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	<title>Socio Political News &#187; India Gate se Sanjay Uvach</title>
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	<description>News Articles and Reactions</description>
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		<title>कांग्रेस बोली- &#8216;नई बात नहीं महंगाई तो हम साथ लाए थे&#8217;</title>
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		<pubDate>Wed, 24 Feb 2010 04:04:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[India Gate se Sanjay Uvach]]></category>

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		<description><![CDATA[यह अपनी मनगढ़ंत बात नहीं। खुद कांग्रेस ने कहीं है यह बात। वह भी कोई छोटे-मोटे नेता ने नहीं। अलबत्ता सोनिया की बगल में खड़े होकर कही गई। वह भी ताल ठोककर। कहां कही, किसने कही, कब कही। उस सबका खुलासा अपन बाद में करेंगे। पहले बात संसद ठप्प होने की। पहले ही दिन दोनों [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">यह अपनी मनगढ़ंत बात नहीं। खुद कांग्रेस ने कहीं है यह बात। वह भी कोई छोटे-मोटे नेता ने नहीं। अलबत्ता सोनिया की बगल में खड़े होकर कही गई। वह भी ताल ठोककर। कहां कही, किसने कही, कब कही। उस सबका खुलासा अपन बाद में करेंगे। पहले बात संसद ठप्प होने की। पहले ही दिन दोनों हाऊस नहीं चले। शुकर है इस बार विपक्ष ने जनता का मुद्दा उठाया। महंगाई का। जिस पर कांग्रेस के सहयोगी भी घुटन महसूस कर रहे। खासकर ममता और करुणानिधि की पार्टियां। लालू-मुलायम भी। जो सरकार के साथ हैं, या नहीं। वे खुद भी नहीं जानते। सहयोगियों की बात छोड़िए। कांग्रेस की सांसद मीरा कुमार भी बोली- &#8216;महंगाई से सचमुच जनता त्रस्त। सदन में प्रभावी बहस होनी चाहिए।&#8217; पर यह बात उनने कही बाहर आकर। अंदर काम रोको प्रस्ताव उन्हीं ने मंजूर नहीं किया। नामंजूर भी नहीं किया। <span id="more-1556"></span>गेंद सरकार के पाले में डाल दी। सरकार को अपना बचाव करने को खड़ा कर दिया। पर नियम-60 कहता है- &#8216;स्पीकर को मुद्दे की पूरी जानकारी न हो। तो वह मंजूर या नामंजूर करने से पहले नोटिस सदन में पढ़ेगा। और नोटिस देने वालों और मंत्री की दलीलें सुनेगा। उसके बाद अपना फैसला सुनाएगा।&#8217; मीरा कुमार ने नोटिस देने वाली सुषमा स्वराज को सुना। काम रोको प्रस्ताव का समर्थन करने वाले मुलायम को सुना। संसदीय कार्यमंत्री पवन कुमार बंसल को भी सुना। शरद पवार को नहीं सुना। बस, तभी हंगामा हो गया। ऐसा क्या कहा था पवन कुमार बंसल ने। जिस पर हंगामा हुआ। उसका खुलासा अपन बाद में करेंगे। पहले बताएं- विपक्ष चाहता क्या है। विपक्ष चाहता है- लोकसभा में काम रोको प्रस्ताव में बहस। राज्यसभा में नियम-167 में बहस। अपन बता दें- काम रोको प्रस्ताव का नियम-56 है लोकसभा में। विपक्ष चाहता है- इसी नियम के तहत हो बहस। सुषमा स्वराज की दलील है- &#8216;यूपीए की पहली सरकार में महंगाई पर सात बार बहस हुई। दूसरी सरकार में भी एक बार हो चुकी। पर न सरकार ने सुध ली, न महंगाई घटी। अलबत्ता लगातार बढ़ रही है महंगाई। सो सरकार को संसद के प्रति जवाबदेह बनाना जरूरी। उसके लिए जरूरी है- उस नियम में बहस हो। जिसके बाद मतविभाजन हो।&#8217; राज्यसभा में यह नियम 167 है। पर सरकार की दुविधा अपन जानते हैं। लोकसभा में तो सरकार को कोई खतरा नहीं। भले ही लालू यादव भी विपक्ष के साथ चले जाएं। भले ममता बनर्जी भी विपक्ष के साथ खड़ी हो जाएं। भले करुणानिधि भी टीआर बालू को विपक्ष के साथ खड़ा कर दें। तब भी सरकार सौ से ज्यादा वोटों से जीतेगी। हां, टीआरएस जरूर खुलकर कहेगी- &#8216;तेलंगाना बनाओ, वोट पाओ।&#8217; पर असली मुद्दा राज्यसभा का। जहां विपक्ष के सांसदों की तादाद यूपीए से ज्यादा। विपक्ष के पास हैं 125 सांसद। सिर्फ 107 हैं यूपीए के पास। सो राज्यसभा में सरकार की हार तय। लोकसभा में मान भी जाए। राज्यसभा में तो मतविभाजन के लिए कतई नहीं मानेगी सरकार। खैर दोनों हाऊस इस मुद्दे पर दिनभर के लिए उठ गए। मुद्दा सिर्फ यह- &#8216;बहस किस नियम में हो।&#8217; सरकार का डर मंत्रियों के चेहरों पर साफ दिखा। विपक्ष के नेता के नाते सुषमा की पहली ललकार थी। सुषमा का खौफ ही सत्ता पक्ष पर आडवाणी से ज्यादा दिखा। हां, बता दें- मीरा कुमार ने जब सुषमा स्वराज का परिचय करवाया। तो आडवाणी की तारीफ में भी पुल बांधे। पर सदन नहीं चला। तो स्थगन का ठीकरा भी एक-दूसरे के सिर फोड़ने की होड़। सुषमा ने बताया- &#8216;सरकार डर रही है। इसीलिए आज सदन नहीं चला।&#8217; पर काम रोको प्रस्ताव में बहस क्यों न हो। पवन कुमार बंसल की दलील भी बताना जरूरी। अलबत्ता वह पवन कुमार बंसल ही थे। जिनने ताल ठोककर कहा- &#8216;महंगाई कोई तात्कालिक मुद्दा नहीं। जो काम रोककर बहस कराई जाए।&#8217; उनने सुषमा की दलील का सहारा लिया। जिनने कहा था- &#8216;आठ बार बहस हो चुकी। सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगी।&#8217; नियम-56 का सहारा भी लिया। सोनिया की मौजूदगी में ताल ठोककर बोले- &#8216;काम रोको प्रस्ताव के लिए तात्कालिक मुद्दा होना चाहिए। महंगाई कोई तात्कालिक मुद्दा नहीं। यूपीए की पहले सरकार में भी सात बार बहस हुई। इस सरकार में भी बहस हो चुकी।&#8217; पवन कुमार बंसल की दलील का लब्बोलुबाब हुआ- &#8216;महंगाई कोई नई बात नहीं। जो काम रोको प्रस्ताव लाकर बहस करें। महंगाई तो हम सत्ता में आते ही साथ लाए थे।&#8217; लगते हाथों बताते जाएं- पड़ोसी ही हैं सुषमा और पवन बंसल। सुषमा अंबाला की, बंसल चंडीगढ़ के। दोनों भिड़े लोकसभा में आमने-सामने</p>
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		<title>अमीर हो गए हैं लोग, मंहगाई का असर नहीं</title>
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		<pubDate>Tue, 23 Feb 2010 07:59:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[India Gate se Sanjay Uvach]]></category>

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		<description><![CDATA[अपन को भी पार्लियामेंट कवर करते दो दशक होने को। ऐसा ढुलमुल अभिभाषण किसी सरकार का नहीं सुना। अभिभाषण पढ़ते भले ही राष्ट्रपति हों। तैयार करती है सरकार। मंजूरी देती है केबिनेट। सो मनमोहन सरकार का अभिभाषण बेअसर सा रहा। ढुलमुल सा रहा। जैसे बचाव की मुद्रा में खड़ी हो सरकार। समस्याओं के बचाव में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">अपन को भी पार्लियामेंट कवर करते दो दशक होने को। ऐसा ढुलमुल अभिभाषण किसी सरकार का नहीं सुना। अभिभाषण पढ़ते भले ही राष्ट्रपति हों। तैयार करती है सरकार। मंजूरी देती है केबिनेट। सो मनमोहन सरकार का अभिभाषण बेअसर सा रहा। ढुलमुल सा रहा। जैसे बचाव की मुद्रा में खड़ी हो सरकार। समस्याओं के बचाव में अजीबोगरीब दलीलें पेश हुई। कुछ समस्याओं से तो कबूतर की तरह आंख ही मूंद लीं। जैसे तेलंगाना का जिक्र तक नहीं। नौ दिसंबर का ऐलान कांग्रेस के जी का जंजाल बन चुका। न बनते बन पड़ रहा है, न उगलते। टाइमपास करने को कमेटी बनी। तो उसकी शर्तें बदनीयती की पोल खोल गई। अब तेलंगाना राष्ट्र समिति की मुखालफत तो अपनी जगह। तेलंगाना के कांग्रेसियों को भी अपने आलाकमान की नीयत पर शक। अपने प्रधानमंत्री की नीयत पर शक। बजट सत्र के पहले दिन ही कांग्रेस को मुखालफत का स्वाद चखना पड़ा। <span id="more-1553"></span>तेलंगाना के सत्रह कांग्रेसी सांसद संसद भवन में इकट्ठे हुए। तेलंगाना के पक्ष में जमकर नारेबाजी की। यों नारे तो जय तेलंगाना के साथ जय कांग्रेस के भी लगाए। पर वहीं पर मौजूद कांग्रेसी सांसद राजगोपाल रेड्डी ने कह दिया- &#8216;तेलंगाना बनने तक आंदोलन जारी रहेगा। जरूरत पड़ी तो कांग्रेस छोड़ देंगे।&#8217; मधु याक्षी ने कहा- &#8216;सरकार नौ दिसंबर का वादा निभाए।&#8217; यह तो रही संसद के अंदर की बात। बाहर भी कमाल हो गया। तेलंगाना के कोई दो हजार वकील &#8216;जंतर-मंतर&#8217; में धरने पर आ बैठे। जब से &#8216;इंडिया गेट से&#8217; धरने हटाए गए। तब से धरने देने वाले जंतर-मंतर पर ही। पर पुलिस आंदोलनकारियों को संसद मार्ग थाने से आगे नहीं बढ़ने देती। वहीं पर अपनी भड़ास निकालकर चले जाते हैं आंदोलनकारी। कभी-कभी ज्यादा जोश हो तो। पानी के फव्वारों की नौबत आती है। और भी ज्यादा जोश हो। तो हल्का लाठीचार्ज। आंदोलनकारी ज्यादा ही गुस्से में हों। तो रबड़ की गोलियों वाली फायरिंग। पर सोमवार को पुलिस गच्चा खा गई। वह काले कोट वालों को ही वकील समझती रही। पर वकील काला कोट उतारकर चुपके से आगे बढ़ गए। पार्लियामेंट एनेक्सी तक पहुंच गए। वहां जाकर फिर काले कोट पहनकर नारे लगाने लगे। तो पुलिस के होश ठिकाने आ गए। संसद के गेट से बस सौ मीटर दूर थे। तब जाकर बेरीकेड लगाकर रोका। पर शाम को जब ताजिए का जुलूस निकला। तो संसद की दीवार के साथ से होकर गुजरा। पर बात हो रही थी राष्ट्रपति के अभिभाषण की। जिसमें खेती पर खास तव्वजो पर जोर दिया। जीडीपी का लक्ष्य नौ फीसदी बताया। विदेशी यूनिवर्सिटियों की बात हुई। तो विदेशी धन लाने का बीडा भी उठाया सरकार ने। सरकार ने सड़क, शिक्षा, बिजली पर अपनी पीठ थपथपाई। तो आतंकवाद रोकने पर पाक से बात का जिक्र भी किया। जब प्रतिभा पाटिल अभिभाषण दे रही थीं। तो तीन बार हलचल भी हुई। पहली बार अल्पसंख्यकों की शिक्षा के मुद्दे पर। दूसरी बार पंचायतों में पचास फीसदी महिला आरक्षण पर। तीसरी बार जब कालेधन का जिक्र किया। वादा तो सांप्रदायिकता विरोधी बिल और महिला आरक्षण का भी हुआ। पर बात समस्याओं की। मंहगाई, नक्सलवाद, आतंकवाद, रोजगार पर कोई ठोस फार्मूला नही दिखा। मंहगाई पर तो सरकार की दलील गजब की रही। अभिभाषण में कहा गया- &#8216;लोगों की खरीदने की क्षमता बढ़ चुकी।&#8217; लब्बोलुबाब यह कि लोग अमीर हो गए। इसलिए मंहगाई बढ़ी। विपक्ष ने आलोचना की। तो मनीष तिवारी ने भी सरकार का पक्ष लिया। बोले- &#8216;यह बात तो सही है। लोगों की आमदनी बढ़ गई। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में खुशहाली आई। विपक्ष के पास आलोचना का कोई ठोस मुद्दा नहीं।&#8217; आपकी आमदनी भी मंहगाई पर भारी पड़ती हो। तो आप भी मंहगाई पर जश्न मनाइए। पर विपक्ष ऐसा नहीं मानता। मंहगाई बजट सत्र में विपक्ष का सरकार पर मारक हथियार। डरे तो पीएम भी हुए हैं। तभी तो अभिभाषण के बाद विपक्ष से अपील की- सहयोग करो।</p>
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		<title>सत्ता चिड़िया की आंख बीजेपी ने तान लिया बाण</title>
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		<pubDate>Sat, 20 Feb 2010 04:24:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[India Gate se Sanjay Uvach]]></category>

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		<description><![CDATA[शुक्रवार बीजेपी अधिवेशन का आखिरी दिन था। आंदोलन की रूपरेखा सामने आई। दूसरे दिन राम मंदिर की तान अलापी गई। तो तीसरे दिन गंगा मैया और मुस्लिम आरक्षण छाया। तीनों मुद्दे हिंदुत्व के। यों नितिन गड़करी कट्टर हिंदूवादी नहीं। पर संघ की लाईन तो लेनी पड़ेगी। यों बात महंगाई, राष्ट्रीय सुरक्षा और कश्मीर की भी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">शुक्रवार बीजेपी अधिवेशन का आखिरी दिन था। आंदोलन की रूपरेखा सामने आई। दूसरे दिन राम मंदिर की तान अलापी गई। तो तीसरे दिन गंगा मैया और मुस्लिम आरक्षण छाया। तीनों मुद्दे हिंदुत्व के। यों नितिन गड़करी कट्टर हिंदूवादी नहीं। पर संघ की लाईन तो लेनी पड़ेगी। यों बात महंगाई, राष्ट्रीय सुरक्षा और कश्मीर की भी हुई। जिनका देश की जनता से सीधा वास्ता। पर मीडिया को चाहिए वे तीनों मुद्दे। जिनसे बीजेपी को सांप्रदायिक ठहराया जाए। जो नितिन गड़करी ने थमा दिए। मंदिर का मुद्दा तो जैसे मीडिया से डरकर आया। कहा- &#8216;मैं मंदिर का मुद्दा नहीं उठाऊंगा। तो मीडिया कहेगा- मुद्दा छोड़ दिया।&#8217; वैसे उनने कोई नई बात नहीं कही। कांग्रेस &#8216;मंदिर दो, मस्जिद लो&#8217; फार्मूले से भी परेशान सी दिखी। पर खुद कांग्रेस को नरसिंह का वादा याद नहीं। उनने मस्जिद बनाने का वादा किया था। गड़करी ने राम मुद्दे पर सिर्फ रस्म अदायगी की। <span id="more-1551"></span>ताकि विनय कटियार जैसे मुंह बंद रखें। वैसे गड़करी ने राजनाथ और कटियार को काम पर लगा दिया। खाली दिमाग, खुराफात का घर होता है। गंगा की सफाई का जिम्मा सौंप दिया। राजीव गांधी ने शुरू किया था गंगा सफाई अभियान। अब तक तीन हजार करोड़ डकार गए सफाई के नाम पर। यह आरोप लगाया बीजेपी ने। यों कहने को तो ग्रामीण रोजगार योजना से भी पार्टी वर्करों की खूब चांदी हुई। राजनाथ सिंह बोले- &#8216;गंगा धार्मिक, सांस्कृतिक आस्था का केंद्र। पर कांग्रेस ने गंगा के नाम पर तीन हजार करोड़ डकार लिए। पवित्र गंगा गंदे नाले में बदल गई।&#8217; दूसरी बार हारने के बाद बीजेपी पुराने मुद्दों पर लौटी। तो जन आंदोलन की रूपरेखा भी बन गई। अब मुस्लिम आरक्षण और महंगाई के मुद्दों पर अलग-अलग दिन संसद घेरेंगे। महंगाई पर सांप्रदायिक मुद्दा भारी पड़ा। महंगाई पर यशवंत सिन्हा के कटाक्ष मनमोहन सिंह को खूब चुभेंगे। आर्थिक प्रस्ताव पेश करते हुए ठेठ देहाती भाषा में बोले- &#8216;जब धूप निकली थी। तब छत पर लिपाई-पोताई नहीं की। ऊंची विकास दर का ढोल बजाते रहे। बरसात आई तो टपक रही है छत।