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	<title>Socio Political News &#187; Open space twitting</title>
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	<description>News Articles and Reactions</description>
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		<title>रूस और अमेरिका दोनों के लिए भारत सिर्फ मार्केट</title>
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		<pubDate>Sat, 27 Jan 2007 18:29:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[बीते हफ्ते चौदहवीं लोकसभा के मध्यावधि सर्वेक्षणों की धूम रही। दो निजी चैनलों और उनके प्रिंट मीडिया ने सर्वेक्षण एजेंसियों के साथ मिलकर मध्यावधि सर्वेक्षण करवाए। दोनों औद्योगिक घरानों का मकसद सिर्फ अपनी टीआरपी बढ़ाना था। अगर एक चैनल अपना जन सर्वेक्षण जारी कर दे और टुकड़ों-टुकड़ों में जारी कर दे, तो उसे लगातार टीआरपी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">बीते हफ्ते चौदहवीं लोकसभा के मध्यावधि सर्वेक्षणों की धूम रही। दो निजी चैनलों और उनके प्रिंट मीडिया ने सर्वेक्षण एजेंसियों के साथ मिलकर मध्यावधि सर्वेक्षण करवाए। दोनों औद्योगिक घरानों का मकसद सिर्फ अपनी टीआरपी बढ़ाना था। अगर एक चैनल अपना जन सर्वेक्षण जारी कर दे और टुकड़ों<font face="Mangal">-</font>टुकड़ों में जारी कर दे<font face="Mangal">, </font>तो उसे लगातार टीआरपी में बढ़ोतरी मिलती है। प्रतिद्वंदी चैनल को भी जवाबी तैयारी करनी ही पड़ती है। राजेंद्र यादव ने जनवरी के <font face="Mangal">&#8216;</font>हंस<font face="Mangal">&#8216; </font>का विशेषांक विजुअल मीडिया की टीआरपी लड़ाई पर ही निकाला है। इस विशेषांक में खुद विजुअल मीडिया के पत्रकारों ने अपनी टीआरपी की भूख मिटाने के लिए किए और किए जा रहे कुकर्मो का खुलासा किया है। <span id="more-101"></span>ऐसे लोगों की कमी नहीं<font face="Mangal">, </font>जो ब्रिटिश चैनल फोर पर दिखाए जा रहे <font face="Mangal">&#8216;</font>बिग ब्रदर<font face="Mangal">&#8216; </font>और भारतीय सोनी चैनल पर दिखाए जा रहे <font face="Mangal">&#8216;</font>बिग बास<font face="Mangal">&#8216; </font>में हुई बदमजगियों की वजह भी टीआरपी बढ़ाना मानते हैं। यह सच भी है<font face="Mangal">, </font>जैडे गुडी ने जब शिल्पा शेट्ठी के लिए नस्लवादी टिप्पणियां की और उन्हें कुत्ती कहा<font face="Mangal">, </font>तो चैनल फोर की टीआरपी बढ़ने लगी। उसके दर्शक भी बत्तीस लाख से बढ़कर छप्पन लाख तक हो गए। ठीक यही बात सोनी चैनल पर भी दोहराई गई<font face="Mangal">, </font>भद्दी भाषा का इस्तेमाल करने वाली राखी सावंत को जब वोटिंग से जनता ने बाहर कर दिया तो उन्हें <font face="Mangal">&#8216;</font>बिग बास<font face="Mangal">&#8216; </font>सिर्फ इसलिए वापस ले आए<font face="Mangal">, </font>क्योंकि विवाद पैदा करने वाला कोई नहीं बचा था। राखी सावंत दुबारा वापस आई तो उसने एक बार फिर रुपाली गांगुली को वही कहा<font face="Mangal">, </font>जो जैडे गुडी ने शिल्पा शेट्ठी को कहा था। भारत की जनता ने शिल्पा शेट्ठी को कुत्ती कहे जाने पर एतराज किया<font face="Mangal">, </font>लेकिन इस घटना के बाद भी राखी सावंत ने रुपाली गांगुली की उसकी गैरहाजिरी में उसे कुत्ती कहा। लेकिन किसी भारतीय को यह नस्लवादी टिप्पणी नहीं लगी। हालांकि बिग बास के फैसले को ठुकराते हुए भारतीय जनता ने दुबारा वोटिंग से राखी सावंत को घर से बाहर निकाल दिया। लेकिन यह टीआरपी का खेल सिर्फ बिग ब्रदर और बिग बास तक सीमित नहीं रहता। अलबत्ता इसके लिए कभी स्टिंग आपरेशन करने पड़ते हैं और कभी सर्वेक्षण। अपना माल बेचने के लिए क्या<font face="Mangal">-</font>क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं। यह बात सिर्फ दुनिया भर के निजी चैनलों पर लागू नहीं होती। महाशक्तियों पर भी लागू होती है। अमेरिका और रूस दोनों अपना माल बेचने के लिए निजी चैनलों जैसी होड़ में शामिल हो चुके हैं। देश की जनता से अब यह छिपा नहीं है कि अमेरिका ने अपना परमाणु ईंधन बेचने के लिए और परमाणु ऊर्जा तैयार करने वाले बेकार पड़े रिएक्टर बेचने के लिए परमाणु ऊर्जा ईंधन सप्लाई करने के कानून को बदल डाला। भारत अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के लिए सिर्फ एक मार्केट है<font face="Mangal">, </font>इससे ज्यादा कुछ नहीं। रूस भी भारत को एक मार्केट की तरह ही इस्तेमाल कर रहा है। यह बात रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत यात्रा से स्पष्ट हो गई। रूस और अमेरिका दोनों भारत को लड़ाई के हथियार बेचने की होड़ में शामिल हैं और गांधी का भारत एक ग्राहक है। राष्ट्रपति बुश ने परमाणु ऊर्जा ईंधन का ऐसा झुनझुना भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हाथ में थमा दिया है कि मौजूदा सरकार अपनी स्वतंत्र विदेश नीति तक भूल गई। राष्ट्रपति बुश ने परमाणु ऊर्जा ईंधन समझौते से दोनों लक्ष्य हासिल किए<font face="Mangal">, </font>एक तरफ लाखों डालर अमेरिका पहुंचेंगे और दूसरी तरफ भारत का इराक के बाद ईरान के खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा। हालांकि मनमोहन सिंह सरकार अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का दावा अभी भी कर रही है<font face="Mangal">, </font>लेकिन अमेरिकी पहल पर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की ओर से ईरान के खिलाफ कार्रवाई के फैसले से यह साबित हो गया है कि राष्ट्रपति बुश का असली मकसद क्या है। कभी अमेरिका और सोवियत संघ दो महाशक्तियां थी और दोनों एक<font face="Mangal">-</font>दूसरे के खिलाफ खड़ी थी। लेकिन ईरान के मामले में इस बार जिस तरह सोवियत संघ टूटने के बाद उसके प्रमुख घटक रूस ने अमेरिका के साथ एकजुटता दिखाई है<font face="Mangal">, </font>उससे साफ हो गया है कि दोनों ने मिलकर गुट निरपेक्ष देशों को मात दे दी है। जिस तरह राष्ट्रपति पुतिन ने गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत आकर हथियारों की दुकान सजाई है<font face="Mangal">, </font>उससे यह साफ हो गया है कि रूस और अमेरिका दोनों में भारत को बाजार बनाने के लिए अघोषित संधि हो चुकी है। यूपीए सरकार की विदेश नीति एकदम बचकाना और नकारा साबित हो रही है। कम्युनिस्ट विरोधी होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी ने अमेरिका के खिलाफ भारत<font face="Mangal">-</font>रूस और चीन का राजनीतिक<font face="Mangal">-</font>कूटनीतिक त्रिगुटा बनाने की मुहिम शुरु की थी<font face="Mangal">, </font>जिसे मौजूदा मनमोहन सिंह सरकार ने छोटे<font face="Mangal">-</font>मोटे लालचों में आकर दीर्घकालिक कूटनीतिक रणनीति को ध्वस्त कर दिया। इस समय जरुरत इस बात की है कि अमेरिका के निरंकुश होने पर ब्रेक लगाई जाए<font face="Mangal">, </font>लेकिन भारत का मौजूदा नेतृत्व इस मामले में खुद को लाचार मानकर चल रहा है। जिसका न सिर्फ रूस और अमेरिका बाजार के तौर पर इस्तेमाल करके फायदा उठाना चाहता है अलबत्ता अब चीन ने भी उसी तरफ कदम बढ़ाना शुरु कर दिया है। अगर भारत इन तीनों देशों का बाजार बनकर रह गया तो आने वाले समय में देश के आर्थिक गुलामी में फंसने में ज्यादा देर नहीं लगेगी।</p>
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		<title>सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट से बढ़ती दूरियां</title>
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		<pubDate>Sat, 20 Jan 2007 18:34:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Open space twitting]]></category>

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		<description><![CDATA[मनमोहन सरकार की अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कारगुजारियों की अगर समीक्षा की जाए, तो पूर्ववर्ती वाजपेयी सरकार के मुकाबले बहुत कमजोर साबित होती है। मनमोहन सिंह इस बात का दावा ठोक रहे हैं कि उन्हाेंने परमाणु ऊर्जा ईंधन का समझौता करके भारत का 33 साल से चला आ रहा अंतर्राष्ट्रीय बहिष्कार खत्म करवाने में महत्वपूर्ण सफलता [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">मनमोहन सरकार की अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कारगुजारियों की अगर समीक्षा की जाए<font face="Mangal">, </font>तो पूर्ववर्ती वाजपेयी सरकार के मुकाबले बहुत कमजोर साबित होती है। मनमोहन सिंह इस बात का दावा ठोक रहे हैं कि उन्हाेंने परमाणु ऊर्जा ईंधन का समझौता करके भारत का <font face="Mangal">33 </font>साल से चला आ रहा अंतर्राष्ट्रीय बहिष्कार खत्म करवाने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। वैसे अमेरिका के परमाणु ऊर्जा ईंधन के निर्यात संबंधी कानून की धारा वन<font face="Mangal">-</font>टू<font face="Mangal">-</font>थ्री के तहत जब समझौता सिरे चढ़ेगा<font face="Mangal">, </font>तभी माना जाएगा कि उन्होंने कोई सफलता हासिल की है। मेरा मानना हैं कि इस समझौते में अभी बहुत अड़चने हैं<font face="Mangal">, </font>क्योंकि अमेरिकी प्रशासन यह समझौता अमेरिकी कांग्रेस की ओर से पास किए गए कानून के दायरे में रहकर ही कर सकता है। <span id="more-128"></span>सच्चाई यह है कि जो कानून पास हुआ है<font face="Mangal">, </font>वह मनमोहन सिंह की ओर से भारतीय संसद में किए गए वायदे के अनुरूप नहीं है। खैर<font face="Mangal">, </font>यह समझौता अगर सिरे चढ़ भी जाए तो इसमें इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि अमेरिका परमाणु ऊर्जा ईंधन हमेशा देता रहेगा और हमारे रिएक्टर हमेशा चलते रहेंगे<font face="Mangal">, </font>जिन पर हम हजारों करोड़ रूपए खर्च करेंगे। अमेरिका हमारे साथ क्या सलूक करेगा<font face="Mangal">, </font>इसके बारे में अभी अंदाज लगाना ठीक नहीं होगा। बहुतेरे लोगों का अनुमान है कि अमेरिका परमाणु ऊर्जा ईंधन के समझौते में भारत को इतना उलझा देगा कि आखिर वह अपनी अंतर्राष्ट्रीय स्वतंत्र हस्ती को बरकरार नहीं रख पाएगा। इराक और ईरान के मामले में जिस तरह अमेरिका ने भारत को अपनी विदेश नीति में फेरबदल के लिए मजबूर किया है<font face="Mangal">, </font>उससे भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है<font face="Mangal">, </font>उसका अंदाजा लगाया जा सकता है। मनमोहन सिंह सरकार ने दो बड़ी गलतियां की हैं<font face="Mangal">, </font>जिनका आज यहां इसलिए उल्लेख करना पड़ रहा है<font face="Mangal">, </font>क्योंकि वाजपेयी सरकार ने जिस तरह संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट के लिए दावा ठोका था और दुनियाभर में अभियान चलाया था<font face="Mangal">, </font>उस सारी मेहनत पर पानी फिर गया है। मनमोहन सिंह सरकार ने जब शशि थरूर को संयुक्त राष्ट्र के महासचिव पद पर जब उम्मीदवार बनाया था<font face="Mangal">, </font>मेरा तभी यह स्पष्ट मत था कि यह करके यूपीए सरकार ने सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट से दावा छोड़ने का नींव पत्थर रख दिया है। अमेरिका ने भारत के उम्मीदवार शशि थरूर को संयुक्त राष्ट्र का महासचिव भी नहीं बनने दिया और स्थाई सीट के दावे को पूरी तरह कुचल कर रख दिया। परमाणु ऊर्जा ईंधन के समझौते में ही भारत के परमाणु शक्ति संपन्न देश होने का दावा खत्म कर दिया गया। मनमोहन सिंह भले ही परमाणु ऊर्जा ईंधन के समझौते के लिए अपनी पीठ ठोंके और इतराएं<font face="Mangal">, </font>लेकिन सच यह है कि वाजपेयी की ओर से देश को परमाणु संपन्न बनाए जाने के बावजूद मनमोहन सिंह ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने घुटने टेक कर सारे किए कराए पर पानी फेर दिया। अब वही हो रहा है<font face="Mangal">, </font>जिसकी आशंका थी। यूपीए सरकार ने सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट का दावा छोड़कर गैर स्थाई सीट के लिए दावा ठोकने का फैसला कर लिया है। इस बाबत न्यूयार्क में भारत के स्थाई दूतावास को खबर भेज दी गई है कि वह अक्टूबर <font face="Mangal">2010 </font>के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के चुनाव में भारत की गैर स्थाई सीट के लिए तैयारी करे। मनमोहन सरकार के इस फैसले के पीछे दलील यह दी जा रही है कि जब तक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का विस्तार नहीं होता<font face="Mangal">, </font>तब तक गैर स्थाई सीट पर दावा ठोकना गलत नहीं होगा। लेकिन अमेरिका ने भारत को अपना पिछलग्गू बनाने में सफलता हासिल करके फिलहाल सुरक्षा परिषद के विस्तार की संभावनाओं पर ही पानी फेर दिया है। कूटनीतिज्ञों का कहना हैं कि भारत ने खुद अमेरिका का जूनियर पाटर्नर बनाकर सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट हासिल करने के रास्ते में खुद की रूकावटें खड़ी कर ली। भारत<font face="Mangal">, </font>जापान<font face="Mangal">, </font>जर्मनी और ब्राजील की ओर से एकजुट होकर स्थाई सीट हासिल करने के लिए जितनी जोरदार कोशिशें की गई थी<font face="Mangal">, </font>उन्हें भारत सरकार ने अमेरिका का जूनियर पाटर्नर बनकर नाकाम बना दिया है। अब हालत यह है कि जर्मनी और ब्राजील भी गैर स्थाई सीट के लिए ही दावा ठोकने की सोच रहे हैं<font face="Mangal">, </font>ताकि स्थाई सीट न सही<font face="Mangal">, </font>कुछ तो हाथ लगे। इस घटनाक्रम से यह साबित हो गया है कि भारत को परमाणु ऊर्जा ईंधन का लालीपॉप दिखाकर अमेरिका भारत<font face="Mangal">, </font>जापान<font face="Mangal">, </font>जर्मनी और ब्राजील में फूट डालकर अपना मकसद हासिल करने में सफल रहा है। पिछली बार भारत के पास गैर स्थाई सीट <font face="Mangal">1990 </font>से <font face="Mangal">1992 </font>तक थी<font face="Mangal">, </font>लेकिन <font face="Mangal">1996 </font>में भारत इस सीट के चुनाव में जापान के हाथों बुरी तरह हारा। गैर स्थाई सीट के लिए दावा करने के पक्ष में एक दलील यह दी जा रही है कि जब तक स्थाई सीटें बढ़ने का फैसला नहीं होता<font face="Mangal">, </font>तो क्या तब तक भारत चुप करके बैठा रहे। लेकिन जैसे मेरा पहले यह मानना था कि शशि थरूर को महासचिव पद पर खड़ा करके भारत ने स्थाई सीट की दावेदारी कमजोर कर ली है<font face="Mangal">, </font>वैसे ही मेरा अब यह मानना है कि जिस तरह शशि थरूर हार को देखते हुए नाम वापस लेने को मजबूर हुए<font face="Mangal">, </font>वैसे ही अगर भारत <font face="Mangal">2010 </font>के चुनाव में गैर स्थाई सीट हार जाता है<font face="Mangal">, </font>तो स्थाई सीट का उसका दावा और कमजोर हो जाएगा। शशि थरूर को चुनाव में उतारते समय गंभीरता से नहीं सोचा गया और चुनाव मैदान में उतरकर भारत ने अपने कई पड़ोसी मित्र देशों को नाराज कर लिया था। अब हम कहीं उसी नाराजगी का विस्तार तो नहीं करने जा रहे।</p>
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		<title>निठारी गांव से मिलने वाला सबक</title>
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		<pubDate>Sat, 06 Jan 2007 18:34:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[छब्बीस दिसंबर को जब पायल नाम की एक लड़की के लापता होने और उसके मोबाइल की रिंगटोन निठारी गांव के पास नोएडा की कोठी डी-5 में जाकर रुक गई, तो कोठी के मालिक मोनिन्द्र सिंह को पुलिस पकड़ कर थाने ले गई। तब तक किसी ने सोचा तक नहीं था कि पायल के मोबाइल की [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">छब्बीस दिसंबर को जब पायल नाम की एक लड़की के लापता होने और उसके मोबाइल की रिंगटोन निठारी गांव के पास नोएडा की कोठी डी-5 में जाकर रुक गई, तो कोठी के मालिक मोनिन्द्र सिंह को पुलिस पकड़ कर थाने ले गई। तब तक किसी ने सोचा तक नहीं था कि पायल के मोबाइल की रिंगटोन निठारी गांव से गायब हो रहे बच्चों की गुत्थी सुलझा देगी। मोनिन्द्र सिंह के बाद उसके नौकर सतीश उर्फ सुरेंद्र को अल्मोड़ा के पास मंगरुकखाल गांव से गिरफ्तार किया गया तो गुत्थी सुलझती चली गई। मोनिन्द्र सिंह सारा ठीकरा सुरेंद्र के सिर फोड़ रहा है तो सुरेंद्र सारा ठीकरा मोनिन्द्र के सिर। <span id="more-127"></span>पर जनता सारा ठीकरा पुलिस के सिर फोड़ रही है। प्रियदर्शिनी मट्टू का केस हो, जेसिका लाल का केस हो या नीतिश कटारा का केस हो, पुलिस की कारगुजारी हर जगह पर शक के दायरे में आ रही है। ठीक इस समय जब निठारी कांड का भंडाफोड़ हुआ, उसी समय देश में पुलिस सुधारों की बात चल रही है। लेकिन क्या पुलिस कानूनों में सुधार पुलिस का ढांचा बदल देंगे, पुलिसियों की मानसिकता में बदलाव ला देंगे। यह बात सही है कि सत्ताधारी पुलिस का जमकर दुरुपयोग करते हैं और बदले में पुलिस को जनता का शोषण करने की छूट देनी पड़ती है। इसी से पुलिस और राजनीतिज्ञों की मिलीभगत का जन्म होता है, इस संदर्भ में इमरजेंसी के बाद जनता शासन के दौरान बनाए गए शाह आयोग की एक टिप्पणी काबिल-ए-गौर है। शाह आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि बयूरोक्रेसी और पुलिस को झुकने के लिए कहा गया था, लेकिन वे लेट गए। शाह आयोग ने राजनीतिज्ञों और बयूरोक्रेसी (जिसमें पुलिस भी आती है) के गठजोड़ का खुलासा किया था। इमरजेंसी के दौरान जेलों में रहे विपक्ष के नेताओं ने यह महसूस किया कि पुलिस का स्वतंत्र होना बहुत जरुरी है, क्योंकि जब इमरजेंसी लगी तो पुलिस सत्ताधीशों के इशारे पर उनके राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ मनमाने और झूठे केस बनाने से नहीं हिचकिचाई। इसलिए जनता शासन के दौरान देश का पहला पुलिस आयोग बना, जिसका नाम दिया गया- राष्ट्रीय पुलिस आयोग। इस आयोग ने 1979 से 1981 के तीन सालों में आठ रिपोर्टें पेश की, लेकिन उन पर अमल होता उससे पहले ही इंदिरा गांधी वापस आ गई और कांग्रेस ने राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों को कूड़ेदान में फेंक दिया। अबदुल कलाम जब राष्ट्रपति बने, तो जानेमाने रिटायर पुलिस अधिकारी आरके राघवन ने उन्हें एक चिट्ठी लिखी। इस लंबी चौड़ी चिट्ठी में राघवन ने राष्ट्रपति अबदुल कलाम को राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशें याद दिलाईं और उन्हें बताया कि राजनीतिज्ञ उन सिफारिशों पर अमल नहीं करना चाहते क्योंकि उन सिफारिशों के अमल से उनका पुलिस पर दबदबा कम हो जाएगा। राघवन ने उम्मीद जाहिर की थी कि अबदुल कलाम इस मामले में केंद्र और राज्य सरकारों पर नैतिक दबाव बनाकर देश के पहले जनता शासन के दौरान शुरु हुई सुधार की कोशिशों को आगे बढ़ा सकते हैं। राघवन को यह उम्मीद इसलिए भी थी क्योंकि केंद्र में वाजपेयी की रहनुमाई वाली करीब-करीब वही सरकार थी, जो 1977 में बनी थी। ज्यादातर राज्यों में भी पुलिस सुधार विरोधी कांग्रेस पार्टी ठिकाने लग चुकी थी। राघवन ने अबदुल कलाम को लिखी चिट्ठी में कहा कि इंदिरा गांधी ने पुलिस और बयूरोक्रेसी का जितना दुरुपयोग किया, उतना पहले कभी नहीं हुआ था और इंदिरा गांधी ने पुलिस को इतना भ्रष्ट बना दिया कि अब बड़े पैमाने पर कानूनों में बदलाव के बिना पुलिस में सुधार संभव नहीं है। राघवन ने अपनी चिट्ठी में राष्ट्रपति अबदुल कलाम को झकझोरने के लिए नाटकीय भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने पूछा कि क्या अबदुल कलाम का कभी निचले स्तर की पुलिस से वास्ता पड़ा है या उन्हें कभी पुलिस थाने जाना पड़ा है। अगर वह कभी पुलिस थाने नहीं गए तो वह व्यक्ति उन्हें बेहतर बता सकता है जिसे कभी पुलिस थाने जाना पड़ा हो। राघवन का मत है कि कानून का पालन करने वाला शहरी पुलिस थाने के नाम से घबराता है, उसकी कोशिश होती है कि वह पुलिस थाने के आगे वाली सड़क से न गुजरे। आजादी के पचपन साल बाद भी पुलिस की ऐसी छवि आजादी का आभास कतई नहीं दिलाती। राघवन ने अपनी चिट्ठी में बताया था कि इंद्रजीत गुप्त जब गृह मंत्री बने तो उन्होंने पहली बार राज्य सरकारों को चिट्ठी लिखकर राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों पर अमल करने की हिदायत दी, लेकिन वह भी ज्यादा कुछ नहीं कर पाएं क्योंकि कानून व्यवस्था राज्य का मामला है और राज्य सरकारें अगर उन सिफारिशों पर अमल कर देंगी तो पुलिस स्वतंत्र हो जाएगी और शासक उनका मनमाना उपयोग नहीं कर पाएंगे। राघवन ने राष्ट्रपति को सतर्क करते हुए लिखा कि अगर वह केंद्र सरकार और राज्य सरकारों से राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों के बारे में पूछेंगे तो उन्हें जवाब मिलेगा कि नब्बे फीसदी सिफारिशें लागू हो चुकी हैं, लेकिन असलियत यह है कि आयोग की तीन बड़ी सिफारिशों पर बिलकुल अमल नहीं हुआ। ये तीन बड़ी सिफारिशें हैं- पहली सिफारिश- सभी राज्यों में राज्य सुरक्षा आयोग बने, जो महत्वपूर्ण जगहों पर पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति का फैसला करे। इस आयोग में राज्य का गृह मंत्री और विपक्ष के कम से कम छह नेता होने चाहिए। दूसरी सिफारिश- डीजीपी की एक जगह पर नियुक्ति का कार्यकाल कम से कम चार साल होना चाहिए। तीसरी सिफारिश- 1861 के पुलिस कानून में आमूलचूल परिवर्तन किया जाए और उसे राजनीतिक और कार्यकारी मजिस्ट्रेट के दायरे से बाहर निकाला जाए। असल में राष्ट्रीय पुलिस आयोग ने नया पुलिस कानून बनाने के लिए एक प्रारूप भी अपनी सिफारिशों में केंद्र सरकार को भेजा था। राष्ट्रपति अबदुल कलाम ने पुलिस सुधारों को लेकर कोई हिदायत केंद्र और राज्य सरकारों को दी या नहीं, यह तो नहीं पता, लेकिन करीब एक साल पहले जब उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस अधिकारी प्रकाश सिंह ने राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों पर अमल के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तब जाकर सरकार जागी। गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने हाल ही में पुलिस सुधारों के लिए राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई और सोली सोराबजी की रहनुमाई में पुलिस सुधारों के लिए एक कमेटी का गठन किया। सोराबजी कमेटी अपनी रिपोर्ट दे चुकी है और अब गृह मंत्रालय ने 31 जनवरी तक देश की जनता से पुलिस सुधारों के लिए सलाह मांगी है। लेकिन पिछले हफ्ते हुई मुख्यमंत्रियों की बैठक से जो नतीजा निकला वह पुलिस सुधारों के लिए उत्साहवर्धक नहीं है। केंद्र सरकार कानून में बदलाव को तैयार नहीं और राज्य सरकारें पुलिस-बयूरोक्रेसी से अपना दबदबा छोड़ने को तैयार नहीं। निठारी में जो कुछ हुआ वह राजनीतिज्ञों और पुलिस की सांठगांठ का जीता-जागता सबूत है। नोएडा में उस समय मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की जाति के सारे यादव पुलिस अधिकारी तैनात थे। मुख्यमंत्री और गृह मंत्री आम तौर पर कमाई वाली जगहों पर अपने करीबी आदमियों को तैनात करते हैं ताकि कुछ फायदा उनका हो और बंधी-बंधाई रकम मुख्यमंत्रियों और संबंधित मंत्रियों को भी पहुंच सके। अब अगर मुलायम सिंह ने अपने यादव भाईयों को निलंबित कर दिया है तो भाई-भतीजावाद को खत्म करने का यह सुनहरा मौका हो सकता है। लेकिन एक सवाल खड़ा होता है कि अगर मौजूदा असंवेदनशील और भ्रष्ट पुलिस को राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों के अनुरुप स्वतंत्र और अधिकार संपन्न बना दिया गया तो पुलिस और निरंकुश और भ्रष्ट होगी या सुधरेगी। निठारी से बड़ा सबक यह मिला है कि कानून नहीं अलबत्ता पुलिस की मानसिकता बदलनी होगी।</font></p>
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		<title>तीस साल में पहली बार लेफ्ट का चेहरा बेनकाब हुआ</title>
