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	<title>Socio Political News &#187; Diplomacy</title>
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	<description>News Articles and Reactions</description>
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		<title>खाद्यान्न समस्या का दूसरा पहलू</title>
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		<pubDate>Sat, 03 May 2008 18:33:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Diplomacy]]></category>

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		<description><![CDATA[

अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने भारत के नव धनाढय मध्यम आय वर्ग को पेटू बताकर कुछ नया नहीं कहा। यही बात भारत के मंत्री प्रफुल्ल पटेल पहले ही कह चुके हैं।
बड़े पेट के भरन को है रहीम देख बाढ़ि
यातें हाथी हहरि कै दप दा दांत दे काढ़ि
कविवर रहीम कहे हैं कि जो आदमी बड़ा है [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size: small;"><br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size: small;">अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने भारत के नव धनाढय मध्यम आय वर्ग को पेटू बताकर कुछ नया नहीं कहा। यही बात भारत के मंत्री प्रफुल्ल पटेल पहले ही कह चुके हैं।</span></p>
<p><span style="font-size: small;">बड़े पेट के भरन को है रहीम देख बाढ़ि<br />
यातें हाथी हहरि कै दप दा दांत दे काढ़ि</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size: small;">कविवर रहीम कहे हैं कि जो आदमी बड़ा है वह अपना दु:ख अधिक दिन तक छुपा नहीं सकता। क्योंकि उसकी संपन्नता लोगों ने देखी होती है, जब उसके रहन-सहन में गिरावट आने लगती है तो उसके दु:ख का फौरन पता चल जाता है। हाथी के दो दांत इसलिए बाहर निकले होते हैं, क्योंकि वह अपनी भूख बर्दास्त नहीं कर सकता। एक ब्लाग पर पढ़ा रहीम का यह दोहा अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश पर हू-ब-हू लागू होता है। </span><span id="more-244"></span><span style="font-size: small;">जार्ज बुश का कहना है कि अमेरिका जैसे देश में खाद्य पदार्थों की कमी भारत में मध्यम वर्ग की ओर से ज्यादा अनाज खाने के कारण पैदा हुई है। रहीम के शब्दों में अमेरिका अनाज की कमी के दु:ख को बर्दास्त नहीं कर पा रहे और उनका दर्द उनकी जुबान पर आ गया है।<br />
जार्ज बुश के इस बयान पर राजनीतिक बवाल खड़ा हो गया है, लेकिन उन्होंने कोई अनोखी बात नहीं कही है। उन्होंने उसी बात को दोहराया है जिसे कुछ दिन पहले सोनिया गांधी के लाड़ले मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने कहा था। प्रफुल्ल पटेल का कहना था कि भारत में लोग ज्यादा खाने लगे हैं इसलिए खाद्यान्न की कमी शुरू हो गई है। मौजूदा संसद सत्र के दौरान प्रफुल्ल पटेल के इस बयान पर कड़ी आपत्ति दायर की गई। बाद में इसी बयान में अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडालिजा राइस ने दोहराया और उन्होंने भारत के साथ चीन को भी जोड़ दिया। कोंडालिजा राइस के बयान पर भारत में प्रफुल्ल पटेल के बयान से भी ज्यादा आपत्ति उठाई गई, क्योंकि किसी भी अन्य देश को इस तरह की टिप्पणीं करने का कोई हक नहीं बनता। कोंडालिजा राइस के बयान को उतनी ज्यादा गंभीरता से भी नहीं लिया गया, फिर भी विदेश राज्यमंत्री आनंद शर्मा ने आपत्ति तो दायर की ही। अब अमेरिका के राष्ट्रपति का बयान कम से कम वामपंथियों को घोर आपत्तिजनक लग रहा है। अमेरिका के साथ दोस्ती बढ़ा रहे मनमोहन सिंह के लिए जार्ज बुश का बयान घरेलू राजनीति में नए संकट से कम नहीं है। हालांकि जार्ज बुश ने अपने जिस भाषण में भारत के मध्यम वर्ग के पेटू हो जाने की बात कही है, उसी भाषण में उन्होंने भारत के मध्यम वर्ग के संपन्न होने से अमेरिका को होने वाले फायदे भी गिनाए हैं। ऐसा लगता है जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति बुश को समझ नहीं आ रहा कि भारत के मध्यम वर्ग की संपन्नता से अमेरिकी उत्पादों की बिक्री बढ़ने से अमेरिका को फायदा होगा या अनाज की कमी से अमेरिका को फायदे से ज्यादा नुकसान होगा। असल में अमेरिका चाहता है कि उसका फायदा तो हो लेकिन भारत से अनाज के निर्यात में कोई कमी न आए। दूसरे शब्दों में अमेरिकी राष्ट्रपति शायद यह कहना चाहते हैं कि भारत का नव धनाढय मध्यम वर्ग अपने खान-पान पर ज्यादा पैसा खर्च करने की बजाए अमेरिकी उत्पादों पर खर्च करे। जिससे अमेरिका को अनाज की कमी भी न हो और अमेरिकी उत्पादों से अमेरिकी उद्योगपतियों को फायदा भी हो। अमेरिकी राष्ट्रपति ने उद्योगपतियों के सामने अपने भाषण में कुछ इस तरह कहा- &#8216;विकाशील देशों में संपन्नता बढ़ रही है, यह अच्छी बात है, यह आपके लिए भी अच्छी बात है क्योंकि आप इन विकासशील देशों में अपने उत्पादों की ज्यादा बिक्री कर पाएंगे। आपको पता ही है कि बड़े देशों के लिए उन देशों में अपने उत्पादों की बिक्री करना कितना मुश्किल है, जो संपन्न नहीं हैं। दूसरे शब्दों में विकासशील देश जितना संपन्न होंगे, अमेरिकी उद्योगपतियों को वहां उतना ही बड़ा मौका मिलेगा। लेकिन यह स्वाभाविक ही है कि जैसे-जैसे संपन्नता आती है, बेहतर खाने की मांग भी बढ़ती है। इसी वजह से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ रही हैं।&#8217;<br />
अमेरिकी राष्ट्रपति बुश की बात में दम है, लेकिन अमेरिका को भारत में अनाज की खपत पर टिप्पणीं करने का कोई हक नहीं है क्योंकि भारत ने अमेरिकियों का पेट भरने का ठेका नहीं ले रखा है। अमेरिका खुद क्या कर रहा है, या यूरोपीय देशों में क्या हो रहा है, इस पर भी नजर दौड़ाना जरूरी है। अमेरिका में घटिया किस्म का लाल गेहूं पैदा होता है, जो अमेरिकी खुद नहीं खाते, अलबत्ता जानवरों को खिलाते हैं। यूरोप में बेहतर गेहूं पैदा होता है लेकिन डब्ल्यूटीओ के सब्सिडी पर प्रहार की वजह से वहां गेहूं की फसल लगातार घट रही है और यूरोप के किसान मक्के जैसे अनाजों की खेती पर जोर दे रहे हैं, जो बायोफ्यूल में इस्तेमाल हो रही हैं। बिल्कुल यही हाल अमेरिका का है, जार्ज बुश यह मानने को तैयार नहीं हैं कि अमेरिका में एथनॉल पैदा करने वाले कृषि उत्पाद बढ़ रहे हैं, इसलिए खाद्यान्न की कमी हो रही है। सच्चाई यह है कि किसानों को गेहूं से कम फायदा होता है, एथनॉल बनाने वाले उत्पादों से ज्यादा फायदा होता है। लेकिन सवाल खड़ा होता है कि कोंडालिजा राइस और जार्ज बुश ने भारत और चीन में खाद्यान्न की खपत बढ़ने का सवाल खड़ा क्यों किया। सवाल यह भी पैदा होता है कि क्या भारत सरकार के मंत्री प्रफुल्ल पटेल अमेरिका की कठपुतली की तरह काम कर रहे थे? आने वाले दिनों में अमेरिका अगर भारतीय किसानों से सीधे अनाज खरीदने की छूट मांगने का प्रस्ताव लेकर आए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।<br />
जहां तक भारत में मध्यम वर्ग की ओर से खाद्यान्न की खपत बढ़ाने का सवाल है, तो अमेरिकी राष्ट्रपति बुश के बयान को नकारा भी नहीं जा सकता। लेकिन अमेरिका को भारत के मध्यम वर्ग को पेटू कहने का हक इसलिए नहीं बनता क्योंकि दुनियाभर की सभी रिपोर्टो की यह कहा जा रहा है कि अमेरिकी खा-खाकर मोटापे का शिकार हो रहे हैं। भारत में सदियों-सदियों से बांटकर खाने की परंपरा चली आई है। गांवों में हर संपन्न घर से कम से कम दो-तीन गरीब परिवारों का पेट भरता रहा है। भारत में खान-पान की यह संस्कृति रही है कि थाली में जूठन नहीं छोड़ा जाता, लेकिन दूसरी तरफ अमेरिका में जितना जूठन हर रोज समुद्र में बहा दिया जाता है, उससे तो करोड़ों गरीबों का पेट भरा जा सकता है। अमेरिका में प्रति व्यक्ति सैंतीस सौ कैलोरी खाना खाया जाता है, जबकि सत्ताईस सौ कैलोरी पर्याप्त होता है। भारत में तो अभी प्रति व्यक्ति चौबीस सौ कैलोरी खाना भी उपलब्ध नहीं हो रहा है। गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाली आधी आबादी को दो हजार से भी कम कैलोरी उपलब्ध हो रही है। अमेरिका में ज्यादा खाने के बाद कैलोरी बर्न करने के लिए हर घर में एक्ससाइज करने वाली मशीनें लगी होती हैं, जबकि भारत में ऐसी मशीनें इस्तेमाल करने वालों की तादाद एक फीसदी भी नहीं। एक तरफ ज्यादा कैलोरी खाकर उसे बर्न करने की समस्या और दूसरी तरफ भारत में पर्याप्त कैलोरी भोजन उपलब्ध नहीं। इसलिए अमेरिका को भारत की गरीबी के साथ इस तरह मजाक करने का कोई हक नहीं बनता। आखिर देश की एक तिहाई मध्यम आय वर्ग वाली आबादी ही सारा अनाज चट नहीं कर जाती। हां, यह तथ्य है कि नई आर्थिक नीतियों के बाद देश के एक तिहाई लोग संपन्नता की सीढ़ी चढ़ रहे हैं, जबकि दो तिहाई लोग और गरीब होते जा रहे हैं। देश की आबादी अगर इस समय 120 करोड़ के आसपास हो, तो करीब चालीस करोड़ की आबादी उच्च आय वर्ग और मध्यम आय वर्ग में आएगी, जबकि अस्सी करोड़ लोग आज भी मुफलिसी में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जार्ज बुश के मुताबिक भारत की पैंतीस करोड़ मध्यम आय वर्ग की आबादी ने अपना खान-पान सुधार लिया है, जिस कारण भारत में खाद्यान्न पदार्थों की खपत बढ़ गई है। उन्होंने यह भी कहा है कि जहां भारत में पैंतीस करोड़ मध्यम आय वर्ग की आबादी है वहां अमेरिका की तो कुल आबादी ही इतनी है। यह सच है कि शहरी लोगों ने अपने खान-पान की आदतें बदली हैं और घरों में खाद्य पदार्थों की खपत में बढ़ोत्तरी हुई है। लेकिन दूसरी तरफ बुंदेलखंड जैसे भारतीय इलाके भुखमरी का शिकार भी हो रहे हैं। सच यह भी है कि दुनियाभर के कुपोषण के शिकार बच्चों में से एक तिहाई बच्चे भारतीय होते हैं।</span></p>
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		<title>कौन मानता है तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग</title>
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		<pubDate>Sat, 05 Apr 2008 18:37:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Diplomacy]]></category>

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		<description><![CDATA[तिब्बत और जम्मू कश्मीर पर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की दो महान गलतियां हमारी कूटनीतिक अपरिपक्वता का पीछा नहीं छोड़ रही। राजा हरि सिंह शुरू में जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र रखने के पक्ष में थे। लेकिन पाकिस्तान ने कबायलियों को आगे करके कश्मीर पर कब्जे की कोशिश शुरू की तो राजा हरि [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size="2">तिब्बत और जम्मू कश्मीर पर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की दो महान गलतियां हमारी कूटनीतिक अपरिपक्वता का पीछा नहीं छोड़ रही। राजा हरि सिंह शुरू में जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र रखने के पक्ष में थे। लेकिन पाकिस्तान ने कबायलियों को आगे करके कश्मीर पर कब्जे की कोशिश शुरू की तो राजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और विभिन्न नेताओं के दखल से कश्मीर का भारत में विलय कर दिया। गृहमंत्री सरदार पटेल ने पाकिस्तान की ओर से हड़पा हुआ क्षेत्र वापस लेने के लिए फौज भिजवा दी थी, लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने माउंटबेटेन की सलाह पर यह मामला संयुक्त राष्ट्र को सौंप दिया। जिसमें ब्रिटेन और अमेरिका ने भारत का साथ नहीं दिया, अलबत्ता जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह का फैसला करवा दिया। तब से हड़पा हुआ जम्मू कश्मीर का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है। <span id="more-219"></span>यहां बात सिर्फ कब्जे की नहीं, अलबत्ता जम्मू कश्मीर एक ऐसा नासूर बन गया है जो साठ साल से भारत की शांति और विकास में बाधक है। पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर के हड़पे हुए हिस्से में से कुछ हिस्सा चीन को सौंप रखा है। जवाहर लाल नेहरू ने दूसरी गलती तिब्बत के मामले में की। जवाहर लाल नेहरू ने 1954 में चीन के साथ किए पंचशील समझौते में तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग मान लिया। जबकि ऐतिहासिक तथ्य इसके विपरीत था, तिब्बत हमेशा से स्वतंत्र राज्य रहा है, तिब्बत से पहली गलती 1788 में हुई थी जब नेपाल की ओर से हमला किया जाने पर दलाईलामा ने चीन से मदद मांगी। चीन ने इस शर्त पर तिब्बत की मदद की, कि भविष्य में दलाईलामा या पंचेनलामा की नियुक्ति पर उसकी भूमिका रहेगी। इस तरह तिब्बत ने विदेशी आक्राता से बचने के लिए मजबूरी में चीन की यह शर्त मानी थी। भारत पर ब्रिटेन का कब्जा होने के बाद 1904 में ब्रिटिश फौज ने तिब्बत पर हमला बोलकर कब्जा कर लिया। तिब्बत पर कब्जा करने की संधि पर दस्तखत करने से पहले दलाईलामा मंगोलिया भाग गए थे। इसके बावजूद ब्रिटिश भारतीय सरकार ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया था और बाद में चीन के हाथों ढाई करोड़ में बेच दिया। भारत की जनता ब्रिटिश राज को हमेशा गुलामी करार देती रही है, तो ब्रिटिश राज की ओर से हथियाए गए तिब्बत को चीन के हाथों बेचना क्या गुलामी से भी बदत्तर नहीं था। इसके बावजूद जवाहर लाल नेहरू ने तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग कहकर क्या गुलामी की तरफदारी नहीं की थी।</font></p>
<p><font size="2">ब्रिटिश सरकार से ढाई करोड़ रुपए में खरीदने के बावजूद चीन का तिब्बत पर कब्जा नहीं हो सका, इसकी वजह यह थी कि तिब्बत में कड़ा विरोध जारी था और वहां की संस्कृति चीन से मेल नहीं खाती थी। चीन के फौजी शासकों ने 1947 तक तिब्बतियों पर अत्याचार जारी रखे, उनके साथ गुलामों जैसा वैसा ही सलूक किया गया, जैसा भारत में ब्रिटिश फौज करती थी। 1947 में भारत को तो आजादी मिल गई, लेकिन तिब्बत को चीन से आजादी नहीं मिली। तिब्बत का संघर्ष भी तेज हो गया था, लेकिन भारत में आजादी के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1954 में चीन से दोस्ती करने के लालच में तिब्बत को उसका अभिन्न अंग बता दिया। भारत की नेहरू सरकार से शह पाकर चीनी लाल सेना ने 1959 में तिब्बत पर हमला बोल दिया। तिब्बतियों के धर्मगुरु और वहां के राज शासक दलाईलामा पचास हजार शरणार्थियों के साथ कई दिन पैदल चलने के बाद भारत पहुंचे। नेहरू सरकार ने तब उन्हें राजनीतिक शरण तो दी, लेकिन चीन से दोस्ती बढ़ाने के लालच में उन पर भारत में राजनीतिक गतिविधियां नहीं करने की शर्त भी लगा दी। हालांकि भारत की जनता जवाहर लाल नेहरू की दोनों बातों से कभी भी सहमत नहीं हुई, न तो भारत की जनता तिब्बत को चीन का अंग मानने को कभी तैयार हुई और न ही दलाईलामा पर लगाई गई शर्त कभी भारतीय जनमानस के गले उतरी। जवाहर लाल नेहरू की चीनपरस्ती के बावजूद चीन ने दलाईलामा को शरण दिए जाने को बर्दाश्त नहीं किया और 1962 में भारत पर हमला कर दिया। भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों ने पहले दलाईलामा को शरण देने का विरोध किया और बाद में चीन के हमले के वक्त भारत का साथ देने के बजाए चीन का साथ दिया।</font></p>