&#8217; सरकार की आर्थिक नीतियों की खिल्ली उड़ाते बोले- &#8216;यह हुआ है उस सरकार में। जिसका पीएम अर्थशास्त्री। पीएम बनने की योग्यता भी यही बता रही थी कांग्रेस।&#8217; बोले- &#8216;मनमोहन सिर्फ चेहरा हैं। नीतियां चल रही सोनिया की।&#8217; मनमोहन की ऐसी ही खिल्ली पहले आडवाणी उड़ाते थे। मुस्लिम आरक्षण के खिलाफ मोर्चा वेंकैया नायडू ने संभाला। बीजेपी ने रंगनाथ मिश्र की सिफारिशें तो खारिज करनी ही थी। आंदोलन का ऐलान भी कर दिया। प्रस्ताव में कहा- &#8216;ओबीसी का मुस्लिम कोटा 8.4 फीसदी से 15 बर्दाश्त नहीं होगा। धर्म परिवर्तन करने वाले ईसाईयों-मुसलमानों को आरक्षण कबूल नहीं। यह हिंदुओं का हक मारना होगा।&#8217; मुस्लिम आरक्षण पर तो देश की अदालतें भी खफा। पर हिंदुओं का हक मारने का राजनीतिक पैंतरा गजब का। कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक के लिए पागल। तो बीजेपी भी हिंदू वोट बैंक का कार्ड खेलने में नहीं चूक रही। एक सेर, तो दूसरा सवा सेर। सांप्रदायिक कार्ड दोनों के हाथ में। पर बीजेपी के कश्मीर मुद्दे की अचानक वापसी भी हुई। वाजपेयी सक्रिय थे। तो मार्गदर्शन उन्हीं का हुआ करता था। अब मार्गदर्शन की बारी आडवाणी की। यों तो गुरुवार को ही प्रस्ताव में कश्मीर आ गया था। पर अपने मार्गदर्शन में कश्मीर का मोर्चा आडवाणी ने खोला। आडवाणी जब होम मिनिस्टर थे। तब फारुख अब्दुल्ला सीएम थे। उनने स्वायत्ता का राग अलापा था। जिसे आडवाणी ने खारिज किया। अब वही फारुख कांग्रेस के साथ। तो सत्ता के गलियारों में स्वायत्ता की नई सुगबुगाहट। आडवाणी ने चेतावनी दी- &#8216;कांग्रेस ने 1953 जैसी स्थिति दुबारा लाने की गुस्ताखी की। तो बीजेपी श्यामा प्रसाद की कुर्बानी दोहराने को तैयार।&#8217; नितिन गड़करी ने फौरन कमान संभाल ली। बेटे की शादी से निपट कर आएंगे। तो चौबीस को जम्मू कश्मीर में आंदोलन की शुरूआत करेंगे। बात पाक से बातचीत पर भी जमकर हुई। आडवाणी-गडकरी ने अमेरिका के हाथों खेलने का आरोप लगाया। बीजेपी के हमलों से कांग्रेसी बचाव मुद्रा में दिखे। गुरुवार को शिवशंकर मेनन ने पीएमओ में बुलाकर मीडिया को ब्रीफ किया। तो शुक्रवार को चिदंबरम-एंटनी सफाई देते दिखे। एंटनी बोले- &#8216;बातचीत में गलत क्या है?&#8217; पूछ सकते हैं- &#8216;फिर सवा साल क्यों ठप्प थी। फिर शर्म-अल-शेख के बाद क्यों पीछे हटे थे मनमोहन।&#8217; चिदंबरम सफाई देते बोले- &#8216;बातचीत में 26/11 उठाएंगे।&#8217; पर बीजेपी अपने तेवरों पर लौटती दिखी। संसद सत्र के मुद्दे तय हो गए। भारत-पाक बात। कश्मीर। महंगाई। मुस्लिम आरक्षण। आडवाणी-गडकरी ने 2014 का निशाना साध लिया। आडवाणी बोले- &#8216;हार से हताश-निराश न हों।&#8217; गड़करी बोले- &#8216;2014 चिड़िया की आंख।&#8217; तो कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी कहते दिखे- &#8216;आडवाणी फिर देख रहे हैं पीएम बनने का ख्वाब।&#8217;</p>
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		<title>ब्यूरोक्रेसी की अकल ठिकाने लगाई तीन दस जनपथियों ने</title>
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		<pubDate>Wed, 17 Feb 2010 08:18:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[सरदार पटेल के समय में जरूर ऐसा होता था। जब कोई मंत्री पीएम से उलझने की हिम्मत करे। इंदिरा के जमाने से वैसी हिम्मत फिर किसी ने नहीं की। जिसने भी हिम्मत की। वह केबिनेट से बाहर हो गया। वीपी सिंह का राजीव से टकराव पुरानी बात नहीं। अरुण नेहरू, अरुण सिंह और आरिफ मोहम्मद [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">सरदार पटेल के समय में जरूर ऐसा होता था। जब कोई मंत्री पीएम से उलझने की हिम्मत करे। इंदिरा के जमाने से वैसी हिम्मत फिर किसी ने नहीं की। जिसने भी हिम्मत की। वह केबिनेट से बाहर हो गया। वीपी सिंह का राजीव से टकराव पुरानी बात नहीं। अरुण नेहरू, अरुण सिंह और आरिफ मोहम्मद खान टकराव पर आए। तो केबिनेट से बाहर होना पड़ा। पर नेहरू से टकराव मोल लेकर भी पटेल मंत्री बने रहे। पटेल ने तो दो बार इस्तीफा भी दिया। पर नेहरू की इतनी हिम्मत नहीं थी। जो पटेल का इस्तीफा मंजूर कर लेते। श्यामाप्रसाद मुखर्जी का भी नेहरू से टकराव रहा। मुखर्जी कांग्रेस में नहीं थे। फिर भी गांधी के कहने पर केबिनेट में थे। कश्मीर जाने के लिए परमिट के मुद्दे पर टकराव हुआ तो इस्तीफा दे दिया। सरदार पटेल का तो हैदराबाद और कश्मीर पर नेहरू से खुला टकराव था। नेहरू के साथ टकराव तो पहले राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू के साथ भी हुआ। हिंदू कोड बिल के खिलाफ थे राजेंद्र बाबू। उनने दो बार बिल वापस लौटाया। तीसरी बार दस्तखत करने पड़े। पर राजेंद्र बाबू ने विरोध जता दिया था। तिब्बत पर भी कड़ा टकराव था नेहरू और राजेंद्र बाबू में। तिब्बत को चीन का हिस्सा नहीं मानना चाहते थे राजेंद्र बाबू। राजेंद्र बाबू का असली टकराव तो नेहरू के साथ सोमनाथ मंदिर पर हुआ। <span id="more-1547"></span>नेहरू ने राजेंद्र बाबू को चिट्ठी लिखकर कहा- &#8216;आप सोमनाथ मंदिर का उद्धाटन करने न जाएं।&#8217; राजेंद्र बाबू ने जवाब लिखा- &#8216;मेरा जाना तय है।&#8217; नेहरू ने इस पर नोट भेजा- &#8216;जाना ही हो, तो आप अपने खर्चे पर जाएं।&#8217; राष्ट्रपति अपने खर्चे पर सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन करने गए। तब नेहरू ने ऑल इंडिया रेडियो में नोट भिजवाया था- &#8216;सोमनाथ मंदिर के उद्धाटन की खबर प्रसारित न की जाए।&#8217; नेहरू को लोकतांत्रिक बताने वाले ऐसे किस्से भूल जाते हैं। पर इन लोगों का कद नेहरू के बराबर या बड़ा था। अब बात मौजूदा पीएम मनमोहन सिंह की। मनमोहन सिंह ने कुछ महीने पहले फरमान भिजवाया- &#8216;मंत्रियों की परफारमेंस का इवेल्यूवेशन होना चाहिए। कामकाज की रेटिंग तय होनी चाहिए।&#8217; इसके लिए केबिनेट सेक्ट्रीएट में पीएमईएस गठित हुआ। यानी परफारमेंस मोनिटरिंग एंड इवेल्यूवेशन सिस्टम। इवेल्यूवेशन करने की जिम्मेदारी ब्यूरोक्रेसी के हाथ थी। ब्यूरोक्रेसी मंत्री की परफारमेंस बनाते। उस पर मंत्री के दस्तखत करवाते। फिर केबिनेट सेक्ट्रीएट में भिजवाते। कुछ मंत्रियों ने तो अनजाने में दस्तखत कर दिए। कुछ ने आंख बंद करके दस्तखत कर दिए। कुछ ने आंख खोलकर दस्तखत किए। दस्तखत करने वालों में गुलाम नबी आजाद भी थे। पर उनने अनजाने में दस्तखत किए। मोनिटरिंग की खबर बाहर आई। तो भड़कने वालों में सबसे पहले गुलाम नबी ही थे। गुलाम नबी की सोनिया गांधी से नजदीकी कौन नहीं जानता। कमलनाथ और अंबिका सोनी की भी सोनिया से उतनी ही नजदीकी। सो तीनों ने पीएम के फैसले पर मीटिंग की। मीटिंग में विरोध का फैसला हुआ। तीनों ने साझा चिट्ठी लिखकर गैर राजनीतिक पीएम को बताया- &#8216;हम आपके प्रति जवाबदेह हैं। केबिनेट के प्रति जवाबदेह हैं। संसद के प्रति जवाबदेह हैं। ब्यूरोक्रेसी के प्रति जवाबदेह नहीं।&#8217; उनने चिट्ठी में पीएमओ के फरमान को लोकतंत्र के खिलाफ भी बताया। तीनों सीनियर मंत्रियों की चिट्ठी आग का धुंआ था। सो मनमोहन सिंह ने फौरन पहचान लिया। मंगलवार को सफाई दी गई। सफाई में कहा गया- &#8216;नौकरशाह मंत्रियों के काम का मूल्यांकन नहीं कर रही। न कोई रेटिंग तय की जा रही। पीएमईएस का मकसद लक्ष्य की समीक्षा। पीएमईएस डिपार्टमेंट्स में तालमेल बिठाती है। ताकि लक्ष्य पूरा हो।&#8217; झेंप मिटाने को भले ही पीएमईएस का काम बताया गया। पर असल में तीन मंत्रियों की चिट्ठी से पीएमओ में खलबली मची। पीएम भी सकते में आए। पीएम को ऐसी चिट्ठी की उम्मीद नहीं थी। चिट्ठी सोनिया गांधी के करीबियों ने लिखी। तो इसका मतलब भी समझते हैं मनमोहन सिंह। सो अब मंत्रियों को मिलेगा ब्यूरोक्रेसी की मोनिटरिंग से छुटकारा।</p>
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		<title>मुंबई के बाद हो गया पुणे, बात से फिर भी नहीं परहेज</title>
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		<pubDate>Tue, 16 Feb 2010 08:11:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[India Gate se Sanjay Uvach]]></category>

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		<description><![CDATA[बारह फरवरी को अपन ने लिखा था- &#8216;अमेरिकी दबाव में बात, पर आतंकियों का घर है पाक।&#8217; इसी में अपन ने खुलासा किया था- &#8216;कुरैशी ने होलबु्रक को भारत में मुंबई नहीं दोहराने की गारंटी नहीं दी।&#8217; और तेरह फरवरी को पुणे में मुंबई दोहराया गया। कौन हैं कुरैशी। कौन हैं होलबु्रक। पाक के विदेशमंत्री [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">बारह फरवरी को अपन ने लिखा था- &#8216;अमेरिकी दबाव में बात, पर आतंकियों का घर है पाक।&#8217; इसी में अपन ने खुलासा किया था- &#8216;कुरैशी ने होलबु्रक को भारत में मुंबई नहीं दोहराने की गारंटी नहीं दी।&#8217; और तेरह फरवरी को पुणे में मुंबई दोहराया गया। कौन हैं कुरैशी। कौन हैं होलबु्रक। पाक के विदेशमंत्री हैं शाह महमूद कुरैशी। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के दक्षिण एशिया दूत हैं होलबु्रक। भले ही एसएम कृष्णा इंकार करें। या चिदंबरम और एंटनी। पर अपन को शक। बातचीत का न्योता होलबु्रक के हाथ ही गया था। अठारह-उन्नीस जनवरी को होलबु्रक दिल्ली में थे। बीस-इक्कीस को इस्लामाबाद में। चार फरवरी को न्योता भेजे जाने का खुलासा हुआ। तो कहा गया था- &#8216;न्योता पंद्रह दिन पहले भेजा गया था।&#8217; अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। कुरैशी ने वादा नहीं किया। अपन ने फिर भी न्योता वापस नहीं लिया। <span id="more-1544"></span>पुणे हो गया। अपन तो अब भी न्योता वापसी को राजी नहीं। सोमवार को सीसीएस बैठी। पर न्योता वापसी का फैसला नहीं हुआ। यानी पच्चीस फरवरी को सचिव स्तर की बातचीत होगी। अमेरिकी दबाव झलक-झलक कर दिख रहा। छह जनवरी 2004 को पाकिस्तान ने लिखित वादा किया था- &#8216;पाकिस्तान की सरजमीं को भारत के खिलाफ आतंकवाद फैलाने के लिए इस्तेमाल नहीं होने देंगे।&#8217; इसके बावजूद कुरैशी वादा करने को तैयार नहीं। अपनी मनमोहन सरकार उस वादे की याद नहीं दिला रही। वादा पूरा नहीं, तो बातचीत कैसी। वह लिखित वादा ही बातचीत की शर्त थी। मुंबई में आतंकी हमले का पर्दाफास हो चुका। पाकिस्तान में रची गयी थी साजिश। वहीं से आए थे आतंकवादी। जनवरी 2004 के वादे की वादाखिलाफी। अब पुणे का सबूत लीजिए। अपन ने पांच फरवरी को खुलासा किया था- &#8216;पाक में जेहाद के नारे, भारत में पाक से गुफ्तगू की तैयारी।&#8217; इसमें अपन ने खुलासा किया था- &#8216;गुफ्तगू की खबर उसी दिन आई। जिस दिन मुजफ्फराबाद में जमात-उद-दावा के जलसे की खबर आई। पाक ने कार्रवाई नहीं की हाफिज सईद पर। अब वह जलसों में खुलेआम लगवा रहा है भारत के खिलाफ जेहाद के नारे।&#8217; तो उस दिन मुजफ्फराबाद में कश्मीर कांफ्रेंस का पहला जलसा था। दूसरा जलसा इस्लामाबाद में हुआ। फिर लाहौर, मुलतान और कराची में। पांच फरवरी को इस्लामाबाद में जब जमात-उद-दावा का जलसा हुआ। तो हाफिज सईद मंच पर थे। हाफिज सईद के डिप्टी कमांडर हैं अब्दुर रहमान मक्की। उनने अपने भाषण में कहा- &#8216;एक समय जेहादियों के सामने कश्मीर ही लक्ष्य था। अब पानी के मुद्दे ने हमें दिल्ली, पुणे, कानपुर पर निशाना साधने का भी मौका दिया।&#8217; और आठवें दिन पुणे में निशाना साध दिया गया। इससे बड़ा सबूत क्या चाहिए। और क्या होता है पाकिस्तान की सरजमीं का भारत के खिलाफ इस्तेमाल। पुणे के धमाके में विदेशियों समेत नौ मरे। इतवार को पूरी दुनिया जब आतंकी वारदात की निंदा कर रही थी। पाक कश्मीर में युध्दविराम का उल्लंघन कर रहा था। अभी तो डेढ़ महीना हुआ है 2010 का। अब तक सत्रह बार घुसपैठ हुई। नौ बार युध्दविराम का उल्लंघन। मनमोहन सरकार मानती है तो माने। अपन नहीं मान सकते- बिना स्लीपिंग सेल की मदद से धमाका हुआ होगा। ना-ना करके आखिर पी चिदंबरम ने मुंबई हमले में भी स्लीपिंग सेल माना। इंडियन मुजाहिद्दीन ही है भारत में लश्कर-ए-तोएबा का स्लीपिंग सेल। इंडियन मुजाहिद्दीन के सब कर्ता-धर्ता आजमगढ़ के। जिस पर आजकल बिछी-बिछी जा रही है कांग्रेस। सोमवार को भी भोपाल में दिग्गी राजा ने कहा- &#8216;मैंने आजमगढ़ जाकर कोई गुनाह नहीं किया।&#8217; रियाज भटकल-इकबाल भटकल हैं इंडियन मुजाहिद्दीन के फाउंडर। दोनों आजमगढ़ के। हेडली ने पूछताछ में भटकल भाईयों का खुलासा किया। दिग्गी राजा भटकल परिवार को ही दिलासा देने गए थे आजमगढ़। कहते हैं- जयपुर, अहमदाबाद, दिल्ली, मुंबई की आतंकी वारदातों का मुकदमा एक जगह सुना जाए। फास्ट ट्रेक अदालत के हवाले हो। ताकि इंडियन मुजाहिद्दीन को राहत मिले। पिछले साल जब इंडियन मुजाहिद्दीन का खुलासा हुआ। तो पकड़े गए इक्कीस में से ग्यारह आतंकी पुणे के थे। आतंकी ई मेल भेजने वाले मंसूर पीरभौय ने खुलासा किया था- &#8216;पुणे के कुरान फाउंडेशन में उसे तैयार किया गया।&#8217; खुलासा यह भी था- &#8216;पुणे को बनाया गया है मुजाहिद्दीन का हेड क्वार्टर।&#8217; फिर भी सावधान नहीं हुई पुणे पुलिस। पकड़ा गया एक शख्स था अकबर। उसने खुद खुलासा किया- &#8216;मेरा भाई मोहसिन चौधरी पुणे में इंडियन मुजाहिद्दीन का चीफ।&#8217; भाई की गिरफ्तारी के बाद से गायब है मोहसिन। कहीं वही तो नहीं, लश्कर-ए-तोएबा का स्लीपिंग सेल।</p>
