता के लिए पहले वह दागी नेताओं को मंत्री बनाने पर मजबूर हुए और बाद में उनके इशारों पर नाचने को मजबूर हैं। स्वास्थ्यमंत्री अंबूमणि रामदास ने आयुर्विज्ञान संस्थान के डायरेक्टर वेणुगोपाल को अपने घर का नौकर समझ कर हुक्म चलाने की कोशिश शुरू कर दी थी। आयुर्विज्ञान संस्थान को वह अपने निजी नर्सिंग होम की तरह चलाना चाहते थे। सुप्रीम कोर्ट ने एक नहीं अलबत्ता कई बार फटकार लगाई, लेकिन न स्वास्थ्य मंत्री सुधरे, न प्रधानमंत्री ने उन्हें सुधरने को कहा। स्वास्थ्य मंत्री ने दो बार वेणुगोपाल को पद से हटाने की कोशिश की। एक बार तो उन्हें हटाने के लिए मंत्रिमंडल ही नहीं, अलबत्ता संसद में बहुमत का भी बेजा इस्तेमाल किया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने स्वास्थ्य मंत्री को अपनी व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के लिए पिछली तारीख से वेणुगोपाल की कार्यावधि कम करके रिटायर करने की इजाजत दी। निजी स्वार्थ और घमंड की पूर्ति के लिए संसद का इस्तेमाल करने देना मनमोहन सिंह की महान गलतियों में से एक है। सुप्रीम कोर्ट में वह कानून भी असंवैधानिक घोषित हो गया।</p>
<p>कम से कम जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल तक यह शर्म बची हुई थी कि असंवैधानिक काम करते पकड़े जाने पर कोई मंत्री नहीं रह सकता था। बिहार के राज्यपाल पद का असंवैधानिक इस्तेमाल करके चुनावों के बाद वहां कोई सरकार न बनने देने और विधानसभा भंग करवाने पर सुप्रीम कोर्ट ने फटकारा तो मनमोहन सिंह ने बूटा सिंह से इस्तीफा ले लिया। जबकि उसी तरह का काम अंबूमणि रामदास ने भी किया था, लेकिन कुर्सी की अपनी मजबूरी में उनसे इस्तीफा नहीं मांगा। हालांकि दोनों ही असंवैधानिक कामों के लिए मनमोहन सिंह खुद जिम्मेदार थे। बिहार विधानसभा भंग करने का फैसला भी मनमोहन सिंह की रहनुमाई में केबिनेट ने लिया था और वेणुगोपाल का कार्यावधि घटाने के बिल को मंजूरी भी मनमोहन की रहनुमाई वाली केबिनेट ने दी थी। वेणुगोपाल के बारे में गलत फैसला करवाने का दबाव उनके मंत्री अंबूमणि रामदास का था और बिहार विधानसभा भंग करवाने का दबाव लालू यादव का था। सत्ता का बेजा इस्तेमाल करने से इन दो उदाहरणों के बाद क्षेत्रीय दलों के हौंसले कितने बढ़ गए हैं, इसका उदाहरण मुलायम सिंह की हां में हां मिलाते हुए सिमी के समर्थन में आए मंत्रियों के बयान से लगाया जा सकता है। रामविलास पासवान और लालू यादव ने सिमी पर लगे प्रतिबंध को नाजायज करार देकर अपनी ही सरकार की आलोचना की। मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी के नाते कोई मंत्री अपनी सरकार के किसी फैसले की आलोचना नहीं कर सकता, भले ही केबिनेट में उसने उस फैसले का विरोध किया हो। वह सिर्फ इस्तीफा देकर ही सार्वजनिक आलोचना कर सकता है, जैसे हाल ही में नारायण सिंह राणे ने मंत्री पद से इस्तीफा देकर विलासराव देशमुख सरकार के एक औद्योगिक घराने को कौड़ियों के भाव जमीन देने पर की है। राणे ने केबिनेट बैठक में इस फैसले का विरोध किया था, लेकिन बहुमत के आधार पर फैसला हो गया तो उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा देकर आलोचना की। लेकिन रामविलास पासवान और लालू यादव ने मंत्री पद पर रहते हुए अपनी ही सरकार के फैसले की आलोचना की। सिमी पर ताजा प्रतिबंध यूपीए सरकार ने फरवरी 2006 में लगाया था, पांच जुलाई 2006 को सुप्रीम कोर्ट ने उसकी पुष्टि की थी।</p>
<p>अब लालू यादव ने अपने गृहराज्य की चुनी हुई विरोधी गठबंधन की सरकार को बदनाम करने और अपनी असंवैधानिक समानांतर सत्ता कायम करने की शुरूआत करके लोकतंत्र और संविधान को तोड़ने का नया अध्याय शुरू कर दिया है। केंद्रीय मंत्रियों की इन हरकतों पर फौरन रोक न लगाई गई तो आने वाली केंद्रीय सरकारों के मंत्री अपने राज्य में अपनी-अपनी समानांतर सरकारें गठित करनी शुरू कर देंगे। केंद्रीय मंत्री जिला कलक्टरों को हिदायत देकर राज्य सरकार के खिलाफ बेजा इस्तेमाल करना शुरू कर देंगे क्योंकि प्रशासनिक अधिकारी  राष्ट्रीय प्रशासनिक सेवा के हिस्सा होते हैं। इसकी शुरूआत हो चुकी है, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसी इरादे से केंद्रीय मंत्रियों को गैर कांग्रेसी राज्यों में पार्टी अध्यक्ष और प्रभारी बनाकर भेजा है, ताकि प्रशासन पर दबदबा बनाने में मदद मिले।</p>
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		<title>गुजरात मॉडल ही बेड़ा पार करेगा भाजपा का</title>
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		<pubDate>Thu, 28 Aug 2008 18:50:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[कांग्रेस जीती तो सुभाष यादव को ही पेश करना पड़ सकता है पचौरी का नाम, रैलियों में प्रस्ताव पास करके कांग्रेसी मुख्यमंत्री नहीं बनते। मुख्यमंत्री तो विधायक दल की बैठक में सोनिया गांधी को अधिकृत करने वाले प्रस्ताव से ही तय होगा।
मध्य प्रदेश में चुनावी शतरंज के लिए बिसात बिछ गई है। कांग्रेस अभी तय [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>कांग्रेस जीती तो सुभाष यादव को ही पेश करना पड़ सकता है पचौरी का नाम, रैलियों में प्रस्ताव पास करके कांग्रेसी मुख्यमंत्री नहीं बनते। मुख्यमंत्री तो विधायक दल की बैठक में सोनिया गांधी को अधिकृत करने वाले प्रस्ताव से ही तय होगा।</strong></p></blockquote>