<p><font size="2">पिछले अढ़तालीस साल से तिब्बत में आजादी का आंदोलन चल रहा है, जिसे चीन की कम्युनिस्ट सरकार उसी तरह दमन करके कुचल रही है, जिस तरह अंग्रेजों ने 1857 का भारतीय आजादी का आंदोलन कुचला था। तिब्बत की आजादी के आंदोलन को भारत की सीपीएम और सीपीआई चीन का अंदरूनी मामला बता रही हैं, और उसकी तुलना जम्मू कश्मीर से कर रही हैं। दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों का कहना है कि अगर हम जम्मू कश्मीर के मामले में विदेशी दखल पसंद नहीं करते, तो हमें तिब्बत पर चीन के अंदरूनी मामले में दखल देने का भी कोई हक नहीं। जम्मू कश्मीर की तिब्बत से तुलना करना कितना हास्यास्पद है, जम्मू कश्मीर सदियों-सदियों से विशाल भारत का हिस्सा रहा है, जबकि तिब्बत सदियों-सदियों से स्वतंत्र देश रहा है। जम्मू कश्मीर का विवाद सिर्फ 1947 में शुरू होता है, जबकि तिब्बत 1788 तक स्वतंत्र देश था।</font></p>
<p><font size="2">जवाहर लाल नेहरू ने चीन के दबाव में आकर तिब्बत की निर्वासित सरकार को कभी भी मान्यता नहीं दी, लेकिन भारतीय जनमानस के दबाव में कभी भी दलाईलामा पर अपनी निर्वासित सरकार भंग करने का दबाव नहीं बनाया। जवाहर लाल नेहरू का पंचशील का सिध्दांत स्वाहा हो गया था, लेकिन नेहरू के बाद दूसरी गलती 1988 में राजीव गांधी ने की, जिन्होंने अपनी चीन यात्रा के दौरान तिब्बत को फिर से चीन का अभिन्न अंग बताकर तिब्बतियों के आजादी के आंदोलन पर कुठाराघात किया। आरएसएस और उससे जुड़े संगठन शुरू से ही तिब्बतियों के हमदर्द रहे हैं और तिब्बत की आजादी के आंदोलन का समर्थन करते रहे हैं। लेकिन बचपन से स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी जब देश के प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने भी 2003 में चीन जाकर जवाहर लाल नेहरू और राजीव गांधी की चीन नीति को दोहराते हुए तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग करार दे दिया। वाजपेयी सरकार के समय से चीन से संबंध सुधारने की शुरूआत को आगे बढ़ाते हुए मनमोहन सरकार ने पूरी तरह घुटने टेक दिए हैं। अब जब चीन में ओलंपिक खेल होने वाले हैं तो अढ़तालीस साल से आजादी का आंदोलन कर रहे तिब्बतियों को अपनी आवाज दुनिया तक पहुंचाने के लिए अच्छा मौका दिखाई दिया और तिब्बत में शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू हो गया। चीन ने अपने पुराने तौर-तरीकों को दोहराते हुए दमनकारी अभियान शुरू कर दिया है और लाल फौज ल्हासा के हर चौक को जलियावाला बाग बना रही है। स्वाभाविक है उसकी प्रतिक्रिया भारत में भी होगी क्योंकि यहां कम से कम एक लाख निर्वासित तिब्बती अपने धर्मगुरु दलाईलामा की रहनुमाई में रह रहे हैं। तिब्बतियों ने दुनियाभर की तरह भारत में भी चीनी अत्याचारों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करके आवाज उठाई, प्रदर्शनकारी चीनी दूतावास में भी घुस गए। चीन इससे इतना खफा हुआ कि भारत की राजदूत निरूपमा राव को आधी रात के बाद दो बजे विदेश मंत्रालय में तलब किया। मनमोहन सरकार इतने दबाव में आ गई कि विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने दलाईलामा को भारत में चीन विरोधी राजनीतिक गतिविधियां नहीं करने की चेतावनी जारी कर दी। तिब्बत के मामले पर भारत में चीन के खिलाफ हमेशा आंदोलन होते रहे हैं, लेकिन किसी भी सरकार ने इन आंदोलनों पर इस तरह आपत्ति नहीं जताई, जिस तरह इस बार मनमोहन सरकार ने जताई है। चीन की ओर से बार-बार अरुणाचल पर दावा जताने के बावजूद मनमोहन सरकार की चीन के आगे दूम हिलाने वाली इस नीति को भारत की आम जनता कतई पसंद नहीं कर रही। लेकिन कम्युनिस्ट और कम्युनिस्ट समर्थक मीडिया तिब्बतियों के साथ खेली जा रही खून की होली को जायज ठहराने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। तिब्बतियों की लाशें बिछाई जा रही हों, तो उनके धर्मगुरु दलाईलामा चुप करके तो नहीं बैठ सकते। लेकिन चीन ने तिब्बत के आंदोलन को दलाईलामा की साजिश बताकर भारत सरकार को धमकाना शुरू कर दिया है। क्या दलाईलामा की ओर से चीनी अत्याचारों का विरोध करना हिंसा को बढ़ावा देना है? दलाईलामा तो हिंसा का कड़ा विरोध कर रहे हैं। फिर उसे राजनीतिक गतिविधि करार देना क्या हास्यास्पद नहीं? भारत से अच्छा तो पोलैंड और फ्रांस हैं, जहां की सरकारें चीन की दमनकारी कार्रवाई का कड़ा विरोध कर रहे हैं। ब्रिटेन और अमेरिका में भी चीन के दमनकारी हथकंडों का विरोध हो रहा है, लेकिन लगता है कम्युनिस्टों के समर्थन से चल रही यूपीए सरकार पर अमेरिका विरोध के साथ-साथ चीनपरस्ती का भी दबाव है। भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों की ओर से तिब्बत में किए जा रहे अत्याचारों को चीन का अंदरूनी मामला कहना क्या मानवाधिकारों के उल्लंघन की पैरोकारी नहीं? कुछ ही दिन पहले नेपाल के अंदरूनी मामलों में दखल देने को लालायित दिखाई दे रहे भारत के कम्युनिस्टों को अचानक तिब्बत में हो रहे लाल सेना के अत्याचार वहां का अंदरूनी मामला दिखाई देने लगा। यह कम्युनिस्टों की चीनपरस्ती का नया सबूत है।</font></p>
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		<title>ओलंपिक के बहाने तिब्बत का दर्द</title>
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		<pubDate>Sat, 15 Mar 2008 18:34:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[दुनिया के ज्यादातर हिस्सों पर राज करने की ख्वाहिश ने 19वीं सदी तक लाखों-करोड़ों बेगुनाहों का खून बहाया है। पंद्रहवीं सदी में मुगल भी हिंदोस्तान पर राज करने की ख्वाहिश लेकर भारत आए थे और उन्होंने हिंदू राजाओं के साथ युध्द करके विस्तारवादी मुहिम जारी रखी। मुगल हिंदोस्तान के ज्यादातर हिस्से पर काबिज हो गए [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">दुनिया के ज्यादातर हिस्सों पर राज करने की ख्वाहिश ने 19वीं सदी तक लाखों-करोड़ों बेगुनाहों का खून बहाया है। पंद्रहवीं सदी में मुगल भी हिंदोस्तान पर राज करने की ख्वाहिश लेकर भारत आए थे और उन्होंने हिंदू राजाओं के साथ युध्द करके विस्तारवादी मुहिम जारी रखी। मुगल हिंदोस्तान के ज्यादातर हिस्से पर काबिज हो गए थे, तभी ब्रिटिश विस्तारवादी शासकों की निगाह भारत पर पड़ी। ठीक इसी तरह तिब्बत पर कभी सिंघाई और कभी मंगोलिया काबिज होते रहे। मंगोलिया के तिब्बत छोड़कर जाने के बाद वहां के कुछ हिस्से पर सिंघाई का राज था। लेकिन तिब्बतियों का आजादी के लिए संघर्ष कभी भी रुका नहीं। <span id="more-201"></span>नतीजतन 1723 में सिंघाई शासकों को भी मध्य तिब्बत छोड़कर जाना पड़ा। इसके बाद तिब्बत में गृहयुध्द शुरू हो गया और चीन ने एमडो पर कब्जा कर लिया, जो बाद में 1929 में सिंघाई प्रांत का हिस्सा बना दिया गया। तिब्बत में गृहयुध्द का फायदा उठाकर चीन ने 1927 में अपने दो उच्चायुक्त नियुक्त किए जिन्हें अंबन कहा गया। चीन समर्थक इतिहासकारों का दावा है कि इन अंबन की मौजूदगी इस बात का सबूत है कि तिब्बत चीन का हिस्सा था। लेकिन सच्चाई यह है कि अंबन वास्तव में चीन के एम्बेसडर (राजदूत) थे। यह इस बात का सबूत है कि तिब्बत पर चीन का कब्जा खत्म हो चुका था। चीन का अगर यह दावा भी मान लिया जाए कि उस समय तिब्बत पर उसका शासन चलता था, इसलिए तिब्बत पर चीन का हक है, तो क्या भारत पर अफगानिस्तान का हक नहीं बनता, जहां के मुगल शासकों ने कई सदियों तक भारत पर राज किया। क्या भारत के गोवा प्रांत पर पुर्तगाल का हक मान लिया जाए, जिसने ब्रिटिश काल में भी गोवा पर कब्जा बनाए रखा। क्या पांडिचेरी पर फ्रांस का हक नहीं होना चाहिए, जो ब्रिटिश राज खत्म होने तक काबिज थे। क्या कर्नाटक के मेंगलूर और केरल के माही पर हौंलेंड का अब भी हक नहीं बनता, जिसका शासन ब्रिटिश काल में भी बना हुआ था।</font><font size="3">यह इतिहास का सच है कि 1728 में तिब्बती शासक फो-ल्हा-नस ने चीन का समर्थन करना शुरू कर दिया था, क्योंकि फो-ल्हा-नस को तिब्बती धार्मिक गुरु दलाई लामा का दखल पसंद नहीं था, जबकि इससे पहले मंगोलिया शासन के समय भी राज-पाट में दलाई लामा की अहमियत बनी रही थी। चीन के लिए तिब्बत पर अपना नियंत्रण बनाने का इससे बढ़िया मौका नहीं था इसलिए उसने सातवें दलाई लामा केलजंग ग्यात्सो को बीजिंग में आमंत्रित किया। दलाई लामा को निमंत्रण फो-ल्हा-नस के साथ चीन की मिलीभगत के तहत दिया गया था। लेकिन बाद में दलाई लामा को 23 साल तक तिब्बत नहीं लौटने दिया गया। फो-ल्हा-नस की मौत के बाद उसके बेटे ने तिब्बत पर राज किया, लेकिन 1750 में चीन के अंबनो ने उसकी हत्या कर दी क्योंकि वह चीन के इशारों पर नहीं चल रहा था। इस पर तिब्बत में दंगे शुरू हो गए और इन दंगों में चीन के दोनों अंबनों की हत्या कर दी गई। इसे बहाना लगाकर चीन ने अपनी सेना तिब्बत में भेज दी। सिंघाई के शासकों ने मौके का फायदा उठाते हुए तिब्बत के राजा (देशी) का पद खत्म कर दिया और चार सदस्यीय मंत्रिपरिषद का गठन कर दिया, जबकि वास्तविक शक्ति नए नियुक्त किए गए दो अंबनों को दे दी। मंत्रिपरिषद की अध्यक्षता करने के लिए दलाई लामा को वापस ल्हासा भेजा गया। दूसरी तरफ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि चीन थककर हार गया था और दलाई लामा को वास्तविक सत्ता सौंप दी थी। नेपाल के गोरखा राजा पृथ्वी नारायण सिंह ने 1788 में जब तिब्बत पर हमला किया तो दलाई लामा ने चीन से मदद मागी, चीन इस शर्त पर मदद देने को तैयार हुआ कि नए दलाई लामा या पंचेन लामा की नियुक्ति में उसकी भूमिका रहेगी। इस तरह तिब्बत ने मजबूरी में चीन का दखल हमेशा-हमेशा के लिए आमंत्रित कर लिया। गोरखे न सिर्फ हार गए अलबत्ता नेपाल पर भी तिब्बत का अधिकार हो गया। नतीजतन 1792 में चीन ने अपने अंबनों की ताकत में बढ़ोत्तरी करके दलाई लामा और पंचेन लामा के बराबर कर दी। तिब्बत के वित्तीय, कूटनीतिक और व्यापारिक मामलों पर चीन के अंबनों का अधिकार हो गया। बिल्कुल उसी तरह, जिस तरह ब्रिटिश शासकों ने भारतीय रियासतों के राजाओं के साथ समझौते करके वित्तीय, कूटनीतिक और व्यापारिक मामलों पर नियंत्रण किया था।</p>
<p>19वीं सदी में सिंघाई शासकों की ताकत घटने लगी और ल्हासा में नियुक्त किए गए अंबनों का प्रभाव भी खत्म हो गया। इस बीच भारत पर ब्रिटिश शासकों का कब्जा हो चुका था और उन्होंने तिब्बतियों को नेपाल से बेदखल कर दिया। अब चीन का दावा यह भी है कि 1788 से लेकर 1908 तक नेपाल पर चीन सरकार का राज रहा था। चीन का यह भी दावा है कि 1856 के समझौते में नेपाल और तिब्बत ने चीन का आधिपत्य मंजूर कर लिया था। लेकिन दूसरी तरफ ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि 1895 में चीन और जापान के युध्द के समय तिब्बत पर ही चीन का कब्जा खत्म हो गया था।</p>
<p>1904 में ब्रिटिश फौज ने लेफ्टिनेंट कर्नल फ्रांसिस यंगहसबेंड की रहनुमाई में भारतीय फौज को ल्हासा पर कब्जा करने भेजा, छोटे-मोटे युध्द के बाद फ्रांसिस ने ल्हासा पर कब्जा कर लिया, तभी चीन ने दावा किया कि तिब्बत उसका अभिन्न अंग है। तिब्बत पर चीन के कब्जे का यह पहला आधिकारिक बयान था। लेकिन तिब्बत पर कब्जा करने की संधि पर दस्तखत करने से पहले ही दलाई लामा मंगोलिया भाग चुके थे। इसलिए फ्रांसिस यंगहसबेंड छोटे-मोटे तिब्बती अधिकारियों के दस्तखत करवाकर ही तिब्बत पर कब्जे की औपचारिकता पूरी कर पाए। तथाकथित संधि के मुताबिक तिब्बत ने ब्रिटिश इंडिया के साथ लगती सीमा खोल दी थी, ब्रिटिश और भारतीय व्यापारियों को खुलेआम आने-जाने की छूट दे दी थी, भारत के साथ किसी तरह के व्यापार पर कोई टैक्स नहीं लगना था और बिना ब्रिटिश शासकों की इजाजत से तिब्बत किसी अन्य देश के साथ संबंध नहीं बनाएगा। इसके अलावा तिब्बत को दो करोड़ पचास लाख रुपए भी अदा करने थे। तिब्बतवासी 1904 तक बार-बार विदेशियों के कब्जे के बावजूद अपनी स्वतंत्रता को बरकरार रखने में सफल रहे थे। लेकिन 1904 में ब्रिटेन और रूस की संधि ने आधुनिक युग में भी तिब्बत को चीन का गुलाम बनने के लिए मजबूर कर दिया, जिसके तहत 1906 में ब्रिटेन ने चीन को तिब्बत संधि का हिस्सेदार बना लिया। इस संधि के तहत चीन का तिब्बत में दखल शुरू हो गया, भरपाई के तौर पर चीन ने ब्रिटिश शासकों को दो करोड़ पचास लाख रुपए की अदायगी कर दी। चीन की सरकार ने झाओ इरफांग को तिब्बत की सेना का कमांडर नियुक्त कर दिया, उसका काम था कि वह तिब्बत के चीन में पूरी तरह विलय करवाने का काम शुरू करे। झाओ इरफांग ने ल्हासा पहुंचते ही अत्याचारों का सिलसिला शुरू किया। उन्होंने तिब्बती नेताओं के सारे अधिकार खत्म कर दिए, तिब्बती मजिस्ट्रेटो को हटाकर चीनी मजिस्ट्रेट तैनात किए गए, एक नए कानून के तहत लामाओं की तादाद तय कर दी गई और तिब्बत में आकर बसने वाले चीनी नागरिकों के लिए कृषि भूमि की योजना शुरू की गई। झाओ के इशारे पर तिब्बती मठों को नष्ट करना शुरू कर दिया गया, धार्मिक तस्वीरों को हटा दिया गया और पत्थरों पर लिखे प्राचीन धार्मिक लेखों की तोड़फोड़ शुरू हो गई। तिब्बती संस्कृति को नष्ट करने का हर हरबा इस्तेमाल किया गया। झाओ की ओर से तिब्बत में अपनाई गई नीति ही बाद में कम्युनिस्ट नीति बनी। झाओ की तिब्बत पर कब्जा करने की नीति कामयाब रही थी और चार साल बाद 1910 में चीन की फौज तिब्बत में घुस गई और दलाई लामा को भारत भागना पड़ा। लेकिन अक्टूबर 1911 में ही सिंघाई पर राज करने वाले सिंघवंश का खात्मा हो गया और फौज ने झाओ का भी सिर कलम कर दिया। दलाई लामा एक बार फिर तिब्बत लौट गए, लेकिन भारत की आजादी के बाद चीन ने तिब्बत पर पूरी तरह कब्जा करके दलाई लामा को भारत भागने के लिए मजबूर कर दिया। शुरू-शुरू में भारत सरकार तिब्बत पर चीन के कब्जे को नाजायज करार देती रही, लेकिन अरुणाचल और सिक्किम पर समझौता करने की गरज से भारत सरकार ने भी ब्रिटिश सरकार की तरह चीन के सामने घुटने टेक दिए हैं, लेकिन पिछले सौ साल से तिब्बती अपनी सर-जमीं को आजाद करवाने के लिए कभी गांधी के रास्ते पर, तो कभी नेता जी सुभाष चंद्र बोस के रास्ते पर चलकर संघर्ष कर रहे हैं। इसी साल अगस्त महीने में चीन में होने वाले ओलंपिक खेलों से पहले अपनी गुलामी की तरफ दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए तिब्बती एक बार फिर ल्हासा की गलियों में अपना खून बहाने उतर आए हैं।</p>