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		<title>तेलंगाना में आग भड़की तो कबूतर ने आंखें मूंद ली</title>
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		<pubDate>Sat, 13 Feb 2010 06:04:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[तेलंगाना पर आयोग बनाकर आग बुझाई थी। आयोग की शर्तों ने आग फिर भड़का दी। नौ दिसंबर कांग्रेस के जी का जंजाल बन गया। उस दिन सोनिया का जन्म दिन था। तेलंगाना के कांग्रेसी नेता बधाई देने पहुंचे। तो तेलंगाना का रिटर्न गिफ्ट मांग लिया। सोनिया ने उसी दिन कोर कमेटी की धड़ाधड़ा मीटिंगे बुलाई। [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">तेलंगाना पर आयोग बनाकर आग बुझाई थी। आयोग की शर्तों ने आग फिर भड़का दी। नौ दिसंबर कांग्रेस के जी का जंजाल बन गया। उस दिन सोनिया का जन्म दिन था। तेलंगाना के कांग्रेसी नेता बधाई देने पहुंचे। तो तेलंगाना का रिटर्न गिफ्ट मांग लिया। सोनिया ने उसी दिन कोर कमेटी की धड़ाधड़ा मीटिंगे बुलाई। रात ग्यारह बजे तीसरी कोर कमेटी से निकले चिदंबरम ने कहा- &#8216;सरकार तेलंगाना बनाने पर सहमत।&#8217; न सहयोगी दलों से पूछा। न केबिनेट से फैसला हुआ। नादिरशाही का जो नतीजा निकलना था। वही निकला। सोनिया ने सोचा था- तेलंगाना बनेगा। तो चंद्रबाबू और जगनरेड्डी कहीं के नहीं रहेंगे। दोनों सिर्फ चार जिलों वाले रायलसीमा के नेता रह जाएंगे। ग्यारह जिलों वाले तटीय आंध्र से कांग्रेस का नया नेतृत्व उभरेगा। <span id="more-1541"></span>तेलंगाना में राज्य बनाने का फायदा मिलेगा कांग्रेस को। सोचा था दोनों हाथों में लड्डू होंगे। पर अनाड़ियों के हाथ में तलवार वाली हालत हो गई। अपना ही गला काट लिया कांग्रेस ने। सोचा नहीं था- रायलसीमा-तटीय आंध्र से इतना विरोध होगा। इनका विरोध हुआ। तो इधर झुक गए। उनका विरोध हुआ। तो उधर झुक गए। सरकार डेढ़ महीना थाली का बैंगन बनी रही। आयोग बनाकर पिंड छुड़ाया। तो अपन ने तभी लिखा था- &#8216;ठंडे बस्ते में डालने का इरादा है सरकार का।&#8217; अब शुक्रवार को जब आयोग की शर्तों का ऐलान हुआ। समय सीमा 31 दिसंबर बताई। तो अपनी बात सोलह आने सही निकली। यह तो थी पुरानी कहानी। अब सुनो नया बवाल। न माया मिली, न राम वाली हालत हो गई। आयोग की शतें जाहिर होते ही बवाल हो गया। दस-ग्यारह महीने की मियाद पर शायद इतना बवाल न होता। पर शर्तों के पहले नुकते ने ही आग भड़का दी। पहले नुकते में तेलंगाना का जिक्र हुआ। तो अखंड आंध्र के जवाबी आंदोलन का भी जिक्र। आयोग सिर्फ तेलंगाना के लोगों को नहीं सुनेगा। अखंड आंध्र के पैरवीकारों को भी सुनेगा। यानी तेलंगाना को ठुकराने की पूरी तैयारी। पिछड़े हैं, पर अकल से पैदल नहीं तेलंगाना वाले। सो टीआरएस तो भड़कनी ही थी। तेलंगाना के कांग्रेसी नेता भी भड़क गए। अपन कांग्रेसियों के मुखारविंद से निकले वचन सुनाएंगे। पहले टीआरएस प्रमुख चंद्रशेखर राव की बात। उनने आयोग की शर्तें फौरन ठुकरा दी। संसद और विधानसभा से इस्तीफे तो होंगे ही। शनि को तेलंगाना बंद का ऐलान भी हो गया। ज्वाइंट एक्शन कमेटी की मीटिंग भी बुला ली। स्टूडेंट्स ने भी मोर्चा संभाल लिया। आग तो शुक्रवार को भी भड़क चुकी थी। आज तो हैदराबाद में गैर तेलंगानियों की खैर नहीं। आंदोलन का हिंसक होना तय। एक वजह आयोग को इतना लंबा वक्त देना। दूसरा शर्तों से सरकार की बदनियति झलकना। सनद रहे, सो अपन बताते जाएं। जब मद्रास प्रांत से आंध्र को अलग करने का फैसला हुआ। तो कमेटी ने सिर्फ एक महीना लगाया था। कमेटी ने तब सिर्फ आंध्र के लोगों से राय ली थी। मद्रास के लोगों से नहीं। पर अपन बता रहे थे तेलंगाना के कांग्रेसियों का गुस्सा। सबसे पहले बात मधु याक्षी की। राहुल के करीबी हैं मधु याक्षी। शुक्रवार को दिल्ली में ही थे। अपन ने पूछा। तो फूट पड़े। बोले- &#8216;केन्द्र के कांग्रेसी नेता रायलसीमा के नेताओं के हाथों बिक गए हैं। सोनिया के सिवा सब बिक गए हैं। मुझे अब भी सोनिया पर भरोसा। वह तेलंगाना देंगी।&#8217; मधु याक्षी के राजनीतिक कैरियर की अभी शुरूआत। सो उनने एक घर माफ किया। पर दिग्गज कांग्रेसी नेता वेंकटस्वामी ने यह घर भी माफ नहीं किया। वह आपे से बाहर थे। बोले- &#8216;तेलंगाना में सोनिया के लिए सम्मान था। पर हमें सबने धोखा दिया।&#8217; केशवराव की जुबां बंद थी। आंखों में आलाकमान के प्रति गुस्सा झलक रहा था। रायलसीमा के एक नेता की बात भी करते जाएं। केंद्र सरकार में मंत्री हैं रायलसीमा के साईं प्रताप। वह भी गुस्से में थे। वजह थी- रायलसीमा की अनदेखी। बोले- &#8216;शर्तों में रायलसीमा का जिक्र नहीं। हम न तटीय आंध्र के साथ खुश, न तेलंगाना के साथ। हमारी बात भी सुने आयोग। हमें भी अलग करें।&#8217; अब आज ज्वाइंट एक्शन कमेटी की मीटिंग में देखना। तेलंगाना के कांग्रेसी भी होंगे। टीडीपी वाले भी। इस्तीफों की होड़ लगेगी। हिंसा भड़केगी। कैसे चलेगा आंध्र का बजट सेशन। राष्ट्रपति राज की ओर बढ़ रहा है आंध्र। जैसा पिछली बार हुआ था। आग भड़की। तो कांग्रेस ने शुक्रवार को भी ब्रीफिंग रद्द कर दी। पर कबूतर के आंख बंद करने से बिल्ली नहीं भागती।</p>
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		<title>पवार की हरकतों पर कांग्रेस की तिरछी नजर</title>
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		<pubDate>Thu, 11 Feb 2010 04:09:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[देवीसिंह शेखावत के खिलाफ कोर्ट फैसले से कांग्रेस में हड़कंप। चौबीस अकबर रोड और दस जनपथ ने फौरी पड़ताल की। अभिषेक मनु सिंघवी को खबर नहीं थी। ब्रीफिंग खत्म हुई। तो उनने सवाल पूछने वाले से डिटेल पूछी। तभी एक मराठी मानुष खबरची ने कहा- &#8216;जमीन घोटाले का मामला नया नहीं। अभी तो कई और [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">देवीसिंह शेखावत के खिलाफ कोर्ट फैसले से कांग्रेस में हड़कंप। चौबीस अकबर रोड और दस जनपथ ने फौरी पड़ताल की। अभिषेक मनु सिंघवी को खबर नहीं थी। ब्रीफिंग खत्म हुई। तो उनने सवाल पूछने वाले से डिटेल पूछी। तभी एक मराठी मानुष खबरची ने कहा- &#8216;जमीन घोटाले का मामला नया नहीं। अभी तो कई और घोटाले खुलेंगे।&#8217; सिंघवी ने साफ किया- &#8216;राष्ट्रपति के परिवार को कानूनी कार्रवाई से छूट नहीं।&#8217; राष्ट्रपति भवन ने भी मुकदमे से नाता तोडा। कहा- &#8216;किसी निजी व्यक्ति के मामले से राष्ट्रपति भवन का ताल्लुक नहीं।&#8217; अपन को राष्ट्रपति चुनाव में हुए आरोप-प्रत्यारोप नहीं भूले। कांग्रेस ने तब यह कहकर पीछा छुड़ाया था- &#8216;उम्मीदवार पर तो कोई आरोप नहीं।&#8217; सवाल दागे गए। तो जवाब अब भी वही होगा। <span id="more-1537"></span>पर कांग्रेस को अब उन आरोपों से फिर दो-चार होना पड़ेगा। बुधवार तीखे सवालों का पहला दिन था। बात महाराष्ट्र की चली। तो बताते जाएं- महाराष्ट्र की राजनीतिक जंग पर भी हुए तीखे सवाल। उध्दव ठाकरे और अशोक चव्हाण आमने-सामने हो चुके। चव्हाण ने कहा- &#8216;शाहरुख खान की पिक्चर पर हिंसा हुई। तो उध्दव ठाकरे की सुरक्षा हटा लेंगे।&#8217; उध्दव को अच्छा मौका मिला। उनने सुरक्षा वापस भिजवाकर राजनीतिक गर्मी बढ़ा दी। अशोक चव्हाण से कहा- &#8216;आप तो अजमल कसाब की सुरक्षा करिए।&#8217; शिवसेना के हुड़दंगी बुधवार को सड़कों पर थे। एक खबरची ने कहा- &#8216;शिवसेना ने सिनेमा हालों में सांप छोड़ने की धमकी दी है।&#8217; अभिषेक ने राजनीति के गिरते स्तर पर सवाल उठाया। पर शिवसेना की ऐसी हरकतों पर बीजेपी चुप्पी साधे रही। अपन ने चार फरवरी को भी लिखा था- &#8216;बाल ठाकरे बीजेपी की लुटिया डुबाएंगे।&#8217; तब बिहार की बात थी। अब महाराष्ट्र भी जोड़ लीजिए। पर राजनीतिक दांव-पेंच की नई सुगबुगाहट बताते जाएं। शरद पवार के भतीजे अजीत पवार आजकल दिखाई नहीं दे रहे। सुनते हैं- बाल ठाकरे के संपर्क में हैं अजीत। याद है 2007 में क्या हुआ था कर्नाटक में। देवगौड़ा के बेटे कुमार स्वामी ने बीजेपी से मिलकर धर्मसिंह सरकार गिरा दी थी। देवगौड़ा अपने बेटे से नाता तोड़ने का नाटक करते रहे। पर देवगौड़ा के सारे विधायकों ने मिलकर बीजेपी-जेडीएस सरकार बनवा दी। कहीं शरद पवार भी भतीजे से वहीं खेल न करवा दें। तीस निर्दलीय विधायक बनवा सकते हैं अजीत-उध्दव सरकार। पवार विरोध भी करेंगे, समर्थन भी। इस सुगबुगाहट से दस जनपथ अनजान नहीं। महाराष्ट्र के एक खबरची के हवाले से खुद अभिषेक सुना रहे थे सुगबुगाहट। पर अभिषेक मनु बुधवार को महंगाई पर बुरे फंसे। सवाल तेल की कीमतों पर हुआ। तो उनने कीमतें बढ़ने से इनकार नहीं किया। कीमतें बढ़ाने की स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी। आजकल में बढ़ेंगी। इस बार गैस सिलेंडर और मिट्टी तेल भी। ज्यादा बढ़ीं। तो कांग्रेस विरोध करेगी। फिर कुछ &#8216;रोल बैक&#8217; होगा। पर तेल की कीमतों का असर महंगाई पर होगा। तो कंगाली में आटा गीला होने वाली बात होगी। फिर महंगाई का ठीकरा पवार पर नहीं। कांग्रेस के सिर ही फूटेगा। याद करा दें- महंगाई की मुद्रास्फीति 17 फीसदी से पार हो चुकी। जैसा नितिन गड़करी ने सोमवार को ऐलान किया था। बीजेपी बुधवार को सड़कों पर उतर आई। नितिन गड़करी, सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी सब जंतर-मंतर पर दिखे। पर बीजेपी का महंगाई पर धरना कांग्रेस को हजम नहीं हुआ। अभिषेक बोले- &#8216;बीजेपी कभी सकारात्मक राजनीति नहीं करती।&#8217; तभी किसी ने याद कराया- &#8216;एनडीए राज में तो महंगाई इतनी नहीं बढ़ी थी। फिर भी कांग्रेस सड़कों पर उतरी थी।&#8217; सिंघवी को काटो तो खून नहीं। बात आम आदमी और गरीबों की चली। तो उनने कहा- &#8216;पिछले साठ साल में असंगठित मजदूरों के लिए इतना नहीं हुआ। जितना मनमोहन सिंह के साढ़े पांच साल में।&#8217; अपन भौंच्चक रह गए। क्या नेहरू-इंदिरा-राजीव को पीछे छोड़ गए मनमोहन। अपन तो सोच ही रहे थे। तभी यही सवाल हो गया। फिर वही, काटो तो खून नहीं।</p>
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		<title>तो कांग्रेस का आपरेशन आजमगढ़ शुरू होगा अब</title>
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		<pubDate>Wed, 10 Feb 2010 08:06:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[तो दिग्गी राजा ने कांग्रेसी प्रवक्ताओं की हवा खिसका दी। अपन भी हैरान थे। दस जनपथ के इशारे बिना तो आजमगढ़ नहीं गए होंगे दिग्गीराजा। वही सच निकला। दिग्गी राजा ने सोनिया को आजमगढ़ दौरे की रपट दी। तो कांग्रेसी प्रवक्ताओं की घिग्गी बंध गई। अभिषेक मनु सिंघवी, मनीष तिवारी, शकील अहमद को पता ही [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">तो दिग्गी राजा ने कांग्रेसी प्रवक्ताओं की हवा खिसका दी। अपन भी हैरान थे। दस जनपथ के इशारे बिना तो आजमगढ़ नहीं गए होंगे दिग्गीराजा। वही सच निकला। दिग्गी राजा ने सोनिया को आजमगढ़ दौरे की रपट दी। तो कांग्रेसी प्रवक्ताओं की घिग्गी बंध गई। अभिषेक मनु सिंघवी, मनीष तिवारी, शकील अहमद को पता ही नहीं था। इसीलिए परेशानी का इजहार कर गए। प्रवक्ताओं को पता ही नहीं लगती- सोनिया-राहुल की रणनीति। खुद सोनिया गांधी और राहुल ने दिग्गी को सौंपा था आपरेशन आजमगढ़। जो दिग्गी राजा की रपट से पूरा नहीं हुआ। अलबत्ता आपरेशन तो अब शुरू होगा। सोनिया को सौंपी लिखित रपट दाखिल खारिज नहीं होगी। अलबत्ता रपट की एक-एक सिफारिश पर अमल होगा। <span id="more-1535"></span>उनने सिफारिश की है- &#8216;आजमगढ़ के मुस्लिम युवकों पर दायर मुकदमों की सुनवाई विशेष अदालत से कराई जाए। चार राज्यों में दायर मुकदमे एक अदालत के सुपुर्द किए जाएं। मुकदमों की सुनवाई तेजी से करवाई जाए।&#8217; उनने एक और सिफारिश भी की। जिसका जिक्र अपन बाद में करेंगे। यों तो ऊपर बताई सिफारिशों का ताल्लुक भी वोट बैंक की राजनीति से। पर वोट बैंक की राजनीति शुरू कैसे होगी। उसका खुलासा भी अपन करेंगे। वरुण और राहुल यूपी में जो कुछ कर रहे। उससे अपने कान खड़े होना स्वाभाविक। एक हिंदू वोट बैंक को रिझाने की कोशिश में। तो दूसरा मुस्लिम वोट बैंक को रिझाने की कोशिश में। दोनों की कोशिशें कामयाब रहीं। तो उत्तर प्रदेश सांप्रदायिकता का अखाडा बनेगा। कांग्रेस-बीजेपी की इस सांप्रदायिक जंग से बेखबर नहीं हैं मुलायम-माया। धु्रवीकरण होगा। तो जातीय राजनीति धरी रह जाएगी। सो मुलायम-माया की जवाबी कार्यवाही क्या होगी। अपन को उस पर भी नजर रखनी होगी। फिलहाल बात दिग्गी राजा की। तो उनने सबसे पहले बाटला हाऊस मुठभेड़ पर सवाल उठाए। फिर कहा- &#8216;मैं कौन होता हूं मुठभेड़ पर सवाल उठाने वाला।&#8217; यों बयानों से मुकरना नेताओं की पुरानी आदत। पर कई बार नदी में कंकड़ फेंककर भी देखते हैं नेता। सो मुठभेड़ की जांच वाली बात नदी में कंकड़ फेंकने वाली थी। पानी में उथल-पुथल ज्यादा हुई। तो पलटी मार गए दिग्गी राजा। सोनिया से मुलाकात के बाद उनने कहा- &#8216;मैंने तो कभी बाटला हाऊस मुठभेड़ पर सवाल नहीं उठाया। न मुठभेड़ की दुबारा जांच मांगी। मैं जानता हूं, सुप्रीम कोर्ट जांच की मांग खारिज कर चुकी। मैंने तो अलबत्ता स्पीडी ट्रायल की मांग की। वह कैसे हुई सांप्रदायिक।&#8217; स्पीडी ट्रायल की मांग का दिग्गी राजा को पूरा हक। आखिर बाटला हाऊस के बाद जमकर मुकदमे हुए। इंडियन मुजाहिद्दीन और आजमगढियों का संबंध गहरा निकला। तो आजमगढ़ के दर्जनों युवाओं पर मुकदमे दायर हुए। जिन चार राज्यों में मुकदमे दायर हुए। उनमें तीन कांग्रेस शासन वाले। सिर्फ गुजरात बीजेपी शासन वाला। दिल्ली, महाराष्ट्र और राजस्थान में तो कांग्रेस की सरकारें। सो आजमगढ़ियों का गुस्सा कांग्रेस पर ही। बड़ी मुश्किल से यूपी में पैर जमने लगे थे कांग्रेस के। आजमगढ़ियों का फच्चर कांग्रेस का &#8216;वाटर लू&#8217; बनने लगा। तो आपरेशन आजमगढ़ की रणनीति बनी। आपको पता होगा- दो साल पड़े हैं यूपी विधानसभा चुनाव में। आपरेशन आजमगढ़ उसी की तैयारी। दिग्गी राजा तो आजमगढ़ियों को समझाने गए थे- &#8216;स्पीडी ट्रायल और मुकदमे क्लब करने की मांग करें।&#8217; सभी राज्यों के मुकदमे एक जगह लाने में मुश्किल भी नहीं होगी। तीन कांग्रेसी राज्यों की सहमति तो सोनिया के इशारे पर हो जाएगी। अपन नहीं जानते- दिग्गी राजा की रपट सोनिया पीएम, एचएम को भेजेगी या नहीं। पर आखिरकार होगा वही। भले अभी न हो। राहुल गांधी के आजमगढ़ दौरे के बाद हो। तो बता दें- दिग्गी राजा ने सिफारिश की है- &#8216;राहुल गांधी को आजमगढ़ भेजा जाए।&#8217; आपरेशन आजमगढ़ तो राहुल के दौरे से शुरू होगा। इंतजार करिए।</p>
