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	<title>Socio Political News &#187; Politicking</title>
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	<description>News Articles and Reactions</description>
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		<title>क्षत्रपों के बिना नहीं उभरेगी कांग्रेस</title>
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		<pubDate>Sun, 01 Jun 2008 03:14:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Politicking]]></category>

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		<description><![CDATA[सोनिया ने हारों से सबक लेकर कमेटी बनाने का फैसला किया है, लेकिन लालकृष्ण आडवाणी क्षत्रपों को उभारकर पार्टी की जड़ें जमा रहे हैं। कांग्रेस के अब देश में सिर्फ 656 विधायक, जबकि भाजपा के 940 हो गए हैं।
अगर कोई कांग्रेस के घटते ग्राफ और भाजपा के बढ़ते ग्राफ की वजह पूछना चाहें, तो मैं [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>सोनिया ने हारों से सबक लेकर कमेटी बनाने का फैसला किया है, लेकिन लालकृष्ण आडवाणी क्षत्रपों को उभारकर पार्टी की जड़ें जमा रहे हैं। कांग्रेस के अब देश में सिर्फ 656 विधायक, जबकि भाजपा के 940 हो गए हैं।</strong></p></blockquote>
<p>अगर कोई कांग्रेस के घटते ग्राफ और भाजपा के बढ़ते ग्राफ की वजह पूछना चाहें, तो मैं कहूंगा कि कांग्रेस में क्षत्रप उभरने नहीं दिए जा रहे और भाजपा में क्षत्रप दिन-प्रतिदिन ताकतवर हो रहे हैं। चार दशक पहले तक कांग्रेस अपनी क्षत्रप नेताओं की वजह से एक मजबूत पार्टी थी, इंदिरा गांधी ने एक-एक करके क्षत्रपों को खत्म कर दिया और कांग्रेस को केंद्रीय नेतृत्व के इर्द-गिर्द सीमित कर दिया। दूसरी तरफ पिछले पांच सालों में भाजपा ने नरेंद्र मोदी, वसुंधरा राजे, प्रेम कुमार धूमल, मेजर भुवन चंद्र खंडूरी और अब येदुरप्पा को क्षत्रप के तौर पर उभरने का पूरा मौका दिया है। <span id="more-273"></span>इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के क्षत्रप नेताओं को धूल चटाकर पार्टी पर एकछत्र नियंत्रण पा लिया था, जो बाद में राजीव गांधी के समय में भी बरकरार रहा। राजीव गांधी के समय में कांग्रेस सत्ता के इर्द-गिर्द मंडराने वाली चौकड़ी बनकर रह गई थी। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के बाद 1991 से 1998 के बीच कांग्रेस एक बार फिर पार्टी के रूप में उभर रही थी, क्षत्रप नेता भी फिर से अपने-अपने राज्यों में अपनी जड़ें जमाने की जद्दोजहद कर रहे थे, तभी कांग्रेस के कुछ नेताओं ने अपने अध्यक्ष सीताराम केसरी को धोखा देकर पार्टी का नेतृत्व सोनिया गांधी को सौंपकर पार्टी को फिर से 1969 से 1990 तक के युग में पहुंचा दिया। नतीजा हमारे सामने है कि कांग्रेस पर सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द मंडराने वाली ऐसी चौकड़ी काबिज हो चुकी है, जो जमीनी आधार वाले क्षत्रपों को उभरने नहीं दे रही है। इंदिरा गांधीे क्षत्रपों को धूल चटाने के बावजूद पार्टी को करिश्माई नेतृत्व देकर चुनावों में सफलता दिलाती रही। लेकिन यह क्षमता सोनिया गांधी के पास नहीं। इसलिए कांग्रेस तब तक अपने पांवों पर खड़ी नहीं हो सकती, जब तक जमीनी नेताओं के हाथ में क्षेत्रीय नेतृत्व नहीं सौंपा जाता। भाजपा वही कर रही है, जो इंदिरा गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने से पहले कांग्रेस में हुआ करता था। भाजपा ने अपने पांच मुख्यमंत्रियों को उनके राज्यों में क्षत्रप के तौर पर उभारकर पार्टी को नई ताकत के साथ 2009 का लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए तैयार कर लिया है।</p>
<p>किसी भी राजनीतिक दल के पास अगर करिश्माई नेतृत्व नहीं है, तो उसकी जमीनी जड़ें मजबूत होना जरूरी है। कांग्रेस को सोनिया गांधी के नेतृत्व पर भ्रम हो गया था, जो अब धीरे-धीरे टूटना शुरू हुआ है, लेकिन अब इतनी देर हो चुकी है कि क्षत्रपों के अभाव में पार्टी को फिर से जमीनी जड़ें जमाना मुश्किल हो रहा है। हालांकि सोनिया गांधी शुरू से कांग्रेस को यह बताती रहीं हैं कि वह करिश्माई नेता नहीं हैं और उन्हें जमीनी स्तर पर अपनी जड़ें मजबूत करनी होंगी। लेकिन इंदिरा गांधी के समय से अपने नेता का चेहरा सामने रखकर चुनाव जीतने के अभ्यस्त हो चुके कांग्रेसी नेताओं ने सोनिया गांधी की बात नहीं मानी और अब असलियत सबके सामने है कि सोनिया उनका बेड़ा पार नहीं कर सकतीं। सोनिया के नेतृत्व पर कांग्रेस को यह भ्रम इसलिए हो गया था क्योंकि जब उन्होंने पार्टी की बागडोर संभाली, तो कांग्रेस सिर्फ आठ राज्यों में सत्तारूढ़ थी। जबकि 1998 से 2003 के पांच सालों में सोनिया की रहनुमाई में कांग्रेस सोलह राज्यों में सत्तारूढ़ हो चुकी थी। आदत के मुताबिक कांग्रेस के नेता इसे सोनिया गांधी का करिश्मा समझने लगे और सोनिया गांधी को भी इसी भ्रम में ला खड़ा किया। जबकि सोनिया गांधी जानती थी कि असलियत यह नहीं है, असलियत यह थी कि जिन-जिन राज्यों में कांग्रेस सत्ता में आई थी, वहां जनता का फैसला गैर कांग्रेसी राज्य सरकारों के खिलाफ था, कांग्रेस के पक्ष में नहीं। ठीक उसी तरह मध्य प्रदेश की दिग्विजय सिंह, छत्तीसगढ़ की अजीत जोगी और राजस्थान की अशोक गहलोत सरकारों के खिलाफ जनता के आक्रोश को एनडीए अपने पक्ष में हवा मान बैठा और आठ महीने पहले ही लोकसभा चुनाव करवाकर हार गया। राजनीतिक दलों को यह समझ आ जाना चाहिए कि राज्य सरकारों के खिलाफ जन आक्रोश विधानसभा चुनाव में भड़कता है और केंद्र सरकार के खिलाफ जन आक्रोश लोकसभा चुनाव में ही भड़कता है। पिछले एक दशक के सभी चुनाव नतीजे देश की जनता के राजनीतिक तौर पर परिपक्व होने का सबूत है। इसलिए 2004 के लोकसभा चुनाव को सोनिया गांधी के पक्ष में जनता का फैसला कहना कांग्रेस की भयंकर भूल थी। जो अब लगातार बारह विधानसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस को समझ आ गई होगी। हालांकि पिछले चार सालों के चुनाव नतीजों से जनता ने 2009 के लोकसभा चुनाव का संकेत देना शुरू कर दिया है।</p>
<p>पिछले पांच सालों में कांग्रेस बारह राज्यों में चुनाव हारी है और इसी दौरान भाजपा ने राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात में दुबारा चुनाव जीतने के बाद अब कर्नाटक में पहली बार खाता खोला है। इसी दौरान भाजपा उड़ीसा में बीजू जनता दल के साथ, पंजाब में अकाली दल के साथ, बिहार में जनता दल के साथ और नगालैंड-मेघालय में वहां के स्थानीय घटक दलों के साथ सत्ता में आई है। इस समय भाजपा के सात अपने मुख्यमंत्री हैं और पांच राज्यों में वह साझा सरकारों में शामिल है। दूसरी तरफ कांग्रेस अपने बूते पर सिर्फ पांच राज्यों आंध्र प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, असम और पांडीचेरी में सत्ता में रह गई है। सहयोगी दलों के बूते जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, मणिपुर और अरुणाचल में इस समय कांग्रेस के मुख्यमंत्री हैं और झारखंड में कांग्रेस के बूते निर्दलियों की सरकार है। भाजपा के सात के मुकाबले कांग्रेसी मुख्यमंत्री भले ही नौ हों, लेकिन भाजपा बड़े राज्यों में अपने बूते पर सत्तारूढ़ है, जबकि कांग्रेस आंध्र को छोड़कर बाकी सभी राज्यों में या तो सहयोगियों पर निर्भर है, या फिर दिल्ली, हरियाणा, पांडीचेरी जैसे छोटे राज्यों में सरकारें हैं। कांग्रेस जिन पांच राज्यों में अपने बूते पर सत्ता में है वहां की कुल लोकसभा सत्तर से कम हैं। जबकि भाजपा जिन राज्यों में सत्तारूढ़ है, वहां की लोकसभा सीटें डेढ़ सौ से ज्यादा हैं। कांग्रेस और भाजपा के ग्राफ का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि जहां सोनिया गांधी के नेतृत्व में देशभर में अब कांग्रेस के सिर्फ 656 एमएलए रह गए हैं, वहां भाजपा के 940 एमएलए हो चुके हैं।</p>
<p>लोकसभा का अगला चुनाव किसी करिश्माई नेता के इर्द-गिर्द नहीं लड़ा जाएगा। कोई करिश्माई नेता अपनी पार्टी को केंद्र में सत्ता नहीं दिला सकता। यह बात सोनिया गांधी पर भी लागू होती है और लाल कृष्ण आडवाणी पर भी। फर्क सिर्फ इतना है कि लालकृष्ण आडवाणी इस बात को बखूबी समझते हैं इसलिए वह क्षत्रप नेताओं को उभारने में जी-जान लगाए हुए हैं और पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत कर रहे हैं, जबकि सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द मंडराने वाले लोग उनको भ्रम जाल में डालकर गलत फहमी का शिकार बनाए हुए हैं। नतीजा यह है कि पार्टी की चुनावी रणनीति क्षत्रपों के मुताबिक उन्हें उभारने के लिए नहीं बनती अलबत्ता हार का ठीकरा उनके सिर फोड़ने और जीत का सेहरा सोनिया गांधी के सिर बांधने के लिए बनती है। कांग्रेस में भी यह चापलूसी वाली संस्कृति बन चुकी है कि हार का ठीकरा अपने सिर फोड़ लेते हैं, जीत का श्रेय सोनिया गांधी को दे देते हैं। गुजरात, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड में चुनाव नतीजों के बाद यही सब देखने को मिला था, कर्नाटक के बाद पहली बार यह देखने को मिला है कि एसएम कृष्णा ने हार का ठीकरा पार्टी हाईकमान की गलत रणनीति के सिर फोड़ा है। कर्नाटक की हार कांग्रेस के लिए एक सबक हो सकती है, अगर कांग्रेस इसे समझे। कर्नाटक की हार के बाद इकत्तीस मई को हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में लगातार हो रही हारों की समीक्षा के लिए एक और कमेटी बनाने का फैसला हुआ है। कांग्रेस जब से सत्ता में आई है, पार्टी और सरकार स्तर पर प्रणव मुखर्जी की रहनुमाई में सत्तर कमेटियां बन चुकी हैं, नई कमेटी किसी की रहनुमाई में भी बने, उसकी कुछ भी सिफारिश हो, जब तक पार्टी में क्षत्रप नहीं उभरेंगे, तब तक कांग्रेस का फिर से जड़ें जमाना संभव नहीं।</p>
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		<title>आतंकवाद राष्ट्रीय मुद्दा घोषित किया जाए</title>
		<link>http://indiagatenews.com/india-news/265.php</link>
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		<pubDate>Sun, 25 May 2008 12:12:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Politicking]]></category>
		<category><![CDATA[Terrorism]]></category>

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		<description><![CDATA[
फैडरल जांच एजेंसी ही नहीं, फैडरल कानून और फैडरल अदालत की भी जरूरत। आतंकवाद से लड़ने के लिए राज्यों और राजनीतिक दलों को तुच्छ राजनीति छोड़नी होगी।

इसी पखवाड़े राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के नोएडा में डा. राजेश तलवार और डा. नूपुर तलवार की चौदह साल की बेटी आरुषि की हत्या हो गई। नोएडा पुलिस ने पहले [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div><span style="font-size: small;"></p>
<blockquote><p>फैडरल जांच एजेंसी ही नहीं, फैडरल कानून और फैडरल अदालत की भी जरूरत। आतंकवाद से लड़ने के लिए राज्यों और राजनीतिक दलों को तुच्छ राजनीति छोड़नी होगी।</p></blockquote>
<p></span></div>
<p><span style="font-size: small;"><span style="font-size: small;">इसी पखवाड़े राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के नोएडा में डा. राजेश तलवार और डा. नूपुर तलवार की चौदह साल की बेटी आरुषि की हत्या हो गई। नोएडा पुलिस ने पहले दिन हत्या के फौरन बाद से गायब घरेलू नौकर हेमराज पर शक किया। हेमराज की तलाश में पुलिस टीम नेपाल भेज दी गई। अगले दिन डा. तलवार के घर की छत पर हेमराज की लाश मिली, तो पुलिस के होश उड़ गए। नोएडा पुलिस लगातार सात दिन तक हवा में तीर मारती रही और अफवाहों को हवा देती रही। <span id="more-265"></span>अखबारों में तरह-तरह की थ्योरियां प्लांट करती रही। आखिर तेईस मई को पुलिस ने एक पोते के दादा पैंतालीस साल के हेमराज और चौदह साल की आरुषि के प्रेम संबंधों की विस्फोटक थ्योरी प्रकट की। थ्योरी का दूसरा हिस्सा था- डा. राजेश तलवार के डा. अनीता दुर्रानी के साथ नाजायज संबंध। पुलिस की थ्योरी यह थी कि बेटी आरुषि और नौकर हेमराज को राजेश तलवार के अनीता दुर्रानी के साथ नाजायज संबंधों का पता चला तो वे दोनों एक-दूसरे के करीब आ गए। डा. तलवार ने अपनी बेटी आरुषि को नौकर के साथ नाजायज हरकतें करते देखा और गुस्से में दोनों की हत्या कर दी। यह थ्योरी प्रकट करते हुए नोएडा पुलिस ने डा. राजेश तलवार को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन अगले ही दिन आरुषि की मां नूपुर तलवार ने पुलिस के सारे आरोपों को बेहूदा, बेवकूफीभरा और झूठा करार देते हुए कहा कि हत्यारे खुले घूम रहे हैं और पुलिस उन्हीं के खिलाफ षड़यंत्र रच रही है।</span></p>
<p><span style="font-size: small;">हत्या के इस मामूली किस्से ने यह जाहिर कर दिया है कि हमारे राज्यों की पुलिस जांच के मामले में कितनी निकम्मी और कमजोर है। राज्यों की ऐसी पुलिस से अंतरराष्ट्रीय साजिश वाली आतंकवादी वारदातों की तह तक जाने की उम्मीद रखना इस देश की भारी भूल होगी। आतंकवाद कोई सामान्य आपराधिक वारदात नहीं है, जिसकी जांच चोरी चकारी रोकने वाली पुलिस के हवाले कर दी जाए। पिछले तीन दशक से आतंकवाद दुनियाभर में बड़ी गंभीर समस्या बना हुआ है और यह स्थानीय स्तर पर काम नहीं कर रहा, अलबत्ता दुनियाभर के आतंकवादी संगठन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, एक-दूसरे को अस्त्र-शस्त्र, आर्थिक मदद और संपर्क मुहैया करवा रहे हैं। कुल मिलाकर आतंकवाद देश पर बाहरी आक्रमण है और संविधान के अनुच्छेद 355 में यह खास प्रावधान किया गया है कि बाहरी आक्रमण से राज्यों की सुरक्षा करना केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है। आतंकवाद को राजनीतिक चश्मे से देखना या आतंकवाद को कानून व्यवस्था का सामान्य समस्या बताना या आतंकवाद को अपराध की सामान्य घटना समझना नादानी ही है। लेकिन अफसोस यह है कि देश के राजनीतिक दल आतंकवाद को राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं, राज्यों की सरकारें आतंकवाद को कानून व्यवस्था का सामान्य मामला बताकर केंद्र सरकार को दखल देने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक दलों और राज्य सरकारों के ये तर्क तब तक ठीक थे जब तक आतंकवाद सिर्फ जम्मू कश्मीर की समस्या थी।</span></p>
<p><span style="font-size: small;">पहले पंजाब और बाद में जम्मू कश्मीर में शुरू हुआ आतंकवाद अब राज्यों की सीमाओं से पार जा चुका है। देशभर में आतंकवादियों का जाल बिछ चुका है, जिनमें ज्यादातर विदेशी और न्यूनतम उनके भारतीय समर्थक हैं, जो उन्हें स्थानीय मदद मुहैया करवाते हैं। किसी राज्य की किसी शहर में होने वाली आतंकवादी वारदात की साजिश किसी और राज्य में रची जाती है, विस्फोटक सामग्री किसी तीसरे राज्य से मंगवाई जाती है और ऑप्रेशन को सरअंजाम देने की जिम्मेदारी किसी चौथे राज्य के आतंकवादियों की होती है। ऐसे हालात में किसी भी राज्य की पुलिस किसी आतंकवादी वारदात के बाद कैसे जांच कर सकती है। हमारे यहां एक राज्य की पुलिस दूसरे राज्य में जाकर जांच करने को समर्थ नहीं है, दूसरे देशों में जाने का तो कोई प्रावधान ही नहीं है, फिर किसी वारदात के अंतरराष्ट्रीय सूत्रों तक कैसे पहुंचा जा सकता है। आतंकवादियों की इस अंतरराष्ट्रीय रणनीति को ग्यारह सितंबर 2001 को न्यूयार्क में हुए आतंकवादी हमले के बाद दुनियाभर में महसूस किया गया, जिसे अमेरिका के स्थानीय आतंकवादियों ने सरअंजाम नहीं दिया था। साजिश अफगानिस्तान में रची गई थी, कोई आतंकवादी पाकिस्तान से गया था, तो कोई सूडान से। न्यूयार्क पर आतंकी हमले के फौरन बाद 27-28 सितंबर 2001 में संयुक्तराष्ट्र ने आतंकवाद के इन पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया। लंबे विचार-विमर्श के बाद संयुक्तराष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने आतंकवाद पर प्रस्ताव संख्या 1373 पास किया और दुनियाभर के देशों को सलाह दी कि वे आतंकवादियों की फंडिंग, स्थानीय मदद, शस्त्रों की सप्लाई आदि रोकने के लिए कड़े कदम उठाएं, जिनमें खुफिया एजेंसियों को मजबूत करना और कानूनों को कड़ा करना भी शामिल था। संयुक्तराष्ट्र के इस प्रस्ताव के बाद दुनियाभर में आतंकवाद से निपटने के लिए अपने-अपने देशों की जरूरतों के मुताबिक कानूनों में बदलाव किया गया।</span></p>
<p><span style="font-size: small;">भारत में भी तभी इन बदलावों की जरूरत महसूस की गई और एनडीए सरकार ने अपराधिक न्याय प्रणाली में बदलावों पर विचार करने के लिए जस्टिस वीएस मलिमथ कमेटी का गठन किया। मलिमथ कमेटी ने सिफारिश की कि आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए देश में एक जांच एजेंसी होनी चाहिए और आतंकवाद से जुड़े मुकदमे एक राष्ट्रीय अदालत के हवाले किए जाने चाहिए। जस्टिस मलिमथ ने सरकार को मौजूदा कानूनों में बदलाव कर कानून कड़े करने की सिफारिश भी की। एनडीए सरकार ने दोनों कदम उठाए। सबसे पहले 25 अक्टूबर 2001 को अध्यादेश के जरिए पोटा कानून लागू किया गया। फिर तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने देशभर के पुलिस प्रमुखों और गृहसचिवों की बैठक बुलाकर आतंकवाद से निपटने के लिए फैडरल जांच एजेंसी का सुझाव रखा। लालकृष्ण आडवाणी के इस सुझाव को इस बैठक में उत्साहवर्धक समर्थन मिला। लेकिन जैसा कि पोटा बिल का राजनीतिक आधार पर विरोध किया गया उसी तरह जब मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई गई तो गैर एनडीए मुख्यमंत्रियों ने इस सुझाव को राज्यों के अधिकारों में दखल करार देते हुए ठुकरा दिया। सुझाव ठुकराने वालों में कांग्रेसी और कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री प्रमुख थे।</span></p>
<p><span style="font-size: small;">उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस प्रमुख प्रकाश सिंह ने पुलिस सुधार से जुड़ी एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी। इस मामले की सुनवाई में मदद के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सोली सोराबजी की रहनुमाई में एक कमेटी बनाई जिसका काम था कि वह पुलिस में सुधार के लिए अपने सुझाव दे। बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह महसूस किया कि आतंकवाद जैसी वारदातों से जुड़ी जांच के लिए देश में एक फैडरल एजेंसी का होना जरूरी है। यह बात 2005 की है, अदालत ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, सोली सोराबजी कमेटी, पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो और केंद्र सरकार से अपनी राय प्रकट करने के लिए कहा। करीब ढाई साल बीत चुके हैं, लेकिन यूपीए सरकार ने फैडरल एजेंसी पर अपनी राय प्रकट नहीं की है। अब देश में लगातार बढ़ रही आतंकवादी वारदातों और यूपीए सरकार का गठन होने के बाद हुई किसी भी वारदात की जांच किसी नतीजे पर नहीं पहुंचने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने फैडरल जांच एजेंसी की जरूरत महसूस की है। लेकिन आतंकवाद से निपटने के लिए बनाए गए पोटा कानून को रद्द करने के बाद फैडरल एजेंसी किसी काम की भी नहीं होगी, क्योंकि फैडरल जांच एजेंसी ही नहीं, अलबत्ता फैडरल कड़ा कानून और फैडरल अदालत की भी जरूरत पड़ेगी, तब जाकर आतंकवाद की मांद में घुसकर प्रहार किया जा सकेगा। देश के मौजूदा कानून, मौजूदा खुफिया एजेंसियां, मौजूदा जांच एजेंसियां आतंकवाद के सामने बौनी दिखाई देती हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यह पैदा होता है कि आतंकवाद से लड़ने के फैडरल ढांचे के बिना दुनियाभर के देशों से आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई और खुफिया एजेंसियों के आदान-प्रदान के समझौतों का क्या मतलब। आतंकवाद से लड़ने के लिए ठोस फैडरल ढांचे की जरूरत है, जिसमें आतंकवादियों और उनके स्थानीय संपर्कों का डाटा, आतंकी संगठनों के अंतरराज्यीय-अंतरराष्ट्रीय संबंधों, वारदातों के तौर-तरीकों, आतंकियों के आर्थिक स्रोतों का विश्लेषण करने के बाद खुफिया तंत्र को मजबूत किया जा सके और उनके खिलाफ प्रो-एक्टिव रणनीति बनाकर सरअंजाम दिया जा सके।</span></p>
