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	<title>Socio Political News &#187; Current Analysis</title>
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		<title>गुटबाजी पर भारी पड़ रहे गड़करी</title>
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		<pubDate>Mon, 08 Feb 2010 07:52:22 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[नितिन गड़करी के अध्यक्ष बनते ही भारतीय जनता पार्टी की धोती उतर गई। राजनाथ सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, वेंकैया नायडू, जना कृष्णामूर्ति सब धोती वाले अध्यक्ष थे। सूटेड-बूटेड अध्यक्ष नितिन गड़करी ने अपनी पहली ही प्रेस कांफ्रेंस में बदली हुई भाजपा के दर्शन करवाए। प्रेस कांफ्रेंस के बाद परोसे गए दोपहर भोज में मांसाहारी व्यंजनों ने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">नितिन गड़करी के अध्यक्ष बनते ही भारतीय जनता पार्टी की धोती उतर गई। राजनाथ सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, वेंकैया नायडू, जना कृष्णामूर्ति सब धोती वाले अध्यक्ष थे। सूटेड-बूटेड अध्यक्ष नितिन गड़करी ने अपनी पहली ही प्रेस कांफ्रेंस में बदली हुई भाजपा के दर्शन करवाए। प्रेस कांफ्रेंस के बाद परोसे गए दोपहर भोज में मांसाहारी व्यंजनों ने सबको चौंकाया। भाजपा दफ्तर में मांसाहारी सार्वजनिक भोजन का आयोजन पहली बार हुआ था। इससे पहले मांसाहारी भोजन के शौकीन वेंकैया नायडू साल में एक बार अपने घर पर ही दोपहर भोज का आयोजन करते थे। जनसंघ के जमाने से भाजपा दफ्तर शुध्द ब्राह्मणवादी छुआछूत के अंदाज से चल रहा था। <span id="more-1539"></span>ऐसा नहीं है कि भाजपा के नेता मांसाहारी नहीं थे। वे सिर्फ सार्वजनिक तौर पर मांसाहारी नहीं थे। अटल बिहारी वाजपेयी को एक बार किसी ने ब्रह्मचारी कहा था।  तो उन्होंने पलटकर कहा था- &#8216;मैं कुंआरा हूं।&#8217; इसी तरह भाजपा दफ्तर में जब मांसाहारी भोजन का आयोजन हुआ, तो कई चेहरे बेनकाब हुए। नितिन गड़करी ने मीडिया को पारदर्शिता की यह पहली झलक दिखाई थी।</p>
<p style="text-align: justify;">नितिन गड़करी के अध्यक्ष बनते ही भाजपा में ही तरह-तरह के सवाल खड़े हो रहे थे। उनके चयन को संघ का थोपा हुआ फैसला बताया गया। उनका कद राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से कम बताया गया। यह भी कहा गया कि भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी के लिए जैसा लोकप्रिय अध्यक्ष होना चाहिए, वैसे नहीं हैं नितिन गड़करी। कुछ लोगों ने उन्हें राजनाथ सिंह से भी ज्यादा गलत फैसला बताना शुरू कर दिया था। लेकिन अपने डेढ़ महीने के कार्यकाल में भले ही वह जननेता की छवि बनाने में नाकाम दिख रहे हों, लेकिन राज्यों में पार्टी को गुटबाजी से निकालने में कामयाब रहे हैं। राजनाथ सिंह के जमाने में पार्टी भयंकर गुटबाजी का शिकार हो गई थी, जिसे सुधारना आसान काम नहीं। इसके बावजूद पिछले डेढ़ महीने में नितिन गड़करी ने राजस्थान, पंजाब और हिमाचल की गुटबाजी पर नकेल डालने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। इन तीनों राज्यों से ज्यादा गुटबाजी का शिकार उत्तर प्रदेश और दिल्ली उनके ताजा एजेंडे पर है। दोनों ही राज्यों में नेताओं को घंटों आमने-सामने बिठाकर हल निकालने की कोशिशों में जुटे हुए हैं गड़करी। राजस्थान का विवाद सबसे ज्यादा उलझा हुआ था। पहले विधानसभा चुनावों में करारी हार और बाद में लोकसभा चुनावों में पार्टी का बंटाधार हुआ। राजनाथ सिंह ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले महेश शर्मा की जगह पर ओमप्रकाश माथुर को अध्यक्ष बनाकर भेजा था जिस पर लालकृष्ण आडवाणी बेहद खफा थे। लंबी जद्दोजहद के बाद राजनाथ सिंह अपना फैसला लागू करवाने में कामयाब हो गए। तो प्रदेश में ओमप्रकाश माथुर की वसुंधरा राजे के सामने ताकतवर अध्यक्ष की पहचान बन गई। प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के छत्तीस के आंकड़े ने राजस्थान में भाजपा की लुटिया डुबो दी। करारी हार के बाद प्रदेश अध्यक्ष ओमप्रकाश माथुर ने वसुंधरा राजे पर प्रहार करने के लिए संगठनमंत्री प्रकाश चंद जैन पर निशाना साधा। उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा भेजते हुए आलाकमान को लिखा था कि प्रदेश में या तो वह काम कर सकते हैं या प्रकाश चंद। दोनों इकट्ठा नहीं कर सकते। प्रकाश चंद से पहले ओमप्रकाश माथुर प्रदेश के संगठन मंत्री हुआ करते थे। संघ और आलाकमान ने वसुंधरा, माथुर और प्रकाश चंद तीनों को ही पदों से हटाने का फैसला करके समस्या का इलाज करने का फैसला किया था। माथुर का इस्तीफा मंजूर करने के बाद प्रकाश चंद से इस्तीफा लिया गया और वसुंधरा को विपक्ष के नेता पद से इस्तीफा देने की हिदायत दी गई। इस पर वसुंधरा राजे और राजनाथ सिंह का टकराव सारे देश के सामने आ गया। नितिन गड़करी ने अपने अध्यक्ष बनने के तीसरे ही दिन राजस्थान के सभी नेताओं को एक कमरे में बिठाकर हल निकलने तक बाहर नहीं जाने देने की हिदायत दे दी। उनकी इस शैली से पार्टी में अनुशासन की नई शुरूआत हुई। सात घंटे की मीटिंग में वह सर्वमान्य हल निकालने में कामयाब हो गए। अब वसुंधरा को नितिन गड़करी अपनी राष्ट्रीय टीम में शामिल करेंगे, लेकिन वह अगले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद की दावेदार होंगी। वसुंधरा के विरोध के बावजूद अरुण चतुर्वेदी ही भाजपा अध्यक्ष चुने जाएंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">हिमाचल की गुटबाजी राजस्थान से भी ज्यादा पेचींदा थी। मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल पार्टी अध्यक्ष पद पर अपने करीबी सोलन के विधायक राजीव बिंदल को बिठाना चाहते थे। हालांकि खीमी राम को विधानसभा उपाध्यक्ष पद से हटाकर प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। धूमल की रणनीति को देखते हुए शांताकुमार ने रोहड़ू से पहली बार विधायक चुने गए खुशीराम बालनाहटा को अध्यक्ष बनाने की मुहिम छेड़ दी। इसी बीच युवा मोर्चे के पुराने सहयोगी नितिन गड़करी के अध्यक्ष बनने से उत्साहित युवा मोर्चे के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नङ्ढा ने मंत्री पद छोड़कर अध्यक्ष पद पर दावा ठोकना शुरू कर दिया। बात दिल्ली दरबार तक पहुंची तो नितिन गड़करी ने  सबकी बात सुनने के बाद पुराने अध्यक्ष को बनाए रखने पर आपत्ति पूछी। इस पर न शांताकुमार के पास कोई जवाब था, न प्रेमकुमार धूमल के पास। अंतत: शांता और  धूमल दोनों चुप्पी साध गए और जेपी नङ्ढा के अध्यक्ष बनने का ख्वाब भी धरा रह गया।</p>
<p style="text-align: justify;">अरुण जेटली ने कमल शर्मा को दो साल पहले ही दिल्ली से पंजाब प्रदेश भाजपा का महासचिव बनवाकर भिजवाया था। इस बार चुनाव से पहले कमल शर्मा अध्यक्ष पद के दावेदार हो गए। संघ और दिल्ली में अपनी पहुंच के जरिए कमल शर्मा अपना नाम पक्का करवाकर चले गए थे। नितिन गड़करी पूरी तरह अंधेरे में थे। आलाकमान का फैसला सुनकर प्रदेश के विधायक और मंत्री दंग रह गए। ठीक चुनाव वाले दिन बगावत के हालात पैदा हो गए, तो चुनाव टालना पड़ा। सभी दिल्ली में नितिन गड़करी के दरबार में पहुंचे तो घंटेभर की बैठक में ही फैसला पलट गया। गड़करी ने कमल शर्मा की बजाए विधायकों और मंत्रियों के समर्थन वाले अश्विनी शर्मा को अध्यक्ष बनाने पर सहमति दे दी। इस तरह नितिन गड़करी ने सभी को आमने-सामने बिठाकर आम सहमति के आधार पर नई भाजपा का गठन करने और ऊपर की पहुंच के आधार पर पदों पर कब्जा करने की रिवायत को खत्म करना शुरू कर दिया है। गड़करी के सामने अब सबसे बड़ा संकट उत्तर प्रदेश और दिल्ली में भाजपा को खड़ा करना है, जो पिछले दस साल से लगातार आधारहीन होती जा रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">जहां एक तरफ भाजपा के नए अध्यक्ष ने अपने विधिवत चुनाव और इंदौर अधिवेशन में उसकी पुष्टि से पहले ही राज्यों की गुटबाजी को समझकर खत्म करना शुरू किया है, वहीं उनके सामने सबसे बड़ी समस्या आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की पसंद वाली युवा भाजपा टीम बनाना है। असल में पंद्रह साल पहले लालकृष्ण आडवाणी की टीम सर्वाधिक ताकतवर और प्रभावी थी। उस टीम में गोविंदाचार्य, अरुण जेटली, प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू जैसे लोकप्रिय चेहरे शामिल थे। राजनाथ सिंह की टीम में संगठन मंत्री रामलाल, अरुण जेटली, अनंत कुमार और गोपीनाथ मुंडे के सिवा कोई ताकतवर नहीं था। गोपीनाथ मुंडे महासचिव जरूर बनाए गए थे, लेकिन उनकी दिलचस्पी दिल्ली में कभी थी ही नहीं। हालांकि अब सांसद बनने के बाद उन पर लोकसभा में उपनेता और पीएसी अध्यक्ष बनने की जिम्मेदारी सिर्फ इसलिए आ गई है, क्योंकि नितिन गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद उनसे सीनियर गड़करी की संगठन में उनकी भूमिका नहीं हो सकती। विजय गोयल, थावरचंद गहलोत और विनय कटियार का कद पार्टी महासचिव लायक कभी था ही नहीं। नितिन गड़करी महासचिव के पद भरने के बजाए काम करने वाले लोकप्रिय चेहरों को सामने लाने की रणनीति बना रहे हैं ताकि भाजपा की छवि बेहतर हो सके। रामलाल जी का संगठन मंत्री और अनंत कुमार का महामंत्री बना रहना तय ही माना जा रहा है। जबकि नए महासचिवों में वसुंधरा राजे, रविशंकर प्रसाद, मनोहर परिकर, शाहनवाज हुसैन या धर्मेन्द्र प्रधान में से चार होंगे। ओबीसी और दलित का पेंच फंसा हुआ है, इस पेंच का फायदा उठाकर थावरचंद गहलोत अध्यक्ष बने रह सकते हैं। राहुल गांधी की आभा को तोड़ने के लिए नितिन गड़करी ने वरुण गांधी को  भाजपा युवा मोर्चे का अध्यक्ष बनने के लिए राजी कर लिया है। हालांकि इससे पहले जब उन्हें यह पेशकश की गई थी, तो उन्होंने ठुकरा दी थी।</p>
<p style="text-align: justify;">इंदौर का भाजपा अधिवेशन नितिन गड़करी की अध्यक्ष पद पर बाकायदा ताजपोशी के लिए बुलाया गया है। अपने जीवन में दीनदयाल उपाध्याय की कार्यशैली अपनाने वाले गड़करी ने इंदौर अधिवेशन को प्राचीनता और आधुनिकता का संगम दर्शाने के कड़े निर्देश दिए हैं। आमतौर पर सभी राजनीतिक दल अपने राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए उन्हीं राज्यों को चुनते हैं जहां उनके दल की सरकार हो। इस मामले में भारतीय जनता पार्टी भी दूसरों से अलग नहीं। अपनी सरकार वाले राज्य में अधिवेशन होने से इंफ्रांस्ट्रक्चर के कई फायदे मिलते हैं, जो इंदौर में भाजपा को मिलेंगे ही। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि भाजपा ने इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए मध्यप्रदेश को चुना है। फिर सवाल खड़ा होता है कि मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की जगह इंदौर क्यों? सुनते हैं, इस मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पर भारी पड़े हैं उनके विरोधी, लेकिन उनके सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय।</p>
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		<title>बंटाधार कर गए नारायणन</title>
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		<pubDate>Mon, 01 Feb 2010 03:41:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[
चिदंबरम को आंतरिक सुरक्षा का नया ढांचा तैयार करना पड़ रहा है जिसमें आंतरिक सुरक्षा सलाहकार की भूमिका विदेशी मामलों तक सीमित कर दी जाएगी।