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		<title>पवार की ठाकरे वंदना से राहुल ब्रिगेड भड़की</title>
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		<pubDate>Tue, 09 Feb 2010 03:45:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[राहुल बाबा ने उस दिन गलती से बिहार की जगह गुजरात कह दिया। तो बवाल खड़ा हो गया। बवाल से नरेन्द्र मोदी गदगद हुए। अब वरुण बाबा ने मंहगाई पर दोधारी तलवार चलाई। तो फिर विवादों में फंस गए। उनने कहा &#8211; &#8216;केन्द्र में रावण, तो प्रदेश में सूर्पनखा।&#8217; दोनों बाबाओं का विवादों से पुराना [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">राहुल बाबा ने उस दिन गलती से बिहार की जगह गुजरात कह दिया। तो बवाल खड़ा हो गया। बवाल से नरेन्द्र मोदी गदगद हुए। अब वरुण बाबा ने मंहगाई पर दोधारी तलवार चलाई। तो फिर विवादों में फंस गए। उनने कहा &#8211; &#8216;केन्द्र में रावण, तो प्रदेश में सूर्पनखा।&#8217; दोनों बाबाओं का विवादों से पुराना रिश्ता। खैर सोमवार राहुल और वरुण का नहीं। आरक्षण और मुखपत्रों की जंग का रहा। जिनके अपने मुखपत्र नहीं। उनने ब्लागों से जंग-ए-एलान कर दिया। कई दिन अमर सिंह ब्लाग पर तीर चलाते रहे। अमर सिंह तो मुलायम के कुनबे पर तीर चला रहे थे। पर लालकृष्ण आडवाणी ने मनमोहन पर निशाना साधा है। अमर सिंह निकाल बाहर किए गए। मुलायम ने अमर सिंह की जगह दूसरा ठाकुर मोहन सिंह भिड़ा दिया। मोहन सिंह अब मनमोहन-माया पर उतना नहीं बरसते। जितना अमर सिंह पर। ऐसे लगता है- जैसे ठाकुरों की जंग शुरु हो गई हो। <span id="more-1532"></span>किसी ने मोहन सिंह से कहा- ठाकुर अमर सिंह के साथ जा रहे है। तो वह बोले &#8211; &#8216;महाराणा परम्परा वाले मेरे साथ। मानसिंह परम्परा वाले अमर सिंह के साथ।&#8217; जंग किस स्तर पर पहुंच गई। इसका अन्दाज आप इस बात से लगाइए। मोहन सिंह ने कहा अमर सिंह अपने सारे राज खोल दें। नही तो गुर्दों के बाद हार्ट अटैक हो जाएगा। मोहन सिंह ने अमर सिंह के बड़े भइया अमिताभ बच्चन को भी नहीं बख्शा। बोले- वह पैसे के लिए इज्जत और कला को गिरवी रखने वाले हैं। अमिताभ का एम्बेसडर गुजरात बनना रास नहीं आ रहा। पर बात हो रही थी लालकृष्ण आडवाणी के ब्लाग की। वह भाजपा अध्यक्ष नहीं रहे। लोकसभा में विपक्ष के नेता नहीं रहे। सो उनने ब्लाग से बयानबाजी शुरु कर दी। ताजा हमला मनमोहन सिंह पर। मनमोहन सिंह ने सदन में दिया वादा तोड़ दिया। कहा था- &#8216;जब तक 26/11 के साजिशकर्ताओं पर कार्रवाई नहीं होती। आतंकवादियों के ट्रेनिंग कैम्प खत्म नहीं होते। तब तक समग्र वार्ता नहीं होगी।&#8217; पर अब खुद भारत ने भेजा है न्यौता। तो आडवाणी ने न्यौते को अमरीका का दबाव बताया। बात बेसिर पैर की भी नही। कुछ दिन पहले ही आए थे। बराक ओबामा के दूत रिचर्ड होलबु्रक। दिल्ली आकर इस्लामाबाद गए थे। आडवाणी के आरोप पर आप भरोसा भले न करें। पर सोमवार को रिचर्ड होलब्रुक ने कहा &#8211; अफगानिस्तान में शान्ति का कश्मीर से सीधा रिश्ता। मनमोहन सिंह की बात अपन छोड़ भी दें। तो कांग्रेस ने ताल ठोककर कहा था- जब तक पाकिस्तान कार्रवाई नहीं करता। तब तक बात नहीं होगी। पर सोमवार को कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी की जुबान बदली हुई थी। पूछा तो बोले- &#8216;पाक ने माना है उसकी धरती का भारत के खिलाफ इस्तेमाल हुआ। भारत पर बातचीत का अन्तरराष्ट्रीय दबाव भी।&#8217; सोमवार को शाह महमूद कुरैशी ने भी खुलासा किया। उनने कहा &#8211; &#8216;हमने नहीं भारत ने घुटने टेके।&#8217; तो सही हुआ न आडवाणी का अमरीकी दबाव का आरोप। पर बात रह गई मुखपत्रों की। शिवसेना का मुखपत्र सामना तो रोज सुर्खियों में होता ही था। अब एनसीपी का मुखपत्र &#8216;राष्ट्रवादी&#8217; भी विवादों में। राष्ट्रवादी ने लिखा- चीनी नहीं खाने से कोई मर नहीं जाएगा। बात मंहगाई की चली। तो बता दें &#8211; नितिन गड़करी ने सोमवार को जोरदार विस्फोट किया। उनने आरोप लगाया है &#8211; कांग्रेस -एनसीपी नेताओं की कम्पनियों ने तीन हजार फीसदी मुनाफा कमाया। उनने पीएम को चुनौती दी- आप खुद उन कम्पनियों का नाम बता दो। मंहगाई के घोटाले का असर संसद के बजट सत्र में दिखेगा। जब विपक्ष मिलकर मनमोहन सरकार घेरेंगे। पर बात हो रही थी मुखपत्र की। तो बाल ठाकरे ने सामना में लिखा है- आईपीएल मैचों पर फैसला एकाध दिन में करेंगे। पता है न &#8211; शरद पवार ने इतवार रात बाल ठाकरे से मिलकर गुहार लगाई थी- मैच होने दें। ठाकरे को यह भी बताया गया- आस्ट्रेलियाई टीम नहीं खेलेगी। अलबत्ता हर टीम में कुछ आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी। ठाकरे-पवार की मुलाकात से अशोक चव्हाण के माथे पर बल। जब राहुल गांधी शिवसेना से दो-दो हाथ कर रहे हो। ऐसे में पवार का घुटने टेकना अखरना ही था। सो सोनिया से मुलाकात के बाद पवार पर भड़कते हुए मुम्बई लौटे। पर मनीश तिवारी और शकील अहमद जुबान खोलने से बचे। बड़ो की लड़ाई में छोटे न ही बोले तो अच्छा।</p>
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		<title>कांग्रेस वर्किंग कमेटी पर दिखी राहुल की छाया</title>
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		<pubDate>Sat, 06 Feb 2010 04:15:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग अर्से बाद हुई। महंगाई पर पिछली मीटिंग पंद्रह अगस्त के बाद उन्नीस अगस्त को हुई थी। अब छब्बीस जनवरी के बाद पांच फरवरी को। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के बीच महंगाई और बढ़ गई। वर्किंग कमेटी के दो मेंबर घट गए। शिवराज पाटिल पंजाब के गवर्नर हो गए। उर्मिला [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग अर्से बाद हुई। महंगाई पर पिछली मीटिंग पंद्रह अगस्त के बाद उन्नीस अगस्त को हुई थी। अब छब्बीस जनवरी के बाद पांच फरवरी को। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के बीच महंगाई और बढ़ गई। वर्किंग कमेटी के दो मेंबर घट गए। शिवराज पाटिल पंजाब के गवर्नर हो गए। उर्मिला सिंह हिमाचल की। गैर कांग्रेसी सरकारों पर नंबरदार बनाकर भेज दिए। अर्जुन सिंह और सीके जाफर शरीफ की सेहत ने इजाजत नहीं दी। या कोपभवन में बैठे हैं दोनों। अर्जुन बेटी को टिकट नहीं दिला पाए थे। तो जाफर शरीफ पोते के लिए भटक रहे थे। नारायणस्वामी तो कहीं अटक गए होंगे। पर राहुल गांधी नहीं आए। तो महाराष्ट्र और पांडिचेरी के मुख्यमंत्री कैसे आते। कांग्रेस के &#8216;युवराज&#8217; महाराष्ट्र-पांडिचेरी के दौरे पर थे। सो दोनों &#8216;जी हुजूरी&#8217; में लगे थे। जी हुजूरी का जलवा तो मुंबई में दिखा। जहां गृहराज्यमंत्री रमेश भागवे ने राहुल के जूते उठा लिए। <span id="more-1526"></span>बाल ठाकरे ने अशोक चव्हाण पर चुटकी ली थी- &#8216;पिता शंकरराव चव्हाण ने संजय गांधी का जूता उठाया था। तो क्या अशोक चव्हाण अब राहुल का जूता उठाएंगे।&#8217; पर अशोक चव्हाण पर भारी पड़ गए रमेश भागवे। बात संजय गांधी की चली। तो बताते जाएं- बीजेपी अब वरुण को युवा मोर्चे की कमान देगी। पर बात राहुल की। शिवसेना या बीजेपी लाख मीन-मेख निकालें। जमीनी राजनीति कैसी होनी चाहिए। यह तो दिखा ही रहे हैं राहुल। मुंबई में लोकल ट्रेन पर चढ़े। तो एटीएम से पैसे भी निकाले। उध्दव ठाकरे इसे नौटंकी कहें, तो कहते रहें। राजनीति नौटंकी के सिवा रह भी क्या गई। अब यह राहुल की नौटंकी ही तो थी। जो उनने स्टूडेंट्स से कहा- &#8216;राजनीति में परिवारवाद के दिन अब लद गए।&#8217; सबूत तो वह खुद सामने खड़े थे। युवक कांग्रेस के नए अध्यक्ष राजीव सातव भी। पर बात वर्किंग कमेटी की। बात संगठन चुनाव, बजट, तेलंगाना और सवा सौ साला समारोह की भी हुई। पर मीटिंग में छाई रही महंगाई। जैसा अपन ने पहले लिखा था। शरद पवार निशाने पर थे। विलासराव देशमुख, सत्यव्रत चतुर्वेदी और आरके धवन ने मोर्चा खोला। न मनमोहन सिंह ने अपने मंत्री का बचाव किया। न सोनिया गांधी ने घटक दल के नेता पर हमले रोके। तीनों ने पवार का नाम नहीं लिया। शुरूआत की पवार के घोर विरोधी विलासराव ने। बोले- &#8216;कोई मंत्री कीमतें बढ़ने वाले बयान कैसे दे सकता है। मंत्री जब-जब बयान देते हैं। अगले दिन महंगाई और बढ़ जाती है।&#8217; उनने अनाज की सरकारी खरीद नीति पर भी निशाना साधा। कहा- &#8216;सीधे किसान से खरीदकर मार्केट में भेजना चाहिए अनाज।&#8217; सत्यव्रत चतुर्वेदी मुंह पर जूता मारने के माहिर। अमर सिंह का बाजा वही बजाया करते थे। वर्किंग कमेटी में उनने पवार का बजाया। बोले- &#8216;बेतुके बयान कोई मंत्री दे, हैरानी वाली बात है। बयानों से जमाखोरी बढ़ा रहे थे मंत्री।&#8217; उनने कहा- &#8216;असल में यह सप्लायर और रिटेलर का खेल। जिसे रोकने में नाकाम रही केंद्र सरकार। कांग्रेसी राज्य सरकारें भी नाकाम रहीं।&#8217; सत्यव्रत जब बोल रहे थे। तो अशोक गहलोत ने टोका। बताया- राजस्थान में सरकार ने क्या-क्या कदम उठाए। बताते-बताते गहलोत वायदा बाजार पर बरसे। कहा- &#8216;खाद्यान्न में वायदा बाजार को अभी भी इजाजत। जो बंद होनी चाहिए।&#8217; गहलोत ने सत्यव्रत को टोका था। तो मनमोहन सिंह ने गहलोत को टोका। कहा- &#8216;जिंदगी जरूरीरियात की चीजों के वायदा बाजार पर रोक लग चुकी।&#8217; पवार पर तीसरे हमलावर थे धवन। वह भी पवार का नाम लिए बिना बोले- &#8216;किसी मंत्री ने प्रधानमंत्री को कैसे घसीटा। यह घोर आपत्तिजनक। प्रधानमंत्री सबसे ऊपर होते हैं।&#8217; याद है- पवार ने महंगाई के लिए पीएम को भी घसीटा था। खैर गहलोत की तरह शीला दीक्षित ने भी सफाई दी। कर्ण सिंह का सुझाव जमाखोरी के खिलाफ नए कानून का था। यों हमला तो केंद्र सरकार पर रहा। पर अजीत जोगी जैसों ने ठीकरा राज्य सरकारों पर फोड़ने का फार्मूला भी सुझाया। जो चला नहीं। बात बजट की चली। तो सबने &#8216;आम आदमी&#8217; का बजट बनाने की सलाह दी। जिसे प्रणव दा ने सिर-आंखों पर लिया। मीटिंग खत्म ही होने वाली थी। तभी एके एंटनी महाराष्ट्र पर बोले। उनने राहुल के बयानों और दौरे का जिक्र तो नहीं किया। पर ठाकरे परिवार की हिंदी भाषियों के खिलाफ मुहिम को खतरनाक बताया। कहा- &#8216;हालात बेहद नाजुक। सावधानी से संभालने होंगे।&#8217;</p>
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		<title>पाक में जेहाद के नारे, भारत में पाक से गुफ्तगू की तैयारी</title>
