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	<title>Socio Political News &#187; Bureaucracy</title>
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	<description>News Articles and Reactions</description>
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		<title>करात-बाबू में थर्डफ्रंट की गुफ्तगू</title>
		<link>http://indiagatenews.com/india-news/92.php</link>
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		<pubDate>Tue, 18 Dec 2007 18:29:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Bureaucracy]]></category>

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		<description><![CDATA[
मौका था किसानों की समस्याओं पर सेमीनार। यूएनपीए के नेता दिल्ली में एकजुट हुए। कृषि विशेषज्ञ स्वामीनाथन को सामने किया गया। स्वामीनाथन को किसानों की समस्याओं पर रपट दिए अरसा हो चुका। पर यूपीए सरकार ने रपट पर अमल नहीं किया। अब यूएनपीए रपट पर अमल के लिए आंदोलन करेगी। पर पर्दे के पीछे बनी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"></p>
<p align="justify">मौका था किसानों की समस्याओं पर सेमीनार। यूएनपीए के नेता दिल्ली में एकजुट हुए। कृषि विशेषज्ञ स्वामीनाथन को सामने किया गया। स्वामीनाथन को किसानों की समस्याओं पर रपट दिए अरसा हो चुका। पर यूपीए सरकार ने रपट पर अमल नहीं किया। अब यूएनपीए रपट पर अमल के लिए आंदोलन करेगी। पर पर्दे के पीछे बनी थर्ड फ्रंट की रणनीति। मंगलवार इस मामले में अहम रहा। पिछली बार थर्ड फ्रंट की सरकार थी। तो चंद्रबाबू नायडू यूएफ के कर्ता<font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">धर्ता थे। <span id="more-92"></span>मंगलवार को यूएफ के दो पुराने पार्टनर दिल्ली में थे। सो थर्ड फ्रंट की सुगबुगाहट तेज हो गई। यूएनपीए के चंद्रबाबू नायडू और यूपीए के करुणानिधि ने थर्ड फ्रंट की संभावनाएं तलाशी। किसानों का सम्मेलन खत्म होने के बाद यूएनपीए के छह नेताओं की बंद कमरे में गुफ्तगू हुई। ये छह नेता थे</font><font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3">चंद्रबाबू नायडू</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">ओम प्रकाश चोटाला</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">मुलायम सिंह</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">गोस्वामी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">येरा नायडू और अमर सिंह। करीब आधे घंटे की गुफ्तगू के बाद चंद्रबाबू नायडू ने माकपा दफ्तर जाकर प्रकाश करात से मुलाकात की। यों तो बाबू के साथ येरा नायडू भी माकपा दफ्तर गए। पर जब दोनों ने बंद कमरे में बातचीत के लिए येरा नायडू को बाहर निकाल दिया। इससे थर्ड फ्रंट और मिड टर्म पोल पर बातचीत की आशंका जाहिर हुई। वैसे भी प्रकाश करात और एबी वर्धन दोनों ने कांग्रेस को गुजरात</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">हिमाचल में झटके की भविष्यवाणी कर दी है। येरा नायडू ने बताया</font><font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3">कांग्रेस को झटके से थर्ड फ्रंट की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। पर चंद्रबाबू नायडू ने अपनी मुलाकात में हुई बातचीत का कोई खुलासा नहीं किया। थर्ड फ्रंट की सुगबुगाहट पीछे छोड़ वह सीधे हवाई अड्डे चले गए। करुणानिधि उत्तर भारत के मुख्यमंत्रियों की तरह बार</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बार दिल्ली नहीं आते। साल में एक</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">दो बार दिल्ली आएं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो काफी। करुणानिधि की ऐसे मौके पर दिल्ली में मौजूदगी राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट का कारण बनी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जब यूएनपीए के नेता दिल्ली में जमा हुए। दिनभर करात</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">करुणानिधि मुलाकात की अफवाहें भी उड़ती रहीं।</font></p>
<p></font></p>
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		<title>नंदीग्राम के जख्म फिर उधड़े</title>
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		<pubDate>Thu, 06 Dec 2007 02:02:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Bureaucracy]]></category>