<p></span></p>
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		<title>भारत का विभाजन चाहते हैं जेहादी</title>
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		<pubDate>Sun, 18 May 2008 05:23:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Politicking]]></category>

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		<description><![CDATA[
पाकिस्तानी आतंकवादियों को अब भारत में बांग्लादेशी और सिमी के कार्यकर्ता जमीनी मदद दे रहे हैं

भारत में मुसलमानों की आबादी पंद्रह करोड़ के आसपास है। मुसलमानों की आबादी के लिहाज से इंडोनेशिया के बाद भारत का दूसरा नंबर है। दुनियाभर में चल रहे इस्लामिक कट्टरपंथ का भारत के मुसलमानों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। कुछेक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="font-size: small;">पाकिस्तानी आतंकवादियों को अब भारत में बांग्लादेशी और सिमी के कार्यकर्ता जमीनी मदद दे रहे हैं</p>
</blockquote>
<p><span style="font-size: small;">भारत में मुसलमानों की आबादी पंद्रह करोड़ के आसपास है। मुसलमानों की आबादी के लिहाज से इंडोनेशिया के बाद भारत का दूसरा नंबर है। दुनियाभर में चल रहे इस्लामिक कट्टरपंथ का भारत के मुसलमानों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। कुछेक जगहों पर जरूर विभिन्न स्थानीय शिकायतों के कारण मुस्लिम युवक पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आईएसआई और पाकिस्तानी कट्टरपंथी और जेहादी संगठनों के बहकावे में आए होंगे। बहुसंख्यक भारतीय मुसलमान देश के प्रति वफादार और कानून का पालन करने वाले हैं। अगर उनकी छोटी-मोटी शिकायतें रही भी होंगी, तब भी उन्होंने भारत के हिंदुओं और भारतीय सरकार के खिलाफ आतंकवादियों का साथ नहीं दिया। भारत के मुसलमान आधुनिक विचारों के, शांतिप्रिय और विकासशील हैं। <span id="more-259"></span>इसका सबूत यह है कि 1980 के दशक में जब दुनियाभर से करीब दस हजार मुसलमान अफगानिस्तान को सोवियत संघ के चंगुल से बचाने के लिए अफगानिस्तान मुजाहिद्दीन में शामिल हुए थे, तब उनमें भारत का एक भी मुसलमान नहीं था। पाकिस्तान के विभिन्न मदरसों में इस्लामिक शिक्षा के नाम पर जेहाद की ट्रेनिंग दी जा रही है। इन मदरसों में दुनियाभर से मुस्लिम आतंकवाद की ट्रेनिंग लेने जाते हैं, लेकिन ऐसा कोई उदाहरण कभी नहीं मिला, जब भारतीय मुसलमान उन मदरसों में ट्रेनिंग लेने गए हों। ओसामा बिन लादेन की अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक फैडरेशन के तहत दुनियाभर के तेरह आतंकी संगठन शामिल हैं। इनमें भारत से जुड़ा एक भी आतंकी संगठन शामिल नहीं है। सात अक्टूबर 2001 को जब अमेरिकी फौजों ने अलकायदा और तालिबान के ट्रेनिंग कैंपों पर हमले शुरू किए, तो दुनियाभर में मुसलमानों ने विरोध प्रदर्शन किए, लेकिन भारत में कहीं विरोध प्रदर्शन नहीं हुए। अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ शुरू हुई जंग का मुकाबला करने के लिए दुनियाभर से मुसलमान अलकायदा का साथ देने के लिए पाकिस्तान और अफगानिस्तान पहुंचे। लेकिन उनमें भारतीय मुसलमान शामिल नहीं थे। दुनियाभर से जितने मुसलमान पाकिस्तान में इस्लामिक शिक्षा पाने के लिए जाते हैं, करीब-करीब उतने ही मुसलमान इस्लामिक शिक्षा के लिए भारत भी आते हैं। पाकिस्तान से शिक्षा पाकर लौटे मुसलमान अपने देशों में लौटकर आतंकवाद फैलाते हैं, नशीली दवाओं का अवैध धंधा करते हैं और अपने देश में कानून व्यवस्था तोड़ने वाले बनते हैं, जबकि भारत से शिक्षा हासिल करके लौटे हामिद करजई अफगानिस्तान के राष्ट्रपति बन गए। इससे स्पष्ट है कि ओसामा बिन लादेन और पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई की बरसों की मेहनत भारतीय मुसलमानों की देशभक्ति को हिला नहीं सकी।</span></p>
<p><span style="font-size: small;">1989 से 1993 तक जम्मू कश्मीर में पाकिस्तानी आतंकवादी नहीं घुसे थे, उन्होंने कश्मीर के युवकों को बहला-फुसलाकर आतंकवाद की राह पर लाने में सफलता हासिल की थी। पाकिस्तान इन युवकों को पीछे से मदद कर रहा था, लेकिन जब स्थानीय युवक सफल नहीं हुए, तो पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई ने पाकिस्तान में प्रशिक्षित किए गए आतंकवादियों की घुसपैठ करवानी शुरू कर दी। जम्मू कश्मीर में घुसपैठ करने वाले आतंकवादी वही थे, जो अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ जंग जीतकर वापस लौटे थे। तब से पाकिस्तानी आतंकवादी जम्मू कश्मीर में कश्मीरी युवकों के नाम पर आतंकवाद का झंडा बुलंद किए हुए हैं। जम्मू कश्मीर में हुए आत्मघाती हमलों में शामिल सभी युवक पाकिस्तानी या अफगानिस्तानी ही पाए गए हैं। पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई एक मकसद को लेकर भारत में आतंकवाद फैला रही है। बांग्लादेश का निर्माण होने के बाद पाकिस्तान में भारत को तोड़ने की रणनीति बनाई गई। इसी रणनीति के तहत अस्सी के दशक में जहां एक तरफ जम्मू कश्मीर में कश्मीरी युवकों को भारत के खिलाफ आतंकवाद के लिए तैयार किया गया। वहां दूसरी तरफ पंजाब में सिखों को हिंदुओं के खिलाफ भड़काकर आतंकवाद फैलाया गया। पाकिस्तान को न कश्मीर में सफलता मिली, न पंजाब में। 1993 में मुंबई में बम धमाकों को सरअंजाम करने के बाद पाकिस्तान गए दाऊद इब्राहिम की मदद से आईएसआई ने अपनी रणनीति को सफल बनाने के लिए दूसरे तरीके इस्तेमाल करने शुरू कर दिए। इसके तहत कई जगहों पर दाऊद के आदमियों को आतंकवाद के लिए इस्तेमाल किया गया और उनके माध्यम से जगह-जगह पर स्थानीय कारणों से नाराज गरीब मुस्लिम युवकों को बहका-फुसलाकर आतंकी वारदातों के लिए राजी किया गया। पाकिस्तानी आतंकवादियों के उकसावे पर पहले उत्तर प्रदेश में और बाद में देशभर में इस्लामिक स्टूडेंट मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के नाम से अलगाववादी संगठन खड़ा हुआ। आखिर बीस साल की मेहनत के बाद आईएसआई भारतीय मुसलमानों में अपने सैल कायम करने में कामयाब हो गई है।</span></p>
<p><span style="font-size: small;"><span style="font-size: small;">पाकिस्तानी जेहादी संगठनों हरकत-उल-मुजाहिद्दीन, हरकत-उल- जेहाद- अल-इसलामी, लश्कर-ए-तोएबा, जैश-ए- मुहम्मद और लश्कर-ए-झांगवी में से पहले चार संगठन भारत में काम कर रहे हैं। जबकि इनमें से आखिरी संगठन लश्कर-ए-झांगवी पाकिस्तान में सुन्नियों का शिया विरोधी आतंकी संगठन। भारत में आतंकवाद फैलाने वाले चारों पाकिस्तानी आतंकी संगठन भारतीयों को यह कहकर बहका रहे हैं कि उनका इरादा कश्मीर को हिंदू भारत से आजाद करवाना है और अंतिम लक्ष्य भारत के बाकी पंद्रह करोड़ मुसलमानों को आजादी दिलाकर दो नए मुस्लिम देश बनाने हैं। जेहादी संगठनों का लक्ष्य उत्तर भारतीय मुसलमानों को भारत से अलग करके नया देश बनाकर देना और दक्षिण भारतीय मुसलमानों के लिए अलग मुस्लिम देश का गठन करना है। इसी लंबे मकसद को हासिल करने के लिए पाकिस्तानी जेहादी संगठनों ने आईएसआई की मदद से भारतभर में आतंकवादी वारदातें शुरू की हुई हैं। पाकिस्तानी जेहादी संगठनों को भारतीय मुसलमानों का साथ तो नहीं मिल रहा, लेकिन बड़ी तादाद में भारत में आकर बसे बांग्लादेशी उनके लिए कारगर साबित हो रहे हैं। बांग्लादेशियों को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए आईएसआई ने योजनाबध्द तरीके से बांग्लादेश में आतंकी संगठन हरकत-उल-जेहाद-ए-इसलामी(हूजी) को खड़ा किया और हूजी के आतंकियों को भारत में अपने ऑपरेशन के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। हाल ही की कई आतंकवादी वारदातों में लश्कर-ए-तोएबा या जैश-ए-मुहम्मद की बजाए हूजी का हाथ होने के सबूत मिले हैं। भारत सरकार के पास ऐसी पुख्ता जानकारियां हैं कि पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आईएसआई का बांग्लादेशी गुप्तचर एजेंसी के साथ तालमेल बना हुआ है और दोनों देश मिलकर भारत के खिलाफ जेहादियों की मदद कर रहे हैं। इस मामले में भारत में रह रहे बांग्लादेशियों के साथ-साथ सिमी में सक्रिय हुए भारतीय मुस्लिम युवक उन्हें स्थानीय स्तर पर मददगार हो रहे हैं। जिन-जिन जगहों पर भारतीय मुसलमान पाकिस्तानी-बांग्लादेशी जेहादियों का आतंकवाद में साथ नहीं दे रहे हैं, वहां-वहां मुस्लिम आबादियां और मस्जिदें भी आतंकवाद का शिकार हो रही हैं। इसका उदाहरण हमने आठ सितंबर 2006 को मालेगांव की मस्जिद में हुए विस्फोटों और 18 मई 2007 को हैदराबाद की मक्का मस्जिद में हुए विस्फोटों के रूप में देखे हैं। आतंकियों का मकसद भारतीय हिंदुओं और देशभर के मुसलमानों को आतंकित करना तो है ही, दोनों समुदायों में एक-दूसरे के खिलाफ शक पैदा करना भी है। इसीलिए योजनाबध्द तरीके से 14 फरवरी 1998 को कोयम्बटूर में लालकृष्ण आडवाणी के दौरे के समय बम धमाके किए गए। फिर संसद पर हमले के बाद 24 सितंबर 2002 को अक्षरधाम मंदिर में और पांच जुलाई 2005 को अयोध्या, तीन मार्च 2006 को वाराणसी के मंदिरों पर आतंकी हमले हुए और अब तेरह मई 2008 को जयपुर के हनुमान मंदिर के अंदर और बाहर बम धमाके। सोमवार को शिवमंदिरों पर, मंगलवार को हनुमान मंदिरों पर और शुक्रवार को मस्जिदों में बम धमाकों से जेहादियों के इरादे समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए।</span></span></p>
<p><span style="font-size: small;">भारत सरकार इन सभी तथ्यों को नजरअंदाज करके आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ रही है। भारत सरकार के सामने यह दुविधा भी है कि आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करते समय स्थानीय बेकसूर मुसलमान कानून का शिकार न हों। हालांकि सिमी के बैनर तले भारतीय मुसलमानों की भागीदारी के बाद यह काम बहुत मुश्किल हो गया है। केंद्र सरकार की इसी संवेदनशीलता का जेहादी संगठन फायदा उठा रहे हैं और स्थानीय मुसलमानों को आतंकवाद के खिलाफ बनाए गए कड़े कानून के खिलाफ भड़काते रहते हैं। नतीजा यह निकला है कि आतंकवाद के खिलाफ बने टाडा को राजनीतिक दबाव में रद्द करना पड़ा और बाद में एनडीए सरकार के समय बने पोटा के खिलाफ सिमी जैसे संगठन ने मुहिम छेड़कर देश के सेक्युलर दलों को पोटा के खिलाफ लामबंद कर दिया। नतीजतन पोटा को भी रद्द कर दिया गया, जबकि पोटा न्यूयार्क में हुए नाइन-इलेवन की आतंकवादी वारदात के बाद संयुक्तराष्ट्र की सभी देशों को सख्त कानून बनाने की हिदायत के तहत बनाया गया था। आतंकवाद के खिलाफ बनाकर रद्द किए गए कानूनों से पाकिस्तानी-बांग्लादेशी जेहादियों के हौंसले बुलंद हुए हैं और वे इन दोनों कानूनों के रद्द होने को अपनी रणनीति की सफलता मानते हैं। निराशाजनक बात यह है कि जहां इन दोनों आतंकवाद विरोधी कानूनों को रद्द करने से भारत की आतंकवाद से लड़ने की इच्छाशक्ति में कमजोरी झलकती है, वहां आतंकवादियों के अड्डे बन चुके बांग्लादेशियों के ठिकाने राजनीतिक दलों की मजबूरी बन चुके हैं। देश की जनता में अपनी साख खो चुके राजनीतिक दल बांग्लादेशियों के अवैध वोटों को सत्ता की सीढ़ी बना चुके हैं। जाने-अनजाने वही राजनीतिक दल और नेता भारत के बटवारे की कोशिश में जुटे आतंकवादियों के मददगार बन गए हैं।</span></p>
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		<title>कांग्रेस के करिश्माई नेतृत्व का अंत</title>
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		<pubDate>Sat, 10 May 2008 18:34:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[राजनीति में हर छोटी बात का महत्व होता है। यह अनुभव से ही आता है। गुजरात विधानसभा के चुनावों में सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर ही तो कहा था। इस छोटी सी बात से गुजरात में कांग्रेस की लुटिया डूब गई। चुनाव जब शुरू हुआ था तो कांग्रेस का ग्राफ चढ़ा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size: small;">राजनीति में हर छोटी बात का महत्व होता है। यह अनुभव से ही आता है। गुजरात विधानसभा के चुनावों में सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर ही तो कहा था। इस छोटी सी बात से गुजरात में कांग्रेस की लुटिया डूब गई। चुनाव जब शुरू हुआ था तो कांग्रेस का ग्राफ चढ़ा हुआ था और दिल्ली के सारे सेक्युलर ठेकेदार ताल ठोककर कह रहे थे कि इस बार मोदी नप जाएंगे। चुनावी सर्वेक्षण भी कुछ इसी तरह के आ रहे थे। लेकिन जैसे-जैसे चुनावी बुखार चढ़ा। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी मौत के सौदागर जैसी छोटी-छोटी गलतियां करती चली गई और आखिर में कांग्रेस बुरी तरह लुढ़क गई। सोनिया गांधी को तो अपनी गलती का अहसास हो गया होगा, लेकिन उनके इर्द-गिर्द चापलूसों का जो जमावड़ा खड़ा हो गया है उसने वक्त रहते गलती सुधारने नहीं दी। <span id="more-251"></span>कांग्रेस ने ताल ठोककर कहा कि सोनिया गांधी ने जो कहा, ठीक कहा। दूसरी तरफ 2004 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी को मिक्स ब्रीड का बछड़ा कहकर जो गलती की थी, उस पर भारतीय जनता पार्टी ने कड़ा ऐतराज जताया था। नरेंद्र मोदी ने अपना वाक्य वापस भी ले लिया था, इसके बावजूद गुजरात में भाजपा की लोकसभा सीटें घट गई थी। इसलिए चुनावों के समय की गई हर छोटी-मोटी गलती का चुनाव नतीजों पर गहरा असर पड़ता है।</span></p>
<p><span style="font-size: small;">गुजरात विधानसभा के चुनाव नतीजों से यह समझ आ जाना चाहिए कि 2004 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को 145 सीटें सोनिया गांधी के किसी करिश्मे के कारण नहीं मिली थी। कांग्रेस की सीटों में कोई बहुत ज्यादा इजाफा नहीं हुआ था जो उसे सोनिया गांधी का करिश्मा कहा जाए। पांच साल पहले सोनिया गांधी की रहनुमाई में ही कांग्रेस 114 सीटें जीती थी और 2004 में बढ़कर 145 हो गई थी। नरसिंह राव भी 1996 में कांग्रेस को 140 सीटें दिला लाए थे और सीताराम केसरी ने भी 1998 में कांग्रेस को 141 सीटें दिला दी थी। इसलिए सोनिया गांधी किसी भी तरह नरसिंह राव या सीताराम केसरी से बडी साबित नहीं हुई। कांग्रेस पिछले बारह सालों में हुए चार लोकसभा चुनावों में 114 से 145 सीटों के बीच लुढ़क रही है। इनमें से दो चुनाव सोनिया गांधी की रहनुमाई में लड़े गए हैं। कांग्रेस अगर यह समझती है कि चार साल के यूपीए शासन में सरकारी इश्तिहारों पर असंवैधानिक ढंग से सोनिया गांधी के फोटो छापने से उनकी लोकप्रियता में इजाफा हो गया है और लोकसभा चुनावों में उन्हें फायदा होगा, तो वे निश्चित रूप से गलतफहमी का शिकार हैं। इन्हीं पिछले चार सालों में यूपी, बिहार, पंजाब, कर्नाटक, हिमाचल, उत्तराखंड, गुजरात, मेघालय, नगालैंड और बंगाल में सोनिया गांधी की लोकप्रियता का इम्तिहान हो चुका है। इन दस में से पांच राज्यों कर्नाटक, मेघालय, पंजाब, हिमाचल, उत्तराखंड में अच्छी-भली कांग्रेस की सरकारें थी। कांग्रेस गोवा में गवर्नर के दुरुपयोग से, झारखंड में राजनीतिक बेईमानी से और महाराष्ट्र में शरद पवार के बूते पर सरकार में है। सिर्फ आंध्र प्रदेश और हरियाणा ऐसे दो राज्य हैं जहां कांग्रेस क्षेत्रीय दलों क्रमश: तेलुगूदेशम और इनलोद के शासन को ध्वस्त करके नकारात्मक वोटों के भरोसे सत्ता में पहुंची है। एकमात्र दिल्ली ऐसा राज्य है जहां सोनिया गांधी के बागडोर संभालने के बाद कांग्रेस लगातार दस साल से सत्ता में है।</span></p>
<p><span style="font-size: small;">सोनिया गांधी के तथाकथित करिश्मे की इस हकीकत के बावजूद कांग्रेस पता नहीं किस भरोसे पर 2009 का लोकसभा चुनाव जीतने का भ्रम पाले हुए है। कांग्रेस मोटे तौर पर दो कारणों से आशान्वित है। पहला कारण राहुल गांधी का नेहरू-इंदिरा परिवार के नए वारिस के तौर पर उभरना और दूसरा कारण मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, बिहार, गुजरात और उत्तर प्रदेश में गैर कांग्रेसी सरकारों के नकारात्मक वोट। अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव का आंकलन लगाने से पहले हमें पिछले लोकसभा चुनाव की याद करनी चाहिए। पांच साल पहले भी कांग्रेस इन्हीं दो कारणों से सत्ता तक पहुंची थी। कांग्रेस के सत्ता में आने की उम्मीद की एक वजह थी सोनिया गांधी का करिश्मा, जो कांग्रेस को लगातार राज्यों में दुबारा सत्ता में ला रही थी। सोनिया गांधी के पार्टी अध्यक्ष बनने से पहले कांग्रेस पूर्वोत्तर के छोटे-मोटे चार राज्यों समेत पूरे देश में सिर्फ आठ राज्यों में सिमट गई थी। सोनिया के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद धीरे-धीरे यह संख्या बढ़कर तेरह हो गई थी। हालांकि नए राज्यों में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के नकारात्मक वोटों के कारण सत्ता में आई थी, लेकिन पार्टी की चापलूसी आधारित राजनीति के तहत उसे सोनिया गांधी का करिश्मा कहकर प्रचारित किया जा रहा था। सोनिया गांधी का करिश्मा लोकसभा चुनावों में कितना काम किया उसका खुलासा हम ऊपर कर चुके हैं। उनके अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस 1999 में 141 सीटों से घटकर 114 पर आ गई थी और छह साल के एनडीए शासन के बाद उसके नकारात्मक वोटों के भरोसे 145 पर आई। इसलिए सोनिया गांधी का करिश्मा मानना कांग्रेस का खुद को धोखे में रखना ही है। छह साल के एनडीए शासन के बावजूद कांग्रेस 2004 में वहीं खड़ी थी, जहां 1996 में नरसिंह राव ने छोड़ा था। अलबत्ता एनडीए के नकारात्मक वोटों का प्रभाव न होता तो कांग्रेस वही 114 सीटों पर खड़ी रहती, जहां 1999 में सोनिया गांधी ने पहुंचाया था। पिछले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का ग्राफ ज्यादा गिरा, लेकिन कांग्रेस का ग्राफ उतना नहीं बढ़ा। भाजपा 182 सीटों से घटकर 138 पर आ गई, उसकी 44 सीटें घटी, लेकिन कांग्रेस की सिर्फ 31 सीटें बढ़ी। इसका मतलब यह हुआ कि सोनिया का करिश्मा तो चला ही नहीं, एनडीए के नकारात्मक वोटों का भी कांग्रेस को उतना फायदा नहीं हुआ। करिश्मे और नकारात्मक वोटों का पिछला हिसाब-किताब सामने रखकर ही हमें 2009 के लोकसभा चुनावों का आंकलन करना चाहिए, क्योंकि कांग्रेस गैर कांग्रेसी राज्यों के नकारात्मक वोटों और राहुल गांधी के करिश्मे पर उम्मीद लगाकर चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है। अपने पांच साल के शासनकाल से सकारात्मक वोटों की उम्मीद कांग्रेस को कतई नहीं है, इसलिए मनमोहन सिंह को दरकिनार कर राहुल गांधी को युवराज की तरह चुनाव मैदान में उतारा जा रहा है।</span></p>