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		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 07:38:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[उधर न्यूयार्क से खबर आई- &#8216;भारत के खिलाफ आतंकियों का इस्तेमाल कर रहा है पाक।&#8217; इधर दिल्ली की खबर है- &#8216;भारत फिर से गुफ्तगू को तैयार।&#8217; शर्म-अल-शेख में गड़बड़झाले के बाद पीएम ने संसद में वादा किया था- &#8216;बिना ठोस कार्रवाई का सबूत मिले बात नहीं होगी।&#8217; दो दिन पहले जब चिदंबरम-एंटनी ने एक साथ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">उधर न्यूयार्क से खबर आई- &#8216;भारत के खिलाफ आतंकियों का इस्तेमाल कर रहा है पाक।&#8217; इधर दिल्ली की खबर है- &#8216;भारत फिर से गुफ्तगू को तैयार।&#8217; शर्म-अल-शेख में गड़बड़झाले के बाद पीएम ने संसद में वादा किया था- &#8216;बिना ठोस कार्रवाई का सबूत मिले बात नहीं होगी।&#8217; दो दिन पहले जब चिदंबरम-एंटनी ने एक साथ कहा- &#8216;पाक ने आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की है।&#8217; तो अपना माथा ठनका था। दोनों से बयान दिलाकर टैस्ट कर रही थी सरकार। विपक्ष ने कड़े तेवर नहीं दिखाए। तो बुधवार को एसएम कृष्णा ने जुबान खोल दी। कुवैत जा रहे कृष्णा रास्ते में खबरचियों से बोले- &#8216;पाक कसाब के बयान को सबूत मानने को राजी हो गया है। यह संबंध सुधारने में सकारात्मक कदम है।&#8217; <span id="more-1524"></span>पूछा गया- क्या समग्र बात शुरू करने का वक्त आ गया। तो एसएम कृष्णा बोले- &#8216;भारत ने गुफ्तगू के दरवाजे कभी बंद नहीं किए। पाक जांच आगे बढ़ाए, तो क्यों नहीं।&#8217; पर अपन ने न्यूयार्क से आई खबर का जिक्र किया। अमेरिकी इंटेलिजेंस चीफ डेनिस ब्लेयर ने सिनेट काउंसिल के सामने  कहा- &#8216;भारत के खिलाफ आतंकवादियों का इस्तेमाल कर रहा है पाक। पाक का मकसद भारत की सेना और आर्थिक ठिकानों को नुकसान पहुंचाना।&#8217; खाली पीली रपट नहीं। अलबत्ता ट्रेनिंग कैंपों के वीडियो दिखाए गए मीटिंग में। पर मनमोहन सिंह शर्म-अल-शेख दोहराने को तैयार। फिलहाल तो सार्क मीटिंग के बहाने सिर्फ चिदंबरम जाएंगे इस्लामाबाद। फिर बारी आएगी विदेश सचिव निरुपमा राव की। गुफ्तगू का न्योता जा भी चुका। बात पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब की चल पड़ी। तो बताते जाएं- कसाब कोर्ट में रोज बयान बदल रहा। कहीं अपने ही बिछाए जाल में न फंस जाएं अपन। जाल बिछाकर फंसना-फंसाना कांग्रेसियों की फिदरत। पाक से गुफ्तगू का ताल्लुक भी वोट बैंक से। जैसे बाटला हाऊस मुठभेड़ का। आप भूले नहीं होंगे- तेरह सितंबर 2008 के दिल्ली में हुए बम धमाके। छब्बीस लोग मारे गए थे धमाकों में। छठे दिन दिल्ली पुलिस ने आतंकियों को घेरा था बाटला हाऊस के एक फ्लैट में। अल्पसंख्यक वोटों के लिए बार-बार मुठभेड़ को फर्जी बताते हैं कांग्रेसी। इंडियन मुजाहिद्दीन की असलियत को कबूल नहीं रहे कांग्रेसी। नरेंद्र मोदी ने जब मुंबई पर हमले में घर के भेदियों का सवाल उठाया। तो कांग्रेस ने कड़ा ऐतराज किया था। अब पी चिदंबरम ने मान लिया- &#8216;पाकिस्तानी आतंकियों का एक भारतीय मददगार अबू जिंदाल भी था।&#8217; बात इंडियन मुजाहिद्दीन की। तो इंडियन मुजाहिद्दीन के बशीर उर्फ आतिफ, साजिद, सैफ, जीशान, शहजाद, जुनैद, जिया उर रहमान, साकिब निसार और मोहम्मद शकील ने किए थे दिल्ली में धमाके। बाटला हाऊस मुठभेड़ में मारे गए थे बशीर उर्फ आतिक और साजिद। मौके पर पकड़ा गया था सैफ। उसी दिन ही पकड़ लिया था जीशान। सभी के सभी आजमगढ़ के। हाल ही में आजमगढ़ से ही पकड़ा गया शहजाद। बात मुठभेड़ की। तो मुठभेड़ में मारे गए थे जांबाज पुलिस इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा। जिसे पिछली 26 जनवरी को मरणोपरांत दिया गया अशोकचक्र। पर कांग्रेसी मुठभेड़ को फर्जी बताने से बाज नहीं आ रहे। तब अब्दुल रहमान अंतुले और दिग्विजय सिंह ने फर्जी कहा था। पीएम की फटकार से तब तो चुप्पी साध ली थी दोनों ने। पर बार-बार सवाल न उठे। सो जांच करा दी थी मानवाधिकार आयोग से। असली पाई गई थी मुठभेड़। पर अब दिग्विजय सिंह ने मुठभेड़ को फिर फर्जी बता दिया। बुधवार को संजरपुर में बोले- &#8216;बाटला हाऊस में मारे गए युवक को पांच गोली कैसे लगी। मुठभेड़ में सिर पर गोली लगना तो नामुमकिन। जांच आयोग ने शिकायतकर्ताओं से पूछताछ तक नहीं की।&#8217; इस पर राजनीतिक बवाल खड़ा हुआ। बीजेपी ने मुस्लिम वोट बैंक की घटिया राजनीति पर हमला बोला। तो चौबीस घंटे में यू टर्न ले ली दिग्गी राजा ने। आजमगढ़ में बोले- &#8216; मैं यहां मुठभेड़ की जांच करने नहीं आया। मैं कैसे कह सकता हूं- मुठभेड़ फर्जी थी या असली। मैं तो यह देखने आया था- आजमगढ़ के युवक रास्ता क्यों भटक गए। आतंकवाद की नर्सरी के नाम से क्यों बदनाम हो रहा है आजमगढ़।&#8217; पर अपन बात कर रहे थे पाक से गुफ्तगू की। गुफ्तगू की खबर उसी दिन आई। जिस दिन मुजफ्फराबाद में जमात-उद-दावा के जलसे की खबर आई। पाक ने कोई कार्रवाई नहीं की हाफिज सईद पर। अब वह जलसों में खुलेआम लगवा रहा है भारत के खिलाफ जेहाद के नारे।</p>
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		<title>बाल ठाकरे अब बिहार में बीजेपी की लुटिया डुबोएंगे</title>
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		<pubDate>Thu, 04 Feb 2010 07:36:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[बीजेपी 2004 का चुनाव हारी। तो प्रमोद महाजन निशाने पर थे। हर ऐरा-गैरा कहता था- &#8216;प्रमोद के फाइव स्टार कल्चर ने पार्टी का बंटाधार किया।&#8217; अब समाजवादी अपने अमर सिंह पर भी वही आरोप लगा रहे। समाजवादी पार्टी से निकाले गए। तो अमर सिंह अब बेपेंदे के लौटे जैसे दिखने लगे। दिन में मायावती की [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">बीजेपी 2004 का चुनाव हारी। तो प्रमोद महाजन निशाने पर थे। हर ऐरा-गैरा कहता था- &#8216;प्रमोद के फाइव स्टार कल्चर ने पार्टी का बंटाधार किया।&#8217; अब समाजवादी अपने अमर सिंह पर भी वही आरोप लगा रहे। समाजवादी पार्टी से निकाले गए। तो अमर सिंह अब बेपेंदे के लौटे जैसे दिखने लगे। दिन में मायावती की तारीफ। रात में सोनिया गांधी की। कभी सोनिया को इटेलियन कहते नहीं थकते थे। अब बोले- &#8216;मेरा डीएनए कांग्रेस विरोधी नहीं।&#8217; अब उन्हें कांग्रेस मुलायम से बेहतर लगने लगी। पर अपन बात कर रहे थे फाइव स्टार कल्चर की। यों तो प्रमोद भी उसी साल मुंबई वर्किंग कमेटी में सादगी दिखा गए थे। पर जबसे नितिन गड़करी आए हैं। तब से सादगी का ढोल ज्यादा ही पीटा जाने लगा। पहले गड़करी के लिए फूल और बुक्के लाने पर रोक लगी। अब इंदौर अधिवेशन में तंबुओं में आवास। और दाल-रोटी, एक-आध सब्जी का प्रचार। प्रमोद ने रसगुल्लों, आइसक्रीम, जलेबियों की जगह गुड रखवा दिया था। इंदौर वाले मीठे में भी कुछ ऐसा ही परोसेंगे। यों यह खाने-पीने की ठाठ वाले इंदौर की परंपरा नहीं। <span id="more-1522"></span>पर इंदौरियों को किफायत की हिदायत जा चुकी। विजय वर्गीज को गाने सुनाकर मेहमाननवाजी करनी होगी। पर बात चली थी अमर सिंह के सोनिया को इटेलियन कहने की। जो अब बाल ठाकरे ने कहा। तो जयंती नटराजन भड़क गई। भड़कने की वजह अपन नहीं समझ पाए। कोई अपनी जड़ें नहीं छोड़ता। सोनिया ने भी अपना इटली वाला मकान अपने नाम पर ही रखा हुआ है। फिर भड़कने की क्या बात। बाल ठाकरे किसी मुकदमे से नहीं डरते। जैसा जयंती नटराजन ने डराने की कोशिश की। वैसे बाल ठाकरे भी अब आपे में नहीं रहे। बुढ़ापे का असर सोच पर भी दिखने लगा। मराठीवाद की संकीर्णता ने शिवसेना की लुटिया डुबो दी। पर राजनीतिक समझ में मैच्योरिटी नहीं आई। बाल ठाकरे-राज ठाकरे की जंग में बीजेपी का भी महाराष्ट्र में नुकसान हुआ। अब बारी बिहार की। अपनी सनक में खुद तो डूबे हैं सनम, बीजेपी को भी ले डूबेंगे। राहुल के राजनीतिक स्टंट को नहीं समझ पा रहे ठाकरे। राहुल ने बिहार विधानसभा चुनाव की शुरूआत की है मुंबई से। आपको याद होगा- अशोक चव्हाण ने जब ड्राइवरों के लिए मराठी जरूरी की। तो दिल्ली से घुड़की मिली थी। चव्हाण की रणनीति इस साल होने वाले मुंबई महापालिका चुनाव थे। पर मुंबई महापालिका से ज्यादा महत्वपूर्ण है बिहार एसेंबली। सो फटकार के बाद चव्हाण को हिंदी-गुजराती जोड़ना पड़ा। मुंबई से बिहार का चुनाव अभियान तभी शुरू हो गया था। राहुल ने अब यूपी-बिहार के एनएसजी को मुंबई का तारणहार बताया। तो उसी प्रचार अभियान को आगे बढ़ाया। दिग्गी राजा ने जो बात कही- &#8216;एनएसजी में सारे देश के जवान।&#8217; तो यह बात उन्हें राहुल को भी बतानी चाहिए थी। जबकि राहुल ने कहा- &#8216;यूपी-बिहार के एनएसजी जवानों ने मुंबई को बचाया।&#8217; तो उनने एनएसजी की राष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचाया। विरोध तो खुद एनएसजी को करना चाहिए। जिसमें राहुल ने क्षेत्रवाद के बीज बोए। वोट बैंक के लिए एनएसजी को हथियार बनाना घोर आपत्तिजनक। अपन राहुल की कार्यशैली से असहमत नहीं। पर वोट बैंक की ओछी राजनीति से पूरी तरह असहमत। क्या एनएसजी में महाराष्ट्रियन जवान नहीं? राहुल ने एनएसजी को गैर महाराष्ट्रियन क्यों कहा? बात राहुल की  कार्यशैली की चली। तो युवक कांग्रेस की बात भी करते जाएं। राहुल दो साल से अंदरूनी लोकतंत्र और पारदर्शिता का ढोल बजा रहे थे। केजे राव से युवक कांग्रेस के चुनाव करवाए। पर ढोल की पोल बुधवार को खुल गई। जब लोकतंत्र और पारदर्शिता धरी रह गई। अशोक गहलोत के दूर के रिश्तेदार युवक कांग्रेस के नए अध्यक्ष तैनात हो गए। उम्र भी पैंतीस से ज्यादा। राहुल-गहलोत के करीबी जितेंद्र सिंह के हाथों हुआ राजीव सात्व का ऐलान। युवक कांग्रेस के नए अध्यक्ष महाराष्ट्र से पहली बार एमएलए बने थे। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी महाराष्ट्र बीजेपी के अध्यक्ष थे। तो राजीव सात्व महाराष्ट्र युवक कांग्रेस के अध्यक्ष थे। दोनों की नियुक्ति बंद कमरे के दांव-पेंचों से हुई। पारदर्शिता कहीं नहीं दिखी। अमर सिंह को भले ही कांग्रेस में पारदर्शिता दिखने लगी हो।</p>
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		<title>महंगाई के मोल-तोल में सरकार एक कदम आगे, दो कदम पीछे</title>
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		<pubDate>Sat, 30 Jan 2010 04:36:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[महंगाई पर केबिनेट कमेटी हुई। तो शरद पवार ने दावा ठोका था- &#8216;अब महंगाई घटनी शुरू हो जाएगी। कम से कम चीनी के दाम जल्द घटेंगे।&#8217; प्रेस कांफ्रेंस का ऐलान छपा। अखबारों की स्याही सूखी नहीं थी। खुद पवार ने दूध की किल्लत का रोना रो दिया। बात पवार की चल ही रही। तो बताते [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">महंगाई पर केबिनेट कमेटी हुई। तो शरद पवार ने दावा ठोका था- &#8216;अब महंगाई घटनी शुरू हो जाएगी। कम से कम चीनी के दाम जल्द घटेंगे।&#8217; प्रेस कांफ्रेंस का ऐलान छपा। अखबारों की स्याही सूखी नहीं थी। खुद पवार ने दूध की किल्लत का रोना रो दिया। बात पवार की चल ही रही। तो बताते जाएं- शरद पवार का मंत्रालय ही परस्पर विरोधी। उनका मंत्रालय है- कृषि एवं खाद्य आपूर्ति। एक तरफ उनका काम फसलों और किसानों का हित देखना। देश को अनाज सही समय पर मिलता रहे। इसकी निगरानी करना। दूसरी तरफ आम आदमी को वाजिब कीमत पर खाद्य आपूर्ति करना। अब अगर वह किसानों के हितों की रक्षा करें। तो किसानों को वाजिब कीमत दिलाने की जद्दोजहद करेंगे। किसानों की चीजों के दाम बढ़ेंगे। तो उसका असर बाजार पर होगा ही। यानी आम आदमी को अनाज महंगा मिलेगा ही। सो हुआ ना परस्पर विरोधी मंत्रालय। किसके हितों की रक्षा करें? किसानों की या उपभोक्ताओं की। <span id="more-1517"></span>सो कांग्रेस में मुहिम शुरू हो चुकी। कृषि को खाद्य आपूर्ति से अलग किया जाए। पर शरद पवार को यह कतई मंजूर नहीं। वह इतने कम वजनदार नेता भी नहीं। जो कृषि या खाद्य आपूर्ति में से एक चुन लें। देश के रक्षामंत्री रहे हैं शरद पवार। दो बार मुख्यमंत्री रहे हैं शरद पवार। कांग्रेस पर कुतरने की कोशिश करेगी। तो राजनीतिक टकराव मोल लेगी। पवार ने दो टूक कह भी दिया- &#8216;ये मंत्रालय मेरे पास छह साल से। किसी ने मुझे नहीं कहा- इसका बंटवारा होना चाहिए। इस तरह की मांग का कोई मतलब ही नहीं। कीमतें तो पांच साल से स्थिर थी। तब भी मैं मंत्री था। एक ही साल से तो बढ़ रही हैं।&#8217; पवार का यह बयान पीएम को चुनौती नहीं। गठबंधन की राजनीति में पीएम के हाथ में सब कुछ होता। तो करुणानिधि मंत्री और मंत्रालय तय न करते। पहली सरकार में लालू और दूसरे में ममता रेल पर खम न ठोकते। पर बात महंगाई की। जबसे मुख्यमंत्रियों की मीटिंग टली। तबसे कांग्रेस वर्किंग कमेटी पहले होने की चर्चा। वर्किंग कमेटी में शरद पवार पर हमले की अब कोई गुंजाइश नहीं। पवार पहले ही हमले तेज कर चुके। जिसका सबसे पहला ऐलान तो अपन ने ही तेईस जनवरी को किया था। जब लिखा- &#8216;महंगाई का ठीकरा फोड़ा तो पवार भी मुंहतोड़ जवाब देंगे।&#8217; अब उनने कह दिया है- &#8216;मंत्रालय का कोई टुकड़ा नहीं देंगे।&#8217; पर असल बात मंत्रालय की नहीं। बात महंगाई की। जिसके घटने का दावा ठोका था सरकार ने। पर गुरुवार को मुद्रास्फीति की दर और बढ़कर आई। अब तो तेरह साल के रिकार्ड टूट गए महंगाई के। खाने-पीने के चीजों की मुद्रास्फीति साढ़े सत्रह फीसदी तक जा पहुंची। जीडीपी साढ़े सात फीसदी हो जाए तो काफी। यानी आमदनी चवन्नी, खर्चा रुपैय्या। जैसी उम्मीद थी, वैसा हुआ। चार महीने पहले मकानों के लिए कर्ज की ब्याज दर पर हायतौबा मची। तो सोनिया के दखल से ब्याज दर घटी थी। हालांकि वाजपेयी के जमाने वाले सात फीसदी पर नहीं आई। पर बारह-तेरह से घटकर आठ-नौ फीसदी तो आई ही। मकानों की कीमतें भी घटी। मिडिल क्लास यानी आम आदमी फिर मकान के चक्कर में पड़ गया। अभी सपना देखा ही था। शुक्रवार को आरबीआई ने तोड़ना शुरू कर दिया। बैंकों का सीआरआर पौना फीसदी बढ़ा दिया। यों दावा किया है- अभी ब्याज नहीं बढ़ेगा। पर कितने दिन? बजट के बाद तो बढ़ेगा ही। बाजार में अढ़तालीस हजार करोड़ पड़ा था। जिसे आम आदमी कर्ज लेकर इस्तेमाल करता। अब नए सीआरआर से छत्तीस हजार करोड़ आरबीआई ले लेगा। बाकी बचेगा बारह हजार करोड़। यानी बैंकों के पास पैसा ही नहीं होगा। तो बेचारा आम आदमी लोन लेगा कहां से। सरकार की नीति एक कदम आगे बढ़ने की। तो दो कदम पीछे हटने की।</p>
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		<title>कंगारूओं की करतूतों से भरा सब्र का प्याला</title>