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		<description><![CDATA[बुध्ददेव भट्टाचार्य नंदीग्राम कांड पर माफी मांगकर कोलकाता लौटे। तो ममता बनर्जी लोकसभा में लौट आईं। पिछले दिनों उन्होंने दूसरी बार इस्तीफा भेजा था। बुध्ददेव कोलकाता लौटे, ममता दिल्ली आई। इस बीच नंदीग्राम से जुड़ी दो बड़ी खबरें आ गई। पहली खबर- सीपीएम के खुन्नस निकालने की शैली से संबंधित। सीपीएम ने महिला फिल्मोत्सव का [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI"><font color="#000080">बुध्ददेव भट्टाचार्य नंदीग्राम कांड पर माफी मांगकर कोलकाता लौटे। तो ममता बनर्जी लोकसभा में लौट आईं। पिछले दिनों उन्होंने दूसरी बार इस्तीफा भेजा था। बुध्ददेव कोलकाता लौटे</font></span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><font color="#000080">, </font><font color="#000080"><span lang="HI">ममता दिल्ली आई। इस बीच नंदीग्राम से जुड़ी दो बड़ी खबरें आ गई। पहली खबर- सीपीएम के खुन्नस निकालने की शैली से संबंधित। सीपीएम ने महिला फिल्मोत्सव का उद्धाटन अपर्णा सेन से करवाने पर एतराज किया है। </span></font></span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><font color="#000080"><span lang="HI"><span id="more-78"></span>अपर्णा ने नंदीग्राम पर कड़ा रुख अपनाकर सीपीएम के खिलाफ मोर्चा खोला था। नौ दिसम्बर से शुरू होने वाला फिल्मोत्सव नई अखाड़ेबाजी का केंद्र बन सकता है। दूसरी खबर- नंदीग्राम से एक और सनसनीखेज कांड की। अब खेजुरी में पांच अधजली लाशें मिली हैं। खेजुरी नंदीग्राम के पास सीपीएम के दबदबे वाला गांव। खबर है कि मरने वाले सीपीएम वर्कर। जो बम बनाते हुए मारे गए</span>, <span lang="HI">जब बम फट गए। सो ममता के आते ही नंदीग्राम फिर से सदन के एजेंडे पर आ गया। बुधवार को स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने मुद्दा नहीं उठाने दिया। भले ही बंगाल की बीजेपी बालागढ़ उप चुनाव में तृणमूल से गठबंधन को तैयार न हो। दिल्ली में ममता का बीजेपी से गठबंधन जारी। ममता ने खेजुरी का मामला उठाने के लिए बीजेपी से बात की। गुरुवार तो बाबरी ढांचे को समर्पित हो जाएगा। सो सात दिसम्बर को उठाने का नोटिस देने का फैसला हुआ है। तृणमूल कांग्रेस इस समय कांग्रेस-भाजपा में झूल रही है। लेफ्ट भरोसे केंद्र की सरकार होने के कारण कांग्रेस पर भरोसा नहीं। पर बीजेपी के साथ मिलकर चुनावी नैय्या पार नहीं होगी। संसद के गलियारों में तृणमूल के नेता एक पल कांग्रेसी नेताओं के साथ दिखेंगे। तो दूसरे ही पल किसी बीजेपी नेता के इर्द-गिर्द।</span><o></o></font></span></p>
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		<title>कर्नाटक विधानसभा कल भंग होने के आसार</title>
		<link>http://indiagatenews.com/india-news/65.php</link>
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		<pubDate>Wed, 21 Nov 2007 18:39:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Bureaucracy]]></category>

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		<description><![CDATA[कर्नाटक में राज्यपाल की सिफारिश पर राष्ट्रपति राज लागू किए जाने की रिपोर्ट आज संसद के दोनों सदनों में रख दी गई। रिपोर्ट के साथ राज्यपाल की ओर से भेजी गई सिफारिश की प्रति भी सदन पटल पर रखी गई। सूत्रों के मुताबिक शुक्रवार को दोनों सदनों से राष्ट्रपति शासन की मंजूरी मिलने के बाद [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify" style="margin: 0cm 0cm 0pt" class="MsoNormal"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI"><font color="#000080">कर्नाटक में राज्यपाल की सिफारिश पर राष्ट्रपति राज लागू किए जाने की रिपोर्ट आज संसद के दोनों सदनों में रख दी गई। रिपोर्ट के साथ राज्यपाल की ओर से भेजी गई सिफारिश की प्रति भी सदन पटल पर रखी गई। सूत्रों के मुताबिक शुक्रवार को दोनों सदनों से राष्ट्रपति शासन की मंजूरी मिलने के बाद देर रात तक विधानसभा भंग की जा सकती है।<span id="more-65"></span></font></span></p>