<p></font></p>
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		<title>असली लोकतंत्र तो है अमेरिका में</title>
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		<pubDate>Thu, 07 Feb 2008 18:39:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Diplomacy]]></category>

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		<description><![CDATA[भारत में अमेरिकी चुनाव पर इतनी दिलचस्पी पहले नहीं देखी गई, जितनी इस बार देखी जा रही है। लोग हैरान हैं कि दो साल पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। पिछले कुछ महीनों से डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टियां अपने उम्मीदवारों का फैसला करने की प्रक्रिया अपना रही हैं। उम्मीदवार [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">भारत में अमेरिकी चुनाव पर इतनी दिलचस्पी पहले नहीं देखी गई, जितनी इस बार देखी जा रही है। लोग हैरान हैं कि दो साल पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। पिछले कुछ महीनों से डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टियां अपने उम्मीदवारों का फैसला करने की प्रक्रिया अपना रही हैं। उम्मीदवार चयन की यह प्रक्रिया सितंबर के पहले हफ्ते में खत्म होगी। डेमोक्रेटिक पार्टी का अधिवेशन डेनेवर, कोलोरेडो में 25 से 28 अगस्त तक होगा, जबकि रिपब्लिकन अधिवेशन मिन्नियापालिस, सेंटपाल, मिनेसोटा में पहली से चार सितंबर तक रखा गया है। इसके बाद राष्ट्रपति का चुनाव 4 नवंबर को होगा और चुना गया राष्ट्रपति 20 जनवरी 2009 को शपथ लेगा। उम्मीदवारों के चयन की इस प्रक्रिया को देखकर स्पष्ट है कि भारतीय राजनीतिक दल आंतरिक लोकतंत्र के मामले में अभी कितनी पिछड़ी हुई हैं। <span id="more-173"></span>अपने यहां संसदीय प्रणाली में प्रधानमंत्री का चयन या तो परिवारवाद पर आधारित होता है, या राजनीतिक दांव-पेंच के जरिए होता है। जबकि राष्ट्रपति के उम्मीदवार का फैसला तो चंद नेता ही बंद कमरे में बैठकर राजनीतिक दांव-पेंच के जरिए कर लेते हैं।</font></p>
<p><font size="3">अमेरिका में राजनीतिक दलों में राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार तय करने के लिए प्राइमरीज (जो चुनाव प्रक्रिया फिलहाल चल रही है) की शुरूआत बीसवीं सदी में प्रगतिशील आंदोलन से हुई। उन दिनों भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे सुधारवादियों ने अपने ही पार्टी के राजनीतिक दिग्गजों और बड़े व्यापारिक संस्थानों के आपसी संबंधों का विरोध किया। जनता की सरकार चुनने के लिए प्राइमरी चुनाव उनके सुधारवादी कार्यक्रमों का हिस्सा बन गया। फ्लोरिडा ने सबसे पहले 1901 में बाकायदा प्राइमरी चुनाव का कानून बनाया जिसमें पार्टी कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए प्रतिनिधि चुनने का विकल्प दिया गया। लेकिन तब राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों का नाम तय करने का प्रावधान नहीं था। राष्ट्रपति पद के लिए सबसे पहले 1910 में ओरेगन में कानून बना। दो सालों के भीतर दर्जनभर राज्यों ने ऐसे कानून बना लिए। इस साल होने वाले राष्ट्रपति के चुनाव में 41 राज्यों में यह प्रक्रिया अपनाई जाएगी जबकि बाकी के नौ राज्यों में काकस बैठकें होंगी जिनमें उम्मीदवारों का चयन होगा।</font><font size="3">हालांकि पांच फरवरी को करीब 22 राज्यों में हुए प्राइमरी चुनावों से यह स्पष्ट हो गया है कि रिपब्लिकन पार्टी की ओर से जोहन मैककेन का पलड़ा भारी है और वही उम्मीदवार होंगे। लेकिन दूसरे और तीसरे नंबर पर रहे उम्मीदवारों ने अभी भी हिम्मत नहीं हारी है। दूसरी तरफ डेमोक्रेट के उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया काफी रोचक हो गई है क्योंकि पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन और अफ्रीकी मूल के बाराक ओबामा में अभी भी कड़ी टक्कर चल रही है। दोनों प्रमुख पार्टियों में उम्मीदवार का चयन करने की प्रक्रिया अलग-अलग है। जहां डेमोक्रेट हर राज्य के मिले हुए वोट को ही उम्मीदवार के पक्ष में गिनते हैं, वहां रिपब्लिकन में जिस उम्मीदवार का पलड़ा भारी होता है, उस राज्य के सारे वोट उसके पक्ष में गिने जाते हैं। जब चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई थी तो दोनों पार्टियों की ओर से छह-छह उम्मीदवार मैदान में थे। पांच फरवरी को 22 राज्यों के प्राइमरी चुनाव की प्रक्रिया खत्म होने के बाद साफ हो गया है कि डेमोक्रेट हिलेरी क्लिंटन और बाराक ओबामा उम्मीदवार चुनेंगे। डेमोक्रेटस का वही उम्मीदवार होगा जिसे 2025 वोट मिलेंगे। पांच फरवरी को 1678 प्रतिनिधियों ने वोट डाले हैं। जिसमें से हिलेरी क्लिंटन को 845 वोट हासिल हो चुके हैं और ओबामा को 765 वोट। लेकिन इस चुनाव प्रक्रिया का दूसरा पहलू यह है कि ओबामा को 14 राज्यों में जीत हासिल हुई है, जबकि हिलेरी क्लिंटन को सिर्फ आठ राज्यों में। हिलेरी क्योंकि कैलीफोर्निया और न्यूयार्क जैसे बड़े राज्यों में जीत गई है इसलिए उसके वोट ज्यादा हैं। दोनों में लड़ाई इसीलिए टक्कर की मानी जा रही है। मजेदार बात यह है कि हिलेरी क्लिंटन भले ही अपने गृहराज्य न्यूयार्क में जीत गई हैं, लेकिन ओबामा ने भी न्यूयार्क में अच्छे-खासे वोटों में सेंध लगाई है जबकि ओबामा के राज्य लियोनोइस में हिलेरी की दाल नहीं गली। कुल मिलाकर देखा जाए तो हिलेरी क्लिंटन को महिलाओं और युवाओं का समर्थन मिल रहा है। जबकि ओबामा को अश्वेत बहुल्य राज्यों का समर्थन मिल रहा है।</font><font size="3"> </font><font size="3">रिपब्लिकन की ओर से भले ही अभी तीन उम्मीदवार मैदान में हैं लेकिन मोटे तौर पर जोहन मैककेन का पलड़ा भारी हो चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में बुश की पार्टी के उम्मीदवार मैककेन चुने गए तो वह अपनी पहली पारी में देश के पहले सबसे ज्यादा उम्र के राष्ट्रपति बन जाएंगे। उनका जन्म 29 अगस्त 1936 में हुआ था। मैककेन का जीवन संघर्ष भरा रहा है। उनके दादा और पिता अमेरिकी सेना में थे। उन्होंने खुद भी सैनिक के तौर पर अपना जीवन शुरू किया और वियतनाम युध्द में अमेरिकी नौसेना के पायलट थे, 1967 में जब उनका विमान गिरा दिया गया तो उनका दायां घुटना और दोनों हाथ टूट गए। वह पांच साल तक युध्द बंदी रहे, उन पर अमानवीय अत्याचार किए गए, तो वह टूट गए थे और उन्होंने फांसी लगाकर आत्महत्या करने की कोशिश की थी। अभी भी उन्हें अपने हाथ ऊपर तक उठाने में तकलीफ होती है। पिछले साल जब अमेरिकी राष्ट्रपति की चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई तो वह काफी पीछे थे, एक स्थिति तो यह आ गई थी कि अपने अभियान के लिए उन्हें पैसे की कमी आ गई और उन्होंने तीन मिलियन डालर का कर्ज लिया है। अगर कर्ज उतारने से पहले उनकी मौत हो गई तो कर्ज की अदायगी जीवनबीमा कंपनी करेगी क्योंकि उन्होंने बैंक की शर्तें पूरी करने के लिए कर्ज के बराबर पॉलिसी ली है।</p>
<p>अमेरिका में मोटे तौर पर दो दलीय चुनाव प्रणाली है, क्षेत्रीय दल नहीं हैं, इसलिए भारत की तरह गठबंधन सरकार की कोई गुंजाइश नहीं बचती। एक हिसाब से राष्ट्र को एक बनाए रखने के लिए यह प्रणाली काफी हद तक सही है। अमेरिकी रिपब्लिकन की तुलना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से की जा सकती है, जबकि डेमोक्रेट्स की तुलना भारतीय जनता पार्टी से की जा सकती है। रिपब्लिकन राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश के साथ भारत के मौजूदा कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पटरी इसीलिए बैठ रही है और अमेरिका के पूर्व डेमोक्रेट राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पटरी इसीलिए अटल बिहारी वाजपेयी के साथ बैठती थी। अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव का मुख्य मुद्दा अभी स्पष्ट नहीं हुआ है, हो सकता है कि इराक युध्द ही चुनाव का मुख्य मुद्दा बने। डेमोक्रेट उम्मीदवार का पलड़ा भारी होने की वजह भी यही दिखाई दे रही है, क्योंकि पिछला राष्ट्रपति चुनाव जीत जाने के बावजूद बुश की इराक नीति को अमेरिका में पसंद नहीं किया गया। अब तो बुश की इराक नीति को ही अमेरिका की मौजूदा आर्थिक मंदी की वजह माना जा रहा है और इसी का गुस्सा रिपब्लिकन पार्टी को झेलना पड़ सकता है। पर्यावरण और ग्लोबल वार्मिंग भी चुनावी मुद्दा बन सकते हैं, लेकिन यह सब तय होगा सितंबर और नवंबर के बीच। फिलहाल डेमोक्रेट का पलड़ा इसलिए भारी दिखाई दे रहा है क्योंकि अमेरिकी अपनी मौजूदा आर्थिक समस्याओं के लिए रिपब्लिकन राष्ट्रपति जार्ज बुश की अफगानिस्तान और इराक नीति को जिम्मेदार मान रहे हैं। डेमोक्रेट्स की तरफ से साफ तौर पर कहा जा रहा है कि उनके सत्ता में आने पर इराक नीति में बदलाव होगा। लेकिन रिपब्लिकन उम्मीदवार जोहन मैककेन ने अपनी नीति स्पष्ट नहीं की है। रिपब्लिकन जोहन मैककेन जीते तो वह सबसे ज्यादा उम्र के और संघर्षशील जीवन से निकलने वाले राष्ट्रपति बनेंगे जबकि डेमोक्रेट्स की हिलेरी क्लिंटन जीती तो वह पहली महिला राष्ट्रपति होंगी। डेमोक्रेट्स के ही ओबामा जीते तो वह पहले अश्वेत राष्ट्रपति होंगे। इसलिए यह चुनाव अपने आप में इतिहास रचने वाला चुनाव होगा।</p>
<p></font></p>
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		<title>भारत की ताकत का लोहा चीन ने माना</title>
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		<pubDate>Mon, 14 Jan 2008 19:18:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Diplomacy]]></category>

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		<description><![CDATA[
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चीन यात्रा को काफी हद तक सफल कहना उचित रहेगा। ऐसे बहुत कम मौके आते हैं, जब किसी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के दूसरे देश की यात्रा के दौरान कोई विवाद खड़ा होता हो। हाल ही के वर्षों की ऐसी दो घटनाएं तो गिनाई जा सकती हैं। पहली घटना डेनमार्क की है, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"></p>
<p align="justify">प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चीन यात्रा को काफी हद तक सफल कहना उचित रहेगा। ऐसे बहुत कम मौके आते हैं<font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जब किसी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के दूसरे देश की यात्रा के दौरान कोई विवाद खड़ा होता हो। हाल ही के वर्षों की ऐसी दो घटनाएं तो गिनाई जा सकती हैं। पहली घटना डेनमार्क की है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जब डेनमार्क के प्रधानमंत्री एंडर्स फोग ने भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजेपयी के साथ साझा प्रेस कांफ्रेंस के समय भारत से सीमा पर तनाव घटाकर पाकिस्तान से बातचीत करने की गुहार लगाई। विवाद इतना जोर पकड़ गया था कि भारत ने कड़ा एतराज जताया और अगले दिन की साझा प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री फोग ने पाकिस्तान पर घुसपैठ रोकने का दबाव बनाने की बात कही। <span id="more-151"></span>दूसरी घटना आगरा की है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने कश्मीर में आतंकवाद के लिए जिम्मेदार आतंकवादियों को स्वतंत्रता सेनानी कहकर पुकारा था। इस बात का खामियाजा उन्हें तुरंत भुगतना पड़ा था और बिना साझा बयान के उल्टे पांव लौटना पड़ा था। वह इतने हताश हो गए थे कि उन्होंने अजमेर शरीफ की यात्रा भी रद्द कर दी थी।</font></p>
<p></font></p>
<p align="justify"><font size="3" face="Mangal">1962 </font><font size="3" face="Times New Roman">के बाद भारत और चीन में काफी बदलाव आ चुका है। भारत का नेतृत्व काफी परिपक्व हो चुका है और चीन भी बदले जमाने की कूटनीति को बेहतरीन ढंग से अंजाम दे रहा है। दोनों देशों की परिस्थितियों में सबसे बड़ा अंतर यह है कि चीन की तरह अब भारत भी परमाणु शस्त्र संपन्न देश बन चुका है। </font><font size="3" face="Mangal">1962 </font><font size="3" face="Times New Roman">के जंग के समय भारत की फौज गए जमाने की बंदूकों के साथ लड़ रही थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3" face="Times New Roman">जबकि अब भारत ने हाल ही में तीन हजार किमी मारक क्षमता वाली अग्नि</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3" face="Mangal">3 </font><font size="3" face="Times New Roman">का सफलतापूर्वक परीक्षण किया है। डीआरडीओ के अध्यक्ष वीके श्रीवास्तव चीन दौरे के समय प्रधानमंत्री मनमोहन के साथ थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3" face="Times New Roman">श्रीवास्तव ने </font><font size="3" face="Mangal">8 </font><font size="3" face="Times New Roman">जनवरी को विशाखापट्टनम में भारतीय विज्ञान कांग्रेस को संबोधित करते हुए कहा था कि भारत अगले साल पांच हजार किमी मारक क्षमता वाली अग्नि</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3" face="Mangal">3 </font><font size="3" face="Times New Roman">प्लस का परीक्षण करेगा। स्वाभाविक है यह मारक क्षमता चीन को प्रभावित करेगी क्योंकि बाकी सब पड़ोसी देशों के लिए इतनी मारक क्षमता की कोई जरूरत नहीं। इसलिए कोई भी देश सीमा पर इतना तनाव पैदा करने की हिमाकत नहीं कर सकता कि छोटी</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3" face="Times New Roman">मोटी घुसपैठ पूर्णरूपेण युध्द का रूप ले लें। हालांकि एक सच्चाई यह है कि पिछले साल </font><font size="3" face="Mangal">2006 </font><font size="3" face="Times New Roman">में चीन की तरफ से भारतीय क्षेत्र में </font><font size="3" face="Mangal">140 </font><font size="3" face="Times New Roman">बार एलएसी </font><font size="3" face="Mangal">(</font><font size="3" face="Times New Roman">वास्तविक नियंत्रण रेखा</font><font size="3" face="Mangal">) </font><font size="3" face="Times New Roman">का उल्लंघन किया गया। हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दौरे से ठीक पहले विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने इस उल्लंघन को मामूली घटना करार दिया</font><font size="3" face="Mangal">, लेकिन यह उल्लंघन इतना मामूली भी नहीं है।</font></p>