<p>मध्य प्रदेश में चुनावी शतरंज के लिए बिसात बिछ गई है। कांग्रेस अभी तय नहीं कर पा रही कि वह किसे चुनावी बारात का दूल्हा बनाए। हालांकि कांग्रेस में दूल्हों की कमी नहीं, अलबत्ता दूल्हे ज्यादा बाराती कम हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की राजनीति चुपके से काम करने की रहती है। <span id="more-366"></span>उन्होंने अर्जुन सिंह, कमलनाथ, दिग्विजय सिंह जैसे धुरंधरों को किनारे करके अपने वफादार और खामोशी से काम करने वाले सुरेश पचौरी को अपना प्रतिनिधि चुना है। मध्य प्रदेश के भावी नेता के तौर पर पेश करने के इरादे से ही सोनिया गांधी ने उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बना कर भेजा था। यही कांग्रेस की परंपरा भी रही है, दिग्विजय सिंह को भी चुनावों से पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी गई थी। उन्हीं की अध्यक्षता में चुनाव जीतने पर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया। राजस्थान में भी अशोक गहलोत को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर भेजा गया था जब उनकी रहनुमाई में कांग्रेस 1998 में चुनाव जीती तो उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया। सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने पर भी यही परंपरा लागू रही। पंजाब में अमरेंद्र सिंह को भी चुनाव से पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया गया था और चुनाव जीतने पर मुख्यमंत्री बनाया गया। इसी तरह गुलाम नबी आजाद को छह साल पहले जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भेजा गया था, नतीजों के बाद कांग्रेस-पीडीपी गठजोड़ में पहले पीडीपी के मुफ्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री बने और दूसरी पाली में गुलाम नबी आजाद को मुख्यमंत्री बनाकर भेजा गया। सोनिया गांधी ने राजशेखर रेड्डी को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाकर भावी मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट किया था। आंध्र प्रदेश के विजय भास्कर रेड्डी जैसे धुंरधर नेताओं ने शुरू में राजशेखर को पसंद नहीं किया था, लेकिन आखिरकार उन्हें झुकना पड़ा। मध्य प्रदेश के धुरंधर कांग्रेसी नेताओं को भी सुरेश पचौरी गले नहीं उतर रहे, तभी तो नेताओं की एकजुटता दिखाने के लिए बुलाई गई रैली में फूट सामने आ गई। हालांकि सुरेश पचौरी और कमलनाथ को एक ही खेमे के और आपस में करीबी माना जाता है लेकिन कमलनाथ को भी सुरेश पचौरी की अगुवाई रास नहीं आ रही। इसीलिए सुभाष यादव के माध्यम से रैली में कमलनाथ की रहनुमाई में विधानसभा चुनाव में उतरने और उन्हें ही मुख्यमंत्री बनवाने का प्रस्ताव पास करवा दिया गया। बड़ी हैरानी की बात है कि सारी जिंदगी कांग्रेस में गुजारने वाले कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और सुभाष यादव यह भी नहीं जानते कि कांग्रेस का मुख्यमंत्री कैसे बनता है। कांग्रेसी मुख्यमंत्री रैलियों में प्रस्ताव पास करके नहीं अलबत्ता विधायक दल की बैठकों में कांग्रेस अध्यक्ष को अधिकृत करने का प्रस्ताव पास करके बनता है। फिर दिल्ली से जो नाम भेजा जाता है उसे विधायक दल भी दुबारा बैठक बुलाकर पास करता है। क्या पता कांग्रेस के बहुमत में आने पर सुभाष यादव को ही विधायक दल की बैठक में सुरेश पचौरी का नाम पेश करने का फरमान जारी हो जाए। कांग्रेस की बागडोर जब नेहरू परिवार के किसी वारिस के हाथ में हो जो सारी जिंदगी कांग्रेस में गुजारने वाले की भी कोई हैसियत नहीं होती। सोनिया गांधी ने आखिर अर्जुन सिंह, नारायण दत्त तिवारी और प्रणव मुखर्जी जैसों को दरकिनार करके तेरह साल पहले कांग्रेस में शामिल हुए मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाकर सबका नेता बना दिया। आज अर्जुन सिंह जैसे दिग्गज राहुल गांधी जिंदाबाद के नारे लगाते दिखाई देते हैं, फिर भी उन्हें फटकार सहनी पड़ती है। ऐसे में रैलियों के प्रस्तावों की क्या अहमियत।</p>
<p>एक तरफ एकजुटता के लिए बुलाई गई कांग्रेस की रैली में कांग्रेसियों की महत्वाकांक्षा और एक-दूसरे से जलन सामने आ गई, तो दूसरी तरफ भाजपा अपने मौजूदा मुख्यमंत्री शिवराज चौहान को सामने करके चुनावी बिसात बिछा चुकी है। सोनिया गांधी अब भाजपा पर यह आरोप नहीं लगा सकती कि वह धर्म पर आधारित राजनीति करती है। खुद सोनिया गांधी ने राहुल गांधी को विधिवत लांच करने से पहले उज्जैन के महाकाल मंदिर में पूजा अर्चना की थी। अब शिवराज चौहान ने चुनाव आयोग की आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले महाकाल के मंदिर में पूजा अर्चना से चुनावी अभियान शुरू कर दिया है। नरेंद्र मोदी ने भी अपने चुनाव अभियान की शुरूआत एक मंदिर के प्रांगण से की थी। चौहान ने अपने राजनीतिक गुरु लालकृष्ण आडवाणी की परंपरा का अनुसरण करते हुए रथयात्रा शुरू कर दी है। रथयात्रा को हरी झंडी भी लालकृष्ण आडवाणी ने दी, राजनाथ सिंह की बजाए आडवाणी की मौजूदगी से ही स्पष्ट है कि पार्टी में अब किस का रुतबा क्या है। गुजरात विधानसभा चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी ने भी जब रथयात्रा शुरू की थी तो हरी झंडी लालकृष्ण आडवाणी ने ही दिखाई थी। हालांकि लालकृष्ण आडवाणी ने दिल्ली में हुए भाजपा अधिवेशन में जब सभी भाजपाई मुख्यमंत्रियों को चुनाव जीतने के लिए गुजरात मॉडल अपनाने की सलाह दी थी तो कई मुख्यमंत्रियों ने नाक-भौं सिकोड़ी थी। जबकि शिवराज सिंह चौहान से लेकर वसुंधरा राजे तक वही तौर-तरीका अपनाने को मजबूर हैं। नरेंद्र मोदी की चुनावी रणनीति को कर्नाटक में भी आजमाया गया था, जिसका भाजपा को अच्छा खासा फायदा हुआ। गुजरात मॉडल के दो पहलू हैं। पहला- आक्रामक चुनाव प्रचार और जन-जन तक पहुंचने का तौर-तरीका। दूसरा- उन विधायकों का टिकट काटना जिनसे जनता का मोह भंग हो चुका है। मध्यप्रदेश और राजस्थान में भाजपा के मौजूदा विधायकों में से 33 फीसदी के टिकट काटने की रणनीति सफल रही तो भाजपा के दुबारा सत्ता में आने की संभावना बन सकती है। वैसे भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह चुनाव वाले सभी पांचों राज्यों में से मध्यप्रदेश को सबसे कमजोर मानते हैं। लेकिन लालकृष्ण आडवाणी की सोच ऐसी नहीं है, आडवाणी के गुजरात फार्मूले पर अमल हुआ तो भाजपा मध्यप्रदेश की नैय्या पार कर सकती है। कांग्रेसी नेताओं की मुख्यमंत्री बनने की भूख भी भाजपा की मददगार होगी क्योंकि राज्य के सभी चार-पांच खेमे एक-दूसरे को मुख्यमंत्री बनने से रोकने के लिए एक-दूसरे के उम्मीदवारों को चूना लगाएंगे। आखिर उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव में नारायण दत्त तिवारी और हरीश रावत के खेमों ने एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाने के चक्कर में सत्ता गवाई ही है। बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है, 1996 के लोकसभा चुनाव में जब मध्यप्रदेश में कांग्रेस को जोरदार झटका लगा तो छोटे उम्मीदवारों ने कांग्रेसी मंत्रियों-विधायकों पर ही उन्हें हरवाने का आरोप लगाया था। वह सिर्फ आरोप नहीं था, आरोपों के साथ कई ठोस सबूत भी थे और उन्हीं सबूतों के आधार पर तत्कालीन प्रदेश प्रभारी कांग्रेस महासचिव सुधाकर राव नाइक ने दिग्विजय सरकार के छोटे-बडे 14 मंत्रियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया ही था।</p>
<p>चुनावों का ऐलान 15 सितंबर को हो सकता है और उसके साथ ही आचार संहिता लागू हो जाएगी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 15 सितंबर को आचार संहिता लागू होने की भनक के आधार पर ही 28 अगस्त को महाकाल मंदिर से रथयात्रा शुरू की है। यह रथयात्रा बीस दिन चलेगी, रथयात्रा के आखिरी दिन पार्टी की महारैली होगी, उसी दिन चुनावों का ऐलान हो जाएगा। बीस दिन, 3500 किलोमीटर और राज्य की 230 विधानसभाओं में से 130 सीटों का दौरा। शिवराज चौहान प्रचार में एक कदम आगे तो होंगे ही। चुनाव प्रचार में भाजपा का अभियान गुजरात और कर्नाटक की तरह बमबारमेंट शैली में ही होगा। भाजपा एक ही दिन 30-40 जगह से जनसभाएं करके चुनाव अभियान शुरू करेगी जबकि कांग्रेस के चुनाव अभियान का दारोमदार सोनिया गांधी के दौरों और राहुल गांधी के रोड शो पर निर्भर करेगा। कांग्रेस राज्य में भाजपा की ओर से पांच साल में तीन मुख्यमंत्री बदले जाने और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाएगी, जबकि भाजपा के पास ज्यादा कारगार महंगाई और आतंकवाद जैसे मुद्दे होंगे, जिनसे देश का आम आदमी पूरी तरह त्रस्त है। चुनाव में जिसका प्रचार अभियान हमलावर हुआ वही बाजी मारेगा। आज की तारीख में कांग्रेस का पलड़ा भारी दिखाई देता है, लेकिन चुनाव कभी भी पांच साल की उपलब्धियों और नाकामियों के आधार पर जीते या हारे नहीं जाते।</p>
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		<title>और अब अलगाववादियों का तुष्टिकरण</title>
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		<pubDate>Fri, 22 Aug 2008 03:34:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[अमरनाथ यात्रा के मार्ग में पड़ने वाले बालताल गांव के पास जंगलात विभाग की जमीन यात्रा के दौरान दो महीनों के लिए श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई थी। अलगाववादी हुर्रियत कांफ्रेंस की ओर से इसका कड़ा विरोध किए जाने के कारण गुलाम नबी सरकार ने अपने इस फैसले को वापस लिया। जम्मू कश्मीर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>अमरनाथ यात्रा के मार्ग में पड़ने वाले बालताल गांव के पास जंगलात विभाग की जमीन यात्रा के दौरान दो महीनों के लिए श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई थी। अलगाववादी हुर्रियत कांफ्रेंस की ओर से इसका कड़ा विरोध किए जाने के कारण गुलाम नबी सरकार ने अपने इस फैसले को वापस लिया। जम्मू कश्मीर के लोग इसे तत्कालीन कांग्रेस सरकार की आतंकवादियों के तुष्टिकरण का कदम मानते हैं। यही वजह है कि दो महीने बीत जाने के बावजूद जम्मू के लोगों का आंदोलन मध्यम नहीं पड़ा है। <span id="more-353"></span>जम्मू के लोग अपने आंदोलन को धार्मिक भावनाओं के साथ जोड़कर नहीं देखते, अलबत्ता राष्ट्रीय भावनाओं से जोड़कर देखते हैं। कश्मीरी मुसलमानों के दबाव में केंद्र