<p align="justify"><font color="#000080"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">कांग्रेस सूत्रों ने विधानसभा को फिर से बहाल किए जाने और एमपी प्रकाश के साथ मिलकर सरकार बनाने की किसी संभावना से इनकार किया। एमपी प्रकाश ने आज बेंगलुरू में कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने की संभावना जताई थी। इस बाबत पूछे जाने पर कांग्रेस सूत्रों ने कहा- </span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">&#8216;<span lang="HI">यह अध्याय अब खत्म हो चुका है।</span>&#8216; <span lang="HI">कर्नाटक में राष्ट्रपति राज का मामला सदन पटल पर रखे जाते समय विधानसभा भंग करने संबंधी केबिनेट की सिफारिश का जिक्र नहीं किया गया। इस पर सिंगापुर में मौजूद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी संसदीय कार्यमंत्री प्रियरंजन दासमुंशी से पूछताछ करवाई। सूत्रों के मुताबिक प्रियरंजन दासमुंशी ने संवैधानिक स्थिति की जानकारी देते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय को बताया कि राष्ट्रपति राज की मंजूरी लेने के बाद विधानसभा भंग करने के लिए संसद की मंजूरी की जरूरत नहीं</span>, <span lang="HI">इस बाबत केबिनेट का फैसला पहले ही हो चुका है। कानून मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति राज को संसद की मंजूरी तक विधानसभा भंग नहीं करने का फैसला दिया है</span>, <span lang="HI">लेकिन विधानसभा भंग करने के लिए संसद की मंजूरी की जरूरत नहीं। इस बीच जद एस के अध्यक्ष एच.डी. देवगौड़ा आज दिल्ली में थे</span>, <span lang="HI">लेकिन उनकी कांग्रेस की किसी नेता से कोई मुलाकात नहीं हुई। आज उन्होंने प्रिंट मीडिया से बात करने का फैसला किया था</span>, <span lang="HI">लेकिन उसे रद्द कर दिया गया।</span></span></font></p>
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		<title>नंदीग्राम पर हो जाए तहलका</title>
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		<pubDate>Tue, 20 Nov 2007 18:40:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Bureaucracy]]></category>

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		<description><![CDATA[लेफ्ट ने गवर्नर की आलोचना के बाद अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एस. राजेंद्र बाबू को कटघरे में खड़ा किया। नंदीग्राम का जिक्र जो भी करेगा। लेफ्ट के निशाने पर आ जाएगा। गुजरात की तरह नंदीग्राम पर स्टिंग आपरेशन हुआ। तो मीडिया भी लेफ्ट के निशाने पर होगा। वैसे भी सांसदों को लिखी खुली [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI"><font color="#000080">लेफ्ट ने गवर्नर की आलोचना के बाद अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एस. राजेंद्र बाबू को कटघरे में खड़ा किया। नंदीग्राम का जिक्र जो भी करेगा। लेफ्ट के निशाने पर आ जाएगा। गुजरात की तरह नंदीग्राम पर स्टिंग आपरेशन हुआ। तो मीडिया भी लेफ्ट के निशाने पर होगा। वैसे भी सांसदों को लिखी खुली चिट्ठी में सीपीएम ने कहा- </font></span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><font color="#000080">&#8216;<span lang="HI">मीडिया की रिपोर्टिंग एकतरफा।</span>&#8216; <span lang="HI">लेफ्ट चाहता है- </span>&#8216;<span lang="HI">जो वह कहे</span>, <span lang="HI">मीडिया वही छापे।</span>&#8216; </font><font color="#000080"><span lang="HI">मीडिया को नंदीग्राम में घुसने की इजाजत नहीं। <span id="more-63"></span>शुरुआती आलोचना के बाद कांग्रेस ने पूरी तरह चुप्पी साध ली। जबकि इस बार सीपीएम के अत्याचार मार्च से कहीं ज्यादा। जब तक भारत में थे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जुबान नहीं खोली। पर विदेश यात्रा पर जाते हुए विमान में जब घेर लिए गए। तो बोले- </span>&#8216;<span lang="HI">राज्य सरकार का काम है सभी नागरिकों की रक्षा करें।</span>&#8216; <span lang="HI">पर बुध्दिजीवी वर्ग नंदीग्राम और गोधरा के बाद हुए गुजरात के नरसंहार में फर्क नहीं मानता। यही बात जस्टिस एस. राजेंद्र बाबू ने कही। तो लेफ्ट ने मंगलवार को कड़ी चिट्ठी लिखी। लेफ्ट ने बहुत कोशिश की संसद में नंदीग्राम पर बहस न हो। उसके कुकर्म संसद के रिकार्ड में न आएं। पर बुधवार को संसद के दोनों सदनों में नंदीग्राम पर बहस होगी। यह लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी का फैसला नहीं। अलबत्ता शरद पवार की ओर से बनाई गई सहमति से तय हुआ। मार्च में जब नंदीग्राम में सीपीएम की पहली हिंसा हुई। तो स्पीकर ने राज्य का मुद्दा बताकर बहस नहीं होने दी। स्पीकर का रवैया इस बार भी वही था। सो तीन दिन संसद एक कदम नहीं चली। बीजेपी ने नंदीग्राम पर काम रोको बहस मांगी। लेफ्ट ने माओवादी-नक्सली हिंसा पर बहस मांगी। कांग्रेस ने मुसलमानों</span>, <span lang="HI">महिलाओं</span>, <span lang="HI">बच्चों पर अत्याचार को मुद्दा बनाना चाहा। पर कोई किसी के सुझाव पर राजी नहीं हुआ। तृणमूल के दिनेश त्रिवेदी तो नंदीग्राम मुद्दे पर अड़ गए। मार्च में सिर्फ उन्होंने कई दिन राज्यसभा नहीं चलने दी। इस बार दोनों सदनों में कमान पूरे एनडीए के हाथ। आखिर मंगलवार को बीच-बचाव का काम शरद पवार को सौंपा गया। जिनने सभी दलों के नेताओं से<span>  </span>सलाह मशविरा किया। शाम को<span>  </span>प्रियरंजन दासमुंशी ने फैसला सुनाया- </span>&#8216;<span lang="HI">बहस नंदीग्राम पर आधारित होगी न कि बाकी राज्यों की हिंसा केंद्रित।</span>&#8216; <span lang="HI">दासमुंशी ने पहले दिन जरूर नंदीग्राम का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। पर जब लेफ्ट ने एटमी करार पर नरम रुख अपना लिया। तो दासमुंशी समेत पूरी कांग्रेस ने चुप्पी साध ली। </span></font></span></p>