<p><span style="font-size: small;">पहले बीजेपी के नकारात्मक वोटों की बात। कांग्रेस मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में जरूर भरोसा कर सकती है। इन तीनों भाजपाई राज्यों के नकारात्मक वोटों का कांग्रेस को कुछ न कुछ फायदा जरूर हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं कहा जा सकता कि केंद्र सरकार की महंगाई जैसी नकारात्मक बातों का वोटरों के दिलो-दिमाग पर असर नहीं पड़ेगा। वोटर अब लोकसभा और विधानसभा चुनावों में फर्क को बखूबी जानता है और राज्यों के नकारात्मक वोट केंद्र में कांग्रेस के लिए सकारात्मक नहीं हो सकते। अलबत्ता इन तीनों राज्यों में भी कांग्रेस को केंद्र सरकार की नाकामियों के नकारात्मक वोटों का सामना करना पड़ेगा। फिर भी अगर इन तीन राज्यों से कांग्रेस को कुछ फायदा हुआ भी, तो उतना नुकसान आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में हो जाएगा। बंगाल, तमिलनाडु से कांग्रेस कोई उम्मीद पाले ही ना। कर्नाटक में भी सीटें बढ़ने से रही। अगर कांग्रेस बिहार, उत्तर प्रदेश और गुजरात से किसी तरह की उम्मीद रख रही हो, तो निश्चित रूप से गलतफहमी का शिकार है। इन तीनों राज्यों में कांग्रेस दो दशक से सत्ता से बेदखल है और पिछले एक दशक से तो सोनिया गांधी के करिश्मे का दो-दो बार और राहुल गांधी के करिश्मे का भी एक बार इम्तिहान हो चुका है। राहुल इन तीनों राज्यों में अपने रोड-शो में पिट चुके हैं। चुनावों के दौरान और चुनावों से पहले राजनीति में हर छोटी-मोटी गलती का महत्व होता है। अब जबकि लोकसभा चुनावों की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं, तो राहुल गांधी की फैसला लेने वाली पहली गलती सामने आ चुकी है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश दास ही एकमात्र ऐसे कांग्रेसी नेता थे, जो एक दशक से अपनी जड़ें जमाने की कोशिशों में लगे हुए थे। उनकी जड़ें मजबूत हो भी गई थी, यही वजह थी कि कांग्रेस ने पिछले चुनावों में अखिलेश दास को अटल बिहारी वाजपेयी के सामने चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया था। लेकिन जमीनी हकीकत से नावाकिफ राहुल गांधी ने अपने चापलूस समर्थकों के कहने पर अखिलेश दास को केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटवाकर कांग्रेस को ही कमजोर किया है। जवाहर लाल नेहरू के समय तक कांग्रेस के ताकतवर क्षत्रप हुआ करते थे, जिनकी अनदेखी करके कांग्रेस आलाकमान पार्टी और संगठन के फैसले लेने की ताकत नहीं रखता था, इंदिरा गांधी ने इन सभी क्षत्रपों को एक-एक करके धराशाही कर दिया। दिल्ली के इशारों पर मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष बदले जाने लगे, नतीजा यह निकला कि कांग्रेस जड़ों से कट गई। अखिलेश दास के मामले में नए करिश्माई नेता की ओर से लिए गए फैसले को भी उसी रौशनी में देखा जा सकता है।</span></p>
<p><span style="font-size: small;">चुनाव मैदान में उतरने वाला हर कांग्रेसी अब यह जानता है कि सोनिया गांधी या राहुल गांधी उसके चुनाव की नैय्या पार नहीं लगा सकते। इसलिए कांग्रेस के नेता अब उनके फैसलों को आलाकमान का आदेश मानकर वैसे ही नहीं मानते, जैसे इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के जमाने में मानने लगे थे। कांग्रेस के दिग्गज नेता अर्जुन सिंह ने सोनिया गांधी के फैसले लेने की पध्दति पर सवाल उठाकर पार्टी में आने वाले बिखराव के संकेत दे दिए हैं। अर्जुन सिंह का बयान ठीक उस समय आया है जब कांग्रेस के दो सांसदों कुलदीप विश्नोई और मदन लाल शर्मा ने सोनिया गांधी के नेतृत्व को खुली चुनौती दी है और तीसरे सांसद अखिलेश दास ने सोनिया के साथ-साथ राहुल गांधी को भी चुनौती दे दी है। इन चार नेताओं के रुख से स्पष्ट है कि सोनिया गांधी का पार्टी को एकजुट रखने का करिश्मा ढल रहा है और राहुल का करिश्मा जोर पकड़ने का नाम नहीं ले रहा है।</span></p>
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		<title>लूट मची है लूट, लूट सके तो लूट</title>
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		<pubDate>Sat, 26 Apr 2008 18:40:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[टी.आर. बालू ने तो बिना राग-द्वेष के मंत्री पद की जिम्मेदारी निभाने की शपथ का उल्लंघन किया ही है। टी.आर. बालू के परिवार की बंद पड़ी और फर्जी कंपनियों को कौड़ियों के भाव सीएनजी दिलवाने में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की दिलचस्पी से सार्वजनिक जीवन में शुचिता का सवाल खड़ा होता है।
&#8221;मैं टी.आर. बालू ईश्वर के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><font size="2">टी.आर. बालू ने तो बिना राग-द्वेष के मंत्री पद की जिम्मेदारी निभाने की शपथ का उल्लंघन किया ही है। टी.आर. बालू के परिवार की बंद पड़ी और फर्जी कंपनियों को कौड़ियों के भाव सीएनजी दिलवाने में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की दिलचस्पी से सार्वजनिक जीवन में शुचिता का सवाल खड़ा होता है।</font></p></blockquote>
<p><font size="2">&#8221;मैं टी.आर. बालू ईश्वर के नाम पर शपथ लेता हूं कि कानून द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रध्दा व निष्ठा बनाए रखूंगा। मैं भारत की एकता और अखंडता अक्षुण बनाए रखूंगा। मैं केंद्र में मंत्री के नाते अपने अंत:करण और पूरी निष्ठा से अपने कर्तव्यों का निवर्हन करूंगा। संविधान और कानून के मुताबिक बिना किसी डर, पक्षपात, राग या द्वेष सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करूंगा।&#8221; </font><font size="2">यह शपथ टी.आर. बालू ने केंद्र में मंत्री बनते समय ली थी। यही शपथ बालू से ठीक पहले मनमोहन सिंह ने भी ली थी। लेकिन पिछले चार साल से टी.आर. बालू लगातार अपनी पारिवारिक कंपनियों को कोड़ियों के भाव सीएनजी उपलब्ध करवाने की कोशिश में जुटे हुए हैं और केंद्र सरकार पर लगातार दबाव बना रहे हैं।<span id="more-237"></span> टी.आर. बालू ने 24 अप्रेल को राज्यसभा में कबूल किया है कि उन्होंने अपने बेटों की कंपनियों को सीएनजी दिलवाने के लिए पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा से सिफारिश की है। राष्ट्रपति भवन में मंत्री पद की शपथ लेते समय देश से किए गए वायदे को पूरी तरह भूलकर बालू इस सिफारिश में कुछ गलत नहीं मान रहे।</p>
<p>इस घटना से अंदाज लग सकता है कि सांसदों और विधायकों में मंत्री पद हासिल करने के लिए होड़ क्यों लगती है। मंत्री पद हासिल करने के बाद अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए वे अपने और अपने परिवार के लिए क्या-क्या हासिल करते होंगे। टी.आर. बालू ने राज्यसभा में खुद को निरीह और वाजपेयी सरकार का सताया हुआ बताकर न्याय के लिए मुरली देवड़ा से गुहार लगाने की बात कही है। उनका कहना है कि द्रमुक क्योंकि लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए छोड़ गई थी, इसलिए वाजपेयी सरकार ने उनकी पारिवारिक कंपनियों को अलाट सीएनजी रद्द कर दी थी। जबकि सच यह नहीं है, उन्होंने राज्यसभा में तथ्य तोड़-मरोड़कर पेश किए हैं और संसद को भी गुमराह किया है। सच यह है कि टी.आर. बालू के बेटे सेल्वा कुमार की कंपनी किंग पावर कारपोरेशन जमीन पर है ही नहीं। दूसरे बेटे राजकुमार की कंपनी किंग कैमिकल्स को बीमारू घोषित किया जा चुका है। बालू यूपीए सरकार पर इन्हीं दो कंपनियों को सीएनजी अलाट करने का दबाव बना रहे थे। सीएनजी की बाजार में कीमत छह से सोलह डालर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट है। जबकि टी.आर. बालू चाहते हैं कि उनके बेटों की इन दोनों फर्जी कंपनियों को दो डालर से भी कम कीमत पर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल इकाई सीएनजी सप्लाई की जाए। असल में वाजपेयी सरकार के समय किंग पावर कारपोरेशन को दस हजार स्टेंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रतिदिन और किंग कैमिकल्स को पचास हजार स्टेंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रतिदिन सप्लाई का फैसला हुआ था। लेकिन एक साल के लिए सीएनजी सप्लाई का समझौता सिर्फ किंग कैमिकल्स के साथ ही हुआ। किंग कैमिकल्स को किसी कंपनी के साथ सीएनजी के ट्रांसपोर्टेशन का समझौता करना था, तभी सीएनजी सप्लाई शुरू होती। किंग कैमिकल्स को बार-बार नोटिस दिए गए लेकिन वह ट्रांसपोर्टेशन  का समझौता नहीं कर पाई। जब समय निकल गया तो टी.आर. बालू ने समय बढ़ाने की मांग की, जिसे वाजपेयी सरकार ने कबूल नहीं किया। इस बीच मामला मद्रास हाईकोर्ट में चला गया, हाईकोर्ट ने बालू के पक्ष में फैसला किया। उस इलाके में सीएनजी हासिल करने वाली बाकी कंपनियों को लगा कि उनके कोटे का सीएनजी काटकर टी.आर. बालू की कंपनी को मिल जाएगा। इसलिए वे हाईकोर्ट की बड़ी बेंच के सामने पेश हुए। बड़ी बेंच ने फैसला किया कि इस मामले को पेट्रोलियम मंत्रालय सुलझाए। कोर्ट के इस फैसले के बाद से टी.आर. बालू केंद्रीय सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि उनके बेटों की कंपनियों को सस्ते रेट पर सीएनजी सप्लाई की जाए।</p>
<p>वाजपेयी सरकार के समय सांसदों के परिजनों और भाजपा वर्करों को पेट्रोल पंप और गैस एजेंसियों के आवंटन का मामला उजागर हुआ था तो सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई थी। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी लगातार प्रहार कर रही थी, मामला अभी कोर्ट में चल ही रहा था कि वाजपेयी ने अपने कार्यकाल में अलाट किए गए सभी पेट्रोल पंप और गैस एजेंसियां रद्द कर दी थी। यह होती है लोक-लाज। लेकिन मनमोहन सरकार के मंत्री टी.आर. बालू यह कहने में कोई शर्म महसूस नहीं करते कि उन्होंने अपने परिजनों की कंपनियों को सीएनजी अलाट करवाने की कोशिशों में कोई गलती की। अपने परिजनों और पार्टी परिजनों को रसोई गैस और पेट्रोल पंपों के लाइसेंस देने के मामले में नरसिम्हा राव सरकार के पेट्रोलियम मंत्री सतीश शर्मा दोषी करार दिए जा चुके हैं। अपने सगे संबंधियों और कांग्रेस पार्टी के सगे मंत्रियों को डीडीए के फ्लैट और जमीन बिना बारी के अलाट करने के मामले में राव सरकार की शहरी विकास मंत्री शीला कौल को अदालत दोषी करार दे चुकी है। एक करोड़ अड़सठ लाख रुपए के टेलीकॉम घोटाले के मामले में नरसिम्हा राव सरकार के संचार मंत्री सुखराम को अदालत तीन साल कैद की सजा सुना चुकी है। नरसिंह राव के बेटे प्रभाकर राव और राव सरकार के फर्टिलाइजर मंत्री राम लखन यादव के बेटे की साझा फर्म की ओर से एक सौ तेतीस करोड़ रुपए के यूरिया घोटाले का अभी तक कोई ओर-छोर नहीं मिला। यह अच्छी बात है कि कांग्रेस ने टी.आर. बालू का बचाव करने में परहेज किया है और कांग्रेस की प्रवक्ता जयंती नटराजन ने कहा है कि कांग्रेस पार्टी का रिकार्ड सार्वजनिक जीवन में शुचिता का है।</p>
<p>सार्वजनिक जीवन में कांग्रेस पार्टी की शुचिता के रिकार्ड पर नजर डालें तो आजादी के बाद शुरू-शुरू में शुचिता के कुछ बेहतरीन उदाहरण जरूर मिलते हैं। टी.आर. बालू से मिलता-जुलता ही मामला पंजाब में हुआ था। जब विपक्ष ने कांग्रेसी मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो पर अपने परिजनों को फायदा पहुंचाने के गंभीर आरोप लगाए थे। जवाहर लाल नेहरू ने जांच के लिए दास आयोग का गठन किया। आरोप सही साबित हुए और प्रताप सिंह कैरो को इस्तीफा देना पड़ा। देश के पहले वित्तमंत्री आर.के. षणमुखम शेट्टी, उद्योग मंत्री केशव देव मालवीय, संचार मंत्री खुर्शीद लाल, विंध्याचल प्रदेश के उद्योग मंत्री राजशिव बहादुर रिश्वतखोरी में हटा दिए गए थे। लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने करोड़ों का जीप घोटाला करने वाले ब्रिटेन में भारत के हाई कमिश्नर वी. के. कृष्ण मेनन को अपने मंत्रिमंडल में मंत्री बनाकर राजनीतिक शुचिता पर पहला धब्बा लगाया था। मुंदरा घोटाले के सरगना टी. टी. कृष्णामचारी को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा, उन्हें बाईस महीने कैद की सजा हुई, लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें क्लीन चिट देकर दुबारा मंत्री बना दिया। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के कार्यकाल में हुए बेइंतहा घोटालों के बावजूद कांग्रेस सार्वजनिक जीवन में शुचिता का दावा करने का पूरा हक रखती है, लेकिन कांग्रेस को इस बात का जवाब देना चाहिए कि टी.आर. बालू के बेटों की दोनों बंद कंपनियों को कौड़ियों के भाव सीएनजी उपलब्ध करवाने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पेट्रोलियम मंत्रालय को एक-एक कर आठ चिट्ठिया क्यों लिखीं। टी.आर. बालू खुद 28 जून 2006 को पेट्रोलियम मंत्रालय जाकर मंत्री मुरली देवड़ा से मिले थे। यह मुलाकात पहले से तय की गई थी और बालू को फायदा पहुंचाने का रास्ता निकालने के लिए ओएनजीसी और गेल के चेयरमैनों को पेट्रेलियम मंत्री ने पहले से अपने कमरे में बुला रखा था। दोनों चेयरमैन किसी भी कीमत पर झुकने को तैयार नहीं हुए, तो कोई न कोई रास्ता निकालने का दबाव बनाया गया। जब बात नहीं बनी तो टी.आर. बालू ने सीधे प्रधानमंत्री को दखल देने के लिए कहा और 13 नवंबर 2007 से लेकर 4 फरवरी 2008 तक पौने तीन महीनों में प्रधानमंत्री कार्यालय से पेट्रोलियम मंत्रालय को आठ चिट्ठिया लिखी गई। राजनीति के शोर में भले ही यह मामला दब जाएगा, लेकिन इस मामले को दबाकर सार्वजनिक जीवन में राजनीतिक शुचिता का दावा कोई नहीं कर सकता।</p>
<p></font></p>
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		<title>चाटुकारिता तो कांग्रेस की राजनीति का गहना</title>
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		<pubDate>Sat, 19 Apr 2008 18:40:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Politicking]]></category>

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		<description><![CDATA[
सोनिया गांधी इस बात से इनकार नहीं कर सकती कि कांग्रेस में चाटुकारिता नहीं। कांग्रेस की राजनीति चाटुकारिता आधारित है इसीलिए तो पार्टी में परिवारवाद चल रहा है।
कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को पार्टी जितनी तवज्जो दे रही है इतनी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नहीं मिल रही। अब तक तो कांग्रेस के पोस्टर बैनरों पर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size="2"></p>
<blockquote><p><strong>सोनिया गांधी इस बात से इनकार नहीं कर सकती कि कांग्रेस में चाटुकारिता नहीं। कांग्रेस की राजनीति चाटुकारिता आधारित है इसीलिए तो पार्टी में परिवारवाद चल रहा है।</strong></p></blockquote>
<p>कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को पार्टी जितनी तवज्जो दे रही है इतनी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नहीं मिल रही। अब तक तो कांग्रेस के पोस्टर बैनरों पर सोनिया गांधी के साथ कहीं कभी कभी मनमोहन सिंह का फोटो दिखाई भी दे जाता था। लेकिन राहुल गांधी को पार्टी महासचिव बनाए जाने के बाद मनमोहन सिंह एकदम गायब हो गए हैं। कांग्रेस में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के बाद दूसरा स्थान राहुल ने हासिल कर लिया है और मनमोहन तीसरे स्थान पर चले गए हैं। तीसरे स्तर के नेता को पार्टी में जितना महत्व मिलना चाहिए, उतना ही मिल रहा है। <span id="more-232"></span>कांग्रेस के कार्यक्रमों में कहीं फोटो लग गया तो लग गया, नहीं लगा तो न सही। इस का ताजा उदाहरण पिछले दिनों मध्यप्रदेश में देखने को मिला जब सुरेश पचौरी के अध्यक्ष बनने पर हुए सम्मेलन में मंच पर पीछे राहुल और सोनिया ही छाए हुए थे। पार्टी में राहुल से कहीं वरिष्ठ महासचिव दिग्विजय सिंह भी गायब थे, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का तो कहीं नामोनिशान नहीं दिखा। इसी मौके पर किसी ने कांग्रेस के वयोवृध्द नेता अर्जुन सिंह से पूछा था कि क्या राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद पर प्रोजैक्ट करके चुनाव लड़ा जाना चाहिए। प्रणव मुखर्जी की तरह अर्जुन सिंह खुद भी कभी प्रधानमंत्री पद की लाईन में शामिल थे और सोनिया गांधी के आशीर्वाद से एक दिन प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे थे। लेकिन परिवारवाद की चाटुकार कांग्रेस पार्टी को छोड़कर वापस लौटे प्रणव मुखर्जी ने गैर-नेहरू परिवार में पैदा होने के कारण खुद को तीसरे-चौथे स्तर का नेता बनना कबूल कर लिया है। लंबे समय तक प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश पाले अर्जुन सिंह ने भी चौथे पांचवें स्थान पर संतोष कर लिया है और कतई नहीं चाहते कि सोनिया-राहुल के अलावा किसी और के मताहत काम करना पड़े। मनमोहन सिंह को तो उन्होंने नरसिंह राव के शासनकाल में भी चुनौती दी थी, अब तो उन्हें मजबूरी में ही उन के तहत काम करना पड़ रहा है। इसलिए अर्जुन सिंह ने भोपाल में जवाब दिया था कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के योग्य नेता हैं।</p>
<p>कुछ अखबारों में छपी इस खबर को कांग्रेस के सचिव राजीव शुक्ल ने पढ़ा होगा और उन्होंने अपने चैनल के कांग्रेस कवर करने वाले संवाददाता को इसी मुद्दे पर अर्जुन सिंह से बात करके खबर बनाने की हिदायत दी होगी। पिछड़े वर्ग को आरक्षण का केस जीतने के बाद अर्जुन सिंह सुर्खियों में थे और उनमें 1995 जैसे राजनीतिक जोश भर आया। तब उन्होंने मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों को मुद्दा बनाकर नरसिंह राव पर निशाना साधा था। मनमोहन सिंह तभी से अर्जुन सिंह की आंख में खटक रहे हैं और ओबीसी आरक्षण से अपना राजनीतिक कद बढा हुआ मानकर उन्होंने भोपाल वाला जवाब जरा ज्यादा ताकत देकर दोहरा दिया। हालांकि सोनिया गांधी चल इसी लाईन पर रही हैं, कांग्रेस पार्टी में यह कौन नहीं जानता कि आखिरकार राहुल ही उनके नेता हैं। राहुल गांधी के देशभर में दौरे हो रहे हैं और वह जहां भी जाते हैं पार्टी उनका अपने युवराज की तरह उसी तरह स्वागत करती है जैसे किसी राजशाही में राजकुमार का होता है। जो कुछ हो रहा है, वह एक परिवार की चाटुकारिता के सिवा कुछ नहीं है। कांग्रेस को अपना भविष्य इसी परिवार में दिखाई देता है इसलिए राहुल गांधी उनके नेता हैं। लेकिन अर्जुन सिंह मीडिया के जरिए अपनी राजनीतिक चाल चलने से पहले यह भूल गए कि कांग्रेस पार्टी ने लोकतंत्र का आवरण ओढ़ा हुआ है। सोनिया गांधी जब कांग्रेस की अध्यक्ष बनी थी तो सीताराम केसरी का इसी तरह तख्ता पलट हुआ था जैसे किसी देश में चुनी हुई सरकार का कोई फौजी कमांडर तख्ता पलट करता है। सीताराम केसरी का तख्ता पलटे जाने की तरह ही ठीक एक साल बाद 1999 में पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ का तख्ता पलटा था। लेकिन अर्जुन सिंह भूल गए कि सोनिया गांधी ने केसरी का तख्ता पलटते समय भी कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलवा कर अपने पक्ष में प्रस्ताव पास करवाया था। मनमोहन सिंह पर राजनीतिक गोटी चलाते समय अर्जुन सिंह लोकतंत्र के आवरण वाले इस मूल मंत्र को भूल गए और यह भी भूल गए कि हर चाल का सही मौका होना चाहिए। अर्जुन सिंह यह भी भूल गए कि नरसिंह राव से टकराव के समय सोनिया गांधी कैसे उन्हें नैतिक समर्थन दे रहीं थी, लेकिन जब तिवारी कांग्रेस बनाकर वह मैदान में कूदे तो सोनिया गांधी ने उन्हें राजनीतिक बियाबान में अकेले छोड़ दिया था। नई पार्टी का गठन करने के लिए तालकटोरा स्टेडियम में सम्मेलन बुलाया गया था और इस सम्मेलन से उठकर अर्जुन सिंह खुद सोनिया गांधी को लेने गए थे, लेकिन उन्होंने उन्हें सिर्फ आशीर्वाद देकर बैरंग लौटा दिया था। बाद में अर्जुन सिंह को संसद में प्रवेश के लाले पड़ गए थे। लगातार दो चुनाव हारने के बाद सीताराम केसरी के जरिए कांग्रेस में लौटे थे। सोनिया गांधी जानती हैं कि राजनीति में कब कौन सी गोटी चलनी चाहिए, अर्जुन सिंह अपनी जिंदगी राजनीति में गुजारने के बाद भी यह नहीं सीख पाए। हालांकि यह अलग बात है कि हमेशा राजनीतिक तीर निशाने पर नहीं लगता, जैसे सोनिया खुद 1999 में सारी तैयारी करके प्रधानमंत्री नहीं बन पाई थी। राजनीति में एक सा वक्त हमेशा नहीं रहता, 1999 में राष्ट्रपति के.आर. नारायण उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने को तैयार थे लेकिन मुलायम सिंह ने विदेशी मूल का मुद्दा उठा दिया, जबकि 2004 में के. आर. नारायण राष्ट्रपति नहीं थे। सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पर बिठाने के लिए 16 मई 2004 को संसद भवन में जिस तरह मणिशंकर अय्यर, कपिल सिब्बल, अंबिका सोनी में आंसू बहाने और दहाड़े मारने की होड़ लगी थी, अगर वह चाटुकारिता नहीं थी, तो क्या थी। कांग्रेस की इसी संस्कृति को अपनाते हुए अर्जुन सिंह ने अगर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की बात कही तो चाटुकारिता पर एतराज क्यों। कांग्रेस अध्यक्ष को अगर चाटुकारिता पसंद नहीं थी तो उस रात सैंट्रल हाल में आंसू बहाकर अपनी वफादारी का झंडा गाड़ने वाले केंद्रीय मंत्रिमंडल में क्यों हैं।</p>