और राज्य सरकार पिछले साठ साल से जम्मू के साथ भेदभाव करती रही है। दलील यह दी जाती रही कि कश्मीर को भारत के साथ रखना है। श्री अमरनाथ संघर्ष समिति का कहना है कि कश्मीर को अपने साथ रखने के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण तक तो ठीक था, आतंकवादियों के तुष्टिकरण को कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यह भावना सिर्फ संघर्ष समिति के नेताओं की नहीं, अलबत्ता पूरे जम्मू के हिंदुओं की भावना है। यही वजह है कि पिछले दो महीनों में जम्मू का आंदोलन सांप्रदायिक आधार पर नहीं, अलबत्ता राष्ट्रीय भावना के आधार पर खड़ा हो गया है। इन दो महीनों में जम्मू क्षेत्र में जितने राष्ट्रीय ध्वज बिके हैं, उतने पिछले साठ साल में नहीं बिके। जम्मू के लोग राष्ट्रीय ध्वज लेकर सड़कों पर उतरते हैं तो अर्ध्द सैनिक बल और सेना के लिए गंभीर संकट खड़ा हो जाता है। एक तरफ कश्मीर घाटी में पाकिस्तान और इस्लामिक झंडा लेकर आंदोलनकारी सड़कों पर उतर रहे हैं, तो दूसरी तरफ जम्मू में राष्ष्ट्रीय ध्वज आंदोलन का केंद्र बिंदु बन गया है।</p>
<p>हुर्रियत कांफ्रेंस ने श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन का विरोध की सांप्रदायिकता के आधार पर किया था, गुलाम नबी सरकार को समर्थन दे रही पीडीपी ने मुस्लिम वोट बैंक के लिए हुर्रियत कांफ्रेंस की मांग का समर्थन किया। घाटी के सारे मुस्लिम वोट पीडीपी को जाते देख नेशनल कांफ्रेंस ने भी श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने का विरोध कर दिया। लेकिन अब जब घाटी में चल रहा आंदोलन पूरी तरह भारत विरोधी हो गया है, तो नेशनल कांफ्रेंस खुद को दुविधा में महसूस कर रही है। लोकसभा में विश्वास मत के समय सांप्रदायिक भाषण देने पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत यूपीए के सभी सांसदों ने मेजें थपथपाई थीं। जबकि अब उमर अब्दुल्ला और फारुख अब्दुल्ला भी श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दो महीने के लिए जमीन देने का विरोध नहीं कर रहे। नेशनल कांफ्रेंस को अब जाकर समझ आया है कि गुलाम नबी सरकार से दबाव में फैसला करवाने के कितने गंभीर नतीजे निकल रहे हैं। असल में गुलाम नबी आजाद को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और गृह मंत्री शिवराज पाटिल का समर्थन मिल जाता, तो वह शायद ही जमीन का आवंटन रद्द करने को तैयार होते। गुलाम नबी आजाद चारों तरफ से दबाव में घिर गए थे।</p>
<p>अलगाववादियों के दबाव में आकर श्राइन बोर्ड की जमीन रद्द करके अब पर्यटन विभाग को यात्रियों की सुविधाओं का जिम्मा देना संविधान के अनुच्छेद 26 और 27 का उल्लंघन भी है। संविधान के अनुच्छेद 26 के मुताबिक धार्मिक संगठनों को धार्मिक स्थलों का प्रबंधन करने का हक है। इसी हक के तहत गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी गुरुद्वारों का और वक्फ बोर्ड मुस्लिम धार्मिक संस्थाओं का प्रबंध देखते हैं। संविधान के अनुच्छेद 27 के मुताबिक सेक्युलर सरकार करदाताओं का धन धार्मिक मामलों पर खर्च नहीं करेगी। इसीलिए धार्मिक स्थलों के रख-रखाव और सुविधाएं मुहैया करवाने के काम के लिए श्राइन बोर्ड जैसी कानूनन संस्थाएं गठित की जाती हैं। श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड तो खुद जम्मू कश्मीर विधानसभा ने गठित किया था, इसलिए अब यात्रियों को सुविधाएं मुहैया करवाने का काम पर्यटन मंत्रालय को दिया जाना संविधान के अनुच्छेद 26 और 27 का खुला उल्लंघन भी है। गुलाम नबी सरकार ने जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट के पंद्रह अप्रेल 2005 के फैसले और जम्मू कश्मीर विधानसभा की ओर से पास किए गए श्राइन एक्ट 2000 के मुताबिक श्राइन बोर्ड को यात्रियों को सुविधाएं मुहैया करवाने के लिए 39.88 हेक्टेयर जमीन अलॉट की थी। श्राइन बोर्ड लंबे समय से यात्रियों को सुविधाएं मुहैया करवाने के लिए जमीन मांग रहा था, राज्य सरकार जमीन नहीं दे रही थी, इसलिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई, इस याचिका पर फैसला पंद्रह अप्रेल 2005 को आया। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि बोर्ड को फौरन जमीन उपलब्ध करवाई जाए। राजीव गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन करते हुए तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के गुजारा भत्ते का हक खत्म किया था, तो मौजूदा केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट के फैसले का उल्लंघन करके आवंटित की गई जमीन रद्द की है।</p>