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		<title>पर अंगद का पांव नहीं कर्नाटक</title>
		<link>http://indiagatenews.com/india-news/54.php</link>
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		<pubDate>Tue, 13 Nov 2007 04:25:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Bureaucracy]]></category>

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		<description><![CDATA[येदुरप्पा कर्नाटक के मुख्यमंत्री हो गए। दक्षिण में खाता खुलना बीजेपी के लिए बड़ा जश्न। पर पहले ही दिन पांव लड़खडाने शुरू हो चुके। कर्नाटक में रखा गया कदम अंगद का पांव साबित होता दिखाई नहीं देता। नरेंद्र मोदी का जश्न में मौजूद रहना देवगौड़ा को खटका होगा। सरकार पर देवगौड़ा की सहमति अभी भी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify" style="margin: 0cm 0cm 0pt; text-align: justify" class="MsoNormal"><font color="#000080"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">येदुरप्पा कर्नाटक के मुख्यमंत्री हो गए। दक्षिण में खाता खुलना बीजेपी के लिए बड़ा जश्न। पर पहले ही दिन पांव लड़खडाने शुरू हो चुके। कर्नाटक में रखा गया कदम अंगद का पांव साबित होता दिखाई नहीं देता। नरेंद्र मोदी का जश्न में मौजूद रहना देवगौड़ा को खटका होगा। सरकार पर देवगौड़ा की सहमति अभी भी शक के घेरे में। एन वक्त पर वह बेंगलुरु से गायब हो गए। शपथ ग्रहण में देवगौड़ा की गैर मौजूदगी आने वाले तूफान का इशारा। <span id="more-54"></span>कुमारस्वामी भले ही शपथ ग्रहण में मौजूद थे। पर उप मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों भाईयों में कसमकस जारी। इसी वजह से जेडीएस से किसी ने मंत्री पद की शपथ नहीं ली। बड़े बेटे एचडी रेवन्ना के मुकाबले कुमारस्वामी का पलड़ा भारी। पर देवगौड़ा भयंकर मुश्किल में। देवगौडा को पहले घर का झगड़ा निपटाना होगा। यह झगड़ा निपटा। तो विभागों के बंटवारे पर झगडा होगा। पहले समझौते के मुताबिक विभागों की अदला-बदली होगी। पर देवगौड़ा परिवार इसके लिए राजी नहीं। येदुरप्पा के लिए अभी बहुमत साबित करने की तलवार भी। वैसे जेडीएस-बीजेपी विधायक दल की बैठक में नेता चुने गए। सो गवर्नर ने बहुमत साबित करने को नहीं कहा। गठबंधन सरकारों<span>  </span>के जमाने में इस हिसाब से यह नया अध्याय। पर तेईस नवम्बर से सत्र शुरू होगा। तब तक देवगौड़ा परिवार का झगड़ा न निपटा। तो बहुत मुश्किल होगी। येदुरप्पा को सिर्फ देवगौड़ा की चालों का सामना नहीं करना। बीजेपी में भी कई नेताओं की चाल टेढ़ी। येदुरप्पा को पार्टी की खेमेबाजी से भी निपटना होगा। शपथ ग्रहण पर सिर्फ देवगौंड़ा परिवार की नजर ही नहीं लगी। बीजेपी परिवार की भी नजर लग चुकी। पहले ही शपथ ग्रहण में गुटबाजी सामने आई। जो चार मंत्री बनाए गए। उनमें दो अनंत कुमार खेमे के। पर अनंत कुमार जिन्हें बनाना चाहते थे। उन्हें रोकने में कामयाब रहे येदुरप्पा। बीजेपी हाईकमान फिलहाल येदुरप्पा के साथ। पर हाईकमान दोनों में तालमेल न बना सका। तो अपने पांव खुद ही उखाड़ लेगी बीजेपी। अनंत कुमार की पहले दिन से ही नाराजगी शुरू। शपथ ग्रहण के बाद लंच और प्रेस कांफ्रेंस से नदारद रहे। अब एक तरफ देवगौड़ा की रोज-रोज की नुक्ताचीनी के साथ-साथ पार्टी की खेमेबाजी भी पांव उखाड़ेगी। येदुरप्पा को सरकार चलाने के लिए दत्ता पीठ जैसे मुद्दे छोड़ने होंगे। जैसे केंद्र में समान नागरिक संहिता और राम मंदिर जैसे मुद्दे छोड़े। कुमारस्वामी की यही पहली शर्त होगी। जिस मुद्दे के बूते बीजेपी कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी उभरी। वही छोड़ेगी</span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">, <span lang="HI">तो पांव जमेंगे नहीं</span>, <span lang="HI">उखड़ने शुरू होंगे।</span></span></font></p>
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		<title>बनी, तो टिकाऊ होगी येदुरप्पा सरकार</title>
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		<pubDate>Thu, 08 Nov 2007 04:44:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Bureaucracy]]></category>