<p align="justify"><font size="3">जनता सरकार के समय जब अटल बिहारी वाजपेयी विदेशमंत्री थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो उन्होंने गतिरोध तोड़ते हुए फरवरी </font><font size="3" face="Mangal">1979 </font><font size="3">में चीन की यात्रा की थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">उन्हीं के न्योते पर चीन के तत्कालीन विदेशमंत्री हुआंग हूओ </font><font size="3" face="Mangal">1981 </font><font size="3">में भारत आए तो दोनों देशों में व्यापार शुरू करने के साथ</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">साथ सीमा विवाद हल करने पर भी सहमति बनी। दोनों मुद्दों पर आठ दौर की बातचीत के बाद </font><font size="3" face="Mangal">1988 </font><font size="3">में राजीव गांधी चीन गए तो इन्हीं दोनों मुद्दों पर तीव्र गति से काम को आगे बढ़ाने के लिए संयुक्त कार्यदल गठित किए गए। अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने पर चीन के साथ रिश्तों में मिठास घुली</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जिसका श्रेय काफी हद तक नरसिंह राव को भी जाता है। जो खुद प्रधानमंत्री रहते हुए चीन गए थे और व्यापारिक रिश्ते शुरू हो चुके थे। अटल बिहारी वाजेपयी ने अपनी जून </font><font size="3" face="Mangal">2003 </font><font size="3">की चीन यात्रा के दौरान सबसे बड़ी उपलब्धि यह हासिल की थी कि चीन ने सिक्किम पर दावा छोड़ दिया था और यह भी स्पष्ट कर दिया था कि वह भविष्य में कभी भी आबादी वाले क्षेत्रों पर कोई दावा नहीं करेगा। इसके बावजूद मनमोहन सिंह के शासनकाल में सीमा विवाद को प्राथमिकता नहीं दिए जाने और व्यापार को ज्यादा प्राथमिकता दिए जाने का नतीजा यह निकला कि नवंबर </font><font size="3" face="Mangal">2006 </font><font size="3">में जब चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ भारत आने वाले थे तो चीन के राजदूत सू युक्शी ने अरुणाचल प्रदेश पर दावा जता दिया। लेकिन हू जिंताओ के भारत आने तक विवाद ठंडा पड़ चुका था और बाद में चीन ने सू युक्शी को वापस बुलाकर झियांग येन को नई दिल्ली में अपना राजदूत बनाया। दूसरी तरफ चीन ने सिक्किम में हो रहे निर्माण पर एतराज जताया</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जबकि सीमा पर तिब्बत की तरफ बड़ी तीव्र गति से सड़क और रेलवे का निर्माण किया जा रहा है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">माओवादी प्रभाव वाली नई नेपाल सरकार ने रेल मार्ग को नेपाल तक लाने की मांग कर दी है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जो भारत के लिए निश्चित ही चिंता का विषय होना चाहिए</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन मनमोहन सिंह की यात्रा से ठीक पहले विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने इसे हल्के से लेते हुए कहा कि दोनों तरफ विकास कार्य जारी हैं। हालांकि रक्षामंत्री एके एंटनी ज्यादा फिक्रमंद दिखाई देते हैं जिन्होंने सीमा पार विकास की गति को समझते हुए सिक्किम के सीमांत प्रांतों में इंफ्रास्टक्चर बढ़ाने की जरूरत बताई है।</font></p>
<p align="justify"><font size="3">राजीव गांधी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">नरसिंह राव और अटल बिहारी वाजपेयी व्यापार के अलावा सीमा विवाद को तीव्र गति से हल करने पर जोर दे रहे थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन यह मनमोहन सिंह की प्राथमिकता नहीं है। मनमोहन सिंह की प्राथमिकता व्यापार की है। जैसा कि मनमोहन सिंह ने </font><font size="3" face="Mangal">14 </font><font size="3">जनवरी को दोनों देशों के व्यापारिक प्रतिनिधि मंडलों को संबोधित करते हुए इस बात पर खुशी जताई है कि </font><font size="3" face="Mangal">2008 </font><font size="3">तक चालीस बिलियन डालर व्यापार का लक्ष्य है </font><font size="3" face="Mangal">2007 </font><font size="3">में ही पूरा कर लिया गया है और अब </font><font size="3" face="Mangal">2010 </font><font size="3">तक </font><font size="3" face="Mangal">60 </font><font size="3">बिलियन डालर का लक्ष्य तय किया गया है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह व्यापार एकतरफा हो रहा है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">चीन से </font><font size="3" face="Mangal">30 </font><font size="3">बिलियन डालर का आयात हो रहा है जबकि उसके मुकाबले निर्यात </font><font size="3" face="Mangal">9 </font><font size="3">बिलियन डालर कम है। पिछले तीन सालों में व्यापारिक असंतुलन की वजह मनमोहन सरकार का चीन की तरफ झुकाव वाले वामपंथी दलों के समर्थन की निर्भरता है। अपनी राजनीतिक मजबूरियों के चलते मनमोहन सरकार चीन पर इस असंतुलन को दूर करने का दबाव नहीं बना पा रही है। अमेरिका के साथ हुए एटमी करार को सिरे चढ़ाने के लिए वामपंथी दलों के समर्थन की दरकार के चलते मनमोहन सरकार रूस और चीन को खुश करने में लगी है। अक्टूबर में आईएईए प्रमुख अल बरदई की सलाह पर मनमोहन सिंह ने चीन के साथ रिश्तों में गरमाहट लाते हुए नवंबर में पहली बार दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों ने </font><font size="3" face="Mangal">&#8216;</font><font size="3">नोट एक्सचेंज</font><font size="3" face="Mangal">&#8216; </font><font size="3">किए। दिसंबर में कुमिंग में भारत</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">चीन की सेनाओं का पहला संयुक्त प्रशिक्षण अभ्यास हुआ और चौदह जनवरी को चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ से सहमति हुई है कि अगले साल दोनों देशों की फौजें फिर से संयुक्त प्रशिक्षण अभ्यास करेंगी। तेईस महीनों की चुप्पी के बाद दिसंबर </font><font size="3" face="Mangal">2007 </font><font size="3">में चीन के साथ रणनीतिक बातचीत भी शुरू कर दी गई। भले ही चीन रवाना होने से पहले मनमोहन सिंह का कहना था कि इस मुद्दे पर बातचीत का अभी मौका नहीं आया है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">यह मौका परमाणु ईंधन सप्लाई गु्रप </font><font size="3" face="Mangal">(</font><font size="3">एनएसजी</font><font size="3" face="Mangal">) </font><font size="3">के साथ भारत की बातचीत के समय होगा</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की चीन यात्रा का असली मकसद यही था और वह काफी हद तक सफल हो गया जब चीन ने भारत के साथ परमाणु ऊर्जा पर सहयोग देने का ऐलान कर दिया। यह भारत के आर्थिक और सैन्य तौर पर शक्ति संपन्न होने का नतीजा है कि चीन ने मनमोहन सिंह की यात्रा के दौरान न सिर्फ परमाणु ईंधन की सप्लाई में इच्छा जताई अलबत्ता संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सीट के लिए भारत के दावे पर भी सकारात्मक संकेत दिया। मनमोहन सिंह और वेन जियाबाओ की बातचीत के बाद जारी छह पेज के साझा दस्तावेज में सीमा विवाद हल करने के लिए एमके नारायणन और दाई बिंगुओ पर आधारित विशेष प्रतिनिधियों की कमेटी तय राजनीतिक मानदंडों के तहत जल्द ही बातचीत को पूर्ण करेंगे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">ताकि आज तनाव की रेखाएं भविष्य की शांति और मित्रता की रेखाएं बन सकें। साझा दस्तावेज में हथियारों की बढ़ती होड़ को खत्म करने और परमाणु परीक्षण के खिलाफ भी राय प्रकट की गई है। लेकिन चीन की विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को भुलाकर बिना सतर्कता के आगे बढ़ना कोई अक्लमंदी नहीं होगी</font><font size="3" face="Mangal">, 1954 </font><font size="3">में जवाहर लाल नेहरू ने भी चीन जाकर ऐसा ही समझौता किया था और </font><font size="3" face="Mangal">1962</font><font size="3"> में जो कुछ हुआ</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">वह सबके सामने। इसलिए याद रखना चाहिए </font><font size="3" face="Mangal">&#8216;</font><font size="3">नजर हटी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">दुर्घटना घटी</font><font size="3" face="Mangal">&#8216;</font><font size="3">।</font></p>
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		<title>दोस्त, दुश्मन की पहचान जरूरी</title>
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		<pubDate>Tue, 01 Jan 2008 18:34:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Diplomacy]]></category>

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		<description><![CDATA[हम भारतीय इतने सुसंस्कारित हैं कि मरे हुए व्यक्ति की बुराईयां नहीं देखते। ऐसा नहीं कि ऐसी सुसंस्कृति अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान की नहीं। आखिर भारत और पाकिस्तान एक ही देश के विभाजन से ही तो बने हैं। धर्म और पूजा पध्दति को छोड़ दें, तो दोनों देशों की संस्कृति, भाषा-बोली, रहन-सहन एक जैसा ही [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font size="3">हम भारतीय इतने सुसंस्कारित हैं कि मरे हुए व्यक्ति की बुराईयां नहीं देखते। ऐसा नहीं कि ऐसी सुसंस्कृति अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान की नहीं। आखिर भारत और पाकिस्तान एक ही देश के विभाजन से ही तो बने हैं। धर्म और पूजा पध्दति को छोड़ दें</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो दोनों देशों की संस्कृति</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">भाषा</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बोली</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">रहन</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">सहन एक जैसा ही है। इसीलिए बेनजीर भुट्टो की हत्या पर हम भारतीयों को गहरा सदमा लगा। भले ही बेनजीर ने कभी भी भारत के साथ दोस्ती की वैसी पैरवी नहीं की</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जैसी नवाज शरीफ ने की। या कारगिल की साजिश रचने के बाद परवेज मुशर्रफ भी करते रहे हैं। हालांकि मेरे जैसे करोड़ाें भारतीय परवेज मुशर्रफ पर भरोसा नहीं करते</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">वह बाकी पाकिस्तानी शासकों से कहीं ज्यादा मक्कार और जुबान के कच्चे हैं। </font><font size="3"><span id="more-138"></span> जहां तक बेनजीर भुट्टो की बात है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो उनकी हत्या पर भारत ने पुरानी सारी बातें भुलाकर उन्हें अपना दोस्त बताना शुरू कर दिया। यह भारत की संस्कृति ही है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जिसमें मरने वाले की बुराई नहीं देखी जाती। इसीलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बेनजीर भुट्टो को श्रध्दांजलि देते हुए पाकिस्तानी उच्चायोग की श्रध्दांजलि पुस्तिका में यहां तक लिख दिया कि दक्षिण एशिया ने एक ऐसा राजनीतिक नेता खो दिया</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जो भारत</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पाक में दोस्ती की हिमायती थी।</font><font size="3"> </font><font size="3"></p>
<p align="justify">प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राजनीति और कूटनीति की अज्ञानता बार<font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बार साबित करते रहे हैं। इससे पहले इंग्लैंड में जाकर भारत में अंग्रेजों के राज में हुए विकास की तारीफ करके विवाद का विषय बन चुके हैं। बेनजीर की हत्या का अफसोस हर भारतीय को है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">इसकी बड़ी वजह यह है कि कारगिल पर हमला करने वाले परवेज मुशर्रफ को पसंद नहीं किया जाता और इस समय बेनजीर उनके शासन का खात्मा करने की तरफ आगे बढ़ रहीं थी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम तथ्यों को तोड़</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">मरोड़कर पेश करें और भारत से दोस्ती की विरोधी रही बेनजीर को दोस्ती का समर्थक बताना शुरू कर दें। प्रधानमंत्री की ओर से श्रध्दांजलि पुस्तिका में लिखी गई बात इतिहास का हिस्सा बनेगी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">इसलिए इतिहास को तोड़</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">मरोड़कर पेश किया जाना ठीक नहीं। कम से कम मौजूदा पीढ़ी को इतिहास का सच मालूम होना चाहिए</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">प्रधानमंत्री ने जो कुछ लिखा है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">या जो मोटे तौर पर भारतीय मीडिया में छप रहा है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">वह सच से कोसों दूर है। </font></p>
<p align="justify"><font size="3">सच यह है कि कश्मीर में भारत विरोधी आतंकवाद की शुरूआत उस समय हुई</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जब बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री थी। बेनजीर भुट्टो खुद कश्मीर को हिंदू मुक्त प्रांत बनाकर भारत के लिए समस्या खड़ी करने के षड़यंत्र में शामिल थी। सच यह है कि बेनजीर भुट्टो ने प्रधानमंत्री रहते हुए कभी भी भारत के साथ दोस्ती की ईमानदारी से कोशिश नहीं की। जिस समय बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">उसी समय कश्मीर में आतंकवाद शुरू हुआ और कश्मीरी पंडितों को बेघर करके कश्मीर से बाहर निकाला गया। जम्मू कश्मीर में उस समय जगमोहन राज्यपाल थे और बेनजीर भुट्टो एक नहीं अलबत्ता अनेक बार हमारे प्रांत के राज्यपाल के खिलाफ बोली थी। बेनजीर भुट्टो ने ही कश्मीर की आजादी का नारा लगाया था। भारत के साथ दोस्ती के सच को जानने के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं। अपनी हत्या से ठीक पहले बेनजीर जो भाषण दे रही थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">उसमें भी उसने भारत के खिलाफ आग उगली थी। बेनजीर भुट्टो ने अपने आखिरी भाषण में भी कहा कि उनके पिता जुल्फिकार अली भुट्टो को जब पता चला कि भारत ने परमाणु बम बना लिया है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो उन्होंने कहा था कि पाकिस्तानी घास की रोटी खा लेगा</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन परमाणु बम बनाकर रहेगा। बेनजीर भुट्टो ने अपने इस भाषण में यह भी कहा कि जब वह प्रधानमंत्री बनी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो खुफिया एजेंसियों ने उन्हें बताया कि भारत के पास मारक हथियार हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जिनका मुकाबला करने के लिए हमें भी मारक हथियार बनाने चाहिए। बेनजीर ने कहा कि उन्होंने तुरंत भारत जैसे ही हथियार बनाने और आयात करने का आदेश दिया। बेनजीर ने यहां तक कहा कि प्रधानमंत्री बनने पर वह भारत के खतरे से सख्ती के साथ निपटेगी। अपने आखिरी भाषण में बेनजीर ने पाक की जनता को भारत के खिलाफ भड़काते हुए यह भी कहा था कि भारत ने पाकिस्तान का बटवारा करवाया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बेनजीर भुट्टो के इस आखिरी भाषण में दोस्ती की गंध कहां से आई</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">समझ से परे है।</font><font size="3"></p>