<p>अर्जुन सिंह से बेहतर कांग्रेस की संस्कृति कौन जानता है। जब कांग्रेस की प्रवक्ता जयंती नटराजन ने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बने रहने और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की चाटुकारिता पसंद नहीं होने की बात कही तो अर्जुन सिंह ने कहा कि कांग्रेस संस्कृति को वह बेहतर जानते हैं। अगर कांग्रेस अध्यक्ष को चाटुकारिता पसंद नहीं है तो देश भर में कांग्रेसियों की ओर से राहुल गांधी के लिए पलक पांवड़े बिछाया जाना वह कैसे बर्दाश्त कर रही हैं, क्या यह चाटुकारिता की श्रेणी में नहीं आता। मध्यप्रदेश और हाल ही में लखनऊ में कांग्रेस कार्यकर्ता सम्मेलनों में कांग्रेस के मंच पर लगे राहुल के बैनर अगर चाटुकारिता की श्रेणी में नहीं आते तो अर्जुन सिंह का सच कहना कैसे चाटुकारिता की श्रेणी में आएगा। कांग्रेस बैठकों, सम्मेलनों में लगते राहुल जिंदाबाद के नारे कांग्रेस के किसी वरिष्ठ नेता को परेशान नहीं करते क्योंकि वे इस परिवार से जुड़ी अपनी नियती को जानते हैं। वे राहुल के संसद में घुसते ही युवराज जैसा स्वागत करने में हिचकिचाहट महसूस नहीं करते, वे लोकसभा में राहुल के खड़ा होने पर खड़े हो जाते हैं, उनके हर शब्द पर ताली बजाते हैं, राहुल एक झलक देख ले तो खुद को धन्य मानते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि मनमोहन सिंह तो मध्यकाल का कामचलाऊ बंदोबस्त है। राहुल ही उनके भावी प्रधानमंत्री हैं, उन्हें भावी प्रधानमंत्री घोषित करने के लिए भाजपा की तरह किसी संसदीय बोर्ड की मंजूरी नहीं चाहिए। यह फैसला किसी भी दिन सोनिया और राहुल खुद कर लेंगे, कांग्रेस कार्यसमिति और संसदीय बोर्ड को तो सिर्फ मुहर लगानी होगी। याद करो जब राहुल गांधी राजनीति में आए-आए थे और उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई थी, तब जब सोनिया गांधी से पूछा जाता था कि वह जिम्मेदारी कब संभालेंगे तो वह कहती थीं- यह फैसला राहुल गांधी खुद लेंगे। फिलहाल तो राहुल प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी निभाने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं, यह अलग बात है कि देश की जनता की सोच वैसी नहीं है, जैसी कांग्रेसी नेताओं की हैं। आजादी के बाद हुए पहले लोकसभा चुनावों में दर्जनों पूर्व राजा-महाराजा चुने गए थे, लेकिन अब उन राजघरानों का इक्का दुक्का ही प्रतिनिधि लोकसभा में दिखाई देता है। मतदाताओं की दो पीढ़ियां बदल गई हैं, इसलिए नेहरू परिवार का आकर्षण भी मंद पड़ गया है। दलित की झोपड़ी में सोना भी उत्तर प्रदेश में कारगर साबित नहीं हो रहा। राहुल को गांधी होने का एक सीमा तक ही लाभ मिलेगा, पिछले दिनों राहुल ने कर्नाटक में अपने दौरे के दौरान कबूल किया कि राजनीति में उन्हें गांधी होने का फायदा मिला है। यह फायदा सिर्फ राहुल को नहीं सोनिया को भी मिला और इससे पहले राजीव को भी मिल चुका है, लेकिन राजशाही अनंतकाल तक नहीं चल सकती। नेपाल का उदाहरण हमारे सामने है।</p>
<p></font></p>
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		<title>आरक्षण पर अभी खत्म नहीं हुआ टकराव</title>
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		<pubDate>Sat, 12 Apr 2008 19:22:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Politicking]]></category>

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		<description><![CDATA[सीमित अंकों की छूट, क्रीमी लेयर, पोस्ट ग्रेजुएट कोर्सों में प्रवेश पर विधायिका और न्याय पालिका में टकराव के आसार कांग्रेस को ऊंची जातियों के मध्यम वर्ग की नाराजगी का डर सताने लगा।
सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़ी जातियों को उच्च शिक्षा में आरक्षण के लिए किए गए 93वे संविधान संशोधन को उचित ठहराकर कांग्रेस की अर्जुन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><font size="2"><strong>सीमित अंकों की छूट, क्रीमी लेयर, पोस्ट ग्रेजुएट कोर्सों में प्रवेश पर विधायिका और न्याय पालिका में टकराव के आसार कांग्रेस को ऊंची जातियों के मध्यम वर्ग की नाराजगी का डर सताने लगा।</strong></font></p></blockquote>
<p><font size="2">सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़ी जातियों को उच्च शिक्षा में आरक्षण के लिए किए गए 93वे संविधान संशोधन को उचित ठहराकर कांग्रेस की अर्जुन सिंह खेमे को ताकत दी है। दूसरी तरफ संविधान संशोधन के समय पूरी तरह भ्रांति में रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ज्ञान आयोग के जरिए देश की प्रतिभाओं को उभारने की मुहिम को धक्का लगा है। यह कहना कि कांग्रेस में पिछड़ी जातियों को शिक्षा में आरक्षण को लेकर एकमत था, ठीक नहीं होगा। पिछड़ा वर्ग कांग्रेस का वोट बैंक नहीं है, अलबत्ता अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यक जरूर कांग्रेस का वोट बैंक रहे हैं। <span id="more-226"></span>संविधान सभा में जब आरक्षण की बात चल रही थी, तब भी कांग्रेस एकमत नहीं थी और अंतत: पिछड़ी जातियों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण का फैसला नहीं हुआ था। आजादी के पच्चीस साल बाद सामाजिक दबाव के चलते इंदिरा गांधी ने पिछड़ी जातियों के आरक्षण पर नए सिरे से विचार करने के लिए मंडल आयोग बनाया था, लेकिन कांग्रेस में कड़े विरोध के चलते आयोग की सिफारिशें ठंडे बस्ते में डाल दी गई थी। अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यक वर्ग के अलावा ऊंची जातियां कांग्रेस का वोट बैंक रही हैं, जो पिछड़े वर्गों को आरक्षण के खिलाफ दबाव बनाती रही हैं। इंदिरा गांधी के बनाए मंडल आयोग की सिफारिशों को भी गैर कांग्रेसी वीपी सरकार ने लागू किया था। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने पर देश में जातीय संघर्ष शुरू हुआ और ऊंची जातियों के युवाओं ने खुद को चौराहों पर अग्नि की भेंट चढ़ाकर आरक्षण को रोकने की कोशिश की। उस आंदोलन को पर्दे के पीछे से कांग्रेस और भाजपा का मध्यम वर्ग वोट बैंक पूरी तरह समर्थन कर रहा था। कांग्र्रेस ने आरक्षण लागू किए जाने के तौर-तरीके का सार्वजनिक विरोध किया था।</font><font size="2"> </font><font size="2">नौकरियों में आरक्षण संबंधी मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने पर भी सुप्रीम कोर्ट मे चुनौती दी गई थी। इंदिरा साहनी केस के तौर पर मशहूर सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों पर आधारित पूर्ण पीठ के फैसले को आरक्षण के मामले में मील का पत्थर माना जाता है। शिक्षा में आरक्षण पर आए पांच जजों की खंडपीठ के फैसले को भी उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला भी इंदिरा साहनी केस के फैसले से प्रभावित है। यूपीए सरकार ने 93वां संविधान संशोधन करने के बाद शिक्षा में आरक्षण का कानून बनाते समय इंदिरा साहनी केस को ध्यान में रख कर क्रीमी लेयर को आरक्षण में शामिल न किया होता तो पिछले साल ही आरक्षण लागू हो जाता। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब भी क्रीमी लेयर का विवाद खत्म नहीं हुआ है, अर्जुन सिंह की रहनुमाई वाला कांग्रेस का वही वर्ग सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध कर रहा है, जिसके दबाव में क्रीमी लेयर को आरक्षण बिल में शामिल किया गया था। अर्जुन सिंह यूपीए के घटक दलों द्रमुक, पीएमके, राजद और लोजपा के साथ मिलकर क्रीमी लेयर पर फैसले को चुनौती देने का दबाव बना रहे हैं। संसद सत्र में क्रीमी लेयर के अदालती फैसले को चुनौती देने का दबाव न्याय पालिका और विधायिका में टकराव के हालात पैदा कर सकता है। पिछड़े वर्ग के सांसद सुप्रीम कोर्ट की इस राय से उत्तेजित हैं, जिसमें सांसदों और विधायकों को क्रीमी लेयर में मानते हुए उनके बच्चों को आरक्षण से वंचित रखने का सुझाव दिया है।</p>
<p>वैसे सरकार के पास अदालत के फैसले को बड़ी वेंच में चुनौती देने का विकल्प खुला हुआ है लेकिन क्रीमी लेयर को आरक्षण में शामिल करना कांग्रेस के एक ताकतवर खेमे को घाटे का सौदा लगता है। ऐसा करने पर ऊंची जातियों का मध्यम वर्ग कांग्रेस से छिटक सकता है और भाजपा उनको लपकने को तैयार बैठी है। फिलहाल वह अकेली पार्टी है जो क्रीमी लेयर को आरक्षण से वंचित करने के पक्ष में है। पिछड़ों को आरक्षण की पैरवी कर रहे जनता दल(यू) के अध्यक्ष शरद यादव अपने स्तर पर क्रीमी लेयर को आरक्षण से वंचित करने का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि नौकरियों में आरक्षण के मामले में क्रीमी लेयर लागू होने के कारण अभी तक पिछड़ों का कोटा भरा नहीं जा सका। उनकी तो यहां तक मांग है कि सरकार पिछले चौदह सालों में ओबीसी को नौकरियों में मिले आरक्षण का श्वेत पत्र जारी करे। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट की भी राय है कि पिछड़े वर्ग की जातियों की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए और क्रीमी लेयर में आ चुकी जातियों को पिछड़े वर्ग से बाहर किया जाना चाहिए।</p>
<p>सुप्रीम कोर्ट के सत्ताईस फीसदी आरक्षण को उस तरह भी नहीं मान लेना चाहिए, जिस तरह सरसरी तौर पर माना जा रहा है। पिछड़े वर्ग को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की तरह आरक्षण तय नहीं किया गया है। अलबत्ता प्रवेश में कुछ अंकों की छूट देने की बात की गई है, इस बाबत सरकार को अपने मापदंड तय करने होंगे। जस्टिस पसायत और जस्टिस ठक्कर ने अपने-अपने फैसले में कहा है कि कोई व्यक्ति वर्ग या धर्म राष्ट्र से बड़ा नहीं हो सकता इसलिए प्रतिभाशाली छात्रों को ही तकनीकी संस्थानों और मेडिकल कालेजों में प्रवेश के लिए चुना जाना चाहिए। उन्होंने पिछड़े वर्ग के छात्रों को स्नातक के कोर्सो में प्रवेश के लिए पांच अंक की राहत देने की बात कही है, जबकि जस्टिस भंडारी ने दस अंक तक छूट की बात कही है। पांच में से तीन जजों ने सत्ताईस फीसदी सीटें आरक्षित किए जाने के बावजूद पांच से दस नंबरों तक की अधिकतम छूट की बंदिश भी लगा दी है। इसका मतलब यह भी है कि पिछड़े वर्ग की आरक्षित सीटें खाली होने पर कोई प्रवेश का हकदार नहीं हो जाएगा। पिछड़े वर्ग के सांसद अदालती फैसले के अध्ययन के बाद इस मुद्दे पर भी टकराव की नौबत पैदा कर सकते हैं।</p>
<p>सिर्फ इतना ही नहीं, क्रीमी लेयर से बड़ी मुश्किल तो पोस्ट ग्रेजुएट स्तर के कोर्सो में आरक्षण को लेकर खड़ी हो गई है। मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह इस मुद्दे पर न्याय पालिका से टकराव के मूड में आ गए हैं। जस्टिस अरजीत परसायत और जस्टिस ठक्कर ने अपने फैसले में कहा है कि क्रीमी लेयर को लेकर समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए। जस्टिस भंडारी ने हर पांच साल बाद समीक्षा की बात कही है तो चीफ जस्टिस बालाकृष्णन और जस्टिस रविंद्रन ने आठ अप्रेल 1993 के सरकारी आदेश में बताए गए क्रीमी लेयर के सिध्दांत को उचित माना है। लेकिन यूपीए सरकार के सामने नई मुसीबत शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा घोषित करने के मुद्दे पर आई अदालती राय से पैदा हुई है। अदालत के सामने एक सवाल था कि शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा किसे माना जाए। इस पर जस्टिस भंडारी ने स्पष्ट राय रखी है कि स्नातक की डिग्री हासिल करने वाला शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा नहीं माना जा सकता। जस्टिस भंडारी ने कहा है कि एक बार जब कोई व्यक्ति विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री हासिल कर लेता है तो वह शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा नहीं रहता और संविधान के अनुच्छेद 15 (5) के तहत उच्चत्तर शिक्षा में आरक्षण का हकदार नहीं रहता। यानी स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद कोई भी पिछड़ी जाति का व्यक्ति आगे शिक्षा में आरक्षण का हकदार नहीं रहेगा। डाक्टरी और इंजीनियरी की उच्च शिक्षा बारहवीं के बाद शुरू हो जाती है, इसलिए पिछड़ी जातियों के बच्चों को इन दोनों श्रेणियों में आरक्षण का हक मिलेगा। लेकिन मैनेजमेंट की पढ़ाई स्नातक की डिग्री के बाद शुरू होती है और मैनेजमेंट की पढ़ाई को स्नातकोत्तर माना जाता है, इसलिए उसमें आरक्षण का हक नहीं होगा। इसका मतलब यह हुआ कि आईआईटी और एमबीबीएस कोर्सो में तो आरक्षण मिलेगा लेकिन आईआईएम और एमबीए के बाकी संस्थानों में आरक्षण नहीं मिलेगा। अर्जुन सिंह इसे सिर्फ एक जज की राय मानकर खारिज करना चाहते हैं, लेकिन जस्टिस पसायत और जस्टिस ठक्कर ने कहा है कि स्नातक स्तर तक शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा माना जाना चाहिए। अगर जस्टिस भंडारी की राय को जस्टिस पसायत और जस्टिस ठक्कर से जोड़कर देखा जाए तो पोस्ट ग्रेजुएट कोर्सो में प्रवेश में आरक्षण लागू नहीं होगा।</p>
<p>अब पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षा में भी आरक्षण की पैरवी करने वाले दलील दे रहे हैं कि क्या ग्रेजुएट होने पर पिछड़े वर्ग के आरक्षण से वंचित किए जाने वाले इस वर्ग के तहत नौकरियों में आरक्षण के हकदार भी नहीं होंगे। हालांकि यह फैसला सिर्फ शिक्षा में आरक्षण के संबंध में है, जहां तक नौकरियों में आरक्षण का सवाल है, उस बाबत इंदिरा साहनी केस एकदम स्पष्ट है। जिसके तहत 1993 में सरकारी आदेश से बनाई गई क्रीमी लेयर में नहीं आने वाले सभी पिछड़े नौकरियों में आरक्षण के हकदार हैं। लेकिन पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षा में आरक्षण के पैरवीकार इस मुद्दे पर न्याय पालिका और विधायिका में टकराव खड़ा करने की कोशिश में जुट गए हैं। मानव संसाधन मंत्रालय पोस्ट ग्रेजुएशन शिक्षा में आरक्षण का आदेश जारी करके एक और अदालती टकराव की तैयारी में जुटा दिखाई दे रहा है।</p>
<p></font></p>
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		<title>कंधार और &#8216;माई कंट्री माई लाईफ&#8217;</title>
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		<pubDate>Sun, 30 Mar 2008 03:19:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Politicking]]></category>

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		<description><![CDATA[लाल कृष्ण आडवाणी की किताब &#8216;माई कंट्री माई लाइफ&#8217; राजनीतिक लड़ाई का केंद्र बिंदु बन गई है। आडवाणी के परंपरागत विरोधी बिना किताब को पढ़े, उनके खिलाफ धड़ाधड़ लिख और बोल रहे हैं। ऐसा नहीं है कि किताब में कोई त्रुटियां नहीं हैं, हालांकि किताब लिखते समय आडवाणी और उनके सलाहकारों ने तथ्यों की अच्छी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size="2">लाल कृष्ण आडवाणी की किताब &#8216;माई कंट्री माई लाइफ&#8217; राजनीतिक लड़ाई का केंद्र बिंदु बन गई है। आडवाणी के परंपरागत विरोधी बिना किताब को पढ़े, उनके खिलाफ धड़ाधड़ लिख और बोल रहे हैं। ऐसा नहीं है कि किताब में कोई त्रुटियां नहीं हैं, हालांकि किताब लिखते समय आडवाणी और उनके सलाहकारों ने तथ्यों की अच्छी तरह जांच-पड़ताल की, फिर भी कई गलतियां रह गई हैं। जैसे एक जगह 1974 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का जिक्र किया, जबकि उन्हें जनसंघ लिखना चाहिए था क्योंकि उस समय जनसंघ थी, भाजपा नहीं। एक और बड़ी चूक हुई है, जिसे आडवाणी के विरोधी हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। यह ऐतिहासिक तथ्य है, जो उस समय भी अखबारों में छपा था कि विमान जब दुबई में उतरा, तो भारत सरकार ने अमेरिका से मदद मांगी थी। लेकिन आडवाणी की ओर से लिखते समय तत्कालीन राजदूत का नाम गलत लिखा गया। उस समय भारत में अमेरिकी राजदूत रिचर्ड सेलस्टे थे, न कि रोबर्ट ब्लैकविल।<span id="more-213"></span></font><font size="2">आडवाणी ने अपनी किताब में लिखा है- &#8216;तेजी से बदलते घटनाक्रम में जब विमान दुबई पर उतरा तो मैंने अमेरिकी राजदूत रोबर्ट ब्लैकविल से बात की और अमेरिकी मदद की गुहार लगाई। उस समय हमें पता चला था कि संयुक्त अरब अमीरात स्थित राजदूत एयरपोर्ट पहुंचे हैं। संयुक्त अरब अमीरात के अधिकारियों ने भारतीय राजदूत को हवाई अड्डे पर जाने की इजाजत नहीं दी थी। मैंने सोचा कि खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका की अच्छी खासी सेना मौजूद है और खाड़ी पर अमेरिका का कूटनीतिक प्रभाव भी है, इसलिए अमेरिका प्रभावशाली कदम उठाकर विमान को वहां से उड़ने से रोक सकता है और इस बीच भारतीय कमांडो बंधकों को छुड़ाने की कार्रवाई कर सकते हैं। लेकिन मुझे निराशा हाथ लगी क्योंकि उन्होंने कोई कोशिश नहीं की। संकट खत्म हो जाने के कुछ दिन बाद जब ब्लैकविल मुझे मिले तो मैंने उनसे अपनी नाराजगी का इजहार किया।&#8217; लेकिन उस समय भारत में अमेरिकी राजदूत रिचर्ड सेलेस्टे थे और स्वाभाविक है कि आडवाणी की यह सारी बातचीत सेलेस्टे से हुई थी। ब्लैकविल की ओर से स्पष्टीकरण आने के बाद लाल कृष्ण आडवाणी ने सफाई देने का फैसला किया है, किताब के अगले संस्करण में इसे सुधार भी लिया जाएगा। लेकिन उनके विरोधी किताब की इस चूक का राजनीतिक फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।</font><font size="2">आडवाणी के सिर्फ राजनीतिक विरोधी होते, तो गनीमत थी, उन्हें मीडिया के एक वर्ग के विरोध का भी सामना करना पड़ता है। जिन्ना प्रकरण भी उनके साथ पाकिस्तान गए अनाड़ी और पूर्वाग्रहग्रस्त मीडिया कर्मियों की ही साजिश थी। आडवाणी ने अपनी किताब में इसका भी जिक्र किया है। मीडिया का यह वर्ग आडवाणी के खिलाफ लिखने की बातें ढूंढता रहता है। इस तरह की एक घटना याद आती है जब एक बड़े अखबार में एक पत्रकार ने आडवाणी की बेटी प्रतिभा की किसी कंपनी में हिस्सेदारी की खबर लिखी थी। जबकि प्रतिभा का उस कंपनी से कुछ लेना-देना नहीं था, प्रतिभा ने जब कानूनी नोटिस जारी किया तो खबर का खंडन कर दिया गया और माफी मांग ली गई। लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता है, आए रोज छपने वाली बेसिर पैर की खबरों का जवाब देते-देते तो आदमी परेशान ही हो जाएगा। इसलिए राजनीतिक नेताओं की बयानबाजी के आधार पर खबर लिखने की बजाए अपने पूर्वाग्रहों को एक तरफ रख पत्रकारों को एहतियात बरतनी चाहिए और अपने स्तर पर तथ्यों की जांच करने के बाद ही लिखना चाहिए।</p>