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		<description><![CDATA[कर्नाटक के सवा सौ एमएलए राष्ट्रपति भवन में परेड करके लौट गए। उसके छत्तीस घंटे बाद भी केंद्र सरकार के सिर पर जूं नहीं रेंगी। बीजेपी-जेडीएस को दावा पेश किए बारह दिन हो चुके। अगर कांग्रेस की सरकार बननी होती। तो इतनी देरी कभी नहीं होती। संघवाद पर दिल्ली में चल रही मीटिंग में गवर्नर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI"><font color="#000080">कर्नाटक के सवा सौ एमएलए राष्ट्रपति भवन में परेड करके लौट गए। उसके छत्तीस घंटे बाद भी केंद्र सरकार के सिर पर जूं नहीं रेंगी। बीजेपी-जेडीएस को दावा पेश किए बारह दिन हो चुके। अगर कांग्रेस की सरकार बननी होती। तो इतनी देरी कभी नहीं होती। संघवाद पर दिल्ली में चल रही मीटिंग में गवर्नर की जगह येदुरप्पा आते। गवर्नर की रपट जगजाहिर नहीं हुई। एसेंबली बहाल कर सरकार बनाने की सिफारिश होती। तो इतनी देर नहीं लगती। गवर्नर ने फैसला<span>  </span>केंद्र पर छोड़ा। अब निगाह केबिनेट की अगली मीटिंग पर। अगली मीटिंग में भी कर्नाटक का फैसला नहीं हुआ। <span id="more-52"></span>तो गवर्नर की भूमिका और केंद्र-राज्य संबंधों की बहस फिर शुरू होगी। सरकार के टिकाऊपन में आशंका न्यौता नहीं देने की वजह नहीं बन सकता। वैसे भी टिकाऊपन को लेकर अब स्थितियां बदल चुकी। राज-काज कब राजनीति बदल दे। यह पहले से अंदाज भी नहीं होता। जदस विधायकों के दबाव में बिना शर्त समर्थन की चिट्ठी देनी पड़ी। वरना एचडी देवगौड़ा किसी भी हालत में बीजेपी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपने को तैयार नहीं थे। कहते हैं ना- सांप मर गया<span style="font-family: Mangal">, <span lang="HI">बल नहीं गया। समर्थन की चिट्ठी के बावजूद देवगौड़ा की शर्तों वाली चिट्ठी को किसी रूप में देखा गया। अपने विधायकों के दबाव और पिता के रुख से दोनों भाईयों में फूट पड़ चुकी। देवगौड़ा चाहते हैं- अगर साझा सरकार बने ही</span>, <span lang="HI">तो दूसरा बेटा एचडी रेवन्ना डिप्टी सीएम बने। लेकिन रेवन्ना के पूरी तरह देवगौड़ा की मुट्ठी में होने के कारण बाकी विधायक तैयार नहीं। इसलिए अब कुमारस्वामी खुद डिप्टी सीएम बनने को तैयार। दोनों भाईयों की फूट का फायदा बीजेपी ने उठाया। रेवन्ना ने राष्ट्रपति भवन की परेड में आने के लिए डिप्टी सीएम की शर्त रख दी थी। बीजेपी ने रेवन्ना को किनारे कर कुमारस्वामी को साथ ले लिया। कुमारस्वामी ने ही विधायकों के दबाव में फिर से गठबंधन की पहल की। विधायक वैसे भी अब देवगौड़ा परिवार के किसी सदस्य के इशारे पर नहीं चलेंगे। इसलिए येदुरप्पा को बाकी के उन्नीस महीने सरकार चलने की उम्मीद। वैसे भी अंदर खाते देवगौड़ा से परेशान ज्यादातर जदस विधायक बीजेपी में शामिल होने को तैयार। येदुरप्पा सरकार टिकाऊ न हो। तो कांग्रेस को ही फायदा होगा। फिर भी कांग्रेस सरकार बनाए जाने के खिलाफ है</span>, <span lang="HI">तो इसकी वजह है- बदली परिस्थितियों में सरकार के टिकाऊ होने का डर।</span><o></o></span></font></span></p>
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		<title>गवर्नर की गेंद केंद्र के पाले में</title>
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		<pubDate>Thu, 01 Nov 2007 04:08:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[राजनीति इसी का नाम। सुषमा स्वराज बेंगलुरु में गांधी की मूर्ति के सामने बोली। तो गवर्नर रामेश्वर ठाकुर का कोई लिहाज नहीं किया। अपनी शैली बरकरार रखते हुए गरजी। येदुरप्पा को सरकार बनाने का न्यौता न मिलने पर आंदोलन की चेतावनी दी। पहले से दी गई दो दिन की मोहलत का भी ख्याल नहीं रखा। [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify" style="margin: 0cm 0cm 0pt; text-align: justify" class="MsoNormal"><font color="#000080"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">राजनीति इसी का नाम। सुषमा स्वराज बेंगलुरु में गांधी की मूर्ति के सामने बोली। तो गवर्नर रामेश्वर ठाकुर का कोई लिहाज नहीं किया। अपनी शैली बरकरार रखते हुए गरजी। येदुरप्पा को सरकार बनाने का न्यौता न मिलने पर आंदोलन की चेतावनी दी। पहले से दी गई दो दिन की मोहलत का भी ख्याल नहीं रखा। शाम तक की चेतावनी दे डाली। <span id="more-39"></span>पर गवर्नर रामेश्वर ठाकुर ने सुषमा की बातों का बुरा नहीं माना। अलबत्ता कर्नाटक में मेहमान मानकर राजभवन आने का न्यौता भेज दिया। सुषमा को अचंभा नहीं हुआ। आखिर सालों-साल राजनीति में इकट्ठे काम किया। एक साथ संसद में रहे</span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">, <span lang="HI">कई कमेटियों में इकट्ठे रहे</span>, <span lang="HI">कई यात्राएं इकट्ठी की। सो इन्हीं संबंधों के नाते ठाकुर ने सुषमा को राजभवन बुलाया। सुषमा राजभवन से मुस्कुराते हुए निकली। तो तस्वीर साफ थी। खबर थी- </span>&#8216;<span lang="HI">गवर्नर ने गृह मंत्रालय को रिपोर्ट भेज दी।