<p>सवाल खड़ा होता है कि सरकारें सांप्रदायिक आधार पर फैसले क्यों लेती हैं, सांप्रदायिक दबाव में फैसले क्यों लेती हैं, वोट बैंक के लिए फैसले क्यों लेती हैं और वोट बैंक के लिए फैसले क्यों बदलती हैं। श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने और जमीन रद्द करने के दोनों फैसलों का आधार ऊपर लिखे चारों कारण हैं। हुर्रियत कांफ्रेंस के विरोध के कारण कांग्रेस आलाकमान को लगा कि इससे उसकी चार साल की मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति का बंटाधार हो जाएगा। इसलिए सोनिया गांधी और गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने गुलाम नबी आजाद और राज्यपाल एनएन वोहरा पर श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन रद्द करने का दबाव बनाया। राज्यपाल एनएन वोहरा कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ रहे हैं, अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे, तो उन्होंने वोहरा को कश्मीर से जुड़े मामले देखने को कहा था। वोहरा की विशेषज्ञता को देखते हुए मनमोहन सरकार ने भी उन्हें यह काम सौंपे रखा। राजग शासनकाल के समय नियुक्त राज्यपाल सिन्हा का कार्यकाल खत्म हुआ, तो शिवराज पाटिल ने वोहरा को राज्यपाल बनाकर भिजवा दिया। नए-नए राज्यपाल बने वोहरा ने केंद्र सरकार के दबाव में आकर श्राइन बोर्ड के अध्यक्ष के नाते जमीन स्वीकार नहीं करने का फैसला किया। राज्यपाल का यह फैसला सुनाए जाने से पहले ही खबरें छप गई थीं कि राज्यपाल खुद जमीन लेने से इंकार कर देंगे, बाद में यही हुआ भी। इससे स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री और राज्यपाल पर केंद्र सरकार और कांग्रेस आलाकमान का कितना दबाव था।</p>
<p>शाहबानो केस के समय राजीव गांधी ने महिला विरोधी कट्टरपंथियों के दबाव में आकर मुस्लिम तुष्टिकरण शुरू किया था, लेकिन अब जंगलात विभाग की जमीन के मामले में आतंकवादियों और अलगाववादियों के तुष्टिकरण की भारत विरोधी राजनीति शुरू हो गई है। जम्मू कश्मीर की मौजूदा समस्या हिंदू बनाम मुसलमान नहीं है, इसे हिंदू बनाम मुसलमान बनाया जा रहा है, यह समस्या जम्मू बनाम कश्मीर भी नहीं है। अलबत्ता आतंकवादियों और अलगाववादियों के दबाव में आकर सरकार की ओर से लिए गए फैसले के कारण राष्ट्रवादियों बनाम राष्ट्र विरोधियों की समस्या बन गई है। इसे सिर्फ जम्मू के लोग इस नजर से नहीं देख रहे हैं अलबत्ता पूरे देश में इसी नजर से देखा जा रहा है। यूपीए सरकार का जमीन रद्द करवाने का कदम कोई पहला कदम नहीं है, जिससे देश की जनता में आतंकवादियों के तुष्टिकरण वाली सरकार की धारणा बनी हो। इससे पहले पोटा कानून को मुस्लिम विरोधी बताकर रद्द करना आतंकवादियों का तुष्टिकरण था। उसके बाद गृह मंत्री शिवराज पाटिल की ओर से संसद पर हमले की साजिश रचने वाले अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाने के बजाए उसकी पैरवी करना आतंकवादियों का तुष्टिकरण था। अब इस तीसरे कदम ने यूपीए सरकार की आतंकवादियों के तुष्टिकरण की राजनीति पर मुहर लगा दी है।</p>
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		<title>जम्मू-कश्मीर में सभी कर रहे हैं- सांप्रदायिक राजनीति</title>
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		<pubDate>Fri, 08 Aug 2008 08:21:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[गुलामनबी आजाद भले ही खुले तौर पर न मानें, लेकिन वास्तविकता यही है कि जम्मू कश्मीर के चुनाव नजदीक होने के कारण पीडीपी को मिलने वाले मुस्लिम वोटों के फायदे को रोकने के लिए ही उन्होंने श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन वापस ली थी। इससे साबित होता है कि जम्मू कश्मीर की [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>गुलामनबी आजाद भले ही खुले तौर पर न मानें, लेकिन वास्तविकता यही है कि जम्मू कश्मीर के चुनाव नजदीक होने के कारण पीडीपी को मिलने वाले मुस्लिम वोटों के फायदे को रोकने के लिए ही उन्होंने श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन वापस ली थी। इससे साबित होता है कि जम्मू कश्मीर की मौजूदा सांप्रदायिक आग जम्मू के हिंदुओं की वजह से नहीं है, अलबत्ता घाटी के मुस्लिम वोट हासिल करने के लिए पीडीपी की ओर से अपनाई गई सांप्रदायिकता है। यही वजह है कि कांग्रेस बचाव की मुद्रा में है, क्योंकि जम्मू कश्मीर की सियासत उसके लिए दो धारी तलवार बन गई है। <span id="more-339"></span>बुधवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर से बुलाई गई सर्वदलीय बैठक से पहले यूपीए की बैठक  में सारे घटनाक्रम की जानकारी देते हुए गुलामनबी आजाद यह सफाई नहीं दे पाए कि उनका पहले वाला कदम सही था या बाद वाला। अगर हम पहले कदम की तह में जाएं, तो पाएंगे कि श्राइन बोर्ड को जमीन देने के फैसले की बाबत जम्मू कश्मीर के जंगलात विभाग के प्रमुख सचिव माधव लाल ने केबिनेट के लिए जो नोट तैयार किया था, उसमें सुप्रीम कोर्ट की राय लेने को कहा गया था, दलील दी गई थी कि सत्ताईस अप्रेल 2007 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अंतरिम फैसले में हिदायत दी थी कि जंगलात विभाग की जमीन किसी अन्य काम के लिए हस्तांतरित किए जाने से पहले अदालत की इजाजत ली जाए। लेकिन गुलामनबी आजाद ने जंगलात विभाग के सचिव की सलाह को दरकिनार करते हुए श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को यात्रियों को सुविधाएं मुहैया करवाने के लिए जंगलात विभाग की सौ एकड़ जमीन को केबिनेट की मंजूरी दिला दी। हालांकि यह बात अलग है कि श्राइन बोर्ड की याचिका पर विभाग  ने यह जमीन स्थाई काम्प्लैक्स बनाने के लिए देने की सिफारिश की थी, लेकिन केबिनेट ने सिर्फ यात्रा के दौरान इस्तेमाल करने के लिए देने का फैसला किया। गुलामनबी आजाद और कांग्रेस के नेता अब यह