<p align="justify">मनमोहन सिंह मीडिया की ओर से पेश किए जा रहे असत्य का शिकार हुए हों<font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">ऐसा भी नहीं कहा जा सकता</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">क्योंकि भारत सरकार का सूचना तंत्र इतना कमजोर भी नहीं है। प्रधानमंत्री को पाकिस्तान उच्चायोग जाने से पहले यह जानकारी तो दी ही गई होगी कि बेनजीर भुट्टो का प्रधानमंत्री के नाते कैसा इतिहास रहा है। भारत के साथ दोस्ती की बात छोड़ भी दें</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो आतंकवाद के मुद्दे पर भी बेनजीर भुट्टो का रिकार्ड ठीक नहीं रहा। उन्होंने न सिर्फ भारत में आतंकवाद की नींव रखी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">अलबत्ता उन्हीं के शासनकाल में अफगानिस्तान से सोवियत फौजों को शिकस्त देने के लिए तालिबान की नींव रखी गई थी। यह इतिहास का कड़वा सच है कि अफगानिस्तान को सेक्युलर बनने से बचाने और इस्लामिक देश बनाए रखने के लिए पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई ने तालिबान के निर्माण में मदद दी। पाकिस्तान के हर शासक ने ओसामा बिन लादेन की मेहमान की तरह खातिरदारी की। यह अलग बात है कि बेनजीर भुट्टो अमेरिकी सहयोग से पाकिस्तान में घुसने के बाद अपने आखिरी दिनों में तालिबान और ओसामा बिन लादेन के खिलाफ बोल रही थी। अमेरिकी राष्ट्रपति बुश से गठजोड़ के कारण ही उसी तालिबान और अलकायदा ने बेनजीर को मौत के घाट उतार दिया</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जिसने उन्हें पाल</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पोषकर बडा किया था। इन तथ्यों की रोशनी में न तो बेनजीर को आतंकवाद विरोधी शख्सियत माना जा सकता है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">न लोकतंत्र के लिए शहीद होने वाली और न ही भारत के मित्र के तौर पर पहचान दी जा सकती है। अपनी संस्कृति के मुताबिक मरने वाले की बुराई नहीं की जाती</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन तारीफ में तथ्यों को नजरअंदाज करना इतिहास के साथ छेड़छाड़ करना है। मरने वालों के साथ कोई मर नहीं जाता</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">इसलिए बेनजीर की मौत से भारत के प्रति उसके ख्यालों को मरा हुआ नहीं माना जा सकता। बेनजीर भुट्टो के भारत विरोधी ख्यालात पाकिस्तान के इतिहास का हिस्सा है और उस इतिहास से छेड़छाड़ कर बेनजीर को भारत का मित्र बताने की हिमाकत नहीं करनी चाहिए।</font></p>
<p></font></p>
<p></font></p>
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		<title>शोले बन गये आग, बेनजीर की हत्या (संशोधित)</title>
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		<pubDate>Sat, 29 Dec 2007 15:12:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Diplomacy]]></category>
		<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[पाकिस्तान की मशहूर लेखिका सादिका ने हाल ही में अपने एक लेख में लिखा था कि पाकिस्तान में शोले दहक रहे हैं और कभी भी आग भड़क उठेगी। इसका अंदाज पिछले हफ्ते 21 दिसम्बर को भी लगा था जब आफताब अहमद खान शेरपाओ पर उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में उस समय गोली मारी गई थी, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font size="3">पाकिस्तान की मशहूर लेखिका सादिका ने हाल ही में अपने एक लेख में लिखा था कि पाकिस्तान में शोले दहक रहे हैं और कभी भी आग भड़क उठेगी। इसका अंदाज पिछले हफ्ते </font><font size="3" face="Mangal">21 </font><font size="3">दिसम्बर को भी लगा था जब आफताब अहमद खान शेरपाओ पर उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में उस समय गोली मारी गई थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जब वह मस्जिद में बकरीद की नमाज पढ़ रहे थे। बाल</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बाल बच गए आफताब अहमद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बड़े नेता थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन बेनजीर भुट्टो के पाकिस्तान छोड़कर इंग्लैंड में जा बसने के बाद परवेज मुशर्रफ से जा मिले थे और हाल ही तक पाकिस्तान के गृहमंत्री थे। अभी एक हफ्ता भी नहीं बीता कि पीपीपी की अध्यक्ष बेनजीर भुट्टो को गोली मार दी गई। दोनों ही आतंकी वारदातों के पीछे स्वात घाटी में सक्रिय अल कायदा से जुड़े तालिबान कमांडर बेतुल्लाह मसूद का हाथ होने का शक है। असल में बेतुल्लाह मसूद अमेरिका समर्थक पाकिस्तानी नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है। पाकिस्तान के एक बड़े वर्ग का मानना है कि राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ और बेनजीर भुट्टो अमेरिका के हितों की रक्षा कर रहे हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जिससे इस्लाम का नुकसान हो रहा है। इसलिए बार</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बार मुशर्रफ और बेनजीर पर आतंकवादी हमले हो रहे थे।<span id="more-134"></span> असल में पाकिस्तान की राजनीति समझने वाले जानते हैं कि वहां पर तालिबान और आईएसआई का अमेरिका के खिलाफ गठजोड़ हो चुका है। बेनजीर भुट्टो दो साल बाद </font><font size="3" face="Mangal">18 </font><font size="3">अक्टूबर को पाकिस्तान लौटीं तो करांची में ही उन पर जानलेवा हमला हुआ लेकिन तब वह बाल</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बाल बच गई थीं। तब से ही आशंका जताई जा रही थी कि आने वाले समय में बेनजीर पर फिर हमला होगा।</font></p>
<p align="justify"><font size="3">बेनजीर भुट्टो के परिवार की तुलना काफी हद तक इंदिरा गांधी के परिवार से की जा सकती है। बेनजीर भुट्टो के दादा सर शाहनवाज भुट्टो की भी गोली मारकर हत्या की गई थी। बेनजीर के पिता जुल्फिकार अली भुट्टो को जिया उल हक ने फांसी पर चढ़ा दिया था। बेनजीर के एक भाई शाहनवाज फ्रांस में मरे पाए गए थे और दूसरे भाई मुर्तजा की </font><font size="3" face="Mangal">1996 </font><font size="3">में हत्या हो गई थी। पाकिस्तान की राजनीति के जानकार मानते हैं कि बेनजीर भुट्टो के दोनों भाईयों की हत्या वहीं की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई ने करवाई थी। पाकिस्तानी फौज और आईएसआई हमेशा से ही भुट्टो परिवार के खिलाफ रहीं हैं और बेनजीर की हत्या में भी आईएसआई और तालिबान के गठजोड़ को नकारा नहीं जा सकता। आजादी के बाद से पाकिस्तान में राजनीतिक हत्याएं होती रहीं हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">यह सिलसिला थमने की बजाए और तेज हो गया है। खासकर अफगानिस्तान से लगते उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में साठ साल से राजनीतिक हिंसा जारी है। पिछले साल उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत के पूर्व मुख्यमंत्री बगूती को पाकिस्तानी फौज ने मुठभेड़ में मार गिराया था। माना जाता है कि बगूती की हत्या राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने करवाई थी। बत्तीस साल पहले फरवरी </font><font size="3" face="Mangal">1975 </font><font size="3">में हयात मोहम्मद खान शेरपाओ भी उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में आतंकवाद का शिकार हुए। बत्तीस साल बाद पिछले हफ्ते </font><font size="3" face="Mangal">21 </font><font size="3">दिसम्बर </font><font size="3" face="Mangal">2007 </font><font size="3">को मोहम्मद खान शेरपाओ के बेटे आफताब अहमद खान शेरपाओ को भी मारने की कोशिश की गई। आफताब तो बाल</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बाल बच गए लेकिन पचास से ज्यादा नमाजी मारे गए। इस घटना से ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अनुमान लगाया जा रहा था कि अब आतंकवाद का निशाना पाकिस्तान बनेगा। अमेरिकी रक्षा मंत्री राबर्ट गेट््स ने पिछले हफ्ते ही पाकिस्तान को चेतावनी दी थी कि आने वाले समय में अल कायदा के हमले तेज होंगे। अल कायदा के निशाने पर बेनजीर भुट्टो और परवेज मुशर्रफ के अलावा इन दोनों के समर्थक भी होंगे।</font><font size="3"> </font><font size="3"></p>
<p align="justify">सच यह है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में जब तक परवेज मुशर्रफ घरेलू कट्टरपंथियों को निशाना बनाए बिना अमेरिका का साथ दे रहे थे<font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तब तक पाक के कट्टरपंथी आतंकवादियों को कोई ज्यादा लेना</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">देना नहीं था। लेकिन अमेरिका के दबाव में मुशर्रफ ने जब अफगानिस्तान से लगते उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में आतंकवादियों पर शिकंजा कसा</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो मुशर्रफ ही नहीं बल्कि उनके सभी समर्थक अलकायदा के निशाने पर आ गए हैं। बेनजीर भुट्टो भी इसीलिए आतंकवादियों के निशाने पर आई क्योंकि उन्होंने अमेरिका और परवेज मुशर्रफ से समझौता करके पाकिस्तान में प्रवेश किया। दूसरी तरफ नवाज शरीफ के साथ ऐसी हालत नहीं है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">उन पर आतंकवादी हमले होने की आशंका नहीं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">क्योंकि वह लगातार अमेरिका के खिलाफ बोल रहे हैं। भारत और अमेरिका में ऐसा मानने वालों की अच्छी</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">खासी तादाद है कि परवेज मुशर्रफ आतंकवाद के खिलाफ ईमानदारी से लडने की बजाए सिर्फ अपनी कुर्सी की रक्षा कर रहे थे। हाल ही में इस खुलासे ने इस आशंका को बल दिया है कि अमेरिका की तरफ से भेजी गई आर्थिक मदद का इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल किया गया। यह खुलासा अमेरिकी एजेंसी ने ही किया है। परवेज मुशर्रफ की आतंकवाद के खिलाफ चल रही अंतरराष्ट्रीय लड़ाई में प्रतिबध्दता के बावजूद अफगानिस्तान से जुड़े पाकिस्तानी इलाकों में अलकायदा की जड़ें मजबूत हुई हैं। अमेरिका दुनियाभर में लोकतंत्र की दुहाई देता है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ ने जब सुप्रीम कोर्ट का गला घोंटा तो अमेरिकी राष्ट्रपति बुश की तरफ से कोई धमकी नहीं आई जबकि दुनिया के बाकी देशों में इस तरह की स्थिति पैदा होने पर अमेरिका का दबाव बढ़ जाता है। अब पाकिस्तान के वकील भी अमेरिका से मांग कर रहे हैं कि वह परवेज मुशर्रफ की आतंकवाद के खिलाफ जंग की असलियत को समझें। अमेरिका की कई खुफिया एजेंसियां भी ओसामा बिन लादेन और उनके समर्थकों के उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में छिपे होने की रिपोर्टे देते रहते हैं। भारतीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि अगर पाकिस्तान की सरकार ईमानदार हो</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो ओसामा बिन लादेन और उनके समर्थकों का पता लगाना कोई मुश्किल काम नहीं। परवेज मुशर्रफ भी यह कह चुके हैं कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में हो सकते हैं। अगर अमेरिकी गुप्तचर एजेंसियों की इस रिपोर्ट पर भरोसा किया जाए कि परवेज मुशर्रफ एक तरफ अमेरिका के साथ हैं तो दूसरी तरफ ओसामा बिन लादेन के हितों की भी रक्षा कर रहे हैं तो यह आशंका भी पैदा होगी कि कहीं बेनजीर भुट्टो की हत्या में भी परवेज मुशर्रफ का हाथ तो नहीं। क्योंकि दुनियाभर में ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है कि अमेरिका अब पाकिस्तान में अपना मोहरा बदलने की फिराक में था और इसी रणनीति के तहत बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तानी वापसी का समझौता करवाया गया था। परवेज मुशर्रफ उन सबको रास्ते से हटाते रहे हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जो उनके रास्ते में आने की हिमाकत करते रहे हैं।</font></p>
<p></font></p>
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		<title>शोले बन गये आग, बेनजीर की हत्या</title>
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		<pubDate>Thu, 27 Dec 2007 18:35:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[पाकिस्तान की मशहूर लेखिका सादिका ने हाल ही में अपने एक लेख में लिखा था कि पाकिस्तान में शोले दहक रहे हैं और कभी भी आग भड़क उठेगी। इसका अंदाज पिछले हफ्ते 21 दिसम्बर को भी लगा था जब आफताब अहमद खान शेरपाओ पर उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में उस समय गोली मारी गई थी, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font size="3">पाकिस्तान की मशहूर लेखिका सादिका ने हाल ही में अपने एक लेख में लिखा था कि पाकिस्तान में शोले दहक रहे हैं और कभी <a target="_blank" href="http://indiagatese.com/wpfiles/wp-content/uploads/benazir.jpg" title="Ex Prime Minister of Pakistan Benazir Bhutto"><img border="1" vspace="1" align="left" width="100" src="http://indiagatese.com/wpfiles/wp-content/uploads/benazir.thumbnail.jpg" hspace="3" alt="Benazir Bhutto" height="125" /></a>भी आग भड़क उठेगी। इसका अंदाज पिछले हफ्ते </font><font size="3" face="Mangal">21 </font><font size="3">दिसम्बर को भी लगा था जब आफताब अहमद खान शेरपाओ पर उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में उस समय गोली मारी गई थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जब वह मस्जिद में बकरीद की नमाज पढ़ रहे थे। आफताब अहमद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बड़े नेता थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन बेनजीर भुट्टो के पाकिस्तान छोड़कर इंग्लैंड में जा बसने के बाद परवेज मुशर्रफ से जा मिले थे और हाल ही तक पाकिस्तान के गृहमंत्री थे। अभी एक <a href="http://indiagatese.com/wpfiles/wp-content/uploads/benazir.jpg" title="Benazir Bhutto"><img border="0" align="left" width="1" src="http://indiagatese.com/wpfiles/wp-content/uploads/benazir.thumbnail.jpg" alt="Benazir Bhutto" height="1" /></a>हफ्ता भी नहीं बीता कि पीपीपी की अध्यक्ष बेनजीर भुट्टो को गोली मार दी गई। दोनों ही बड़े नेताओं की हत्याओं के पीछे स्वात घाटी में सक्रिय अल कायदा से जुड़े तालिबान कमांडर बेतुल्लाह मसूद का हाथ होने का शक है। असल में बेतुल्लाह मसूद अमेरिका समर्थक पाकिस्तानी नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है। पाकिस्तान के एक बड़े वर्ग का मानना है कि राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ और बेनजीर भुट्टो अमेरिका के हितों की रक्षा कर रहे हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जिससे इस्लाम का नुकसान हो रहा है। इसलिए बार</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बार मुशर्रफ और बेनजीर पर आतंकवादी हमले हो रहे थे। <span id="more-130"></span>असल में पाकिस्तान की राजनीति समझने वाले जानते हैं कि वहां पर तालिबान और आईएसआई का अमेरिका के खिलाफ गठजोड़ हो चुका है। बेनजीर भुट्टो दो साल बाद </font><font size="3" face="Mangal">18 </font><font size="3">अक्टूबर को पाकिस्तान लौटीं तो करांची में ही उन पर जानलेवा हमला हुआ लेकिन तब वह बाल</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बाल बच गई थीं। तब से ही आशंका जताई जा रही थी कि आने वाले समय में बेनजीर पर फिर हमला होगा। </font></p>