एमके नारायणन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पद से हटाए गए। या उन्होंने खुद हटाने की गुजारिश की थी। इस रहस्य को सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के सिवा कोई नहीं जानता। लेकिन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>चिदंबरम को आंतरिक सुरक्षा का नया ढांचा तैयार करना पड़ रहा है जिसमें आंतरिक सुरक्षा सलाहकार की भूमिका विदेशी मामलों तक सीमित कर दी जाएगी।</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">एमके नारायणन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पद से हटाए गए। या उन्होंने खुद हटाने की गुजारिश की थी। इस रहस्य को सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के सिवा कोई नहीं जानता। लेकिन यह सच है कि पी चिदंबरम के गृहमंत्री बनने के बाद वह असहज थे। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार के नाते उनका ओहदा राज्यमंत्री का था। राज्यपाल बनकर वह मुख्यमंत्री या केबिनेट मंत्री से भी ऊपर हो गए। नारायणन की तरक्की हुई है। इसलिए राजनीतिक, कूटनीतिक और नौकरशाही में अफवाहें थम नहीं रही। <span id="more-1520"></span>मुंबई पर आतंकवादी हमला राष्ट्रीय सुरक्षा बंदोबस्त में सबसे बड़ी खामी थी। एमके नारायणन सीधे तौर पर जिम्मेदार थे। गृहमंत्री शिवराज पाटिल से तो इस्तीफा मांग लिया गया था। लेकिन एमके नारायणन ने चारों तरह से हो रही छिछालेदर के बाद इस्तीफा दिया था। इसके बावजूद मनमोहन सिंह ने उनका इस्तीफा मंजूर नहीं किया। क्यों? मनमोहन सिंह ने इस्तीफा मंजूर नहीं किया। उससे भी अहम सवाल है कि नारायणन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के ओहदे तक पहुंचे कैसे। आईएफएस तो दूर की बात, वह आईएएस भी नहीं थे, वह डायरेक्टर आईबी के पद से रिटायर हुए एक आईपीएस अफसर थे। उनका अनुभव सिर्फ इतना था कि वीपी सिंह के प्रधानमंत्री काल में वह राष्ट्रीय सुरक्षा समन्वयक के तौर पर कुछ देर प्रधानमंत्री कार्यालय में थे। नारायणन से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार रहे बृजेश मिश्र और जेएन दीक्षित दोनों आईएफएस थे। आतंकवाद का दायरा अब राष्ट्रीय नहीं। अलबत्ता अंतरराष्ट्रीय है। आतंकवाद की हर वारदात के तार विदेशों से जुड़े होते हैं। आतंकवाद की वारदात कोई सामान्य अपराध की घटना नहीं। आतंकवाद की गुत्थियां सुलझाने के लिए व्यापक दृष्टिकोण और व्यापक समझ चाहिए। दूसरे देशों से कूटनीतिक संबंध बनाना। आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग का दायरा बढ़ाना। यह सब आईपीएस अफसर की सोच से बाहर का मामला होता है। इसीलिए अटल बिहारी वाजपेयी ने सोच समझकर रिटायर्ड आईएफएस बृजेश मिश्र को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार नियुक्त किया था। बृजेश मिश्र एनडीए सरकार बनने से काफी पहले भाजपा में शामिल हो गए थे। मध्य प्रदेश के पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री डीपी मिश्र के बेटे बृजेश मिश्र की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी उन्हें इस पद के करीब ले गई। कांग्रेस को सत्ता में आता देख पूर्व विदेश सचिव जेएन दीक्षित 2003 में ही कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार के दावेदार हो गए थे। उनका कार्यकाल बहुत छोटा था और आतंकवाद की कोई बड़ी घटना भी नहीं हुई। पद पर ही उनका देहांत हो गया। एमके नारायणन की नियुक्ति से कूटनीतिक हलकों में अचंभा हुआ था। वह सोनिया गांधी से सीधे केरल संपर्क के माध्यम से इस पद पर पहुंच गए थे। वह नियुक्ति पूरी तरह राजनीतिक थी और अंतत: गलत साबित हुई।</p>
<p style="text-align: justify;">अब मनमोहन सिंह ने सोनिया गांधी से सलाह लिए बिना पूर्व विदेश सचिव शिवशंकर मेनन को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया है। मेनन भारत के दोनों महत्वपूर्ण पड़ोसी देशों पाकिस्तान और चीन में उच्चायुक्त और राजदूत रह चुके हैं। इन्हीं दोनों देशों से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है। अमेरिका से परमाणु समझौता करवाने में वही मनमोहन सिंह और बिल क्लिंटन में कड़ी का काम कर रहे थे। नारायणन गलत चयन था तो मेनन बेहतरीन चयन है। लेकिन जब गृहमंत्री पी चिदंबरम एनसीटीसी की नई अवधारणा के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा का सारा जिम्मा अपने अधीन ले रहे हैं, तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भूमिका सीमित हो जाएगी। बृजेश मिश्र के समय राष्ट्रीय सुरक्षा का एक ढांचा तैयार किया गया था, जो सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के अधीन आता था। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के नाते बृजेश मिश्र हर रोज प्रधानमंत्री को ताजा स्थिति पर रिपोर्ट करते थे। सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार नहीं, अलबत्ता राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार बोर्ड का गठन भी किया गया। सुरक्षा मामलों की केबिनेट कमेटी और सुरक्षा सलाहाकार बोर्ड को मिलाकर राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का गठन हुआ। हालांकि सुरक्षा मामलों की केबिनेट कमेटी ही लगातार सुरक्षा समीक्षा करने वाली संस्था है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड की तो पिछले ग्यारह सालों में यदा-कदा ही मीटिंग हुई होगी। बृजेश मिश्र जब तक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार रहे वह हर रोज इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक और रॉ प्रमुख को साथ लेकर प्रधानमंत्री से मुलाकात करते थे। नतीजा यह होता था कि ताजा जानकारियों का अदान-प्रदान हो जाता था। प्रधानमंत्री को सीधे जमीनी जानकारी मिलती थी। नारायणन के कार्यकाल में खुफिया तंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा का सारा ढांचा तहस-नहस हो गया। इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि मुंबई पर आतंकवादी हमले के समय खुफिया विभाग को कोई खबर नहीं थी। जबकि इस गणतंत्र दिवस पर देश पर हवाई हमले की खुफिया खबरें, और हवाई हमले के लिए यूरोप से खरीदे गए 50 पैरा ग्लाइडर की खुफिया रिपोर्टे पूरी तरह बोगस साबित हुई हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">जब से एमके नारायणन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार बने, उन्होंने खुफिया प्रमुखों की प्रधानमंत्री से रोजाना मीटिंगों का सिलसिला ही बंद कर दिया। वह हर रोज इंटेलिजेंस निदेशक से इनपुट तो लेते थे, लेकिन उनकी प्रधानमंत्री से मुलाकात नहीं करवाते थे। उन्होंने इंटेलिजेंस डायरेक्टर को प्रधानमंत्री से कम ही मिलने दिया। रॉ प्रमुख के साथ तो खुद भी रोजाना की बजाए साप्ताहिक मुलाकातें होने लगी थी। जबकि आतंकवाद से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय सूचनाएं आज के युग में ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। बृजेश मिश्र के समय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार परिषद सचिवालय में दो काम होते थे। पहला गुप्तचर सूचनाओं की जानकारी हासिल करना और आतंकवाद से निपटने के लिए दीर्घकालीन रणनीति बनाकर उसे लागू करने की योजना तैयार करना। लेकिन एमके नारायणन ने गुप्तचर सूचनाओं का समायोजन करने के लिए बनाई गई संयुक्त खुफिया परिषद (जेआईसी) को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार परिषद से अलग कर दिया। एमके नारायणन के कार्यकाल में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार परिषद (जेआईसी) में वरिष्ठ स्टाफ की भारी कमी आ गई थी। विदेश सेवा से जुड़े अफसर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार परिषद में जाने से कन्नी काटने लगे थे। इस विभाग में विदेशी भाषाओं के जानने वालों का होना भी जरूरी था, लेकिन नारायणन के कार्यकाल में इसमें भी भारी कमी आई। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार एमके नारायणन और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार परिषद सचिवालय में भी तालमेल की भारी कमी आ गई थी।</p>
<p style="text-align: justify;">मुंबई पर आतंकी हमले के बाद भले ही शिवराज पाटिल के साथ एमके नारायणन की विदाई नहीं हुई। लेकिन गृहमंत्री बनने के बाद पी चिदंबरम लगातार राष्ट्रीय सुरक्षा के ढांचे की समीक्षा कर रहे हैं। उन्होंने पहला काम यह किया था कि रोज दोपहर को एक मीटिंग लेने लगे थे। इस मीटिंग में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार नारायणन, गृहसचिव, गुप्तचर एजेंसी  रॉ सचिव, डायरेक्टर आईबी, चेयरमैन जेआईसी और गृहमंत्रालय के विशेष सचिव शामिल हो रहे थे। नारायणन पहले सिर्फ प्रधानमंत्री को अकेले ही राष्ट्रीय सुरक्षा पर रिपोर्ट देकर इतिश्री कर रहे थे। चिदंबरम की ओर से बुलाई गई मीटिंगों में बैठना नारायणन को पूरी तरह असहज कर रहा था। हालांकि चिदंबरम की इन कोशिशों से सूचनाओं का आदान-प्रदान तेजी से होने लगा है और आतंकी वारदातों में व्यापक कमी आई है। चिदंबरम ने सभी गुप्तचर एजेंसियों की सूचनाएं एक जगह इकट्ठी करने के लिए &#8216;नेटग्रिड&#8217; की स्थापना करने का भी फैसला किया है। यह नेटग्रिड डेढ़-दो साल में स्थापित हो जाएगा। यह काम राष्ट्रीय सलाहाकार का था, लेकिन कोई योजना बनाने में वह पूरी तरह नाकाम रहे। संसद से कानून बनवाकर राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी का गठन कर देने के बाद पी चिदंबरम अब राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र स्थापित करना चाहते हैं। मार्च के पहले हफ्ते में राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र (एनसीटीसी) का ड्राफ्ट केबिनेट के सामने रख दिया जाएगा। चिदंबरम की योजना एनसीटीसी को सीधे गृहमंत्रालय के अधीन लाकर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार की भूमिका कम या खत्म करने की है। एनसीटीसी बन जाने के बाद प्रधानमंत्री का राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार विदेश संबंधों, चीन के साथ सीमा विवाद, परमाणु समझौते जैसे मुद्दों पर ज्यादा कारगर ढंग से काम कर सकेंगे। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार आंतरिक सुरक्षा को बाहरी खतरे के प्रति जवाबदेह बनाया जा सकेगा। वह गृहमंत्री के माध्यम से एनसीटीसी और प्रधानमंत्री में भी पुल का काम कर सकता है। चिदंबरम ने मन बना लिया है कि नई बनी राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी (एनआईए) एनटीआरओ, जेआईसी, एनसीआरबी सीधे एनसीटीसी के तहत काम करेगी। सीबीआई, रॉ आदि की भूमिका भी तय होगी। चिदंबरम इन दोनों एजेंसियों को भी एनसीटीसी के साथ जोड़ना चाहते हैं। मिलिट्री इंटेलिजेंस और वित्त मंत्रालय की इंटेलिजेंस एजेंसियों के नुमाइंदे भी एनसीटीसी में शामिल होंगे। इस तरह राष्ट्रीय सुरक्षा का नया ढांचा तैयार होगा, जो अमेरिका के मौजूदा ढांचे के अनुरूप होगा।</p>
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		<title>अब फहराया जा सकेगा हुबली में राष्ट्रीय ध्वज</title>
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		<pubDate>Mon, 18 Jan 2010 03:41:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[
श्रीनगर के लाल चौक में आतंकवादियों ने और हुबली के ईदगाह मैदान में अंजुमन-ए-इस्लाम नाम के स्थानीय संगठन ने राष्ट्रीय ध्वज फहराने की मुखालफत की थी। इस गणतंत्र दिवस से पहले सुप्रीम कोर्ट ने ईदगाह मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराने की सारी अड़चनें दूर कर दी हैं।

अगले हफ्ते गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रपति प्रतिभा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीनगर के लाल चौक में आतंकवादियों ने और हुबली के ईदगाह मैदान में अंजुमन-ए-इस्लाम नाम के स्थानीय संगठन ने राष्ट्रीय ध्वज फहराने की मुखालफत की थी। इस गणतंत्र दिवस से पहले सुप्रीम कोर्ट ने ईदगाह मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराने की सारी अड़चनें दूर कर दी हैं।</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">अगले हफ्ते गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील इंडिया गेट पर आयोजित शानदार समारोह में राष्ट्रीय ध्वज फहराएंगी। राष्ट्रीय ध्वज फहराना क्या कभी अल्पसंख्यकों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना हो सकता है? ऐसा सोचने पर भी रूह कांप उठती है। गणतंत्र दिवस के मौके पर ऐसी दो घटनाओं को याद करना बेहद जरूरी होगा। बीस साल पहले 1990 में आतंकवादियों ने लाखों कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से बाहर निकालने की सफलता के बाद श्रीनगर के लाल चौक में पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया था। उन्होंने चुनौती दी थी कि कोई भी पाकिस्तानी ध्वज को उतारकर भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराकर दिखाए। <span id="more-1495"></span>जम्मू कश्मीर की पुलिस और भारत सरकार लुंज-पुंज दिखाई देने लग गई थी और ऐसा लगता था कि कश्मीर को देश का हिस्सा बनाए रखना अब मुश्किल होगा। तब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए कन्याकुमारी से कश्मीर तक की यात्रा शुरू की और छब्बीस जनवरी 1992 को गणतंत्र दिवस पर उसी लाल चौक में राष्ट्रीय ध्वज फहराने का ऐलान किया। उस समय केंद्र में कांग्रेस की नरसिंह राव सरकार थी, जिसने मुरली मनोहर जोशी को श्रीनगर जाने से रोकने की कोशिश की, ताकि लाल चौक पर राष्ट्रीय ध्वज न फहराया जा सके। सरकार को डर था कि अगर लाल चौक पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया तो आतंकवादी और उनके अल्पसंख्यक समर्थक भड़क उठेंगे। लेकिन मुरली मनोहर जोशी के अड़ जाने और उन्हें रोकने पर देशभर में आक्रोश की आशंका को देखते हुए सरकार ने उन्हें सड़क मार्ग की बजाए विमान से ले जाकर झंडा फहराने की रस्म अदायगी करवाई। मुरली मनोहर जोशी ने अपनी यात्रा के दौरान देशभर के लोगों को आह्वान किया था कि वे गणतंत्र दिवस में जहां-जहां संभव हो, ज्यादा से ज्यादा संख्या में राष्ट्रीय ध्वज फहराकर राष्ट्रभक्ति का वातावरण निर्मित करें। मुरली मनोहर जोशी के उसी आह्वान के तहत हुबली के नागरिकों ने भी छब्बीस जनवरी 1992 को किटूर रानी चेन्नमा मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराने का फैसला किया।</p>