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		<pubDate>Sat, 30 Dec 2006 18:39:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[साल 2006 की सबसे बड़ी घटना यह है कि वामपंथी दलों ने बंगाल को लेकर देश भर में जो गलतफहमी फैलाई हुई थी, वह खुद उनके कुकर्मो से बेनकाब हो गई। वामपंथी विरोधी दल जब यह कहते थे कि बंगाल में वामपंथियों ने सच्चे लोकतंत्र की हत्या कर दी है और संगठित ढंग से चुनावों [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">साल <font face="Mangal">2006 </font>की सबसे बड़ी घटना यह है कि वामपंथी दलों ने बंगाल को लेकर देश भर में जो गलतफहमी फैलाई हुई थी<font face="Mangal">, </font>वह खुद उनके कुकर्मो से बेनकाब हो गई। वामपंथी विरोधी दल जब यह कहते थे कि बंगाल में वामपंथियों ने सच्चे लोकतंत्र की हत्या कर दी है और संगठित ढंग से चुनावों में धांधली करके वामपंथी दल सत्ता पर काबिज हैं तो यह बात किसी के समझ में नहीं आती थी। कांग्रेस को नेस्तनाबूद करके वामपंथियों ने अपने पैर जमाए थे और भाजपा को कभी बंगाल में घुसने का मौका ही नहीं मिला। वामपंथी एक बार काबिज हो गए तो उसके बाद उन्होंने जैसे सभी राजनीतिक दलों के लिए <font face="Mangal">&#8216;</font>नो<font face="Mangal">-</font>एंट्री<font face="Mangal">&#8216; </font>का बोर्ड लगा दिया। समाज के हर क्षेत्र में वामपंथियों ने पांव जमा लिए और कोई भी संस्था ऐसी नहीं रही<font face="Mangal">, </font>जिस पर वामपंथी दलों का कबजा न हुआ हो। <span id="more-126"></span>बंगाल को रोलमॉडल बनाकर वामपंथी दलों ने देश भर में सामाजिक क्षेत्र में प्रवेश की सफल कोशिश की<font face="Mangal">, </font>यह बात अलग है कि उसे चुनावी मैदान में भुना नहीं पाए। जैसे आप कलाकारों का क्षेत्र लें<font face="Mangal">, </font>शिक्षकों का क्षेत्र लें<font face="Mangal">, </font>इतिहासकारों का क्षेत्र लें<font face="Mangal">, </font>महिला आंदोलन का क्षेत्र लें<font face="Mangal">, </font>विश्वविद्यालय छात्र यूनियनों का क्षेत्र लें<font face="Mangal">, </font>या फिर भले ही मेधा पाटेकर का विकास विरोधी आंदोलनकारियों का जमावड़ा हो या खुद को सेक्युलरवादी कहकर भाजपा के खिलाफ अभियान चलाने वाला तीस्ता सीतलवाड़ का <font face="Mangal">&#8216;</font>कम्बैट कम्युनलिज्म मोर्चा<font face="Mangal">&#8216;, </font>सब जगह वामपंथी विचारधारा की अलग<font face="Mangal">-</font>अलग दुकानें दिखाई देंगी। पश्चिम बंगाल में बुध्ददेव भट्टाचार्य ने ज्योति बसु की विकास विरोधी धारा को बदलकर वामपंथियों को नया चेहरा देने का प्रयास किया तो वहां सिर्फ ममता बनर्जी ही नहीं<font face="Mangal">, </font>अलबत्ता मेधा पाटेकर जैसे विकास विरोधी वामपंथी हस्तियों को मैदान में कूदना पड़ा। टाटा के छोटी और सस्ती कार बनाने के कारखाने को दी गई जमीन ने वामपंथियों की पोल खोलकर रख दी। वामपंथियों का अंदरुनी टकराव खुलकर सामने आ गया। पुराने वामपंथियों ने इस बात पर कड़ा एतराज किया कि जब तीस साल तक बिना विकास किए ज्योति बसु बंगाल में लाल झंडा फहराने में कामयाब रहें तो उस नीति को बदलने की क्या जरुरत थी। बिना खुद को वामपंथी बताए देश भर में वामपंथियों के एजंडे पर काम करने वाली मेधा पाटेकर के लिए यह संकट की घड़ी थी<font face="Mangal">, </font>अगर वह बंगाल में जाकर किसानों के पक्ष में मोर्चा न खोलती तो खुद बेनकाब होती<font face="Mangal">, </font>क्योंकि मेधा पाटेकर हों या तीस्ता सीतलवाड़ हर किसी को गुजरात में मोर्चा खोलते हुए देखा गया था। मेधा पाटेकर ने अगर अपनी विकास विरोधी मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए नर्मदा विरोधी आंदोलन चलाया तो तीस्ता सीतलवाड़ ने गुजरात के दंगों को आधार बनाकर नरेंद्र मोदी के खिलाफ मोर्चा खोला। बेस्ट बेकरी कांड में तीस्ता सीतलवाड़ की दिलचस्पी जाहिरा शेख के प्रभावित परिवार को इंसाफ दिलाने में नहीं थी<font face="Mangal">, </font>अलबत्ता नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलने की थी। हालांकि केरल के विधानसभा चुनाव में वामपंथी दलों ने जब कोयंबटूर की जेल में बंद आतंकवादी अबदुल नासिर मदनी को रिहा करवाने का अभियान छेड़ा और हाल ही में केरल के एक उपचुनाव में वामपंथी दलों की ओर से सांप्रदायिक कार्ड खेला गया तो तीस्ता सीतलवाड़ को <font face="Mangal">&#8216;</font>कम्बैट कम्युनलिज्म<font face="Mangal">&#8216; </font>भूल गया। लेकिन तारीफ करनी पड़ेगी मेधा पाटेकर की<font face="Mangal">, </font>जिन्होंने अपनी वामपंथी वफादारी को दरकिनार करके सिंगूर में किसानों के पक्ष में मोर्चा खोलकर वामपंथी चेहरे को बेनकाब किया। ममता बनर्जी पिछले एक दशक से वामपंथियों को बेनकाब करने की कोशिशों में जुटी हुई थी। जब उन्होंने देखा कि कांग्रेस गंभीरता से वामपंथियों से लोहा लेने को तैयार नहीं तो उन्होंने नरसिंह राव के मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर अकेले ही मोर्चा खोला। तबसे वह दो बार चुनाव हार चुकी हैं<font face="Mangal">, </font>दोनों ही बार कांग्रेस ने वामपंथियों को हराने के लिए ममता बनर्जी का साथ नहीं दिया<font face="Mangal">, </font>अलबता अपनी विचारधारा से दूर होने के बावजूद ममता बनर्जी को भाजपा का साथ मिला। हालांकि ममता बनर्जी बार<font face="Mangal">-</font>बार अस्थिर दिमाग की साबित हुई और सोनिया गांधी इसी का फायदा उठाते हुए दो बार उन्हें अपने पाले में लाने में कामयाब रही। सोनिया गांधी के इसी चातुर्य के कारण बंगाल में ममता बनर्जी की वामपंथी विरोधी जंग की विश्वसनीयता कटघरे में खड़ी हुई। हाल ही में गनी खान चौधरी के देहांत के बाद सोनिया गांधी ने एक बार फिर अपने चातुर्य से ममता बनर्जी को साथ मिलाकर उनकी छवि का मटियामेट किया। लेकिन टाटा के कारखाने के मुद्दे पर ममता बनर्जी ने जोरदार आंदोलन छेड़कर अपनी अब तक की खराब हुई छवि को दुबारा प्रदेश में निखारने में सफलता हासिल की है। ममता बनर्जी ने जब सिंगूर में किसानों की जमीन जबरदस्ती अधिग्रहित किए जाने का मामला उठाकर आंदोलन शुरु किया तो वामपंथियों के समर्थक विजुअल मीडिया ने उनके आंदोलन की धार भोंथरी करने के लिए किसानों की जमीन अधिग्रहित किए जाने की खबरों को झूठा बताना शुरु कर दिया। प्रिंट मीडिया के वामपंथी पत्रकारों ने भी किसानों के साथ हुए अन्याय को दबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन ममता बनर्जी ने आमरण अनशन जैसा कदम उठाकर वामपंथी दलों की तीस साल से झूठ के रेत पर खड़े महल को नेस्तनाबूद करने में जबरदस्त सफलता हासिल की है। शुरु में ऐसा लगता था कि ममता बनर्जी जल्द ही आमरण अनशन खत्म करके अपनी रही<font face="Mangal">-</font>सही साख भी खत्म कर देंगी। लेकिन ममता बनर्जी ने तीन बार राज्यपाल को बैरंग लौटाया<font face="Mangal">, </font>मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टाचार्य की तीन चिट्ठियों पर तवाो नहीं दी<font face="Mangal">, </font>लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी की ओर से की गई अपील को भी ठुकराया और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चिट्ठी पर भी तवाो नहीं दी। जहां तक आखिरी दो महानुभावों का सवाल है तो दोनों का ममता के बारे में नजरिया कौन नहीं जानता। सोमनाथ चटर्जी ने पूर्वाग्रह से प्रभावित होकर सदन में ममता बनर्जी की निंदा का प्रस्ताव पास करवाया था और मनमोहन सिंह ने जिस दिन चिट्ठी भेजी उसी दिन बुध्ददेव भट्टाचार्य के टाटा कारखाने संबंधी कदम की तारीफ की। अगर ममता बनर्जी आमरण अनशन पर अड़ी न रहती तो यह बात कभी सामने नहीं आती कि बंगाल सरकार ने सिंगूर की उपजाऊ जमीन तंग राजनीतिक नजरिए के कारण किसानों का शोषण करके रतन टाटा को सौंपने की साजिश रची थी। वहां ममता बनर्जी का प्रभाव था और उसके प्रभाव को खत्म करने के लिए उपजाऊ जमीन टाटा को सौंपने का फैसला किया और किसानों के विरोध के बावजूद उनकी महंगी जमीन कौड़ियों के भाव अधिग्रहित की गई<font face="Mangal">, </font>जो वामपंथी पूरे देश में एसईजेड का विरोध करते हुए किसानों के मुद्दे पर आंदोलन की धमकी देते हैं<font face="Mangal">, </font>खुद उन्होंने बंगाल में क्या किया<font face="Mangal">, </font>इसे ममता बनर्जी ने बेनकाब करके रख दिया। मीडिया के वामपंथी तत्व भी पूरी तरह बेनकाब हो गए और पहली बार ऐसा हुआ कि मीडिया अपने वामपंथी आकाओं की रक्षा नहीं कर पाया। राष्ट्रपति<font face="Mangal">, </font>प्रधानमंत्री और खासकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पहल के कारण ममता बनर्जी की जान बच सकी<font face="Mangal">, </font>वरना छब्बीसवां दिन खतरनाक साबित हो सकता था। ममता बनर्जी को यह भी श्रेय जाएगा कि उन्होंने चार वामपंथी दलों के मोर्चे के अंदरुनी मतभेदों को सामने लाने में सफलता हासिल की<font face="Mangal">, </font>वरना खुद के ज्यादा प्रभाव की दादागिरी जमाते हुए माकपा बाकी वामपंथी दलों की हर जायज बात को अनसुनी कर देती थी। सिंगूर में किसानों की जमीन अधिग्रहित किए जाने से भाकपा<font face="Mangal">, </font>आरएसपी और फारवर्ड ब्लाक भी खफा थे<font face="Mangal">, </font>लेकिन खुलकर कुछ बोलने को तैयार नहीं थे। ममता बनर्जी भले ही पिछले चुनाव में चुनाव आयोग के निष्पक्ष चुनावों के प्रयासों के बावजूद बड़ा प्रभाव नहीं दिखा पाईं थी<font face="Mangal">, </font>लेकिन उनके इस आंदोलन ने उनकी जमीन इतनी मजबूत कर दी है कि अब वामपंथियों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।</p>
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		<title>परमाणु समझौता, मुशर्रफ फार्मूला और हमारे हित</title>
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		<pubDate>Sat, 23 Dec 2006 18:34:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बहुत तेज दौड़ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बुश से परमाणु ईंधन समझौते के बाद उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से ले-देकर कश्मीर का मसला सुलझाने की कवायद शुरू कर दी है। लेकिन इतना तेज दौड़ते हुए क्या वह भारत के स्वाभिमान की रक्षा कायम रख सकेंगे, जिसे जवाहरलाल नेहरू से लेकर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बहुत तेज दौड़ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बुश से परमाणु ईंधन समझौते के बाद उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से ले<font face="Mangal">-</font>देकर कश्मीर का मसला सुलझाने की कवायद शुरू कर दी है। लेकिन इतना तेज दौड़ते हुए क्या वह भारत के स्वाभिमान की रक्षा कायम रख सकेंगे<font face="Mangal">, </font>जिसे जवाहरलाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक सबने कायम रखा। मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ परमाणु ऊर्जा ईंधन का समझौता करने की सारी औपचारिकताएं पूरी कर दी हैं और उन्हें दंभ है कि उन्होंने परमाणु ईंधन हासिल करने के लिए अमेरिका को अपने कानून में बदलाव करने पर मजबूर किया<font face="Mangal">, </font>जबकि अटल बिहारी वाजपेयी तो सीटीबीटी पर दस्तखत करने को तैयार हो गए थे। <span id="more-125"></span>मनमोहन सिंह का सीटीबीटी पर दस्तखत करने की अटल बिहारी वाजपेयी की तैयारी का दावा स्ट्रा टालबोट की किताब पर आधारित है। लेकिन इसी किताब का वह पन्ना मनमोहन सिंह ने या तो जानबूझकर पढ़ा नहीं<font face="Mangal">, </font>या उसे पढ़कर भी देश की जनता को बताना नहीं चाहते<font face="Mangal">, </font>जिसमें उन्होंने यह भी लिखा है कि जसवंत सिंह ने सीटीबीटी पर दस्तखत करने का वादा किया था<font face="Mangal">, </font>लेकिन बाद में उन्होंने इस बात के लिए खेद जताया था कि वह इस वादे को निभा नहीं पाए। स्वाभाविक है कि जसवंत सिंह अपने वादे को इसलिए नहीं निभा पाए क्योंकि तबके प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उसके लिए तैयार नहीं हुए होंगे। यह सब जानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने छह साल के शासनकाल में सीना तानकर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का मुकाबला किया और भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित करवाने व संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट हासिल करवाने के लिए हरसंभव कोशिश की। लेकिन मनमोहन सिंह ने जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के जमाने से चली आ रही इन दोनों कोशिशों को दरकिनार करके परमाणु ऊर्जा ईंधन हासिल करने पर सारा जोर लगा दिया है<font face="Mangal">, </font>जबकि देश पिछले <font face="Mangal">30 </font>साल से यूरेनियम के लिए अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश में जुटा हुआ था और काफी हद तक सफलता पा ली थी। हमारे पूर्वोत्तर में यूरेनियम के भंडार हैं और वहां अंतरराष्ट्रीय ताकतें आदिवासियों को यूरेनियम की खुदाई करने के खिलाफ भड़का कर भारत को आत्मनिर्भर बनने से रोक रही हैं। मनमोहन सिंह को अमेरिका से यूरेनियम हासिल करने की बजाए इस बात का पता लगवाना चाहिए था कि पूर्वोत्तर में कौन सी अंतरराष्ट्रीय शक्तियां काम कर रही हैं। मनमोहन सिंह देश की जनता के सामने भारत के परमाणु कार्यक्रम के कारण पैदा हुई <font face="Mangal">30 </font>साल की अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों को खारिज करवा कर परमाणु ऊर्जा ईंधन हासिल करने के लिए अमेरिका का कानून बदलवाने का ढोल पीट रहे हैं। लेकिन वह यह नहीं बता रहे कि परमाणु समझौते की आधारशिला कहां रखी गई थी<font face="Mangal">, </font>और क्यों रखी गई थी। असल में <font face="Mangal">2005 </font>के शुरुआत में मास्को में बुश और मनमोहन सिंह की मुलाकात हुई थी<font face="Mangal">, </font>इस मुलाकात में दोनों नेताओं ने भारत और अमेरिका में व्यापारिक रिश्ते बढ़ाने के क्षेत्र ढूंढने के लिए दोनों देशों के व्यापारियों का एक गुट बनाना तय किया था। इस गुट में मनमोहन सिंह और बुश ने किस<font face="Mangal">-</font>किस को तैनात किया था<font face="Mangal">, </font>यह किसी को नहीं पता<font face="Mangal">, </font>लेकिन यह तय है कि इसी गुट ने भारत<font face="Mangal">-</font>अमेरिका परमाणु ऊर्जा ईंधन का व्यापार बढ़ाने का सुझाव दिया। असल में अमेरिका में परमाणु ईंधन यूरेनियम का भंडार है और <font face="Mangal">1964 </font>के बाद वहां परमाणु ऊर्जा के लिए कोई नया रिएक्टर नहीं लगा। सीटीबीटी के कारण कई देशों पर परमाणु ईंधन का आयात करने की पाबंदी लगी हुई है और उसका व्यापारिक खामियाजा अमेरिका को भुगतना पड़ रहा है। इसीलिए यह रास्ता निकाला गया कि भारत का पैसा कैसे अमेरिका के खजाने में पहुंच सके। यूपीए सरकार भले ही बांछें खिलाकर घूम रही हो<font face="Mangal">, </font>लेकिन परमाणु समझौता भारत के हित में कम<font face="Mangal">, </font>अमेरिका के हित में ज्यादा है। यह <font face="Mangal">2000 </font>लाख करोड़ रुपए का व्यापार है और अमेरिका मालोमाल हो जाएगा। इसके लिए भारत को जो खामियाजा भुगतना पड़ा है<font face="Mangal">, </font>उसका कोई जिक्र नहीं कर रहा। वैज्ञानिकों की <font face="Mangal">30 </font>साल की मेहनत से हम परमाणु संपन्न देश बने और उसकी मान्यता हासिल किए बिना हमने अमेरिका का परमाणु ऊर्जा ईंधन हासिल करने के लिए अपने परमाणु कार्यक्रम को हमेशा<font face="Mangal">-</font>हमेशा के लिए खत्म करने के बीज बो लिए हैं। भारत के वैज्ञानिक इसीलिए <font face="Mangal">&#8216;</font>हैनरी हाइड एक्ट<font face="Mangal">&#8216; </font>की शर्तों के तहत परमाणु ऊर्जा ईंधन समझौते का विरोध कर रहे हैं। ईरान और भारत में फर्क यह है कि ईरान ने सीटीबीटी पर दस्तखत किए हैं<font face="Mangal">, </font>लेकिन उसके पास परमाणु क्षमता नहीं है<font face="Mangal">, </font>वह सीटीबीटी पर दस्तखत करने के बाद गुपचुप तरीके से परमाणु क्षमता हासिल करने की कोशिश कर रहा है। बुश ने मनमोहन सिंह को परमाणु ऊर्जा ईंधन का लालच देकर भारत के परमाणु कार्यक्रम को ठप्प कराने में सफलता हासिल कर ली है<font face="Mangal">, </font>और यही लालच राष्ट्रपति बुश ईरान को दे रहे थे<font face="Mangal">, </font>जिसे ईरान के राष्ट्रपति अहमदी नेजाद ने नहीं माना<font face="Mangal">, </font>लेकिन भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मान लिया। स्ट्रा टालबोट लंबे समय से जसवंत सिंह को इसी के लिए राजी करने की कोशिश में जुटे हुए थे<font face="Mangal">, </font>वे दो लक्ष्य हासिल करना चाहते थे<font face="Mangal">, </font>अमेरिका का यूरेनियम बिकने का रास्ता खुल जाए और भारत अपना परमाणु कार्यक्रम रद्द कर दे। विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने राज्यसभा में भरोसा दिया है कि जरूरत पड़ने पर भारत परमाणु परीक्षण करने के लिए स्वतंत्र है। हालांकि प्रणव मुखर्जी के इस दावे में कोई दम नहीं लगता क्योंकि अमेरिका ने जो <font face="Mangal">&#8216;</font>हैनरी हाइड एक्ट<font face="Mangal">&#8216; </font>पास किया है<font face="Mangal">, </font>उसमें साफ शर्त लिखी है कि अगर भारत परमाणु कार्यक्रम जारी रखता है तो न सिर्फ अमेरिका परमाणु ऊर्जा ईंधन की सप्लाई बंद कर देता अलबत्ता सारे रिएक्टर और ईंधन भारत को वापस करना होगा। अमेरिका ने ईंधन की रिप्रोसेसिंग पर भी पाबंदी लगाई है। सरकार की दलील है कि अमेरिकी कानून की पाबंदियां भारत पर लागू नहीं होंगी<font face="Mangal">, </font>लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश इसी कानून के तहत <font face="Mangal">1954 </font>के परमाणु एक्ट की धारा वन टू थ्री में भारत को परमाणु ऊर्जा ईंधन का समझौता करेंगे। परमाणु ऊर्जा समझौता अमेरिका के <font face="Mangal">1954 </font>के परमाणु एक्ट के तहत ही होगा<font face="Mangal">, </font>जिसमें सीटीबीटी पर दस्तखत किए बिना किसी देश को परमाणु ईंधन की सप्लाई नहीं हो सकती। इसी कानून में छूट देने के लिए <font face="Mangal">&#8216;</font>हैनरी हाइड एक्ट<font face="Mangal">&#8216; </font>बना है<font face="Mangal">, </font>लेकिन अमेरिकी कांग्रेस ने छूट की शर्तें तय की हैं। पता नहीं राष्ट्रपति बुश की तरह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और प्रणव मुखर्जी कैसे कह रहे हैं कि ये सब शर्तें बाध्यकारी नहीं हैं। और छह<font face="Mangal">-</font>आठ महीनों में यह भी पता चल जाएगा<font face="Mangal">, </font>जब वन टू थ्री के तहत समझौते की बातचीत शुरू होगी। माकपा नेता सीताराम येचुरी का मानना है कि यह समझौता होगा ही नहीं<font face="Mangal">, </font>क्योंकि राष्ट्रपति बुश <font face="Mangal">&#8216;</font>हैनरी हाइड एक्ट<font face="Mangal">&#8216; </font>से बंधे हैं और मनमोहन सिंह संसद को दिए गए वायदे से<font face="Mangal">, </font>और दोनों ही एक<font face="Mangal">-</font>दूसरे के विपरीत हैं। लेकिन यह चमत्कार हो भी गया तो भारत को परमाणु संपन्न देश घोषित करवाने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट पाने का सपना तो टूट ही गया है।</p>
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		<title>परमाणु समझौता कहीं गले की फांस न बने</title>
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		<pubDate>Sat, 16 Dec 2006 18:34:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Open space twitting]]></category>

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		<description><![CDATA[शुक्रवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे के साथ मुलाकात के दौरान परमाणु ईंधन सप्लाई करने वाले देशों की बैठक में भारत को परमाणु ऊर्जा ईंधन सप्लाई करने की बाबत होने वाले फैसले में सहयोग मांगा। हालांकि शिंजो ने फौरी तौर पर कोई भरोसा नहीं दिया है, न ही जापान से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">शुक्रवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे के साथ मुलाकात के दौरान परमाणु ईंधन सप्लाई करने वाले देशों की बैठक में भारत को परमाणु ऊर्जा ईंधन सप्लाई करने की बाबत होने वाले फैसले में सहयोग मांगा। हालांकि शिंजो ने फौरी तौर पर कोई भरोसा नहीं दिया है<font face="Mangal">, </font>न ही जापान से परमाणु ऊर्जा ईंधन की सप्लाई का कोई भरोसा दिया है<font face="Mangal">, </font>लेकिन प्रधानमंत्री की ओर से परमाणु ऊर्जा ईंधन के मुद्दे पर बात किए जाने से एक बात साफ हो गई है कि संसद में अमेरिकी कानून की कितनी भी मुखालफत की जाए<font face="Mangal">, </font>प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ वन टू थ्री समझौता करने का फैसला कर लिया है। <span id="more-124"></span>अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी <font face="Mangal">(</font>आईएईए<font face="Mangal">) </font>की बैठक में अमेरिकी दबाव में जब ईरान के खिलाफ वोटिंग पर विवाद खड़ा हुआ था<font face="Mangal">, </font>तो वामपंथी दलों ने इसका कड़ा विरोध किया था और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वामदलों की कोई परवाह नहीं की थी। पहले और दूसरे दौर में ईरान के खिलाफ वोट देकर मनमोहन सिंह सरकार ने स्पष्ट कर दिया था कि वह परमाणु ऊर्जा ईंधन के लिए अमेरिका के हर इशारे का पालन करेगी। अब अमेरिकी कानून में कई नुक्ते भारतीय हितों के खिलाफ होने के बावजूद मनमोहन सरकार ने उसी कानून के तहत परमाणु ईंधन के लिए अमेरिका के साथ वन टू थ्री समझौता करने का फैसला कर लिया है। इस बारे में देश की संसद को पूरी तरह अंधेरे में रखा गया है<font face="Mangal">, </font>सरकार की तरफ से संसद में इस तरह का स्पष्ट बयान नहीं दिया गया कि सरकार को अमेरिकी सीनेट और अमेरिकी कांग्रेस की ओर से पास किया गया कानून मंजूर है और उसके तहत अब आगे समझौता करने का फैसला कर लिया गया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने <font face="Mangal">17 </font>अगस्त <font face="Mangal">2006 </font>को विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से उठाई गई आशंकाओं का जवाब देते हुए संसद से वादा किया था कि अगर अमेरिकी कानून में कुछ भी ऐसी बात हुई जो <font face="Mangal">18 </font>जुलाई <font face="Mangal">2005 </font>और दो मार्च <font face="Mangal">2006 </font>के भारत<font face="Mangal">-</font>अमेरिका साझा बयानों के अनुरूप न हुई<font face="Mangal">, </font>तो भारत परमाणु ऊर्जा ईंधन समझौते पर पुनर्विचार करने के लिए स्वतंत्र होगा। बारह दिसंबर <font face="Mangal">2006 </font>को विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने संसद में कबूल किया है कि अमेरिकी सीनेट और अमेरिकी कांग्रेस की ओर से <font face="Mangal">8-9 </font>दिसंबर को पास किए गए कानून में ऐसी कई असंगत बातें हैं और ऐसे कई आदेशात्मक प्रावधान हैं जो भारत को कबूल नहीं हैं और ऐसे प्रावधान <font face="Mangal">18 </font>जुलाई <font face="Mangal">2005 </font>के साझा बयान से मेल नहीं खाते। प्रणव मुखर्जी ने यह भी एलान किया था कि भारत की विदेश नीति को कोई भी देश प्रभावित नहीं कर सकता और न ही इसे कबूल किया जाएगा। प्रणव मुखर्जी ने यह भी वादा किया था कि भारत अपने सामरिक कार्यक्रमों <font face="Mangal">(</font>परमाणु संयंत्रों<font face="Mangal">) </font>की निगरानी करने की इजाजत नहीं देगा और न ही इन संयंत्रों में कोई विदेशी हस्तक्षेप मंजूर किया जाएगा। प्रणव मुखर्जी ने यह बात प्रधानमंत्री की ओर से संसद में किए गए वायदे के मुताबिक कही थी। स्वाभाविक है कि प्रणव मुखर्जी के बयान की ये कुछ तीखी बातें सिर्फ इसलिए स्पष्ट हुई क्योंकि अमेरिकी कानून में ये शर्तें लगाई गई हैं। पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अमेरिकी कानून में तीन खोट निकाले हैं<font face="Mangal">, </font>एक अन्य पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने दो खोट निकाले हैं और माकपा ने छह खोट निकाले हैं। माकपा मूल रूप से अमेरिका के खिलाफ है<font face="Mangal">, </font>इसलिए माकपा के मीन<font face="Mangal">-</font>मेख तब तक इतना महत्व नहीं रखते<font face="Mangal">, </font>जब तक उनका सरोकार राष्ट्रीय हितों से न हो। लेकिन इन राजनीतिक दलों के मीन<font face="Mangal">-</font>मेखों को मैं इतना महत्व नहीं देता<font face="Mangal">, </font>जितना भारतीय परमाणु कार्यक्रमों से जुड़े वैज्ञानिकों की ओर से उठाई जा रही आशंकाओं को देता हूं। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इन वैज्ञानिकों की आशंकाओं की भी अनदेखी कर दी है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश के सारे ढांचे को ध्वस्त करने में लगे हुए हैं। पाठकों को याद होगा कि नवंबर <font face="Mangal">2006 </font>में पुलिस और सुरक्षा बल प्रमुखों की दिल्ली में हुई तीन दिवसीय बैठक में आईबी प्रमुख ने आतंकवादियों से निपटने के लिए कारगर कानून की मांग की थी। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इससे साफ इनकार कर दिया। इससे पहले सेना में मुसलमानों की गिनती करवाने के मामले में भी तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने जब सार्वजनिक तौर पर विरोध किया तो सरकार ने सच्चर कमेटी को यह सांप्रदायिक काम करने से रोका था<font face="Mangal">, </font>जबकि इससे पहले प्रणव मुखर्जी संसद में भी सच्चर कमेटी के इस काम की पैरवी कर रहे थे। अब अमेरिका के साथ परमाणु समझौते के मामले में राष्ट्रीय हितों के खिलाफ बने अमेरिकी कानून का कोई विरोध किए जाने की बजाए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बिना देश को भरोसे में लिए समझौते में आगे बढ़ने का फैसला कर लिया है। मैं इस मुद्दे पर खास तौर पर परमाणु ऊर्जा आयोग के चेयरमैन अनिल काकोडकर की आशंकाओं का जिक्र करना चाहूंगा। अनिल काकोडकर ने उस समय भी आशंकाएं जताई थीं<font face="Mangal">, </font>जब मनमोहन सिंह राष्ट्रपति बुश के साथ साझा बयान देकर भारत लौटे थे। अमेरिकी सीनेट और कांग्रेस की ओर से नौ दिसंबर को बिल पास कर देने के बाद अनिल काकोडकर ने <font face="Mangal">13 </font>दिसंबर को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की और उन्हें कानून में रखे गए कुछ प्रावधानों से भारतीय हितों की अनदेखी होने की आशंका जताई। उनकी सबसे बड़ी आशंका यह है कि भारत को अपना परमाणु कार्यक्रम रद्द करना पड़ेगा और यह समझौता एनपीटी और सीटीबीटी पर दस्तखत करने से भी बुरा होगा। लेकिन प्रधानमंत्री ने परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष की आशंका को भी दरकिनार करके इस मामले में आगे बढ़ने का फैसला किया है। हालांकि अनिल काकोडकर ने <font face="Mangal">15 </font>दिसंबर को खुलासा किया है कि उन्हें प्रधानमंत्री ने यह आश्वासन दिया था कि वन टू थ्री समझौता करने से पहले सभी पक्षों को भरोसे में लिया जाएगा और हर पहलू पर विचार किया जाएगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों की अनदेखी किए जाने पर देश के छह प्रमुख वैज्ञानिकों ने बैठक करके अपनी चिंताएं जगजाहिर करने की रणनीति बनाना शुरू कर दिया है। ये वही छह वैज्ञानिक हैं जिन्होंने अगस्त <font face="Mangal">2006 </font>में प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर अपनी चिंताओं से अवगत करवाया था। ये छह वैज्ञानिक हैं डा<font face="Mangal">. </font>होमी सेठना<font face="Mangal">, </font>डा<font face="Mangal">. </font>पीके आयंगर <font face="Mangal">(</font>दोनों परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष<font face="Mangal">), </font>डा<font face="Mangal">. </font>ए<font face="Mangal">.</font>एन<font face="Mangal">. </font>प्रसाद <font face="Mangal">(</font>बीएआरसी के पूर्व अध्यक्ष और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की इराक गई निरीक्षण टीम के सदस्य<font face="Mangal">), </font>डा<font face="Mangal">. </font>ए<font face="Mangal">. </font>गोपालकृष्णन <font face="Mangal">(</font>परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष<font face="Mangal">), </font>डा<font face="Mangal">. </font>प्लेसिड रोड्रिक्स <font face="Mangal">(</font>इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान कलपक्कम के पूर्व निदेशक<font face="Mangal">) </font>और डा<font face="Mangal">. </font>एम<font face="Mangal">.</font>आर<font face="Mangal">. </font>श्रीनिवासन <font face="Mangal">(</font>परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष और आयोग के मौजूदा सदस्य<font face="Mangal">)</font>। मुझे आशंका है कि ये वैज्ञानिक भी तीनों सेनाओं के अध्यक्षों और आईबी प्रमुख की तरह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कोई चेतावनी दे देंगे।</p>
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		<title>विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका का टकराव</title>
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		<pubDate>Sat, 09 Dec 2006 18:40:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[राजग सरकार के समय न्यायपालिका और कार्यपालिका में एक बार टकराब की नौबत आ गई थी, तो अटल बिहारी वाजपेयी ने इस टकराव को टालने के लिए अपने सबसे प्रिय मित्र और तब के विधि मंत्री राम जेठमलानी को मंत्री पद से हटाकर इस टकराव को बचाया था। लेकिन मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बार-बार ऐसे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">राजग सरकार के समय न्यायपालिका और कार्यपालिका में एक बार टकराब की नौबत आ गई थी<font face="Mangal">, </font>तो अटल बिहारी वाजपेयी ने इस टकराव को टालने के लिए अपने सबसे प्रिय मित्र और तब के विधि मंत्री राम जेठमलानी को मंत्री पद से हटाकर इस टकराव को बचाया था। लेकिन मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बार<font face="Mangal">-</font>बार ऐसे हालात पैदा कर रहे हैं<font face="Mangal">, </font>जिनसे टकराव के हालात पैदा हों। हालांकि मनमोहन सिंह अच्छी तरह जानते हैं कि इन टकरावों को बड़ी आसानी से टाला जा सकता है। ऐसा नहीं है कि टकराव के हर मुद्दे पर न्यायपालिका ही सही है<font face="Mangal">, </font>लेकिन जिस तरह कार्यपालिका और विधायिका हर मुद्दे पर खुद को सुप्रीम समझते हुए न्यायपालिका को नीचा दिखाने की कोशिश कर रही है<font face="Mangal">, </font>उससे टकराव बढ़ रहा है। <span id="more-123"></span>वरना जिन छोटे<font face="Mangal">-</font>मोटे मुद्दों पर न्यायपालिका गलत भी हो<font face="Mangal">, </font>उन्हें बड़ी आसानी से हल किया जा सकता है। जैसे शहरी विकास मंत्रालय की ओर से दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए मकान अलाट करने का मामला। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहली नजर में ही गलत दिखाई देती है<font face="Mangal">, </font>लेकिन सरकार ने जो रवैया अपना लिया है उस कारण सुप्रीम कोर्ट भी कई बार जिद पकड़ रही है। शहरी विकास मंत्रालय ने कुछ कोठियां न्यायपालिका के लिए तय की हुई हैं<font face="Mangal">, </font>अगर कोई जज रिटायर होता है तो वह कोठी नए जज को अलाट हो जाती है। इसी तरह मंत्रियों के लिए भी कोठियां तय हैं<font face="Mangal">, </font>जो मंत्रियों के साथ<font face="Mangal">-</font>साथ बदलती रहती हैं। लेकिन इस बार विवाद यह खड़ा हो गया कि सुप्रीम कोर्ट का कोई जज पहले वाले जज की ओर से खाली की जाने वाली कोठी के बजाए अपनी मनमर्जी की कोठी मांग रहा है। किसी जज ने नजमा हेपतुल्ला की कोठी पर उंगली रख दी और शहरी विकास मंत्रालय को वह कोठी देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यह वैसे ही संवैधानिक सत्ता का दुरुपयोग है<font face="Mangal">, </font>जैसे विधायिका और कार्यपालिका संवैधानिक नियम<font face="Mangal">-</font>कायदों को ताक पर रखकर कोई फैसला करे। सुप्रीम कोर्ट का काम संवैधानिक नियम<font face="Mangal">-</font>कायदों की रक्षा करना है<font face="Mangal">, </font>अगर कोई प्रभावित व्यक्ति जनहित याचिका लेकर या इंसाफ की गुहार लगाते हुए अदालत में जाए और अदालत उस पर फैसला करे<font face="Mangal">, </font>तो इसे विधायिका या कार्यपालिका में दखल नहीं माना जाना चाहिए। मैंने पहले भी यह बात कई बार जोर देकर लिखी है कि श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में यह भ्रम फैला दिया कि विधायिका यानी संसद सर्वोच्च है। इंदिरा गांधी की यह धारणा संविधान के ढांचे से मेल नहीं खाती<font face="Mangal">, </font>क्योंकि हमारे संसदीय लोकतंत्र में संसद भी संविधान के नियम<font face="Mangal">-</font>कायदे के तहत काम करती है। कोई संवैधानिक प्रावधान बदलना हो तो उसके लिए भी एक प्रक्रिया है<font face="Mangal">, </font>मामूली बहुमत के बल पर संविधान के मूल ढांचे को नहीं बदला जा सकता। हमने देश की आजादी के बाद कोई <font face="Mangal">90 </font>बार संशोधन कर लिया है। इन संशोधनों पर सुप्रीम कोर्ट ने कभी एतराज नहीं किया<font face="Mangal">, </font>शर्त सिर्फ यह है कि संविधान की मूल धारणा में फेरबदल नहीं होना चाहिए। लेकिन मौजूदा टकराव यह पैदा हो रहा है कि विधायिका और कार्यपालिका के रोजमर्रा के कामों पर भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले आ रहे हैं। इस पर कार्यपालिका और विधायिका हताशा का शिकार हो गई हैं। सुप्रीम कोर्ट को अपने दायरे में रखने के लिए मौजूदा सरकार में न्यायपालिका को जवाबदेह बनाने की कोशिश संबंधी जो कानून बनाने की बात की जा रही है<font face="Mangal">, </font>यह इसी हताशा का नतीजा है और सरकार के इस कदम ने न्यायपालिका को और हमलावर बना दिया है। यह टकराव पैदा करने की एक अपरिपक्व कोशिश है<font face="Mangal">, </font>मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि मौजूदा विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज इन टकरावों को टालने के पक्ष में रहे हैं<font face="Mangal">, </font>लेकिन मनमोहन सिंह वामपंथियों और भ्रष्ट सांसदों के दबाव में टकराव मोल लेने की कोशिश कर रहे हैं। हाल ही में आईएमडीटी एक्ट<font face="Mangal">, </font>बांग्लादेशी घुसपैठिए<font face="Mangal">, </font>अवैध निर्माण<font face="Mangal">, </font>आरक्षण में क्रीमीलेयर<font face="Mangal">, </font>अल्पसंख्यकों को आरक्षण<font face="Mangal">, </font>भ्रष्टाचार के मामलों में चार्जशीट से पहले सरकार की इजाजत<font face="Mangal">, </font>हत्या के मामलों में सांसदों को सजा संबंधी फैसलों से विधायिका और कार्यपालिका खफा हैं। कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति इन सभी मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को उचित ठहराएगा। सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों पर अगर जनमत संग्रह करवाया जाए और जनमत संग्रह में सिर्फ पढ़े<font face="Mangal">-</font>लिखे लोगों को वोट डालने के लिए कहा जाए<font face="Mangal">, </font>तो मेरा मानना है कि <font face="Mangal">95 </font>फीसदी लोग न्यायपालिका के हक में होंगे। सवाल पैदा होता है कि इन सब मुद्दों में न्यायपालिका ने फैसले दिए ही क्यों<font face="Mangal">, </font>स्वाभाविक है कि जब कोई व्यक्ति इंसाफ के लिए दरवाजा खटखटाएगा<font face="Mangal">, </font>तो न्यायपालिका अपना काम करेगी ही। लेकिन विधायिका और कार्यपालिका न तो खुद ईमानदारी से काम कर रही हैं और न ही न्यायपालिका को काम करने दे रही हैं<font face="Mangal">, </font>अगर न्यायपालिका संविधान के तहत फैसले देती है<font face="Mangal">, </font>तो वह कार्यपालिका और विधायिका को मंजूर नहीं। आईएमडीटी कानून ऐसा बन गया था<font face="Mangal">, </font>जिससे भारत के मूल नागरिकों और कार्यपालिका के हितों की रक्षा नहीं हो रही थी<font face="Mangal">, </font>अलबत्ता विदेशी घुसपैठियों के हितों की रक्षा हो रही थी। इस कानून के तहत किसी घुसपैठिए को पकड़े जाने पर उसे अदालत में अपने भारतीय होने का सबूत नहीं देना पड़ता था<font face="Mangal">, </font>अलबत्ता कार्यपालिका की जिम्मेदारी थी कि वह उसे घुसपैठिया साबित करे। हमारी कार्यपालिका इतनी कमजोर है कि उसे आसानी से खरीदा जा सकता है<font face="Mangal">, </font>जो घुसपैठिया बड़ी आसानी से राशन कार्ड<font face="Mangal">, </font>वोटर पहचान पत्र और पासपोर्ट तक बनवा ले<font face="Mangal">, </font>उसे कार्यपालिका कैसे घुसपैठिया साबित करेगी। अबू सलेम और मोनिका बेदी के आधा<font face="Mangal">-</font>आधा दर्जन पासपोर्ट हमारी कार्यपालिका के बड़ी आसानी से बिक जाने का जीता<font face="Mangal">-</font>जागता सबूत हैं। घुसपैठिए बड़ी आसानी से रिश्वतखोरी के बल पर इतने सबूत इकट्ठे कर लेते थे<font face="Mangal">, </font>कि आईएमडीटी एक्ट उनके लिए खुद को भारतीय साबित करने का हथियार बन गया था। स्थानीय नागरिक इस कानून के खिलाफ लंबे समय से आंदोलनरत थे<font face="Mangal">, </font>लेकिन किसी ने सुप्रीम कोर्ट में दरख्वास्त नहीं दी थी<font face="Mangal">, </font>आखिर जब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया और अदालत ने इस कानून के गुण<font face="Mangal">-</font>दोषों पर विचार किया<font face="Mangal">, </font>तो पाया कि यह कानून भारत की सुरक्षा के लिए नुकसानदेह था। सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को रद्द किया<font face="Mangal">, </font>तो पहले पहल सरकार की प्रतिक्रिया अदालत का सम्मान करने की थी<font face="Mangal">, </font>लेकिन असम में रह रहे बांग्लादेशी वोटरों के दबाव में मनमोहन सिंह ने राष्ट्र के हितों से खिलवाड़ करने में भी कोई गुरेज नहीं किया। जब कार्यपालिका देश और संविधान के प्रति इतनी लापरवाह हो जाए<font face="Mangal">, </font>तो न्यायपालिका को देश और संविधान की रक्षा करनी ही पड़ेगी। बिहार विधानसभा को सरकार बनाने का मौका दिए बिना ही भंग करना कार्यपालिका और विधायिका का संविधान विरोधी कुकर्म था। विधायिका और कार्यपालिका इसके लिए कतई शर्मसार नहीं<font face="Mangal">, </font>अलबत्ता सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नाक<font face="Mangal">-</font>भौं सिकोड़ रही हैं। इसी तरह जनता की ओर से चुने गए सांसदों को बिना किसी नियम<font face="Mangal">-</font>कायदे और संवैधानिक प्रावधान के बर्खास्त करना विधायिका का भीड़तंत्र बन जाने का सबसे बड़ा सबूत है। फिर यह कहना कि अदालत उस पर सुनवाई तक न करे<font face="Mangal">, </font>विधायिका की तानाशाही का सबूत ही है। दिल्ली की अवैध दुकानों को ही लो<font face="Mangal">, </font>कार्यपालिका जानबूझकर कानून का उल्लंघन करती और करवाती रही<font face="Mangal">, </font>यह भी रिश्वतखोरी का एक बड़ा मामला है। कार्यपालिका के अफसर अपनी जेबें भरकर रिहायशी इलाकों में दुकानें बनवाते रहे<font face="Mangal">, </font>जब बेचारे <font face="Mangal">&#8216;</font>रेजीडेंट्स<font face="Mangal">&#8216; </font>अदालत में गए तो सुप्रीम कोर्ट को नियम<font face="Mangal">-</font>कायदों का हवाला देना पड़ा। लेकिन कार्यपालिका और विधायिका संविधान और कानून का साथ नहीं दे रही<font face="Mangal">, </font>अलबत्ता कानून<font face="Mangal">-</font>कायदे की धाियां उड़ाने वालों का साथ दे रही है<font face="Mangal">, </font>जो महत्वपूर्ण वोटर हैं। विधायिका और कार्यपालिका की सबसे बड़ी कमजोरी वोटर और भ्रष्टाचार बन चुका है। न्यायपालिका देश को भ्रष्टाचार और भीड़तंत्र से बचाने की कोशिश में जुटी हुई है<font face="Mangal">, </font>इसीलिए विधायिका और कार्यपालिका ने उसके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है।</p>
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		<title>संसद में अपराधी नहीं, अब अपराधियों की संसद</title>
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		<pubDate>Sat, 02 Dec 2006 18:34:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पिछले हफ्ते दो सांसद हत्या के मामले में अपराधी घोषित किए गए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस कटघरे में थी कि शिबू सोरेन पर हत्या के दो मुकदमे चल रहे थे, फिर भी उन्हें केबिनेट मंत्री बना दिया गया। कांग्रेस और मनमोहन सिंह को कटघरे में खड़ा करने वाली भाजपा दो ही दिनों में खुद [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">पिछले हफ्ते दो सांसद हत्या के मामले में अपराधी घोषित किए गए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस कटघरे में थी कि शिबू सोरेन पर हत्या के दो मुकदमे चल रहे थे<font face="Mangal">, </font>फिर भी उन्हें केबिनेट मंत्री बना दिया गया। कांग्रेस और मनमोहन सिंह को कटघरे में खड़ा करने वाली भाजपा दो ही दिनों में खुद कटघरे में खड़ी हो गई<font face="Mangal">, </font>क्योंकि उसके सांसद नवजोत सिंह सिध्दू भी मौत के एक मामले में दफा <font face="Mangal">304 </font>में अपराधी घोषित हो गए। मनमोहन सिंह ने अगर यह जानते हुए भी शिबू सोरेन को मंत्री बनाया था<font face="Mangal">, </font>कि वह हत्या के दो मामलों में अभियुक्त है<font face="Mangal">, </font>तो भाजपा ने भी यह जानते हुए नवजोत सिंह सिध्दू को अमृतसर से पार्टी का टिकट दिया कि हत्या के एक मामले में उस पर हाई कोर्ट में केस लंबित है<font face="Mangal">, </font>भले ही वह निचली अदालत से बरी हो चुका था। <span id="more-122"></span>दोनों केसों में गुण<font face="Mangal">-</font>दोष अलग<font face="Mangal">-</font>अलग हो सकते हैं<font face="Mangal">, </font>मनमोहन सिंह ने इस मामले को कतई गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने मंत्री से इस्तीफा लेकर अपने फर्ज का अंत मान लिया<font face="Mangal">, </font>जबकि उन्हें इस बात के लिए देश से माफी मांगनी चाहिए कि उनके हाथों कितना बड़ा अपराध हुआ। अफसोस तो यह है कि चंद हजार रुपए की रिश्वत लेने पर सांसदों को बर्खास्त कर दिया गया<font face="Mangal">, </font>लेकिन हत्या के मामले में आरोपी साबित हो चुके शिबू सोरेन अभी भी सांसद बने हुए हैं और उनकी सदस्यता रद्द करने का कदम उठाने के लिए कोई गंभीर नहीं है। इस मामले में नवजोत सिंह सिध्दू की तारीफ करनी पड़ेगी कि निचली अदालत से बरी होने और सुप्रीम कोर्ट में याचिका का दरवाजा खुला होने के बावजूद उन्होंने हाईकोर्ट का फैसला आने के तीन घंटे के भीतर लोकसभा स्पीकर के पास जाकर अपना इस्तीफा सौंप दिया। इस्तीफा या बर्खास्तगी कुछ तो होना ही चाहिए। संसद इस बात के लिए भी शर्मसार नहीं है कि पप्पू यादव जैसे हत्या के आरोपी उसके कई सदस्य लंबे समय तक जेलों में पड़े रहते हैं। मोटा सवाल यह है कि राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए और उन्हें अब तक क्यों नहीं उठाया गया। करीब पांच साल पहले चुनाव आयोग ने राजनीति का अपराधीकरण खत्म करने के लिए कुछ उपाय सुझाए थे<font face="Mangal">, </font>उन उपायों पर उस समय सरकार ने विचार विमर्श किया और एक बिल तैयार किया। इस बिल में यह प्रावधान रखा गया था कि अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसे तीन मुकदमें लंबित हों<font face="Mangal">, </font>जिन पर कोर्ट ने चार्जशीट का संज्ञान लिया हो<font face="Mangal">, </font>उसे चुनाव लड़ने की योग्यता से वंचित किया जाए। इस बिल के खिलाफ बहुत सारे तर्क हो सकते हैं<font face="Mangal">, </font>जैसे राज्य सरकारें अपने राजनीतिक विरोधियों<font face="Mangal">, </font>खासकर चुनाव जीत सकने वाले राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ ढ़ेर सारे मुकदमे दायर कर सकती है और राज्य की पुलिस मशीनरी चुनावों से पहले अदालत में चार्जशीट दाखिल कर सकती है। हालांकि इस बिल के ड्राफ्ट में यह प्रावधान रखा गया था कि कम से कम तीन मुकदमों पर कोर्ट की ओर से संज्ञान लिया हुआ होना चाहिए। भले ही राज्य सरकारें अपनी पुलिस मशीनरी से फर्जी मुकदमे दायर करवाने में सक्षम हो<font face="Mangal">, </font>लेकिन यह मान लेना कि अदालतें भी राज्य सरकारों के इशारे पर किसी राजनीतिक खेल में शामिल हो जाएंगी<font face="Mangal">, </font>अपने आप में पूरी व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाना होगा। लेकिन अफसोस कि अपने आप में पुख्ता बिल पर भी सर्वदलीय बैठक में सवालिया निशान लग गया। मुझे वह दिन याद है जब संसद भवन के हॉल नंबर <font face="Mangal">53 </font>में अटल बिहारी वाजपेयी ने इस मुद्दे पर आम राय बनाने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई थी और बिल का ड्राफ्ट राजनीतिक दलों के सामने रखा था। समाजवादी पार्टी<font face="Mangal">, </font>वामपंथी पार्टी और कांग्रेस पार्टी ने इस बिल का विरोध किया। उनके तर्क वही थे<font face="Mangal">, </font>जिनका जिक्र मैंने ऊपर किया है<font face="Mangal">, </font>बिल का विरोध करते हुए इन तीनों राजनीतिक दलों ने राज्यों की पुलिस व्यवस्था पर ही नहीं<font face="Mangal">, </font>बल्कि न्यायिक व्यवस्था पर भी सवालिया निशान लगा दिया। एक मायने में देखा जाए तो इन राजनीतिक दलों ने बिल का विरोध करके न्यायिक व्यवस्था के खोखलेपन को उजागर कर दिया। कैसी है यह न्यायिक व्यवस्था जो सरकार चलाने वाले और कानून बनाने वाले राजनीतिक दलों की नजर में कोई मायने नहीं रखती। ऐसी कानून व्यवस्था जिसे खरीदा जा सकता है। आज संसद की यह हालत हो गई है कि एक हफ्ते में ही दो<font face="Mangal">-</font>दो सांसद हत्या के मामले में आरोपी साबित हो जाते हैं<font face="Mangal">, </font>तो क्या देश की संसदीय प्रणाली पर सवालिया निशान नहीं है। जो राजनीतिक दल राजनीति के अपराधीकरण रोकने के बिल का विरोध कर रहे थे<font face="Mangal">, </font>क्या वे अब शर्मिंदगी महसूस नहीं कर रहे। अगर वे शर्मिंदगी महसूस कर रहे हैं तो अब समय आ गया है कि रद्दी की टोकरी में फेंके गए उस बिल को बिना कोई कांट<font face="Mangal">-</font>छांट किए संसद में पास किया जाए<font face="Mangal">, </font>ताकि संसदीय प्रणाली की गिरती हुई साख को बचाया जा सके। आज हालत यह हो गई है कि मौजूदा संसद में डेढ़ सौ से ज्यादा ऐसे सांसद बैठे हुए हैं<font face="Mangal">, </font>जिन पर गंभीर अपराधों के मुकदमें चल रहे हैं। माना कि राजनीतिक आंदोलनों के कारण राजनेताओं पर मुकदमे दायर होते हैं<font face="Mangal">, </font>लेकिन कानून बनाते समय यह बात तय की जा सकती है कि वे चार्जशीट किन मामलों के होंगी। किसी राजनीतिक आंदोलन के कारण दायर हुई एफआईआर को इस दायरे से खारिज किया जा सकता है। यह तय करने का अधिकार चुनाव आयोग को दिया जा सकता है<font face="Mangal">, </font>इसमें हर्ज क्या होगा। अगर अब भी राजनीतिक दल नहीं जागे<font face="Mangal">, </font>तो अगली लोकसभा में ऐसे लोगों की तादाद और बढ़ेगी<font face="Mangal">, </font>जो आपराधिक मामलों में लिप्त होंगे। अगर इसे अभी नहीं रोका गया तो देश की जनता का विश्वास राजनीतिक नेताओं नहीं<font face="Mangal">, </font>अलबत्ता संसदीय व्यवस्था से ही उठ जाएगा। क्रांति के संकेत नेपाल से लिए जा सकते हैं<font face="Mangal">, </font>अगर नेपाल से सबक नहीं लेना हो तो हाल ही में भारत में ही कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं<font face="Mangal">, </font>जो सबक के लिए काफी हैं। बलात्कार और हत्या के मामलों में पुलिस प्रशासन की अपराधियों से सांठगांठ के कारण देश में कई जगह पर जनता सड़कों पर उतरकर शासकों को सबक सिखा चुकी है। यह जनता के आक्रोश का एक संकेत मात्र है<font face="Mangal">, </font>जिसे बड़े परिदृश्य में नहीं देखना अदूरदर्शिता ही होगी। इसलिए अभी भी समय है कि लोकसभा को अपराधसभा बनाने से रोकने के कदम उठा लिए जाएं<font face="Mangal">, </font>वरना बहुत देर हो जाएगी।</p>
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		<title>संसदीय प्रणाली पर चोट करने का स्टिंग ऑपरेशन</title>