</span>&#8216; <span lang="HI">बीजेपी को चार दिन से इसी बात का इंतजार था। रिपोर्ट में ऐसा कुछ नहीं था</span>, <span lang="HI">जिससे बीजेपी फिक्रमंद होती। गवर्नर ने वही लिखा। जो उनने देखा। उनने अपनी रिपोर्ट में लिखा- </span>&#8216;<span lang="HI">कुछ निर्दलीयों समेत मेरे पास जेडीएस-बीजेपी के </span>129 <span lang="HI">विधायक आए। उन्होंने येदुरप्पा को अपना नेता चुनने की बात कही और विधानसभा बहाल करने की मांग की। मैंने विधायकों की पुष्टि कर ली है और मैं संतुष्ट हूं।</span>&#8216; <span lang="HI">पर गवर्नर ने अपनी तरफ से किसी तरह की कोई सिफारिश नहीं की। विधानसभा बहाल की जाए</span>, <span lang="HI">या नहीं। येदुरप्पा को न्यौता दिया जाए या नहीं। रिपोर्ट में ऐसा कुछ नहीं कहा</span>, <span lang="HI">अलबत्ता फैसला केंद्र सरकार पर छोड़ दिया। जो मुनासिब समझें करे। चाहे तो विधानसभा बहाल कर सरकार बनवाए। चाहे तो बीजेपी से बड़े टकराव को तैयार हो जाए। रामेश्वर ठाकुर ने वह गलती नहीं की। जो दो साल पहले बिहार के गवर्नर के नाते बूटा सिंह ने की थी। अब न तो बीजेपी-जेडीएस गवर्नर को निशाना बना सकते हैं</span>, <span lang="HI">न कांग्रेस कोई गिला-शिकवा कर सकती है। जो फैसला लेना हो</span>, <span lang="HI">दिल्ली में ही ले लिया जाए।</span></span></font></p>
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		<title>देवगौड़ा की टेढी चालें</title>
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		<pubDate>Wed, 31 Oct 2007 08:33:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पिछले दो सालों में एचडी देवगौड़ा ने घाघ राजनीतिज्ञ की छवि भले ही बनाई। मक्कार राजनीतिज्ञ का लेबल भी खुद पर चिपका लिया। कब कौन सी राजनीतिक चाल चलेंगे, कब कौन सी करवट ले लेंगे। इसे समझना आसान नहीं। शुक्रवार को पुराने साथी एमपी प्रकाश को कांग्रेस से गठबंधन करने की हरी झंडी दी। शनिवार [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><font color="#000080">पिछले दो सालों में एचडी देवगौड़ा ने घाघ राजनीतिज्ञ की छवि भले ही बनाई। मक्कार राजनीतिज्ञ का लेबल भी खुद पर चिपका लिया। कब कौन सी राजनीतिक चाल चलेंगे, कब कौन सी करवट ले लेंगे। इसे समझना आसान नहीं। शुक्रवार को पुराने साथी एमपी प्रकाश को कांग्रेस से गठबंधन करने की हरी झंडी दी। शनिवार को बीजेपी को समर्थन की चिट्ठी दे दी। बीजेपी इस चिट्ठी से फूली नहीं समाई और सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। <span id="more-37"></span>कर्नाटक के गवर्नर रामेश्वर ठाकुर ने गुरुवार को दिल्ली में जब कहा- &#8216;गठबंधन की सरकार बनने की संभावना अभी भी खुली।&#8217; तो उन्होंने सोचा नहीं था- देवगौड़ा एक बार फिर बीजेपी से हाथ मिला लेंगे। उस समय एमपी प्रकाश की कर्नाटक कांग्रेस के प्रभारी पृथ्वीराज चव्हाण से बात चल रही थी। गवर्नर ने जैसे ही शुक्रवार का घटनाक्रम देखा। विधानसभा भंग करने की सिफारिश वाली देवगौड़ा की चौबीस अक्टूबर की चिट्ठी रसीद भेज दी। साफ था- देवगौड़ा की यह चिट्ठी विधानसभा भंग करने का आधार बनेगी। अपने विधायकों की खरीद-फरोख्त रोकने के लिए देवगौड़ा यही चाहते थे। कांग्रेस और बीजेपी भी यही चाहती थी। लेकिन बदले हालात में बीजेपी ने देवगौड़ा से नई चिट्ठी की गुहार लगाई। तो देवगौड़ा ने बीजेपी को पानी पिला दिया। देवगौड़ा से नई चिट्ठी हासिल करने में बीजेपी को 48 घंटे मेहनत करनी पड़ी। देवगौड़ा ने गवर्नर को नई चिट्ठी लिखने के बदले विभागों के नए सिरे से बंटवारे की शर्त रख दी। येदुरप्पा को मुख्यमंत्री बनाने के विरोधी भाजपाई ने भी देवगौड़ा के कान भरे।<span>  </span>लेकिन घाघ राजनीतिज्ञ देवगौड़ा पर घाघ कूटनीतिज्ञ यशवंत सिन्हा भारी पड़े। सिन्हा ने सोमवार दोपहर अज्ञात स्थान पर देवगौड़ा से आमने-सामने बात की। इससे पहले देवगौड़ा अपने दूतों वाईएसवी दत्ता और मराजुद्दीन के माध्यम से ही बात कर रहे थे। सिन्हा गवर्नर को नई चिट्ठी लिखवाकर ही बाहर निकले। सिर्फ यहीं पर बात खत्म नहीं हुई। शाम को जब बीजेपी-जेडीएस विधायकों ने येदुरप्पा को नेता चुना। तो<span>  </span>सीधे राजभवन जाने का फैसला किया। लेकिन कुमारस्वामी यह कहकर कन्नी काटने लगे- &#8216;हल्फिया बयान और चिट्ठी तो भेजी ही जा रही है। एमएलए चले जाएं। मेरी क्या जरूरत।