<p style="text-align: justify;">जम्मू कश्मीर की बात अलग थी, वहां पाकिस्तान समर्थक आतंकवादियों का दबदबा कायम हो गया था। लेकिन कर्नाटक के हुबली शहर के किसी मैदान में गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने पर किसी को क्या आपत्ति हो सकती थी। लेकिन हुबली के किटूर रानी चेन्नपा मैदान को अपनी मलकियत बताने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के संगठन अंजुमन-ए-इस्लाम ने सचमुच विरोध कर दिया था। मैदान पर मलकियत का विवाद अपनी जगह था, लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय के किसी संगठन को गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के मौकों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का विरोध करने की बजाय स्वागत करना चाहिए था। कई बार ऐसे संगठन गलत कदम उठाकर अल्पसंख्यक समुदाय की राष्ट्रभक्ति को चौराहे पर खड़ा कर देते हैं। अंजुमन-ए-इस्लाम की धमकियों से डरकर कर्नाटक के मुख्यमंत्री एस बंगारप्पा ने हुबली के किटूर रानी चेन्नमा मैदान में झंडा फहराने की कोशिश करने वालों को गिरफ्तार करने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया। मुख्यमंत्री का तर्क था कि गणतंत्र दिवस पर वहां झंडा फहराने से अल्पसंख्यकों की भावनाओं को ठेस पहुंचेगी। राष्ट्रीय ध्वज फहराना क्या कभी अल्पसंख्यकों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना हो सकता है? लेकिन यह सच है कि हुबली में अल्पसंख्यकों की भावनाओं को सचमुच ठेस पहुंच गई थी और बेहद तनाव का वातावरण बन गया था। अल्पसंख्यकों की भावनाओं को शांत करने के लिए पुलिस ने अपने मुख्यमंत्री का हुक्म बजाने के लिए स्थानीय नागरिकों की ओर से फहराए गए झंडे को उतारकर उनके सामने तार-तार कर दिया था। मुख्यमंत्री के हुक्म से 1971 के राष्ट्रीय सम्मान सुरक्षा कानून का उल्लंघन उन्हीं लोगों ने किया, जिनकी जिम्मेदारी राष्ट्रीय सम्मान की सुरक्षा करने की थी। इस कानून में कहा गया था कि गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर सार्वजनिक स्थानों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने में अड़चन बनने वाले व्यक्ति को तीन साल तक की कैद हो सकती है। इस गणतंत्र दिवस से पहले हुबली के इस किटूर रानी चेन्नमा मैदान में झंडा फहराने को लेकर कोई विवाद नहीं था। लेकिन जब पुलिस ने उन्हें झंडा फहराने से रोका तो हुबली के लोगो ने मिलकर राष्ट्रीय ध्वज रक्षा समिति का गठन करके पंद्रह अगस्त को भी झंडा फहराने का ऐलान कर दिया। भारी पुलिस बंदोबस्त के बावजूद एक बूढ़ी महिला ने मैदान में जाकर झंडा गाड़ दिया और फौरन राष्ट्रगान शुरू कर दिया। पुलिस ने भागकर उस बूढ़ी महिला को धक्का देकर गिरा दिया और राष्ट्रीय ध्वज उखाड़ दिया। अगले साल छब्बीस जनवरी 1993 को फिर वही दोहराया गया, पंद्रह अगस्त 1993 को राज्य की कांग्रेस सरकार ने वहां सेना और बीएसएफ तैनात कर दी ताकि कोई राष्ट्रीय ध्वज न फहरा सके। कर्नाटक विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने कहा था कि हुबली में राष्ट्रीय ध्वज फहराने से रोकने के लिए सरकार ने तीन करोड़ चालीस लाख खर्च किए। भारतीय जनता पार्टी से जुड़े लोगों ने इसे आंदोलन के तौर पर लिया और छब्बीस जनवरी 1994 को उस समय की भारतीय युवा मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष उमा भारती ने खुद वहां राष्ट्रीय ध्वज फहराने का ऐलान किया। कर्नाटक की सत्ता तब तक एस बंगारप्पा के हाथ से निकलकर वीरप्पा मोइली के हाथ में आ चुकी थी। लेकिन सरकार की नीति में कोई फर्क नहीं आया, मोइली सरकार की पुलिस ने राष्ट्रीय ध्वज फहराने से रोकने के लिए वहां कर्फ्यू लगा दिया। इसके बावजूद हजारों लोग हुबली के इस मैदान में पहुंचे और झंडा फहराया गया। जिसे रोकने के लिए पुलिस ने गोली चला दी थी जिसमें छह लोग मारे गए। हुबली चार-पांच साल तक स्वतंत्रता संग्राम का अखाड़ा बना रहा।</p>
<p style="text-align: justify;">छब्बीस जनवरी 1994 को हुई हिंसा कर्नाटक और देश की राजनीति के इतिहास में राष्ट्रीय ध्वज आंदोलन के तौर पर याद की जाएगी। राज्य की सरकार लोगों को वहां राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए सिर्फ इसलिए रोक रही थी क्योंकि स्थानीय अल्पसंख्यकों का संगठन अंजुमन-ए-इस्लाम इसका विरोध कर रहा था। अंजुमन-ए-इस्लाम के विरोध का आधार यह था कि वह जगह सार्वजनिक नहीं, अलबत्ता अंग्रेजी शासन ने उन्हें 999 साल की लीज पर दी थी। अंजुमन-ए-इस्लाम 1973 में मुंसिफ कोर्ट और 1982 में सिविल कोर्ट और 1992 में हाईकोर्ट से मैदान की मलकियत का मुकदमा हार चुकी थी। इसके बावजूद कर्नाटक की सरकार अंजुमन-ए-इस्लाम पर काबू पाने में नाकाम थी, जबकि राष्ट्रीय ध्वज फहराने की कोशिश करने वालों को लगातार रोका जा रहा था। घटना के बाद उमा भारती पर आपराधिक मुकदमा दायर किया गया, जब वह मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री बनी, तो कर्नाटक की सरकार ने इस मुकदमे को दुबारा से खोलकर उनके वारंट जारी करवा दिए थे। उमा भारती को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर आत्मसमर्पण करने की यात्रा शुरू करनी पड़ी। जबकि राष्ट्रीय ध्वज की लहर फिर पैदा होने के डर से राज्य की कांग्रेस सरकार ने मुकदमा वापस लेने का फैसला किया। संभवत: इस गणतंत्र दिवस को हुबली के किटूर रानी चेन्नमा मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराने से कोई नहीं रोकेगा। इसकी वजह वहां सिर्फ भाजपा की सरकार होना नहीं, अलबत्ता पिछले हफ्ते चौदह जनवरी को ही सुप्रीम कोर्ट का फैसला है। सुप्रीम कोर्ट ने अंजुमन-ए-इस्लाम के इस दावे को पूरी तरह नकार दिया है कि 14 मई 1930 को ब्रिटिश सरकार ने किटूर रानी चेन्नमा मैदान उन्हें 999 साल की लीज पर दिया था। अलबत्ता कोर्ट ने कहा है कि ब्रिटिश सरकार ने एक रुपया सालाना फीस पर साल में दो बार बकरीद और रमजान के मौके पर सिर्फ नमाज अदा करने के लिए किराया तय किया था। जबकि अंजुमन-ए-इस्लाम ने मैदान को अपनी प्रापर्टी समझकर वहां पर मस्जिद और मार्किट तक बना डाली। अब अदालत के फैसले के बाद मैदान का सारा निर्माण तोड़ा जाएगा और साल में दो बार नमाज अदा करने के अलावा राष्ट्रीय ध्वज फहराने के साथ-साथ बाकी सार्वजनिक कार्यों के लिए  भी इस्तेमाल होगा। जिस समय विवाद जोरों पर था, उस समय देशभर के अनेक तथाकथित बुध्दिजीवियों ने हुबली-धारवाड नगर पालिका की मलकियत वाले इस किटूर रानी चेन्नमा मैदान को ईदगाह मैदान साबित करने के लिए देशभर के अखबारों में न जाने कितने लेख लिखे। इन लेखों का उद्देश्य राष्ट्रीय ध्वज फहराने वालों को सांप्रदायिक साबित करना था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उन सभी तथाकथित बुध्दिजीवियों को देश से माफी मांगनी चाहिए और हो सके तो उसी तरह हुबली में जाकर खुद राष्ट्रीय ध्वज फहराना चाहिए, जिस तरह पचास साल तक बंगाल में वामपंथियों का समर्थन करने के बाद अब उन्हें एहसास हो रहा है कि उन्होंने गलती की थी।</p>
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		<title>बांग्लादेश से मधुर संबंधों का वक्त</title>
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		<pubDate>Mon, 11 Jan 2010 08:05:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[पाक और भारत की अदालतों और राजनीतिज्ञों की मानसिकता एक सी। भारत और आस्टे्रलिया में अपराध एक से। कोपेनहेगन की गलती का एहसास धीरे-धीरे।
मेरे नाम और उल्फा उग्रवादी अनूप चेतिया के नाम में बहुत फर्क है। फिर भी 1991 में जब मैंने गुवाहटी जाने के लिए रेल टिकट आरक्षित करवाया, तो आईबी के लोग अगले [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>पाक और भारत की अदालतों और राजनीतिज्ञों की मानसिकता एक सी। भारत और आस्टे्रलिया में अपराध एक से। कोपेनहेगन की गलती का एहसास धीरे-धीरे।</strong></p></blockquote>
<p style="text-align: justify;">मेरे नाम और उल्फा उग्रवादी अनूप चेतिया के नाम में बहुत फर्क है। फिर भी 1991 में जब मैंने गुवाहटी जाने के लिए रेल टिकट आरक्षित करवाया, तो आईबी के लोग अगले दिन मेरे घर पहुंच गए थे। उन्हें लगा कि अनूप चेतिया ही नाम बदलकर टे्रन पर सफर कर रहा होगा। अब जबकि बांग्लादेश की नई प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत आई हैं तो उनकी सरकार के एक मंत्री अशरफ उल रहमान ने खुलासा किया है कि कट्टरपंथी खालिदा जिया की सरकार के समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ जब ढाका आए थे, तो उन्होंने शैरटन होटल में अनूप चेतिया से मुलाकात की थी। <span id="more-1481"></span>अपने निर्माण के पहले चार साल छोड़कर बांग्लादेश हमारे लिए सिरदर्द बना रहा है। पिछले 39 साल में तीस साल तक कट्टरपंथियों का शासन रहा, इस दौरान बांग्लादेश पूर्वोत्तर के विदा्रेहियों का शरणस्थल बना रहा। शेख हसीना की आवामी लीग एक साल पहले ही दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में लौटी है।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><strong>शेख हसीना का भारत आना</strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">बांग्लादेश के अस्तित्व में आने के चार साल बाद ही 1975 में मुजीब्बर रहमान की हत्या कर दी गई थी। सैन्य विद्रोह के बाद शेख हसीना ने करीब पांच साल तक नई दिल्ली में निर्वासित जीवन बताया था। उनकी पार्टी आवामी लीग 1996 से 2001 तक दुबारा सत्ता में आई लेकिन कम बहुमत के कारण भारी दबावों में थी। इस बार दो तिहाई बहुमत से लौटी शेख हसीना ने भारत के साथ दोस्ती के पुराने संबंध बहाल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। एक साल के छोटे कार्यकाल में ही उन्होेंने उल्फा उग्रवादियों को पकड़कर भारत के हवाले करना शुरू कर दिया है। अपनी भारत यात्रा से महीनाभर पहले उल्फा प्रमुख अरविंद राजखोवा की भारत के सुपुर्द किया जाना भारत के पूर्वोत्तर में चल रहे आतंकवाद को खत्म करने की दिशा में बांग्लादेश के नए निजाम का सबूत है। वह पिछले एक साल में न सिर्फ खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के कट्टरपंथी विरोध का सामना कर रही हैं, अलबत्ता पाकिस्तान और सऊदी अरब भी दबाव बनाए हुए हैं। इसके बावजूद शेख हसीना ने बांग्लादेश को मुस्लिम शरीमत पर आधारित कट्टरपंथी देश की छवि से निकालना शुरू कर दिया है। शेख हसीना के भारत दौरे के दौरान आतंकवाद से संबधित तीन समझौतों के अलावा तीस्ता नदी जल विवाद और कृषि सहयोग के समझौते भी होंगे। अफगानिस्तान के बाद बांग्लादेश में भारत के अनुकूल सरकारों का आना शुभ लक्ष्य है।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><strong>भारत-पाक की अदालतें एक सी</strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">यह हमारे लिए खुशी की बात है कि बीते साल कोई बड़ी आतंकवादी वारदात नहीं हुई। जम्मू कश्मीर भी अपेक्षाकृत पिछले सालों के मुकाबले बेहतर रहा। जबकि पाकिस्तान में आतंकवादी वारदातें भारत से यादा हुई हैं। यह हमारे लिए खुशी की बात नहीं है, लेकिन जब-जब पाकिस्तान में फिदायिन हमला होता है हमारे मुंह से बरबस ही निकल पड़ता है- &#8216;जो जैसा करता है, वैसा भरता है।&#8217; शुरू-शुरू में पाकिस्तान ने ब्लूचिस्तान में हो रही आतंकवादी वारदातों का ठीकरा हमारे सिर फोड़ने की कोशिश की। पाकिस्तान को ऐसा कहने का मौका खुद हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दिया था। जिन्होंने शर्म-अल-शेख के साझा बयान में बेवजह ब्लूचिस्तान को जोड़ने की इजाजत दे दी थी। शर्म-अल-शेख का बयान जरूर अमेरिकी दबाव का नतीजा था भले ही भारत सरकार इससे ना-नुकर करती रहे। उसी बयान में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कह दिया था कि आतंकवादी वारदातें भारत-पाक शांति वार्ता में बाधा नहीं बननी चाहिए। भारतीय संसद में भारी दबाव के बाद अब भारत सरकार का स्पष्ट नजरिया है कि पाकिस्तान जब तक मुंबई के हमलावरों पर ठोस कार्रवाई का सबूत नहीं देता। तब तक समग्र वार्ता नहीं होगी। पाकिस्तान की अदालतें और सरकार गिरफ्तार किए गए आतंकवादियों पर ठोस कार्रवाई करती दिखाई नहीं दे रही है, इसलिए समग्र बातचीत ठंडे बस्ते में पड़ी है। पाकिस्तान की अदालतें भारत की अदालतों और कानूनी प्रक्रिया से अलग नहीं है। पाकिस्तान में भी सरकार और राजनीतिक हुकमरानोें का नजरिया भारतीय हुकमरानों से अलग नहीं है। भारत की मौजूदा सरकार को लगता है कि संसद पर हमले की साजिश रचने वाले अफजल गुरु की फांसी उसके वोट बैंक को नुकसान कर सकती है, तो फैसला पांच साल से लटका कर रखा हुआ है। इसी तरह पाकिस्तान के हुकमरानों को लगता है कि मुंबई के हमलावरों पर कड़ी और तेजी से कराई गई कानूनी कार्रवाई उसे सत्ता से बेहदखल कर सकती है। कुल मिलाकर भारत और पाकिस्तान दोनों ही आतंकवाद के खिलाफ उतने ईमानदार नहीं हैं, जितना होना चाहिए। पाकिस्तान में अदालत हाफिज सईद को रिहा कर देती है, तो यह काम हमारी अदालतें भी कर रही हैं। कसूर अदालतों का नहीं। राजनीतिज्ञों के दबाव में जांच एजेंसियां पुख्ता सबूत अदालतों में पेश नहीं करती। पिछले हफ्ते ही देहरादून की भारतीय सैन्य अकादमी पर हमले की साजिश रचने वाले चार आतंकी बरी हो गए। पिछले हफ्ते ही यह खुलासा हुआ कि आतंकवादी गतिविधियों में सजा पूरी कर चुके तीन आतंकवादी लापरवाह पुलिस अधिकारी के कारण फरार हो गए।</p>