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		<pubDate>Sat, 25 Nov 2006 18:34:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[देश बड़ी बेसब्री से ग्यारह सांसदों की बर्खास्तगी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहा है। तेरह जनवरी को चीफ जस्टिस वाई के सभ्रवाल रिटायर हो जाएंगे। उससे पहले फैसला आना स्वाभाविक है। लेकिन माना यह जाना चाहिए कि 15 दिसम्बर को सुप्रीम कोर्ट की छुट्टियों से पहले फैसला आना चाहिए। वैसे अगर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">देश बड़ी बेसब्री से ग्यारह सांसदों की बर्खास्तगी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहा है। तेरह जनवरी को चीफ जस्टिस वाई के सभ्रवाल रिटायर हो जाएंगे। उससे पहले फैसला आना स्वाभाविक है। लेकिन माना यह जाना चाहिए कि <font face="Mangal">15 </font>दिसम्बर को सुप्रीम कोर्ट की छुट्टियों से पहले फैसला आना चाहिए। वैसे अगर फैसला शीत सत्र से पहले या शीत सत्र के दौरान आ जाता<font face="Mangal">, </font>तो अच्छा रहता। पिछले एक साल से लोकसभा के दस सांसदों ने सदन का मुंह नहीं देखा। सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी सांसदों के क्षेत्रों में चुनाव करवाने पर भी रोक लगा दी थी। मेरा शुरू से यह मत रहा है कि संसद को संविधान के किसी प्रावधान में सांसदों को बर्खास्त करने का हक नहीं दिया। <span id="more-121"></span>मेरा यह भी मानना रहा है कि संसद सर्वोच्च नहीं है<font face="Mangal">, </font>अलबता संविधान सर्वोच्च है<font face="Mangal">, </font>इसलिए संसद को संविधान के तहत मिले अधिकारों के तहत काम करना चाहिए। लेकिन लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने उस समय सांसदों को बर्खास्त करवाने के लिए एक्टीविस्ट की भूमिका निभाई। पिछले दिनों एक संसदीय प्रतिनिधि मंडल कुछ देशों के दौर पर गया था। इस प्रतिनिधिमंडल में लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी के साथ प्रियरंजन दासमुंशी और विजय कुमार मल्होत्रा भी थे। जिस देश में भी यह प्रतिनिधि मंडल गया<font face="Mangal">, </font>मल्होत्रा ने वहां एक सवाल जरूर उठाया कि वहां की संसद को अपने सांसदों को बर्खास्त करने का हक है या नहीं। हर जगह से करीब करीब यह जवाब मिला कि भ्रष्टाचार या अन्य मामलों में फैसला अदालतों में होता हैं<font face="Mangal">, </font>संसद अदालत नहीं बनती। विजय कुमार मल्होत्रा यह सवाल जानबूझकर उठा रहे थे और हर जवाब के बाद प्रियरंजन दासमुंशी और सोमनाथ चटर्जी के सिर झुक जाते थे। दासमुंशी भले ही जल्दबाजी में की गई गलती का एहसास कर रहे हो<font face="Mangal">, </font>लेकिन मेरा पक्का मानना है कि सोमनाथ चटर्जी को यह एहसास कतई नहीं<font face="Mangal">, </font>अलबता मेरा यह भी मानना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि संसद को सांसदों को बर्खास्त करने का हक नहीं था<font face="Mangal">, </font>तो सोमनाथ चटर्जी इस फैसले का विरोध करेंगे। सोमनाथ चटर्जी इससे पहले झारखंड के राज्यपाल सिबते रजी की ओर से बहुमत न होने के बावजूद शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने और उन्हें बहुमत साबित करने के लिए महीने भर का समय देने पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार का विरोध कर चुके हैं। लेकिन इससे भी अहम सवाल यह कि क्या स्टिंग ऑपरेशनों को इसी तरह होने देना चाहिए और स्टिंग ऑपरेशनों के मुद्दे पर कोई कानून कायदा नहीं बनाया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने ग्यारह सांसदों की बर्खास्तगी पर सुनवाई करते समय एक अहम टिप्पणी की है। यह टिप्पणी गौर करने लायक है। इस टिप्पणी में उन्होंने कहा है कि अगर कोई स्टिंग ऑपरेशन मुनाफा कमाने के लिए किया जा रहा हो<font face="Mangal">, </font>तो उसे जर्नलिज्म के नाम पर छूट नहीं दी जा सकती। पाठकों को याद होगा कि अनिरूद्ध बहल ने बंसल कमेटी के सामने यह कबूल किया था कि उसने आज तक को अपना स्टिंग ऑपरेशन <font face="Mangal">57 </font>लाख रूपए में बेचा था<font face="Mangal">, </font>यानी वह स्टिंग ऑपरेशन मुनाफे के लिए था। अगर हर स्टिंग ऑपरेशन को टीवी पर दिखाए जाने को ही सही मान लिया जाए और आरोपी को जिरह करने और अपनी बेगुनाही साबित करने का मौका नहीं दिया जाना है<font face="Mangal">, </font>तो सवाल पैदा होगा कि गृह राज्य मंत्री गोवित को तो उसी समय बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए था<font face="Mangal">, </font>जिसे जी टीवी ने माफिया डॉन के साथ बातचीत करता हुआ सुनाया था। लेकिन गोवित के मामले में न तो सरकार उतनी सक्रिय दिखी<font face="Mangal">, </font>न लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी। लेकिन <font face="Mangal">57 </font>लाख रूपए का मुनाफा कमाने के बाद अनिरूद्ध बहल के हौंसले ज्यादा बुलंद हो चुके हैं और अब नक्सलवादियों और वामपंथियों का संसदीय प्रणाली तहस नहस करने का मकसद पूरा करने की कोशिशें तेज हो गई हैं। संसदीय प्रणाली को ध्वस्त करने के लिए बड़ा आसान सा तरीका है कि सांसदों की छवि धूमल कर दी जाए। लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी इस तरह के किसी स्टिंग ऑपरेशन में शामिल है या नहीं<font face="Mangal">, </font>लेकिन यह सच है कि वह हमेशा भ्रष्टाचार को बेनकाब करने के लिए स्टिंग ऑपरेशनों के पक्ष में रहे हैं। भ्रष्टाचार को बेनकाब करने के लिए हर कोई स्टिंग ऑपरेशन का समर्थन ही करेगा<font face="Mangal">, </font>लेकिन इसकी आड़ में संसदीय प्रणाली को निशाना बनाया जा रहा हो<font face="Mangal">, </font>तो देश को उससे सावधान रहने की जरूरत है। संसद में सवाल पूछने के मुद्दे पर ऑपरेशन करने वाली सुहासिनी अब इस ऑपरेशन में जुट चुकी हैं। सूचना के अधिकार के तहत लोकसभा सचिवालय ने <font face="Mangal">180 </font>सांसदों की जायदाद का बयोरा कोबरा डॉट काम को सौंप दिया है। अब इन <font face="Mangal">180 </font>सांसदों की ओर से लोकसभा में दिए गए जायदाद के बयोरे<font face="Mangal">, </font>चुनाव आयोग को चुनाव लड़ने से पहले दिए गए बयोरे और उन सांसदों के क्षेत्रों में उनकी जायदाद<font face="Mangal">, </font>उनकी रिश्तेदारों की जायदाद के स्टिंग ऑपरेशन शुरू हो चुके हैं। हालांकि स्थिति फिर वही होगी कि स्टिंग ऑपरेशन के दावे कितने सच्चे हैं<font face="Mangal">, </font>उसकी जांच कौन करेगा<font face="Mangal">, </font>न्यायपालिका या स्पीकर की बनाई हुई बंसल कमेटी। जांच अदालत में हो या किसी बंसल कमेटी की ओर से<font face="Mangal">, </font>लेकिन करीब डेढ़ सौ सांसदों की छवि बिगाड़ने का मतलब संसदीय प्रणाली से जनता का मोह भंग करना है<font face="Mangal">, </font>जिसमें यह स्टिंग ऑपरेशन आसानी से कामयाब हो जाएगा। भारत की संसदीय प्रणाली और लोकतंत्र को दांव पर लगाने के लिए सिर्फ स्टिंग ऑपरेशन नहीं किए जा रहे<font face="Mangal">, </font>अलबता बड़ी धीमी गति से<font face="Mangal">, </font>लेकिन सोची समझी योजना के तहत माओवादी नक्सलियों के जरिए भारत में घुस रहे हैं। मौजूदा व्यवस्था को ध्वस्त करके जिस तरह नेपाल में चीन के माओवादियों ने अपना मकसद हासिल किया है<font face="Mangal">, </font>बिलकुल वैसे ही भारत में तैयारी हो रही है और इस तैयारी में भारत के वामपंथी भी बराबर के हिस्सेदार हैं। पहले भी किसी स्टिंग ऑपरेशन में वामपंथियों और उनके सहयोगियों को शामिल नहीं किया गया और अब भी नहीं किया जाएगा। राजनेताओं ने सता का दुरूपयोग करके आपार संपति जोड़ी हैं<font face="Mangal">, </font>इनमें कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के सांसद शामिल हैं और इन दोनों दलों के सांसदों को बेनकाब करके संसदीय प्रणाली पर चोट करने की रणनीति बन चुकी है।</p>
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		<title>करजई-मनमोहन चाहें, तो मुशर्रफ होंगे मुश्किल में</title>
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		<pubDate>Sat, 18 Nov 2006 18:34:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पाकिस्तान के विदेश सचिव रियाज मोहम्मद खान इस बार भारत आए, तो काफी डरे हुए थे। इसकी ताजा वजह यह है कि बलूचिस्तान और नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रॉवींस में जंग-ए-आजादी एक बार फिर मुंह बाए खड़ी है। पाकिस्तान के विदेश सचिव इस्लामाबाद लौटे ही थे, कि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद करजई शिमला से होते हुए दिल्ली [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">पाकिस्तान के विदेश सचिव रियाज मोहम्मद खान इस बार भारत आए<font face="Mangal">, </font>तो काफी डरे हुए थे। इसकी ताजा वजह यह है कि बलूचिस्तान और नार्थ<font face="Mangal">-</font>वेस्ट फ्रंटियर प्रॉवींस में जंग<font face="Mangal">-</font>ए<font face="Mangal">-</font>आजादी एक बार फिर मुंह बाए खड़ी है। पाकिस्तान के विदेश सचिव इस्लामाबाद लौटे ही थे<font face="Mangal">, </font>कि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद करजई शिमला से होते हुए दिल्ली पहुंच गए। बलुचिस्तान और नार्थ वेस्ट फ्रंटियर का भारत से शायद उतना नाता नहीं है<font face="Mangal">, </font>जितना अफगानिस्तान से है। पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर के मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इतना बड़ा विवाद का मुद्दा बना दिया<font face="Mangal">, </font>लेकिन खुद उसने बिना बलुचिस्तान और नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोवींस से कोई बात किए इन दोनों सीमांत राज्यों पर बलात कबजा किया था। <span id="more-120"></span>इनमें से नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोवींस तो बाकायदा अफगानिस्तान का हिस्सा था<font face="Mangal">, </font>जबकि बलुचिस्तान एक ऐसा स्वतंत्र देश था<font face="Mangal">, </font>जिस पर कभी अंग्रेज भी पूरी तरह कबजा नहीं कर पाए थे। जब अंग्रेजों ने भारत को आजाद किया और देश का बंटवारा हुआ तो अंग्रेजों ने जम्मू कश्मीर के साथ<font face="Mangal">-</font>साथ बलुचिस्तान और नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोवींस के बारे में भी कोई फैसला नहीं किया था। थोड़ा इतिहास में जाना पड़ेगा। बात <font face="Mangal">1893 </font>की है<font face="Mangal">, </font>जब अफगानिस्तान के तबके शासक आमीर अबदुल रहमान खान और ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव सर हेनरी मोरटाइमर डूरंड में एक समझौता हुआ। इस समझौते के तहत ब्रिटेन ने नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोवींस को अफगानिस्तान से लीज पर ले लिया था और <font face="Mangal">2,450 </font>किलोमीटर की सीमा तय की गई थी। हालांकि इस सीमा क्षेत्र में बलुचिस्तान भी आता था<font face="Mangal">, </font>लेकिन उसे न तो भरोसे में लिया गया और न समझौते पर तबके बलुचिस्तान के शासक के दस्तखत करवाए गए<font face="Mangal">, </font>अलबता ब्रिटिश विदेश सचिव डूरंड ने झूठ बोला कि बलुचिस्तान ब्रिटिश भारत के कबजे में है। यह <font face="Mangal">2,450 </font>किलोमीटर की सीमा तीन देशों की सीमा थी और त्रिपक्षीय समझौता होना चाहिए था<font face="Mangal">, </font>लेकिन अंग्रेजों की मक्कारी के कारण बलुचिस्तान को पूरी तरह अंधेरे में रखा गया। अफगानिस्तान के साथ अंग्रेजों ने इतना बड़ा धोखा किया कि वहां के मौजूदा राष्ट्रपति हामिद करजई इस डूरंड लाईन को धोखे की लाईन कहकर पुकारते हैं। करजई की तरफ से डूरंड लाईन को धोखे की लाईन कहे जाने का साफ मतलब है कि अफगानिस्तान ने कम से कम नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोवींस पर अपना दावा आज भी नहीं छोड़ा है। इतिहासकार बताते हैं कि ब्रिटिश इंडिया के विदेश सचिव डूरंड ने अफगानिस्तान के शासक आमीर अबदुल रहमान खान को कहा था कि नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोवींस की लीज <font face="Mangal">1993 </font>में खत्म हो जाएगी। हालांकि लिखित दस्तावेजों में इसका कोई जिक्र नहीं है<font face="Mangal">, </font>अगर लिखित दस्तावेजों में इसका जिक्र होता तो भले ही अंग्रेज भारत<font face="Mangal">-</font>पाक छोड़कर चले गए हों<font face="Mangal">, 1993 </font>में नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोवींस का उसी तरह अफगानिस्तान में हस्तांतरण हो जाना चाहिए था<font face="Mangal">, </font>जिस तरह हांगकांग का चीन में हुआ है। लेकिन अंग्रेजों ने यहां भी अपनी मक्कारी नहीं छोड़ी। जब भारत<font face="Mangal">-</font>पाक का बंटवारा हुआ तो अंग्रेजों ने नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोवींस पाकिस्तान को सौंप दिया<font face="Mangal">, </font>लेकिन बलुचिस्तान क्योंकि उसके कबजे में था ही नहीं<font face="Mangal">, </font>इसलिए वह पाकिस्तान को नहीं सौंपा गया था। जिस समय भारत आजाद हो रहा था और उसका बंटवारा हो रहा था तो उसी समय अफगानिस्तान में <font face="Mangal">&#8216;</font>लोया जिरगा<font face="Mangal">&#8216; (</font>कबीलों के सरदारों की पंचायत<font face="Mangal">) </font>हुआ और डूरंड रेखा को पूरी तरह खारिज कर दिया गया। अफगानिस्तान ने यह मामला संयुक्त राष्ट्र में भी उठाया<font face="Mangal">, </font>लेकिन इस छोटे से देश की वहां से किसी ने मदद नहीं की। उधर <font face="Mangal">11 </font>अगस्त <font face="Mangal">1947 </font>को लार्ड माउंटबेटन ने कलत के खान मीर अहमद यार खान को बुलाकर बलुचिस्तान पूरी तरह उसके हवाले कर दिया। कलत के खान ने बलुचिस्तान को एक आजाद देश घोषित कर दिया<font face="Mangal">, </font>मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने एक बयान में मीर अहमद यार खान के तहत बलुचिस्तान को एक स्वतंत्र देश घोषित करने का स्वागत किया था। <font face="Mangal">&#8216;</font>न्यूयार्क टाईम्स<font face="Mangal">&#8216; </font>के <font face="Mangal">12 </font>अगस्त <font face="Mangal">1947 </font>के अखबार में यह खबर छपी थी कि पाकिस्तान ने एक समझौते के तहत कलत को आजाद देश मान लिया है और नई दिल्ली ने भी इसका स्वागत किया है। अगले दिन यानी <font face="Mangal">13 </font>अगस्त <font face="Mangal">1947 </font>को बंटवारे का जो नक्शा <font face="Mangal">&#8216;</font>न्यूयार्क टाईम्स<font face="Mangal">&#8216; </font>में छपा<font face="Mangal">, </font>उसमें कलत के तहत बलुचिस्तान को अलग देश दिखाया गया था। उस समय पाकिस्तान और कलत के शासक मीर अहमद यार खान के बीच हुए समझौते में संचार और व्यापार संबंधी फैसले हो गए थे<font face="Mangal">, </font>जबकि रक्षा और विदेश मामलों संबंधी बातचीत होनी बाकी थी। पंद्रह अगस्त <font face="Mangal">1947 </font>को जब भारत में आजादी का एलान हो रहा था<font face="Mangal">, </font>उसी समय बलुचिस्तान के शासक मीर अहमद यार खान ने वहां एक रैली की<font face="Mangal">, </font>जिसमें उन्होंने आजाद देश का एलान करते हुए पंद्रह अगस्त को आजादी दिवस के तौर पर घोषित किया। देश को चलाने के लिए दो सदन भी गठित कर दिए गए<font face="Mangal">, </font>जिसकी पहली बैठक में स्वतंत्र देश की पुष्टि की गई। यह सब हो जाने के बाद मोहम्मद अली जिन्ना ने खान से बात की और बलुचिस्तान का पूरी तरह पाकिस्तान में विलय करने का प्रस्ताव रखा<font face="Mangal">, </font>लेकिन खान ने इसे नामंजूर कर दिया। यह मामला बलुचिस्तान के दोनों सदनों में भी गया और दोनों सदनों ने भी इसे खारिज कर दिया। इसके बाद <font face="Mangal">15 </font>अप्रैल <font face="Mangal">1948 </font>को पाकिस्तान की फौजों ने बलुचिस्तान पर चढ़ाई कर दी। कलत विधानसभा के सारे विधायकों को बंदी बना लिया गया और बलुचिस्तान पर विजय का एलान कर दिया गया। भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और उस समय तक भारत में मौजूद लार्ड माउंटबेटेन ने इसका जरा भी विरोध नहीं किया। महात्मा गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले सीमांत गांधी अबदुल गफ्फार खान की पार्टी खुदाई<font face="Mangal">-</font>खिदमतगार नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोवींस के पाकिस्तान में विलय के बावजूद आजादी की मांग कर रहे थे<font face="Mangal">, </font>लेकिन महात्मा गांधी और नेहरू ने उनका साथ नहीं दिया। बलुचिस्तान पर विजय हासिल करने के बाद पाकिस्तान ने सेना के बूते नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोवींस पर भी कबजा कर लिया। तबसे पाकिस्तान की हमेशा यह कोशिश रही कि अफगानिस्तान कमजोर रहे और वह कभी नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोवींस पर निगाह न टिका सके। इसीलिए पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई अमेरिका के साथ सांठगांठ करके पिछले लंबे समय से अफगानिस्तान को कमजोर करने में लगी हुई है। अब नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोवींस और बलुचिस्तान दोनों में ही विद्रोह भड़क रहा है। हाल ही में बलुचिस्तान के सबसे बड़े नेता और पूर्व शासक के उतराधिकारी नवाब अकबर खान बुगती की पाकिस्तानी सेना ने धोखे से हत्या कर दी। लंबे समय के बाद अफगानिस्तान थोड़ा मजबूत हुआ है और यही वह समय है जब भारत उसकी मदद करके नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोवींस पर उसके दावे के समर्थन में खड़ा होकर पाकिस्तान को जम्मू कश्मीर में चलाई गई उसकी साजिश का जवाब दे सकता है। हामिद करजई यही चाहते हैं<font face="Mangal">, </font>लेकिन क्या भारत इसके लिए तैयार है।</p>
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		<title>सद्दाम को फांसी से पहले बुश का बंटाधार</title>
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		<pubDate>Sat, 11 Nov 2006 18:39:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डबलयू बुश ने 2003 में इराक पर हमला करने के बाद अपने देश में भारी विरोध के बावजूद जब दूसरी बार राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत लिया था, तो ऐसा लगता था कि रिपबिलकन पार्टी का दबदबा राष्ट्रपति पद पर अगले चुनाव तक रहेगा। लेकिन जॉर्ज बुश की दूसरी आधी अवधि भी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डबलयू बुश ने <font face="Mangal">2003 </font>में इराक पर हमला करने के बाद अपने देश में भारी विरोध के बावजूद जब दूसरी बार राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत लिया था<font face="Mangal">, </font>तो ऐसा लगता था कि रिपबिलकन पार्टी का दबदबा राष्ट्रपति पद पर अगले चुनाव तक रहेगा। लेकिन जॉर्ज बुश की दूसरी आधी अवधि भी अभी पूरी नहीं हुई कि अमेरिकी कांग्रेस और सीनेट दोनों में रिपबिलकन पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा है। कानून बनाने वाले इन दोनों ही सदनों में जॉर्ज बुश और उनकी रिपबिलकन पार्टी का कबजा नहीं रहा<font face="Mangal">, </font>अलबता दोनों ही जगह डेमोक्रेट्स का बहुमत हो गया है। डेमोक्रेट्स पार्टी के बिल क्लिंटन जब तक राष्ट्रपति रहे<font face="Mangal">, </font>खूब लोकप्रिय रहे। लेकिन जैसे ही उनका दूसरा कार्यकाल खत्म हुआ<font face="Mangal">, </font>डेमोक्रेट्स अपने नए उम्मीदवार को विजय नहीं दिला पाए। <span id="more-119"></span>हालांकि पिछले छह सालों में डेमोक्रेट्स ने बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन को भावी राष्ट्रपति के लिए पूरी तरह तैयार कर लिया है। अमेरिकी कांग्रेस के चुनाव में लगातार दूसरी बार जीत हासिल करके हिलेरी क्लिंटन ने जॉर्ज बुश के बाद राष्ट्रपति पद पर अपनी दावेदारी मजबूत कर ली है। बिल क्लिंटन के साथ राजग सरकार के बेहतरीन रिश्ते थे और जब वह राष्ट्रपति के तौर पर भारत आए थे<font face="Mangal">, </font>तो संसद के सेंट्रल हॉल में उनके भाषण के बाद सांसदों का उनसे हाथ मिलाने के लिए भगदड़ मचाना उनकी लोकप्रियता का सबूत था। राष्ट्रपति बुश के साथ संबंध बनाने में मनमोहन सिंह काफी हद तक सफल रहे<font face="Mangal">, </font>इसी वजह से वह परमाणु ईधन समझौता हो पाया<font face="Mangal">, </font>जो जसवंत<font face="Mangal">-</font>टालबोट में हुई कई दौर की बातचीत में भी संभव नहीं हुआ था। इसकी एक वजह तो यह भी हो सकती है कि वाजपेयी सरकार परमाणु कार्यक्रम पर किसी तरह का सौदा करने को तैयार नहीं थी<font face="Mangal">, </font>जबकि मनमोहन सिंह ने परमाणु ईधन के लिए ललचाई भरी नजर से देखकर देश को परमाणु संपन्न राष्ट्र का दर्जा दिलवाने की सारी मुहिम को खटाई में डालने पर सहमति दे दी। दूसरी वजह यह है कि डेमोक्रेट्स और रिपबिलकन पार्टी के नेताओं की कार्यशैली में जमीन आसमान का फर्क है। जब नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे<font face="Mangal">, </font>तो उस समय आबिद हुसैन अमेरिका में भारत के राजदूत थे<font face="Mangal">, </font>उधर अमेरिका में डेमोक्रेट्स की जीत हुई<font face="Mangal">, </font>इधर आबिद हुसैन अपना कार्यकाल पूरा करके दिल्ली लौटे। नरसिंह राव ने दिल्ली लौटने पर आबिद हुसैन को बुलाकर अमेरिकी सत्ता में आए परिवर्तन से अमेरिका की भारतीय नीति में बदलाव की संभावनाओं के बारे में पूछताछ की। आबिद हुसैन ने तब नरसिंह राव को बताया था कि अमेरिका की नीति में कोई खास फर्क नहीं आएगा<font face="Mangal">, </font>फर्क सिर्फ इतना होगा कि डेमोक्रेट्स के सत्ता में रहते समय दोनों देशों के संबंधों पर अच्छे सेमिनार किए जा सकते हैं<font face="Mangal">, </font>जबकि रिपबिलकन पार्टी के सता में रहने पर कई तरह के समझौते किए जा सकते हैं। आबिद हुसैन की राय थी कि डेमोक्रेट्स भारत के साथ ऐसे समझौते नहीं करेंगे<font face="Mangal">, </font>जिससे भारत को फायदा हो<font face="Mangal">, </font>अलबता वे संबंध सुधारने के सेमिनारों में ज्यादा दिलचस्पी लेंगे। अब रिपबिलकन पार्टी के जॉर्ज बुश ऐसे समय पर दोनों सदनों में कमजोर हुए हैं<font face="Mangal">, </font>जब उनका भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ हुआ परमाणु समझौता दांव पर लगा है। जब दोनों सदनों में रिपबिलकन पार्टी का बहुमत था<font face="Mangal">, </font>तब भी बुश के लिए परमाणु समझौते को लागू करने के लिए अमेरिकी कानून में फेरबदल करवाना मुश्किल हो गया था<font face="Mangal">, </font>अब तो और ज्यादा मुश्किल होगा। हालांकि डेमोके्रट्स ने ठीक आबिद हुसैन के कथन के मुताबिक शुरूआती बयान समझौते को लागू करवाने के लिए सहयोग का दिया है<font face="Mangal">, </font>लेकिन आशंका यह है कि डेमोक्रेट्स भारत को परमाणु ऊर्जा ईधन और रिएक्टर देने की इतनी शर्तें लगा देंगे कि भारत के लिए उन्हें मानना मुश्किल हो जाएगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारतीय संसद को कई बार आश्वासन दिया है कि उनकी सरकार ऐसी बेजा शर्तों को नहीं मानेगी<font face="Mangal">, </font>जो <font face="Mangal">18 </font>जुलाई <font face="Mangal">2005 </font>के समझौते से जरा भी इधर<font face="Mangal">-</font>उधर हो। लेकिन इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता कि डेमोक्रेट्स ने ही भारत को परमाणु ऊर्जा ईंधन देने के लिए अमेरिकी कानून में संशोधन वाले बिल में कई कड़ी शर्तें जुड़वा दी हैं। राष्ट्रपति बुश प्रधानमंत्री मनमोहन को बार बार भरोसा दिलवाते रहे हैं कि बिल जब कानून की शक्ल लेगा<font face="Mangal">, </font>तो वह <font face="Mangal">18 </font>जुलाई <font face="Mangal">2005 </font>के समझौते के अनुरूप ही होगा। लेकिन अब बदले हालात में बुश के लिए यह कर पाना खाला जी का घर नहीं। निश्चित रूप से इन चुनावों से राष्ट्रपति बुश बेहद कमजोर हुए हैं<font face="Mangal">, </font>हालांकि चुनावों से ठीक पहले इराक के अपदस्थ राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी की सजा का फैसला करवाकर बुश उसका चुनावी फायदा उठाना चाहते थे<font face="Mangal">, </font>लेकिन हुआ ठीक इसके उलट है। अमेरिकी जनता को इराक पर जो फैसला दो साल पहले राष्ट्रपति पद के चुनाव के समय सुनाना चाहिए था<font face="Mangal">, </font>वह उसने सद्दाम हुसैन को फांसी पर लटकाए जाने की खबर के बाद सुनाया। अब यह तय है कि अमेरिकी जनता ने खूब सोच समझकर यह फैसला किया हैं। अमेरिका में यह धारणा बन गई है कि राष्ट्रपति बुश की नीतियों के कारण न सिर्फ अमेरिका बल्कि दुनिया ज्यादा असुरक्षित हुई है। अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को ईसाई और मुस्लिम संस्कृतियों की लड़ाई बनाकर दुनिया को दो हिस्सों में बांट दिया है। भारत के परमाणु समझौते के भविष्य पर तो सवाल उठ ही रहे हैं<font face="Mangal">, </font>अब दुनिया के सामने इससे भी अहम सवाल यह है कि सद्दाम हुसैन को फांसी होगी या नहीं। रिपबिलकन पार्टी के भविष्य को बचाने के लिए क्या राष्ट्रपति बुश अमेरिकी जनता की भावनाओं की कदर करते हुए सद्दाम हुसैन की फांसी रूकवाने का पैंतरा चल सकते हैं <font face="Mangal">? </font>हालांकि इराकी कानून के मुताबिक फांसी की सजा देने के तीस दिन के अंदर उसकी अदालती समीक्षा हो जाती है और पचास दिन के अंदर आर या पार हो जाता है। इस हिसाब से दिसम्बर में सद्दाम हुसैन को फांसी होनी चाहिए<font face="Mangal">, </font>लेकिन समीक्षा के समय फैसला पलट सकता है और कुर्दों की हत्या का दूसरा मामला लंबित होने के कारण कानूनी दांवपेंच से भी सद्दाम हुसैन की फांसी लटकाई जा सकती है। अगर ऐसा होता है<font face="Mangal">, </font>तो यह अच्छा ही होगा<font face="Mangal">, </font>क्योंकि इससे दुनिया भर में ईसाइयों और मुसलमानों में शुरू हुई संस्कृतियों की जंग थम सकती है। शिया मुसलमानों को छोड़कर आमतौर पर भारत में सद्दाम हुसैन को फांसी दिए जाने के खिलाफ सभी राजनीतिक दलों और धार्मिक संस्थाओं में मोटे तौर पर सहमति है। सद्दाम हुसैन दुनिया के उन गिने चुने व्यक्तियों में से एक थे<font face="Mangal">, </font>जिन्होंने बाबरी ढांचा टूटने पर कहा था कि उसे बाबर ने मंदिर तुड़वाकर बनवाया था। सद्दाम हुसैन के इस बयान से दुनियाभर के मुसलमान इतने भड़के थे कि उन्हें काफिर घोषित कर दिया था।</p>