कहते हैं कि उन पर जमीन देने के लिए तत्कालीन राज्यपाल एस के सिन्हा का दबाव था और पीडीपी की सांप्रदायिक राजनीति के कारण जमीन रद्द करने का फैसला करना पड़ा। लेकिन वास्तविकता कुछ और है, गुलामनबी आजाद शुरू से ही जम्मू की राजनीति कर रहे थे, क्योंकि घाटी में कांग्रेस की कोई गुंजाइश नहीं बची। घाटी से कश्मीरी पंडित तो जा ही चुके हैं, मुसलमान या तो नेशनल कांफ्रेंस के साथ हैं, या कट्टरवादी पीडीपी के साथ। विधानसभा के पिछले चुनाव में भी कांग्रेस को जम्मू की 37 में से 17 सीटें मिली थी, गुलामनबी आजाद की राजनीति जम्मू में कांग्रेस का आधार बढ़ाने की थी। इसलिए जब तत्कालीन राज्यपाल एसके सिन्हा ने श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड के अध्यक्ष के नाते जंगलात विभाग की सौ एकड़ जमीन यात्रियों को सुविधाएं मुहैया करवाने के लिए देने की सिफारिश की, तो गुलामनबी आजाद ने इसे जम्मू में कांग्रेस का आधार बढ़ाने का हथियार समझते हुए मंजूरी दी थी।</p>
<p>कांग्रेस जम्मू में अपना आधार मजबूत करने के लिए मंदिर का इस्तेमाल कर रही थी, तो वह कतई सांप्रदायिक नहीं था। लेकिन जब उसी मंदिर को जमीन दिलाने के लिए भाजपा आंदोलन कर रही है, तो यह सांप्रदायिक है। गुलामनबी आजाद हिंदू सांप्रदायिकता कर रहे थे, लेकिन जब घाटी में इसके जवाब में मुस्लिम सांप्रदायिकता हो गई, तो उन्हें मजबूरी में अपना कदम पीछे हटाना पड़ा। मुख्यमंत्री की कुर्सी फिर भी नहीं बची, क्योंकि पीडीपी को कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने से कोई फायदा नहीं होने वाला। अगर पीडीपी को कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने से फायदा होता, तो गुलामनबी सरकार गिरने से बच सकती थी, क्योंकि गुलामनबी ने पीडीपी के दबाव में श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन तो वापस ले ही ली थी। जम्मू की राजनीति में औंधे मुंह गिरने और मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवाने के बाद अब दिल्ली आकर गुलामनबी आजाद भाजपा पर मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने का आरोप लगा रहे हैं। लेकिन मौजूदा हालात के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो वह सिर्फ गुलामनबी आजाद हैं, जिन्होंने जंगलात विभाग की सलाह को दरकिनार करके अपनी सुविधाजनक राजनीति के लिए श्राइन बोर्ड को जमीन देने का फैसला किया था।</p>
<p>श्राइन बोर्ड को जमीन देने के बाद हुर्रियत कांफ्रेंस ने जब आंदोलन शुरू किया, तो मांग जमीन का आवंटन रद्द करने की नहीं थी, अलबत्ता गवर्नर की रहनुमाई वाले श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड से बाहरी लोगों को निकालकर बोर्ड का पुनर्गठन करने की थी। तत्कालीन राज्यपाल एसके सिन्हा ने जो बोर्ड बनाया था, उनमें से आधों का कुछ अता-पता नहीं था। कोई मेरठ का रहने वाला था तो कोई अंबाला का। आठ सदस्यों में से सिर्फ दो कश्मीरी पंडित थे। इसलिए हुर्रियत कांफ्रेंस को यह अफवाह फैलाने का मौका मिल गया कि श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन जम्मू कश्मीर से बाहर के लोगों को चोर दरवाजे से जमीन पर कब्जा करवाने की साजिश  है। जम्मू कश्मीर में क्योंकि बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते, इसलिए हुर्रियत कांफ्रेंस को भड़काने का मौका मिल गया। श्राइन बोर्ड को जमीन रद्द करने  की मांग पीडीपी ने की, क्योंकि वह इस मुद्दे का राजनीतिक फायदा उठाना चाहते थे। पीडीपी को राजनीतिक हथियार भी तत्कालीन राज्यपाल के सचिव और बोर्ड के सदस्य अरुण कुमार ने मुहैया करवाया। केबिनेट  के फैसले के अगले दिन अरुण कुमार ने एक प्रेस कांफ्रेंस करके कहा कि श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन स्थाई है। उनसे पूछा गया कि यह जमीन कब तक श्राइन बोर्ड के पास रहेगी, तो उन्होंने कहा कि जब तक दुनिया है, तब तक यात्रा चलती रहेगी, जब यात्रा चलती रहेगी, तब तक श्राइन बोर्ड इस जमीन का यात्रियों को सुविधाएं मुहैया करवाने के लिए इस्तेमाल करेगा। अरुण कुमार की इस प्रेस कांफ्रेंस के अगले दिन ही घाटी में आंदोलन ने जोर पकड़ लिया और पीडीपी ने फौरन मौके का फायदा उठाया। इसलिए मौजूदा हालात के लिए गुलामनबी आजाद के बाद पीडीपी जिम्मेदार है। पीडीपी की ओर से जमीन वापस मांगने का आंदोलन खड़ा किए जाने के बाद नेशनल कांफ्रेंस ने भी यही मांग रख दी, क्योंकि उसे भी चुनाव के वक्त घाटी के सौ फीसदी मुस्लिम वोटरों को जवाब देना था। कुल मिलाकर सारी राजनीति घाटी के मुस्लिम वोटरों के इर्द-गिर्द घुमती रही। गुलामनबी आजाद को मजबूरी में जम्मू की जनता की भावनाएं दरकिनार करनी पड़ी। जम्मू की जनता जब उठ खड़ी हुई और घाटी की तरफ जाने वाले रास्ते बंद कर दिए गए, तो केंद्रीय गृहमंत्रालय गहरी नींद से जागा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 31 जुलाई को विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी को बुलाकर कहा कि कश्मीर घाटी की आर्थिक नाकेबंदी अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन जाएगा, इसलिए भाजपा को दखल देकर इस आंदोलन को तुरंत रुकवाना चाहिए। यह बात सही भी थी, क्योंकि घाटी में जिंदगी