<p><strong><span style="text-decoration: underline;">कोपेनहेगन की गलती</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत की विदेशनीति में अमेरिका का दबाव और असर लगातार बढ़ रहा है। सिर्फ शर्म-अल-शेख ही इसका उदाहरण नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अचानक ग्लोबल वार्मिंग सम्मेलन में जाना भी इसी ओर इशारा करता है। प्रधानमंत्री का वहां जाने का कोई कार्यक्रम नहीं था। कोपेनहेगन में हमने अचानक विकासशील छोटे गरीब देशों का साथ छोड़कर चीन-ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के साथ मिलकर अमेरिका के हितों की रक्षा करने वाले समझौते पर सहमति जता दी। जब सारे विकासशील और गरीब देश हमारे साथ थे, तो भारत को अचानक अपना स्टैंड बदलने की क्या जरूरत पड़ गई थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पर्यावरण रायमंत्री जयराम रमेश ने बार-बार पूछे जाने पर भी संसद में यह खुलासा नहीं किया कि भारत-चीन-ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की बैठक में अचानक आकर बाराक ओबामा ने क्या कहा था। आखिरकार वही हो गया, जो अमेरिका चाहता था। अमेरिका चाहता था कि विकसित देशों को क्योटो प्रोटोकाल से निजात मिल जाए। शुरू में जयराम रमेश हमें यह बताते रहे कि क्योटो प्रोटोकाल से कोई समझौता नहीं किया है। विकसित देशों पर क्योटो प्रोटोकाल लागू रहेगा। क्योटो प्रोटोकाल विकसित देशों पर यह बंदिश लगाता था कि वे 1990 के अपने लैवल से उत्सर्जन में पांच फीसदी की कटौती करेंगे। क्योटो प्रोटोकाल के बाद हुई बातचीत में विकसित देश इस बात पर भी राजी हो गए थे कि वे 1990 के स्तर से 25 से 40 फीसदी कटौती करेंगे ताकि तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस से यादा बढ़ोत्तरी न हो। विकसित देश अपने इस वायदे से मुकरने का रास्ता खोल रहे थे और भारत ने अमेरिका की मदद की। कोपेनहेगन में विकासशील और छोटे गरीब देशों को धोखा देकर हमारे पर्यावरण मंत्री उस दस्तावेज पर दस्तखत कर आए हैं जिसमें विकसित देश अब इस 31 जनवरी को 2020 तक उत्सर्जन कटौती का अपना नया कार्यक्रम घोषित करेंगे। रायसभा में जब विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने आरोप लगाया था कि भारत ने विकसित देशों को क्योटो प्रोटोकाल से निजात पाने में मदद की है तो जयराम रमेश ने खंडन किया था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तब चुप्पी साधकर बैठे थे जबकि बाद में उन्होंने मान लिया है कि कोपेनहेगन में क्योटो प्रोटोकाल को धक्का लगा है।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><strong>फर्क नहीं आस्टे्रलिया-भारत में</strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">भारत सरकार के तीखे रुख के बावजूद आस्टे्रलिया में भारतीय मूल के छात्रों पर हमले रुक नहीं रहे हैं। अब ये हमले सिर्फ छात्रोें पर नहीं हो रहे, अलबत्ता वहां रह रहे अन्य भारतीय नागरिकों पर भी हो रहे हैं। नितिन गर्ग की हत्या की स्याही अभी सूखी नहीं थी कि जसप्रीत सिंह को जिंदा जलाने की खबर आ गई। आस्टे्रलिया में भारतीय मूल के लोगों पर हो रहे हिंसक हमलों का असर प्रवासी भारतीय सम्मेलन पर भी दिखाई दिया। इस बार फर्क यह है कि दोनों देशों की ओर से तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है जिसका असर दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों पर भी पड़ेगा। आस्टे्रलिया की उपप्रधानमंत्री ने भारत पर भड़काने वाले बयान देने का आरोप लगाते हुए कहा कि दुनिया के किस बड़े शहर में आपराधिक घटनाएं नहीं हो रहीं। क्या आए दिन मुंबई में ऐसी घटनाएं नहीं होती। हम इस बयान को भले ही खारिज करें, लेकिन इस पर मनन करना जरूरी है। क्या हमारे जयपुर, पुष्कर, मुंबई शहरों और गोवा में विदेशी युवतियों से बलात्कार की घटनाएं कम हो रही हैं। अपने विदेशमंत्री एसएम कृष्णा भले ही शुरू में बड़े लुंज-पुंज दिखाई देते थे लेकिन उनका यह बयान गौर करने लायक है कि मध्यम वर्गीय भारतीयों को बाहर जाकर पढ़ने में इतनी दिलचस्पी क्यों है। यह बात सही है कि हमारे मध्यवर्गीय परिवारों में अपने बच्चों को विदेशों में पढ़ाने का मोह है, जबकि भारत में कहीं बेहतर पढ़ाई उपलब्ध है। आस्टे्रलिया जैसे देश हमारे छात्रों को बाजार के ग्राहक की तरह देखते हैं और हम वर्क वीजा के लालच में खिंचे चले जाते हैं। विदेशी विश्वविद्यालय भी हमारे दरवाजे पर बाजार ढूंढने ही आ रहे हैं, जबकि दुनिया के हर कोने में भारतीय वैज्ञानिक और आईटी इंजीनियर ही अपना लोहा मनवा रहे हैं।</p>
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		<title>लोकतंत्र खड़ा चौराहे पर</title>
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		<pubDate>Mon, 04 Jan 2010 08:00:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[
एक आईपीएस अफसर पूरे तंत्र को अपनी ऊंगलियों पर नचा रहा था। स्कूल, अस्पताल, पुलिस थाना, सीबीआई, मुख्यमंत्री, न्यायपालिका सबको चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है एक आईपीएस अफसर ने।

हमारा प्रशासनिक राजनीतिक ढांचा चरमरा रहा है। प्रशासनिक सुधार आयोगों की रिपोटें असली मर्ज को पहचानने की कोशिश भी नहीं करतीं। राजनीतिक नेता और नौकरशाही [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>एक आईपीएस अफसर पूरे तंत्र को अपनी ऊंगलियों पर नचा रहा था। स्कूल, अस्पताल, पुलिस थाना, सीबीआई, मुख्यमंत्री, न्यायपालिका सबको चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है एक आईपीएस अफसर ने।</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">हमारा प्रशासनिक राजनीतिक ढांचा चरमरा रहा है। प्रशासनिक सुधार आयोगों की रिपोटें असली मर्ज को पहचानने की कोशिश भी नहीं करतीं। राजनीतिक नेता और नौकरशाही का मकड़जाल देश के लोकतंत्र को घुन की तरह खा रहा है। नौकरशाह देश को चूसने वाले गिध्द बन गए हैं और राजनीतिक नेता उन पर नकेल कसने की बजाए छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए उनके हाथों का खिलौना बन गए हैं। कई मुख्यमंत्रियों को निजी बातचीत में यह कहते सुना है कि ब्यूरोक्रेसी से काम लेना आसान नहीं। <span id="more-1457"></span>ब्यूरोक्रेसी (जिनमें खासकर आईएएस-आईपीएस अधिकारी) तब तक किसी राजनेता के पांव नहीं जमने देती जब तक राजनेता उन्हें संरक्षण का वायदा नहीं करते। जब वे आपस में घुल-मिल जाते हैं तो एक-दूसरे के काले कारनामों में मददगार हो जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">रुचिका गिरहोत्रा का मामला देश में पहला नहीं है। इससे मिलते-जुलते सैकड़ों मामले मिल जाएंगे। जहां ब्यूरोक्रेसी और राजनेताओं ने समाज पर अत्याचार किए और कोई कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सका। दूर क्यों जाते हो, देश की राजधानी दिल्ली के पुलिस थानों में बलात्कार की घटनाएं होती रहती हैं। मुंबई के पुलिस बूथ में बलात्कार की घटना हुई थी। चौदह साल की रुचिका के साथ जैसी छेड़छाड़ पुलिस इंस्पैक्टर जनरल एसपीएस राठौर ने की, ऐसी घटनाएं हर जिले-तहसील में आए दिन होती हैं। उन्नीस साल पहले 1990 में चंडीगढ़ में स्वतंत्रता दिवस से तीन दिन पहले राठौर ने रुचिका को अपने दफ्तर में बुलाया। वह इंस्पैक्टर जनरल के साथ-साथ हरियाणा लान टैनिस एसोसिएशन का अध्यक्ष भी था। रुचिका लान टैनिस की खिलाड़ी थी। शासन क्यों इजाजत देता है पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को खेल संघों में सक्रिय होने और दखल देने की। खेल संघों के पदाधिकारी बनने की होड़ क्यों मची है प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं में। मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और आईएसएस, आईपीएस, आईएफएस अधिकारियों पर खेल संघों और क्लबों के पदाधिकारी बनने पर रोक लगनी चाहिए। ऐसे प्रभावशाली लोगों के कारण खेलों और सामाजिक क्लबों का वातावरण दूषित हो रहा है, इनकी बेजा दिलचस्पी से खेल संघों और क्लबों में देह शोषण को बढ़ावा मिल रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">क्या हमारा लोकतंत्र सफल हो रहा है। जब अपराधी और अपराधियों को संरक्षण देने वाले चुनाव जीत रहे हों, तो लोकतंत्र को सफल कैसे कहा जा सकता है। नारायण दत्त तिवारी के सैक्स स्कैंडलों के किस्से पिछले 30 साल से हर किसी की जुबान पर थे, लेकिन इन तीस सालों में उन्होंने क्या हासिल नहीं किया। वह तीन बार मुख्यमंत्री, दो बार केंद्र में मंत्री और राज्यपाल बने। जब तक उनका स्टिंग आपरेशन नहीं हुआ, कोई उनका बाल भी बांका नहीं कर सका। उत्तर प्रदेश के मंत्री राजा भैय्या के कारनामों पर कोई कानून उनका क्या बिगाड़ सका। उन्होंने अपनी प्रेमिका मधुमिता शुक्ला की हत्या करवा दी और बाद में एक-एक करके गवाहों को निपटा दिया। यह सब करने के बाद भी राज्य सरकार में मंत्री बन गया। उत्तर प्रदेश के ही होनहार बैडमिनटन खिलाड़ी सैयद मोदी की हत्या दिन दहाड़े हुई थी। सैयद मोदी की हत्या के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने अपनी पत्नी से तलाक लेकर सैयद मोदी की पत्नी अनिता से शादी कर ली। सैयद मोदी की हत्या से पहले अनिता का संजय सिंह से प्रेम शुरू हो चुका था। अनिता मोदी बाद में दो बार एमएलए और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री भी बनीं, संजय सिंह को भी कोई कानून चुनाव लड़ने और मंत्री बनने से कहां रोक सका। शिबू सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा के उन चार सांसदों में से एक थे, जिन्हें नरसिंह राव की सरकार बचाने के लिए मोटी रकम मिली थी। रिश्वत की यह राशि अदालत में साबित हो गई थी लेकिन उन्हें बार-बार सांसद बनने, केंद्र में मंत्री बनने और अब तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने से कौन रोक सका। सुखराम के घर से उनके बाथरूम और बिस्तरे के गद्दों में काले धन की गड्डियां मिली थीं। यह काला धन उन्होंने नरसिंह राव सरकार में मंत्री होते हुए देशभर में टेलीफोन का जाल बिछाते कमाया था। कोई कानून उन्हें इसके बाद चुनाव लड़ने और मंत्री बनने से कब रोक सका। ओमप्रकाश चौटाला और मायावती के पास अकूत संपत्ति का सारा कच्चा चिट्ठा सीबीआई के पास है, लेकिन अदालतों से उन्हें बार-बार राहत मिल रही है। हम लोकतंत्र की सफलता का ढिंढोरा पीटना चाहें तो चाहे जितना पीटें। हमारी प्रशासन और राजनीति के शुध्दिकरण में जरा दिलचस्पी नहीं हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं का गठजोड़ लोकतंत्र को मजबूत होने देना नहीं चाहता। अगर लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती तो ऐसे केसे हो सकता था कि एक आईपीएस अफसर पूरे पुलिस प्रशासन को अपनी ऊंगलियों पर नचाता। पुलिस ने छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज नहीं की थी। रुचिका के पिता ने जब गृहमंत्री संपत सिंह को शिकायत की तो उन्होंने डीजीपी आरआर सिंह को तीन दिन में जांचकर रिपोर्ट सौंपने को कहा था। आरआर सिंह ने जांच के बाद इंस्पैक्टर जनरल राठौर के खिलाफ केस दर्ज करने की सिफारिश की थी लेकिन संपत सिंह ने केस दर्ज नहीं करवाया। तत्कालीन मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला कैसे कह सकते हैं कि वह बेदाग हैं। वही मुख्यमंत्री थे उस समय। यह तो नहीं कहा जा सकता कि गृहमंत्री संपत सिंह ने केस दबा दिया होगा, वह केस दबाना चाहते तो तीन दिन में जांच रिपोर्ट ही क्यों मांगते। पिचहत्तर साल के रिटायर डीआईजी आरआर सिंह अभी भी समझ नहीं पा रहे हैं कि तत्कालीन सरकार में कौन राठौर की मदद कर रहा था। जिस चौटाला सरकार ने राठौर को राष्ट्रपति पुलिस मैडल की सिफारिश की, वह अपने हाथ कैसे धो सकते हैं। चौटाला के राज में राठौर को राष्ट्रपति पुलिस मैडल की सिफारिश करने वाला गृहसचिव बीरबल दास दहिया अब चौटाला की पार्टी में नेता हैं। सारा गठजोड़ शीशे की तरह साफ है।</p>