<p align="justify"><font size="3">बेनजीर भुट्टो के परिवार की तुलना काफी हद तक इंदिरा गांधी के परिवार से की जा सकती है। बेनजीर भुट्टो के दादा सर शाहनवाज भुट्टो की भी गोली मारकर हत्या की गई थी। बेनजीर के पिता जुल्फिकार अली भुट्टो को जिया उल हक ने फांसी पर चढ़ा दिया था। बेनजीर के दोनों भाई फ्रांस में मारे गए थे और इस बात का राज अब तक नहीं खुला है कि उन दोनों की हत्या किसने करवाई। पाकिस्तान की राजनीति के जानकार मानते हैं कि बेनजीर भुट्टो के दोनों भाईयों की हत्या वहीं की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई ने करवाई थी। पाकिस्तानी फौज और आईएसआई हमेशा से ही भुट्टो परिवार के खिलाफ रहीं हैं और बेनजीर की हत्या में भी आईएसआई और तालिबान के गठजोड़ को नकारा नहीं जा सकता। आजादी के बाद से पाकिस्तान में राजनीतिक हत्याएं होती रहीं हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">यह सिलसिला थमने की बजाए और तेज हो गया है। खासकर अफगानिस्तान से लगते उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में साठ साल से राजनीतिक हिंसा जारी है। पिछले साल उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत के पूर्व मुख्यमंत्री बगूती को पाकिस्तानी फौज ने मुठभेड़ में मार गिराया था। माना जाता है कि बगूती की हत्या राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने करवाई थी। बत्तीस साल पहले फरवरी </font><font size="3" face="Mangal">1975 </font><font size="3">में हयात मोहम्मद खान शेरपाओ भी उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में आतंकवाद का शिकार हुए। बत्तीस साल बाद पिछले हफ्ते </font><font size="3" face="Mangal">21 </font><font size="3">दिसम्बर </font><font size="3" face="Mangal">2007 </font><font size="3">को मोहम्मद खान शेरपाओ के बेटे आफताब अहमद खान शेरपाओ पर जामियां मस्जिद में गोली मारी गई। आफताब तो बाल</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बाल बच गए लेकिन पचास से ज्यादा नमाजी मारे गए। इस घटना से ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अनुमान लगाया जा रहा था कि अब आतंकवाद का निशाना पाकिस्तान बनेगा। अमेरिकी रक्षा मंत्री राबर्ट गेट्स ने पिछले हफ्ते ही पाकिस्तान को चेतावनी दी थी कि आने वाले समय में अल कायदा के हमले तेज होंगे। अल कायदा के निशाने पर बेनजीर भुट्टो और परवेज मुशर्रफ के अलावा इन दोनों के समर्थक भी होंगे।</font><font size="3"></p>
<p align="justify">सच यह है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में जब तक परवेज मुशर्रफ घरेलू कट्टरपंथियों को निशाना बनाए बिना अमेरिका का साथ दे रहे थे<font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तब तक पाक के कट्टरपंथी आतंकवादियों को कोई ज्यादा लेना</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">देना नहीं था। लेकिन अमेरिका के दबाव में मुशर्रफ ने जब अफगानिस्तान से लगते उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में आतंकवादियों पर शिकंजा कसा</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो मुशर्रफ ही नहीं बल्कि उनके सभी समर्थक अलकायदा के निशाने पर आ गए हैं। बेनजीर भुट्टो भी इसीलिए आतंकवादियों के निशाने पर आई क्योंकि उन्होंने अमेरिका और परवेज मुशर्रफ से समझौता करके पाकिस्तान में प्रवेश किया। दूसरी तरफ नवाज शरीफ के साथ ऐसी हालत नहीं है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">उन पर आतंकवादी हमले होने की आशंका नहीं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">क्योंकि वह लगातार अमेरिका के खिलाफ बोल रहे हैं। भारत और अमेरिका में ऐसा मानने वालों की अच्छी</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">खासी तादाद है कि परवेज मुशर्रफ आतंकवाद के खिलाफ ईमानदारी से लडने की बजाए सिर्फ अपनी कुर्सी की रक्षा कर रहे थे। हाल ही में इस खुलासे ने इस आशंका को बल दिया है कि अमेरिका की तरफ से भेजी गई आर्थिक मदद का इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल किया गया। यह खुलासा अमेरिकी एजेंसी ने ही किया है। परवेज मुशर्रफ की आतंकवाद के खिलाफ चल रही अंतरराष्ट्रीय लड़ाई में प्रतिबध्दता के बावजूद अफगानिस्तान से जुड़े पाकिस्तानी इलाकों में अलकायदा की जड़ें मजबूत हुई हैं। अमेरिका दुनियाभर में लोकतंत्र की दुहाई देता है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ ने जब सुप्रीम कोर्ट का गला घोंटा तो अमेरिकी राष्ट्रपति बुश की तरफ से कोई धमकी नहीं आई जबकि दुनिया के बाकी देशों में इस तरह की स्थिति पैदा होने पर अमेरिका का दबाव बढ़ जाता है। अब पाकिस्तान के वकील भी अमेरिका से मांग कर रहे हैं कि वह परवेज मुशर्रफ की आतंकवाद के खिलाफ जंग की असलियत को समझें। अमेरिका की कई खुफिया एजेंसियां भी ओसामा बिन लादेन और उनके समर्थकों के उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में छिपे होने की रिपोर्टे देते रहते हैं। भारतीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि अगर पाकिस्तान की सरकार ईमानदार हो</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो ओसामा बिन लादेन और उनके समर्थकों का पता लगाना कोई मुश्किल काम नहीं। परवेज मुशर्रफ भी यह कह चुके हैं कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में हो सकते हैं। अगर अमेरिकी गुप्तचर एजेंसियों की इस रिपोर्ट पर भरोसा किया जाए कि परवेज मुशर्रफ एक तरफ अमेरिका के साथ हैं तो दूसरी तरफ ओसामा बिन लादेन के हितों की भी रक्षा कर रहे हैं तो यह आशंका भी पैदा होगी कि कहीं बेनजीर भुट्टो की हत्या में भी परवेज मुशर्रफ का हाथ तो नहीं। क्योंकि दुनियाभर में ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है कि अमेरिका अब पाकिस्तान में अपना मोहरा बदलने की फिराक में था और इसी रणनीति के तहत बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तानी वापसी का समझौता करवाया गया था। परवेज मुशर्रफ उन सबको रास्ते से हटाते रहे हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जो उनके रास्ते में आने की हिमाकत करते रहे हैं।</font></p>
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		<title>शोलों पर पाकिस्तान</title>
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		<pubDate>Fri, 21 Dec 2007 18:34:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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बत्तीस साल पहले फरवरी 1975 में हयात मोहम्मद खान शेरपाओ पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में आतंकवाद का शिकार हुए। उनकी याद में शेरपाओ की जामियां मस्जिद के पास ही एक गुम्बंद बनाया गया। बत्तीस साल बाद 21 दिसम्बर 2007 को मोहम्मद खान शेरपाओ के बेटे आफताब अहमद खान शेरपाओ पर जामियां मस्जिद में उस [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"></p>
<p align="justify">बत्तीस साल पहले फरवरी <font size="3" face="Mangal">1975 </font><font size="3">में हयात मोहम्मद खान शेरपाओ पाकिस्तान के उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में आतंकवाद का शिकार हुए। उनकी याद में शेरपाओ की जामियां मस्जिद के पास ही एक गुम्बंद बनाया गया। बत्तीस साल बाद </font><font size="3" face="Mangal">21 </font><font size="3">दिसम्बर </font><font size="3" face="Mangal">2007 </font><font size="3">को मोहम्मद खान शेरपाओ के बेटे आफताब अहमद खान शेरपाओ पर जामियां मस्जिद में उस समय आत्मघाती हमला हुआ</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जब वह बकरीद की नमाज अदा कर रहे थे। आफताब अहमद हाल ही तक पाकिस्तान के गृह मंत्री थे और राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के बेहद करीबियों में माने जाते हैं। बेनजीर भुट्टो के पाकिस्तान से बाहर चले जाने के बाद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी में फूट पड़ी और एक खेमा परवेज मुशर्रफ के साथ जा मिला था। <span id="more-96"></span>आफताब अहमद पीपीपी के उस खेमे के अध्यक्ष हैं। आफताब तो बाल</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बाल बच गए लेकिन पचास से ज्यादा नमाजी मारे गए। परवेज मुशर्रफ के समर्थकों पर आतंकवादी हमले अब तेज हो चुके हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में जब तक वह घरेलू कट्टरपंथियों को निशाना बनाए बिना अमेरिका का साथ दे रहे थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तब तक पाक के कट्टरपंथी आतंकवादियों को कोई ज्यादा लेना</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">देना नहीं था लेकिन अमेरिका के दबाव में परवेज मुशर्रफ ने जब अफगानिस्तान से लगते उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में आतंकवादियों पर शिकंजा कसा</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो परवेज मुशर्रफ ही नहीं बल्कि उनके सभी समर्थक अलकायदा के निशाने पर आ गए हैं। बेनजीर भुट्टो भी संभवत</font><font size="3" face="Mangal">: </font><font size="3">इसीलिए आतंकवादियों के निशाने पर आई क्योंकि उन्होंने अमेरिका और परवेज मुशर्रफ से समझौता करके पाकिस्तान में प्रवेश किया। </font></p>
<p align="justify"><font size="3">भारत और अमेरिका में ऐसा मानने वालों की अच्छी</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">खासी तादाद है कि परवेज मुशर्रफ आतंकवाद के खिलाफ ईमानदारी से लडने की बजाए सिर्फ अपनी कुर्सी की रक्षा कर रहे थे। परवेज मुशर्रफ की आतंकवाद के खिलाफ चल रही अंतरराष्ट्रीय लड़ाई में प्रतिबध्दता के बावजूद अफगानिस्तान से जुड़े पाकिस्तानी इलाकों में अलकायदा की जड़ें मजबूत हुई हैं। अमेरिका दुनियाभर में लोकतंत्र की दुहाई देता है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ ने जब सुप्रीम कोर्ट का गला घोंटा तो अमेरिकी राष्ट्रपति बुश की तरफ से कोई धमकी नहीं आई जबकि दुनिया के बाकी देशों में इस तरह की स्थिति पैदा होने पर अमेरिका का दबाव बढ़ जाता है। अब पाकिस्तान के वकील भी अमेरिका से मांग कर रहे हैं कि वह परवेज मुशर्रफ की आतंकवाद के खिलाफ जंग की असलियत को समझें। अमेरिका की कई खुफिया एजेंसियां भी ओसामा बिन लादेन और उनके समर्थकों के उत्तर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पश्चिम सीमांत प्रांत में छिपे होने की रिपोटे देते रहते हैं। भारतीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि अगर पाकिस्तान की सरकार ईमानदार हो</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो ओसामा बिन लादेन और उनके समर्थकों का पता लगाना कोई मुश्किल काम नहीं। परवेज मुशर्रफ भी यह कह चुके हैं कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में हो सकते हैं।</font><font size="3"> </font></p>
<p></font></p>