जरूरिआत की चीजों का आभाव पैदा होने से पड़ोसी देश पाकिस्तान को राहत सामग्री भेजने के लिए संयुक्त राष्ट्र में मसला उठाने का मौका मिलता। लालकृष्ण आडवाणी ने इस नाजुक हालात को समझकर बाकायदा जम्मू में एक बयान जारी किया, जिसमें सेबों के ट्रक जम्मू कश्मीर से बाहर जाने देने और खाद्य सामग्री कश्मीर जाने देने की अपील जारी की। जहां एक तरफ आडवाणी ने जम्मू के आंदोलनकारियों  को समझाने बुझाने की कोशिश की वहां भाजपा ने श्री अमरनाथ श्राइन को जमीन देने के मुद्दे को जोरदार ढंग से उठाने का फैसला भी किया। क्योंकि कांग्रेस अगर अपनी राजनीतिक मजबूरी के तहत श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन वापस ले सकती है, तो भाजपा भी अपनी राजनीतिक मजबूरी के कारण आंदोलन से अलग-थलग नहीं रह सकती। इसलिए यह कहना कि एक राजनीतिक दल सांप्रदायिक राजनीति कर रहा है, ठीक नहीं है, जम्मू कश्मीर का मौजूदा आंदोलन सभी राजनीतिक दलों की सांप्रदायिकता पर आधारित है।</p>
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		<title>वोट-नोट की सियासत में मीडिया के भी जले हाथ</title>
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		<pubDate>Fri, 01 Aug 2008 04:18:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पहले खुद स्टिंग आपरेशन में शामिल होकर पीछे हटने से सीएनएन-आईबीएन चैनल की विश्वसनीयता को भाजपा ने कटघरे में खड़ा कर दिया है। चैनल का बायकाट मीडिया को सियासत से दूर रखने पर सोचने के लिए बाध्य करे, तो मीडिया का ही भला होगा।
कांग्रेस ने लोकसभा में वोट की सियासत भले ही जीत ली हो, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>पहले खुद स्टिंग आपरेशन में शामिल होकर पीछे हटने से सीएनएन-आईबीएन चैनल की विश्वसनीयता को भाजपा ने कटघरे में खड़ा कर दिया है। चैनल का बायकाट मीडिया को सियासत से दूर रखने पर सोचने के लिए बाध्य करे, तो मीडिया का ही भला होगा।</strong></p></blockquote>
<p>कांग्रेस ने लोकसभा में वोट की सियासत भले ही जीत ली हो, नोट की सियासत में अभी बुरी तरह उलझी हुई है। जिस तरह नोटों का बंडल दराज में रखते बंगारू लक्ष्मण भाजपा का पीछा नहीं छोड़ रहे, वैसे ही लोकसभा के टेबल पर रखी गई नोटों की गड्डियां कभी भी कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़ेंगी। <span id="more-330"></span>कांग्रेस 1996 में सत्ता से बाहर हुई तो दो बातें छोड़कर गई थी। पहली बात थी- बोफोर्स घोटाले के मुख्य अभियुक्त ओतोवियो क्वात्रोची को रात के अंधेरे में भारत से भगा देना और दूसरी बात थी- 1993 में सांसदों की खरीद-फरोख्त करके सरकार को बचाना। कांग्रेस आठ साल बाद सत्ता में लौटी तो उसकी सियासत में कोई फर्क नहीं पड़ा। कांग्रेस ने अपनी गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा। सत्ता में आने के बाद फिर वही दोनों गलतियां दोहराई गई हैं। पहली- ओतोवियो क्वात्रोची के सील खातों को खुलवाकर उसकी मदद करना और दूसरी- सांसदों की खरीद-फरोख्त करके मनमोहन सिंह की सरकार बचाना। कांग्रेस ने वोटों और नोटों की सियासत को गङ्ढमङ्ढ कर दिया है।</p>
<p>कांग्रेस आजादी के बाद से ही अल्पसंख्यकों को लुभाने वाले नारे लगाकर और गरीबों का वोट हासिल करने वाले ठेकेदारों को सरकारी खजाना लुटाकर सत्ता में बनी रही थी। लेकिन नरसिंह राव के शासनकाल में सत्ता में बने रहने के इन दोनों आधारों को कड़ा झटका लगा, क्योंकि नरसिंह राव भारत को सही मायनों में विकास की पटरी पर लाना चाहते थे। खास वर्ग के वोटरों को लुभाने वाली पैंतरेबाजी और सरकारी खजाना ठेकेदारों को लुटाने वाली रणनीति को नरसिंह राव के शासनकाल में पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया था। भले ही नरसिंह राव ने अपनी सरकार सांसदों की खरीद-फरोख्त से बचाई थी, लेकिन उन्होंने हवाला कांड में फंसे अपने आधा दर्जन मंत्रियों को पार्टी का टिकट देने से इंकार कर दिया था। कांग्रेस के रणनीतिकार ऐसा मानते रहे हैं कि 1992 में बाबरी ढांचा बचाने में नाकामी की वजह से मुसलमान उससे दूर चले गए हैं और नरसिंह राव के शासनकाल में मानवीय चेहराविहीन उदारवाद ने गरीबों को उससे दूर कर दिया है। इसलिए कांग्रेस ने सत्ता में आते ही अपने इन दोनों वोट बैंकों को लुभाने के लिए इनफ्रास्टक्चर और विकास की गाड़ी को पटरी से उतार दिया। सत्ता में दुबारा लौटते ही कांग्रेस ने भारत निर्माण और ग्रामीण रोजगार गारंटी जैसी दो बड़ी योजनाएं शुरू की, जिनसे केंद्र सरकार का करोड़ों-अरबों रुपया गरीबों के नाम पर वोट दिलाने वाले ठेकेदारों की तिजोरी में भरना शुरू हो गया। अब खुद केंद्र सरकार की एजेंसियां इन दोनों कार्यक्रमों को फ्लाप और खजाने का दुरुपयोग बता रही हैं। कांग्रेस ने सरकार संभालते ही दूसरा काम अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए सरकारी तिजोरी खोलने का किया, जो अब तक जारी है। कुल मिलाकर कांग्रेस सरकार की योजनाएं अपने वोट बैंक को मजबूत करने पर आधारित रही हैं और पिछले हफ्ते लोकसभा में विश्वासमत के दौरान वोट की राजनीति के अलावा नोट की राजनीति का भंडाफोड़ भी हुआ।</p>