<p style="text-align: justify;">रुचिका का मामला जोर पकड़ा तो आईपीएस अधिकारी की पूरे पुलिस महकमे ने मदद की। उनके इशारे पर रुचिका के भाई आशू पर चोरी का झूठा मुकदमा बनाया गया। नंगा करके उसके घर के पास घुमाया गया। राठौर की मौजूदगी में पुलिस उसकी पिटाई करती थी। राठौर ने रुचिका को स्कूल से निकलवाकर उसकी पढ़ाई बंद करा दी। रुचिका ने आत्महत्या कर ली तो भी पुलिस राठौर की मदद करती रही। पोस्टमार्टम में आत्महत्या का तरीका बदल दिया गया, यहां तक कि नाम बदल दिया गया, पिता का नाम भी बदल दिया गया। डाक्टर और अस्पताल भी राठौर के प्रभाव में उनके इशारों पर काम कर रहे थे। सीबीआई कोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज करने की सिफारिश की तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने राठौर को राहत दे दी। जिस सीबीआई अफसर आरएम सिंह ने आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला जोडने की सिफारिश लिखी, उसे सीबीआई के डायरेक्टर और सीबीआई के कानूनी सलाहकार ने हटवा दिया। बताएं प्रशासन और न्यायतंत्र का कोई ऐसा कमरा बचा है, जो बेदाग हो। एक आईपीएस अफसर पूरे तंत्र को अपनी ऊंगलियों पर नचा रहा था। स्कूल, अस्पताल, पुलिस थाना, सीबीआई, मुख्यमंत्री, न्यायपालिका सबको चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है एक आईपीएस अफसर ने।</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षा का मंदिर स्कूल, न्याय का मंदिर अदालत, इंसाफ दिलाने की जिम्मेदार सीबीआई और इन सब पर निगाह रखने वाली चुनी हुई सरकार- सब चरमरा कर गिर गए हैं। रुचिका और उसके परिवार पर अत्याचार करने वाले पुलिस कर्मचारियों की लंबी सूची है। क्या राठौर के साथ-साथ उन सब पर भी कानूनी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। क्या उन सब पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए जिनकी आंखों के सामने यह घोर अपराध हो रहा था और वे आंख मूंदे हुए थे। क्या केंद्र की तत्कालीन चंद्रशेखर से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक की सरकारों के गृहमंत्री कटघरे में खड़े नहीं होने चाहिए, जिनके तहत देशभर के आईपीएस अफसर काम करते हैं। क्या चौटाला, बंशीलाल, भजनलाल कटघरे में नहीं खड़े होने चाहिए, जो इतने बड़े अपराध पर आंखें मूंदे हुए थे। किसी एक मुख्यमंत्री ने राठौर को निलंबित करने की जहमत नहीं उठाई। इसीलिए राठौर छह महीने मात्र  की सजा सुनकर मुस्कराता हुआ कोर्ट से बाहर निकला, क्योंकि उसे अब भी उम्मीद है कि जैसे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने पहले उसकी मदद की, इस बार भी करेगी। रुचिका से ज्यादा अलग नहीं है राजस्थान की आदिवासी महिला का मामला। जिसका राजस्थान के डीआईजी मधुकर टंडन ने तेरह साल पहले बलात्कार किया था। फर्क सिर्फ इतना है कि वह तब से भगौड़ा है, लेकिन पुलिस अब भी उसकी मददगार बनी हुई है। वह कानून की नजर से लगातार बचा रही है अपने फरार डीआईजी को। डीआईजी बार बार उस महिला और उसके पति को उठाकर पुलिस थाने ले जाता है और समझौता करने का दबाव बनाता है। पुलिस कहती है, वह लापता है और मुख्यमंत्री उस पीड़ित महिला को मिलने से इनकार कर देते हैं क्योंकि वह एक ऐसे सांसद के साथ उन्हें मिलने पहुंचती है जो उनकी पार्टी में नहीं है। यह है हमारा सफल लोकतंत्र।</p>
<p style="text-align: justify;">पुलिस तंत्र, प्रशासनिक तंत्र और लोकशाही में आमूलचूल परिवर्तन ही देश को लोकतंत्र की सही पटरी पर ला सकता है। पुलिस को हर शिकायत की एफआईआर दर्ज करने की हिदायत ही काफी नहीं। पुलिस से टार्चर करने के सारे अधिकार वापस लेने होंगे। पुलिस रिमांड का कानूनी प्रावधान खत्म करना होगा। पुलिस न्यायिक हिरासत में ही पूछताछ करे। प्रशासन में बैठे भ्रष्ट और बेईमान अफसरों को फैसले करने वाले पदों से हटाना होगा। चुनाव लड़ने के नियम ज्यादा कड़े करने होंगे। जिन नेताओं के खिलाफ तीन चार्जशीट पर अदालत संज्ञान ले चुकी हो, उन्हें चुनाव लड़ने या कोई भी राजनीतिक पद ग्रहण करने से वंचित करना होगा। ये सब कदम भी काफी नहीं हैं, लोकतंत्र को पटरी पर लाकर देश में सुशासन की स्थापना करने के लिए। जैसी जागृति जेसिका लाल, नीतिश कटारा, प्रियदर्शनी मट्टू, के अदालती फैसलों के बाद देश की जनता ने दिखाई है, ऐसी जागृति हमेशा कायम रहे, तभी कानून के रक्षकों को भक्षक बनने से रोका जा सकेगा।</p>
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		<title>अपराधियों का किला भेद रहा मीडिया</title>
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		<pubDate>Mon, 28 Dec 2009 07:50:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[साल 2009 बीत रहा है। यह साल मीडिया के लिए भी कई खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजरा है। साल की पहली तिमाही में जरनैल सिंह ने कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेंस में गृहमंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंककर मीडिया के लिए असमंजस की स्थिति पैदा कर दी थी। तो बाद में जरनैल सिंह एक सिख पत्रकार के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">साल 2009 बीत रहा है। यह साल मीडिया के लिए भी कई खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजरा है। साल की पहली तिमाही में जरनैल सिंह ने कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेंस में गृहमंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंककर मीडिया के लिए असमंजस की स्थिति पैदा कर दी थी। तो बाद में जरनैल सिंह एक सिख पत्रकार के तौर पर नाइंसाफी के खिलाफ लड़ने वाले जुझारू पत्रकार के रूप में मशहूर हुए। एक जमाना था जब मीडियाकर्मियों और मीडिया को नाइंसाफी के खिलाफ लड़ने वाला मिशनरी माना जाता था। स्वतंत्रा संग्राम के आंदोलन में मीडियाकर्मियों की भूमिका इसलिए ज्यादा अहम थी। बाजारीकरण ने पिछले एक दशक में मीडिया की जुझारू छवि को धूल धूसरित कर दिया था। <span id="more-1466"></span>पिछले दो दशक में मीडिया के स्वरूप में भारी बदलाव आए। वह प्रभावशाली लोगों के गठबंधन की ओर से की जा रही नाइंसाफियों को आंख मूंदकर देखने लगा। मीडिया की लापरवाही के कारण ब्यूरोक्रेसी और राजनीतिज्ञों के गठबंधन में कई जगह पर ज्यूडिशरी के शामिल होने की घटनाएं भी सामने आई। जबकि बीत रहा 2009 साल मीडिया के लिए अपनी साख बचाने की जद्दोजहद करने और मिशनरी आग को फिर से धधकाने के लिए तैयार होने के रूप में देखा जाएगा।</p>
<p style="text-align: justify;">उत्तर प्रदेश और बिहार में कुछ लोगों ने मिलकर मृतक संघ बनाया है। लेटर हैड पर मृतक संघ पढ़कर गुदगुदाने वाला आश्चर्य होता है। ये वो लोग हैं, जो नौकरशाही और न्यायपालिका के गठबंधन का शिकार हुए हैं। अदालतों में इन्हें मृतक साबित करके इनके रिश्तेदारों या प्रभावशाली लोगों ने इनकी जमीन-जायदाद हड़प ली है। अदालती फैसलों में ये सभी मृतक घोषित हो चुके हैं, जबकि वास्तव में वे जिंदा हैं। ऐसे फैसले करवाने में प्रशासन, प्रभावशाली लोगों और न्यायपालिका का गठबंधन रहता है। अदालतों की तरफ से मृतक घोषित हो चुके लोगों की तादाद तीन सौ से ज्यादा है। इन सभी ने इंसाफ के लिए संगठन बना लिया है और पिछले कुछ सालों से हर दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं। हमारी न्यायपालिका कितनी चरमरा गई है, मृतक संघ इसका पुख्ता सबूत है।</p>
<p style="text-align: justify;">पिछले कुछ सालों में मीडिया ने प्रभावशाली लोगों की ओर से इंसाफ को प्रभावित करने के कई मामले बेनकाब किए हैं। जेसिका लाल हत्याकांड, प्रियदर्शिनी मट्टू, शिवानी भटनागर, नितीश कटारा हत्याकांड में प्रभावशाली लोगों को बेनकाब करके अदालतों को कड़ी सजा के लिए मजबूर करने और बीएमडब्ल्यू केस में वकील के बिक जाने का मामला मीडिया ने उजागर किया है। इन मामलों से मीडिया के उस पुराने युग की याद ताजा हुई है, जब मीडिया एक प्रोफेशन नहीं, सिर्फ मिशन हुआ करता था जहां मीडिया में काम करने वाले लोगों और समाज के लिए कुछ उत्साहवर्धक उदाहरण हैं। वहां हाल ही के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मीडिया की साख को बट्टा भी लगा है। कुछ अखबारों ने (जिनमें राष्ट्रीय स्तर का अखबार होने का दावा करने वाले अखबार भी शामिल थे) उम्मीदवारों पर दबाव बनाकर उनके समर्थन में लिखने के पैसे वसूल किए। &#8216;पेड न्यूज&#8217; से अखबारों को काले धन की कमाई हुई, जिनका उम्मीदवारों ने चुनाव आयोग को दी गई खर्चे की सूची में उल्लेख नहीं किया। देश के लिए यह सुखद आश्चर्य है कि शुरूआती चुप्पी के बाद मीडिया और मीडिया संगठनों ने पत्रकारिता में प्रवेश कर रही इस आत्मघाती कुरीति के खिलाफ खुद ही मुहिम छेड़ दी है। भारत की मीडिया में शुरू हुए इस भ्रष्टाचार के खिलाफ पहली आवाज अमेरिका के एक अखबार में उठी। जिसे पढ़कर हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने सबसे पहले कलम उठाई। उन्होंने लिखा- &#8216;ऐसे अखबारों के रजिस्ट्रेशन रद्द कर देने चाहिए और उन्हें सिर्फ प्रिटिंग प्रेस का लाइसेंस देना चाहिए।&#8217; हिंदी मीडिया के लिए यह गर्व की बात है कि &#8216;पेड न्यूज&#8217; के खिलाफ हिंदी के एक पत्रकार की ओर से शुरू की गई मुहिम अब व्यापक रूप ले चुकी है। विभिन्न मीडिया संगठनों ने इसके खिलाफ प्रस्ताव पास किए हैं और संसद के अगले सत्र में इस पर विशेष चर्चा होने के आसार हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">देश के लिए यह गर्व की बात है कि साल के आखिर में मीडिया ने सालों की चुप्पी तोड़ते हुए ब्यूरोक्रेसी, ज्यूडिशरी और एडमिनिस्ट्रेशन के गठबंधन की नाइंसाफी पर भी प्रहार शुरू कर दिए हैं। पहली चुप्पी 1990 में एक पुलिस अफसर की मनमानी का शिकार हुई चौदह साल की किशोरी रुचिका के हक में आवाज उठाने से टूटी। रुचिका गिरहोत्रा प्रभावशाली लोगों के देहशोषण का पहला उदाहरण नहीं है। करीब पांच साल पहले एक न्यूज चैनल ने कई सांसदों-विधायकों की रंगरलियों का स्टिंग आपरेशन दिखाया था। ऐसा ही एक स्टिंग आपरेशन फिल्मी हस्तियों का भी हुआ था। स्टिंग आपरेशन को कानून का डंडा दिखाकर रोक दिया गया। पच्चीस साल पहले भी इसी तरह की एक घटना दिल्ली में हुई थी। एक प्रभावशाली व्यापारी ने दिल्ली के एक सैन्य फार्महाऊस में रात्रिभोज रखा था, आधी रात के बाद तक चले इस भोज में शराब और शबाब का नंगा नाच हुआ। जिसमें सभी राजनीतिक दलों के नेता और छोटी अदालतों के कई जज भी शामिल थे। एक अखबार ने जब इसका विस्तृत ब्योरा छापा, तो सुप्रीम कोर्ट ने सुओ मोटो नोटिस लेते हुए अखबार और पत्रकार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">हरियाणा के इंस्पेक्टर जनरल शंभू प्रताप सिंह राठौर ने अपनी बेटी से भी एक साल छोटी रुचिका गिरहोत्रा के साथ दुरव्यवहार किया, लेकिन जब उसने अपने घर वालों को यह बात बता दी और बात कानून के पास पहुंचने को हुई, तो रुचिका और उसके परिवार का मुंह बंद करने के लिए हर तरीका इस्तेमाल किया गया। शंभू प्रताप सिंह की डयूटी भाखड़ा नंगल बांध पर लगी थी, अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके उन्होंने उन सब लोगों पर बिजली चोरी के केस बनवा दिए, जो रुचिका और उसके परिवार की मदद कर रहे थे। रुचिका के किशोरावस्था भाई को थ्री व्हीलर चोरी में गिरफ्तार किया गया। सात और कारों की चोरी के मामले भी एक-एक कर दायर कर दिए गए। राठौर की मौजूदगी में पुलिस थाने में उसकी पिटाई की गई। उस पर दबाव डाला गया कि वह अपनी बहन से शिकायत वापस लेने के लिए कहे। मार-मार कर अधमरी हालत में रुचिका के भाई को हथकड़ी लगाकर उसके घर लाया गया ताकि उसकी बहन यह सब देख सके। अपने भाई को इस तरह देखने के बाद रुचिका ने आत्महत्या कर ली, क्योंकि उसका परिवार उसकी वजह से सजा भुगत रहा था। सारी हरियाणा पुलिस, प्रशासन और सत्ताधारी राजनीतिज्ञ पुलिस इंस्पेक्टर की मदद कर रहे थे। वह इतना प्रभावशाली था कि निचली अदालतों से संभावित कार्रवाई को रोकने के लिए हाईकोर्ट से स्थागनादेश हासिल कर लेता था। एक नहीं, तीन बार हाईकोर्ट से पुलिस इंस्पेक्टर जनरल को राहत मिली। केस सीबीआई के सुपुर्द हुआ, तो सीबीआई ने आत्महत्या के लिए उकसाने का  मामला दर्ज करने से इंकार कर दिया। अब जब उन्नीस साल बाद राठौर को छह महीने की कैद हुई है तो मीडिया के दबाव में पुलिस-प्रशासन और राजनीतिज्ञों का नापाक गठजोड़ चौराहे पर खड़ा है।</p>
<p style="text-align: justify;">साल के आखिरी हफ्ते की आखिरी घटना में एक राजनीतिज्ञ को कुर्सी छोड़ने के लिए मजबूर करने का श्रेय भी मीडिया को जाएगा। तीन दशक से राजनीतिक हलकों में हर कोई एनडी तिवारी की फितरत से वाकिफ था। हर साल तिवारी से जुड़ी कोई नई घटना सामने आती थी। केंद्रीय मंत्री प्रोफेसर शेर सिंह की बेटी उज्जवला अपने बेटे को पिता का नाम दिलाने के लिए पिछले उनतीस साल से नारायण दत्त तिवारी के खिलाफ संघर्ष कर रही थी। इन उनतीस सालों में तिवारी दो बार मुख्यमंत्री, तीन बार केंद्रीय मंत्री और राज्यपाल बने। उनकी अपनी पार्टी के अलावा सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को इस किस्से की सालों से जानकारी थी। उज्जवला का उनतीस साल का बेटा रोहित शेखर पिछले साल अदालत से इंसाफ लेने गया, तो उस जज को बदलवा दिया गया, जो कड़ा रुख अपना रहा था। अदालत में केस दायर होने के बावजूद दिल्ली में बैठे शासकों ने राज्यपाल की कुर्सी पर बने रहने में उनकी मदद की। अदालत ने रोहित शेखर को इस आधार पर इंसाफ देने से इंकार कर दिया कि उसे अठारह साल का होने पर ही अदालत आना चाहिए था, अब बहुत देर हो गई। अदालतें कितनी देर से इंसाफ देती हैं, इसका ताजा उदाहरण तो रुचिका गिरहोत्रा का मामला ही सामने है।</p>
<p style="text-align: justify;">आंध्र प्रदेश के एक अखबार और न्यूज चैनल ने राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी के सेक्स स्कैंडल का स्टिंग ऑपरेशन करके पिछले तीन दशक से उनके बारे में चली आ रही अफवाहों को पुख्ता सबूत के तौर पर पेश कर दिया। आंध्रज्योति नाम का यह अखबार कुछ साल पहले बंद हो गया था। इसे पिछले साल ही एक पत्रकार ने खरीदकर दुबारा शुरू किया। दिसंबर के दूसरे पखवाड़े में ही अखबार ने अपना न्यूज चैनल एबीएन शुरू किया। सेक्स स्कैंडल की सीडी दिखाने पर अदालत ने फौरन रोक लगा दी, लेकिन जिस तरह मीडिया के दबाव से रुचिका मामले में हरियाणा और केंद्र सरकार हरकत में आई, उसी तरह केंद्र सरकार को एनडी तिवारी के खिलाफ हरकत में आना पड़ा। परिणामस्वरूप अदालती रोक के बावूजद चौबीस घंटे के अंदर तिवारी को इस्तीफा देना पड़ा।</p>