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		<title>भारतीय सड़कों पर वीआईपी आतंक</title>
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		<pubDate>Sat, 04 Nov 2006 18:34:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[राजस्थान हाईकोर्ट ने वीआईपी मूवमेंट के दौरान जनता को होने वाली परेशानी पर एक अहम फैसला सुनाया है। पर हाईकोर्ट के इस फैसले पर कितना अमल हो पाएगा, मुझे आशंका है। हू-ब-हू ऐसा ही फैसला पहले दिल्ली हाईकोर्ट भी दे चुकी है। लेकिन दिल्ली में वीवीआईपी मूवमेंट के समय ट्रैफिक जाम करने की पुलिस की [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">राजस्थान हाईकोर्ट ने वीआईपी मूवमेंट के दौरान जनता को होने वाली परेशानी पर एक अहम फैसला सुनाया है। पर हाईकोर्ट के इस फैसले पर कितना अमल हो पाएगा<font face="Mangal">, </font>मुझे आशंका है। हू<font face="Mangal">-</font>ब<font face="Mangal">-</font>हू ऐसा ही फैसला पहले दिल्ली हाईकोर्ट भी दे चुकी है। लेकिन दिल्ली में वीवीआईपी मूवमेंट के समय ट्रैफिक जाम करने की पुलिस की ढींगामुश्ती खत्म नहीं हुई। वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे<font face="Mangal">, </font>तो उन्होंने इस मामले में कुछ नियम बनाए थे। इन नियमों के मुताबिक सिर्फ एक तरफ का टै्रफिक रोका जाता था<font face="Mangal">, </font>जबकि दूसरी तरफ का टै्रफिक चलता रहता था। लेकिन यूपीए सरकार आने के बाद जनता पर नेताओं और पुलिस की मिलीजुली ढींगामुश्ती फिर शुरू हो गई। वीआईपी सुरक्षा की वजह से आम जनता को जो परेशानी झेलनी पड़ती है<font face="Mangal">, </font>उसका कोई जवाब नहीं। <span id="more-118"></span>देश की राजधानी दिल्ली में सुरक्षा की वजह से लोगों को ज्यादा परेशानी होती है। एक बार सुझाव आया था कि राष्ट्रपति भवन में ही प्रधानमंत्री आवास भी बना दिया जाए<font face="Mangal">, </font>ताकि सुरक्षा का तामझाम थोड़ा सा तो कम हो। ऐसा होने पर दिल्ली के वीआईपी इलाके की सारी सड़कों को काफी हद तक निजात मिल जाती। लेकिन यह सुझाव इसलिए ठुकरा दिया<font face="Mangal">, </font>क्योंकि इससे राष्ट्रपति की छत्रछाया में प्रधानमंत्री का रूतबा कम दिखता। अहम आड़े आ रहा था। राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे<font face="Mangal">, </font>तो वेद मारवाह को सिर्फ इसलिए पुलिस कमीश्र पद से हटा दिया गया था<font face="Mangal">, </font>क्योंकि उनकी कार उसी रास्ते पर आ गई थी<font face="Mangal">, </font>जहां से राजीव गांधी का काफिला गुजरने वाला था। पुराने लोग जानते हैं<font face="Mangal">, </font>जवाहर लाल नेहरू तीन मूर्ति में रहा करते थे और प्रधानमंत्री होते हुए कई बार पीएमओ और संसद भवन तक पैदल आते थे। चीन ने जब भारत पर हमला किया। इस वाक्या के लिए वामपंथी माफ करें<font face="Mangal">, </font>जिनकी नजर में चीन ने नहीं<font face="Mangal">, </font>भारत ने हमला किया था। उस समय अगर अमेरिका मदद पर न आता<font face="Mangal">, </font>तो भारत का अच्छा खासा भू<font face="Mangal">-</font>भाग चीन के कबजे में होता। हालांकि अमेरिका के मदद पर आने में भी बहुत देर हो गई थी और जवाहर लाल नेहरू की लापरवाही के कारण देश अच्छा खासा खामियाजा भुगत चुका था। अमेरिका के मदद के आने के कारण ही चीन ने एकतरफा युद्धविराम घोषित कर दिया था। युद्ध समाप्ति के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डी ईजनऑवर भारत आए<font face="Mangal">, </font>तो प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू उन्हें पैदल ही कनॉट प्लेस लेकर गए थे। दोनों का जब रामलीला मैदान में स्वागत होना था<font face="Mangal">, </font>तो रास्ते में लोगों ने नेहरू को घेर लिया था<font face="Mangal">, </font>जिस पर नेहरू और डी ईजनऑवर आम लोगों से हाथ मिलाते हुए काफी दूर तक पैदल चलते रामलीला मैदान पहुंचे थे। उन दिनों पंडित गोविंद सिंह नाम के एक सब इंस्पेक्टर जवाहर लाल नेहरू के सुरक्षा अधिकारी थे। आज दिल्ली पुलिस का आईजी स्तर का अधिकारी प्रधानमंत्री का सुरक्षा अधिकारी होता है और एसपीजी का घेरा अलग से। इसके बावजूद नेताआें की सुरक्षा के कारण आम लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। यह बात सही है कि दुनिया भर में आतंकवाद के कारण वीआईपी की सुरक्षा के मापदंड बदल गए हैं। लेकिन भारत में यह स्थिति इंदिरा गांधी के शासनकाल में इमरजेंसी में ही शुरू हो गई थी। क्योंकि इंदिरा गांधी ने देश की आजादी को कुचल दिया था<font face="Mangal">, </font>इसलिए वह डरी हुई थी और अपनी सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा ली थी। यह बात सही है कि इमरजेंसी के कारण किसी ने उन्हें गोली का निशाना नहीं बनाया<font face="Mangal">, </font>लोकतंत्र के समर्थकों ने अपनी लड़ाई लोकतांत्रिक ढंग से ही लड़ी। लेकिन पंजाब में आतंकवाद के कारण फौज ने स्वर्ण मंदिर पर हमला किया<font face="Mangal">, </font>तो उन्हीं के दो सिख सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें गोली से उड़ा दिया। इसके बाद तो वीआईपी का सुरक्षाचक्र मजबूत दर मजबूत होता चला गया। असल में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को आतंकवाद से लड़ने की टे्रनिंग ही नहीं दी गई। सुरक्षा एजेंसियों के अनटे्रंड होने का खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ता है। वे सुरक्षा का ठीक से बंदोबस्त नहीं कर सकते<font face="Mangal">, </font>इसलिए सारा टै्रफिक ही रोक देते हैं। कुछ मामलों में हमारी पुलिस और अन्य सुरक्षाबल बाबा आदम जमाने के अनाड़ी साबित होते हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ <font face="Mangal">2002 </font>में जब मैं साइप्रस<font face="Mangal">, </font>इंगलैंड और डेनमार्क गया था<font face="Mangal">, </font>तो तीनों जगह पर वहां के प्रधानमंत्रियों के साथ प्रेस कांफ्रेंसों में शामिल होने का मौका मिला। न तो किसी ने मोबाइल फोन ले जाने पर एतराज किया<font face="Mangal">, </font>न ही स्वीच ऑफ और ऑन करने की कोई हिदायत दी। जबकि वहां से लौटने के बाद तब के उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के साथ अंडमान निकोबार गया<font face="Mangal">, </font>तो वहां राजभवन में मोबाइल नहीं ले जाने दिया गया। सुरक्षा एजेंसियों के अप्रशिक्षित होने का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है। जवाहर लाल नेहरू जब प्रधानमंत्री थे<font face="Mangal">, </font>तो हर दो घंटे बाद अपने घर के लॉन में लोगों को मिलने आते थे<font face="Mangal">, </font>लेकिन कुछ महीने पहले राजस्थान की दो युवतियां अपने एक मित्र के साथ कार चलाते हुए प्रधानमंत्री के दर्शन करने की इच्छा मन में संजोए प्रधानमंत्री के घर के सामने क्या पहुंच गए<font face="Mangal">, </font>उन्हें जेल की हवा खानी पड़ी। मनमोहन सिंह की जान के उतने दुश्मन नहीं होंगे<font face="Mangal">, </font>जितने वाजपेयी की जान के दुश्मन थे। लेकिन हो उल्टा रहा है<font face="Mangal">, </font>वाजपेयी के समय सुरक्षाकर्मी इतने भयभीत नहीं थे<font face="Mangal">, </font>जितने मनमोहन सिंह के समय हैं। मनमोहन सिंह से सिर्फ वही लोग घृणा करते हैं<font face="Mangal">, </font>जो दो<font face="Mangal">-</font>दो<font face="Mangal">, </font>तीन<font face="Mangal">-</font>तीन दशक से कांग्रेस में रहकर भी प्रधानमंत्री नहीं बन पाए। लेकिन उन सभी का गांधीगिरी में भरोसा हैं<font face="Mangal">, </font>इसलिए सुरक्षाकर्मियों को इतना भयभीत नहीं होना चाहिए। एहतियात बरतना जरूरी है<font face="Mangal">, </font>लेकिन इतना भी नहीं कि कोई विदेशी प्रधानमंत्री घर के पास मौजूद जिमखाना से दूरबीन के जरिए नजारा देख रहा हो<font face="Mangal">, </font>तो उसे गिरफ्तारी कर लिया जाए। पूर्व सेना अधिकारी के एक विदेशी दामाद को जिमखाना से इसलिए हिरासत में ले लिया गया था<font face="Mangal">, </font>क्योंकि वह दूरबीन से प्रधानमंत्री आवास को निहार रहा था। अभी तिरूवनंतपुरम में एक कार चालक से मामूली गलती क्या हो गई<font face="Mangal">, </font>उसे गिरफ्तार कर लिया गया। हाल ही में दिल्ली के एक कॉलेज के लेक्चरर को भी इसीलिए गिरफ्तार कर लिया था<font face="Mangal">, </font>क्योंकि वह गलती से उस रास्ते पर आ गया था<font face="Mangal">, </font>जहां से मनमोहन सिंह गुजरने वाले थे। सुरक्षाकर्मियों की अपनी लापरवाही के कारण आम आदमी को खामियाजा भुगतना पड़ता हैं और नेताओं का अहम भी इस टै्रफिक जाम की एक वजह है। जिस पर कोई कानून कायदा तो लागू होना ही चाहिए। वरना देश को आजाद कौन कहेगा और आम नागरिकों को आजादी का एहसास कैसे होगा। टै्रफिक जाम करने की यह फितरत फिरंगी मानसिकता ही है।</p>
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		<title>दो दशकों में बदल गया मीडिया</title>
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		<pubDate>Sat, 28 Oct 2006 18:39:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[करीब एक साल पहले वीर सिंघवी ने हिंदुस्तान टाइम्स में एक लेख में दावा किया था कि सोनिया गांधी कभी भी देश की प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहती थी। उनका दावा था कि सोनिया गांधी ने 1999 में भी वाजपेयी सरकार गिरने के बाद खुद प्रधानमंत्री बनने का दावा नहीं किया था। बाद में इसी अखबार [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">करीब एक साल पहले वीर सिंघवी ने हिंदुस्तान टाइम्स में एक लेख में दावा किया था कि सोनिया गांधी कभी भी देश की प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहती थी। उनका दावा था कि सोनिया गांधी ने <font face="Mangal">1999 </font>में भी वाजपेयी सरकार गिरने के बाद खुद प्रधानमंत्री बनने का दावा नहीं किया था। बाद में इसी अखबार में लीड के तौर पर इससे मिलती जुलती खबर छपी<font face="Mangal">, </font>जिसमें कहा गया कि <font face="Mangal">2004 </font>चुनाव नतीजों के फौरन बाद सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का फैसला कर लिया था। इन दोनों ही खबरों की के आर नारायणन के जीवित रहते किसी ने पुष्टि नहीं की। हालांकि <font face="Mangal">2004 </font>का इतिहास बहुत पुराना नहीं हुआ और मेरे जैसे दर्जनों पत्रकार उस पूरे घटनाक्रम के गवाह हैं कि सोनिया गांधी के घर हुई बैठक में उन्हें सर्वसम्मति से प्रधानमंत्री की शपथ लेने के लिए नेता चुना गया था। <span id="more-117"></span>सोनिया गांधी खुद वहां मौजूद थी और उन्होंने इसकी मुखालफत नहीं की थी। इस खबर के बाद ही राष्ट्रपति भवन से राष्ट्रपति एपीजे अबदुल कलाम का बुलावा आया था। सोनिया गांधी अकेले राष्ट्रपति से मिलने गई थी और बाहर निकलते समय उनके चेहरे पर मायूसी थी। राष्ट्रपति भवन में खड़े पत्रकारों से उन्होंने कहा था कि वह जल्द ही राष्ट्रपति को कांग्रेस के फैसले से अवगत करवाएंगी। इसके बाद सोनिया गांधी ने पहली बार कहा कि वह प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहती। सोनिया गांधी के राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद किए गए इस फैसले के बाद मनमोहन सिंह को बुलाकर उन्हें प्रधानमंत्री बनने का फैसला सुनाया गया था। जहां तक <font face="Mangal">1999 </font>का सवाल है<font face="Mangal">, </font>तो <font face="Mangal">19 </font>अप्रैल <font face="Mangal">1999 </font>को ऑस्कर फर्नांडिज और पी जे कूरियन ने राष्ट्रपति से मुलाकात करके उन्हें कांग्रेस कार्यसमिति और कांग्रेस संसदीय दल के उन प्रस्तावों की प्रतियां सौंपी थी<font face="Mangal">, </font>जिनमें सरकार बनाने की कार्यवाही करने के लिए सोनिया गांधी को अधिकृत किया गया था। इसके बाद ही राष्ट्रपति ने <font face="Mangal">20 </font>अप्रैल को सोनिया गांधी को अगले दिन बातचीत के लिए बुलाया<font face="Mangal">, </font>सोनिया गांधी <font face="Mangal">21 </font>अप्रैल को अकेली राष्ट्रपति से मिलने गई थी और बाहर निकल कर उन्होंने <font face="Mangal">272 </font>सांसदों का समर्थन होने का दावा किया था। लोकसभा भंग करने का आदेश जारी करते समय <font face="Mangal">26 </font>अप्रैल <font face="Mangal">1999 </font>को राष्ट्रपति भवन से जो बयोरा दिया गया<font face="Mangal">, </font>उसमें सोनिया गांधी के राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद पत्रकारों के सामने दिए गए बयान का हवाला दिया गया था। राष्ट्रपति से उनकी क्या बातचीत हुई<font face="Mangal">, </font>यह के आर नारायणन के जिंदा रहने तक न तो सोनिया गांधी ने किसी को कुछ बताया और न खुद के आर नारायणन ने। वीर सिंघवी ने जब अपने लेख में यह कहा कि सोनिया गांधी कभी प्रधानमंत्री बनना नहीं चाहती थी<font face="Mangal">, </font>तो यह कांग्रेस के लिए निश्चित रूप से राहत की बात थी<font face="Mangal">, </font>क्योंकि विपक्ष लगातार यह बातें कहता रहा कि <font face="Mangal">1999 </font>में मुलायम सिंह ने विदेशी मूल के कारण सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया<font face="Mangal">, </font>इसीलिए लोकसभा भंग करने की नौबत आई और <font face="Mangal">2004 </font>में सुब्रहमन्यम स्वामी की ओर से राष्ट्रपति एपीजे अबदुल कलाम को विदेशी मूल के मुद्दे पर पहले सुप्रीम कोर्ट की राय लिए जाने की याचिका लगाए जाने के कारण वह प्रधानमंत्री नहीं बन पाई। सोनिया गांधी की राष्ट्रपति एपीजे अबदुल कलाम से क्या बातचीत हुई थी<font face="Mangal">, </font>यह कोई नहीं जानता। सिवा इसके कि सोनिया गांधी जब उन्हें मिलने गई थी<font face="Mangal">, </font>तो वह कांग्रेस<font face="Mangal">, </font>सहयोगी दलों और वामपंथी दलों की ओर से नेता चुनी जा चुकी थी और उसी हैसियत में राष्ट्रपति से मिलने गई थी। वहां से बाहर आने के बाद ही स्थितियां बदली और पहली बार मनमोहन सिंह का नाम सामने आया। वीर सिंघवी को दावा किए कई महीने हो चुके<font face="Mangal">, </font>लेकिन इसकी किसी भी ओर से पुख्ता पुष्टि नहीं की गई। अब जब खुद वीर सिंघवी को सोनिया गांधी से एनडीटीवी और हिंदुस्तान टाइम्स के लिए इंटरव्यू करने का मौका मिला तो उन्होंने अपनी लिखी बात की पुष्टि करने के लिए उनसे पूछा<font face="Mangal">-&#8217;</font>क्या आप इस बात की पुष्टि करेंगी कि <font face="Mangal">1999 </font>में वाजपेयी सरकार गिरने के बाद जब वह वैकल्पिक सरकार बनाने का दावा कर रही थी<font face="Mangal">, </font>क्या उस समय भी मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री होते <font face="Mangal">?&#8217; </font>क्या इस सवाल का कोई नकारात्मक जवाब की उम्मीद कर सकता है। सवाल पूछा ही अपनी खबर की पुष्टि के लिए किया था। राजनीति भी इस खबर की पुष्टि के लिए कहती है। इसलिए सोनिया गांधी ने वही जवाब दिया<font face="Mangal">, </font>जो उनसे मांगा गया था। लेकिन सब जानते हैं कि <font face="Mangal">1999 </font>में वाजपेयी सरकार गिराने में अहम भूमिका सुब्रहमणयम स्वामी ने निभाई थी। अब उन्हीं सुब्रहमणयम स्वामी ने सोनिया गांधी के इस दावे का खंडन किया है कि उस समय वैकल्पिक सरकार इसलिए नहीं बन सकी<font face="Mangal">, </font>क्योंकि वह खुद प्रधानमंत्री बनना चाहती थी। पिछले कुछ अरसे से मीडिया में जानबूझ कर तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश करने और अपने प्रिय नेताओं की बुराइयों को छुपाकर उन्हें त्यागी और मसीहा साबित करने की कोशिशें की जा रही हैं। पत्रकार अपनी विचारधारा के आधार पर नेताओं को पसंद और नापसंद करने लगे हैं और उसी हिसाब से रिपोर्टिंग भी शुरू हो चुकी है। आज से बीस साल पहले पत्रकार मिशनरी के तौर पर इस धंधे में आते थे<font face="Mangal">, </font>लेकिन पिछले दो दशकों में सारी स्थिति बदल गई है। पिछले दो दशकों में दो तरह के पत्रकार पैदा हुए हैं<font face="Mangal">, </font>एक तो निष्पक्षता को छोड़कर अपनी विचारधारा का पोषण करने वाले और दूसरे पूरी तरह धंधेबाज<font face="Mangal">, </font>जो अपने हितों को पूरा करने के मौके की तलाश में रहते हैं। इनका काम सरकारों से कम कीमत पर प्लाट हासिल करना और नेताओं को खबरें छपवाने के लिए पत्रकारों को गिफ्ट देने की सलाह देना रह गया है। इन सब वजहों से आम जनता में मीडिया और पत्रकारों की छवि खराब होती जा रही है। एक समय था जब मीडिया किसी की किस्मत बना या बिगाड़ सकता था। इस मामले में भैरोंसिंह शेखावत अपना उदाहरण देते हैं। जब वह पहली बार <font face="Mangal">1952 </font>में विधानसभा चुनाव लड़े<font face="Mangal">, </font>तो <font face="Mangal">&#8216;</font>जयभूमि<font face="Mangal">&#8216; </font>नाम के एक साप्ताहिक अखबार में गुलाब चंद काला ने शेखावत की प्रशंसा में चार लाइनें लिख दी थीं और उसी ने हवा का रुख उनकी तरफ मोड़ दिया। तबसे शुरू हुआ राजनीतिक सफर उन्हें देश के दूसरे सबसे बड़े औहदे पर ले आया। लेकिन आज <font face="Mangal">80 </font>फीसदी मीडिया नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभियान चलाकर भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सका और गुजरात की जनता अभी भी उनके साथ है। यह है समाज में मीडिया की छवि। गुजरात के मामले में मीडिया खुद एक पार्टी बन गया और समाज की सोच को दरकिनार कर दिया। लालू यादव की ओर से साबरमती एक्सप्रेस में हुई घटना को तोड़मरोड़ कर पेश करने और उसे कानूनी जामा पहनाने की कोशिशों को मीडिया ने जिस तरह समर्थन दिया<font face="Mangal">, </font>उसका उदाहरण भी याद रखने लायक है। आतंकवादी इशरत जहां जब गुजरात में पुलिस से मुठभेड़ में मारी गई थी<font face="Mangal">, </font>तो मीडिया ने उसे बेगुनाह बताने का ऐसा सिलसिला शुरू किया कि सभी तथाकथित राष्ट्रवादी पार्टियों ने उसे शहीद करार देकर सम्मानित करना शुरू कर दिया था। जबकि बाद में पाकिस्तान से लश्कर<font face="Mangal">-</font>ए<font face="Mangal">-</font>तोइबा का बयान आया कि इशरत जहां उनके संगठन की सदस्य थी। राजनीतिक दलों ने मीडिया के बहकावे में आकर इशरत जहां को सम्मानित किया था<font face="Mangal">, </font>लेकिन इतनी बड़ी चूक पर किसी पत्रकार या निजी टीवी चैनल ने देश से माफी नहीं मांगी। नेता अगर तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश करते हैं तो पत्रकारों का काम उनके बयानों के साथ<font face="Mangal">-</font>साथ पाठकों और दर्शकों को इतिहास के सच को भी सामने रखने का होता है<font face="Mangal">, </font>लेकिन अब तो मीडिया खुद झूठ का स्क्रिप्ट लिख रहा है।</p>
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		<title>सेना का आधुनिकीकरण रोकने की साजिश</title>
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		<pubDate>Sat, 14 Oct 2006 18:29:22 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[जॉर्ज फर्नाडिज के खिलाफ दायर एफआईआर के गुण दोष पर कुछ ज्यादा कहने की जरूरत नहीं। ऐसा मानने वालों की कमी नहीं, जो जॉर्ज फर्नाडिज को भ्रष्ट मानते हैं, लेकिन ऐसा मानने वालों की भी कमी नहीं, जो उन्हें जुझारू और सच्चा देश भक्त मानते हैं और इस केस को पूरी तरह राजनीति से प्रेरित [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">जॉर्ज फर्नाडिज के खिलाफ दायर एफआईआर के गुण दोष पर कुछ ज्यादा कहने की जरूरत नहीं। ऐसा मानने वालों की कमी नहीं<font face="Mangal">, </font>जो जॉर्ज फर्नाडिज को भ्रष्ट मानते हैं<font face="Mangal">, </font>लेकिन ऐसा मानने वालों की भी कमी नहीं<font face="Mangal">, </font>जो उन्हें जुझारू और सच्चा देश भक्त मानते हैं और इस केस को पूरी तरह राजनीति से प्रेरित समझते है। डीआरडीओ की आपत्ति को जॉर्ज के खिलाफ एफआईआर का मुख्य आधार बनाया गया है। कहा गया है कि डीआरडीओ के तत्कालीन अध्यक्ष अबदुल कलाम ने राजग सरकार को यह कहते हुए बराक मिसाइल खरीदने से रोका था कि एक तो वह पूरी तरह सक्षम नहीं है और दूसरा डीआरडीओ जल्द ही त्रिशूल बनाकर सेना को सौंप देगा। <span id="more-116"></span>लेकिन डीआरडीओ की रिकॉर्ड कितना खराब है<font face="Mangal">, </font>यह अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पहले वायुसेना को दशक के इंतजार के बाद <font face="Mangal">&#8216;</font>आकाश<font face="Mangal">&#8216; </font>की जगह विदेशी टेक्नोलॉजी हासिल करनी पड़ी और वह अब तक भी <font face="Mangal">&#8216;</font>त्रिशूल<font face="Mangal">&#8216; </font>सेना के हवाले नहीं कर सका। त्रिशूल और आकाश का सेना पिछले बीस साल से इंतजार कर रही है<font face="Mangal">, </font>डीआरडीओ के भरोसे सेना का आधुनिकीकरण आने वाले सौ साल तक नहीं होगा। मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि झूठ की बुनियाद पर खडा यह केस धराशायी हो जाएगा। इसके बावजूद कि सीबीआई ने जॉर्ज फर्नांडिज के एक पुराने घरेलू वफादार को जॉर्ज के खिलाफ मोहरे के तौर पर इस्तेमाल किया है। मीडिया के कुछ जाने पहचाने जॉर्ज फर्नांडिज विरोधी चेहरों को छोड़ दे तो मोटे तौर पर देश भर के मीडिया ने इस केस को राजनीतिक विद्वेष का माना है। आमतौर पर कांग्रेस के समर्थक माने जाने वाले अखबारों के संपादकीय भी सीबीआई के रवैये की आलोचना करने को मजबूर हुए। एक कांग्रेसी सांसद के अखबार ने तो अपने संपादकीय में यहां तक लिखा कि सीबीआई <font face="Mangal">1150 </font>करोड़ के सौदे में सिर्फ दो करोड़ रूपए की रिश्वत बताकर अपनी पोल खुद खोल रही है। अखबार की यह भी आपत्ति है कि दो करोड़ की रिश्वत की जांच पर बीसियों करोड़ खर्च करने का फैसला निश्चित रूप से राजनीति से प्रेरित ही है। जैसा मैंने पहले लिखा<font face="Mangal">, </font>मैं केस के गुण दोष पर नहीं जाऊंगा<font face="Mangal">, </font>लेकिन यूपीए सरकार की ओर से अब तक जॉर्ज फर्नांडिज के खिलाफ एफआईआर दर्ज न करना जरूर आश्चर्यचकित कर रहा था। जिस तरह उन्होंने पिछले चालीस साल से कांग्रेस की नीतियों की लगातार आलोचना की और पहले बोफार्स सौदे और बाद में सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को उठाते रहे<font face="Mangal">, </font>उससे उनके खिलाफ कोई न कोई संगीन एफआईआर दर्ज किया जाना संभावित ही था। लेकिन यहां जरूरी है यह सोचना कि इससे देश और सेना की तैयारियों पर क्या असर पड़ेगा। मनमोहन सिंह जब वित्त मंत्री थे<font face="Mangal">, </font>तो उन्होंने रक्षा बजट घटा दिया था<font face="Mangal">, </font>अब उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही फिर वही खेल शुरू कर दिया है। हालांकि प्रणब मुखर्जी ने जॉर्ज फर्नांडिज की ओर से सेना के आधुनिकीकरण की योजना को आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है और उन्होंने हाल ही में अवाक्स जैसे कुछ बड़े सौदें भी किए हैं। लेकिन जिस तरह न चाहते हुए भी प्रणब मुखर्जी को राजग कार्यकाल के सारे रक्षा सौदें सीबीआई को सौंपने पड़े और अब जॉर्ज फर्नांडिज और तत्कालीन नौसेना अध्यक्ष सुशील कुमार के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है<font face="Mangal">, </font>तो वह मंत्रालय छोड़ना चाहते है। मनमोहन सिंह अगर अपने मंत्रिमंडल के फेरबदल में प्रणब मुखर्जी से रक्षा मंत्रालय ले लें<font face="Mangal">, </font>तो वह राहत महसूस करेंगे। राजनीतिक विद्वेष की कोई सीमा नहीं होती<font face="Mangal">, </font>लेकिन इस घटनाक्रम से सबसे ज्यादा नुकसान सेना के आधुनिकीकरण का होगा। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल विनय शंकर कारगिल युद्ध के समय गोला बारूद विभाग के महानिदेशक थे<font face="Mangal">, </font>उनका मानना है कि यह प्रवृत्ति बंद होनी चाहिए<font face="Mangal">, </font>क्योंकि इससे सेना का आधुनिकीकरण प्रभावित होगा। राजनीतिक आधार पर पूर्व रक्षा मंत्रियों और सेनाध्यक्षों के खिलाफ मुकदमें दायर करने के बजाय हथियारों की खरीद को पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। हालांकि प्रणब मुखर्जी ने हाल ही में हथियारों की खरीद की जो नई नीति घोषित की है<font face="Mangal">, </font>उसके मुताबिक ट्रायल के बाद मौके पर ही यह तय कर लिया जाएगा कि कौन सा उपकरण पास हुआ। लेकिन रिश्वतखोरी की बीमारी उसके बाद ही शुरू होती है<font face="Mangal">, </font>जब मामला <font face="Mangal">&#8216;</font>प्राइस नेगोशिएशन<font face="Mangal">&#8216; </font>कमेटी के पास जाता है<font face="Mangal">, </font>हर तरह का दबाव तभी शुरू होता है। पारदर्शिता अपनाना कोई मुश्किल काम नहीं है<font face="Mangal">, </font>क्यों नहीं ऐसा कर लिया जाता कि किसी भी उपकरण का टेंडर बुलाए जाने के बाद ही <font face="Mangal">&#8216;</font>प्राइस नेगाशिएट<font face="Mangal">&#8216; </font>कर लिया जाए और बाद में ट्रायल किया जाए। ट्रायल में जिस कंपनी और देश का उपकरण उम्दा साबित हो<font face="Mangal">, </font>उसे पहले से तय कीमत पर खरीदने का सैद्धांतिक फैसला उसी समय हो जाए। इसके साथ ही जिन कंपनियों और देशों के उपकरण तय मापदंड से कम पाए जाएं<font face="Mangal">, </font>उन्हें यह बताया जाए कि उनके उपकरण में क्या<font face="Mangal">-</font>क्या कमियां हैं। वाजपेयी सरकार ने पारदर्शिता के लिए एक और कदम उठाया था<font face="Mangal">, </font>उन्होंने सप्लायर कंपनियों को रजिस्टर्ड करने और कमीशन को कानूनी तौर पर लागू करने का एलान किया था<font face="Mangal">, </font>लेकिन यूपीए सरकार ने आते ही इस नीति को खारिज कर दिया और परदे के पीछे से लेन<font face="Mangal">-</font>देन का चक्कर फिर शुरू हो गया<font face="Mangal">, </font>जो हाल ही में स्कॉर्पियन डील में साफ हो चुका है। यह याद रखना चाहिए कि देश में सबसे ज्यादा खरीदारी रक्षा मंत्रालय नहीं करता<font face="Mangal">, </font>अलबत्ता ओएनजीसी करता है और ओएनजीसी की खरीदारी में कमीशन को कानूनी मान्यता हासिल है। दुनियाभर की हथियारों की कंपनियां अपने हथियार बेचने के लिए हर हरबा इस्तेमाल करती है और भारत के राजनीतिज्ञ उसका फायदा उठाते रहे हैं। बोफोर्स सौदे की जांच को हालांकि यूपीए सरकार ने आते ही ब्रेक लगा दी<font face="Mangal">, </font>लेकिन तब तक यह साबित हो चुका था कि बोफोर्स खरीद में दलाली ली गई थी<font face="Mangal">, </font>इतना ही नहीं रिश्वत के खाते भी सील हो चुके थे। अब बोफार्स तोपों के बाद जो बराक मिसाइलों के साथ हुआ है<font face="Mangal">, </font>उससे सेना का आधुनिकीकरण रूकने की आशंका पैदा हो गई है। बोफार्स तोपों की जांच के बाद सेना को नई खेप नहीं मिली और उसके स्पेयर पाट्र्स भी नहीं मिले। एचडीडबलयू विवाद के बाद पनडुबबी बनाने की टेक्नोलॉजी हासिल करना भी खटाई में पड़ गया। नतीजा यह निकला कि इस मामले में हम ब्राजील और तुर्की जैसे छोटे देशों से भी पिछड़ गए। फिर डेनेल तोप का भी वही हश्र हुआ और अब बराक मिसाइल और कारसनोपोल के गोलों का आयात रूक जाएगा। अगर हम दुनिया की हथियार बनाने वाली कंपनियों को अपनी घरेलू राजनीति के लिए बदनाम करते रहेंगे<font face="Mangal">, </font>तो हम हथियार कहां से खरीदेंगे। अपनी घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के कारण वामपंथी दलों ने इजरायल की आईएआई को बलैकलिस्ट करने की मांग कर दी है। शायद लोगों को यह पता नहीं कि यह प्राइवेट कंपनी नहीं<font face="Mangal">, </font>अलबत्ता यह इजरायल की सरकारी कंपनी है और हमने उससे सिर्फ बराक मिसाइलें नहीं ली<font face="Mangal">, </font>अलबत्ता सुधरी हुई किस्म की बराक<font face="Mangal">-2 </font>बनाने के लिए डीआरडीओ के साथ समझौता भी किया है। हमने आईएआई से अवाक्स जैसी प्रणाली का सौदा भी किया है<font face="Mangal">, </font>जिसे हासिल करने के बाद भारत दुनिया की तीसरी सैन्य ताकत बन जाएगा। पहले ही बहुत नुकसान हो चुका है और अगर हथियारों की खरीद पर राजनीति बंद न हुई तो भारतीय फौज आधुनिकीकरण में बहुत पिछड़ जाएगी।</p>
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		<title>कूटनीति की किरकिरी</title>
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		<pubDate>Sat, 07 Oct 2006 18:34:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[अगर नेपाल के साथ भारत की प्रत्यार्पण संधि नहीं होती है तो मनमोहन सरकार कूटनीति के मामले में आजादी के इतिहास के बाद देश की सबसे नकारा साबित होगी। अगर नेपाल के साथ प्रत्यार्पण संधि होगी तो नक्सलवादियों का वहां हिंसा फैलाकर भारत में आकर खुले घूमना और भारत में हिंसा फैलाकर नेपाल में भाग [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">अगर नेपाल के साथ भारत की प्रत्यार्पण संधि नहीं होती है तो मनमोहन सरकार कूटनीति के मामले में आजादी के इतिहास के बाद देश की सबसे नकारा साबित होगी। अगर नेपाल के साथ प्रत्यार्पण संधि होगी तो नक्सलवादियों का वहां हिंसा फैलाकर भारत में आकर खुले घूमना और भारत में हिंसा फैलाकर नेपाल में भाग जाना बंद हो जाएगा। मनमोहन सरकार को समर्थन दे रही दोनों वामपंथी पार्टियां ऐसा नहीं चाहती<font face="Mangal">, </font>इसलिए उनके दबाव में नेपाल के गृह मंत्री कृष्ण प्रसाद सितौला का आखिरी समय में प्रत्यार्पण संधि के लिए भारत आना टला। चीन सरकार और भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के षडयंत्र के तहत नेपाल पहले ही अपना हिंदू राष्ट्र का दर्जा खत्म करके खुद को सेक्युलर देश घोषित कर चुका है<font face="Mangal">, </font>हालांकि अपने पड़ोसी देश नेपाल में हुआ यह घटनाक्रम कूटनीति के लिहाज से बिलकुल ठीक नहीं है<font face="Mangal">, </font>लेकिन वामपंथियों के दबाव में मनमोहन सरकार चुप्पी साधकर बैठी रही। <span id="more-115"></span>जिसके नतीजे आज दिखने लगे हैं<font face="Mangal">, </font>नेपाल की मौजूदा सरकार में माओवादियों का प्रभाव होने के कारण ही प्रत्यार्पण संधि पर ब्रेक लग गई। माओवादियों ने नेपाल में अपना मकसद हासिल कर लिया है और अब उनके निशाने पर भारत के सीमांत राज्य हैं। इस षडयंत्र में नेपाल के साथ<font face="Mangal">-</font>साथ चीन भी शामिल है और दोनों सरकारों को भारत के दोनों वामपंथी दलों का खुला समर्थन है। जिस तरह कम्युनिस्ट पार्टियों ने केरल में पोत बनाने के मामले में चीन की एक फर्म को ठेका देने के लिए पैरवी की है<font face="Mangal">, </font>उससे इन दोनों दलों पर चीन परस्त होने का शक फिर पैदा हो गया है। आखिर कम्युनिस्ट पार्टियों को चीन या किसी भी और देश की पैरवी करने की क्या जरुरत थी। एनडीए सरकार के समय जब यह खुलासा हुआ था कि कुछ सांसद विमानों की खरीददारी के लिए किसी खास देश की पैरवी कर रहे हैं तो उसे अत्यंत गंभीरता से लिया गया था। यूपीए सरकार के समय भी जब रेणुका चौधरी ने एक विदेशी फर्म की पैरवी करते हुए सिफारिशी चिट्ठी लिखी थी<font face="Mangal">, </font>तो बवाल खडा हो गया था और रेणुका चौधरी को माफी मांगनी पड़ी थी। लेकिन कोई राजनीतिक दल सारी मर्यादा और परंपरा को ताक पर रखकर विदेशी कंपनियों की इस तरह पैरवी करने लगे<font face="Mangal">, </font>तो देश का क्या होगा। राजनीतिक दल विदेशी कंपनियों के दलाल बन जाएंगे<font face="Mangal">, </font>तो देश की सारी लोकतांत्रिक व्यवस्था चरमरा जाएगी। वामपंथियों के माओवादियों और चीन सरकार और वहां की कंपनियों से संबंधों के चलते यूपीए सरकार को संभल<font face="Mangal">-</font>संभल कर कदम उठाना होगा। लेकिन मनमोहन सिंह इस मामले में न सिर्फ अनाड़ी अलबता दब्बू भी साबित हो रहे हैं। हालांकि नटवर सिंह भले ही बेहतरीन विदेश मंत्री नहीं थे<font face="Mangal">, </font>लेकिन मौजूदा व्यवस्था से तो बेहतर ही थे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले एक साल में अपने ही कंधों पर विदेश मंत्रालय का बोझ ढोकर कूटनीति के मामले में देश को कंगाल सा बना दिया है। मनमोहन सिंह को राजनीति नहीं आती<font face="Mangal">, </font>यह तो वह खुद कबूल कर चुके हैं<font face="Mangal">, </font>लेकिन यह तो कोई अनाड़ी भी समझ लेगा कि जिसे राजनीति नहीं आती<font face="Mangal">, </font>वह निश्चित रुप से कूटनीति में तो पैदल ही होगा। यह देश का दुर्भाग्य कहा जाएगा कि मनमोहन सिंह को न अच्छा गृह मंत्री मिला<font face="Mangal">, </font>न अच्छा विदेश मंत्री मिला<font face="Mangal">, </font>न अच्छा कृषि मंत्री मिला और यह देश फिर भी चल रहा है। यह अलग बात है कि देश की दिशा प्रेशर ग्रुप तय कर रहे हैं<font face="Mangal">, </font>जो किसी भी देश के लिए ठीक नहीं। देश के अंदर भी प्रेशर ग्रुप नीतियों और फैसलों को प्रभावित कर रहे हैं और देश के बाहर भी ऐसे ही प्रेशर ग्रुप कूटनीति को प्रभावित कर रहे हैं। आजादी के बाद ऐसी लच्चर व्यवस्था पहले कभी नहीं थी। सरकार चलना अलग बात है<font face="Mangal">, </font>लेकिन सरकार का ठीक से चलना और हर चीज पर नियंत्रण होना अलग बात। महंगाई काबू नहीं आ रही<font face="Mangal">, </font>खाद्यान्न का अकाल पड़ गया है<font face="Mangal">, </font>आतंकवाद ने अपनी बांहे फैलाना शुरु कर दिया है<font face="Mangal">, </font>मुस्लिम कट्टरपंथी सरकार पर हावी हो गए हैं और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की किरकिरी हो रही है। सिर्फ नेपाल ही क्यों<font face="Mangal">, </font>अमेरिका के साथ परमाणु समझौते और पाकिस्तान के साथ आतंकवाद के मुद्दे पर साझा मेकेनिज्म मनमोहन सिंह की दो बडी ग़लतियां सामने आ रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अभी आश्वस्त नहीं हैं कि उनका अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश से किया गया परमाणु समझौता सिरे चढ़ेगा या नहीं। लेकिन मनमोहन सिंह ने देश के लिए बिना कुछ हासिल किए अमेरिका को भारत के परमाणु संयंत्रों का सारा कच्चा चिट्ठा सौंप दिया है। अगर परमाणु समझौता कामयाब नहीं होता और भारत को परमाणु ईंधन नहीं मिलता तो भारत की ओर से अमेरिका को दी गई परमाणु संयंत्रों की जानकारी मनमोहन सिंह की ऐतिहासिक गलती साबित होगी। परवेज मुशर्रफ के साथ आतंकवाद के खिलाफ साझा मेकेनिज्म पर भी मनमोहन सिंह अब आश्वस्त नहीं हैं। कुछ ही दिन के बाद अब उन्होंने यह बोलना शुरु कर दिया है कि इस मुद्दे पर पाकिस्तान का इम्तिहान होगा। ताजा गलती शशि थरूर को संयुक्त राष्ट्र के महासचिव पद का उम्मीदवार बनाने की थी। जिस समय शशि थरूर को उम्मीदवार बनाया गया उस समय मैंने यह लिखा था कि यह कूटनीतिक गलती है क्योंकि जब भारत सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता की दावेदारी कर रहा है तो उसे महासचिव पद की दावेदारी करनी ही नहीं चाहिए। यह कैसे हो सकता है कि भारत संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद पर दावा ठोके और उसके बाद सुरक्षा परिषद की सदस्यता भी मांगे। दोनों चीजें साथ<font face="Mangal">-</font>साथ नहीं चल सकती। संयुक्त राष्ट्र के नियम के मुताबिक ही सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य देश महासचिव पद के दावेदार नहीं हो सकते। महासचिव पद पर अपना उम्मीदवार खड़ा करना सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता की दावेदारी छोड़ना था। यह तो अच्छा ही हुआ कि अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को करारा झटका देते हुए दक्षिण कोरिया के उम्मीदवार बून का समर्थन कर दिया। हालांकि इसका कोई फायदा मिलने की मुझे कोई उम्मीद नहीं दिखती क्योंकि सुरक्षा परिषद की सदस्यता की जितनी जोरदार ढंग से पैरवी की जानी चाहिए थी<font face="Mangal">, </font>उतनी नहीं हो रही। मनमोहन सिंह से सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता की जोरदार पैरवी की कोई उम्मीद भी नहीं दिखती। अगर इसी वजह से मनमोहन सिंह ने शशि थरूर को महासचिव पद का उम्मीदवार बनाया था तो उन्हें पहले होमवर्क कर लेना चाहिए था<font face="Mangal">, </font>कूटनीतिक कदम बिना आकलन के नहीं उठाए जाते। अगर कोई समझदार विदेश मंत्री होता तो मनमोहन सिंह को बिना होमवर्क के महासचिव पद के लिए उम्मीदवार खड़ा करने की सलाह नहीं देता। मनमोहन सिंह को चाहिए था कि वह सुरक्षा परिषद के पांचों स्थाई सदस्यों से पहले बात करते<font face="Mangal">, </font>फिर उम्मीदवार खड़ा करते। जब किसी भी एक स्थाई सदस्य की वीटो पावर उम्मीदवार रुखसत कर सकती है<font face="Mangal">, </font>तो भारत जैसा कोई भी बुध्दिमान विशाल देश उन पांचों देशों से गारंटी लेने के बाद ही उम्मीदवार खड़ा करता। इस मामले में शशि थरूर की किरकिरी नहीं हुई अलबता मनमोहन सिंह की किरकिरी हुई है और मनमोहन सिंह की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी का मतलब है भारत की किरकिरी।</p>
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		<title>संस्कृति, सभ्यता, संविधान और हिंदू</title>
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		<pubDate>Sat, 23 Sep 2006 18:34:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[हाल ही में अल कायदा ने अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश को सलाह दी कि अगर वह बचना चाहते हैं तो उन्हें इस्लाम कबूल कर लेना चाहिए। इससे भी पहले एक खबर आई कि एक ईसाई महिला पत्रकार का अपहरण किया गया और उसका धर्म परिवर्तन करवा कर मुक्त कर दिया गया। उसे धमकी दी गई [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">हाल ही में अल कायदा ने अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश को सलाह दी कि अगर वह बचना चाहते हैं तो उन्हें इस्लाम कबूल कर लेना चाहिए। इससे भी पहले एक खबर आई कि एक ईसाई महिला पत्रकार का अपहरण किया गया और उसका धर्म परिवर्तन करवा कर मुक्त कर दिया गया। उसे धमकी दी गई कि वह अब मुस्लिम के तौर पर ही रहेगी। ईरान और अफगान से आए मुगलों ने हिंदुस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन करवाने की मुहिम छेड़ी थी<font face="Mangal">, </font>इसी वजह से कश्मीर में ज्यादातर आबादी मुस्लिम हो गई<font face="Mangal">, </font>जबकि वहां सौ फीसदी आबादी ब्राह्मणों की थी। कश्मीरी पंडितों की फरियाद पर ही गुरु तेगबहादुर ने बलिदान दिया और उसके बाद सिख मत का उदय हुआ। <span id="more-114"></span>मुगलों ने हिंदुस्तान में न सिर्फ तलवार की नोंक पर धर्म परिवर्तन करवाया<font face="Mangal">, </font>अलबता हिंदुओं के हजारों साल पुराने मंदिरों को तोड़ा<font face="Mangal">-</font>फोड़ा और लूटा गया। मुगलों की इसी कारिस्तानी के खिलाफ देश भर में जगह<font face="Mangal">-</font>जगह लड़ाइयां होती रहीं। बंगाल से लेकर पंजाब तक<font face="Mangal">, </font>महाराष्ट्र से लेकर राजस्थान तक मुगलों से लड़ाइयां हुईं। बांग्ला भाषा में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने <font face="Mangal">&#8216;</font>आनंद मठ<font face="Mangal">&#8216; </font>नाम से जो उपन्यास लिखा उसमें भी मुसलमानों के तलवार की नोंक पर धर्म परिवर्तन करवाने की आलोचना की गई है। वंदे मातरम से मुसलमानों का विरोध सिर्फ इसलिए हैं क्योंकि वह <font face="Mangal">&#8216;</font>आनंद मठ<font face="Mangal">&#8216; </font>में लिखा गया था।</p>
<p align="justify">धर्म परिवर्तन करवाने के मामले में ईसाइयों का रिकार्ड भी कोई कम नहीं। करीब छह साल पहले दिसंबर <font face="Mangal">1999 </font>में मैं अंडमान निकोबार के काचाल नामक द्वीप में गया था तो वहां पाया कि ईसाइयों ने इस द्वीप के आदिवासियों का भी लालच देकर धर्म परिवर्तन करवा दिया। भारत में ब्रिटिश शासन खत्म होने के बाद धर्म परिवर्तन करवाने की मुहिम में तेजी आई है। वेटिकन सिटी से भेजे गए पादरियों ने देश भर के आदिवासी क्षेत्रों को धर्म परिवर्तन का क्षेत्र चुना। पूर्वोत्तर के सभी राज्य<font face="Mangal">, </font>उड़ीसा<font face="Mangal">, </font>राजस्थान<font face="Mangal">, </font>झारखंड<font face="Mangal">, </font>छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में पिछले पचास सालों में बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन की मुहिम चलाई। जगह<font face="Mangal">-</font>जगह पर हिंदुओं ने लालच से धर्म परिवर्तन करवाए जाने की मुखालफत की और तनाव पैदा हुआ। कई जगह पर हिंसक स्थिति भी पैदा हुई<font face="Mangal">, </font>जिससे समाज में वैमनस्य फैला। उड़ीसा में ग्राह्म स्टेंस की हत्या इसी वैमनस्य का नतीजा था<font face="Mangal">, </font>जो कई सालों से समाज सेवा के नाम पर धर्म परिवर्तन करवाने की मुहिम छेड़े हुए थे। हिंदू धर्म की बुराइयां निकाल कर<font face="Mangal">, </font>देवी<font face="Mangal">-</font>देवताओं की खिल्ली उड़ाकर<font face="Mangal">, </font>उनके लिए अपमानजनक और अश्लील टिप्पणियां करके ईसाई स्कूलों में पढ़ रहे अबोध बच्चों के मन पर हिंदू धर्म के खिलाफ नफरत फैलाने का काम आज भी किया जा रहा है।</p>
<p align="justify">लेकिन हिंदुओं ने दुनिया भर में कहीं भी<font face="Mangal">, </font>कभी भी धर्म परिवर्तन करवाने की कोई मुहिम नहीं छेड़ी। स्वामी दयानंद ने जरूर मुगलों की ओर से जबर्दस्ती मुसलमान बनाए गए हिंदुओं को वापस हिंदू धर्म में लाने के लिए शुध्दि अभियान चलाया था<font face="Mangal">, </font>जो आगे चलकर कई जगह पर सनातन धर्म ने भी अपनाया। लेकिन यह धर्म परिवर्तन कतई नहीं था<font face="Mangal">, </font>क्योंकि यूरोप से आए ईसाइयों या ईरान या अफगानिस्तान से आए मुसलमानों को हिंदू बनाने की मुहिम नहीं थी<font face="Mangal">, </font>अलबत्ता सिर्फ धर्म परिवर्तन करने वालों के शुध्दिकरण की मुहिम थी। हिंदुस्तान में सदियों<font face="Mangal">-</font>सदियों से हर धर्म को सम्मान दिया गया। हिंदू यहां की जीवन पध्दति है<font face="Mangal">, </font>इसका पूजा<font face="Mangal">-</font>पाठ से कोई ताल्लुक नहीं। इसीलिए जैन<font face="Mangal">, </font>सिख<font face="Mangal">, </font>बौध्द सभी खुद को हिंदू ही कहते रहे<font face="Mangal">, </font>क्योंकि यह सभी मत यहीं पर पनपे और उनका मूल हिंदू ही था। वे हिंदू होते हुए भी जैन<font face="Mangal">, </font>सिख<font face="Mangal">, </font>बौध्द थे। जैसे मूर्ति पूजा करने वाला भी हिंदू है और मूर्ति पूजा न करने वाला भी हिंदू है। आर्यसमाजी भी हिंदू है और सनातन धर्मी भी हिंदू है। हिंदू की यही परिभाषा संविधान में भी दर्ज है और सुप्रीम कोर्ट भी अपने फैसलों में यही परिभाषा दे चुकी है। सिर्फ मुसलमान और ईसाई ही खुद को बाकी धर्मों से ऊपर मानते हैं और पूरी दुनिया को मुसलमान और ईसाई बनाने की कोशिशों में जुटे रहते हैं। ईसाइयों और मुसलमानों की पूरी दुनिया को अपने रंग में रंग लेने की मुहिम शताब्दियों से चल रही है<font face="Mangal">, </font>जिस कारण भारत में हिंदू खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और उनमें असुरक्षा की भावना के कारण समय<font face="Mangal">-</font>समय पर आक्रोश पैदा होता रहा।</p>
<p align="justify">हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करवाने की मुहिम आठ सौ साल से चल रही है। पहले मुसलमानों ने ऐसी कोशिश की और अब ईसाई ऐसी कोशिश में जुटे हुए हैं। अगर ईसाइयों और मुसलमानों में हिंदुओं की तरह सब धर्मों को बराबर मानने की धारणा होती<font face="Mangal">, </font>तो धर्म परिवर्तन की जरूरत ही नहीं पड़ती। जब ईश्वर एक है तो कोई किसी भी पध्दति से उसका पूजा<font face="Mangal">-</font>पाठ करे<font face="Mangal">, </font>उससे क्या फर्क पड़ता है<font face="Mangal">, </font>धर्म परिवर्तन करवाने की जरूरत ही क्या है। यह व्यक्ति के विवेक पर छोड़ देना चाहिए कि वह किस रास्ते को अपनाता है। अपने धर्म को ऊंचा बताकर धर्म परिवर्तन की मुहिम मानवाधिकार विरोधी मानी जानी चाहिए। लेकिन इस तरह का कोई विचारणीय फैसला करने की बजाए धर्म परिवर्तन राजनीतिक दलों का वोट हासिल करने का जरिया बनकर रह गया। आजादी से पहले धर्म परिवर्तन हो रहा था और आजादी के बाद भी उस पर रोक नहीं लगी। अब कुछ राज्य सरकारों ने धर्म परिवर्तन के नियमों को कुछ कड़ा करने की कोशिश की है<font face="Mangal">, </font>ताकि डरा<font face="Mangal">-</font>धमका या लालच देकर धर्म परिवर्तन न करवाया जा सके<font face="Mangal">, </font>तो उसकी राजनीतिक तौर पर मुखालफत की जा रही है। जो भी गवर्नर राजनीतिक कारणों से धर्म परिवर्तनों को कानून<font face="Mangal">-</font>कायदे के दायरे में लाने में रुकावट बन रहे हैं<font face="Mangal">, </font>वे निश्चित रूप से धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन कर रहे हैं।</p>
<p align="justify">राजस्थान की गवर्नर प्रतिभा पाटिल ने राजस्थान विधानसभा से पारित बिल पर अभी मोहर नहीं लगाई<font face="Mangal">, </font>बावजूद इसके कि उन्होंने जो आपत्तियां उठाई थीं<font face="Mangal">, </font>उनका राज्य मंत्रिमंडल जवाब दे चुका है। इसी तरह का विवाद अब गुजरात विधानसभा की ओर से पारित बिल में भी पैदा करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि गुजरात के राज्यपाल नवल किशोर शर्मा के बारे में यह आम धारणा है कि वह राजनीतिक दबाव में कोई फैसला नहीं करते और माना जा रहा है कि इस बिल में उन्हें कोई संवैधानिक खामी नजर नहीं आई तो वह बिल पर दस्तखत कर देंगे। अब सवाल पैदा होता है कि विवाद किस बात पर खड़ा किया जा रहा है। विवाद इस बात पर खड़ा किया जा रहा है कि हिंदुओं के साथ<font face="Mangal">-</font>साथ बौध्दों और जैनों के धर्म परिवर्तन करके मुसलमान या ईसाई बनने पर जिला कलेक्टर को पहले सूचना देनी होगी। यह प्रावधान इसलिए किया गया है कि अगर धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति खुद जिला मुख्यालय में जाकर समय रहते धर्म परिवर्तन की इजाजत मांगेगा तो ईसाइयों पर जबरन धर्म परिवर्तन करवाने का आरोप नहीं लग सकेगा। यह प्रावधान तो देश भर में धर्म परिवर्तन करवाने वाले ईसाइयों के हित में है<font face="Mangal">, </font>फिर कांग्रेस इसका विरोध क्यों कर रही है<font face="Mangal">? </font>कांग्रेस के नेता इस बात से खफा हैं कि हिंदुओं के साथ<font face="Mangal">-</font>साथ जैनियों और बौध्दों पर भी पूर्व सूचना की बंदिश क्यों लगाई जा रही है। असल में वे हिंदुओं को बहुत छोटा समुदाय बनाने में तुले हुए हैं<font face="Mangal">, </font>इसलिए पिछले पचास सालों से बौध्दों<font face="Mangal">, </font>जैनियों और सिखों को यह कहकर उकसाया जा रहा है कि उनका हिंदुओं से कुछ लेना<font face="Mangal">-</font>देना नहीं। लेकिन जो लोग इस देश का इतिहास और संस्कृति जानते हैं<font face="Mangal">, </font>वे जानते हैं कि ये तीनों समुदाय ही नहीं बल्कि अनेकों अनेक पूजा पध्दतियों को अपनाने वाले हिंदू ही हैं<font face="Mangal">, </font>जिसे न सिर्फ इतिहास बल्कि संविधान ने भी स्पष्ट रूप से माना है।</p>