&#8217; बीजेपी नेताओं को कुमारस्वामी की मिन्नत करनी पड़ी। देवगौड़ा ने सोमवार को विधायकों  के राजभवन में धरने की योजना भी नाकाम कर दी। बीजेपी ने मंगलवार को सभी विधायक दिल्ली लाकर राष्ट्रपति भवन में परेड करवाने का प्रस्ताव रखा। तो देवगौड़ा ने कहा- &#8216;मुझे यह पसंद नहीं।&#8217; आखिर बीजेपी ने बुधवार को अपने सांसदों के माध्यम से सारे हल्फिया बयान राष्ट्रपति को सौंपने की रणनीति बनाई है। गवर्नर पर दबाव के लिए बीजेपी ने बुधवार को राजभवन के बाहर धरने का एलान किया। तो देवगौड़ा इसके भी हक में नहीं थे। लेकिन बीजेपी की रणनीति कामयाब रही। गवर्नर ने मंगलवार दोपहर येदुरप्पा और सदानंद गौड़ा को बुलाकर दो दिन की मोहलत मांग ली। बीजेपी मान गई है। पर कोई चांस नहीं लेना चाहती। इसलिए बुधवार को महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने दो घंटे धरना होगा। लेकिन एचडी देवगौड़ा इस सारे अभियान से अलग-थलग हैं। उनके दोनों हाथों में लड्डू हैं। बीजेपी को समर्थन न देने का कलंक भी हट गया। सरकार न भी बनी, तो अब विधायकों का दल-बदल करवाकर कांग्रेस सरकार की गुंजाइश खत्म।<o></o></font></span></p>
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		<title>मोटे तौर पर चुनावी तैयारियां शुरू</title>
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		<pubDate>Wed, 24 Oct 2007 04:04:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मोटे तौर पर चुनावी तैयारियां शुरू हो चुकी। एटमी करार पर यूपीए-लेफ्ट की पांचवीं मीटिंग के बाद मंगलवार को लेफ्ट की तीसरे मोर्चे से गुफ्तगू साफ संकेत। तीसरे मोर्चे में अब फिलहाल चौटाला, चंद्रबाबू और मुलायम। तीनों के साथ प्रकाश करात और एबी वर्धन ने संसद सत्र की रणनीति बनाई। पंद्रह नवंबर को शुरू होने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font color="#000080"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">मोटे तौर पर चुनावी तैयारियां शुरू हो चुकी। एटमी करार पर यूपीए-लेफ्ट की पांचवीं मीटिंग के बाद मंगलवार को लेफ्ट की तीसरे मोर्चे से गुफ्तगू साफ संकेत। तीसरे मोर्चे में अब फिलहाल चौटाला</span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">, <span lang="HI">चंद्रबाबू और मुलायम। तीनों के साथ प्रकाश करात और एबी वर्धन ने संसद सत्र की रणनीति बनाई। पंद्रह नवंबर को शुरू होने वाला सत्र संभवत: आखिरी होगा। संभवत: करार पर लेफ्ट-यूपीए की अगले दिन होने वाली मीटिंग भी आखिरी होगी। करार की खामियां समझने का काम पूरा हो चुका। लेफ्ट का रुख पहले से ही स्पष्ट। <span id="more-31"></span>इसीलिए सोमवार को यूपीए-लेफ्ट मीटिंग से पहले मनमोहन ने यूपीए मीटिंग की। इस मीटिंग में एक बात तय हुई- </span>&#8216;<span lang="HI">चुनाव की नौबत आई। तो मिलकर लड़ेंगे।</span>&#8216; <span lang="HI">कांग्रेस अलग-थलग होने से बच जाएगी। पवार-करुणानिधि- लालू के तेवरों से यूपीए टूटने का खतरा अब टल गया।<span>  </span>पीएम की शर्मिंदगी और इस्तीफे की धमकी का यह असर जरूर हुआ। भले ही कांग्रेस ने शर्मसारी वाले बयान और इस्तीफे की पेशकश का खंडन किया। पर मंगलवार को पीएम के भाषण से उनके मन में क्या चल रहा है</span>, <span lang="HI">यह साफ हुआ। चुनावी तैयारियों के और पुख्ता सबूत भी मिले। लेफ्ट से सोलह नवंबर तक की मोहलत के बाद मंगलवार को मैककिंसे सम्मेलन में पीएम ने कहा- </span>&#8216;<span lang="HI">आज की राजनीति और अधूरे जनादेश में काम करना मुश्किल हो चुका।</span>&#8216; <span lang="HI">प्रधानमंत्री ने अधूरे जनादेश को विकास में अड़चन बताकर इरादे जता दिए। स्वाभाविक है प्रधानमंत्री ने बिना सोनिया गांधी से राय लिए चुनावी तैयारियां शुरू नहीं की होंगी। पीएम के गुस्से और शर्मिंदगी वाले बयान को भले ही सिंघवी ने बेबुनियाद कहा। पर वीरप्पा मोईली ने पुष्टि कर दी। मोईली ने कहा- </span>&#8216;<span lang="HI">अगर प्रधानमंत्री ने दु:ख जाहिर किया</span>, <span lang="HI">तो गलत नहीं। जो भी विकास चाहेगा</span>, <span lang="HI">उसे एटमी करार की इस दशा पर दु:ख होगा ही।</span>&#8216; <span lang="HI">अधूरे जनादेश का दु:ख पीएम ने खुद भी जाहिर कर सिंघवी को गलत ठहराया। पृथ्वीराज चव्हाण भी मंगलवार को कांग्रेस दफ्तर में काफी देर जमे। आन रिकार्ड कुछ बोलने को तैयार नहीं। ऑफ रिकार्ड भी इशारों में बात की। पर यह समझने में किसी को दिक्कत नहीं होनी चाहिए- </span>&#8216;<span lang="HI">चुनाव वक्त से पहले होंगे।