<p style="text-align: justify;">नारायण दत्त तिवारी ने जब अर्जुन सिंह के साथ मिलकर तिवारी कांग्रेस बनाई थी, तो एक रात वह अचानक गायब हो गए थे। अर्जुन सिंह ने उनके अपहरण की एफआईआर दर्ज करा दी थी, लेकिन वह अगले दिन सुबह दिल्ली से सत्तर किलोमीटर दूर गजरौला के एक गेस्ट हाऊस में संदिग्ध हालत में पाए गए थे। मीडिया ने उस समय भी इस घटना को उजागर किया था, लेकिन यह पृष्ठभूमि भी रोहित शेखर को अदालत से इंसाफ दिलाने में काम नहीं आई। इंसाफ मिला, मीडिया के हरकत में आने से। इसलिए बीत रहे साल को अपराधियों का किला भेदने में मीडिया की सफलता के तौर पर भी याद किया जाएगा।</p>
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		<title>तीसरी पीढ़ी के कंधों पर भाजपा की बागडोर</title>
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		<pubDate>Mon, 21 Dec 2009 07:54:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मुखर्जी-उपाध्याय, अटल-आडवाणी के बाद अब सुषमा-गड़करी
मोहन भागवत ने भाजपा के नए नेतृत्व के चयन की जिम्मेदारी लालकृष्ण आडवाणी को सौंपकर पिछले चार साल से चली गुटबाजी को विराम देने की कोशिश की है। आडवाणी की ओर से चुने गए पार्टी के तीनों नए नेता सुषमा स्वराज, नितिन गड़करी और अरुण जेटली अब पिछले चार साल [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><span style="color: #800000;"><strong>मुखर्जी-उपाध्याय, अटल-आडवाणी के बाद अब सुषमा-गड़करी</strong></span></p>
<blockquote><p style="text-align: justify;"><strong>मोहन भागवत ने भाजपा के नए नेतृत्व के चयन की जिम्मेदारी लालकृष्ण आडवाणी को सौंपकर पिछले चार साल से चली गुटबाजी को विराम देने की कोशिश की है। आडवाणी की ओर से चुने गए पार्टी के तीनों नए नेता सुषमा स्वराज, नितिन गड़करी और अरुण जेटली अब पिछले चार साल की गलतियां सुधारने में जुटेंगे।</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">मौसम परिवर्तन को लेकर कोपेनहेगन में दुनियाभर के नेता कोई सर्वमान्य हल निकालने की मशक्कत कर रहे थे, लेकिन वहां कोई हल नहीं निकला। जबकि भारत में ठीक उसी समय भारतीय जनता पार्टी में मौसम परिवर्तन हो गया। <span id="more-1441"></span>अठारह दिसंबर की शाम पांच बजे से शुरू हुई भाजपा में मौसम परिवर्तन की मुहिम अगले दिन उन्नीस दिसंबर के शाम<a href="http://indiagatenews.com/wpfiles/wp-content/uploads/adwani_vajpayee.jpg" target="_blank"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-1442" style="border: 0pt none; margin: 5px 10px;" title="L K Adwani &amp; A B Bajpeyee" src="http://indiagatenews.com/wpfiles/wp-content/uploads/adwani_vajpayee-150x150.jpg" alt="L K Adwani &amp; A B Bajpeyee" width="150" height="150" /></a> तीन बजे तक जारी थी। बाईस घंटों के भीतर किसी भी राजनीतिक दल में दो पीढ़ियों का इतना बड़ा अंतर कभी नहीं देखा गया। इन बाईस घंटों में बनी भाजपा संसदीय दल की नेता सुषमा स्वराज और भाजपा अध्यक्ष नितिन गड़करी का जन्म जनसंघ के गठन के बाद हुआ है। अब तक भाजपा की बागडोर जनसंघ के गठन से पहले पैदा हुए नेताओं के हाथ में थी। सुषमा स्वराज जनसंघ के जन्म 21 अक्टूबर 1951 से करीब चार महीने बाद 14 फरवरी 1952 को पैदा हुई। जबकि नितिन गड़करी का जन्म तो जनसंघ  के गठन से पांच साल बाद 27 मई 1957 को हुआ। रायसभा में छह महीने पहले ही विपक्ष के नेता की जिम्मेदारी संभालना शुरू कर चुके अरुण जेटली का जन्म भी 28 दिसंबर 1952 को हुआ था। उम्र के लिहाज से सुषमा स्वराज इन तीनों में सबसे बड़ी हैं, हालांकि वह भी सिर्फ 57 साल की हैं। भाजपा को लंबे अर्से के बाद 52 साल का अध्यक्ष मिला है।</p>
<p style="text-align: justify;">अठावन साल पहले जब जनसंघ का गठन हुआ, तो श्यामाप्रसाद मुखर्जी अध्यक्ष और दीनदयाल उपाध्याय संगठन मंत्री थे, जबकि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी कुछ महीनों बाद जनसंघ में शामिल हुए। श्यामाप्रसाद मुखर्जी के जम्मू जेल में निधन के बाद पार्टी की बागडोर  दीनदयाल उपाध्याय के कंधों पर आ गई थी, तो 1968 में दीनदयाल उपाध्याय की हत्या के बाद पार्टी की बागडोर अटल बिहारी वाजपेयी के कंधों पर आ गई। दीनदयाल उपाध्याय के कार्यकाल में भारतीय जनसंघ  बाकी छोटे-बड़े राजनीतिक दलों के साथ मिलकर बिहार, उत्तर प्रदेश और पंजाब में संविद सरकारों में शामिल हो <a href="http://indiagatenews.com/wpfiles/wp-content/uploads/spm_ddu.jpg" target="_blank"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-1443" style="border: 0pt none; margin: 5px 10px;" title="S P Mukharjee &amp; D D Upadhyaye" src="http://indiagatenews.com/wpfiles/wp-content/uploads/spm_ddu-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" /></a>गई थी, लेकिन अटल जी के कार्यकाल में यह संविद सरकारें गिर गई और 1969 के चुनावों में जनसंघ बुरी तरह हारी थी। अटल बिहारी वाजपेयी को तब पार्टी के भीतर से भी बलराज मधोक के विरोध का सामना करना पड़ा था, जो उनसे काफी पहले जनसंघ के अध्यक्ष रह चुके थे। जब जनसंघ में वाजपेयी-मधोक में घमासान चल रहा था, ठीक उसी समय इंदिरा गांधी ने 1969 में कांग्रेस को दोफाड़ कर दिया। जनसंघ की केंद्रीय राजनीति में लालकृष्ण आडवाणी का उदय 1970 में रायसभा के सदस्य के रूप में हुआ। तब से लेकर 2004 तक जनसंघ और भाजपा पर अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का चुनौतीरहित कब्जा बना रहा। इस बीच वाजपेयी और आडवाणी ने पार्टी को सत्ता के शिखर तक पहुंचाया, तो उन्हीं की मौजूदगी में पार्टी पिछले दो लोकसभा चुनाव लगातार हारी।</p>
<p style="text-align: justify;">भाजपा का छह साल का शासनकाल संघ परिवार से खट््टे-मीठे रिश्तों का दौर रहा। संघ परिवार के तीन संगठन विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और स्वदेशी जागरण मंच एनडीए सरकार की शुरू से लेकर आखिर तक आलोचना और विरोध करते रहे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक के सुदर्शन के साथ न तो अटल बिहारी वाजपेयी के रिश्ते अच्छे थे, न लालकृष्ण आडवाणी के। हालांकि जिस समय एनडीए सरकार बनी, उस समय इन दोनों नेताओं के उस समय के सरसंघचालक राू भैया  के साथ संबंध बेहतरीन थे। एनडीए सरकार के समय ही राू भैया ने संघ की जिम्मेदारी के सुदर्शन को सौंपकर एक तरह से सरकार के लिए कांटों का मार्ग खड़ा कर दिया। सिर्फ राम जन्मभूमि मंदिर ही नहीं, सरकार की आर्थिक नीतियों पर भी संघ परिवार से टकराव की नौबत आ गई। अटल बिहारी वाजपेयी ने इन परिस्थितियों से निपटने की जिम्मेदारी लालकृष्ण आडवाणी को सौंप दी थी, लेकिन वह के सुदर्शन को संतुष्ट नहीं कर पाए। नतीजतन दोनों में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास की खाई चौड़ी होती गई, जिसका विस्फोट चार-पांच जून 2005 को लालकृष्ण आडवाणी की कराची में कायद-ए-आजम मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर दिए गए भाषण के बाद हुआ। लालकृष्ण आडवाणी ने ऐसा कुछ नहीं कहा था, जिससे सरसंघचालक का गुस्सा इतना भड़कता। आडवाणी से खार खाए बैठे विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल की ओर से मौके का फायदा उठाया जाना तो समझ में आता था, लेकिन सरसंघचालक ने भी जिन्ना की थोड़ी सी तारीफ पर आसमान सिर पर उठा लिया। आडवाणी ने जिन्ना को सेक्युलर नहीं कहा था, हालांकि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में जिन्ना को बार-बार ऐसा सेक्युलर दिखाया गया है, जो कांग्रेस की उनके प्रति नफरत के कारण कट्टरपंथी मुसलमान बना। आडवाणी ने जिन्ना की मजार पर भाषण देते हुए पाकिस्तानियों को याद दिलाया था कि 11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की संविधान सभा में भाषण देते हुए जिन्ना ने पाक को ऐसा सेक्युलर स्टेट बनाने का वादा किया था जिसमें सभी धर्मों के लोगों को उपासना की आजादी होगी और उसके नागरिकों से धर्म के आधार पर भेद नहीं किया जाएगा। पहले भारतीय मीडिया ने और बाद में संघ परिवार ने इसे जिन्ना के तारीफ के तौर पर पेश करके आडवाणी की छवि को धूमल करने की आपराधिक कोशिश की।</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://indiagatenews.com/wpfiles/wp-content/uploads/sushma_gadkari.jpg" target="_blank"><img class="alignright size-thumbnail wp-image-1444" style="border: 0pt none; margin: 5px 10px;" title="Sushma &amp; Gadkari" src="http://indiagatenews.com/wpfiles/wp-content/uploads/sushma_gadkari-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" /></a>पहले से ही अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी से खफा चल रहे सरसंघचालक के सुदर्शन ने इन दोनों के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए दोनों को अपने-अपने पद छोड़ने का फरमान जारी कर दिया। यह भारतीय जनता पार्टी के कामकाज में संघ का सीधा-सीधा दखल था, जबकि इससे पहले इस तरह का दखल इस तरह खुल्लम-खुल्ला कभी नहीं हुआ था। जनसंघ के जन्म के समय भी श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने गुरु गोलवरकर के साथ जब नई पार्टी बनाने का विचार-विमर्श किया था, तो संघ ने पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए संघ के प्रचारक भेजने मात्र का समझौता किया था। आरएसएस ने उसी परंपरा के तहत भाजपा में कार्यरत संगठन महामंत्री संजय जोशी का लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ माहौल बनाने के लिए इस्तेमाल किया। जनसंघ के शुरूआती समय से ही भाजपा से जुड़े रहे लालकृष्ण आडवाणी को भी 2005 के चेन्नई अधिवेशन में यह कहना पड़ा कि संघ पार्टी के रोजमर्रा के काम में दखल न दे। लेकिन संघ नेतृत्व पर इसका कोई असर नहीं हुआ, आडवाणी अध्यक्ष पद छोड़ने को राजी हो गए थे, बेहतर होता कि उन्हीं की पसंद का नया अध्यक्ष बनाया जाता, क्योंकि वह पच्चीस साल से पार्टी को सींच रहे थे। लेकिन संघ ने आडवाणी विरोधियों से सलाह-मशविरा करके राजनाथ सिंह को पार्टी अध्यक्ष पद सौंप दिया। संघ अगर आडवाणी से सलाह-मशविरा करके उन्हीं से राजनाथ सिंह का नाम आगे बढ़वाता, तो पिछले चार साल में पार्टी जिस गुटबाजी का शिकार हुई, वैसा न होता। पार्टी पहले दिन से ही आडवाणी समर्थकों और आडवाणी विरोधियों में बंट गई, दोनों गुटों में अविश्वास की खाई इतनी बढ़ गई थी, जिसका असर 2009 के लोकसभा चुनावों में साफ दिखाई दे रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">नए सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने पूर्ववर्ती सरसंघचालक के सुदर्शन  के रोडमैप का अनुसरण करते हुए पार्टी को नया नेतृत्व देने की सलाह देने में बेहतर ईमानदारी का परिचय दिया है। उन्होंने पार्टी युवा कंधों पर सौंपने के समय और युवा कंधों के चयन का फैसला लालकृष्ण आडवाणी पर सौंपकर पार्टी को गुटबाजी से निजात दिलाने की ईमानदार कोशिश की है। नतीजतन जनसंघ गठन के बाद पैदा हुए नितिन गड़करी, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज के चयन का फैसला लालकृष्ण आडवाणी के हाथों हुआ है। अब लालकृष्ण आडवाणी की जिम्मेदारी इन तीनों को प्रशिक्षित करके कुशल नेतृत्व देने में सक्षम करने और निचले स्तर पर नया नेतृत्व उभारने की भूमिका निभाना है। जिसमें लालकृष्ण आडवाणी मन-कर्म-वचन से लग गए हैं। मोहन भागवत ने आडवाणी के करीबी वेंकैया, जेटली, अनंत, सुषमा या नरेंद्र मोदी को अध्यक्ष बनाने का कभी विरोध नहीं किया। नरेंद्र मोदी खुद गुजरात से अभी मुक्त नहीं होना चाहते थे, जेटली और सुषमा को आडवाणी संसदीय जिम्मेदारी के लिए तैयार कर चुके थे, इसलिए विकल्प सिर्फ वेंकैया नायडू और अनंत कुमार बचते थे। अनंत कुमार को अपेक्षाकृत विवादास्पद माना गया, क्योंकि वह कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदुरप्पा के खिलाफ हैं, जबकि वेंकैया नायडू का प्रयोग पार्टी पहले ही कर चुकी थी। लालकृष्ण आडवाणी को ही अन्य नाम सुझाने की सलाह दी गई थी और इसी सलाह-मशविरे में नागपुर के किसान और उद्योगपति नितिन गड़करी का नाम उभरा, जो समाजपरक राजनीति से अपना लोहा मनवा चुके थे। संघ मुख्यालय के नजदीक घर होना उनकी योग्यता नहीं है, मशहूर केतकी सिल्क साड़ी कंपनी के मालिक होना भी उनकी योग्यता नहीं है, पीवीसी पाईप बनाने वाली या पाउडर कोटेड प्रीमियम फर्नीचर या क्राफ्ट पेपर को-आपरेटिव सोसायटी चलाना भी उनकी योग्यता नहीं है। वाजपेयी सरकार के समय बनी प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना का पहला प्रयोग नितिन गड़करी ने महाराष्ट्र का पीडब्ल्यूडी मंत्री रहते हुए किया था। चतुर्भुज राष्ट्रीय राजमार्ग संबंधी वाजपेयी के सपने को साकार करने वाली कमेटी से भी नितिन गड़करी जुड़े रहे। वह उतना समय राजनीति में नहीं लगाते, जितना समाजसेवा में लगाते हैं। गड़करी ने पार्टी को गुटबाजी से मुक्त करने का वादा करके चार्ज लिया है।</p>