<p>वोट और नोट की राजनीति में महारत के अलावा कांग्रेस मीडिया मैनेजमेंट में भी अपनी प्रमुख प्रतिद्वंदी भाजपा पर भारी पड़ती रही है। एनडीए सरकार के समय हुए तहलका को भाजपा शुरू से ही कांग्रेस प्रायोजित साजिश बताती रही है। तहलका के माध्यम से एनडीए सरकार के मंत्रियों को भ्रष्टाचार में फंसाने वाली टीम का एक सदस्य कांग्रेस मुख्यालय का पूर्व कर्मचारी था। लेकिन कांग्रेस की महारत सिर्फ एनडीए राज के समय ही नहीं, अलबत्ता यूपीए राज में भी साबित हुई। उसी तहलका टीम के माध्यम से संसद में सवाल पूछने के बदले रिश्वत देने का स्टिंग आपरेशन करके भाजपा के आठ सांसदों को संसद से बाहर करवाने में भी कांग्रेस की मीडिया मैनेजमेंट की महारत साबित हुई। जबकि भाजपा मीडिया मैनेजमेंट के मामले में एकदम फिसड्डी साबित हुई है। भाजपा के महासचिव अरुण जेटली ने पहली बार सांसद खरीद-फरोख्त का भंडाफोड़ करवाने के लिए स्टिंग आपरेशन करवाया था। सीएनएन के संपादक राजदीप सरदेसाई ने आपरेशन का सारा जिम्मा अपने पत्रकार सिध्दार्थ गौतम को सौंपा था। लेकिन सब कुछ हो जाने के बाद सीएनएन-आईबीएन चैनल स्टिंग आपरेशन अपने चैनल पर दिखाने से मुकर गया। सीएनएन-आईबीएन के संपादक राजदीप सरदेसाई ने गुजरात में दंगों के वक्त नरेंद्र मोदी के खिलाफ अहम भूमिका निभाई थी। कांग्रेस ने उनकी भूमिका से खुश होकर उनको पद्मश्री की उपाधि से सम्मानित करवाया। सांसद खरीद-फरोख्त का भंडाफोड़ने के लिए हुए स्टिंग आपरेशन को चैनल पर दिखाने की पूरी तैयारी हो चुकी थी। चैनल ने तीनों सांसदों का इंटरव्यू भी कर लिया था, योजना यह थी कि जैसे ही सांसद लोकसभा में जाकर भंडाफोड़ करेंगे, चैनल स्टिंग आपरेशन को भी साथ-साथ प्रसारित करना शुरू कर देगा। लेकिन जब सारा देश लोकसभा टीवी का सीधा प्रसारण देख रहा था, जिसमें भाजपा के तीनों सांसद एक करोड़ रुपया सदन पटल पर रख रहे थे, तब राजदीप सरदेसाई ने अपने चैनल पर आकर कहा कि यह स्टिंग आपरेशन उनके चैनल ने किया था, लेकिन वह अभी अधूरा ही था इसलिए चैनल ने उसे नहीं दिखाने का फैसला किया है। उन्होंने यह भी कहा कि जितना भी स्टिंग आपरेशन हुआ है, उसकी टेप पांच मिनट बाद वह लोकसभा स्पीकर को सौंप देंगे। लेकिन राजदीप सरदेसाई ने उस दिन संसद भवन में मौजूदगी के बावजूद वह टेप स्पीकर को नहीं सौंपी। स्पीकर को वह टेप लालकृष्ण आडवाणी की प्रेस कांफ्रेंस के बाद दी गई। खुद पर कीचड़ उछाले जाने से आहत होकर राजदीप सरदेसाई ने स्टिंग आपरेशन न दिखाने की वजहें बताते हुए लंबा-चौड़ा बयान जारी किया। जिसमें प्रसिध्द वकील हरीश साल्वे को ढाल की तरह इस्तेमाल किया गया है। सीएनएन-आईबीएन के बयान में साल्वे ने सलाह दी है कि चैनल संसदीय कमेटी की जांच रपट का इंतजार करे। बयान में सीएनएन ने यह भी कहा है कि उसका स्टिंग आपरेशन अभी अधूरा था। लेकिन सच यह नहीं है, अलबत्ता स्टिंग आपरेशन प्रसारित करने के लिए तीनों सांसदों का इंटरव्यू भी कर लिया गया था। भाजपा पहली बार इस चैनल के खिलाफ हमलावर हुई है। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू ने चैनल पर सियासत में शामिल होने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि स्टिंग आपरेशन को प्रसारित नहीं करके चैनल ने पत्रकारिता की सारी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया है। उनकी दलील यह है कि मीडिया का काम सूचनाएं हासिल करके जनता के सामने रखना होता है न कि जांच करके उसका फैसला सुनाना। यह काम जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया पर छोड़ देना चाहिए। सिर्फ भाजपा ही नहीं बल्कि देश में अब यह आम धारणा बन गई है कि चैनल ने यूपीए सरकार के दबाव में आकर स्टिंग आपरेशन को प्रसारित नहीं किया।</p>
<p>सवाल पैदा होता है कि क्या कांग्रेस ने वोट और राजनीति के अलावा मीडिया को भी अपना राजनीतिक हथियार बनाने में सफलता हासिल कर ली है। छोटे स्तर पर राजनीतिक दल मीडिया का अपने हितों के लिए उपयोग करते रहे हैं, लेकिन तहलका के बाद यह पहली बार हुआ है कि मीडिया सियासत में उलझा हुआ दिखाई दे रहा है। संभवत: यह भी पहली बार हो रहा है कि भारत के प्रमुख राजनीतिक दल ने सीएनएन-आईबीएन के बायकाट जैसा बड़ा कदम उठाकर मीडिया की निष्पक्षता को कटघरे में खड़ा कर दिया है। गुजरात के दंगों से पहले मीडिया की प्रमुख हस्तियों ने मोटे तौर पर अपनी निष्पक्ष छवि बनाई हुई थी, लेकिन गुजरात के बाद कई बड़ी मीडिया हस्तियों की सियासत स्पष्ट हो चुकी है। लोकसभा में बहुमत साबित करने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त के इस ताजा प्रकरण ने मीडिया की सियासत को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। भ्रष्टाचार के मामलों में बार-बार भाजपा के सांसद फंसने पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि समाज में जो गिरावट आई है, उसका असर भाजपा सांसदों पर भी पड़ा है। पिछले साठ सालों में भारत की सियासत का स्तर तो गिरा ही है, मीडिया भी सियासतदानों की जमात में शामिल होने से बच नहीं सका है। वोट और नोट की सियासत में मीडिया ने भी अपने हाथ जला लिए हैं। मीडिया को इस घटनाक्रम से सबक लेकर सियासतदानों की सियासत से दूर रहने का मौका दिया है।</p>
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