<p align="justify">संविधान के अनुच्छेद <font face="Mangal">25 </font>की धारा<font face="Mangal">- </font>दो में लिखा है कि हिंदू में सिख<font face="Mangal">, </font>जैन और बौध्द भी शामिल हैं। तत्कालीन चीफ जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ की रहनुमाई वाली पांच जजों की बैंच ने <font face="Mangal">1982 </font>में कहा था<font face="Mangal">- &#8216;</font>संविधान निर्माताओं ने यह स्पष्ट कर दिया था कि हिंदुओं में सिख<font face="Mangal">, </font>जैन और बौध्द मतों को मानने वाले भी आते हैं।<font face="Mangal">&#8216; </font>जस्टिस जेएस वर्मा ने <font face="Mangal">1994 </font>के अपने एतिहासिक फैसले में लिखा था कि हिंदू कोई धर्म नहीं बल्कि जीवन पध्दति है। जो कांग्रेस अब गुजरात विधानसभा की ओर से पास किए गए बिल का यह कहकर विरोध कर रही है कि जैनियों<font face="Mangal">, </font>बौध्दों को हिंदुओं में शामिल करना संघ परिवार की साजिश है<font face="Mangal">, </font>उन्हें यह क्यों भूल जाता है कि जवाहरलाल नेहरू के समय में इसी कांग्रेस ने <font face="Mangal">1955 </font>में जब हिंदू विवाह कानून बनाया और <font face="Mangal">1956 </font>में जब हिंदू उत्तराधिकार कानून बनाया<font face="Mangal">, </font>उसके बाद जब हिंदू उत्तराधिकारी कानून और हिंदू दत्तक और भत्ता कानून बनाया तो यह कहा गया कि यह सिखों<font face="Mangal">, </font>बौध्दों और जैनों पर भी लागू होगा<font face="Mangal">, </font>लेकिन मुसलमानों<font face="Mangal">, </font>ईसाइयों<font face="Mangal">, </font>पारसियों और यहूदियों पर लागू नहीं होगा। कांग्रेस विदेशी धर्मावलंबियों के मोह में भारतीय संस्कृति और इतिहास को सिर्फ पचास साल के छोटे कार्यकाल में भूल गई है। गुजरात के बिल का विरोध करने वालों को डा<font face="Mangal">. </font>अंबेडकर का संसद में दिया गया जवाब याद करना चाहिए। डा<font face="Mangal">. </font>अंबेडकर जब नवंबर <font face="Mangal">1947 </font>में संसद में हिंदू कोड बिल पेश कर रहे थे<font face="Mangal">, </font>तो उनसे आदिवासियों की स्थिति के बारे में कई टेढ़े सवाल किए गए। तो उन्होंने जवाब दिया<font face="Mangal">- &#8216;</font>अगर मेरे मित्रों ने हिंदू कोड बिल की परिभाषा पढ़ ली हो<font face="Mangal">, </font>तो यह स्पष्ट है कि कौन हिंदू है और किस पर यह लागू होगा। उन्होंने देख लिया होगा कि हिंदू कोड बिल में यह प्रावधान है कि जो मुसलमान<font face="Mangal">, </font>पारसी या ईसाई नहीं है<font face="Mangal">, </font>उसे हिंदू माना जाएगा।<font face="Mangal">&#8216; </font>अब यही बात गुजरात विधानसभा की ओर से पारित बिल में कही गई है। यानी हिंदू<font face="Mangal">, </font>बौध्द और जैन अगर ईसाई<font face="Mangal">, </font>मुसलमान धर्म अपनाते हैं तो उन्हें कलेक्टर को सूचना देनी होगी। यह बात मुसलमानों और ईसाइयों के हिंदू बनने पर भी लागू होगी<font face="Mangal">, </font>लेकिन कोई सुन्नी अगर शिया बने या कोई कैथोलिक अगर प्रोटेस्टेंट बने तो कोई कानूनी बंदिश नहीं। इसी तरह आर्यसमाजी<font face="Mangal">, </font>सनातनी<font face="Mangal">, </font>जैनी<font face="Mangal">, </font>बौध्द हिंदुओं का कोई भी मत अपना लें<font face="Mangal">, </font>कोई कानूनी बंदिश नहीं। इसमें आपत्तिजनक क्या है<font face="Mangal">, </font>यह समझ नहीं आ रहा।</p>
<p align="justify">भारतीय सभ्यता<font face="Mangal">, </font>संस्कृति और संविधान के मुताबिक भी देश में पनपे सभी मत हिंदू धर्म में आते हैं। हालांकि आजादी के बाद राजनीतिक कारणों से ही जैनियों<font face="Mangal">, </font>बौध्दों और सिखों को हिंदुओं से अलग<font face="Mangal">-</font>थलग करने की साजिश के तहत उन्हें अल्पसंख्यक ठहराया गया और अल्पसंख्यक आयोग में शामिल किया गया<font face="Mangal">, </font>अदालतों ने भी कुछ इस तरह के फैसले दिए जिनमें कुछ भ्रांतियां पैदा हुई<font face="Mangal">, </font>लेकिन मोटे तौर पर मंदिरों<font face="Mangal">, </font>गुरुद्वारों और जैन स्थानकों में बिना भेदभाव के हिंदू<font face="Mangal">, </font>सिख<font face="Mangal">, </font>जैनी जाते हैं<font face="Mangal">, </font>उन पर कोई रोक<font face="Mangal">-</font>टोक नहीं होती। इसलिए इतिहास के गर्भ में जाकर<font face="Mangal">, </font>प्राचीन संस्कृति और नवीनतम संविधान के प्रावधानों और भावनाओं को समझ कर हिंदुओं के ही विभिन्न मतों को हिंदुओं से लड़ाने की घिनौनी चालें खत्म होनी चाहिए। बांटकर राज करने की अंग्रेजों की प्रवृत्ति खत्म होनी चाहिए।</p>
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		<title>विकास के लिए जरुरी राजनीतिक स्थिरता</title>
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		<pubDate>Sat, 16 Sep 2006 18:34:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[झारखंड में सता परिवर्तन के बाद मौजूदा संविधान पर एक बार फिर गौर करने का वक्त आ गया है। कई बार लगता है कि अमेरिका का संविधान भारत के संविधान से कहीं बेहतर है। शायद इसी वजह से अमेरिका में राजनीतिक स्थिरता कायम रहती है और विकास की गति मंद होने के सवाल ही पैदा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">झारखंड में सता परिवर्तन के बाद मौजूदा संविधान पर एक बार फिर गौर करने का वक्त आ गया है। कई बार लगता है कि अमेरिका का संविधान भारत के संविधान से कहीं बेहतर है। शायद इसी वजह से अमेरिका में राजनीतिक स्थिरता कायम रहती है और विकास की गति मंद होने के सवाल ही पैदा नहीं होता। भारत के बारे में कहा जाता है कि या तो चुनाव हो रहे होते हैं<font face="Mangal">, </font>या चुनावों की तैयारी हो रही होती है। मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था ने सरकारों को इतना कमजोर और अस्थिर बना दिया है कि कोई भी निर्दलीय विधायक सरकार को गिराने की स्थिति में होता है। बड़े राजनीतिक दलों का जमीनी आधार खिसकने के बाद इस स्थिति ने विकराल रुप धारण कर लिया है। <span id="more-113"></span>तीन दशक तक सिर्फ कांग्रेस ही बड़ा राजनीतिक दल रहा और आजादी के बाद देश में दलीय राजनीति को खड़ा करने की जो जिम्मेदारी कांग्रेस पर आई थी<font face="Mangal">, </font>कांग्रेस ने उसे निभाने के बजाए दूसरे दलों को उभरने हीं नहीं दिया। आज इस बात की समीक्षा करने का वक्त आ गया है कि क्या कांग्रेस की इस मनोवृति ने देश की लोकतांत्रिक जड़ों को कमजोर किया या मजबूत किया। कांग्रेस से जब जनता का मोहभंग हुआ तो उसके सामने कोई एक बडा विकल्प मौजूद नहीं था। नतीजा यह निकला कि जगह<font face="Mangal">-</font>जगह पर स्थानीय नेतृत्व उभरकर सामने आया। कई जगह पर जरुर प्रमुख विपक्षी दल के रुप में भाजपा ने कांग्रेस की जगह ली<font face="Mangal">, </font>लेकिन मोटे तौर पर भाजपा उस कांग्रेस का विकल्प नहीं बन पाई जो जमीनी आधार खो चुकी थी। इसका नुकसान पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को झेलना पड़ रहा है। लालकृष्ण आडवाणी की मौजूदा समय में एक राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर यह टिप्पणी काफी हद तक सही है कि जिस तीव्र गति से जनता का कांग्रेस से मोहभंग हुआ<font face="Mangal">, </font>उस तीव्र गति से भाजपा का विकास नहीं हुआ। अगर यह विकास स्वाभाविक होता और भाजपा जनता में अपनी जड़े जमाने की कोशिशों में जुटती तो कांग्रेस का विकल्प तैयार हो सकता था। आडवाणी की यह बात बिलकुल सही है कि कांग्रेस जनता की निगाह से उतर गई लेकिन भाजपा जनता की निगाह में चढ़ नहीं पाई। जिसका नतीजा <font face="Mangal">1991 </font>से <font face="Mangal">1998 </font>तक के तीन चुनावों में तो लगातार दिखा ही<font face="Mangal">, </font>उसके बाद के <font face="Mangal">1999 </font>और <font face="Mangal">2004 </font>के चुनावों में भी दिखा। लगातार पांच लोकसभाओं में किसी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। पिछले सोलह सालों से देश में जुगाड़ से बनी मिली जुली सरकारों का दौर चल रहा है। जिस कारण राजनीतिक अस्थिरता तो है ही<font face="Mangal">, </font>विकास और आर्थिक स्थिरता पर भी गहरा असर पड़ा है। यह संयोग ही है कि <font face="Mangal">1991 </font>में जब अस्थिर सरकारों का दौर शुरु हुआ तभी भारत को नरसिंह राव के रुप में एक ऐसा विद्वान प्रधानमंत्री मिला<font face="Mangal">, </font>जिसके राजनीतिक कौशल्य को तो याद किया ही जाएगा<font face="Mangal">, </font>देश के विकास के लिए अपनाई गई नीतियों को भी हमेशा याद रखा जाएगा। अगर देश में स्थिर राजनीतिक माहौल होता तो पिछले सोलह सालों में विकास की गति कई गुना ज्यादा हो सकती थी। लेकिन हुआ इसके उलट है<font face="Mangal">, </font>सिर्फ केंद्रीय स्तर पर ही नहीं<font face="Mangal">, </font>राज्यों में भी अस्थिर सरकारों का दौर चला। अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने शासनकाल में देश में राजनीतिक स्थायित्व के लिए एक बड़ा कदम उठाने की पहल की थी<font face="Mangal">, </font>लेकिन उसका इतना ज्यादा विरोध हुआ कि बात नतीजे तक नहीं पहुंच पाई। वाजपेयी और उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत ने देश में यह बहस शुरु करवाई थी कि लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल पांच साल तय होना चाहिए। राजनीतिक मक्कारी और कुटिलता के कारण मलाईदार ओहदे नहीं मिलने पर सरकारों को गिराने और विधानसभाओं को भंग करवाने के ओछे हथकंडे हमेशा के लिए बंद किए जाने चाहिए। संविधान में संशोधन करके इस तरह का बंदोबस्त करना कोई बड़ी मुश्किल नहीं है<font face="Mangal">, </font>लेकिन अच्छी नीयत से शुरु की गई इस बहस का देश की आजादी में अहम भूमिका निभाने वाली देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ने विरोध किया। हालांकि अगर ऐसा हो जाए तो राजनीति में धन<font face="Mangal">-</font>बल की भूमिका को काफी हद तक कम किया जा सकता है<font face="Mangal">, </font>विकास के कामों की गति में निरंतरता और तेजी लाई जा सकती है। आए दिन चुनावों का सामना करने या चुनावों की तैयारी करने के माहौल से बचा जा सकता है<font face="Mangal">, </font>विधानसभाओं के कार्यकाल पूरा न करने और लोकसभा के मध्यावधि चुनावों ने पिछले तीन दशकों में देश पर अच्छा खासा आर्थिक बोझ डाला है। राज्यों में अस्थिरता पैदा करने में केंद्र सरकारों की भी अहम भूमिका रही है। हालांकि सरकारिया आयोग ने राज्यों में केंद्र सरकार के दखल को रोकने के लिए कई अच्छे सुझाव दिए थे<font face="Mangal">, </font>लेकिन राजनीतिक स्वार्थो के कारण उन सुझावों पर भी अमल नहीं हुआ। केंद्र सरकार की ओर से अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर राज्यों में अस्थिरता पैदा करने का ताजा उदाहरण झारखंड का है। इससे पहले गोवा और अरुणाचल में भी यह हथकंडा अपनाया जा चुका है। ऐसा नहीं है कि ऐसे हथकंडे सिर्फ कांग्रेस ही अपनाती है अलबता राजग सरकार के समय में भी इस तरह के हथकंडे अपनाए गए थे। अरुणाचल की कांग्रेस सरकार अचानक भाजपा की सरकार बन गई थी। अब समय आ गया है कि देश में हर चीज राजनीतिक नजरिए से नहीं<font face="Mangal">, </font>अलबता आर्थिक और सामजिक विकास के नजरिए से देखी जानी चाहिए। सरकारों की स्थिरता के लिए मौजूदा संविधान की खामियों को दूर किया जाना चाहिए। जब लाभ के पदों पर बैठे सांसदों की सदस्यता बचाने के लिए अधकचरा कानून बनाया जा सकता है तो देश की राजनीतिक स्थिरता के लिए कोई बड़ा कदम क्यों नहीं उठाया जा सकता। अटल बिहारी वाजपेयी ने संविधान की समीक्षा के लिए जो आयोग बनाया था<font face="Mangal">, </font>उसने गंभीर मसलों पर गंभीरता से विचार करने के बजाए ज्यादातर जजों की समस्याओं पर ही विचार विमर्श किया। वाजपेयी की गलती यह थी कि उन्होंने संविधान समीक्षा संबंधी आयोग का प्रमुख एक पूर्व चीफ जस्टिस को बना दिया था। जबकि इसके लिए राजनीतिक दिमाग की ज्यादा जरुरत थी। देश के विकास के लिए हर कोशिश करने वाले मनमोहन सिंह को इस बारे में बिना राजनीतिक नफा<font face="Mangal">-</font>नुकसान देखे देश के हित में एक ऐसा कदम उठाना चाहिए जिससे राजनीतिक अस्थिरता और रोज<font face="Mangal">-</font>रोज के चुनावों से देश को निजात मिले।</p>
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		<title>मालेगांव से सबक लें मुसलमान</title>
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		<pubDate>Sat, 09 Sep 2006 18:34:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था- &#8216;फटा हुआ बम अपने शिकार का धर्म या जाति नहीं पूछता।&#8216; मालेगांव में हुए बम धमाकों से यह बात सही साबित हो गई। इससे पहले आतंकवादी सिर्फ उन्हीं जगहों को निशाना बनाते थे, जहां हिंदू बहुल आबादी हो। पहली बार ऐसा हुआ है कि बम ऐसी जगह [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था<font face="Mangal">- &#8216;</font>फटा हुआ बम अपने शिकार का धर्म या जाति नहीं पूछता।<font face="Mangal">&#8216; </font>मालेगांव में हुए बम धमाकों से यह बात सही साबित हो गई। इससे पहले आतंकवादी सिर्फ उन्हीं जगहों को निशाना बनाते थे<font face="Mangal">, </font>जहां हिंदू बहुल आबादी हो। पहली बार ऐसा हुआ है कि बम ऐसी जगह पर फटे हैं जो मुस्लिम बहुल आबादी वाला क्षेत्र है। हालांकि इस घटना के फौरन बाद किसी भी नतीजे पर पहुंचना नादानी होगा<font face="Mangal">, </font>लेकिन देश के गृहमंत्री शिवराज पाटिल और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने कई घंटों की समीक्षा और गुप्तचर एजेंसियों से मिली रिपोर्ट के बाद आतंकवादियों की वारदात कहकर उन अफवाहों को निराधार कर दिया<font face="Mangal">, </font>जिन्हें फैलाकर हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलने की शुरुआत हो चुकी थी। <span id="more-112"></span>ये अफवाहें आतंकवादियों का मकसद पूरा करने के लिए ही फैलाई जा रही थी। आतंकवादियों का मकसद वंदे मातरम से शुरू हुई हिंदू<font face="Mangal">-</font>मुस्लिम की खाई को और बढ़ाना हो सकता है। अभी कह नहीं सकते कि यूपीए सरकार के रेल मंत्री लालू यादव इस घटना पर क्या रुख अख्तियार करेंगे। कम से कम मुझे यह आशंका है कि वह गोधरा ट्रेन पर हुए हमले को हादसा करार देने जैसा ही कोई स्टैंड ले सकते हैं। मालेगांव की घटना के बाद भी पुलिस और सीबीआई की जांच के साथ<font face="Mangal">-</font>साथ एक न्यायिक आयोग बैठ जाएगा और नतीजा लालू यादव के दबाव में गोधरा जैसा भी आ सकता है। ऐसी आशंका मैं इसलिए जाहिर कर रहा हूं<font face="Mangal">, </font>क्योंकि सरकारों का काम अब सच पर टिके रहना नहीं रहा<font face="Mangal">, </font>अलबता मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए किसी भी हद तक जाना हो गया है। चाहे आप वंदे मातरम की घटना लें या इजराइल की ओर से लेबनान पर किए गए हमले की घटना। इजराइल ने लेबनान पर इसलिए हमला किया था क्योंकि वहां के आतंकवादी संगठन हिजबुल्ला ने इजराइल के दो फौजियों का अपहरण कर लिया था। इंसाफ का तकाजा यह था कि पूरी दुनिया लेबनान पर दबाव डालती कि वह हिजबुल्ला पर प्रतिबंध लगाए और उसके सफाए का अभियान शुरू करे। लेकिन हुआ इसका उलटा<font face="Mangal">, </font>जैसे पाकिस्तान की सरकार और वहां की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई मुस्लिम कट्टरपंथी आतंकवादियों को भारत में आतंकवाद फैलाने के लिए <font face="Mangal">&#8216;</font>लोजिस्टिक सपोर्ट<font face="Mangal">&#8216; </font>मुहैया करवा रही है<font face="Mangal">, </font>बिलकुल वैसे ही लेबनान की सरकार हिजबुल्ला को <font face="Mangal">&#8216;</font>लोजिस्टिक सपोर्ट<font face="Mangal">&#8216; </font>दे रही है। लेकिन इसके उलट भारत के मुस्लिम कट्टरपंथियों और वोट के सौदागर सेक्युलर दलों के दबाव में यूपीए सरकार ने संसद के दोनों सदनों में इजराइल के खिलाफ एक प्रस्ताव पास किया। सिर्फ इतना ही काफी नहीं<font face="Mangal">, </font>अब जब संयुक्त राष्ट्र ने वहां शांति सेना भेजी है और इजराइल के कबजे वाले लेबनानी क्षेत्र को हिजबुल्ला आतंकवादियों से मुक्त करवाने के लिए शांति सेना से अभियान शुरू करवाने का फैसला किया है<font face="Mangal">, </font>तो मनमोहन सिंह सरकार ने संयुक्त राष्ट्र को धमकी दी है कि अगर ऐसा हुआ तो भारत अपने सैनिकों को वापस बुला लेगा। इन सब बातों से समझ नहीं आता कि भारत आतंकवाद के खिलाफ है या पक्ष में। मौजूदा सरकार को पहले यह तय कर लेना चाहिए कि वह आतंकवाद और आतंकवादियों के खिलाफ है या उनके पक्ष में। इसी तरह की एक और घटना बताना भी जरूरी होगा जिससे मौजूदा सरकार के आतंकवाद से लड़ने और आतंकवादियों की शिनाख्त करने की इच्छाशक्ति पर शक पैदा होता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पांच सितंबर को आतंकवाद और नक्सलवाद के मुद्दे पर पहली बार मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई। यह संतोष की बात थी<font face="Mangal">, </font>क्योंकि पिछले सवा दो सालों में इन दोनों मुद्दों पर मनमोहन सरकार बेपरवाह लंबी तानकर सोई हुई थी। लेकिन इस बैठक में भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मकसद मुस्लिम तुष्टिकरण का रहा। उन्होंने इसे दुर्भाग्य बताया कि आतंकवादी वारदातें एक समुदाय को निशाना बनाकर की जाती हैं<font face="Mangal">, </font>जिस कारण मुसलमान शक के दायरे में आ जाते हैं। उनका स्पष्ट यही कहना था कि आतंकवादी वारदातों में क्योंकि हिंदू निशाने पर होते हैं<font face="Mangal">, </font>इसलिए मुसलमानों को शक की निगाह से देखा जाता है। खासकर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की तरफ इशारा करते हुए मनमोहन सिंह का कहना था कि मुसलमानों को अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। मनमोहन सिंह ने जिसे पांच सितंबर को दुर्भाग्य कहा था वह आठ सितंबर को संयोग में कैसे बदल गया कि पहली बार मुस्लिम बहुत इलाके में बम फटे। आने वाले समय में मनमोहन सिंह के पांच सितंबर के भाषण की भी समीक्षा होनी चाहिए कि उन्होंने यह बात संयोगवश कही थी या गुप्तचर एजेंसियों की ओर से दी गई किसी सूचना के आधार पर। लेकिन मालेगांव की घटना से भारत के मुसलमानों को सबक लेना चाहिए और अटल बिहारी वाजपेयी का कहा हुआ याद करना चाहिए कि फटने वाला बम अपने शिकार का धर्म नहीं पूछता। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जिया उल हक ने जब भारत के खिलाफ <font face="Mangal">&#8216;</font>आपरेशन टोपाज<font face="Mangal">&#8216; </font>की रणनीति बनाई थी<font face="Mangal">, </font>तो भारत में पहली बार पाकिस्तान की ओर से आतंकवादी वारदातें शुरू हुई थी। <font face="Mangal">&#8216;</font>आपरेशन टोपाज<font face="Mangal">&#8216; </font>का मकसद <font face="Mangal">1971 </font>की जंग का बदला लेना था<font face="Mangal">, </font>जिस कारण पाकिस्तान का बंटवारा हो गया था। <font face="Mangal">&#8216;</font>आपरेशन टोपाज<font face="Mangal">&#8216; </font>के जरिए पाकिस्तान भी सिखों को भड़का कर भारत का बंटवारा करवाना चाहता था और खालिस्तान नाम से एक नया राष्ट्र बनवाना चाहता था। हिंदुओं और सिखों को लड़वाने के लिए हर हरबा इस्तेमाल किया गया। लेकिन पाकिस्तान इसके बावजूद इसलिए सफल नहीं हुआ<font face="Mangal">, </font>क्योंकि सिख हिंदुओं के खिलाफ खड़ा होने को तैयार नहीं हुए। पाकिस्तान से ट्रेनिंग लेकर आए सिख आतंकवादियों ने गुस्से में पंजाब के गांवों में सिखों की लड़कियों का ही अपहरण कर बलात्कार करने शुरू कर दिए। नतीजा इसके उलटा निकला और आम शहरी और ग्रामीण सिख आतंकवादियों के खिलाफ खड़ा हो गया। अब पाकिस्तान की आईएसआई एजेंसी की ओर से ट्रेंड किए गए गैर भारतीय मुसलमान भी हू<font face="Mangal">-</font>ब<font face="Mangal">-</font>हू वही तरीका अपना रहे हैं। कश्मीर से गाहे<font face="Mangal">-</font>ब<font face="Mangal">-</font>गाहे इस तरह की खबरें आती रही हैं कि आतंकवादी किस तरह मुस्लिम घरों में पनाह लेते हैं और उनकी लड़कियों से बलात्कार करते हैं। इसलिए कश्मीर में जगह<font face="Mangal">-</font>जगह पर मुसलमान इन आतंकवादियों के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। पाकिस्तानी आतंकवादियों ने <font face="Mangal">&#8216;</font>आपरेशन टोपाज<font face="Mangal">&#8216; </font>जैसा ही आपरेशन पूरे भारत में छेड़ दिया है और उन जगहों को अपना पनाह का केंद्र बनाया है<font face="Mangal">, </font>जो मुस्लिम बहुल हैं। जो काम <font face="Mangal">80 </font>के दशक में पंजाब में नहीं हो सका<font face="Mangal">, </font>उसे छुटपुट उन जगहों पर सफल करने की योजना बनाई गई है<font face="Mangal">, </font>जो मुस्लिम बहुल हैं। वंदे मातरम का मुस्लिम कट्टरपंथियों की ओर से बड़े पैमाने पर विरोध करने से इन कट्टरपंथियों के हौसले बुलंद हुए हैं और उन्हें लगने लगा है कि मुसलमानों को हिंदुओं के खिलाफ भड़का कर मकसद हासिल किया जा सकता है। मुसलमानों को हिंदुओं के खिलाफ भड़काने के लिए ही मालेगांव में बड़े पैमाने पर मुसलमानों की हत्या करना रणनीति का हिस्सा हो सकता है। वंदे मातरम का विरोध करके भारत के मुसलमानों ने पाकिस्तान के आतंकवादियों को यह साफ संदेश दिया है कि वे भारतीय बाद में हैं<font face="Mangal">, </font>मुसलमान पहले हैं। बेहतर होगा कि भारत के मुसलमान उन कट्टरपंथियों को अलग<font face="Mangal">-</font>थलग कर दें<font face="Mangal">, </font>जो उन्हें ऐसा पाठ पढ़ाकर हिंदुओं के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। भारत में रह रहे मुसलमान अगर खुद को सच्चा भारतीय साबित नहीं करेंगे तो पाकिस्तान उनकी इस कमजोरी का मालेगांव जैसे हादसे करके फायदा उठाने की कोशिश करेगा।</p>
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		<title>विपदाओं पर राजनीतिक रोटियां</title>