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		<title>लघु ही सुंदर है</title>
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		<pubDate>Mon, 14 Dec 2009 07:31:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[पीएमके प्रमुख रामदौस भी राज्यों के विभाजन की दौड़ में शामिल हो गए हैं। तेलंगाना की मांग के हिंसक रूप लेने पर केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश के बंटवारे की बात सिध्दांतत: मंजूर कर ली। केंद्र का यह फैसला मक्खियों के छत्ते में हाथ मारने जैसा साबित हो रहा है क्योंकि लगभग हर राज्य में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">पीएमके प्रमुख रामदौस भी राज्यों के विभाजन की दौड़ में शामिल हो गए हैं। तेलंगाना की मांग के हिंसक रूप लेने पर केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश के बंटवारे की बात सिध्दांतत: मंजूर कर ली। केंद्र का यह फैसला मक्खियों के छत्ते में हाथ मारने जैसा साबित हो रहा है क्योंकि लगभग हर राज्य में बंटवारे की मांग खड़ी हो गई है। पीएमके प्रमुख रामदौस ने दस साल पहले तमिलनाडु के विभाजन का आंदोलन शुरू किया था, लेकिन चारों तरफ से विरोध का सामना हुआ तो चुप्पी साध ली थी। अब देशभर में राज्यों के विभाजन की मांग उठने पर उन्होंने छोटे राज्यों के पक्ष में अंग्रेजी की एक कहावत का सहारा लेकर कहा है- &#8216;स्माल इज ब्यूटीफुल।&#8217;</p>
<p style="text-align: justify;">वैसे संविधान के मुताबिक किसी राज्य का विभाजन करने के लिए वहां की विधानसभा से प्रस्ताव पास होना जरूरी नहीं है। ऐसे प्रस्ताव का कोई मतलब नहीं है, लेकिन छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड बनाते समय सरकार ने विधानसभा के प्रस्तावों को ढाल की तरह इस्तेमाल किया था। <span id="more-1423"></span>भाजपा तेलंगाना और विदर्भ का भी समर्थन करती थी, लेकिन दोनों राज्यों मे उसके पार्टनर तेलगूदेशम और शिवसेना विभाजन के खिलाफ थी, इसलिए विधानसभाओं के प्रस्ताव आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र विभाजन टालने की ढाल बने। संवैधानिक प्रावधान के मुताबिक राज्यों के पुनर्गठन या सीमाओं के निर्धारण का फैसला राष्ट्रपति करते हैं। राष्ट्रपति इस बाबत पहले बिल विधानसभा को भेजते हैं और बाद में उसे पास करने के लिए संसद को सौंपते हैं। यूपीए सरकार अपने पहले कार्यकाल में आम सहमति का बहाना बनाकर तेलगाना की मांग टालती रही, हालांकि 2004 के चुनावों में तेलंगाना राष्ट्र समिति से वादा किया था। अब तेलंगाना आंदोलन के हिंसक रूप लेने और तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष चंद्रशेखर राव के आमरण अनशन से भयभीत होकर कांग्रेस आलाकमान ने तेलंगाना बनाने पर सहमति दे दी। बिना आम सहमति बनाए आनन-फानन में की गई विभाजन की घोषणा सरकार और कांग्रेस के गले में फंस गई है। एक तरफ आंध्र प्रदेश के बाकी दोनों हिस्से तटीय आंध्र और रायलसीमा में विरोध की ज्वाला भड़क गई है तो दूसरी तरफ तमिलनाडु से लेकर उत्तर प्रदेश तक में बड़े राज्यों के विभाजन की मांग शुरू हो गई है।</p>
<p style="text-align: justify;">दार्जिलिंग को पश्चिम बंगाल से अलग करने की मांग राजीव गांधी के शासनकाल में जोर पकड़ी थी। सुभाष घीसिंग का आंदोलन भी हिंसक रूप लेने लगा तो राजीव गांधी ने समझौता करके दार्जिलिंग पर्वतीय विकास परिषद का गठन कर मांग ठंडी कर दी थी। अब सुभाष घीसिंग का दौर खत्म हो चुका है और नए राज्य के निर्माण के लिए गोरखाजनमुक्ति मोर्चा का गठन हो चुका है। वह इतना प्रभावशाली है कि उसके समर्थन से भाजपा टिकट पर राजस्थान के जसवंत सिंह दार्जिलिंग से लोकसभा चुनाव जीत गए। सुभाष घीसिंग और राजीव गांधी में सेतु बनने वाले वरिष्ठ पत्रकार इंद्रजीत भी दोनों में समझौते के बाद दार्जिलिंग से चुनाव जीत गए थे। दार्जिलिंग वासियों की पश्चिम बंगाल सरकार से नाराजगी इन दोनों के दार्जिलिंग से चुनाव जीतने से ही स्पष्ट है। अगर हिंसक आंदोलन से ही राज्य हासिल किया जा सकता है तो तेलंगाना के बाद यह आग सबसे पहले दार्जिलिंग में भड़केगी, क्योंकि वहां जमीन तो पहले से ही तैयार है। आंदोलनकारियों ने तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष चंद्रशेखर राव की तरह आमरण अनशन की रूपरेखा बना ली है। दार्जिलिंग की मांग संसद में उठाने का वादा करके चुनाव जीतने वाले जसवंत सिंह ने कहा कि अगर नए छोटे राज्यों का निर्माण होना है, तो सबसे पहला हक दार्जिलिंग का है क्योंकि उसकी मांग सबसे पुरानी 1917 से की जा रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">उड़ीसा का विभाजन करके कौशल राज्य के निर्माण की मांग नए सिरे से शुरू होने की आशंका पैदा हो गई है। उड़ीसा के पिछड़े जिलों कालाहांडी, नौपाडा, संबलपुर, देयोगढ़, झारसुगुडा, बौध्द, बोलंगीर, सोनेपुर और सुंदरगढ क़ो मिलाकर कौशल राज्य बनाने की मांग भी पुरानी है। उल्लेखनीय है कि ग्यारहवीं सदी में उड़ीसा के इन्हीं जिलों और मौजूदा छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों पर आधारित कौशल स्टेट हुआ करती थी।</p>
<p style="text-align: justify;">गुजरात के सबसे बड़े कच्छ जिले में तेलंगाना की तरह ही अलग राज्य की मांग बहुत पुरानी है। लेकिन यह मांग कभी आंदोलन का रूप नहीं ले सकी। कच्छ राजघराने के कुंवर विजय राज सिंह जडेजा जब सांसद बने थे तो उन्होंने अलग कच्छ राज्य की मांग उठाते हुए कहा था कि जवाहर लाल नेहरू ने एक बार मांग का समर्थन किया था।</p>
<p style="text-align: justify;">फिल्मी कलाकार राजा बुंदेला उत्तर प्रदेश-मध्यप्रदेश सीमा पर स्थित पिछड़े भू-भाग बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर आंदोलन चला रहे हैं। इस क्षेत्र पर बुंदेला शासकों के शासन का इतिहास भी रहा है। पिछड़े क्षेत्र बुंदेलखंड को उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पुनर्प्रवेश का द्वार बनाने की कोशिश कर रहे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी ने अलग बुंदेलखंड का समर्थन करके आंदोलन को हवा दे दी है। उन्होंने केंद्र सरकार से बुंदेलखंड को अलग से पैकेज दिलाकर अपनी भावी राजनीति के संकेत दे दिए थे। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भी तेलंगाना मुद्दे पर बुरी फंसी कांग्रेस को और उलझाने के लिए बुंदेलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को काटकर अलग से हरित प्रदेश बनाने की वकालत कर दी है। उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने में विफल रहे चौधरी चरण सिंह के बेटे अजित सिंह हरित प्रदेश की मांग करते रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को निकाल बाहर किए जाने और राज्य सरकार की ओर से जम्मू व लद्दाख के साथ भेदभाव को देखते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने एक बार जम्मू कश्मीर को तीन राज्यों में विभाजित करने की मांग उठाई थी। हालांकि इस मांग को कभी समर्थन नहीं मिला लेकिन तेलंगाना की आग अब जम्मू में भी जा पहुंची है। कर्नाटक के कुर्ग, महाराष्ट्र के विदर्भ, बिहार के मिथिलांचल, असम के बोडोलैंड, गुजरात के सौराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी भाषी इलाकों को मिलाकर भोजपुर, बिहार के ही मिथिलांचल, पश्चिम बंगाल और असम के कुछ इलाकों को मिलाकर ग्रेटर कूच बिहार आदि छोटे राज्यों की मांग समय-समय पर उठती रही।</p>
<p style="text-align: justify;">पहला राज्य पुनर्गठन आयोग 1948 में बना था। आयोग को सिर्फ आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, कोल, महाराष्ट्र के बारे में रिपोर्ट देने को कहा था। उत्तर भारत को एकदम अलग रखा गया, इससे सिख बेहद खफा थे, क्योंकि उनकी मांग भाषा आधारित पंजाबी सूबे की थी। सिखों ने पंजाबी सूबे के लिए आंदोलन तेज किया तो जवाहर लाल नेहरू ने 1953 में दूसरा राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया। लेकिन इस आयोग ने भाषा आधारित पंजाबी सूबा बनाने की सिफारिश से इनकार करते हुए पटियाला स्टेट और हिमाचल के पंजाब में विलय की सिफारिश कर दी थी। इस पर सिखों ने पंजाबी सूबे के लिए दस साल तक आंदोलन किया। जिसमें संत फतेसिंह के 22 दिन और मास्टर तारी सिंह के 48 दिन के अनशन के बावजूद जवाहर लाल नेहरू नहीं झुके थे। हालांकि इंदिरा गांधी को भाषा आधारित पंजाबी सूबा बनाना ही पड़ा था, जिसमें पंजाब के हिंदी भाषी अबोहर-फाजिलका और चंडीगढ़ का विवाद अभी तक लटका हुआ है।</p>
<p style="text-align: justify;">अब जबकि देशभर में छोटे राज्यों की मांग जोर पकड़ रही है तो एक सवाल और भी खड़ा हो रहा है कि जगह-जगह और बार-बार के हिंसक आंदोलनों का सामना करने की बजाए क्यों न एक और राज्य पुनर्गठन आयोग बना दिया जाए। एक समय कांग्रेस तेलंगाना की मांग के सामने झुकने की बजाए राज्य पुनर्गठन आयोग बनाकर आंदोलन को ठंडे बस्ते में डालने की सोच रही थी। लिब्रहान आयोग ने एक विवाद को 17 साल तक लटका कर किसी भी आंदोलन को ठंडे बस्ते में डालने का रास्ता दिखा दिया है। पिछली यूपीए सरकार में प्रणव मुखर्जी कमेटियां मामले को लटकाने का फार्मूला हुआ करती थी, लेकिन अब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की कार्यशैली थोड़ी अलग दिखती है। रणनीतिकारों ने उन्हें समझाया कि तेलंगाना बनाने से आंध्र प्रदेश में क्षत्रप की तरह उभर रहे जगन रेड्डी को खत्म करने में सहायता मिलेगी। इसके अलावा आंध्र में कांग्रेस के प्रमुख प्रतिद्वंदी चंद्रबाबू नायडू की राजनीति भी खत्म हो जाएगी और दोनों ही राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनेगी। इसलिए उन्होंने विवाद पर फौरन पानी डालने का फार्मूला निकाला, लेकिन तेलंगाना का ऐलान होते ही आंध्र प्रदेश में उठे बवाल ने कांग्रेस और सरकार की नींद उड़ा दी, तो धीमी गति से चलने की राह अपनानी पड़ी है। तेलंगाना का दावा पंजाबी सूबे की तरह अलग भाषा के आधार पर नहीं बनता क्योंकि तेलंगाना की भाषा भी तेलुगू ही है। हिंदी भाषी राज्यों को छोड़कर देश में बाकी किसी भी प्रादेशिक भाषा के दो राज्य नहीं हैं। तेलंगाना के पिछड़ेपन और अलग संस्कृति के आधार पर राज्य की मांग उठती रही है। यही आधार झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड का भी बना था, लेकिन इन तीनों राज्यों का निर्माण भारतीय जनता पार्टी ने करवाया था जो हमेशा से ही छोटे राज्यों के पक्ष में रही थी। जबकि कांग्रेस जवाहर लाल नेहरू के जमाने से ही बड़े राज्यों के पक्ष में रही है। कांग्रेस की दलील रही है कि पिछड़े राज्यों का अपने पैरों पर खड़ा होना संभव नहीं होगा जबकि बड़े राज्यों के हिस्से के रूप में पिछड़ेपन को दूर करने के उपाय किए जा सकते हैं। आंध्र प्रदेश के निर्माण के समय जवाहर लाल नेहरू ने तेलंगाना के विकास के लिए विशेष व्यवस्था का वचन दिया था। इस बावत बाकायदा छह सूत्री फार्मूला भी बना था जिसमें तेलंगाना के विकास और वहां के बेरोजगारों को रोजगार में कोटा तय करने की बात थी। याद करना बेहतर रहेगा कि मौजूदा आंध्र प्रदेश का निर्माण राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश के आधार पर हुआ था। तब तक तेलुगू भाषी इलाका मद्रास राज्य के अधीन था। राज्य  पुनर्गठन आयोग की सिफारिश से पहले 1952 में पोट्टा श्रीमुल्लू ने तेलुगू भाषी राज्य की मांग को लेकर आंदोलन छेड़ा था। मद्रास के तेलुगू भाषी इलाके और हैदराबाद रियासत को मिलाकर आंध्र प्रदेश बनाया गया, मौजूदा तेलंगाना उस समय हैदराबाद रियासत का हिस्सा ही था। तेलंगाना में उस समय भी अलग राज्य की मांग उठी थी, लेकिन विकास का वायदा करके दबा दी गई, जो कभी पूरा नहीं हुआ। तेलंगाना का विकास नहीं होने के कारण नक्सलवादियों को अपने पांव जमाने में सफलता मिली। तटीय आंध्र और रायलसीमा पर तेलंगाना के शोषण का आरोप हमेशा लगता रहा।</p>
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		<title>उल्फा के बहाने बात मूल निवासियों के हक की</title>
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		<pubDate>Mon, 07 Dec 2009 07:40:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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		<description><![CDATA[
पूर्वोत्तर के कई राज्य ब्रिटिश भारत के मानचित्र में भी नहीं थे। अलग भाषा और नस्ल के कारण पूर्वोत्तर में अलगाववादी आंदोलन तो था ही, विकास के असंतुलन ने आग में घी का काम किया है।