</span>&#8216; <span lang="HI">गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद हों। या बजट के बाद। यह वक्त ही तय करेगा। गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद हुए। तो पंद्रह नवंबर से शुरू होने वाले संसद सत्र को आखिरी मानिए। सत्र तीस नवंबर तक चलेगा। यह बात पृथ्वीराज चव्हाण ने साफ की। क्योंकि आम चुनाव ही ज्यादा दूर नहीं। सो कर्नाटक में भी साथ ही चुनाव करवाने का इरादा। देवगौड़ा परिवार विधायकों के दबाव में लाख कोशिश करे। कांग्रेस ने मंगलवार को तय किया- </span>&#8216;<span lang="HI">कर्नाटक में<span>  </span>चुनाव ही करवाएंगे।</span>&#8216;<o></o></span></font></p>
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		<title>जमीनी हकीकत ने बदली चुनावी रणनीति</title>
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		<pubDate>Sun, 14 Oct 2007 08:53:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Bureaucracy]]></category>

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		<description><![CDATA[लोकसभा पर मंडराए बादल फिलहाल छंट गए। एटमी करार को ठंडे बस्ते में डाल मनमोहन इतवार को पांच  दिन की विदेश यात्रा पर रवाना होंगे। नेहरू के बाद मनमोहन द्विपक्षीय  बातचीत के सिलसिले में नाइजीरिया जाने वाले पहले पीएम होंगे। नेहरू 1962 में नाइजीरिया गए थे। वाजपेयी 2003 में नाइजीरिया जरूर गए, पर कामन वेल्थ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font size="+0" color="#000080">लोकसभा पर मंडराए बादल फिलहाल छंट गए। एटमी करार को ठंडे बस्ते में डाल मनमोहन इतवार को पांच  दिन की विदेश यात्रा पर रवाना होंगे। नेहरू के बाद मनमोहन द्विपक्षीय  बातचीत के सिलसिले में नाइजीरिया जाने वाले पहले पीएम होंगे। नेहरू 1962 में नाइजीरिया गए थे। वाजपेयी 2003 में नाइजीरिया जरूर गए, पर कामन वेल्थ सम्मेलन के सिलसिले में। मध्यावधि चुनाव टालने के बाद सोनिया भी मंगलवार को रायबरेली रवाना होंगी। <span id="more-21"></span>वामपंथियों के लिए एक नया अच्छा संदेश भी है। नवरात्रों के बाद बाइस अक्टूबर को लेफ्ट-यूपीए मीटिंग होगी। उसके तीसरे ही दिन सोनिया गांधी तीन दिन के लिए चीन जाएंगी। चीन यात्रा से पहले सोनिया ने वामपंथियों को देशभक्ति का सर्टिफिकेट थमाते हुए कहा- &#8216;किसी भी कांग्रेसी ने वामपंथियों को चीन का एजेंट नहीं कहा।&#8217; मनमोहन-सोनिया दोनों ने पहले वामपंथियों को चुनौती दी। बाद में अचानक नरम पड़ गए। तो एटमी करार समर्थकों को निराशा हुई। के. सुब्रह्मणयम को तो अब भी दोनों के पैंतरा बदलने की उम्मीद। पर इसकी गुंजाइश नहीं। सोनिया-मनमोहन ने काफी दबाव के बाद रुख बदला। कम से कम गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले कुछ नहीं होगा। जब चुनाव हो रहे होंगे। मनमोहन सिंह ठीक उस समय रूस जाएंगे। उनके साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नारायणन और परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष काकोड़कर भी होंगे। जहां परमाणु ऊर्जा के नए रास्ते खोलने की उम्मीद। आईएईए-एनएसजी से नवंबर की बातचीत टालने का फैसला सोच-समझकर हुआ। जमीनी हकीकत इस नई सोच की वजह। सोनिया ने कांग्रेस को चुनाव के लिए चाक-चौबंद कर लिया था। मनमोहन ने कुबेर का खजाना खोल दिया था। इसके बावजूद शरद पवार, लालू यादव, करुणानिधि को चुनावों से बेहतर नतीजों की उम्मीद नहीं हुई। इन तीनों ने अपने-अपने राज्यों की निराशाजनक तस्वीर पेश करते हुए कहा- &#8216;कांग्रेस की देशभर में दस-बीस सीटें बढ़ भी गईं। तो इससे ज्यादा सीटें यूपीए दलों की घट जाएंगी। ऐसे हालात में चुनाव का कोई फायदा नहीं। सरकार बनाने के लिए फिर वामपंथी दलों का मुंह देखना पड़ेगा।&#8217; सोनिया-मनमोहन को आखिरी झटका कोर कमेटी में लगा। जब कांग्रेस के तीन बड़े नेता भी फौरी चुनाव के खिलाफ हो गए। आठ अक्टूबर की मीटिंग में प्रणव, अर्जुन के साथ शिवराज पाटिल की भी यही राय थी। तीनों की दलील थी- &#8216;मध्यावधि चुनावों से कांग्रेस की छवि खराब होगी। एनडीए को कहने का मौका मिलेगा- कांग्रेस गठबंधन सरकार नहीं चला सकती।&#8217; तीनों नेताओं का यह भी कहना था- &#8216;रामसेतु मुद्दे पर बीजेपी के हौंसले बुलंद। जिसका चुनाव पर भी असर होगा।&#8217; नौ अक्टूबर की यूपीए-लेफ्ट बैठक से ठीक सोलह घंटे पहले मनमोहन सिंह के घर यह निर्णायक बैठक हुई थी।</font></p>
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