<p>ताजा घटना एक भूतपूर्व पत्रकार और मौजूदा कांग्रेसी सांसद की है, जो विभिन्न अखबारों में अभी भी कालम लिख रहे हैं। उन्होंने अपने ताजा कालम में लिखा है- &#8216;आडवाणी ने अपनी पुस्तक में स्पष्ट किया है कि उन्हें पता नहीं है कि तत्कालीन विदेशमंत्री किसके कहने पर और क्यों आतंकवादियों के साथ जहाज में बैठकर कंधार गए थे? उनको इसकी भी जानकारी नहीं है कि आतंकवादियों की और क्या-क्या शर्तें पूरी की गई थी? आडवाणी के अनुसार हो सकता है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अनुमति से वह कंधार गए हों।&#8217; स्पष्ट है कि इस कालम के लेखक सांसद महोदय ने आडवाणी की किताब को पढ़ना तो दूर, देखा तक नहीं होगा। उन्होंने अपने कालम में जो कुछ लिखा है वह किताब में है ही नहीं। इस सांसद ने पिछले साल राज्यसभा में कहा था कि विमान के अपहरणकर्ताओं को बीस करोड़ डालर भी दिए जाने के आरोप लग रहे हैं। संसद में कही गई इससे ज्यादा गैर जिम्मेदाराना बात नहीं हो सकती। जसवंत सिंह अपनी किताब &#8216;ए कॉल टू ऑनर&#8217; में लिख चुके थे कि आतंकवादियों ने 36 आतंकवादियों को छोड़ने और बीस करोड़ डालर की मांग की गई थी, जिसे मंत्रिमंडल ने ठुकरा दिया था लेकिन बाद में अपहृत नागरिकों को छुड़ाने का दबाव बढ़ने पर सरकार तीन आतंकवादियों को छोड़ने के लिए राजी हुई थी। जसवंत सिंह की इस किताब से स्पष्ट था कि पैसे की मांग पूरी नहीं की गई थी। लेकिन कांग्रेस के सांसद ने जो बात संसद में कही थी उसे अपने ताजा लेख में फिर दोहराते हुए कहा है &#8211; &#8216;तीन आतंकवादी छोड़ दिए गए थे, तब यह भी संभव है कि धन की उनकी दूसरी मांग भी पूरी की गई हो। यदि यह तथ्य सही नहीं है तो भाजपा नेता इसका खंडन क्यों नहीं कर रहे हैं।&#8217; संभवत: कांग्रेस के सांसद इस थ्योरी पर चल रहे हैं कि झूठ को बार-बार बोलने से सच लगने लगता है। भाजपा के जिम्मेदार नेता संसद में इसका खंडन कर चुके हैं। पूर्व विदेशमंत्री यशवंत सिन्हा ने खुद राज्यसभा में इस आरोप का खंडन किया था, जो कांग्रेस के सांसद ने लगाया था। खासकर सत्ताधारी पार्टी के सांसद को इस तरह के अनर्गल आरोप नहीं लगाने चाहिए, क्योंकि सारे सरकारी दस्तावेज तो उसी की पार्टी के केंद्रीय मंत्रियों के कब्जे में हैं। अगर इस आरोप में जरा भी सच्चाई है, तो सरकार के पास एनडीए के खिलाफ इससे बड़ा और हथियार कोई नहीं हो सकता। आखिर एक सहज सा सवाल खड़ा होता है कि बीस हजार करोड़ रुपया क्या इतनी मामूली रकम है? उसे वाजपेयी-आडवाणी या जसवंत सिंह ने अदा कर दिया होगा? सरकारी खजाने से इतनी बड़ी रकम गई हो, उसका खुलासा न हो, यह कैसे हो सकता है? राजनीति को इतने निम्नतम स्तर पर भी नहीं पहुंचा देना चाहिए।</p>
<p>जहां तक मसूद अजहर समेत तीन आतंकवादियों को छोड़े जाने की बात है, तो यह सब जानते हैं कि प्रधानमंत्री के घर पर अपहृत लोगों के परिजनों की ओर से किए जा रहे प्रदर्शनों को किस तरह प्रायोजित किया जा रहा था। अफसोस यह है कि मीडिया का जो वर्ग आज तीन आतंकियों को रिहा किए जाने पर सवाल उठा रहा है, वही उस समय प्रधानमंत्री के घर पर हो रहे प्रदर्शनों को हवा दे रहा था। जसवंत सिंह और आडवाणी दोनों ने ही अपनी किताबों में मीडिया की उस भूमिका का जिक्र किया है। जहां तक जसवंत सिंह के आतंकवादियों के साथ जाने का सवाल है, तो उस पर सवाल उठाया जाना वाजिब है। भले ही जार्ज फर्नाडीस ने इस बाबत मंत्रिमंडलीय समूह के फैसले की बात कही है, लेकिन जसवंत सिंह ने भी अपनी किताब में इसका जिक्र नहीं किया। जसवंत सिंह और आडवाणी की किताबों में यह बात एक जैसी है कि सरकार पहले आतंकियों की कोई भी शर्त मानने को तैयार नहीं थी, लेकिन जन दबाव में ऐसा फैसला लेना पड़ा। आडवाणी ने ऐसा कहीं नहीं कहा है कि उन्हें आतंकवादियों को छोड़े जाने की जानकारी नहीं थी, जसवंत सिंह ने भी ऐसा कहीं नहीं कहा है कि उनके उसी विमान में कंधार जाने का फैसला केबिनेट कमेटी में लिया गया था। अलबत्ता जसवंत सिंह ने अपनी किताब में उस वक्त की मजबूरी को स्पष्ट किया है- &#8216;अपहृत नागरिकों को छुड़वाने के लिए बातचीत कर रहे तीन प्रमुख अधिकारियों विवेक काटजू, अजीत दोवल और सी डी सहाय का कहना था कि भले ही आतंकवादी तीन आतंकियों को छोड़ने पर सभी यात्रियों को मुक्त करने पर राजी हो गए हैं, फिर भी पता नहीं आखिरी समय पर क्या अड़चन खड़ी हो जाए, इसलिए हम चाहते हैं कि मौके पर फौरी फैसला लेने वाला होना चाहिए।&#8217; स्वाभाविक है कि अचानक आ पड़े संकट पर कोई भी बड़ा अधिकारी फैसला नहीं ले सकता था, कोई मंत्री ही फैसला ले सकता था, वह भी जो प्रधानमंत्री से सीधे बात कर सकता हो। हालांकि जसवंत सिंह उसी विमान में जाने के हालात को टाल सकते थे, वह दूसरे विमान से जाते तो उनके लिए ऐसी दयनीय स्थिति पैदा नहीं होती। जहां तक लाल कृष्ण आडवाणी का सवाल है तो वह इस लेखक को मार्च 2004 में ही बता चुके हैं कि जसवंत सिंह का उस विमान में साथ जाना उचित नहीं था और इस गलत फैसले पर बाद में उन्होंने अपनी आपत्ति जताई थी। उस समय आडवाणी उपप्रधानमंत्री थे।</p>
<p></font></p>
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		<title>अंधा बांटे रेवड़ियां, मुड-मुड अपनो को दे</title>
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		<pubDate>Sun, 03 Feb 2008 04:55:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[
यूपीए सरकार ने पिछले छह सालों की तरह इस बार भी किसी को भारत रत्न नहीं देकर खुद को भंवर जाल से तो निकाल लिया, लेकिन भारत रत्न सम्मान खुद भंवर जाल में फंस गया। परंपरा के मुताबिक विपक्ष के नेता लाल कृष्ण आडवाणी का यह अधिकार था कि वह अपनी तरफ से प्रधानमंत्री को [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">
<p align="left">यूपीए सरकार ने पिछले छह सालों की तरह इस बार भी किसी को भारत रत्न नहीं देकर खुद को भंवर जाल से तो निकाल लिया, लेकिन भारत रत्न सम्मान खुद भंवर जाल में फंस गया। परंपरा के मुताबिक विपक्ष के नेता लाल कृष्ण आडवाणी का यह अधिकार था कि वह अपनी तरफ से प्रधानमंत्री को किसी का नाम सुझाते। यह अलग बात है कि उन्होंने अपनी ही पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी का नाम पेश किया, इसमें इतनी बुराई इसलिए नहीं है, क्योंकि कांग्रेस सरकारें अपने ही प्रधानमंत्री और नेता को भारत रत्न और दूसरे नागरिक सम्मान देती रही है। बुराई यह थी कि आडवाणी ने प्रधानमंत्री को भेजी गई सलाह प्रेस को लीक कर दी। कम से कम ऐसी परंपरा पहले नहीं थी। <span id="more-169"></span>कहा जा रहा है कि लाल कृष्ण आडवाणी ने अपनी सिफारिशी चिट्ठी इसलिए लीक की ताकि यूपीए सरकार वाजपेयी को दरकिनार करके ज्योतिबसु को भारत रत्न से सम्मानित न कर सके। लाल कृष्ण आडवाणी छह साल तक देश के गृहमंत्री और तीन साल तक उप प्रधानमंत्री रहे हैं। अगर यह बात सही है, तो जरूर उनके पास ब्यूरोक्रेसी से यह खबर आई होगी कि मनमोहन सिंह सरकार ज्योतिबसु को भारत रत्न देकर अमेरिका से हुए परमाणु समझौते का हित साधना चाहती है। अगर इसमें जरा भी तथ्य है तो देश के सर्वोच्च सम्मान का दोनों तरफ से राजनीतिक इस्तेमाल किया गया।</p>
<p align="left">सम्मानों के इतिहास में जाएं तो चाणक्य नीति में लिखा है कि राजा को अपने समर्थकों की तादाद बढ़ाने के लिए राजकोष से धन और सम्मान देना चाहिए। हालांकि चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में इस तरह के सम्मान दिए जाने का कोई ऐतिहासिक सबूत नहीं है। मुगलों के काल में इदमाद-उल-दौला (विश्वस्त व्यक्ति) का सम्मान दिया जाता था। राजा अकबर ने नूरजहां के पिता मिर्जा गयासुद्दीन को इदमाद-उल-दौला का सम्मान दिया था। मुगल काल में मनसब और खिल्लत भी दिए जाते थे। अंग्रेजों ने अपने भारतीय चापलूसों की तादाद बढ़ाने के लिए सर, रायसाहब, रायबहादुर जैसे कई तरह के सम्मान बांटे। जनरल डायर को सम्मानित करने वाले एक ग्रंथी अरूड़ सिंह को सर की उपाधि दी गई थी और भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने वाले सोभा सिंह को भी सर की उपाधि मिली थी। हंटर कमीशन के सामने रोहतक के एक लालचंद नामक व्यक्ति ने गवाही दी थी कि अगर जलियांवाला बाग में ब्रिटिश पुलिस गोली न चलाती तो अराजकता फैल जाती। ब्रिटिश सरकार ने हंटर कमीशन में गवाही देने वाले लालचंद को रायबहादुर से सम्मानित किया।</p>
<p align="left">वैसे संविधान सभा में इस मुद्दे पर बहस हुई थी कि अंग्रेजों की ओर से दिए जा रहे सर, रायबहादुर जैसे सम्मान दिए जाएं या नहीं। संविधान सभा ने यह कहते हुए इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था कि अंग्रेज सरकार चापलूसी करने वाले और अंग्रेजों के हित साधने वालों को इस तरह के सम्मान देकर चापलूसों का दायरा बढ़ाया करती थी, जबकि भारत की चुनी हुई सरकार को इस तरह की कोई जरूरत नहीं। लेकिन पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कहने पर 2 जनवरी 1954 को पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण सम्मानों के साथ &#8216;भारत रत्न&#8217; जैसे सर्वोच्च सम्मान का भी ऐलान किया। राजनीतिक आधार पर चयन तो पहले साल ही हो गया था जब सी. राजगोपालाचारी और डा. राधाकृष्णन को पहले भारत रत्न के तौर पर सम्मानित किया गया। हालांकि उस समय वैज्ञानिक सीवी रमन को भारत रत्न दिया जाना सराहनीय कदम था। उस समय कांग्रेस और सरकार में तमिलनाडु की तूती बोलती थी और पहले साल भारत रत्न हासिल करने वाले तीनों ही तमिलनाडु के थे। सम्मानों को शुरू करते समय राष्ट्रपति भवन से जो आदेश जारी किया गया था, उसमें यह प्रावधान किया गया था कि उस समय से पहले के व्यक्ति को यह सम्मान नहीं दिया जाएगा, इसलिए महात्मा गांधी को भारत रत्न की उपाधि नहीं दी गई। लेकिन एक साल बाद ही इस प्रावधान को लागू कर दिया गया, इसके बावजूद महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अब्बुल कलाम आजाद जैसे आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेने वाले देशभक्तों को भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया गया, जबकि जवाहर लाल नेहरू ने खुद 1955 में ही भारत रत्न ले लिया। बाकी सम्मानों की अलग चयन पध्दति को छोड़ दिया जाए तो भारत रत्न का फैसला खुद प्रधानमंत्री स्तर पर होता है, इसलिए यह कहना कि पहले राजनीतिक आधार पर फैसले नहीं लिए गए, ठीक नहीं होगा। कितना आश्चर्यजनक लगता है कि जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने खुद प्रधानमंत्री होते हुए खुद को &#8216;भारत रत्न&#8217; से सम्मानित करवा लिया। जब तक नेहरू-इंदिरा-राजीव का शासन रहा तब तक डा. अंबेडकर, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अब्बुल कलाम आजाद, मोरारजी देसाई, जयप्रकाश नारायण भारत रत्न से सम्मानित नहीं किए गए। इन सभी को गैर गांधी परिवारों की सरकारों ने भारत रत्न माना। गैर गांधी कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने 1991 में वल्लभ भाई पटेल, मोरारजी देसाई (राजीव गांधी को भी) और 1992 में मौलाना अब्बुल कलाम आजाद और सुभाष चंद्र बोस को भारत रत्न से सम्मानित किया। हालांकि सुभाष चंद्र बोस को सम्मान का विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, क्योंकि समाज का एक वर्ग यह मानने को तैयार ही नहीं कि नेताजी की विमान हादसे में मौत हो गई थी, जबकि सम्मान देते समय उन्हें स्वर्गीय बताया गया था। सरकार अदालत में यह साबित नहीं कर पाई कि सुभाष चंद्र बोस की मौत हो गई थी इसलिए इस सम्मान को रद्द कर दिया गया।</p>
<p align="left">जब भारत रत्न और दूसरे सम्मानों की घोषणा की गई थी, उस समय भी देश के बहुत सारे लोग यह मानते थे कि इन सम्मानों से ब्रिटिश परंपरा ही शुरू होगी। कांग्रेस में भी इस मुद्दे पर गहरे मतभेद थे, जिसकी झलक मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्री बनने पर दिखी, जब पहले जनता शासन में 13 जुलाई 1977 से लेकर 26 जनवरी 1980 तक किसी को भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया गया। लेकिन जैसे ही इंदिरा गांधी का शासनकाल वापस आया, तो एग्नेस जोंग्हा बोजासिंऊयानी मदर टरेसा को भारत रत्न से सम्मानित करके सम्मान परंपरा फिर से शुरू कर दी गई। मदर टरेसा विदेश में जन्मी पहली भारतीय नागरिक थीं जिसे भारत रत्न से सम्मानित किया गया। मदर टरेसा को चैरिटी कार्यों के लिए चर्च का पूरा समर्थन था, इसलिए जब उन्हें सम्मानित किया गया तो एक खास वर्ग ने इसकी कड़ी आलोचना की। मानव सेवा का मदर टरेसा से भी बड़ा काम अमृतसर में भगत पूर्ण सिंह ने पिंगलवाड़ा बनाकर किया था, लेकिन उन्हें इस सम्मान के योग्य नहीं समझा गया। इसलिए सम्मान के राजनीतिक मापदंडों को सिरे से नकारा नहीं जा सकता। जिस तरह राजनीतिक संतुलन के आधार पर एमजी रामाचंद्रन को उनके देहांत के एक हफ्ते बाद ही भारत रत्न से सम्मानित किया गया, उससे इस बात का अंदाज तो लग ही जाता है कि सम्मान के मापदंड क्या हैं।</p>
<p align="left">&#8216;भारत रत्न&#8217; का सम्मान हासिल करने के लिए इस साल शुरू हुई राजनीतिक होड़ से सम्मान की प्रतिष्ठा धूल धूसरित हुई है। अब भारत रत्न भी पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण जैसे राजनीतिक होड़ वाले सम्मानों में शामिल हो गया है। नवंबर में हुए गुजरात विधानसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के खिलाफ मुहिम चलाने वाले तीन मीडियाकर्मियों को पद्मश्री देने से इन सम्मानों के राजनीतिक मापदंड किसी से छिपे नहीं रहे। सत्ताधारी गलियारों में घूमने वाले नौकरशाह अच्छी तरह जानते हैं कि हर साल दिसंबर और जनवरी महीने में इन सम्मानों को हासिल करने के लिए किस तरह होड़ मचती है। बहुत कम लोग होते हैं, जिन्हें सम्मान के बारे में पहले जानकारी नहीं होती। इन सम्मानों की गरिमा इतनी गिर चुकी है कि कई वास्तविक हकदार घोषणा होने पर सम्मान लेने से इंकार कर चुके हैं। इंग्लैंड में सत्ताधारी पार्टी को चुनाव में चंदा देने की एवज में सम्मान दिए जाने का वादा करने का खुलासा होने के बाद अंदाज लगाया जा सकता है कि अंग्रेजों की इस परंपरा का भारत में किस तरह निर्वहन हो रहा होगा। क्या अब वक्त आ गया है कि इन सम्मानों पर पुनर्विचार किया जाए।</p>
<p></font></p>
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		<title>अंदरूनी लोकतंत्र से ही उपजेगा जनाधार</title>
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		<pubDate>Fri, 18 Jan 2008 18:45:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Politicking]]></category>

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		<description><![CDATA[अगर इस साल लोकसभा चुनाव नहीं भी हुए, तो भी आम चुनावों में अब सिर्फ सवा साल बाकी रह गया है। राजग ने छह साल केंद्र में सरकार चलाई, लेकिन आखिरी दिनों में भारतीय जनता पार्टी की इतनी बुरी हालत नहीं हुई थी, जितनी इस समय कांग्रेस की दिखाई देने लगी है। दिसंबर 2003 में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font size="3">अगर इस साल लोकसभा चुनाव नहीं भी हुए</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो भी आम चुनावों में अब सिर्फ सवा साल बाकी रह गया है। राजग ने छह साल केंद्र में सरकार चलाई</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन आखिरी दिनों में भारतीय जनता पार्टी की इतनी बुरी हालत नहीं हुई थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जितनी इस समय कांग्रेस की दिखाई देने लगी है। दिसंबर </font><font size="3" face="Mangal">2003 </font><font size="3">में मध्य प्रदेश</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">राजस्थान</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">छत्तीसगढ़ विधानसभाओं के चुनाव जीतने से भारतीय जनता पार्टी इतनी उत्साहित थी कि लोकसभा चुनाव वक्त से पहले करवा दिए। लोकसभा चुनावों में भाजपा से आठ सीटें ज्यादा जीतने से कांग्रेस इतनी उत्साहित थी कि उसे जनादेश मान बैठी। <span id="more-156"></span>लेकिन पिछले पौने चार सालों में कांग्रेस की लगातार हार से अब यह एकदम साफ हो गया है कि जनादेश कांग्रेस के साथ तब भी नहीं था</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">आज भी नहीं है। यह ठीक है कि राजग सरकार के समय कांग्रेस की विधानसभाएं नौ से बढ़कर चौदह हो गई थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जिसे कांग्रेस ने अपनी नेता सोनिया गांधी का करिश्मा समझ लिया। लेकिन पिछले </font><font size="3" face="Mangal">44 </font><font size="3">महीनों में कांग्रेस की राज्य सरकारों की तादाद फिर से घटकर दस हो गई है। इस बीच उड़ीसा</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">गुजरात</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">पश्चिम बंगाल</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">बिहार</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">उत्तर प्रदेश के चुनावों में सोनिया गांधी का इम्तिहान हुआ और वह फेल रही। कांग्रेस जब केंद्र में सत्तारूढ़ हुई तो कर्नाटक</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">हिमाचल</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">पंजाब</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">उत्तराखंड में कांग्रेस सरकारें थीं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जो अब कांग्रेस के नियंत्रण में नहीं हैं। सिर्फ आंध्र प्रदेश</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">पांडिचेरी और हरियाणा में ही कांग्रेस ने क्षेत्रीय दलों पर जीत हासिल करके अपनी सरकारें बनाई हैं। कांग्रेस विधानसभाई चुनावों में सिर्फ असम और दिल्ली में अपनी सरकारें बरकरार रख पाई। गोवा और महाराष्ट्र में गठबंधन सरकारें दुबारा बनी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन दोनों ही विधानसभाओं में कांग्रेस की सीटें घटी।</font></p>