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		<pubDate>Fri, 29 Jan 2010 04:31:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आस्ट्रेलिया में हमले थम नहीं रहे। गुरुवार को फिर ताजा खबर आ गई। एक ही दिन में तीन हमले। तीन टैक्सी ड्राईवर निशाने पर थे। चौथा पिज्जा डिलिवरी करता था। अपन खुद ही हमलों की छानबीन कर लें। पिछले एक साल में जितने हमले हुए। सभी छोटे-मोटे करिंदों पर थे। या फिर उन भारतीय छात्रों [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">आस्ट्रेलिया में हमले थम नहीं रहे। गुरुवार को फिर ताजा खबर आ गई। एक ही दिन में तीन हमले। तीन टैक्सी ड्राईवर निशाने पर थे। चौथा पिज्जा डिलिवरी करता था। अपन खुद ही हमलों की छानबीन कर लें। पिछले एक साल में जितने हमले हुए। सभी छोटे-मोटे करिंदों पर थे। या फिर उन भारतीय छात्रों पर। जो पढ़ाई के साथ काम भी करते थे। किसी रेस्टोरेंट, होटल, पेट्रोलपंप या डिपार्टमेंटल स्टोर पर। अपन ने पहली नजर में रंगभेदी हमले माने। गोरों को गेहुंआ रंग पसंद नहीं आता। शायद &#8216;बिग ब्रदर&#8217; में शिल्पा शेट्टी से हुआ दुर्व्यवहार का असर होगा। सो अपन उसी लाईन पर सोचते रहे। सोचो, जेड गुड्डी हमलावर क्यों थी। शिल्पा को सबसे ज्यादा परेशान तो उसी ने किया। तो अपन सहज ही नतीजे पर पहुंचेंगे। <span id="more-1515"></span>जेड गुड्डी को शिल्पा से खतरा था। खतरा था- &#8216;वह गेहूंआ रंग की भारतीय &#8216;बिग ब्रदर&#8217; का ताज ले जाएगी।&#8217; गुड्डी का डर सही ही तो था। अब वही डर आस्ट्रेलियाई युवकों में। डर है- ज्यादा बुध्दि वाले भारतीय सारी नौकरियां खा जाएंगे। डर गलत भी नहीं। अपन भारतीयों से सिर्फ आस्ट्रेलिया नहीं डर रहा। अमेरिका को भी डर सता रहा भारतीय बुध्दि का। गुरुवार को ही अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा ने कहा- &#8216;भारत, जर्मनी और चीन आगे निकल जाएंगे।&#8217; अमेरिका में मंदी की मार पड़ी। तो सबसे पहले भारतीयों की नौकरियां गई। दुनिया के बाकी देशों से भी भारतीय ही ज्यादा तादाद में लौटे। पर बात आस्ट्रेलिया की। जिस लंदन की धरती पर शिल्पा शेट्टी को रंगभेद झेलना पड़ा। गुड़िया सी खिलखिलाती शिल्पा को गुड्डी के तानों ने रुलाया। उसी लंदन की धरती पर रंगभेद की नई बहस हुई। बहस हुई- अपने विदेश मंत्री एसएम कृष्णा की आस्ट्रेलियाई विदेशमंत्री स्टीफन स्मिथ से। बुधवार को एक घंटा तर्क-वितर्क हुए। कुतर्क भी हुए होंगे। इसी महीने के शुरू में हत्या हुई थी नितिन गर्ग की। उससे चार दिन पहले रणजोध सिंह की लाश मिली थी। बुधवार को ही रणजोध की हत्या में नवविवाहित जोड़ा गिरफ्तार हुआ। अभी यह खबर नहीं आई। जोड़ा बेरोजगार था। या नौकरीशुदा। बेरोजगार निकला। तो रंगभेद नहीं, यह रोजगार के मौकों की लड़ाई। कुछ साल पहले चीनी बन रहे थे निशाना। अब भारतीय। पर अपन बात कर रहे थे कृष्णा-स्मिथ गुफ्तगू की। तो स्मिथ रंगभेद का मामला मानने को तैयार नहीं। नितिन गर्ग की हत्या के बाद आस्ट्रेलियाई उपप्रधानमंत्री ने कहा था- &#8216;दुनिया के हर बड़े शहर में होती हैं हत्याएं। क्या मुंबई, लंदन, वाशिंगटन, पेरिस में नहीं होती। मेलबर्न भी इसी तरह महानगर।&#8217; अपना भड़कना स्वाभाविक ही था। सो आस्ट्रेलिया ने सफाई दी। इसके बाद तो तीन बार लिखित सफाई दे चुका। ताजा सफाई विक्टोरिया पुलिस ने भेजी। कहा- &#8216;ज्यादातर हमलावर किशोर उम्र के।&#8217; रिपोर्ट में कहा है- &#8216;सालभर में 18 मामले आए। दो तो ट्रेन हादसे। तीन मामलों का सुराग नहीं मिला। बाकी के 13 मामलों में 33 पकड़े गए। पकड़े गए आधे किशोर उम्र के।&#8217; अब आप इसी से अंदाजा लगा लें। आपको भी रंगभेद से ज्यादा रोजगार की लड़ाई नहीं दिखती। पर बात कृष्णा-स्मिथ गुफ्तगू की। तो स्मिथ ने बताया- &#8216;आस्ट्रेलिया भी फिक्रमंद। मेरी रहनुमाई में हाई-लेवल वर्किंग ग्रूप बन चुका। जो इस मुद्दे की निगरानी करेगा।&#8217; पर स्मिथ अड़े रहे उसी बात पर- &#8216;सामान्य अपराध।&#8217; कृष्णा ने कहा- &#8216;भारत-आस्ट्रेलिया रिश्तों में खटास न आए। यह जिम्मेदारी अब आस्ट्रेलिया की।&#8217; अपन इस भाषा को नरम तो नहीं कह सकते। पर स्मिथ के अपन को मिले भरोसे की खबर छप रही थी। तभी गुरुवार तड़के चार और भारतीयों पर हमले की खबर आ गई। कृष्णा लंदन में फिर स्मिथ से मिले। दिल्ली में प्रणीत कौर। अपनी विदेश राज्यमंत्री। प्रणीत कौर ने तेवर तीखे किए। शब्द नहीं थे, पर लब्बोलुबाब था- &#8216;कंगारूओं की करतूतों से भर रहा है सब्र का प्याला।&#8217; उनने कहा- &#8216;भारत उन्हें सामान्य आपराधिक घटनाएं मानने को तैयार नहीं। आस्ट्रेलिया अपनी जिम्मेदारी को समझे।&#8217; अपनी सरकार इसे रंगभेद मान रही। पर अपन जरा रोजगार के मौकों की नजर से भी देख लें।</p>
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		<title>कांग्रेस पर हावी होने लगे यूपीए सरकार के मंत्री</title>
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		<pubDate>Thu, 28 Jan 2010 04:15:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[यों तो पहले कांग्रेस की सरकारें रही हों। या बीजेपी की। पार्टियों का वजूद खत्म सा हो जाता रहा। इंदिरा-राजीव-नरसिंह राव पीएम थे। तो कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भी थे। सो कांग्रेस चौबीस अकबर रोड से नहीं। पीएम के घर से ही चलती थी। सरकार वाजपेयी की बनी। तो वाजपेयी बीजेपी के अध्यक्ष नहीं थे। [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">यों तो पहले कांग्रेस की सरकारें रही हों। या बीजेपी की। पार्टियों का वजूद खत्म सा हो जाता रहा। इंदिरा-राजीव-नरसिंह राव पीएम थे। तो कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भी थे। सो कांग्रेस चौबीस अकबर रोड से नहीं। पीएम के घर से ही चलती थी। सरकार वाजपेयी की बनी। तो वाजपेयी बीजेपी के अध्यक्ष नहीं थे। न लालकृष्ण आडवाणी। पर पार्टी के अध्यक्ष इन दोनों के आगे बौने ही थे। सो सत्ता के समय कांग्रेस-बीजेपी को पीएम ही चलाते रहे। पर अब जब मनमोहन सिंह कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का रुतबा मनमोहन सिंह से ज्यादा। तो कायदे से दबदबा कांग्रेस पार्टी का होना चाहिए। पर हाल ही की घटनाएं इसे साबित नहीं करती। यूपीए सरकार के मंत्री। कांग्रेसी हों या गैर कांग्रेसी। कांग्रेस को हर बात पर ठेंगा दिखाने लगे। <span id="more-1513"></span>सबसे पहले अपन शशि थरूर का उदाहरण लें। थरूर ने जब हवाई जहाज की इकोनामी क्लास को कैटल क्लास कहा। तो हमला पीएम या प्रणव दा पर नहीं था। जिनने मंत्रियों को इकोनामी क्लास में सफर का हुक्म दिया था। हमला सीधा सोनिया गांधी पर था। जिनने खुद स्पेशल प्लेन छोड़ इकोनामी क्लास में सफर किया था। यह अलग बात। जो सोनिया के बगल में कोई नहीं बैठा। आगे की दो लाइनों में दस सीटें खाली छोड़ी थी। पीछे की दो लाइनों की दस सीटें भी। कुल मिलाकर बिजनेस क्लास से दस गुना खर्चा बैठा था। पर बात शशि थरूर की। जिनने इकोनामी क्लास को कैटल क्लास कहकर खिल्ली उड़ाई। तो कांग्रेस के प्रवक्ता आग बबूला हो गए थे। खबरें छपी थी- थरूर की छुट्टी होगी। पर थरूर का कुछ नहीं बिगड़ा। उनने अलबत्ता कांग्रेसी नेताओं में &#8216;सेंस आफ ह्यूमर&#8217; की कमी बताया। थरूर के साथ और भी किस्से हुए। पर बात शरद पवार की। शरद पवार पर महंगाई का ठीकरा फोड़ने की कोशिश हुई। तो उनने पलटवार किया। अब भले कांग्रेस कहे- &#8216;पवार पर हमला नहीं किया।&#8217; भले शरद पवार भी कहें- &#8216;मैंने मनमोहन सिंह पर पलटवार नहीं किया।&#8217; पर इस युध्द विराम के पीछे की कहानी सबको मालूम। जनार्दन द्विवेदी, मोहन प्रकाश, अभिषेक मनु सिंघवी, शकील अहमद सबने इशारों में पवार को जिम्मेदार ठहराया। पर जब पवार ने पलटवार शुरू किया। तो कांग्रेसी नेताओं की घिग्गी बंध गई। चुप्पी साध गए सारे। अब ताजा घटना संतसिंह चटवाल को पद्मश्री पुरस्कार की। चटवाल को पद्मश्री बिल क्लिंटन ने दिलाया। हिलेरी क्लिंटन ने दिलाया। या बराक ओबामा ने। अपन इस विवाद में नहीं पड़ते। पर चटवाल का नाम सुनते ही विवाद खड़ा हुआ। ऐलान नहीं हुआ था। पर विवाद के बाद भी ऐलान रुका नहीं। कोई छोटी-मोटी सिफारिश होती। तो ऐलान रुक जाता। पर ऐलान के बाद विवाद को हवा दी खुद कांग्रेस ने। जब चटवाल के सीबीआई केसों का सवाल उठा। तो कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद ने कहा- &#8216;आम तौर पर यह सम्मान उन लोगों को मिलना चाहिए। जो सम्मान के हकदार हों। उन लोगों को नहीं, जो दागी हों। जहां तक चटवाल का सवाल। तो इस पर जवाब सरकार दे।&#8217; यह कहकर कांग्रेस ने सरकार को कटघरे में खड़ा किया। सरकार में सबसे पहले कटघरे में खड़े हुए होम मिनिस्टर। होम मिनिस्ट्री ही करती है पद्म सम्मानों की सिफारिश। कटघरे में खड़े हुए। तो चिदंबरम भी पलटकर बोले। चटवाल के पक्ष में होम मिनिस्ट्री ने कांग्रेस का मुंह बंद किया। होम मिनिस्ट्री के बयान का लब्बोलुबाब- &#8216;चटवाल कोई छोटा-मोटा आदमी नहीं।&#8217; अनाड़ी कांग्रेसियों को चिदंबरम ने याद दिलाया- &#8216;2005 का राजीव गांधी अवार्ड चटवाल को ही मिला था। पंजाब सरकार भी आर्डर ऑफ खालसा सम्मान दे चुकी।&#8217; चटवाल की तारीफ में होम मिनिस्ट्री ने कहा- &#8216;भारत-अमेरिका रिश्तों में अहम किरदार। वह विलियम क्लिंटन फाउंडेशन का ट्रस्टी। वह अमेरिकन इंडिया फाउंडेशन का भी ट्रस्टी। उसने सुनामी और एड्स पीड़ितों को मदद पहुंचाई। अमेरिका में एनआरआई समुदाय में सक्रिय। एटमी करार में अहम भूमिका निभाई थी चटवाल ने।&#8217; जहां तक बात सीबीआई की। तो होम मिनिस्ट्री ने उस पर भी सफाई दी। कहा- &#8216;बैंक ऑफ बड़ोदा और बैंक ऑफ इंडिया के साथ फ्राड के केस थे। सीबीआई ने चार्जशीट दाखिल तक नहीं की। सीबीआई ने तीन केस दाखिल खारिज कर दिए। दो केसों में अदालत ने बरी कर दिया।&#8217; सो सरकार ने कोई गलती नहीं की। होम मिनिस्ट्री का बयान आने पर अपन ने कांग्रेसी प्रवक्ता ढूंढे। पर बोलने को कोई राजी न हुआ।</p>
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		<title>पवार के मुंहतोड़ जवाब से कांग्रेस हुई लाजवाब</title>
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		<pubDate>Tue, 26 Jan 2010 08:12:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[गणतंत्र दिवस की बधाई। खुशी के मौके पर महंगाई का रोना ठीक नहीं। सो मनमोहन ने मुख्यमंत्रियों की मीटिंग टाल दी। सोनिया ने सीडब्ल्यूसी की मीटिंग बुलाई। पर गणतंत्र दिवस के बाद। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली म्यूंग बाक दिल्ली पहुंच गए। वह आज गणतंत्र दिवस के खास मेहमान होंगे। ली के आने से पहले [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">गणतंत्र दिवस की बधाई। खुशी के मौके पर महंगाई का रोना ठीक नहीं। सो मनमोहन ने मुख्यमंत्रियों की मीटिंग टाल दी। सोनिया ने सीडब्ल्यूसी की मीटिंग बुलाई। पर गणतंत्र दिवस के बाद। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली म्यूंग बाक दिल्ली पहुंच गए। वह आज गणतंत्र दिवस के खास मेहमान होंगे। ली के आने से पहले ही अपन ने मेहमाननवाजी शुरू कर दी थी। दक्षिण कोरिया की स्टील कंपनी पास्को को पर्यावरण मंत्रालय ने हरी झंडी दी। उड़ीसा में लगाया जाएगा स्टील प्लांट। सोमवार को चार समझौतों पर दस्तखत भी हुए। आने वाले साल अपने काम का रहेगा दक्षिण कोरिया। अपन को एशिया पेसेफिक को-आपरेशन फोर्म में मददगार होगा। हर साल अपन विदेशी मेहमान कोई यों ही नहीं चुन लेते। कूटनीतिक-आर्थिक हित देखकर ही होता है फैसला। पिछले सालों अपन ने कजाकिस्तान, फ्रांस और रूस के राष्ट्रपतियों को बुलाया। तीनों एटमी ईंधन मुहैया कराने वाले देश। <span id="more-1511"></span>पर इस बार एटमी करार का जिक्र तक नहीं। एटमी ईंधन की गाड़ी बीच में ही कहीं अटक गई। पर अपना लाख टके का सवाल। क्या हर साल होना चाहिए गणतंत्र दिवस समारोह। क्या हर साल ही होना चाहिए स्वतंत्रता दिवस समारोह। आप कहेंगे- जब हर साल होली-दिवाली। तो हर साल राष्ट्रीय समारोह क्यों नहीं। पर होली-दिवाली और गणतंत्र-स्वतंत्रता दिवसों में बहुत फर्क। होली-दिवाली पर राष्ट्रीय खर्च नहीं होता। अपन लोगों की जेब से निकलता है पैसा। सरकारी इश्तिहार भी अखबारों-चैनलों में नहीं आते। बात इश्तिहार की चली। तो याद आई- कृष्णातीरथ के महिला बाल विकास मंत्रालय की। जिनने चार पेज के इश्तिहारों में ब्लंडर किया। पाकिस्तान के पूर्व वायुसेनाध्यक्ष का फोटू छाप दिया। ब्लंडर सामने आया। तो बोली- &#8216;फोटू पर मत जाओ। मकसद पर जाओ।&#8217; जुगाड़ से मंत्री बनने और मंत्री बनने की काबिलियत होने में यही फर्क। प्रधानमंत्री को माफी मांगनी पड़ी। कांग्रेस को माफी मांगनी पड़ी। कृष्णातीरथ को तब गलती का अहसास हुआ। अब ठीकरा भले किसी के सिर फूटे। पर खुद कृष्णातीरथ ने पुल आउट देखकर दी थी मंजूरी। पर अपन बात कर रहे थे हर साल के समारोहों की। टेलीविजन युग में अब हर साल करोड़ों के खर्चे की जरूरत नहीं। पांच साल बाद होना चाहिए समारोह। जब महंगाई के लिए मंत्रियों में तू-तू, मैं-मैं हो रही हो। तो अपन को अनाप-शनाप खर्चों के बारे में सोचना चाहिए। कांग्रेस का इरादा महंगाई का ठीकरा पवार के सिर फोड़ने का। अपन ने तेईस जनवरी को लिख दिया था- &#8216;महंगाई का ठीकरा फोड़ा तो पवार भी देंगे मुंहतोड़ जवाब।&#8217; तो पवार ने चौबीस को मुंहतोड़ जवाब दे दिया। जब उनने कहा- &#8216;मैं क्यों, पीएम भी जिम्मेदार हैं महंगाई के लिए। कीमतों की नीतियां मैं नहीं बनाता। केबिनेट बनाती है।&#8217;  अपन को पवार पार्टी का एक छुटभैया बता रहा था- &#8216;मीठा-मीठा घप्प, कड़वा कड़वा थू कांग्रेस की पुरानी आदत।&#8217; पर मीठा ही तो मुसीबत बन गया। चीनी के दाम इस रफ्तार से पहले कभी नहीं बढ़े। इंदिरा के जमाने में किल्लत होती थी। किल्लत होती थी- चीनी की। गेहूं-चावल-डालडा घी की भी। रसोई गैस तो बड़े लोगों के घरों में ही थी। पर किल्लत होना अलग बात। किल्लत तो किसी चीज की है ही नहीं। हर चीज बाजार में मौजूद। चाहें तो एक क्विंटल चीनी उठा ले। चाहें जितना आटा-चावल उठा लें। पर आम आदमी उतना ही तो पैर फैलाएगा। जितनी चादर होगी। सोमवार को अपन आटा लेने गए। तो एमपी का गेहूं तीन रेट का था। बाईस, पच्चीस और अठाईस। जब रोटी-कपड़ा-मकान फिल्म बनी थी। तो यह एक मन गेहूं का रेट था। अब तो एक किलो का हो गया। इस बीच अपन हरित क्रांति ला चुके। उस पिक्चर का वह गाना याद होगा- &#8216;बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गई।&#8217; उस गाने में जो लाइन थी- &#8216;पहले मुट्ठी में पैसे लेकर थैलाभर शक्कर लाते थे। अब थैले में पैसे जाते हैं, मुट्ठी में शक्कर आती है।&#8217; पर अपन बात कर रहे थे महंगाई का ठीकरा फोड़ने की। कांग्रेस के छुटभैये भी पवार पर ठीकरा फोड़ने से गुरेज नहीं करते। बातें तो पवार के कानों में भी पहुंचती होंगी। सो उनके सब्र का प्याला भर गया। सो सीडब्ल्यूसी से पहले ही मुंहतोड़ जवाब दे दिया। तो कांग्रेस के प्रवक्ता बंगलें झांकने लगे। बंगलें झांकते हुए शकील अहमद बोले- &#8216;पवार गलत नहीं कह रहे। कीमतों को काबू रखना पूरी केबिनेट की जिम्मेदारी।&#8217; पवार ने केबिनेट कमेटी आन प्राईस की याद दिला दी। कांग्रेस को अब नया बहाना ढूंढना होगा।</p>