<p align="justify"><font size="3">पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली के चुनावों का बिगुल बज चुका है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">हालांकि जिस तरह चुनाव करवाए जा रहे हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">उसकी निष्पक्षता पर पाकिस्तान ही नहीं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">अलबत्ता पूरी दुनिया में सवाल उठाया जा रहा है। यूरोपियन यूनियन ने तो निष्पक्षता पर सवाल उठाया ही है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">अमेरिका की मानवाधिकार संस्थाएं भी सवाल उठा रही हैं। जिस तरह पांच साल पहले चुनावों की नौटंकी हुई थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">निष्पक्ष प्रवेक्षकों का मानना है कि इस बार भी चुनावों की नौटंकी ही होगी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जिसमें सरकारी अमला परवेज मुशर्रफ के समर्थकों की जीत सुनिश्चित करेगा। परवेज मुशर्रफ ने वर्दी उतारने के बाद नागरिक राष्ट्रपति की शपथ लेने के बावजूद अपने समर्थकों को जिताने के लिए खुलेआम बयान देकर अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं। इसीलिए परवेज मुशर्रफ के वर्दी उतारने</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">नागरिक राष्ट्रपति के तौर पर शपथ लेने और आपात स्थिति हटाए जाने के बावजूद राष्ट्रमंडल मंत्रिमंडलीय समूह पाकिस्तान का निलंबन रद्द करने के लिए आम सहमति पर नहीं पहुंचा है। परवेज मुशर्रफ ने जब </font><font size="3" face="Mangal">1999 </font><font size="3">में नवाज शरीफ का तख्ता पलटकर सत्ता पर कब्जा किया था तो राष्ट्रमंडल ने पाकिस्तान की सदस्यता निलंबित कर दी थी। पांच साल बाद जब परवेज मुशर्रफ आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में शामिल हुए</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तब जाकर पाकिस्तान की सदस्यता बहाल की गई। अब सुप्रीम कोर्ट के दबाव में परवेज मुशर्रफ ने भले ही अपनी वर्दी उतार दी है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन न्यायपालिका का गला घोंट दिया है। उन्होंने कानून के राज को खत्म कर दिया है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">संविधान में मनमाफिक रद्दोबदल कर दिया है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">सेना को असीमित अधिकार दे दिए हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">मीडिया पर पाबंदियां लगा दी हैं और चुनाव जीतने के हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए हैं। परवेज मुशर्रफ ने जब आपात स्थिति लगाकर सुप्रीम कोर्ट के जजों को नजरबंद कर लिया था तो </font><font size="3" face="Mangal">22 </font><font size="3">नवम्बर को राष्ट्रमंडल से पाकिस्तान को फिर निलंबित कर दिया गया था। हालांकि परवेज मुशर्रफ ने अब आपात स्थिति को हटा दिया है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन इस बीच उन्होंने लोकतंत्र को जितना नुकसान पहुंचाया है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">उससे राष्ट्रमंडल देश पाकिस्तान का निलंबन रद्द करने के पक्ष में दिखाई नहीं देते। अब राष्ट्रमंडल के ज्यादातर देशों की भी राय बन रही है कि परवेज मुशर्रफ की नीतियां लोकतंत्र विरोधी हैं और पाकिस्तान में आतंकवादियों को बढ़ावा दे रही हैं। राष्ट्रमंडल के हरारे सम्मेलन में मानवाधिकारों</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">कानून के राज और मूलभूत राजनीतिक मर्यादाओं पर बल दिया गया था। चार साल पहले अबूजा में हुए राष्ट्रमंडल देशों के सम्मेलन में तय किया गया था कि निष्पक्ष न्यायपालिका लोकतांत्रिक प्रशासन का मूल आधार होंगी। इसलिए मौजूदा हालात में पाकिस्तान की राष्ट्रमंडल में वापसी संभव दिखाई नहीं देती। राष्ट्रमंडल की सदस्यता बहाली या निलंबन से पाकिस्तान की सेहत पर कोई ज्यादा असर तो नहीं पड़ता लेकिन परवेज मुशर्रफ के गैर लोकतांत्रिक तौर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">तरीकों पर अमेरिकी राष्ट्रपति बुश की सहमति जरूर सवालों के घरे में आती है। पाकिस्तान में आठ जनवरी को चुनाव होने वाले हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन इन चुनावों से पहले ही यह हवा बनने लगी है कि चुनाव </font><font size="3" face="Mangal">2002 </font><font size="3">जैसे ही होंगे और परवेज मुशर्रफ बिना बाधा बने रहेंगे। इस आम धारणा के चलते कट्टरपंथियों ने अपने हमले तेज कर दिए हैं और आने वाले समय में आतंकी गतिविधियां और बढ़ जाएंगी। पाकिस्तान की मशहूर लेखिका सादिका ने अपने एक लेख में लिखा है कि पाकिस्तान में शोले दहक रहे हैं और कभी भी आग भड़क उठेगी।</font></p>
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		<title>क्या होगा परवेज मुशर्रफ का</title>
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		<pubDate>Sun, 02 Dec 2007 05:00:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<guid isPermaLink="false">http://indiagatese.com/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%9c-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ab-%e0%a4%95/</guid>
		<description><![CDATA[आठ जनवरी को होने वाले पाकिस्तान के चुनावों के लिए चीन से बनवाई गई मतदान पेटियां पहुंच चुकी हैं। चुनावों से पहले अमेरिका ने राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के सामने वर्दी उतारने और आपातकाल हटाने की शर्तें रखी थीं। इनमें वर्दी उतारने की पहली शर्त पूरी हो चुकी है। और आपातकाल हटाने की दूसरी शर्त सोलह [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><font color="#000080">आठ जनवरी को होने वाले पाकिस्तान के चुनावों के लिए चीन से बनवाई गई मतदान पेटियां पहुंच चुकी हैं। चुनावों से पहले अमेरिका ने राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के सामने वर्दी उतारने और आपातकाल हटाने की शर्तें रखी थीं। इनमें वर्दी उतारने की पहली शर्त पूरी हो चुकी है। और आपातकाल हटाने की दूसरी शर्त सोलह दिसंबर को पूरी करने का वादा है। वर्दी उतारते समय परवेज मुशर्रफ बहुत असहज महसूस कर रहे थे, जिससे स्पष्ट था कि उन्हें कितनी मजबूरी में यह करना पड़ रहा है। <span id="more-75"></span>जिस तरह उन्होंने फौज से बेपनाह मोहब्बत होने की बात कही है। उससे स्पष्ट है कि उनके दिमाग पर फौज की ओर से तख्ता पलट का इतिहास छाया हुआ था। जुल्फकार अली भुट्टो ने दो जनरलों की वरीयता को खारिज करते जिया उल हक को राष्ट्रपति बनवाया था। भुट्टो समझते थे कि फौज अब उनकी मुट्ठी में रहेगी, लेकिन उसी जिया उल हक ने न सिर्फ भुट्टो का तख्ता पलट किया, बल्कि फांसी पर भी चढ़ा दिया। इसी तरह नवाज शरीफ ने भी दो जनरलों की वरीयता को दरकिनार करते परवेज मुशर्रफ को सेनाध्यक्ष बनाया था। नवाज शरीफ भी यह समझते थे कि मुशर्रफ एहसान में दबकर उनकी मुट्ठी में रहेंगे। लेकिन मुशर्रफ ने एक साल के अंदर ही न सिर्फ शरीफ को अंधेरे में रखकर पहले कारगिल कर दिया और बाद में उनका तख्ता पलट कर देश निकाला भी दे दिया।<o></o></font></span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><font color="#000080">अब परवेज मुशर्रफ ने फौज के वरीयता क्रम को तोड़े बिना ही जनरल आफताब कियानी को सेनाध्यक्ष बनाया है। इसलिए मुशर्रफ ने कियानी को सेनाध्यक्ष बनाकर कोई एहसान भी नहीं किया। कियानी को सेनाध्यक्ष भी अमेरिका के दबाव में बनाना पड़ा, वे भी अमेरिका के उतने ही नजदीक हैं जितने खुद परवेज मुशर्रफ। इसलिए विदाई भाषण के समय परवेज मुशर्रफ असहज और डरे हुए दिखाई दे रहे थे। फौज से बेपनाह मोहब्बत की बात दोहराते हुए उन्होंने कम से कम पंद्रह बार कहा कि उन्हें वर्दी उतारते हुए अफसोस हो रहा है। वह बार-बार फौज को बताना चाहते थे, कि वह भले ही नागरिक राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं लेकिन उनके साथ भुट्टो व नवाज शरीफ जैसा सलूक न किया जाए। वह बार-बार कह रहे थे कि वर्दी उनके लिए उनके शरीर की दूसरी चमड़ी है और वह बिना वर्दी के भी भीतर से फौजी ही रहेंगे। मुशरर्फ ने वर्दी उतारते हुए खुद को पाकिस्तान से ज्यादा फौज का वफादार बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी, जब उन्होंने कहा- &#8216;कौम को बचाना है। हर रुकावट को मार हटाना है। यह काम सिर्फ फौज ही कर सकती हैं। बिना इसके पाकिस्तान का कोई वजूद नहीं।&#8217; परवेज मुशर्रफ ने यहां फौज को यह बताने की कोशिश की है कि नवाज शरीफ, बेनजीर भुट्टो और इफ्तिकार चौधरी जैसे लोग फौज के लिए अड़चन हैं, वहां अमेरिका को भी संदेश दिया कि फौज के बिना पाकिस्तान में किसी का कोई वजूद नहीं।<o></o></font></span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><font color="#000080">तख्तापलट का इतिहास दोहराया जाएगा या नहीं, दोहराया जाएगा तो कब। यह भविष्यवाणी करना अभी जल्दबाजी होगा। लेकिन इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। अमेरिका के दबाव में चीन ने निर्मित बैलेट बॉक्स पाकिस्तान का जो भविष्य तय करेंगे, काफी कुछ उस पर निर्भर रहेगा। लेकिन दुनियाभर के कूटनीतिज्ञों की निगाह परवेज मुशर्रफ के भविष्य पर टिक गई है और ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि उनके दिन अब थोड़े रह गए हैं। उनका हश्र या तो जिया उल हक जैसा होगा या जुल्फकार अली भुट्टो जैसा। अगर अमेरिका की मेहरबानी बरकरार रही तो वक्त रहते नवाज शरीफ और बेनजीर की तरह विदेश में पनाह मिल सकती है। पाकिस्तान के ज्यादातर लोग यही चाहते हैं कि परवेज मुशर्रफ वाशिंगटन का एकतरफा टिकट लेकर रुख्सत कर जाएं। क्योंकि पाकिस्तान को अमेरिका के साथ जोड़कर मुशर्रफ ने पाक का भला करने की बजाए नुकसान ज्यादा किया है। कट्टरपंथियों ने आम शहरियों पर हमले तेज कर दिए हैं, जिस कारण आम पाकिस्तानी नागरिक मानता है कि परवेज मुशर्रफ ने भाई-भाई में दरार पैदा करके देश को आत्मघाती मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।<o></o></font></span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><font color="#000080">परवेज मुशर्रफ अमेरिकी राष्ट्रपति बुश से 2003 से वादा कर रहे थे कि वह पाकिस्तान में असली लोकतंत्र बहाल करेंगे। लेकिन एक महीने बाद भंग होने वाली राष्ट्रीय एसेंबली से खुद को अवैध तरीके से दोबारा चुनवाने के बाद ही उन्होंने वर्दी उतारी। चार साल से इंतजार कर रहे अमेरिका का डंडा न होता तो मुशर्रफ अभी भी वर्दी नहीं उतारते। क्योंकि वह जानते हैं कि पाकिस्तान में असली ताकत वर्दी में ही है। यही वजह है कि साठ साल के कार्यकाल में तीस साल तक पाकिस्तान में फौजी शासकों ने ही शासन किया। वर्दी उतारने के बाद परवेज मुशर्रफ ने भले ही नागिरक राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ले ली है। लेकिन उनके राष्ट्रपति पद पर चुने जाने को किसी भी हालत में वास्तविक लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता, जिसका वादा वह पिछले चार साल से कर रहे थे। क्या अमेरिकी राष्ट्रपति बुश नहीं जानते कि भंग होने वाली राष्ट्रीय एसेंबली से उनके चुने जाने पर सुप्रीम कोर्ट में सवालिया निशान लगा हुआ था, खुद को राष्ट्रपति पद पर स्थापित करने के लिए परवेज मुशर्रफ ने आपातकाल लगाकर सुप्रीम कोर्ट के सारे जज बर्खास्त किए और अपने हक में फैसला देने वाले नए जज तैनात किए। मुशर्रफ ने राष्ट्र्रपति का पद चुनाव से हासिल नहीं किया अलबत्ता न्यायपालिका को बंधक बनाकर चुराया है। इसके बावजूद दुनियाभर में लोकतंत्र का दंम भरने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति बुश आए दिन परवेज मुशर्रफ के हर कदम की तारीफ कर रहे हैं। अगर राष्ट्रपति बुश सचमुच पाकिस्तान में वास्तविक लोकतंत्र को बढ़ावा देना चाहते हैं तो सबसे पहले उन्हें मुशर्रफ को समर्थन से हाथ खींचना होगा। क्योंकि मुशर्रफ लोकतांत्रिक सिध्दांतों और न्यापालिका की हत्या कर राष्ट्रपति बने हैं।<o></o></font></span></p>
<p align="justify"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><font color="#000080">ब्रिटेन और राष्ट्रकुल की तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने मुशर्रफ की देश को जल्द ही लोकतांत्रिक पटरी पर लाने की दलील को नामंजूर करते हुए पाकिस्तान की सदस्यता निलंबित कर दी। लेकिन सच यह है कि दुनिया की राजनीति में राष्ट्रकुल का उतना महत्व नहीं है, जितना अमेरिका का। अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने परवेज मुशर्रफ पर वर्दी उतारने और आपातकाल हटाने का दबाव तो डाला, लेकिन स्वतंत्र न्यायपालिका की बहाली का कोई दबाव नहीं डाला। इससे स्पष्ट है कि बुश किसी न किसी तरह मुशर्रफ को बनाए रखना चाहते हैं। दूसरी तरफ अगर जल्द ही मुशर्रफ का तख्तापलट न भी हुआ तो भी नागरिक राष्ट्रपति के तौर पर वह इतने कमजोर हो जाएंगे कि जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। उन्हें जल्द ही एहसास हो जाएगा कि वर्दी के बिना उस राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में भी उनकी क्या हैसियत है, जिसे उन्होंने खुद बनाया है। तीन नवंबर को आपात स्थिति लगाकर निलंबित किए गए संविधान की अगले महीने बहाली के बाद नागरिक राष्ट्रपति के नाते परवेज मुशर्रफ के पास सिर्फ संसद को भंग करने का अधिकार रह जाएगा। अभी फिलहाल चुनाव से पहले ही इस बात का भी फैसला होना है कि देश का कोई नागरिक चौथी बार प्रधानमंत्री बन सकता है या नहीं। इस पर अमेरिका का रुख<span>  </span>साफ नहीं है, लेकिन परवेज मुशर्रफ इस संवैधानिक प्रावधान के जरिए नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो को प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर कर चुके हैं। फिलहाल तो मुशर्रफ को इन दोनों पूर्व प्रधानमंत्रियों से निपटना होगा, जो पूरी तरह टकराव के मूड में आ चुके हैं। इन दोनों ने सत्ता में आने पर बर्खास्त चीफ जस्टिस इफ्तिकार चौधरी की बहाली का मन बनाया हुआ है। अगर चुनावो ंमें मुशर्रफ की पार्टी हारी, तो उनका राष्ट्रपति पद पर रहना मुश्किल ही नहीं अलबत्ता असंभव हो जाएगा।</font></span></p>
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		<title>बुश की ताकत का इम्तिहान पाक में</title>
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		<pubDate>Thu, 15 Nov 2007 04:04:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Diplomacy]]></category>

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		<description><![CDATA[बत्तीस साल पहले भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी कुर्सी खतरे में देखते हुए देश में आपातकाल लगा दिया था। भारत में आपातकाल के बत्तीस साल बाद अब बिल्कुल उन्हीं परिस्थितियों में परवेज मुशर्रफ ने आपातकाल लगाया है। इस संदर्भ से यह नतीजा निकलना गलत नही होगा कि भारत में लोकतंत्र की जो [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify" style="margin: 0cm 0cm 0pt; text-align: justify" class="MsoNormal"><font color="#000080"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">बत्तीस साल पहले भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी कुर्सी खतरे में देखते हुए देश में आपातकाल लगा दिया था। भारत में आपातकाल के बत्तीस साल बाद अब बिल्कुल उन्हीं परिस्थितियों में परवेज मुशर्रफ ने आपातकाल लगाया है। इस संदर्भ से यह नतीजा निकलना गलत नही होगा कि भारत में लोकतंत्र की जो मजबूती आज दिखाई दे रही है वैसी ही मजबूती के लिए पाकिस्तान को बत्तीस साल का इंतजार करना होगा। <span id="more-58"></span>भारत और पाकिस्तान को आजादी एक साथ मिली थी</span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">, <span lang="HI">भले ही पाकिस्तान का निर्माण मजहब के आधार पर हुआ लेकिन आजादी के फौरन बाद मोहम्मद अली जिन्ना सेक्युलर देश की स्थापना करना चाहते थे। पाकिस्तान की संविधान सभा में जिन्ना का पहला भाषण इस बात का गवाह है। लेकिन सेक्युलर देश बनना तो दूर की बात</span>, <span lang="HI">पाकिस्तान लोकतांत्रिक देश भी नहीं बन पाया। मुशर्रफ चौथे फौजी हुकमरान हैं जिन्होंने चुनी हुई सरकारों का तख्ता पलटकर सत्ता हथियाई।</span></span></font></p>
<p align="justify" style="margin: 0cm 0cm 0pt; text-align: justify" class="MsoNormal"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><span lang="HI"></span></span></p>