<p><font size="3">कुल मिलाकर कांग्रेस को केंद्र में सत्तारूढ़ होकर जिस फायदे की उम्मीद थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">वह कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। फायदा तो दूर की बात</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">अलबत्ता कांग्रेस का आधार लगातार घट रहा है। यह इस के बावजूद हुआ है कि सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी भी राजनीति में सक्रिय हो चुके हैं। पहले राहुल गांधी को लोकसभा चुनाव लड़वाने से कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में जनाधार बढ़ने की उम्मीद थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अस्सी में से सिर्फ नौ सीटें हासिल हुई। राहुल गांधी के लोकसभा चुनाव लड़ने का उत्तर प्रदेश में कुछ असर नहीं हुआ तो उन्हें पार्टी में महासचिव बनाकर भावी प्रधानमंत्री के रूप में दिखाने की कोशिश की गई</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">ताकि कांग्रेस का खत्म हो चुका जनाधार लौट सके। राहुल गांधी के कांग्रेस महासचिव बनने के बाद उत्तर प्रदेश</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">गुजरात और हिमाचल विधानसभाओं के चुनाव हुए हैं और तीनों ही राज्यों में कांग्रेस को बुरी तरह हार मिली। राहुल गांधी को भावी प्रधानमंत्री के तौर पर स्थापित करने के लिए गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनावों से ठीक पहले नवंबर में कांग्रेस का दिल्ली में अधिवेशन किया गया। यह अधिवेशन इस दृष्टि से एकदम अलग इसलिए था क्योंकि किसी के महासचिव बनने पर इस तरह अधिवेशन नहीं होते। यह अधिवेशन राजकुमार की ताजपोशी के लिए हुआ था</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">ताकि कांग्रेसजनों और नेहरू</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">गांधी परिवार में आस्था रखने वालों को कांग्रेस के नए नेतृत्व का संकेत दिया जा सके। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में राहुल गांधी को राजकुमार की तरह घुमाया गया और उनके रोड</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">शो करवाए गए। लेकिन कांग्रेस का जनाधार बढ़ने का सपना चकनाचूर हो गया</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो कांग्रेस अब पूरी तरह हतोत्साहित हो चुकी है। सोनिया गांधी की हाल ही की बीमारी को भी हताशा का नतीजा समझा गया।</font><font size="3"> </font><font size="3"></p>
<p align="justify">सोनिया गांधी के अध्यक्ष पद संभालने पर कांग्रेसी दिग्गजों को उम्मीद थी कि पार्टी एकजुट होगी और कांग्रेस का पुराना वैभव लौट आएगा। जब ऐसा नहीं हुआ<font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो परिवार के दूसरे राजकुमार राहुल को राजनीति में उतारा गया। लेकिन कांग्रेसजन यह भूल गए कि नेहरू</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">इंदिरा के जमाने के मतदाताओं की तादाद अब दस फीसदी भी नहीं रही। देश पूरी तरह बदल गया है और नई पीढ़ी को लोकतंत्र में राज परिवार जैसी अवधारणा रास नहीं आ रही है। कांग्रेस को इस बात का मंथन करना होगा कि परिवारवाद के रथ पर दुबारा सवार होने और केंद्र में सत्ता आने के बाद भी उसका जनाधार क्यों नहीं बढ़ रहा है। कांग्रेस को समझना पड़ेगा कि लोकतंत्र में कोई भी राजनीतिक दल सिर्फ एक परिवार के वारिसों के बूते नहीं चल सकता। अलबत्ता कांग्रेस के भीतर वही पुराना अंदरूनी लोकतंत्र कायम करना होगा</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जो आजादी से पहले था। सोनिया गांधी को भी यह बताने की जरूरत है कि आजादी से पहले की कांग्रेस में ब्लॉक स्तर से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष स्तर तक सांगठनिक चुनाव हुआ करते थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">नियुक्तियां नहीं। यही वजह थी कि कांग्रेस एक पार्टी नहीं बल्कि आंदोलन बन गई थी। अंदरूनी लोकतंत्र को खत्म करके कोई भी पार्टी जनाधार कायम नहीं रख सकती। कांग्रेस अगर अपने संविधान के मुताबिक पार्टी की सदस्यता और संगठनात्मक चुनाव ही करवाने लग जाए तो कोई अन्य पार्टी उसका मुकाबला नहीं कर सकेगी। कांग्रेस को सबसे पहले अपने पदाधिकारियों के चुनाव का अधिकार सोनिया गांधी को देने का सर्वसम्मत प्रस्ताव करने की प्रवृत्ति छोड़नी होगी। सोनिया गांधी जब कांग्रेस की अध्यक्ष बनी थी तो शुरू</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">शुरू में उन्होंने इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने की कोशिश की थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन उनके इर्द</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">गिर्द मंडराने वाले चापलूसों ने उसे लागू नहीं करने दिया। सोनिया गांधी दस जनपथ के इर्द</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">गिर्द मंडराने वाले सत्ता के दलालों से घिरी हैं और हर फैसला उन्हीं की इच्छा के मुताबिक हो रहा है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जिस कारण पार्टी का जनाधार नहीं बन पा रहा है। भविष्य की चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए वीरप्पा मोईली की रहनुमाई में बनाई गई कमेटी की बैठक में राहुल गांधी ने संगठन में ऊपर से नियुक्तियों की प्रवृत्ति खत्म करने की बात कही है। लेकिन अहम सवाल यही है कि क्या सोनिया गांधी और राहुल कांग्रेस को जनाधारित पार्टी बनाने में कामयाब हो पाएंगे</font><font size="3" face="Mangal">?</font></p>
<p></font><font size="3"></p>
<p align="justify">गुजरात और हिमाचल प्रदेश का चुनाव हारने के बाद कांग्रेस निराशा के दौर से गुजर रही है। मार्च महीने में पूर्वोत्तर के तीन राज्यों त्रिपुरा<font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">मेघालय और नगालैंड के चुनाव हो रहे हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन यह चुनाव देश की दिशा तय करने में कोई भूमिका नहीं निभा सकते। कांग्रेस की निगाह इसके बाद होने वाले कर्नाटक और इस साल के आखिर में होने वाले मध्य प्रदेश</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">राजस्थान</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">छत्तीसगढ़ विधानसभाओं के चुनावों पर लगी है। कांग्रेस के रणनीतिकार यह मानकर चल रहे हैं कि कर्नाटक भले ही कांग्रेस की झोली में न पड़े</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">भारतीय जनता पार्टी के कब्जे वाले मध्य प्रदेश</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">राजस्थान</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">छत्तीसगढ़ में उसका पलड़ा भारी होगा और लोकसभा चुनावों से ठीक पहले इन तीनों राज्यों के नतीजे कांग्रेस का मनोबल बढ़ा देंगे। लेकिन भारतीय जनता पार्टी भी अगले लोकसभा चुनावों की तैयारी में जुट गई है और उसे भी पता है कि इन तीन राज्यों की विधानसभाएं पंद्रहवीं लोकसभा के लिए कितने अहम हैं। हालांकि कांग्रेस गुजरात और हिमाचल के विधानसभा चुनाव नतीजों को यह कहकर झेंप मिटाने की कोशिश कर रही है कि विधानसभा चुनाव नतीजों का लोकसभा चुनावों पर कोई असर नहीं पड़ता। कांग्रेस के नेता अपने तर्क के पक्ष में </font><font size="3" face="Mangal">2003 </font><font size="3">की इन तीनों विधानसभा चुनावों के नतीजों को उदाहरण के तौर पर पेश करते हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">इन तीनों ही विधानसभाओं में जीत से उत्साहित होकर भारतीय जनता पार्टी ने चौदहवीं लोकसभा के चुनाव वक्त से पहले करवा दिए थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन उसे हार का मुंह देखना पड़ा। लेकिन यही तर्क अगले लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस के उलट भी जाता है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">अगर इस साल के आखिर में होने वाले इन तीनों राज्यों में कांग्रेस जीत भी जाए</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि हवा उसके पक्ष में बहनी शुरू हो जाएगी और पंद्रहवीं लोकसभा का नतीजा उसके पक्ष में जाएगा।</font></p>
<p></font></p>
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		<title>रोटी, कपड़ा, मकान और नैनो</title>
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		<pubDate>Fri, 11 Jan 2008 18:35:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की सरकार ने आम आदमी के हित में कितने काम किए, इसका हिसाब-किताब तो अगले चुनावों में ही पता चलेगा। वैसे एक वर्ग का मानना है कि पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात ने अपना फैसला सुना दिया है। इस बड़े तबके के हिसाब से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font size="3">प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की सरकार ने आम आदमी के हित में कितने काम किए, इसका हिसाब-किताब तो अगले चुनावों में ही पता चलेगा। वैसे एक वर्ग का मानना है कि पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात ने अपना फैसला सुना दिया है। इस बड़े तबके के हिसाब से मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी आम आदमी की बात करके सत्ता तक तो पहुंचे पर आम आदमी को कोई फायदा नहीं हुआ। दूसरी तरफ आजादी से पहले के भारत के दो बड़े औद्योगिक घरानों बिड़ला और टाटा ने अचानक आम आदमी की फिक्र करना शुरू कर दिया है। <span id="more-148"></span>बिड़ला घराना आईडिया का मोबाइल नेटवर्क आज की युवा पीढ़ी का सबसे लोकप्रिय रिचार्ज कूपन बन चुका है। जबकि जेआरडी टाटा के वारिस रतन टाटा ने मध्यम वर्ग की जेब के मुताबिक छोटी और सस्ती कार मार्केट में लाकर आम आदमी का सपना साकार कर दिया है। टाटा घराने ने लखटकिया कार दिखाकर सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को भौंचक कर दिया है। पहले ऐसा माना जा रहा था कि कार दो सीटों वाली होगी और उसका चेहरा-मोहरा बजाज थ्री व्हीलर जैसा होगा। यह भी कहा जा रहा था कि दो थ्री व्हीलरों को मिलाकर एक कार पेश कर दी जाएगी। लेकिन आगे से मैटीज और पीछे से सेंट्रो की तरह दिखने वाली नैनो ने मारुति ही नहीं अलबत्ता हुंडई को संकट में लाकर खड़ा कर दिया है। </font></p>
<p align="justify"><font size="3">रतन टाटा की मातृ भाषा गुजराती है और गुजराती में &#8216;नैनो&#8217; का मतलब होता है &#8216;छोटा&#8217;। धीरू भाई अंबानी और नरेंद्र मोदी के बाद अब गुजराती नैनो दुनियाभर में लोकप्रिय होगी। रतन टाटा ने चार साल पहले देश को लखटकिया कार का सपना दिखाया था, लेकिन सिंगूर में जमीन का झगड़ा होने के कारण कार का मॉडल आने में ही तीन साल की देरी हो गई। इस देरी की वजह से स्टील और टायर की कीमतों में काफी बढ़ोत्तरी हुई है इसके बावजूद रतन टाटा ने जून से शुरू होने वाली कम से कम पहली बुकिंग एक लाख रुपए में ही करने का ऐलान किया है हालांकि सड़क पर लाते समय आम आदमी को सवा लाख रुपए चुकाना होगा। फिर भी यह बड़ी बात है कि दो सवारी वाले मोटर साईकिल आज पचास-साठ हजार रुपए में मिलते हैं और सर्दी-गरमी, बारिश से राहत देने वाली चार सवारियों वाली कार एक लाख में मुअस्सर होगी। अपना वायदा पूरा करने के लिए रतन टाटा एक कार से सिर्फ चार हजार रुपए का मुनाफा हासिल करेंगे।</font></p>
<p align="justify"><font size="3">अब देश के दो और पुराने औद्योगिक घराने भी आम आदमी की तरफ आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। सब जानते हैं कि बिड़ला परिवार की तरह जमनालाल बजाज परिवार की भी आजादी के आंदोलन में अहम भूमिका रही है। बिड़ला और टाटा की ओर से आम आदमी की क्रांति शुरू करने के बाद अब बजाज भी जल्द ही छोटी कार मार्केट में लाने जा रहा है। एक समय था जब देश में बजाज स्कूटरों का ही दबदबा था। जमनालाल बजाज परिवार की कांग्रेस से निकटता के कारण जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने किसी अन्य को स्कूटर बनाने का लाइसेंस नहीं दिया। तब कोटा-परमिट, लाइसेंस राज हुआ करता था। कोटा-परमिट, लाइसेंस राज खत्म हुआ, तो कई तरह के स्कूटर, मोटर साईकिल मार्केट में आए। बजाज स्कूटर को तब हीरो साईकिल बनाने वाले मुंजाल परिवार ने पहले स्कूटी मार्केट में उतारकर टक्कर दी और बाद में हीरो होंडा मोटर साईकिल। अब स्कूटर-मोटर साईकिल की औद्योगिक लड़ाई लड़ने वाले बजाज और मुंजाल भी जापानी और कोरियन छोटी कारें लेकर मैदान में कूदेंगे। लेकिन छोटे दुकानदार, रेहड़ी वाले, नाई, मोची, धोबी और यहां तक कि घर में काम करने वाली बाई भी अगले दशक में टाटा, बजाज या मुंजाल की छोटी कार पर सवार होकर काम पर आया करेंगे। अभी भले ही यह हंसी-ठठ्ठे का मुद्दा लगता हो, लेकिन एक दशक पहले जब मोबाइल फोन मार्केट में आया था तो किसी ने सोचा नहीं था कि पान की दुकान में पान की डंडी तोड़ने वाले, रिक्शा चलाने वाले, माल की ढुलाई वाली रेहड़ी चलाने वाले, घर की मेहतरानी, घर का कचरा ले जाने वाले की जेब में मोबाइल होगा। </font></p>
<p align="justify"><font size="3">इस समय देश में पचास लाख कारें और सात करोड़ ऑटो-रिक्शा, मोटर साईकिल और स्कूटर सड़कों पर मौजूद हैं। आधी कारें डीजल का धुंआ उगलकर पर्यावरण को प्रदूषित कर रही हैं, बजाज के ऑटो ने दिल्ली-चेन्नई-कोलकाता जैसे महानगरों को सांस लेने लायक भी नहीं छोड़ा है। आने वाले समय में जल्द ही कम से कम पांच लाख नैनो सड़कों पर होंगी लेकिन पर्यावरणवादियों के लिए यह खुशी की बात है कि रतन टाटा ने मारुति-800 में मौजूद यूरो-3 से कहीं आगे यूरो-4 मुहैया करवाने का वादा किया है। दस जनवरी 2008 को रतन टाटा ने देश को &#8216;नैनो&#8217; दिखाकर एक ही झटके में नई क्लास पैदा कर दी है। आम आदमी के नैनों में नैनो का सपना संजोते हुए रतन टाटा ने कम से कम तीन बड़ी हस्तियों पर चुटकी ली। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टाचार्य के अकुशल प्रबंधन के कारण कार तीन साल लेट आएगी, इसलिए उन्होंने कार का नाम बुध्दू रखने के सुझाव का जिक्र किया। सिंगूर में कारखाना नहीं लगने देने का आंदोलन चलाने वाली ममता बनर्जी के बावजूद कार आ रही है, इसलिए उन्होंने कार का नाम ममता रखने का सुझाव आने का जिक्र भी किया। कार यूरो-4 मानक पर खरी उतरेगी, इसीलिए उन्होंने पर्यावरणविद सुनीता नारायणन का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें फिक्र की जरूरत नहीं। आम आदमी की आंखों में चमक भरने वाला ऐसा सपना जिसके बारे में पांच पेज के लंबे बायोडाटा वाले अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने कभी सोचा भी नहीं था, टाटा घराने ने पूरा कर दिखाया। मनमोहन सिंह की बात तो छोड़िए, कार्ल मार्क्स ने भी हर घर में कार का सपना नहीं लिया था। चार दशक पहले देश में रोटी-कपड़ा और मकान मिल जाए तो जीवन की सारी सुख-सुविधा मिलना मान लिया जाता था। इसीलिए इंदिरा गांधी ने सबको रोटी-कपड़ा और मकान मुहैया करवाने का नारा देकर चुनाव जीता। हालांकि अब भी देश में लाखों-करोड़ों लोग रोटी-कपड़ा और मकान के लिए दिन-रात जद्दोजहद में लगे हुए हैं, लेकिन अब आम मध्यम वर्ग के लिए रोटी-कपड़ा और मकान जिंदगी की जरूरत नहीं होगा, अलबत्ता रोटी-कपड़ा-मकान और एक नैनो एजेंडे में शामिल हो जाएगा।</font></p>
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		<title>भाजपा का अश्वमेघ घोड़ा कहीं रास्ते में न रुके</title>
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		<pubDate>Thu, 03 Jan 2008 18:34:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Politicking]]></category>

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		<description><![CDATA[गुजरात-हिमाचल में जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी में नया उत्साह आ गया है। लोकसभा चुनावों में हार के बाद से पार्टी में मुर्दनी छाई हुई थी। इस बीच पार्टी में कई प्रयोग हुए लेकिन कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं भरा जा सका था। भाजपा को निराशा के चक्रव्यूह में फसाने का काम राष्ट्रीय स्वयं सेवक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font size="3">गुजरात</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">हिमाचल में जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी में नया उत्साह आ गया है। लोकसभा चुनावों में हार के बाद से पार्टी में मुर्दनी छाई हुई थी। इस बीच पार्टी में कई प्रयोग हुए लेकिन कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं भरा जा सका था। भाजपा को निराशा के चक्रव्यूह में फसाने का काम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विवादास्पद फैसलों से हुआ था। उत्तर प्रदेश में भाजपा की करारी हार के बाद संघ ने भाजपा पर अपनी नीतियां</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">निर्देश थोपने की गलती कबूल की और लाल कृष्ण आडवाणी का विरोध छोड़ दिया। आडवाणी को प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करके अगले लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला इसी समीक्षा से निकला। स्वाभाविक तौर पर संघ परिवार के बदले रुख से भाजपा में नए सिरे से उथल</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पुथल शुरू हो चुकी है। <span id="more-141"></span>राजनाथ सिंह अपने स्तर पर अपनी समझ से पार्टी को चला रहे थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन अब उन्हें सभी फैसले लाल कृष्ण आडवाणी से सलाह मशविरा करके करने पड़ेंगे। ऐसा नहीं है कि राजनाथ सिंह पहले आडवाणी से सलाह मशविरा नहीं करते थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन आडवाणी न तो कोई सलाह दे रहे थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">और न ही किसी फैसले का विरोध कर रहे थे। आडवाणी ने पार्टी पदाधिकारियों की सूची में नरेंद्र मोदी को संसदीय बोर्ड से हटाने और अरुण जेटली को प्रवक्ता पद से हटाने पर न तो सहमति दी थी और न ही विरोध जताया था। कर्नाटक में जदस से गठबंधन पर भी उन्होंने अपनी राय नहीं दी थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">हालांकि उनके खास समझे जाने वाले अनंत कुमार शुरू से गठबंधन के खिलाफ थे। संघ परिवार के फैसले पर शुरूआती टकराव के बाद </font><font size="3" face="Mangal">(</font><font size="3">भोपाल में वाजपेयी की चिट्ठी लाने की घटना</font><font size="3" face="Mangal">) </font><font size="3">राजनाथ सिंह ने भी खुद को परिस्थितियों के मुताबिक ढालना शुरू कर दिया है।</font><font size="3"></p>
<p align="justify">पार्टी का संसदीय बोर्ड लाल कृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर चुका है और पार्टी के सभी फैसले आम सहमति से होने लगे हैं। गुजरात के चुनावों के दौरान ही कर्नाटक और राजस्थान की दो बड़ी घटनाएं हुई और दोनों ही जगह फैसला आम सहमति से लिया गया। कर्नाटक में अनंत कुमार की इच्छा के खिलाफ आडवाणी ने देवगौड़ा परिवार से मिलकर येदुरप्पा सरकार बनाने की सहमति दी। न सिर्फ सहमति दी<font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">बल्कि खुद शपथ ग्रहण में भी मौजूद थे। इसी तरह राजस्थान में वसुंधरा राजे विरोधी खेमे ने प्रदेश अध्यक्ष महेश शर्मा को निशाना बनाया</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो आडवाणी ने अपने शुरूआती विरोध के बाद गुजरात विधानसभा चुनावों के बाद बदलाव पर सहमति दे दी। महेश शर्मा को हटाने का फैसला उस समय भी हो सकता था</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन उसका सीधा असर गुजरात के चुनावों पर पड़ता क्योंकि ओम माथुर वहां के प्रभारी महासचिव थे। बदलाव के फैसले का संदेश लेने के बाद ही राजस्थान के असंतुष्टों ने अपनी तलवारें म्यान में डाल ली थी और वसुंधरा राजे सरकार की चौथी सालगिरह धूम</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">धाम से मनाई जा सकी।</p>