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		<title>मंहगाई का ठीकरा फोड़ा तो पवार भी मुंहतोड़ जवाब देंगे</title>
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		<pubDate>Sat, 23 Jan 2010 04:17:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[बात मंहगाई की। कांग्रेस मीडिया के सवालों से परेशान। ऊपर से पवार के चीनी-दूध की कीमतें बढ़ाने वाले बयान। यों भी कांग्रेस को मंहगाई पर कोई जवाब नहीं सूझ रहा। पीएम केबिनेट कमेटी की मीटिंग कर चुके। केबिनेट में चर्चा हो चुकी। चीनी की कीमतें घटाने के कुछ कदम भी उठाए। खासकर इम्पोर्टेड चीनी को [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">बात मंहगाई की। कांग्रेस मीडिया के सवालों से परेशान। ऊपर से पवार के चीनी-दूध की कीमतें बढ़ाने वाले बयान। यों भी कांग्रेस को मंहगाई पर कोई जवाब नहीं सूझ रहा। पीएम केबिनेट कमेटी की मीटिंग कर चुके। केबिनेट में चर्चा हो चुकी। चीनी की कीमतें घटाने के कुछ कदम भी उठाए। खासकर इम्पोर्टेड चीनी को किसी भी चीनी मिल में लाने की छूट। मायावती ने किसानों के दबाव में रोक लगाई थी। सो रॉ चीनी बंदरगाहों पर अटकी थी। फैसले से मायावती को बदनाम करने का मौका मिला। पर मायावती भी राजनीति की अनाड़ी नहीं। उनने मुख्यमंत्रियों की मीटिंग में आने की शर्त रख दी। बोली &#8211; &#8216;पहले मंहगाई के जिम्मेदार पवार को हटाओ। फिर आएंगी मीटिंग में।&#8217; माया-पवार की तू तू &#8211; मैं मैं शुरू हो गई। कांग्रेस बाहर बैठकर तमाशा देखने लगी। <span id="more-1508"></span>तो पवार ने माया पर पलटवार किया- &#8216;माया की खुन्नस इम्पोर्टेड चीनी पर फैसले से।&#8217; पर माया को समर्थन नितिश से मिला। कांग्रेस ने अपनी खाल बचाने के लिए ठीकरा राज्यों के सिर फोड़ा। भले ही अपने कांग्रेसी मुख्यमंत्री भी लपेटे में आए। पर गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों की तादाद ज्यादा। सो गैर-कांग्रेसी सीएम भी एकजुट हो गए। बीजेपी-सीपीएम सड़कों पर उतर आई। आडवाणी की रहनुमाई में बीजेपी मनमोहन से भी मिली। नितिन गडकरी ट्रेनी लीडर की तरह साथ गए। पर बात बीजेपी के इरादे की।&#8217; कांग्रेस ने जो गेंद राज्य सरकारों के पाले में फेंकी थी। उसे बीजेपी वापस कांग्रेस और केंद्र के पाले में डाल आई। अब मीडिया को भी कांग्रेस की दलील नहीं पच रही। गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों से डरकर पीएम ने मीटिंग तो टाल दी। पर बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी। सो कांग्रेस की नीति अब पवार पर ठीकरा फोड़ने की। यही फर्क है एनडीए और यूपीए में। एनडीए राज में बीजेपी ने कभी अपनों को बदनाम नहीं किया। कांग्रेस अपनों को बदनाम करने का मौका नहीं चूकती। मुलायम ने एटमी करार के वक्त सरकार बचाई। तो बाद में कांग्रेस ने मुलायम की रेल बना दी। पिछली सरकार के रेल मंत्री लालू की खाट ममता से खड़ी करवा दी। तो ममता की खाट स्टेट मिनिस्टरों की मीटिंग में मुनिअप्पा से खड़ी करवाई। बात ममता की चली। तो बताते जाएं- बंगाल में ममता की कांग्रेस के साथ चख-चख शुरू हो चुकी। पर पहले बात कांग्रेस की अंदरुनी मारकाट की। उस दिन भोपाल में राहुल ने कहा था- &#8216;कांग्रेसी ही कांग्रेसी को हराता है।&#8217; तो सिब्बल पिछले एचआरडी मंत्री अर्जुन सिंह की वैसी ही पोल खोल रहे। जैसी ममता ने लालू की खोली। बात ममता की चली। तो बता दें- ज्योति दा को श्रध्दांजलि देने मनमोहन कोलकाता गए। तो ममता जानबूझकर गैरहाजिर रही। सोनिया गई। तब भी गैरहाजिर रही। फिलहाल तो कांग्रेस ममता का बचाव कर रही। पर यह ज्यादा दिन नहीं चलना। शुक्रवार की बात ही लो। शिबू सोरेन के नक्सल विरोधी अभियान पर नकेल की बात उठी। तो बंगाल में ममता के नक्सलियों को समर्थन की बात भी उठी। पर मनीष तिवारी ने ममता का बचाव किया। बात शिबू की चली। तो बता दें- बीजेपी उनकी नक्सल समर्थक नीति से बेहद खफा। शिबू ने लाइन न बदली। तो ज्यादा देर नहीं चलना गठबंधन। पर मूल बात थी मंहगाई की। अपन को तो बजट में मंहगाई की मार बढ़ने की आशंका। बात बजट की चली। तो बता दें- प्रणव दा का बजट राहुल की लाइन पर होगा। अमीर और गरीब की खाई पाटने वाला। चिदंबरम ने पिछली बार जो इंफ्रास्ट्रक्चर की अनदेखी की। इस बार जोर इंफ्रास्ट्रक्चर पर होगा। पर बात मंहगाई की। सोनिया मंहगाई पर यूपीए की मीटिंग बुलाती। तो अपन को ज्यादा गंभीरता दिखती। पर उनने फैसला किया सीडब्ल्यूसी बुलाने का। मतलब साफ- मंहगाई पर राजनीति करने का। सीडब्ल्यूसी कुछ ठीकरा राज्यों के सिर फोड़ेगी। तो कुछ बिना नाम लिए पवार के सिर। पवार को इसकी भनक लग चुकी। द्विवेदी-सिंघवी-शकील के बयान वह भी देख रहे। सो उनने भी शुक्रवार को पुणे में बिना नाम लिए पलटवार किया। बोले- &#8216;एग्रीकल्चर मिनिस्टरी का मंहगाई से क्या ताल्लुक। मिनिस्टरी का काम कृषि उत्पादों पर निगाह रखना। मैं चालीस साल में पहली बार मंहगाई का ठीकरा कृषि मंत्रालय पर फूटता देख रहा हूं।&#8217;</p>
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		<title>चिदंबरम फार्मूले में एनएसए के लिए कोई जगह नहीं होगी</title>
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		<pubDate>Fri, 22 Jan 2010 08:12:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[नारायणन की जगह फिलहाल शिवशंकर मेनन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार। चिदंबरम के दिमाग में कुछ और। इसीलिए अपन ने फिलहाल लिखा। इसका खुलासा अपन बाद में करेंगे। पहले बात मेनन की। यूपीए सरकार के साढ़े पांच साल में वह तीसरे एनएसए। जेएन दीक्षित, नारायणन पहले रह चुके। एनडीए शासन के छह साल में सिर्फ बृजेश मिश्र [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">नारायणन की जगह फिलहाल शिवशंकर मेनन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार। चिदंबरम के दिमाग में कुछ और। इसीलिए अपन ने फिलहाल लिखा। इसका खुलासा अपन बाद में करेंगे। पहले बात मेनन की। यूपीए सरकार के साढ़े पांच साल में वह तीसरे एनएसए। जेएन दीक्षित, नारायणन पहले रह चुके। एनडीए शासन के छह साल में सिर्फ बृजेश मिश्र थे। दीक्षित का तो देहांत हो गया। नारायणन की च्वाइस ही गलत थी। सो मनमोहन सिंह ने मेनन को बनाकर गलती सुधारी। अपन नहीं जानते नारायणन को हटाने का फैसला क्यों हुआ। मुंबई पर हमला वजह होता। तो मनमोहन अपने दूसरे कार्यकाल के शुरू में ही न बनाते। नारायणन का तब विरोध भी खूब हुआ था। पर अब हटाने की वजह शर्म-अल-शेख में बलूचिस्तान वाली गलती। यों मनमोहन लोकसभा में गलती अपने सिर ले चुके। <span id="more-1506"></span>उनने कहा- &#8216;पाकिस्तान के पीएम ने बलूचिस्तान पर चिंता जताई। तो मुझे उसे साझा बयान में शामिल करना गलत नहीं लगा।&#8217; पर क्या यही सच था। क्या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की नादानी से ऐसा ड्राफ्ट बना। अपन को याद है पंद्रह जुलाई 2001 की आगरा में हुई वाजपेयी-मुशर्रफ वार्ता। जो ड्राफ्ट को लेकर ही फेल हुई। अपन को याद है पांच जनवरी 2006  की वह रात। अपन वाजपेयी की मीडिया टीम के साथ इस्लामाबाद में थे। बृजेश मिश्र रातभर साझा बयान के ड्राफ्ट पर मशक्कत करते रहे। कोमा, फुलस्टाप पर भी तू-तू, मैं-मैं की नौबत थी। सो शर्म-अल-शेख की गलती का ठीकरा भी एनएसए पर होगा। सुभाष अग्रवाल ने आरटीआई डालकर ड्राफ्ट की नोटिंग मांगी। तो विदेश मंत्रालय ने इनकार कर दिया। यह विवाद अब कोर्ट का रुख लेगा। पर विवादास्पद एनएसए की विदाई हो गई। सिर्फ स्टेट मिनिस्टर ही तो होता है एनएसए। अपन को हैरानी तब हुई। जब खबर मिली- &#8216;पीएम खुद नारायणन को शानदार विदाई डीनर देंगे।&#8217; शनिवार को होगा यह डीनर। ब्यूरोक्रेसी के साथ मंत्री भी मौजूद होंगे। कांग्रेस नारायणन से कतई खुश नहीं। फिर भी उनको ऐसी विदाई। अपन ने पहले न देखी, न सुनी। सब जानते हैं। नारायणन सफल एनएसए नहीं थे। पी चिदंबरम भले ही नारायणन को फेमिली फ्रेंड कहें। अपनी पत्नी और नारायणन का जन्मदिन एक दिन होने की दुहाई दें। पर चिदंबरम जब से होम मिनिस्टर बनें। तब से एनएसए पर विदाई के बादल मंडरा रहे थे। यूपीए सरकार में टकराव के और भी कई उदाहरण। स्टेट मिनिस्टरों ने कैसे केबिनेट मिनिस्ट्रों के खिलाफ भड़ास निकाली। यह अपन ने लगातार दो दिन बताया। अब बीटी बैंगन पर पवार-जयराम की जंग देखो। पवार ने कहा- &#8216;संवैधानिक संस्था जीईएसी की ओर से दी गई राय ही फाइनल। सरकार की अपनी कोई राय नहीं।&#8217; जयराम रमेश इस बयान पर भड़क गए। उनने पवार को चिट्ठी लिख मारी। चिट्ठी प्रेस को जारी भी कर दी। जिसमें उनने लिखा- &#8216;सरकार की जिम्मेदारी जनता और किसानों के प्रति। हमारा काम उनके हितों की रक्षा करना। जीईएसी फाइनल नहीं। फाइनल सरकार का फैसला होगा। मैं पीएम से बात करूंगा।&#8217; मंहगाई पर पवार-कांग्रेस की चिक-चिक अपन रोज देख ही रहे। पर बात हो रही थी चिदंबरम-नारायणन की। एचएम-एनएसए का टकराव कोई नया नहीं। एनडीए राज में भी हुआ था टकराव। आडवाणी-बृजेश कई बार आमने-सामने हुए। बृजेश चाहते थे- राष्ट्रीय सुरक्षा का अलग मंत्रालय बने। एनएसए की जगह राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री बने। वाजपेयी काफी हद तक सहमत थे। बृजेश को राज्यसभा में लाने की तैयारी भी हुई। पर आडवाणी सहमत नहीं हुए। अब चिदंबरम होम मिनिस्ट्री को ही राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्रालय बनाने पर उतारू। जिसमें एनएसए की जरूरत ही नहीं होगी। नारायणन रवानगी की पटकथा चिदंबरम के हाथों ही लिखी गई। बात अक्टूबर 2009 की। चिदंबरम ने महनोहन के सामने राष्ट्रीय कानून आतंकवाद विरोधी केंद्र का फार्मूला रखा। यानि एनसीटीसी। पीएम की हरी झंडी हुई। तो चिदंबरम ने तेईस दिसंबर को ड्राफ्ट का खाका खुफिया अफसरों के सामने रखा। फिलहाल वह ड्राफ्ट बनाने में मशगूल। मार्च के पहले हफ्ते में ड्राफ्ट केबिनेट के सामने होगा। एनसीटीसी आतंकवाद विरोधी नीति बनाएगी। वही बाकी एजेंसियों से तालमेल करेगी। वही आतंकवाद विरोधी दिशा-निर्देश देगी। एनएसए के अधीन हैं जेआईसी, एनटीआरओ, एआईओ। चिदंबरम के ड्राफ्ट में ये तीनों एजेंसियां भी एनसीटीसी को रिपोर्ट करेंगी। एनसीटीसी होगी सीधे एचएम के कंट्रोल में। फिर एनएसए का काम क्या होगा? एक इंटरव्यू में चिदंबरम से पूछा। तो वह बोले- &#8216;यह पीएम सोचें।&#8217; उनने साफ कहा- &#8216;जब मैंने तेईस दिसंबर को एनसीटीसी का विचार रखा। तो उसमें एनएसए का कोई जिक्र नहीं किया।&#8217; मतलब साफ। मेनन हो सकते हैं आखिरी एनएसए। वह भी इस साल के आखिर तक के लिए।</p>
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		<title>चीनी के बाद अब पवार ने दूध मंहगा करने की ठानी</title>