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		<pubDate>Sat, 02 Sep 2006 18:34:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[राजस्थान में आई बाढ़ ने उस राजनीति की याद फिर ताजा कर दी, जो एनडीए सरकार के समय देखने को मिली थी। सोनिया गांधी उस समय विपक्ष की नेता थी और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार थी। सोनिया गांधी बार-बार राजस्थान में जाकर केंद्र पर सूखा राहत में भेदभाव का आरोप लगा रही थी। यह [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">राजस्थान में आई बाढ़ ने उस राजनीति की याद फिर ताजा कर दी<font face="Mangal">, </font>जो एनडीए सरकार के समय देखने को मिली थी। सोनिया गांधी उस समय विपक्ष की नेता थी और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार थी। सोनिया गांधी बार<font face="Mangal">-</font>बार राजस्थान में जाकर केंद्र पर सूखा राहत में भेदभाव का आरोप लगा रही थी। यह आरोप मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मौजूदगी में लगाए जाते थे<font face="Mangal">, </font>इसलिए जनता का एक बड़ा तबका इन आरोपों को सही मानता था। लेकिन दिल्ली में बैठे एनडीए सरकार के कर्ताधर्ताओं ने सोनिया गांधी के आरोपों की आंकड़ों के साथ धाियां उड़ाना शुरू किया<font face="Mangal">, </font>तो खुद गहलोत सरकार कटघरे में खड़ी हो गई थी। <span id="more-111"></span>आखिर चुनाव में जनता ने सोनिया गांधी के आरोपों को सही नहीं माना और उनके धुंआधार दौरों के बावजूद कांग्रेस न सिर्फ हार गई<font face="Mangal">, </font>बल्कि राजस्थान के इतिहास में इतनी बुरी हार का सामना कभी नहीं करना पड़ा था। राजग सरकार जनता में यह छाप छोड़ने में कामयाब रही कि केंद्र की ओर से तो भरपूर सहायता दी गई<font face="Mangal">, </font>लेकिन राज्य की सरकार ने उसका ठीक से इस्तेमाल नहीं किया। अब जब राजस्थान में बाढ़ आई है<font face="Mangal">, </font>तो वही बातें फिर दोहराई जा रही हैं। पिछले ढाई सालों में फर्क सिर्फ यह आया है कि सोनिया गांधी तब विशेष विमान पर राजस्थान का दौरा करती थी<font face="Mangal">, </font>जिसका किराया कांग्रेस पार्टी को अदा करना पड़ता था। भले ही राज्य में सोनिया गांधी के दौरे राज्य सरकार के छोटे विमान पर हो जाते थे<font face="Mangal">, </font>जिससे कांग्रेस पार्टी का कुछ पैसा बच जाता था। अब सोनिया गांधी के देश भर में हो रहे दौरों में कांग्रेस को कौड़ी भी खर्च नहीं करनी पड़ती। अलबता गृहमंत्री शिवराज पाटिल या रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी को सोनिया गांधी के साथ संतरी की तरह जाना पड़ता है। क्योंकि सरकारी विमान यही दोनों केंद्रीय मंत्री इस्तेमाल कर सकते हैं<font face="Mangal">, </font>इसलिए सोनिया गांधी के दौरों के लिए इन दोनों मंत्रियों को अपने दौरे कई बार रद्द करने पड़ते हैं। अब सोनिया गांधी के राजस्थान दौरे को ही लें<font face="Mangal">, </font>तो रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी का वहां रक्षा मंत्रालय से जुड़ा कोई काम नहीं था। लेकिन उन्हें सोनिया गांधी के साथ जाना पड़ा और रक्षा मंत्रालय के विमान के इस्तेमाल के बावजूद वह दौरा रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी का न होकर सोनिया गांधी का दौरा कहलाया। इसी तरह सरकारी विमानों के निजी दौरों के लिए इस्तेमाल का एक मामला कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट में गया था। जिसमें दो केंद्रीय मंत्रियों को सुप्रीम कोर्ट में फटकार भी पड़ी थी। मुलायम सिंह जब हरदन हल्ली डोडेगौड़ा देवगौड़ा सरकार में रक्षा मंत्री थे<font face="Mangal">, </font>तो उन्होंने उतर प्रदेश के बहुत दौरे किए थे। वह अक्सर सुबह लखनऊ चले जाते थे और शाम को लौट आते थे<font face="Mangal">, </font>इस दौरान उनका रक्षा मंत्री के नाते कोई कार्यक्रम भी नहीं होता था। हू<font face="Mangal">-</font>ब<font face="Mangal">-</font>हू वही नरसिंह राव के शासनकाल के समय भी हुआ था<font face="Mangal">, </font>जब शरद पवार रक्षा मंत्री थे। उस समय रक्षा मंत्री महाराष्ट्र के बहुत दौरे करते थे<font face="Mangal">, </font>जबकि रक्षा मंत्री का वहां कोई काम नहीं होता था। सरकारी विमान असल में सरकारी कामकाज को जल्दी निपटाने के लिए मुहैया करवाए जाते हैं। अभी सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका यह भी लंबित पड़ी है कि यूपीए सरकार आने के बाद कई नेताओं के जन्मदिन पर लाखों रुपए के इश्तिहार जारी किए गए<font face="Mangal">, </font>जबकि आम जनता के टेक्स से उगाही गई इस राशि का विकास और जनकल्याण के कामों पर इस्तेमाल होना चाहिए। विभिन्न राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के इश्तिहारों में सोनिया गांधी के फोटो को लेकर भी मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है। हालांकि मामला अदालत में जाने के बाद केंद्र और राज्य सरकारें इस मामले में एहतियात बरतने लगी हैं<font face="Mangal">, </font>लेकिन कम से कम इन दो मामलों में कोई कानून<font face="Mangal">-</font>कायदा स्पष्ट तौर पर बनाया जाना चाहिए। सरकारी विमानों को दुरुपयोग नहीं होना चाहिए और आम जनता की ओर से उगाहे गए टेक्सों का भी अपने राजनीतिक प्रचार के लिए दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। सरकारी फंड के अपने राजनीतिक प्रचार के लिए इस्तेमाल का एक तीसरा उदाहरण सांसदों को मिल रही सांसद निधि का है। सांसद निधि <font face="Mangal">1993 </font>में नरसिंह राव के शासनकाल में सांसदों को खुश करने के लिए शुरू की गई थी<font face="Mangal">, </font>जो संवैधानिक प्रावधानों का खुला उल्लंघन है। अब यह सांसद निधि सांसदों के व्यक्तिगत और चुनावी लाभ का हथियार बन चुकी है। चुनावों के समय सांसद अपनी सांसद निधि से करवाए कामों के आधार पर वोट मांगता है<font face="Mangal">, </font>जबकि उसके प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार के पास ऐसे उदाहरण नहीं हैं। इस तरह सरकारी फंड राजनीतिक इस्तेमाल का जरिया बन गया है। यही पैसा इस तरह की प्राकृतिक विपदाओं के समय इस्तेमाल किया जा सकता है। लोकसभा और राज्यसभा के कुल मिलाकर <font face="Mangal">800 </font>सांसद हैं और हर सांसद को दो करोड़ रुपया प्रति वर्ष सांसद निधि मिलती है। इस तरह हर साल <font face="Mangal">1600 </font>करोड़ रुपया प्राकृतिक विपदाओं के लिए रखा जा सकता है। प्राकृतिक विपदा पर राज्य सरकार को केंद्र सरकार की ओर से समय पर राहत राशि न पहुंचाया जाना राजनीतिक विवाद का कारण अब भी बन गया है<font face="Mangal">, </font>जैसा कि राज्य में कांग्रेस और केंद्र में राजग सरकार के समय बना था। लेकिन इस बार सोनिया गांधी ने अपने राजस्थान दौरे के समय वसुंधरा सरकार पर उस तरह के आरोप लगाने से परहेज किया। शायद इसकी वजह भाजपाई विधायकों की तरफ से पूरी तैयारी कर लेना था। बाढ़ग्रस्त क्षेत्र के विधायक जालम सिंह रावलोत ने उस प्रायोजित कार्यक्रम का मौके पर कड़ा विरोध किया<font face="Mangal">, </font>जिसमें सोनिया गांधी को यह बताया जाना था कि राज्य सरकार ने कोई राहत नहीं पहुंचाई। हम सब जानते हैं कि इस तरह की विपदाओं के समय राजनीतिक नेताओं के सामने इस तरह की भीड़ जुटाई जाती है जो विरोधी दल की आलोचना करे। सोनिया गांधी जब गहलोत सरकार के समय राजस्थान के दौरे करती थीं<font face="Mangal">, </font>तो राज्य सरकार की तारीफ और केंद्र सरकार की आलोचना करने वाली भीड़ जुटाई जाती थी<font face="Mangal">, </font>और अब ठीक इसके उलटा हो रहा है। आम तौर पर इस तरह के राजनीतिक शोशेबाजी वाले कार्यक्रमों में दूसरे दलों के नेता दूर ही रहते हैं। लेकिन भाजपा के विधायक ने अपने साथ भीड़ ले जाकर जिस तरह सोनिया गांधी का मौके पर विरोध किया है<font face="Mangal">, </font>वह अपने आप में उन नेताओं के लिए सीख है जो ऐसी विपदाओं के मौके पर राजनीतिक रोटियां सेकने की कोशिश करते हैं।</p>
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		<title>क्रीमीलेयर के लिए ही बिल बनाती सरकार</title>
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		<pubDate>Sat, 26 Aug 2006 18:34:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[संविधान निर्माताओं ने जब अनुसूचित जाति और जनजाति को आरक्षण देने का फैसला किया, तो बहुत लंबा चौड़ा विचार विमर्श हुआ था। सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण नहीं देने और सदियो सदियों से पिछडे दोनों समुदायों को आरक्षण का फैसला बाकी समाज में लाकर खड़ा करने की सोच का नतीजा था। सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण नहीं [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">संविधान निर्माताओं ने जब अनुसूचित जाति और जनजाति को आरक्षण देने का फैसला किया<font face="Mangal">, </font>तो बहुत लंबा चौड़ा विचार विमर्श हुआ था। सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण नहीं देने और सदियो सदियों से पिछडे दोनों समुदायों को आरक्षण का फैसला बाकी समाज में लाकर खड़ा करने की सोच का नतीजा था। सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण नहीं देने का फैसला तो स्पष्ट है<font face="Mangal">, </font>इसलिए हुआ था<font face="Mangal">, </font>क्योंकि मुसलमानों ने अपना पाकिस्तान धार्मिक आधार पर ही बनाया था। जबकि भारत में जितने भी इसाई है<font face="Mangal">, </font>वे सभी के सभी पहले हिंदू अनुसूचित जाति और जनजाति के थे और धर्मांतरण की मुख्य वजह भी यही बताई जाती रही कि उनके साथ हिंदू समाज में बराबरी का व्यवहार नहीं होता था। <span id="more-110"></span>जब उन्हाेने इसाई धर्म ग्रहण करके बराबरी का हक हासिल कर लिया<font face="Mangal">, </font>तो उनका पिछड़ापन अपने आप ही दूर हो गया<font face="Mangal">, </font>इसलिए उन्हें आरक्षण देने का कोई मतलब नहीं। अनुसूचित जाति और जनजातियों के अलावा अन्य पिछड़े वर्गों के आरक्षण की मांग लंबे समय से उठती रही थी और इंदिरा गांधी ने इस पर विचार करने के लिए मंडल आयोग बनाया था। इसी मंडल आयोग की सिफारिशें बाद में देश में सामाजिक समन्वय बिगड़ने की आशंका के कारण इंदिरा गांधी ने लागू नहीं की थी। वी पी सिंह ने इसे राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया और नौकरियों में <font face="Mangal">27 </font>फीसदी आरक्षण को लागू कर दिया। अनुसूचित जाति और जनजातियों को इससे पहले <font face="Mangal">15 </font>फीसदी आरक्षण था और अन्य पिछड़ी जाति को <font face="Mangal">27 </font>फीसदी आरक्षण देने के बाद <font face="Mangal">42 </font>फीसदी नौकरियां आरक्षित हो गई और राजपूत<font face="Mangal">, </font>ब्राहम्ण व बनिए अनाराक्षित वर्ग रह गया। जाटों<font face="Mangal">, </font>जैनियों जैसे अनेकों समुदाय भी कई जगह पर अन्य पिछड़े वर्गों में हैं<font face="Mangal">, </font>तो कई जगह पर अनारक्षित वर्गों में। नौकरियों में आरक्षण के समय देश में सामाजिक तनाव बढ़ा था<font face="Mangal">, </font>लेकिन वी पी सिंह और उनके जनता दल को इसका कोई दीर्घकालीन फायदा नहीं हुआ। हालांकि कांग्रेस को मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का बहुत नुकसान भुगतना पड़ा। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद कांग्रेस लोकसभा में कभी भी बहुमत हासिल नहीं कर पाई। राज्यों में भी कांग्रेस का आधार <font face="Mangal">1989 </font>से पहले जैसा नहीं रहा। देश की आम जनता इस बात को समझ चुकी थी कि कांग्रेस ने <font face="Mangal">1947 </font>से लेकर <font face="Mangal">1989 </font>तक के <font face="Mangal">42 </font>सालों में से चालीस साल राज किया लेकिन अन्य पिछड़े वर्गों के साथ न्याय नहीं किया। इसलिए कांग्रेस का वह आधार मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद नहीं रहा<font face="Mangal">, </font>जैसा पहले था। अब जबकि कांग्रेस को आठ साल के बनवास के बाद सत्ता हासिल हुई है तो वह अपने राजनीतिक आधार को वापस लाने के लिए हर हरबा इस्तेमाल करने को तैयार है<font face="Mangal">, </font>भले ही उससे कितना ही सामाजिक तनाव और वैमनस्य पैदा हो। अर्जुन सिंह की ओर से अन्य पिछड़े वर्गों को उच्च शिक्षा में आरक्षण के लिए मानसून सत्र में पेश किया गया बिल इसी रणनीति का हिस्सा है। लेकिन बिल पेश करते समय राजनीतिक क्रीमी लेयर को ज्यादा से ज्यादा सहुलियतें मुहैया करवाने की कांग्रेसी शैली की तरह अन्य पिछड़े वर्गों की क्रीमी लेयर को आरक्षण की मलाई देने का फैसला किया गया है। देश में आम धारणा यह है कि जो भी व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा हो चुका है<font face="Mangal">, </font>उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। एक तरफ तो अनुसूचित जाति और जनजातियों के आरक्षण में भी क्रीमी लेयर को आरक्षण से अलग करने की बात उठ रही है<font face="Mangal">, </font>दूसरी तरफ पहले से संपन्न हो चुके अन्य पिछड़े वर्ग की जातियों को भी आरक्षण देने की बात शुरू हो गई है। समाज में आम धारणा है कि आजादी के बाद अनुसूचित जाति और जनजाति के कुछ परिवार ही आरक्षण का फायदा उठा रहे है<font face="Mangal">, </font>बाकी परिवार जस के तस गरीबी रेखा के नीचे हैं। जो परिवार पहले दशक में आरक्षण का फायदा उठाकर नौकरियों में पहुंच गए<font face="Mangal">, </font>उन्हीं के वंशज पढ़ लिखकर जातिय आधार पर आरक्षण के तहत नौकरियां और अन्य सहुलियतें पा रहे हैं। जबकि गांवों में रहने वाले अनुसूचित जाति जनजाति परिवार जब अपने बच्चों को नौकरियों के लिए न्यूनतम शिक्षा ही नहीं दे पाते तो नौकरियां कैसे हासिल करेंगे। इसलिए समय समय पर मांग उठती रहती है कि क्रीमी लेयर को आरक्षण से महरूम किया जाए। सरकार कम से कम अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण देते समय <font face="Mangal">(</font>शिक्षा और नौकरियों दोनों<font face="Mangal">) </font>क्रीमी लेयर को इससे वंचित कर सकती है। लेकिन अन्य पिछड़े वर्गों की जाति के रानजीतिज्ञ और नौकरशाह ऐसा नहीं होने दे रहें<font face="Mangal">, </font>क्योंकि इससे उन्हीं के परिवारों को नुकसान होगा। इसलिए सरकार ने इन्हीं प्रभावशाली कुछ परिवारों के दबाव में आकर क्रीमी लेयर को भी आरक्षण देने का बिल पेश किया है। हालांकि पहले क्रीमी लेयर को आरक्षण नहीं देने का प्रावधान रखा गया था<font face="Mangal">, </font>उसका बिल भी तैयार हुआ था<font face="Mangal">, </font>उसका हिंदी में अनुवाद भी हुआ था। लेकिन कैबिनेट ने आखिरी बैठक में दक्षिण के नेताओं ने सरकार को प्रारूप बदलने के लिए मजबूर कर दिया। सरकार ने अंग्रेजी के प्रारूप में तो क्रीमी लेयर को महरूम करने का पैराग्राफ हटा दिया लेकिन हिंदी के बिल में बना हुआ है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता<font face="Mangal">, </font>सरकार का इरादा क्रीमी लेयर को भी आरक्षण देने का है। लेकिन सवाल होता है कि फिर आरक्षण का फायदा किसे होगा<font face="Mangal">, </font>इस समय देश में <font face="Mangal">52 </font>फीसदी आबादी अन्य पिछड़े वर्गों की है<font face="Mangal">, </font>लेकिन आरक्षण <font face="Mangal">27 </font>फीसदी ही दिया जा रहा है<font face="Mangal">, </font>अगर क्रीमी लेयर को इसमें शामिल किया गया तो सारा का सारा आरक्षण क्रीमी लेयर ही चट कर जाएंगी<font face="Mangal">, </font>जिस तरह अनुसूचित जाति<font face="Mangal">, </font>जनजाति का आरक्षण अपना मकसद हासिल करने में विफल रहा<font face="Mangal">, </font>उसी तरह अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण का मकसद भी विफल हो जाएगा। हू<font face="Mangal">-</font>ब<font face="Mangal">-</font>हू वैसे ही जैसे संसद में पारित और राष्ट्रपति की ओर से हस्ताक्षर के बावजूद लाभ के पदों की राजनीतिक मलाई खा रहे क्रीमी लेयर वाले राजनीतिज्ञों को राहत नहीं मिल रही<font face="Mangal">, </font>क्योंकि एक तरफ तो सोनिया<font face="Mangal">-</font>सोमनाथ को राहत पहुंचाने वाले कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है<font face="Mangal">, </font>तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी चिदम्बरम लाभ के पदों की मलाई खाने के आरोप में फंस गए हैं। लाभ के पदों की मलाई सिर्फ क्रीमीलेयर वाले<font face="Mangal">, </font>यानी प्रभावशाली सांसदों<font face="Mangal">-</font>विधायकों को ही मिलती हैं। लाभ के पदों की ठीक से परिभाषा करने के बजाय<font face="Mangal">, </font>बिल में पदों का नाम जोड़ने के कारण समस्या का हल नहीं निकल पा रहा। यूपीए सरकार बिल बनाने के मामले में एकदम नाकारा साबित हो रही हैं। पहले विवादास्पद लाभ के पद का बिल बना और अब उससे भी ज्यादा विवादास्पद आरक्षण का बिल।</p>
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		<title>नियंत्रण रेखा को बार्डर बनाना बेहतर हल</title>
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		<pubDate>Sat, 19 Aug 2006 18:34:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[दो साल सात महीने पहले जनवरी 2004 में जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री के नाते इस्लामाबाद में हुए सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने गए थे, तो दिल्ली से गई प्रेस टीम में मैं भी मौजूद था। करीब हफ्ते भर के पाकिस्तान दौरे के समय मेरे कई भ्रम टूटे थे। मैं इस नतीजे पर पहुंचा था [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">दो साल सात महीने पहले जनवरी <font face="Mangal">2004 </font>में जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री के नाते इस्लामाबाद में हुए सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने गए थे<font face="Mangal">, </font>तो दिल्ली से गई प्रेस टीम में मैं भी मौजूद था। करीब हफ्ते भर के पाकिस्तान दौरे के समय मेरे कई भ्रम टूटे थे। मैं इस नतीजे पर पहुंचा था कि पाकिस्तान का आवाम भारत के साथ न सिर्फ दोस्ताना संबंध रखने का इच्छुक है अलबत्ता ले<font face="Mangal">-</font>देकर कश्मीर समस्या को हमेशा के लिए हल करने का भी पक्षधर है। लेकिन पाकिस्तान की समस्या यह है कि थोड़ी<font face="Mangal">-</font>छोड़ी देर बाद लोकतंत्र खत्म हो जाता है और सैनिक शासन पाक के गले पड़ जाता है। उन दिनों मेरी वहां के पत्रकार हमीद मीर से लंबी बातचीत हुई थी<font face="Mangal">, <span id="more-109"></span></font>जिनका कहना था कि कश्मीर समस्या का हल सिर्फ तब निकलेगा जब दोनों देशों के चुने हुए नुमाइंदे मिल<font face="Mangal">-</font>बैठ कर बात करेंगे। वह इसके हिमायती नहीं थे कि भारत के चुने हुए प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान के सैनिक शासक परवेज मुशर्रफ से बात करें। वह चाहते थे कि वाजपेयी पाकिस्तान के चुने हुए प्रधानमंत्री जमाली के साथ बात करें। लेकिन वाजपेयी शायद बेहतर जानते थे कि पाकिस्तान में चुने हुए प्रधानमंत्री की कोई औकात नहीं होती<font face="Mangal">, </font>यह बाद में साबित भी हुआ जब मुशर्रफ ने जमाली को दूध से मक्खी की तरह निकाल बाहर किया और अपनी पसंद के शौकत अजीज को प्रधानमंत्री बना दिया। पर उस समय के प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और प्रधान सचिव बृजेश मिश्र वह ऐतिहासिक समझौता करवाने में कामयाब हो गए थे जो आतंकवाद के खिलाफ एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर जाना जाएगा। आगरा में आतंकवादियों को आजादी के आंदोलनकारी बताने वाले परवेज मुशर्रफ यह कहने को तैयार हो गए थे कि वह आतंकवादियों को पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर की सरजमीं को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देंगे। इसे एक अच्छी शुरुआत माना गया था और माना यह गया था कि दोस्ती की यह बयार आगे जाकर कश्मीर समस्या के हल में सहायक होगी। वाजपेयी ने इस साझा बयान पर दस्तखत के बाद मुशर्रफ को फोन करके कहा था कि वह अब आतंकवादियों से सावधान रहें। मुशर्रफ ने वाजपेयी के स्वस्थ रहने की दुआ की थी। खैर<font face="Mangal">, </font>उसके बाद दोस्ती की नई बयार शुरू हुई<font face="Mangal">, </font>ऐसा<font face="Mangal">-</font>ऐसा कुछ हुआ जिसके बारे में कभी कोई सोच भी नहीं सकता था<font face="Mangal">, </font>दोनों तरफ के कश्मीरियों का मिलन शुरू हुआ<font face="Mangal">, </font>मुजफ्फराबाद<font face="Mangal">-</font>श्रीनगर रास्ता खुल गया और कड़वाहट का दौर खत्म होना शुरू हो गया। लेकिन कश्मीर को लेकर कोई ऐसा फार्मूला सामने नहीं आया<font face="Mangal">, </font>जो दोनों पक्षों को मान्य हो। इसमें सबसे बड़ी अड़चन भारत की संसद की ओर से पास किया गया वह प्रस्ताव है<font face="Mangal">, </font>जिसमें कहा गया है कि पाक अधिकृत कश्मीर भारत का हिस्सा है और उसे वापस हासिल करना है। इतना ही नहीं पाक अधिकृत कश्मीर के हिस्से की जम्मू<font face="Mangal">-</font>कश्मीर विधानसभा की <font face="Mangal">24 </font>सीटें भी खाली छोड़ी हुई हैं। भारत और पाकिस्तान के आवाम की सोच में मुझे एक गंभीर फर्क यह दिखा कि भारत की आम जनता हर हालत में पाक अधिकृत कश्मीर हासिल करने की बात करती है<font face="Mangal">, </font>लेकिन पाकिस्तान की आम जनता भारत के कब्जे वाले कश्मीर को हासिल करने की कोई बात नहीं करती। हालांकि ऐसी बात नहीं है कि कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के आवाम में भावनात्मक लगाव नहीं। पाकिस्तान के आवाम का कश्मीर के साथ भावनात्मक लगाव मुस्लिम बहुल होने के कारण है। परवेज मुशर्रफ ने <font face="Mangal">&#8216;</font>फ्रंट लाइन<font face="Mangal">&#8216; </font>के लिए एजी नूरानी को दिए इंटरव्यू में कहा कि न तो पाकिस्तान और न ही भारत यह चाहता है कि जम्मू<font face="Mangal">-</font>कश्मीर आजाद मुल्क बने। इसलिए इस समस्या का हल यही हो सकता है कि जम्मू<font face="Mangal">-</font>कश्मीर के दोनों हिस्सों में साझा प्रबंधन की शुरुआत की जाए। एजी नूरानी <font face="Mangal">15 </font>अगस्त से पहले पाकिस्तान में थे और उन्होंने वहां मुशर्रफ से यह इंटरव्यू किया था<font face="Mangal">, </font>लेकिन मीडिया ने मुशर्रफ के इस बयान को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के <font face="Mangal">15 </font>अगस्त को दिए गए भाषण के साथ जोड़कर जारी किया। मनमोहन सिंह और मुशर्रफ दोनों के बयानों को तोड़<font face="Mangal">-</font>मरोड़ कर पेश किया गया। मनमोहन सिंह की तरफ से यह कहा गया कि दोनों हिस्सों के लोगों को करीब लाने की दिशा में व्यवस्था को सांस्थानिक रूप दिया जाना चाहिए। परवेज मुशर्रफ की तरफ से यह कहा गया कि उन्होंने मनमोहन सिंह के इस सुझाव का समर्थन करते हुए कहा कि इस पर बातचीत होनी चाहिए क्योंकि इससे क्षेत्र में साझा प्रबंधन की शुरुआत हो सकती है। दिल्ली से जारी हुई एक एजेंसी की खबर में इतनी बेईमानी होगी<font face="Mangal">, </font>यह देखकर हैरानी होती है। लेकिन परवेज मुशर्रफ का दोनों तरफ के जम्मू<font face="Mangal">-</font>कश्मीर में मौजूदा व्यवस्था को खत्म करके साझा प्रबंधन का बयान कोई नया नहीं है। परवेज मुशर्रफ हमेशा से यह मांग करते रहे कि जम्मू<font face="Mangal">-</font>कश्मीर में तैनात साढ़े तीन लाख फौजियों को वहां से हटा दिया जाए तो समस्या का हल हो सकता है। उनके इस बयान का मतलब ही यह है कि जैसे भारत ने सेना के बल पर जम्मू<font face="Mangal">-</font>कश्मीर में बलात कब्जा कर रखा है। परवेज मुशर्रफ के ताजा बयान का मतलब भी यही है कि भारतीय फौज को वहां से हटाया जाए और कोई साझा प्रबंधन शुरू किया जाए। पाकिस्तान में कश्मीर समस्या के हल के लिए आम तौर पर दो तरह के सुझाव दिए जाते हैं<font face="Mangal">, </font>उन दोनों सुझावों का भारत के कुछ चुने हुए लोग भी समर्थन करते हैं। एक सुझाव तो यह है कि मौजूदा नियंत्रण रेखा को ही अंतरराष्ट्रीय सीमा मान लिया जाए। अमेरिका और ब्रिटेन ने करीब दो दशक पहले भारत के कुछ बुध्दिजीवी पत्रकारों को लंदन और न्यूयार्क घुमाकर जम्मू<font face="Mangal">-</font>कश्मीर समस्या के स्थाई हल के लिए नियंत्रण रेखा को सीमा बनाने की घुट्टी पिलाकर वापस भेजा था। जिन दिनों यह अभियान अखबारों में छाया हुआ था<font face="Mangal">, </font>उन दिनों भावनात्मक भारतीय आवाम ने इसका कड़ा विरोध किया और नतीजा यह निकला कि <font face="Mangal">1993 </font>में भारत संसद ने पाक अधिकृत कश्मीर को हासिल करने का सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास करके नियंत्रण रेखा को सीमा बनाने के अभियान को पंक्चर कर दिया। जिन दिनों मैं पाकिस्तान में था<font face="Mangal">, </font>उस समय इस्लामाबाद और रावलपिंडी में आम लोगों से कश्मीर समस्या पर बातचीत करने का मौका मिला। परवेज मुशर्रफ ने जिस साझा प्रशासन की बात अब की है<font face="Mangal">, </font>वही बात इस्लामाबाद की मार्केट में घूमते हुए बातचीत के दौरान गुजरांवाला के एक पढ़े<font face="Mangal">-</font>लिखे युवा किसान मोहम्मद अकरम ने की थी। वह कश्मीर को लेकर ज्यादा कट्टर था और उसका कहना था कि दोनों देश वहां से अपनी फौजें हटा लें<font face="Mangal">, </font>पूरे कश्मीर में प्रशासन के लिए तीन मैंबरी कमेटी बनाई जाए<font face="Mangal">, </font>जिसमें एक भारतीय<font face="Mangal">, </font>एक पाकिस्तानी और एक जम्मू<font face="Mangal">-</font>कश्मीर का नुमाइंदा हो। तीनों <font face="Mangal">20 </font>साल तक प्रशासन करें और कश्मीर का विकास करें। अकरम की नजर में <font face="Mangal">20 </font>साल बाद कश्मीर समस्या अपने आप सुलझ चुकी होगी। लेकिन पाकिस्तान के फौजी शासक और कट्टरपंथी आतंकवादी इस तरह कश्मीर समस्या का हल नहीं होने देंगे। इसलिए साझा प्रशासन का परवेज मुशर्रफ का फार्मूला मक्कारी भरा है और इससे अच्छा तो यही है कि नियंत्रण रेखा को सीमा मान लिया जाए<font face="Mangal">, </font>जिससे पाक का आवाम भी काफी हद तक सहमत है।</p>
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