<p align="justify">गुजरात<font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">हिमाचल का चुनाव जीतने पर भाजपा में उत्साह तो है लेकिन कर्नाटक</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">मध्य प्रदेश</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">राजस्थान</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">छत्तीसगढ़ का खतरा भी सिर पर मंडरा रहा है। इन चारों ही राज्यों में पार्टी भयंकर फूट का शिकार है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">अगर वक्त रहते फूट पर काबू नहीं पाया गया</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो लोकसभा चुनाव आते</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">आते सारा उत्साह काफूर हो चुका होगा। इसलिए जहां एक तरफ अरुण जेटली</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">अनंत कुमार</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">सुषमा स्वराज</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">सुधीन्द्र कुलकर्णी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">अरुण शौरी पार्टी के पक्ष में वातावरण बनाए रखने की रणनीति और चुनाव घोषण पत्र तैयार करने में जुट गए हैं वहां इन चारों राज्यों को संभालने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। कर्नाटक को छोड़ दिया जाए</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जहां येदुरप्पा पार्टी के चुनावी हीरो के तौर पर चुनाव प्रचार की कमान संभालेंगे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">बाकी तीनों राज्यों में भाजपा के किसी मुख्यमंत्री की हैसियत नरेंद्र मोदी जैसी नहीं है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जो विद्रोहियों को ठेंगा दिखाकर अपनी लोकप्रियता के आधार पर पार्टी की नैय्या पार लगा सके। इसलिए मध्यप्रदेश</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विद्रोहियों को शांत करके संगठन</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">सरकार में तालमेल बिठाने की रणनीति शुरू हो गई है। पार्टी जानती है कि तीनों ही राज्यों में संगठन को दर</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">किनार करके चुनाव नहीं जीता जा सकता। भाजपा आलाकमान छत्तीसगढ़ को सबसे मजबूत </font><font size="3" face="Mangal">(</font><font size="3">वह भी कांग्रेस में फूट के कारण</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जहां सोनिया गांधी ने अजीत जोगी की इच्छा के खिलाफ विद्याचरण शुक्ल को कांग्रेस में लेकर दो गुट खड़े कर दिए हैं</font><font size="3" face="Mangal">) </font><font size="3">मान रहा है और मध्यप्रदेश को सबसे कमजोर। राजस्थान में स्थिति इतनी बुरी नहीं कि संभाली न जा सके</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन सिर्फ वसुंधरा राजे के भरोसे चुनाव नहीं जीत सकते। पार्टी का छत्तीसगढ़</font><font size="3" face="Mangal">- </font><font size="3">राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन का कोई इरादा नहीं है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन मध्यप्रदेश में चाहकर भी नेतृत्व परिवर्तन में हिचक है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">क्योंकि चार साल में तीन मुख्यमंत्री पहले ही बदले जा चुके हैं। हिमाचल की तरह भाजपा तीनों ही राज्यों में बसपा पर निगाह टिकाए बैठी है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">बसपा हिमाचल में कांग्रेस को हराने और भाजपा कों सत्ता दिलाने में काफी सहायक रही है।</font><font size="3"></p>
<p align="justify">भाजपा एक साथ दोतरफा तैयारियों में जुटी हुई है<font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जहां एक तरफ लोकसभा चुनाव की तैयारी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो दूसरी तरफ चारों राज्यों के चुनावों की तैयारी। राजग के घटक दलों ने लाल कृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के फैसले को मंजूर कर लिया है। शिव सेना</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">अकाली दल</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">बीजू जनता दल ने लाल कृष्ण आडवाणी को बाकायदा बधाई दी है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जनता दल के अध्यक्ष शरद यादव की ओर से आपत्ति की गुंजाइश भी खत्म हो चुकी है। हालांकि उन्होंने उत्साह नहीं दिखाया</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि जनता दल को आडवाणी के नाम पर कोई एतराज नहीं है। जहां तक ममता बनर्जी का सवाल है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">वह बार</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">बार फैसले बदलती रही हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">और फिलहाल भी राजग से बाहर जाने का रास्ता देख रही हैं। लोकसभा चुनावों की तैयारी का दूसरा चरण राजग में बड़े पैमाने पर पुनर्गठन और फेरबदल की प्रक्रिया से शुरू होगा। राजग के चेयरमैन अटल बिहारी वाजपेयी स्वास्थ्य कारणों से दिसम्बर </font><font size="3" face="Mangal">2005 </font><font size="3">में ही चुनावी राजनीति से संन्यास का ऐलान कर चुके थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन मीडिया ही उन्हें उम्मीदवार घोषित किए हुए था। अब स्वास्थ्य कारणों के आधार पर प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर होकर उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी को आगे कर दिया है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो सवाल खड़ा हो रहा है कि जब वाजपेयी का स्वास्थ्य इतना ही खराब है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो चुनावों से पहले राजग की बागडोर भी किसी अन्य के हवाले की जानी चाहिए। वाजपेयी की तरह राजग के संयोजक जार्ज फर्नाडीस का स्वास्थ्य भी अब उनका साथ नहीं दे रहा है। वैसे भी उनकी हैसियत अब उनकी अपनी पार्टी में वैसी नहीं रही। जार्ज फर्नाडीस को जनता दल अध्यक्ष के पद से चुनाव में हराने वाले शरद यादव की निगाह राजग के चेयरमैन या संयोजक के पद पर है और यह स्वाभाविक भी है कि दोनों में से एक पद गैर भाजपा नेता के पास रहे। लाल कृष्ण आडवाणी भी चाहेंगे कि राजग का एक पद गैर भाजपा नेता के पास रहे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">ताकि घटक दलों में समन्वय का काम सुचारू रूप से चलता रहे। भैरोंसिंह शेखावत हालांकि उपराष्ट्रपति पद से हटने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल नहीं हुए</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन उन्हें भाजपा के नेता के तौर पर ही देखा जाता है। शेखावत सक्रिय राजनीति में लौटने का ऐलान कर चुके हैं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">राजग के पास भी उन जैसा लोकप्रिय चेहरा नहीं है। देशभर में उनकी स्वीकार्यता अटल बिहारी वाजपेयी जैसी ही है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">इसलिए लाल कृष्ण आडवाणी उन्हें राजग का चेयरमैन बनाकर उनकी निर्विवाद छवि का फायदा उठाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।</font></p>
<p></font></p>
<p></font></p>
<p></font></p>
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		<title>मोदी को मुद्दा बना खुद हारी कांग्रेस</title>
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		<pubDate>Sun, 23 Dec 2007 07:03:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Politicking]]></category>

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		<description><![CDATA[गुजरात के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का पलड़ा उसी दिन भारी हो गया था, जिस दिन कांग्रेस नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत विरोध पर उतर आई थी। चौदहवीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस ने मोदी को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया था, तो गुजरात में कांग्रेस की स्थिति में सुधार हुआ था। अलबत्ता विधानसभा क्षेत्रों [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font size="3">गुजरात के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का पलड़ा उसी दिन भारी हो गया था</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जिस दिन कांग्रेस नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत विरोध पर उतर आई थी। चौदहवीं लोकसभा के चुनाव<img border="1" vspace="2" align="left" width="236" src="http://indiagatese.com/wpfiles/wp-content/uploads/narendra-modi.jpg" hspace="2" alt="Narendra Modi" height="250" /> में कांग्रेस ने मोदी को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया था</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो गुजरात में कांग्रेस की स्थिति में सुधार हुआ था। अलबत्ता विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से देखा जाए तो कांग्रेस </font><font size="3" face="Mangal">91 </font><font size="3">क्षेत्रों में जीती थी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जबकि भाजपा </font><font size="3" face="Mangal">89 </font><font size="3">क्षेत्रों में। इसका मतलब यह हुआ कि करीब साढ़े तीन साल पहले नरेंद्र मोदी का प्रभाव घटना शुरू हो गया था</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन कांग्रेस ने हालात का फायदा उठाकर खुद को मजबूत करने की बजाए कमजोर कर लिया। </font><font size="3"></p>
<p align="justify">चुनाव नतीजों से पहले ही यह चर्चा शुरू हो गई कि गुजरात में न तो भाजपा जीतेगी<font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">न हारेगी। जीतेंगे तो नरेंद्र मोदी</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">हारेंगे तो नरेंद्र मोदी। <span id="more-97"></span>यह चर्चा उन्हीं लोगों ने शुरू की जो पिछले पांच साल से नरेंद्र मोदी को हेय दृष्टि से देखते रहे हैं। इनमें अंग्रेजी मीडिया के साथ</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">साथ जमीनी हकीकत से कोसों दूर दिल्ली और मुम्बई में बैठकर गुजरात पर लिखने वाले लोग शामिल हैं। यह ठीक है कि नरेंद्र मोदी ने चुनाव में खुद को दांव पर लगाया</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन यह भी सच है कि भाजपा के रणनीतिकारों ने प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही मोदी को मुद्दा बनाने का फैसला कर लिया था। केशुभाई समर्थकों को इसी रणनीति के तहत शुरू में ही अलग</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">थलग कर दिया गया था। भाजपा के लिए लगातार तीसरी बार गुजरात का चुनाव जीतना ज्यादा जरूरी था</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">भले ही इसके लिए केशुभाई पटेल जैसे पांच दशक पुराने नेताओं को दरकिनार करना पड़ा। चुनाव क्योंकि नरेंद्र मोदी को मुद्दा बनाकर लड़ा जाना था</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">इसलिए भाजपा के रणनीतिकारों को इंतजार सिर्फ इस बात का था कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की ओर से उन पर सीधा हमला हो। भले ही गुजरात से कोसों दूर बैठे मीडियाकर्मी यह समझते हों कि चुनाव हारता देख नरेंद्र मोदी ने गुजरात की अस्मिता और खुद को मुद्दा बना लिया। भाजपा के रणनीतिकार यह मानकर चल रहे थे कि सोनिया गांधी अपनी पहली चुनावी सभा में ही मोदी पर सीधा हमला करेंगी। पहली दिसम्बर को जैसे ही सोनिया गांधी ने मौत के सौदागर वाला भाषण दिया</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">मोदी के रणनीतिकारों ने उसी समय लपक लिया। भाषण की टेप अगले ही दिन चुनाव आयोग के दफ्तर में पहुंचाने के बाद मोदी ने सोहराबुद्दीन और मोहम्मद अफजल का राग अलापना शुरू कर दिया।भारतीय राजनीति में जब से सोनिया गांधी का उदय हुआ है</font></p>
<p></font>
</p>
<p align="justify"><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तब से दो बड़े राजनीतिक दलों में विचारधारा की लड़ाई आपसी दुश्मनी में तब्दील हो चुकी है। इसका आभास तेरहवीं लोकसभा में सत्रावसान के समय अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गांधी की ओर से होने वाले भाषणों से मिलना शुरू हो गया था। दुश्मनी जब सत्रावसान का मजा किरकिरा करने लगी तो सरकार की ओर से सदन के नेता और प्रतिपक्ष के नेता के भाषणों की परंपरा खत्म करने की पहल हुई। करीब पांच साल का इंतजार करने के बाद लाल कृष्ण आडवाणी ने हाल ही में राजनीतिक दुश्मनी का वातावरण खत्म करने के लिए राहुल गांधी को समझाने की पहल की है। आडवाणी की इस पहल का आने वाले समय में क्या असर पड़ेगा</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">राजनीतिक विश्लेषक इसे गंभीरता से देख रहे हैं। राजनीतिक प्रतिद्वंदी को दुश्मन मानकर राजनीति करने से कितना नुकसान हो सकता है</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">इसका अंदाज गुजरात के चुनाव नतीजों से लगाया जाएगा। </font><font size="3">नरेंद्र मोदी ने शुरू से अपने शासन के दौरान हुए विकास को मुद्दा बनाकर चुनाव प्रचार शुरू किया था</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">लेकिन इस चुनाव प्रचार से सार्थक नतीजे निकलने की उम्मीद टूटनी शुरू हो गई थी। मोदी इस बात का इंतजार ही कर रहे थे कि किसी तरह अपने पुराने कट्टरवादी हिंदुत्व के मुद्दे पर लौट सकें। सोनिया गांधी ने जैसे ही मुद्दा दिया</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">नरेंद्र मोदी ने खुद पर हुए हमले को गुजरात की अस्मिता के साथ जोड़ दिया। पिछले विधानसभा चुनावों में भी नरेंद्र मोदी गुजरात की अस्मिता को मुद्दा बनाकर गुजरातियों का मन जीतने में सफल रहे थे। भाजपा और शिवसेना को छोडक़र बाकी सभी राजनीतिक दलों ने गोधरा के बाद हुए दंगों को आधार बनाकर गुजरात की छवि खराब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। देश की ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां इस हकीकत से अभी भी वाकिफ नहीं हैं कि गुजरात के दंगों में आम गुजराती शामिल हो गया था। उन दंगों को सरकार प्रायोजित दंगा बताकर और गोधरा में टे्रन के अंदर से लगी आग बताकर कांग्रेस और कांग्रेस के समर्थक दलों ने गुजरात की जनता को और उत्तेजित कर दिया। गोधरा में टे्रन जलाए जाने से हिंदुओं में इतना ज्यादा आक्रोश था कि खाते</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">पीते घरों के मध्यमवर्गीय लोग भी सड़कों पर उतर आए। कांग्रेस और कांग्रेस के समर्थक दलों ने दंगों को सरकार प्रायोजित बताकर गुजराती वोटरों को अपने साथ खींचने के बजाए खुद</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">ब</font><font size="3" face="Mangal">-</font><font size="3">खुद नरेंद्र मोदी की ओर धकेल दिया। हालांकि हकीकत यह थी कि </font><font size="3" face="Mangal">27 </font><font size="3">फरवरी को बोगी जली थी और </font><font size="3" face="Mangal">28 </font><font size="3">फरवरी को पुलिस की गोली से तीन दंगई मारे गए थे। इस हकीकत को नजरअंदाज करके नरेंद्र मोदी और गुजरात की भाजपा सरकार को पिछले पांच सालों से मौत का सौदागर कहकर कांग्रेस अपना लगातार नुकसान कर रही है। कांग्रेस जब तक दंगों की हकीकत को नहीं समझेगी तब तक नरेंद्र मोदी का कुछ नहीं बिगाड़ सकेगी। असल में नरेंद्र मोदी की असली ताकत कांग्रेस की नीति है।</font><font size="3"> </font><font size="3"></p>
<p align="justify">हालांकि पिछले पांच सालों में कम से कम ग्रामीण क्षेत्रों में वह अपनी लोकप्रियता खो चुके थे<font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जिसका सबूत पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजे हैं। लेकिन सोनिया गांधी ने उन्हें मौत का सौदागर कहकर और मनमोहन सिंह ने पांच साल पुराने दंगों के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए दंगों की पुरानी फाइलें फिर से खोलने की बात कहकर नरेंद्र मोदी का ही भला किया। इसके बाद नरेंद्र मोदी चुनावों में अपना </font><font size="3" face="Mangal">56 </font><font size="3">इंच का सीना फूलाकर सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को चुनौती देते थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">तो अपने उन्हीं वोटरों का मन जीत रहे थे</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">जो </font><font size="3" face="Mangal">2002 </font><font size="3">के चुनाव में उनके साथ थे। वह गुजराती वोटरों को यह समझाने में सफल रहे कि कांग्रेस सत्ता में आ गई तो गुजरात में फिर से आए दिन दंगों और कर्फ्यू के दिन लौट आएंगे। चुनाव के आखिरी दिनों में कांग्रेस कमजोर दिखाई देने लगी तो कहा जाने लगा कि नरेंद्र मोदी पर भाजपा का कोई नियंत्रण नहीं</font><font size="3" face="Mangal">, </font><font size="3">वह भाजपा से बड़े हो गए हैं। यह हताशा भरी वह स्थिति थी जिसमें कांग्रेस मोदी विरोधी भाजपाईयों का सक्रिय समर्थन हासिल करना चाहती थी।</font></p>
<p></font></p>
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		<title>संसद की कारगुजारी से चुनावी आहट</title>
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		<pubDate>Sat, 08 Dec 2007 18:29:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Politicking]]></category>