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		<pubDate>Thu, 21 Jan 2010 08:08:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[दूध का वादा कारोबार कैसे होगा। दूध तो आज की बात आज। पर नहीं, दूध का वादा कारोबार भी होगा। दूध से बनी चीजों की मांग आज दूध से ज्यादा। जो बच्चे दूध नहीं पीते। उनको भी दूध का बना &#8216;चीज&#8217; पसंद। इटली के &#8216;पीजा&#8217; की डिमांड अब बड़े शहरों में तो घर-घर में। बिना [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">दूध का वादा कारोबार कैसे होगा। दूध तो आज की बात आज। पर नहीं, दूध का वादा कारोबार भी होगा। दूध से बनी चीजों की मांग आज दूध से ज्यादा। जो बच्चे दूध नहीं पीते। उनको भी दूध का बना &#8216;चीज&#8217; पसंद। इटली के &#8216;पीजा&#8217; की डिमांड अब बड़े शहरों में तो घर-घर में। बिना &#8216;चीज&#8217; के नहीं बनता &#8216;पीजा&#8217;। संसद के सेंट्रल हाल में भी आजकल &#8216;दोसा&#8217; से ज्यादा डिमांड &#8216;पीजा&#8217; की। दूध से बने चॉकलेट भी खूब पसंद आते हैं बच्चों को। सो सूखे दूध का बिजनेस अब ताजा दूध से ज्यादा। दूध के कारोबार को अपन कुछ ऐसे समझ लें। अपने एक सांसद मित्र का बिलासपुर में पेट्रोल पंप था। जिन दिनों पेट्रोल की कीमतों पर अटकलें चलतीं। उन दिनों सांसद का फोन खूब आता। सवाल एक ही होता- &#8216;क्या कल बढ़ जाएंगी कीमतें?&#8217; आखिर जनर्लिस्टों को एक दिन पहले तो लग ही जाती है भनक। यह अलग बात, जो कई बार पेट्रोलियम मंत्री का कहा भी गलत हो जाए। <span id="more-1504"></span>जैसे इस बार पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़नी थी। पर कीमतों से जुड़ी केबिनेट कमेटी ने मंजूरी नहीं दी। मंजूरी देती, तो मंहगाई में एक और मार पड़ती। तो छपी-छपाई खबर गलत हो गई। खुद मुरली देवड़ा ने एक दिन पहले दी थी खबर। पर अपन बात कर रहे थे सांसद की। अपनी बताई जानकारी उसके बहुत काम की होती थी। वह रात को ही पेट्रोल-डीजल टैंकरों का आर्डर भेज देता। नियम के मुताबिक आर्डर के वक्त दिया गया रेट लगता। सो पेट्रोल पंप डीलर की चांदी हो जाती। हू-ब-हू ऐसे ही बाकी चीजों का वादा व्यापार। चीनी की कीमतें बढ़ रही थी। तो शरद पवार ने एक दिन कहा- &#8216;चीनी की कीमतें और बढ़ेंगी।&#8217; कांग्रेस की ब्रीफिंग में ताबड़तोड़ सवाल हुए। तो बात दस जनपथ तक पहुंची। देर शाम जनार्दन द्विवेदी ने पवार का नाम लिए बिना कहा- &#8216;समस्या बताना ही नहीं, समस्या का समाधान भी सरकार की जिम्मेदारी।&#8217; कांग्रेस के प्रवक्ता मोहन प्रकाश ने तो पवार का नाम लेकर कहा- &#8216;ऐसे बयानों से कालाबाजारी हरकत में आएंगे ही। उन चीजों की कीमतें भी बढ़ेंगी। जिनकी अभी नहीं बढ़ी।&#8217; पवार के मंहगाई बढाऊ बयान से सरकार में खलबली मच गई। पवार के प्रवक्ता ने सफाई दी- &#8216;पवार ने ऐसा तो नहीं कहा था।&#8217; पर पवार ने चीनी की कीमतें बढ़ाने की बात ही कही थी। इसीलिए तो मनमोहन सिंह भी हरकत में आए। उनने फौरन केबिनेट बुलाई। चीनी की कीमतें घटाने के ताबड़तोड फ़ैसले किए। बात सिर्फ चीनी की नहीं। चावल, आटा, दालें सब आम आदमी के बूते से बाहर। सो मनमोहन सिंह ने सताईस को मुख्यमंत्रियों की मीटिंग भी बुलाई है। पर इस मीटिंग से पहले अब पवार का नया बयान। उनने कहा है- &#8216;अब दूध की कीमतें बढ़ेंगी।&#8217; तो बयान आते ही कांग्रेस की ब्रीफिंग में फिर हल्ला हुआ। पर अब के अभिषेक मनु सिंघवी ने पवार पर हमला नहीं बोला। यों बयान जनार्दन द्विवेदी जैसा ही था। बोले- &#8216;मंहगाई की समस्या तो है ही। मांग और पूर्ति में फर्क होगा। तो मंहगाई बढ़ेगी। कीमतें बढ़ने की चेतावनी गलत बात नहीं। पर कीमतें काबू करना भी सरकार की जिम्मेदारी। इस जिम्मेदारी से सरकार भागेगी नहीं।&#8217; पर क्या मंत्री और सरकार कांग्रेस की बात नहीं मानते। इस सवाल पर सिंघवी थोड़ा बिदके। कहा- &#8216;ऐसी बात नहीं। सरकार अपनी कोशिश कर ही रही है।&#8217; पर सिंघवी ने मोहन प्रकाश की तरह यह मानने से इनकार किया। पवार के बयान से दूध की कीमतें तो बढ़ेंगी ही। बाकी चीजों पर भी असर होगा।</p>
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		<title>युवा स्टेट मिनिस्टर रोए पीएम के सामने</title>
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		<pubDate>Wed, 20 Jan 2010 00:01:52 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[India Gate se Sanjay Uvach]]></category>

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		<description><![CDATA[अपन ने कल बताया था- &#8216;मारे-मारे फिर रहे हैं युवा स्टेट मिनिस्टर।&#8217; उसमें अपन ने पीएम की बुलाई मीटिंग का खुलासा किया। तो मंगलवार को तय वक्त पर हो गई मीटिंग। मनमोहन खुलकर सुनने के मूड में थे। सो दो घंटे का वक्त तय हुआ। पर मीटिंग खत्म हो गई एक घंटे में। वजह थी- [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">अपन ने कल बताया था- &#8216;मारे-मारे फिर रहे हैं युवा स्टेट मिनिस्टर।&#8217; उसमें अपन ने पीएम की बुलाई मीटिंग का खुलासा किया। तो मंगलवार को तय वक्त पर हो गई मीटिंग। मनमोहन खुलकर सुनने के मूड में थे। सो दो घंटे का वक्त तय हुआ। पर मीटिंग खत्म हो गई एक घंटे में। वजह थी- &#8216;उत्साही युवा मंत्रियों का पीएम की बोलती बंद कर देना।&#8217; अपन आरपीएन सिंह, प्रणीत कौर, पलानीमनिक्कम, नमोनारायण मीणा को छोड़ दें। तो बाकी सबने अपने केबिनेट मंत्रियों की खाल खींची। मनिक्कम ने तो प्रणव दा को पिता तुल्य बता दिया।  मीणा और मनिक्कम के मुखारविंद से प्रणव दा की तारीफ हुई। आरपीएन के मुंह से कमलनाथ की। शशि थरुर आए नहीं। प्रणीत कौर ने एसएम कृष्णा की तारीफ की। <span id="more-1501"></span>आरपीएन बोले- &#8216;मैं तो संतुष्ट हूं, काश मेरी तरह बाकी स्टेट मिनिस्टर भी संतुष्ट होते।&#8217; पहली बार एमपी बने आरपीएन ने सलाह दी- &#8216;स्टेट मिनिस्टरों का काम और टारगेट तय होना चाहिए।&#8217; यूथ अफेयर स्टेट मिनिस्टर अरुण यादव अपने केबिनेट मंत्री एसएस गिल की खिल्ली उड़ाते बोले- &#8216;यूथ मामले हैं मेरे पास। नेहरू युवक केंद्र भी। पर फाइलें नहीं आती। सीनियर ही देख रहे हैं यूथ मामले भी।&#8217; अपने पास एक-एक स्टेट मिनिस्टर के कहे का हिसाब-किताब। अड़तीस में से छत्तीस मंत्री आए। थरुर के अलावा संगमा की बेटी अगाथा नहीं आई। सिर्फ चार ने अपने केबिनेट मंत्रियों की तारीफ की। जतिन और माकन चुप्पी साधे रहे। बाकी तीस ने खाल उधेडी। शुरुआत की सौगतराय ने। ममता की पार्टी के सौगतराय। जयपाल रेड्डी के साथ शहरी विकास में स्टेट मिनिस्टर। बोले- &#8216;आपने मुझे नौकरों-चाकरों की फौज दी। तेरह का स्टाफ है मेरे पास। बड़ा बंगला, कार-ड्राइवर। फोन तो जहां-तहां खूब लगे पड़े हैं। पर मेरे पास काम कोई नहीं। मैं भी यूपीए में हूं। जब इतना कुछ दिया है। तो कुछ काम भी दो। बताओ मैं खाली बैठा क्या करूं।&#8217; सौगतराय जब रेड्डी पर बरस रहे थे। तभी रेल रायमंत्री मुनिअप्पा ने बैठे-बैठे कहा- &#8216;स्टेट मिनिस्टर को काम देने की सलाह अपनी लीडर ममता को भी दो।&#8217; सब खिल खिलाकर हंस पड़े। सो केबिनेट मंत्रियों की खिंचाई भी हुई, खिल्ली भी उड़ी। छठी बार के सांसद सांई प्रताप ने भी कुछ यों ही वीरभद्र की खिल्ली उड़ाई। बोले- &#8216;मैं अभी सीख रहा हूं।&#8217; पल्लम राजू ने एंटनी पर गुस्सा उतारा। तो हरीश रावत ने मलिकार्जुन खड़के पर। केबिनेट से स्टेट मंत्री बने श्रीकांत जेना के तुजुर्बे का लोहा मनमोहन को भी मानना पड़ा। उनने कहा- &#8216;केबिनेट मंत्रियों के हक सीमित होने चाहिए। विभागों के बंटवारे की पॉलिसी बननी चाहिए। केबिनेट मंत्रियों की मनमर्जी नहीं।&#8217; ई.अहमद ने भी यही कहा। ममता से ही खफा अहमद बोले- &#8216;काम का साफ-साफ बंटवारा होना चाहिए।&#8217; अहमद पिछली सरकार में भी थे। उनने मनमोहन को याद दिलाते हुए कहा- &#8216;मैं तो पुराना मंत्री हूं। पर अब बेकार हूं। मंत्रालय में बैठकर क्या करूं।&#8217; अपन को सबसे क्षुब्ध स्टेट मिनिस्टर चुनना हो। तो अपन मुनिअप्पा को चुनेंगे। उनने जो कहा, सुनिए। बोले- &#8216;प्रधानमंत्री जी आपने मंदी में किफायत का मंत्र दिया हुआ है। उसी के तहत स्टेट मिनिस्टरों का पद खत्म कर दें। इनकी कोई जरूरत नहीं। सिवा फिजूलखर्ची के कुछ नहीं होता। इससे अच्छा होगा, हमें पार्टी का काम दे दें।&#8217; ज्योतिरादित्य ने शिकायत जरूर की थी। पर अपन को लगता था। वह मीटिंग में नहीं बोलेंगे। पर वह तो जमकर बोले। कहा- &#8216;हम युवा लोग कुछ करना चाहते हैं, पर क्या करें। मिनिस्ट्री की कोई खबर तक नहीं पहुंचती। फाइलें तो बहुत दूर की बात। आप खुद तय करें- हम क्या करें। अगर आपने केबिनेट मंत्रियों पर छोड़ दिया। तो निकलना-निकलाना कुछ नहीं। आपके कहने पर काम दे देंगे, पर फाइलें नहीं आएंगी।&#8217; लगते हाथों पी. लक्ष्मी ने उदाहरण भी दे डाला। अपने केबिनेट मंत्री दयानिधि मारन पर कटाक्ष करते हुए बोली- &#8216;वह बहुत अच्छे हैं। मुझे काम भी सौंपा है। पर जो जो काम सौंपा है। उसकी फाइलें भी मेरे पास नहीं आती।&#8217; अपन को शोले फिल्म के डायलॉग याद आ गए। जय की भूमिका में अमिताभ जब मौसी से वीरू के लिए बसंती का हाथ मांगने गए। तो वीरू की जैसे तारीफ जय ने की थी। पी. लक्ष्मी वैसे ही तारीफ दयानिधि मारन की कर रही थी। पुरंदेश्वरी ने ऐसी ही तारीफ की सिब्बल की। पीएम ने फिर वही आश्वासन दिया- &#8216;केबिनेट में बात करूंगा। कुछ तो करूंगा।&#8217;</p>
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		<title>मारे-मारे फिर रहे हैं युवा स्टेट मिनिस्टर</title>
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		<pubDate>Tue, 19 Jan 2010 07:56:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[India Gate se Sanjay Uvach]]></category>

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		<description><![CDATA[गवर्नरों की तैनाती हो गई। मोहसिना किदवई और उर्मिलाबेन बनती-बनती रह गई। खबर उड़ाई- मोहसिना ने आखिर वक्त पर इनकार कर दिया। अपन यह मानने को तैयार नहीं। उनकी जगह पर एमओएच फारुकी का नाम अचानक नहीं आया। तीन दिन पहले छप चुका था। उर्मिलाबेन के नाम की गफलत तो मीडिया से हुई। नाम लीक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">गवर्नरों की तैनाती हो गई। मोहसिना किदवई और उर्मिलाबेन बनती-बनती रह गई। खबर उड़ाई- मोहसिना ने आखिर वक्त पर इनकार कर दिया। अपन यह मानने को तैयार नहीं। उनकी जगह पर एमओएच फारुकी का नाम अचानक नहीं आया। तीन दिन पहले छप चुका था। उर्मिलाबेन के नाम की गफलत तो मीडिया से हुई। नाम लीक हुआ था उर्मिला। उर्मिला सिंह का नाम तो किसी के ख्याल में ही नहीं आया। सबने उर्मिलाबेन समझ लिया। पिछली सरकार में मंत्री थी। पर दिग्विजय सिंह बड़ी सफाई से उर्मिला सिंह को गवर्नर बनवा ले गए। सीडब्ल्यूसी की मेंबर हैं उर्मिला। सरकारिया आयोग की सिफारिशें धरी रह गई। शिवराज पाटिल लंबे समय से कह रहे थे- &#8216;मैंने गवर्नर बनने से इनकार कर दिया।&#8217; उनका कहा सही होता। तो कैसे बनते गवर्नर। सो इनकार कोई नहीं करता। न पहले पाटिल ने किया था। न अब मोहसिना किदवई ने किया। अपन को एक बात की बेहद खुशी। <span id="more-1499"></span>पाटिल की अलमारी में पड़े सफारी सूटों के दिन लौट आए। राष्ट्रपति नहीं बन सके थे। राज्यपाल सही। पर अर्जुन सिंह को बुढ़ापे में राज भवन भी नसीब नहीं। दिग्विजय ने उर्मिला सिंह का तुरुप चल दिया। खैर सबसे ज्यादा किरकिरी हुई एमके नारायण की। अर्श से फर्श पर आ गए। देश की सुरक्षा में नाकाम रहे। तो बंगाल की खाड़ी में जाना पड़ा। सुरक्षा की नाकामी के कारण ही तो पाटिल भी अर्श से फर्श पर गिरे। जो गवर्नर बनाते थे। खुद गवर्नर बन गए। खैर गर्वनरों की तैनाती हो गई। तो अब कांग्रेस में बदलाव की बयार। शकील अहमद से पूछा। तो उनने कहा- &#8216;दोनों का आपस में कोई ताल्लुक नहीं। सोनिया जब जरूरत समझेंगी। संगठन में फेरबदल करेंगी।&#8217; कहने को भले शकील भाई कुछ कहें। रिश्ता कैसे नहीं। सोनिया गांधी ने ही तय किए गवर्नर। वही तय कर रही हैं- कौन मंत्री बनेगा। कौन महामंत्री। और कौन राज्यसभा में लौटे, कौन न लौटे। बता दें- इस साल राज्यसभा की 65 सीटें खाली होंगी। अंबिका सोनी, आनंद शर्मा, एके एंटनी, जयराम रमेश, एमएस गिल पांच मंत्री भी। आनंद शर्मा हिमाचल से नहीं लौट सकते। गिल का पंजाब में कड़ा विरोध। अब इनका भविष्य भी तो सोनिया ही तय करेंगी। बात मंत्रियों की चली। तो बता दें- मनमोहन सरकार के स्टेट मिनिस्टर बेहद नाराज। वैसे स्टेट मिनिस्टर हमेशा ही केबिनेट मंत्रियों की तानाशाही से खफा। पर यूपीए का आलम निराला। पिछली सरकार में स्टेट मिनिस्टरों ने शिकायत की। तो मनमोहन ने दो बार काउंसिल की मीटिंग बुलाई। स्टेट मिनिस्टरों की शिकायतें केबिनेट मंत्रियों के सामने सुनी। अब केबिनेट मंत्रियों के सामने कौन बोलता। फिर भी तीन-चार ने हिम्मत की। एक मंत्री ने अपने मंत्रालय की उपलब्धियां गिनाकर आखिर में कहा- &#8216;यह सब सिर्फ केबिनेट मंत्री के आदेश से हुआ।&#8217; खैर हालात फिर भी नहीं बदले। इसीलिए तो इस बार भी पीएम को शिकायत पहुंची। अबके शिकायत की है- हरीश रावत ने मल्लिकार्जुन खड़के की। शिशिर अधिकारी ने सीपी जोशी की। जिनने मंत्रालय के कलैंडर में शिशिर अधिकारी का फोटू ही नहीं छपवाया। ज्योतिरादित्य ने शिकायत की है आनंद शर्मा की। सचिन पायलट ने की है ए. राजा की। पुरंदेश्वरी ने की है कपिल सिब्बल की। सुलतान अहमद ने की है शैलजा की। दिनेश त्रिवेदी ने की है गुलाम नबी की। भरत सिंह शोलंकी ने शिकायत की है- सुशील कुमार शिंदे की। सो मनमोहन सिंह ने सभी स्टेट मिनिस्टरों की मीटिंग बुला ली। सबकी शिकायतें सुनेंगे। पर कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद को केबिनेट में बवाल की भनक तक नहीं। अपन ने पूछा- &#8216;पहले कभी पीएम ने सिर्फ स्टेट मिनिस्टरों की मीटिंग बुलाई?&#8217; तो वह बोले- &#8216;मुझे याद नहीं।&#8217; शकील जब स्टेट मिनिस्टर हुआ करते थे। तो उन्हें भी अपने केबिनेट मंत्री से ढेरों शिकायतें थी। स्टेट मिनिस्टर भी जानते हैं- पहले की तरह होगा इस बार भी कुछ नहीं। पिछली बार स्टेट मिनिस्टरों ने केबिनेट मंत्रियों के मुंह पर कहा- &#8216;फाईल हमारे माध्यम से न जाए। तो कम से कम हमारे माध्यम से लौटे। ताकि मंत्रालय के फैसलों की जानकारी हमें मीडिया से तो न मिले।&#8217; एक अनुभवी स्टेट मिनिस्टर बता रहा था- &#8216;जब तक पीएम खुद विभागों का बंटवारा नहीं करें। कोई केबिनेट मंत्री फाइलें नहीं देखने देगा।&#8217; पर पीएम ऐसा करने से रहे। कितना ढिंढोरा पिटा था- युवा सांसदों, युवा मंत्रियों का। पर अब कितने मारे-मारे फिर रहे हैं युवा स्टेट मिनिस्टर।</p>
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