<p align="justify" style="margin: 0cm 0cm 0pt; text-align: justify" class="MsoNormal"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><span lang="HI"></span></span><font color="#000080"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">पहले की मार्शल लॉ सरकारों और परवेज मुशर्रफ की हुकूमत में एक बड़ा बदलाव अंतरराष्ट्रीय संदर्भों के कारण जरूर देखा जा सकता है। परवेज मुशर्रफ ने खुद को राष्ट्रपति चुनवाने में सफलता हासिल कर ली</span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">, <span lang="HI">जबकि वह सेनाध्यक्ष भी बने रहे। इसलिए पिछले आठ सालों में पाकिस्तान एक तरह से लोकतांत्रिक देश भी बना रहा और फौजी शासन भी बरकरार रहा। नवाज शरीफ का तख्ता पलटने से लेकर परवेज मुशर्रफ के राष्ट्रपति चुने जाने तक कुछ समय के लिए कॉमन वेल्थ से पाकिस्तान की सदस्यता निलंबित जरूर की गई थी। परवेज मुशर्रफ को इसलिए याद किया जाएगा कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद के लिए जितना समर्थन हासिल किया</span>, <span lang="HI">इससे पहले कोई भी पाकिस्तानी फौजी शासक ऐसा समर्थन हासिल नहीं कर पाया था। इसे मुशर्रफ के लिए संयोग ही कहा जाएगा कि अफगानिस्तान ऐसे समय में आतंकवाद का अंतरराष्ट्रीय अड्डा बन गया जब वह पाकिस्तान की सत्ता संभाल रहे थे। अमेरिका को अफगानिस्तान पर हमला करने के लिए पड़ोसी देश पाकिस्तान की जरूरत थी और अमेरिका ने मदद के बदले परवेज मुशर्रफ के फौजी शासन को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाई।</span></span></font></p>
<p align="justify" style="margin: 0cm 0cm 0pt; text-align: justify" class="MsoNormal"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><span lang="HI"></span></span></p>
<p align="justify" style="margin: 0cm 0cm 0pt; text-align: justify" class="MsoNormal"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><span lang="HI"></span></span><font color="#000080"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">अमेरिका की शह मिलने के बाद परवेज मुशर्रफ पहले से भी ज्यादा निरंकुश हो गए और उन्होंने आतंकवाद के नाम पर लोकतंत्र बहाली की मांग करने वालों को दबाना शुरू कर दिया। एक तरफ लोकतंत्र समर्थक राजनीतिक दल परवेज मुशर्रफ के खिलाफ लामबंद हो रहे थे तो दूसरी तरफ अमेरिका विरोधी मुस्लिम जहनियत भी उनके खिलाफ खड़ी हो गई। परवेज मुशर्रफ पिछले छह साल से आतंकवाद को दबाने के नाम पर लोकतंत्र पर भी कुठाराघात जारी रखे हुए थे</span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">, <span lang="HI">लेकिन उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के अमेरिका विरोधी कट्टरपंथियों ने पेशावर से इस्लामाबाद की तरफ कूच कर दिया तो मुशर्रफ की मुसीबतें बढ़नी शुरू हुई। अफगानिस्तान से लगते उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में अलकायदा और तालिबान की गतिविधियां इसी साल इस्लामाबाद की लाल मस्जिद तक पहुंच गई थी। लोकतंत्र को कुचलकर सत्ता पर काबिज रहने की परवेज मुशर्रफ की लालसा पर अदालती अंकुश से<span>  </span>हालात ने ऐसा मोड़ ले लिया कि अमेरिका को पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ के विकल्प की तलाश शुरू करनी पड़ी</span>, <span lang="HI">जो उसे जल्दी से बेनजीर भुट्टो के तौर पर मिल भी गई।</span></span></font></p>
<p align="justify" style="margin: 0cm 0cm 0pt; text-align: justify" class="MsoNormal"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><span lang="HI"></span></span></p>
<p><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><span lang="HI"></span></span><font color="#000080"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">तीन घटनाएं एक साथ हुई। इस्लामाबाद की लाल मस्जिद से खदेड़े जाने के बाद अलकायदा और तालिबान ने अफगानिस्तान से लगते उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत की स्वात घाटी में अपने पांव जमाने शुरू कर दिए। सुप्रीम कोर्ट ने पहले मौजूदा नेशनल एसेंबली और चारों प्रांतों की एसेंबलियों से परवेज मुशर्रफ के दुबारा राष्ट्रपति चुने जाने पर अंकुश लगाने की कोशिश की और बाद में बिना वर्दी उतारे फिर से राष्ट्रपति चुने जाने पर सुनवाई शुरू कर दी। उधर अमेरिका के दखल से बेनजीर भुट्टो का पाकिस्तान में प्रवेश हुआ। परवेज मुशर्रफ को लगा कि वह चारों तरफ से घिर रहे हैं तो उन्होंने अमेरिका की परवाह किए बिना देश में इमरजेंसी लगाकर सुप्रीम कोर्ट और लोकतंत्र दोनों पर सवालिया निशान लगा दिया। अब अमेरिका के लिए परवेज मुशर्रफ का ज्यादा दिन तक बचाव करना बहुत मुश्किल हो गया है। जो बेनजीर भुट्टो संकट में घिरे मुशर्रफ का बचाव करने के लिए आठ साल का वनवास छोड़कर पाकिस्तान पहुंची थी</span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">, <span lang="HI">उसने परवेज मुशर्रफ के खिलाफ मोर्चा खोल लिया है और न्याय पालिका से जुड़ी बिरादरी पूरे देश में इमरजेंसी के खिलाफ सड़कों पर उतर चुकी है और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के इलाकों पर मौलाना फजलुल्ला की रहनुमाई में तालिबान का काफिला कब्जा करते हुए आगे बढ़ रहा है। कम से कम दो जिलों स्वात और सांगला में स्थानीय प्रशासन को खदेड़कर तालिबान कब्जा कर चुका है और पाकिस्तानी फौजें हेलीकाप्टरों से गोलीबारी कर रही हैं। उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में तालिबानों के बढ़ते दबाव के नाम पर परवेज मुशर्रफ अभी भी अमेरिका का समर्थन हासिल करने की कोशिश में जुटे हुए हैं लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने लोकतंत्र बहाली</span>, <span lang="HI">वर्दी उतारना और इमरजेंसी हटाने की तीन शतर्ें रख दी हैं। अमेरिकी दबाव के चलते संकेत मिल रहे थे कि परवेज मुशर्रफ इन तीनों शर्तों को मान लेंगे लेकिन ताजा संकेत इसके विपरीत हैं। संभवत: इसीलिए अमेरिकी दखल से पाकिस्तान पहुंची बेनजीर भुट्टो ने मुशर्रफ को उखाड़ फेंकने का आंदोलन छेड़ दिया है। अपना तख्ता उलटते देख परवेज मुशर्रफ ने बेनजीर भुट्टो के साथ काम करने से इंकार कर दिया है। इतना ही नहीं इमरजेंसी हटाने</span>, <span lang="HI">वर्दी उतारने और लोकतंत्र बहाली का अमेरिकी राष्ट्रपति बुश के साथ किया गया वादा निभाने में भी आनाकानी करना शुरू कर दिया है। राष्ट्रपति बुश को पिछले छह साल में ऐसी असुविधाजनक स्थिति का सामना पहले कभी नहीं करना पड़ा होगा। अब सवाल यह खड़ा होता है कि क्या परवेज मुशर्रफ का हश्र ओसामा बिन लादेन जैसा होगा। अफगानिस्तान पर सोवियत संघ के कब्जे के समय अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को खड़ा किया था। बाद में जब लादेन ने अमेरिका को आतंकवाद का निशाना बनाया तो अमेरिका को उसी के खिलाफ जंग छेड़नी पड़ी। </span><o :p></o></span></font></p>
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		<title>बेनजीर और नवाज शरीफ का पाकिस्तान</title>
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		<pubDate>Sun, 21 Oct 2007 09:09:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Diplomacy]]></category>

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		<description><![CDATA[बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तान वापसी ने परवेज मुशर्रफ की मुश्किलें कम करने की बजाए बढ़ा दी हैं। तालिबान के खिलाफ अफगानिस्तान में अमेरिकी कार्रवाई का समर्थन करके परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान में अपनी हकूमत की मियाद तो बढ़ा ली। लेकिन परवेज मुशर्रफ की अपनी साख लगातार घट रही है। पाकिस्तान समेत दुनियाभर का आम मुसलमान [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font color="#000080"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तान वापसी ने परवेज मुशर्रफ की मुश्किलें कम करने की बजाए बढ़ा दी हैं। तालिबान के खिलाफ अफगानिस्तान में अमेरिकी कार्रवाई का समर्थन करके परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान में अपनी हकूमत की मियाद तो बढ़ा ली। लेकिन परवेज मुशर्रफ की अपनी साख लगातार घट रही है। पाकिस्तान समेत दुनियाभर का आम मुसलमान अमेरिका को इस्लाम विरोधी मानता है और जो भी मुस्लिम नेता अमेरिका का साथ देता है</span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">, <span lang="HI">उसे इस्लाम विरोधी मानने लगता है। यह<span>  </span>धारणा अब परवेज मुशर्रफ के बारे में भी बन चुकी है</span>, <span lang="HI">इसीलिए इस्लामिक कट्टरवादियों ने उन पर तीन बार कातिलाना हमला किया। <span id="more-28"></span>पाकिस्तान का आम मुसलमान हालांकि अमन पसंद है</span>, <span lang="HI">लेकिन परवेज मुशर्रफ आम मुसलमान की आंख में खटकने लगा है। इस हकीकत को जानने के बावजूद बेनजीर भुट्टो ने परवेज मुशर्रफ और अमेरिका के साथ हाथ मिलाकर पाकिस्तान में अपने भविष्य को दांव पर लगा दिया है। यह ठीक है कि बेनजीर भुट्टो और उनके पिता जुल्फिकार अली खां भुट्टो कट्टरपंथी सैनिक शासकों से टक्कर लेते रहे हैं</span>, <span lang="HI">इसलिए भुट्टो परिवार की उदारवादी लोकतांत्रिक छवि बनी थी। बेनजीर भुट्टो अगर परवेज मुशर्रफ की मुखालफत करते हुए ही पाकिस्तान में लौटतीं तो हकूमत तक पहुंचने का उनका रास्ता बहुत आसान होता। बेनजीर भुट्टो के आठ साल पाकिस्तान से बाहर रहने के दौरान देश के हालात काफी बदल चुके हैं और अब आम जनता की सहानुभूति सैनिक शासकों के साथ कतई नहीं। परवेज मुशर्रफ को पाकिस्तानी आवाम का शुरू में काफी समर्थन मिला था</span>, <span lang="HI">लेकिन अफगानिस्तान में अमेरिका का मददगार बनकर मुशर्रफ ने आवाम में अपनी स्थिति बेहद नाजुक कर ली है। ऐसे में जो व्यक्ति परवेज मुशर्रफ के खिलाफ मोर्चा खोलने की स्थिति में होगा</span>, <span lang="HI">आवाम उसी के साथ होगा। </span><o></o></span></font><font color="#000080"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">परवेज मुशर्रफ भी मन से नहीं चाहते थे कि बेनजीर भुट्टो चुनावों से पहले पाकिस्तान में लौटें। इसलिए भले ही ऊपर से परवेज मुशर्रफ कितना ही मीठा बोलें</span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">, <span lang="HI">अंदर से वह बेनजीर से खार खाते हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि अमेरिका बेनजीर भुट्टो को पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ का विकल्प बनाने की रणनीति अपना रहा है। अमेरिका की कूटनीति को समझने वाले जानते हैं कि परवेज मुशर्रफ का जनविरोध होने के कारण अमेरिका बेनजीर भुट्टो को ढाल के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। अमेरिका पहले मुशर्रफ को राष्ट्रपति के तौर पर लोकतांत्रिक मान्यता दिलवाने के लिए बेनजीर भुट्टो का उनके राजनीतिक विरोधी के तौर पर इस्तेमाल करेगा। बाद में धीरे-धीरे सत्ता पर बेनजीर का नियंत्रण कर दिया जाएगा। मुशर्रफ और उनके बल पर सत्ता सुख भोगने वाले सभी लोग जानते हैं कि बेनजीर उनके लिए मददगार नहीं</span>, <span lang="HI">अलबत्ता नुकसानदायक साबित होगी। इसलिए बेनजीर पर हुए आतंकी हमले के पीछे सरकार में शामिल लोगों की मिलीभगत भी मानी जा रही है। बेनजीर भुट्टो अगर अमेरिका और मुशर्रफ के साथ समझौता करके पाकिस्तान न लौटतीं</span>, <span lang="HI">तो वह सर्वाधिक लोकप्रिय नेता के तौर पर उभरती। लेकिन अब जिस तरह वह पाकिस्तान में लौटी हैं उससे सभी अमेरिका विरोधी ताकतें बेनजीर के खिलाफ एकजुट हो गई हैं। जिनमें तालिबान</span>, <span lang="HI">अलकायदा समर्थक और आईएसआई भी शामिल है</span>, <span lang="HI">पाकिस्तान की फौज जिया उल हक के जमाने से ही भुट्टो परिवार के खिलाफ है। </span><o></o></span></font><font color="#000080"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">दूसरी तरफ परवेज मुशर्रफ के कट्टर विरोधी नवाज शरीफ की लोकप्रियता में बेहद इजाफा हुआ है। यह एक अजीब-ओ-गरीब स्थिति है कि दुनियाभर में लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटने वाला अमेरिका पाकिस्तान में चुनी हुई सरकार का तख्ता पलटने वाले सैनिक शासक परवेज मुशर्रफ के साथ है और चुने हुए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के खिलाफ। तख्ता पलटे जाने के वक्त </span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">1999 <span lang="HI">में नवाज शरीफ की लोकप्रियता में गिरावट आ रही थी</span>, <span lang="HI">लेकिन अब उनके अमेरिका विरोधी रुख के कारण उनकी लोकप्रियता में कई गुना ज्यादा इजाफा हो चुका है। पाकिस्तान</span>, <span lang="HI">खासकर पंजाब में आम लोगों का मानना है कि परवेज मुशर्रफ ने अमेरिका की शह पर ही नवाज शरीफ को पिछले महीने इस्लामाबाद हवाई अड्डे से वापस भेज दिया था</span>, <span lang="HI">जबकि अब अमेरिका के इशारे पर ही बेनजीर भुट्टो को लौटने दिया है। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लाहौर बस यात्रा का न्यौता देकर कट्टरपंथियों की आंख में किरकिरी बने नवाज शरीफ अब अचानक उनकी आंख का तारा बन गए हैं। नवाज शरीफ एक बार फिर पाकिस्तान लौटने की कोशिश करने का एलान कर चुके हैं और माना जा रहा है कि इस बार सऊदी अरब शासक भी परवेज मुशर्रफ के साथ नहीं हैं। सब जानते हैं कि पिछले महीने परवेज मुशर्रफ को दस साल के निर्वासन का वादा निभाने के लिए राजी करने में सऊदी अरब शासक की भी अहम भूमिका थी। लेकिन बेनजीर को पाकिस्तान में लौटने की इजाजत देने और नवाज शरीफ को हवाई अड्डे से वापस लौटने के परवेज मुशर्रफ के फैसले से अब सऊदी अरब शासक भी खफा हैं। इसलिए इस बार अगर नवाज शरीफ पाकिस्तान वापस लौटते हैं तो न सिर्फ उन्हें अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलेगा अलबत्ता सुप्रीम कोर्ट से भी राहत मिल सकती है</span>, <span lang="HI">जहां अदालत<span>  </span>की अवमानना का केस पहले से लंबित है। बेनजीर भुट्टो पर हुए आतंकी हमले के बाद नवाज शरीफ ने उनसे फोन पर बात करके स्वस्थ लोकतांत्रिक माहौल को तैयार कर लिया है</span>, <span lang="HI">इसलिए हैरानी नहीं होगी अगर बेनजीर भुट्टो भी उनकी वापसी का समर्थन करें। </span><o></o></span></font></p>
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