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		<description><![CDATA[एटमी करार पर हुई बहस के बाद वामपंथी, तीसरे मोर्चे और राजग के सांसदों ने वाकआउट करके यूपीए सरकार को अल्पमत में दिखा दिया है। भले ही वामपंथी दलों ने मनमोहन सिंह सरकार को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से बातचीत करने की हरी झंडी दे दी है, लेकिन संसद में दिखाए गए तेवरों से चौदहवीं [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify" style="margin: 0cm 0cm 0pt; text-align: justify" class="MsoNormal"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">एटमी करार पर हुई बहस के बाद वामपंथी</span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">, <span lang="HI">तीसरे मोर्चे और राजग के सांसदों ने वाकआउट करके यूपीए सरकार को अल्पमत में दिखा दिया है। भले ही वामपंथी दलों ने मनमोहन सिंह सरकार को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से बातचीत करने की हरी झंडी दे दी है</span>, <span lang="HI">लेकिन संसद में दिखाए गए तेवरों से चौदहवीं लोकसभा पर अभी भी तलवार लटकी हुई है। वित्त मंत्री पी. चिदंबरम </span>2008-09 <span lang="HI">का बजट तैयार कर रहे हैं</span>, <span lang="HI">संसद पर लटकी तलवार के कारण माना जा रहा है कि मौजूदा सरकार का यह बजट ही आखिरी हो सकता है। इसलिए तय है कि यह बजट लोकलुभावन होगा। <span id="more-83"></span>लोकसभा की अवधि उसके आखिरी सत्रों से आंकी जाती है</span>, <span lang="HI">जब मध्यावधि चुनाव दिखाई दे रहे हों</span>, <span lang="HI">तो संसद सत्र में सांसदों की दिलचस्पी कम दिखाई देने लगती है। सात दिसम्बर को समाप्त हुए शीत सत्र में ऐसे लक्षण दिखाई देने लग गए थे। वैसे तो सत्ताधारी दल की नेता सोनिया गांधी हर सत्र के बाद<span>  </span>अपने दल के सांसदों को जनता में जाने की गुहार लगाती है लेकिन इस बार उन्होंने सांसदों से जमीनी हकीकत की जानकारी लेकर आलाकमान को बताने का फरमान जारी किया है। इससे भी अनुमान लगाए जा रहे हैं कि फरवरी के तीसरे हफ्ते में शुरू होने वाला संसद का बजट सत्र चौदहवीं लोकसभा का आखिरी सत्र हो सकता है। </span></span></p>
<p align="justify" style="margin: 0cm 0cm 0pt; text-align: justify" class="MsoNormal"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><span lang="HI"></span></span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">मनमोहन सिंह सरकार का गठन मई </span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">2004 <span lang="HI">में हुआ था</span>, <span lang="HI">अगले साल ही मनमोहन सिंह ने बिना अपनी पार्टी कांग्रेस और अपने सहयोगी दलों को विश्वास में लिए अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के साथ एटमी करार कर लिया। जिस पर सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दलों ने कड़ा एतराज किया और तब से ही सरकार तलवार की धार पर चल रही है। गठबंधन में दरार और टकराव के बावजूद मनमोहन सरकार ने ढाई साल और पूरे कर लिए हैं</span>, <span lang="HI">लेकिन अब ऐसी स्थिति पैदा हो गई है कि सरकार का आगे चलना संभव दिखाई नहीं देता। जिसके लक्षण इस पूरे साल में संसद सत्रों के दौरान दिखाई देते रहे</span>, <span lang="HI">खासकर सात दिसम्बर को खत्म हुए इस साल के आखिरी और शीत सत्र में ज्यादा दिखाई दिए। अगर हम पिछले आठ साल की समीक्षा करें तो चुनावी साल </span>2004 <span lang="HI">को छोड़कर बाकी के सभी सात सालों के मुकाबले मौजूदा साल संसद की कार्रवाई सबसे कम रिकार्ड की गई। चुनावी साल में एक सत्र कम हुआ था</span>, <span lang="HI">इसलिए उस साल के रिकार्ड से तुल्नात्मक मुकाबला नहीं करना चाहिए। सन् </span>2000 <span lang="HI">में संसद </span>85 <span lang="HI">दिन बैठी</span>, 2001 <span lang="HI">में </span>81 <span lang="HI">दिन बैठी</span>, 2002 <span lang="HI">में </span>84 <span lang="HI">दिन बैठी</span>, 2003 <span lang="HI">में </span>74 <span lang="HI">दिन बैठी</span>, 2004 <span lang="HI">में </span>53 <span lang="HI">दिन बैठी</span>, 2005 <span lang="HI">में </span>85 <span lang="HI">दिन बैठी। यह स्थिति एटमी करार होने से पहले के कामकाज के कारण मजबूत हुई। एटमी करार हो जाने पर यूपीए में आई दरार के कारण </span>2006 <span lang="HI">में सिर्फ </span>77 <span lang="HI">दिन काम हुआ</span>, <span lang="HI">जबकि इस साल तो रिकार्ड ही टूट गया</span>, <span lang="HI">जब लोकसभा सिर्फ </span>66 <span lang="HI">दिन चली और राज्यसभा उससे भी एक दिन कम </span>65 <span lang="HI">दिन। कामकाजी घंटों के आधार पर मुकाबला करें तो भी </span>2004 <span lang="HI">के साल को छोड़कर </span>2007 <span lang="HI">में संसद ने सबसे कम काम किया। यूपीए सरकार ने सर्वाधिक काम एटमी करार से पहले </span>2005 <span lang="HI">में ही किया</span>, <span lang="HI">इसलिए उसी साल लोकसभा में सर्वाधिक </span>490 <span lang="HI">घंटे और राज्यसभा में </span>401 <span lang="HI">घंटे काम हुआ जबकि इस साल लोकसभा सिर्फ </span>281 <span lang="HI">घंटे चली जबकि राज्यसभा सिर्फ </span>217 <span lang="HI">घंटे। बिलों के हिसाब से भी मौजूदा साल की उपलब्धि बहुत कम रही है वाजपेयी के पूरे छह साल के शासनकाल और मनमोहन सिंह के साढ़े तीन साल के शासनकाल में से मौजूदा साल बिल पास करने के मामले में भी सबसे पीछे साबित हुआ। इस साल संसद में कुल </span>56 <span lang="HI">बिल पेश हुए और </span>46 <span lang="HI">पास हुए। </span></span></p>
<p align="justify" style="margin: 0cm 0cm 0pt; text-align: justify" class="MsoNormal"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><span lang="HI"></span></span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">दर्जनभर से ज्यादा युवा सांसदों से लब्बालब चौदहवीं लोकसभा का गठन हुआ तो ऐसा माना जा रहा था कि आजादी के बाद दूसरी पीढ़ी लोकतंत्र संभालने के लिए तैयार हो रही है। लेकिन चौदहवीं लोकसभा के कार्यकाल में संसद के दोनों सदनों में उम्र के हिसाब से चर्चाओं में हिस्सा लेने का रिकार्ड बेहद निराश करने वाला है। लोकसभा में </span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">25 <span lang="HI">साल से </span>40 <span lang="HI">साल के उम्र के सिर्फ </span>2.6 <span lang="HI">फीसदी सांसदों ने बहस में हिस्सा लिया। राज्यसभा में पहुंचने की न्यूनतम उम्र ही </span>30 <span lang="HI">साल है इसलिए </span>30 <span lang="HI">से </span>45 <span lang="HI">साल की उम्र के सांसदों का रिकार्ड तैयार किया गया तो पता चला कि इस आयुवर्ग के </span>2.8 <span lang="HI">फीसदी सांसदों ने बहस में हिस्सा लिया। लोकसभा में </span>41 <span lang="HI">से </span>55 <span lang="HI">साल आयुवर्ग के </span>4.3 <span lang="HI">फीसदी</span>, 56 <span lang="HI">से </span>70 <span lang="HI">साल आयुवर्ग के </span>4.6 <span lang="HI">फीसदी और </span>71 <span lang="HI">साल से ज्यादा उम्र के </span>4 <span lang="HI">फीसदी सांसदों ने बहस में हिस्सा लिया। मजेदार बात यह है कि कुल सांसदों का पंद्रह-सोलह फीसदी सांसद ही बहस में हिस्सा लेते हैं</span>, <span lang="HI">बाकी तो साल भर में एक-दो बार बोल जाएं तो काफी। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि चुने जाने के बाद सांसदों के प्राथमिकता किस तरह बदल जाती है।</span></span></p>
<p align="justify" style="margin: 0cm 0cm 0pt; text-align: justify" class="MsoNormal"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal"><span lang="HI"></span></span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">संसद का सात दिसम्बर को खत्म हुआ सत्र इसलिए भी अगले साल को चुनावी साल बताने का संकेत देता है</span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">, <span lang="HI">क्योंकि सरकार ने छोटा सत्र होने के बावजूद भी जरूरत से ज्यादा काम निपटा लिया। एटमी करार और नंदीग्राम जैसी बढ़ी घटनाओं के कारण संसद के हंगामापूर्ण रहने के बावजूद लोकसभा ने तय समय का नब्बे फीसदी समय काम किया</span>, <span lang="HI">जबकि राज्यसभा ने करीब-करीब सौ फीसदी तय समय काम किया। नंदीग्राम पर शुरूआती दो दिन बर्बाद होने की भरपाई देर रात तक काम करके की गई। एटमी करार पर बहस के समय राज्यसभा रात साढ़े ग्यारह बजे तक चली और इस मुद्दे पर सरकार पर तलवार लटकी होने के कारण प्रधानमंत्री खुद रात ग्यारह बजे तक बैठे रहे। शीत सत्र में सरकार का इरादा </span>18 <span lang="HI">बिल पास करवाने का था</span>, <span lang="HI">सात बिल लंबित होने और एक बिल वापस लिए जाने के बावजूद सरकार ने </span>15 <span lang="HI">बिल पास करवा लिए</span>, <span lang="HI">यानी कि पांच बिल ऐसे पास हो गए</span>, <span lang="HI">जो शीत सत्र के लिए सरकार के एजेंडे पर नहीं थे। इनमें एक राजीव गांधी इंस्टीटयूट ऑफ पेट्रोलियम टेक्नोलॉजी बिल भी है</span>, <span lang="HI">जो युवा वोटरों को लुभाने के लिए लाया गया था। हालांकि अगर हम पिछले सात-आठ सालों की तुलना करें तो मौजूदा साल में सबसे कम बिल पास हुए हैं। मनमोहन सरकार पर संकट का अहसास इस बात से भी होता है कि इस साल सरकार संसद का मुकाबला करने से कतराती रही। बजट सत्र </span>42 <span lang="HI">दिन का तय हुआ था लेकिन सिर्फ </span>32 <span lang="HI">दिन चला। मानसून सत्र </span>23 <span lang="HI">दिन का तय हुआ था</span>, <span lang="HI">लेकिन सिर्फ </span>17 <span lang="HI">दिन चला। गुजरात और हिमाचल के चुनावों के कारण शीत सत्र सिर्फ </span>17 <span lang="HI">दिन का ही तय किया गया था और पूरे </span>17 <span lang="HI">दिन काम चला</span>, <span lang="HI">हालांकि आमतौर पर शीत सत्र </span>23 <span lang="HI">दिन का होता रहा है। कामकाजी घंटों का तुल्नात्मक अध्ययन करें तो पिछले आठ सालों में सबसे कम काम मौजूदा साल में हुआ। लोकसभा छह घंटे और राज्यसभा पांच घंटे काम करती है लेकिन इस साल लोकसभा ने सिर्फ औसत </span>4.30 <span lang="HI">घंटे और राज्यसभा ने सिर्फ औसत </span>3.30 <span lang="HI">घंटे काम किया। वैसे तो पूरा साल यूपीए में दरार दिखाई देती रही</span>, <span lang="HI">लेकिन आखिरी सत्र में दरार ज्यादा उभरकर सामने आई इस कारण माना जा रहा है कि अब यह गठबंधन दरकने लगा है। दरार के दो बड़े उदाहरण<span>  </span>नजरअंदाज नहीं किए जा सकते। नंदीग्राम के मुद्दे पर वामपंथी एकदम अलग-थलग हो गए जबकि एटमी करार के मुद्दे पर कांग्रेस अलग-थलग हो गई। कम से कम दो मौकों पर राजग</span>, <span lang="HI">तीसरा मोर्चा और वामपंथी दल एकजुट दिखाई दिए। एटमी करार पर सरकार का विरोध करते हुए तीनों मोर्चों ने इकट्ठे वाकआउट किया और पांडिचेरी में स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास की ओर से मनमाना बिल पास करवाने की कोशिश भी तीनों ने मिलकर नाकाम की।</span><o></o></span></p>
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		<title>सवाल करार का नहीं, विदेश नीति का</title>
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		<pubDate>Sun, 21 Oct 2007 18:25:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Politicking]]></category>

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		<description><![CDATA[वामपंथी दलों की मुख्य चिंता भारत-अमेरिका एटमी करार की नहीं, अलबत्ता विदेश नीति को लेकर है। एटमी करार के जरिए अमेरिका ने जिस तरह की रणनीति अख्तियार की है, उससे भारत की विदेश नीति में बदलाव होना स्वाभाविक है। मौजूदा सरकार कितना भी कहे कि भारत की विदेश नीति कतई प्रभावित नहीं होगी, लेकिन मनमोहन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font color="#000080"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">वामपंथी दलों की मुख्य चिंता भारत-अमेरिका एटमी करार की नहीं</span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">, <span lang="HI">अलबत्ता विदेश नीति को लेकर है। एटमी करार के जरिए अमेरिका ने जिस तरह की रणनीति अख्तियार की है</span>, <span lang="HI">उससे भारत की विदेश नीति में बदलाव होना स्वाभाविक है। मौजूदा सरकार कितना भी कहे कि भारत की विदेश नीति कतई प्रभावित नहीं होगी</span>, <span lang="HI">लेकिन मनमोहन सिह का यह कथन विश्वसनीय साबित नहीं होता। खासकर ईरान को लेकर अमेरिका के भारत पर पड़ रहे दबाव के कारण यह स्पष्ट हो जाता<span>  </span>है कि महाशक्ति के असली इरादे क्या हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान-पाक-भारत गैस पाईप लाइन का समझौता न हो</span>, <span lang="HI">इसीलिए उसने भारत के सामने एटमी ऊर्जा का प्रस्ताव रखा था।<span id="more-27"></span></span></span></font><font color="#000080"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">अमेरिका ने जिस तरह अफगानिस्तान के खिलाफ पाकिस्तान को इस्तेमाल करके वहां राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर दी है</span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">, <span lang="HI">ठीक उसी तरह का इरादा ईरान के मामले में भारत को इस्तेमाल करने का लगता है। अमेरिका चाहता है कि ईरान के खिलाफ कार्रवाई में भारत उसके साथ रहे। अमेरिका के इराक पर हमले से पहले भारत-अमेरिका संबंधों में काफी नजदीकी आ चुकी थी</span>, <span lang="HI">इसके बावजूद तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने संसद से इराक पर हमले की निंदा का प्रस्ताव पास करवाया था। जबकि ईरान को एटमी कार्यक्रम बंद करने संबंधी धमकी देने का आईएईए की बैठक में प्रस्ताव पास करवाए जाने के वक्त भारत ने अमेरिका का साथ दिया। हालांकि यह प्रस्ताव उस समय पास हुआ जब वामपंथी दलों के समर्थन से भारत में यूपीए सरकार है। दूसरी तरफ रूस शुरू से ही ईरान के खिलाफ किसी तरह का प्रस्ताव पास करवाए जाने के खिलाफ था</span>, <span lang="HI">हालांकि जब प्रस्ताव पास हुआ तो रूस ने भी मजबूरी में इसका समर्थन किया। लेकिन रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने पिछले हफ्ते ईरान जाकर अमेरिका के खिलाफ अपने मत का इजहार कर दिया है। ईरान के खिलाफ प्रस्ताव के समय भारत के रुख को लेकर भी यूपीए सरकार और वामपंथी दलों में गंभीर टकराव की स्थिति पैदा हुई थी। </span><o></o></span></font><font color="#000080"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">जवाहर लाल नेहरू व्यक्तिगत तौर पर कम्युनिस्ट विचारधारा के नजदीक थे इसलिए उन्होंने अमेरिका की तरफ से बढ़ाए गए दोस्ती के हाथ को थामने के बजाए सोवियत संघ से दोस्ती गांठी। नतीजा यह निकला कि अमेरिका ने एशिया में पाकिस्तान को अपना मित्र बना लिया। ठीक उसी समय सोवियत संघ का चीन के साथ तकरार चल रहा था और भारत-सोवियत संघ गठबंधन का नतीजा यह निकला कि चीन भी पाकिस्तान का हमदर्द हो गया। सोवियत संघ ने भारत को न सिर्फ<span>  </span>बाजार की तरह इस्तेमाल किया और अपने ज्यादातर हथियार भारत को बेचने लगा</span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">, <span lang="HI">अलबत्ता भारत के माध्यम से ही तीसरी दुनिया के देशों में प्रवेश किया। दुनिया में उस समय अमेरिका और सोवियत संघ दो बड़ी ताकतें थीं</span>, <span lang="HI">जवाहर लाल नेहरू ने वैसे तो गुट निरपेक्षता का झंडा बुलंद किया लेकिन भारत को पूरी तरह सोवियत खेमे में ला खड़ा किया था। उन दिनों हालत यह थी कि जो भी कोई अमेरिकी नीतियों या अमेरिका से दोस्ती की पैरवी करता था उसे सीआईए का एजेंट करार दे दिया जाता था। भारत-पाक युध्द के बाद इंदिरा गांधी ने देश को चीन और पाकिस्तान के खतरों से सुरक्षित करने के लिए </span>1971 <span lang="HI">में सोवियत संघ से एतिहासिक संधि की (इस संधि की संसद से मंजूरी नहीं ली गई थी</span>, <span lang="HI">हालांकि इंदिरा गांधी ने जब इसे संसद में पेश किया तो मेजे थपथपाकर स्वागत किया गया था।)। भारत की सोवियत संघ निर्भरता वाली इस संधि का नतीजा यह निकला कि अमेरिका ने पाकिस्तान को सैन्य मदद बढ़ा दी</span>, <span lang="HI">चीन और सोवियत संघ के संबंध और बिगड़ गए</span>, <span lang="HI">भारत-चीन के संबंधों में ठंडापन आ गया</span>, <span lang="HI">चीन और अमेरिका में शीत युध्द जैसे हालात पैदा हो गए</span>, <span lang="HI">जबकि चीन और पाकिस्तान में दोस्ती और गहरी हो गई। यह स्थिति </span>1986 <span lang="HI">में गोर्बाच्योव के वलादिवोस्टोक भाषण तक जारी रही। इस एतिहासिक भाषण में गोर्बाच्योव ने चीन की सीमा से फौजें हटाने और अफगानिस्तान से पीछे हटने का एलान करके विदेश नीति में व्यापक बदलाव कर डाला। इस नई विदेशनीति के बाद सोवियत संघ ने पाकिस्तान और चीन के साथ संबंध सुधारने शुरू किए और </span>1992 <span lang="HI">में सोवियत संघ टूटने के बाद तो स्थिति एकदम बदल गई। सोवियत संघ टूटने के बाद </span>20 <span lang="HI">जुलाई </span>2000 <span lang="HI">को रूस के विदेशनीति संबंधी घोषणापत्र में चीन को अपना पहला मित्र घोषित किया गया। इसके बाद तो भारत के पास अपनी विदेशनीति में बदलाव के सिवा कोई चारा नहीं था। </span><o></o></span></font><font color="#000080"><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal" lang="HI">रूस के अचानक पासा पलट लेने के बाद भारत के लिए अपने सामरिक हितों का संकट पैदा हो गया। भारत के सामने एक रास्ता तो यह था कि मल्टीपोलर कूटनीति को अपनाते हुए रूस-चीन-भारत का त्रिगुटा बनाया जाए। कूटनीतिक हलकों में इस पर गंभीर चर्चा हुई</span><span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal">, <span lang="HI">मास्को में वाजपेयी-पुतिन और चीन के राष्ट्रपति की एक बैठक भी हुई। लेकिन इस मल्टीपोलर कूटनीति से भारत के सामरिक हितों की रक्षा में अड़चनों को देखते हुए संतुलित विदेशनीति तैयार की गई। जहां एक तरफ अमेरिका से संबंध सुधारे गए</span>, <span lang="HI">वहां दूसरी तरफ रूस से मित्रवत संबंध बनाए रखे गए। लेकिन वक्त के मुताबिक सामरिक संबंधों में परिवर्तन करते हुए रूस से सैन्य निर्भरता कम करने का फैसला किया गया। यूपीए सरकार का गठन होने के बाद बनाए गए न्यूनतम साझा कार्यक्रम में भी विदेशनीति को लेकर कोई संसय नहीं था। न्यूनतम साझा कार्यक्रम में साफ कहा गया था कि स्वतंत्र विदेशनीति अपनाते हुए मल्टीपोलर कूटनीति को बढ़ावा दिया जाएगा लेकिन अमेरिका के साथ घनिष्ठ संपर्कों और संबंधों को आगे बढ़ाया जाएगा। ठीक यही विदेशनीति एनडीए सरकार ने अपनाई थी। लेकिन अमेरिका के साथ एटमी करार के साथ जुड़ी हाईड एक्ट की शर्तों ने स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है। वामपंथियों के समर्थन से मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद जहां उम्मीद यह की जाती थी कि राजग सरकार के समय अमेरिका के साथ बढ़ गई घनिष्ठता में थोड़ी कमी आएगी</span>, <span lang="HI">वहां हुआ ठीक इसके उलट है। वामपंथी दलों के दबाव के बावजूद मनमोहन सिंह सरकार ईरान के मामले में अमेरिका के सामने झुक गई और एटमी ऊर्जा ईंधन हासिल करने के लिए अमेरिका की तरफ झुकाव वाली विदेशनीति अपनाने के साफ संकेत भी दे दिए। वामपंथियों के लिए सबसे बड़ा संकट यह है कि उसके समर्थन से चल रही सरकार अमेरिका समर्थक नीतिया अपना ले तो भविष्य में उसके लिए अमेरिका विरोध बेहद मुश्किल हो जाएगा। इसलिए सवाल अब एटमी करार का नहीं अलबत्ता भारत की विदेशनीति का है</span>, <span lang="HI">जो इस करार के माध्यम से अमेरिका समर्थक हो जाएगी। </span><o></o></span></font></p>
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