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना 19 दिसम्बर को भारत आ रही हैं। उनके भारत आने से ठीक पहले बांग्लादेश सीमा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>पूर्वोत्तर के कई राज्य ब्रिटिश भारत के मानचित्र में भी नहीं थे। अलग भाषा और नस्ल के कारण पूर्वोत्तर में अलगाववादी आंदोलन तो था ही, विकास के असंतुलन ने आग में घी का काम किया है।</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना 19 दिसम्बर को भारत आ रही हैं। उनके भारत आने से ठीक पहले बांग्लादेश सीमा से लगते असम राज्य  के अलगाववादी संगठन उल्फा के बड़े नेता गिरफ्तार कर भारत के सुपुर्द किए गए हैं। असम में बाहरी लोगों के खिलाफ लड़ाई के दो पहलुओं पर गौर करने की जरूरत है। पहला आंदोलन आसू ने बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ शुरू किया था। आंदोलन मूल आबादी का राज्य पर राजनीतिक अधिकार बनाए रखने का था। <span id="more-1408"></span>कांग्रेस बांग्लादेशियों के राशन कार्ड और वोट बनाकर उन्हें अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए इस्तेमाल कर रही थी। कई विधानसभा क्षेत्रों में हालत यह हो गई थी कि हार-जीत की चाबी बांग्लादेशियों के हाथ में आ गई थी। सत्ता के वर्चस्व का हिंसक नजारा 1983 में देखने को मिला जब विधानसभा चुनाव में कम से कम तीन हजार लोग मारे गए। शांतिप्रिय आंदोलन हिंसक रूप ले चुका था। राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद एक तरफ असम का आंदोलन खत्म करने के लिए 15 अगस्त 1985 को आसू से राजनीतिक समझौता किया। तो दूसरी तरफ पंजाब में सिखों की नाराजगी दूर करने के लिए 24 जुलाई 1985 को संत हरचंद सिंह लोगोवाल से समझौता किया। नतीजतन दोनों ही राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ। राजीव गांधी सत्ता की राजनीति से काफी दूर थे। अपनी पार्टी के हित की बजाए अनेक बार उन्होंने राष्ट्रीय हित को तरजीह दी। यह दो उदाहरण यही दर्शाते हैं। तीसरा उदाहरण दार्जिलिंग पर्वतीय परिषद का भी है, जो उन्हीं के कार्यकाल में बनी।</p>
<p style="text-align: justify;">राजीव गांधी पूर्वोत्तर के अलगाववादी आंदोलनों से बेहद चिंतित थे। उन्होंने पूर्वोत्तर के आदिवासियों का दिल जीतने के लिए विकास की कई योजनाएं शुरू की। लेकिन देश के बाकी हिस्सों की तरह पूर्वोत्तर में भी विकास की योजनाएं बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का शिकार होकर रह गई। आज मुंबई में उत्तर भारतीयों खासकर बिहारियों के खिलाफ जो आंदोलन दिखाई दे रहा है, वही आंदोलन पूर्वोत्तर में सत्तर के दशक से चल रहा है। जहां आसू का आंदोलन सिर्फ बांग्लादेशियों के खिलाफ था वहां यूनाईटिड लिब्रेशन फ्रंट आफ असम यानी उल्फा ने भी ठीक उसी समय 1979 में आंदोलन किया था। उल्फा का आंदोलन असम को गैर असमियों से मुक्त कराकर स्वतंत्र देश की स्थापना करना था। यह आंदोलन बांग्लादेशियों के खिलाफ कम, वहां जा बसे उत्तर भारतीयों के खिलाफ ज्यादा था। इसलिए उल्फा उग्रवादियों को बांग्लादेश से समर्थन मिलना शुरू हो गया। तभी से असम में अलगाववादी गतिविधियों का केंद्र बांग्लादेश बना हुआ है।</p>
<p style="text-align: justify;">मूल निवासियों की ओर से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक प्रतिष्ठानों पर अपना कब्जा बरकरार रखने की कोशिश सिर्फ असम और मुंबई में ही नहीं दिखती। बीते हफ्ते पंजाब के लुधियाना में हुई हिंसक झड़पें भी इसी का उदाहरण हैं। बासठ सालों में विकास के भारी असंतुलन ने देश में इस समस्या को विकट रूप तक पहुंचा दिया है। झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ राज्यों का निर्माण भी विकास के असंतुलन और मूल निवासियों के अस्तित्व पर खतरे के कारण हुआ। दिल्ली और मुंबई बासठ साल में अपना चरित्र बदल चुकी हैं, देश के बाकी महानगरों में भी यही स्थिति पैदा हो रही है, जिस कारण मूल निवासियों की कुंठाएं बढ़ रही हैं। लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों में असम एक ऐसा राज्य था जिसने इस खतरे को सबसे पहले सत्तर के दशक में भांप लिया था। अपने अस्तित्व के बचाव के लिए अस्सी के दशक में असम के बोडो आदिवासियों ने बोडोलैंड की मांग शुरू कर दी थी। नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट बोडोलैंड की मांग अपने क्षेत्र को राज्य के भीतर ही स्वायत्तता दिलाना है। असम के अलावा पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों की स्थिति देश के बाकी हिस्सों से थोड़ी अलग है। सिलीगुड़ी या चिकेन नेक के नाम से मशहूर पश्चिम बंगाल का छोटा कारीडोंर पूर्वोत्तर के सात राज्यों को भारत की मुख्य धरती से जोड़ता है। इसमें हम असम को नहीं जोड़ते, जो 1947 से पहले ही भारत से जुड़ा है और वहां की भाषा, संस्कृति, इतिहास भारत के इतिहास से अलग नहीं है। हालांकि असम में भी ब्रिटिश भारत से पहले आहोम राजशाही का शासन था। उल्फा ने अपने अलगाववादी आंदोलन की शुरूआत उस रंगघर पैवेलियन से की थी जो कभी आहोम राजशाही की प्रमुख सीट मानी जाती थी। पूर्वोत्तर के बाकी मौजूद सात राज्यों मेघालय, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर, नगालैंड और सिक्किम की भाषा, वेशभूषा, संस्कृति और यहां तक कि लोगों के चेहरे-मोहरे भी बाकी भारतीयों से अलग हैं। एक-दो राज्यों को छोड़कर करीब करीब पूरे पूर्वोत्तर में सशस्त्र विद्रोह चल रहा है। कोई संगठन पूर्ण आजादी की मांग कर रहा है तो कोई भारतीय संविधान के तहत स्वायत्तता की मांग करता है।</p>
<p style="text-align: justify;">वस्तुस्थिति यह है कि पूर्वोत्तर के इस हिस्से के साथ ही चीन के कब्जे वाले तिब्बत की स्थिति काफी भिन्न रही है। इस पूरे इलाके पर न कभी चीन का अधिपत्य रहा है और न पूरे तौर पर भारत का। देश की आजादी से पहले असम भी पूरे तौर पर भारतीय राजनीतिक मानचित्र का हिस्सा नहीं था। नगालैंड, मिजोरम और मेघालय उस समय तक असम का ही हिस्सा थे। मणिपुर और त्रिपुरा पर स्थानीय राजघराने का शासन था, जो ब्रिटिश काल में ही भारत का हिस्सा बने थे। अरुणाचल और सिक्किम भी ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं थे। बीसवीं सदी के शुरू में ब्रिटेन ने भारत का राजनीतिक मानचित्र खिंचा तो पूर्वोत्तर के असम, मणिपुर और त्रिपुरा को भारत में शामिल किया, तो उत्तर पूर्व के बलूचिस्तान और उत्तर पश्चिम फ्रंटीयर राज्य को भारतीय मानचित्र में शामिल किया। आजादी के बाद जहां भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में विद्रोह की चिंगारियां भड़कती रहती हैं, वहीं बलूचिस्तान और एनडब्ल्यूएफपी पाकिस्तान के लिए समस्या बना हुआ है। बलूचिस्तान में शुरू से ही पाकिस्तान से अलग होने का आंदोलन चल रहा है, तो भारत के हिस्से में आए अरुणाचल और सिक्किम पर चीन अपना दावा ठोकता रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में चीन ने सिक्किम को तो भारत का हिस्सा मान लिया है, लेकिन अरुणाचल पर अभी भी दावा नहीं छोड़ा है, जिस पर भारत-चीन बातचीत चल रही है। ब्रिटिश हुकूमत की ओर से भारत और तिब्बत में बार्डर के तौर पर तय की गई मेकमोहन रेखा को चीन मान्यता नहीं देता।</p>
<p style="text-align: justify;">एक तरफ अरुणाचल को लेकर चीन का दावा है तो दूसरी तरफ आजादी के समय तक राजशाही बरकरार रहने वाले मणिपुर और त्रिपुरा में अलगाववादी आंदोलन चल रहा है। मणिपुर में पीपुल्स लिबे्रेशन आर्मी, यूनाईटेड नेशनल लिब्रेशन फ्रंट और पीपुल्स रिवोलयूशनरी पार्टी आजादी का खूनी आंदोलन चलाए हुए हैं त्रिपुरा के आंदोलन की बागडोर तो वामपंथी उग्रवादियों के दो संगठनों नेशनल लिबेशन आफ त्रिपुरा और आल त्रिपुरा टाईगर फोर्स के हाथ में हैं, जिन्हें चीन और नेपाल के माओवादियों का समर्थन हासिल है। इसी तरह आजादी तक राज घराने के शासनाधीन रहे नगालैंड में पहले फिजों का आंदोलन चल रहा था तो अब एनएससीएन-एन और एनएससीएन-के का आंदोलन चल रहा है। इन दोनों संगठनों का लक्ष्य ग्रेटर नगालैंड की स्थापना है। जिसमें मणिपुर और असम का चचार पर्वतीय इलाका शामिल हो। राजीव गांधी के शासनकाल से ही इन दोनों संगठनों से केंद्र सरकार की बातचीत चल रही है। वाजपेयी के शासनकाल में बातचीत ने तेजी पकड़ी थी, लेकिन पिछले पांच साल से अब लगातार युध्द विराम की अवधि बढ़ाकर काम चलाऊ फार्मूला अपनाया जा रहा है। मेघालय में गारो हिल्स का आंदोलन चल रहा है, मिजोरम में असमियों के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ आक्रोश है। लेकिन इन सभी छोटे-छोटे विद्रोही संगठनों से ज्यादा खतरा है उल्फा का। जो 30 साल के बाद बातचीत के लिए मजबूरी में राजी हुआ है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत दौरे से पहले उल्फा प्रमुख अरबिंद राजखोवा और उनके कई प्रमुख सहयोगी चार दिसंबर को भारत के सुपुर्द कर दिए गए, उनकी गिरफ्तारी बांग्लादेश में पांच दिन पहले हो चुकी थी। हिंसक आंदोलन का प्रमुख अगुवा परेश बरूआ अभी भी शिकंजे से बाहर है, इसलिए राजखोवा की गिरफ्तारी को उल्फा आंदोलन का अंत मानना जल्दबाजी होगी। मूल समस्या विकास के असंतुलन से उपजी है जो आज असम, मुंबई और लुधियाना में दिखती है। अगर असंतुलन खत्म नहीं हुआ तो देश में जगह-जगह मूल निवासी विद्रोह पर उतर आएंगे।</p>
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		<title>शिवसेना पतन की ओर</title>
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		<pubDate>Mon, 30 Nov 2009 08:27:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[
भतीजे राज ठाकरे के बाद अब पुत्रवधु स्मिता का भी बाल ठाकरे का साथ छोड़ने का फैसला। महाराष्ट्र में भाजपा गिरते ग्राफ वाली उध्दव की शिवसेना को अपना हमराही बनाए रखे, या उत्तर-दक्षिण भारत विरोधी राजठाकरे को नया हमराही बनाए। भाजपा के आगे कुआं है, तो पीछे खाई।

केशव सीताराम का जन्म महाराष्ट्र के एक निम्न [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>भतीजे राज ठाकरे के बाद अब पुत्रवधु स्मिता का भी बाल ठाकरे का साथ छोड़ने का फैसला। महाराष्ट्र में भाजपा गिरते ग्राफ वाली उध्दव की शिवसेना को अपना हमराही बनाए रखे, या उत्तर-दक्षिण भारत विरोधी राजठाकरे को नया हमराही बनाए। भाजपा के आगे कुआं है, तो पीछे खाई।</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">केशव सीताराम का जन्म महाराष्ट्र के एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। फिर भी वह बड़े होनहार थे और उन्होंने &#8216;प्रबोधन&#8217; नाम से एक पाक्षिक पत्रिका निकालकर मराठी भाषा और मराठी सभ्यता के लिए काम किया। हालांकि वह खुद मूलरूप से मराठी नहीं थे। पचास के दशक में जब मराठी भाषा और संस्कृति के आधार पर महाराष्ट्र राज्य निर्माण की मांग उठी तो केशव सीताराम और उनकी पाक्षिक पत्रिका ने उसमें अहम भूमिका निभाई थी। वह जातिवाद के कट्टर विरोधी थे और एक ऐसे महाराष्ट्र की कल्पना करते थे जिसका विकास तुच्छ राजनीतिक मुद्दों में न फंसे। वह संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन का हिस्सा ही नहीं, अलबत्ता अग्रणी नेता थे। मोरारजी देसाई मुंबई को महाराष्ट्र में शामिल करने के खिलाफ थे लेकिन केशव सीताराम ठाकरे ऐसे मराठी भाषी राज्य की कल्पना करते थे जिसमें बहुभाषी मुंबई को भी शामिल किया जाए। ठीक उसी समय सीताराम ठाकरे के बेटे बाला साहेब ठाकरे ने मुंबई के अंग्रेजी अखबार फ्री प्रैस जनरल में कार्टूनिस्ट के तौर पर काम शुरू किया। <span id="more-1392"></span>अपने पिता की विचारधारा से अलग बाला साहेब ठाकरे के कार्टूनों में भाषाई आंदोलन की बू शुरूआती दिनों में ही दिखने लगी थी। जब महाराष्ट्र का निर्माण हो रहा था ठीक उसी समय बाल ठाकरे ने &#8216;मराठी&#8217; भाषा के विकास के लिए गुजराती और दक्षिण भाषियों के खिलाफ अपनी कलम चलानी शुरू की। मुंबई में उस समय भी गुजराती भाषियों का बोलबाला था, गुजराती भाषी मोरारजी देसाई मुंबई के मुख्यमंत्री थे। मराठी भाषियों और महाराष्ट्र के मूल निवासी महाराष्ट्रियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए बाला साहेब ठाकरे ने 19 जून 1966 को शिवसेना की स्थापना की। शिवसेना का लक्ष्य मुंबई में आने वाले प्रवासी गुजरातियों, पंजाबियों, मारवाड़ियों और दक्षिण भारतीयों की बजाए मराठियों के लिए नौकरियों की लड़ाई लड़ना था। शिवसेना ने क्योंकि मराठियों को नौकरियां दिलाने, उनकी लड़ाई लड़ने का उद्देश्य तय किया था इसलिए कामगारों में शिवसेना की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। नतीजतन जल्द ही कम्युनिस्ट पार्टियों की मजदूर यूनियनों का वर्चस्व टूटना शुरू हो गया।</p>
<p style="text-align: justify;">बाल ठाकरे ने मूल निवासियों के खास वर्ग को अपनी तरफ प्रभावित करने में सफलता हासिल करने के बाद बाकी राज्यों से निर्वासित मुसलमानों को निशाना बनाना शुरू किया। सत्तर के दशक में जहां एक तरफ शिवसेना गैर मराठी भारतीयों को निशाना बना रही थी, वहां बांग्लादेश बनने के बाद भारी तादाद मे बांग्लादेशियों के आने से मुंबई की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई, तो उन्होंने अपने आंदोलन का रुख बांग्लादेशी विरोध पर केंद्रित कर लिया। एक दशक के छोटे कार्यकाल में शिवसेना का आधार काफी बढ़ चुका था, यह वही वक्त था जब देश में बेरोजगारी बढ़ रही थी और उसका सर्वाधिक असर मुंबई जैसे महानगरों पर पड़ रहा था। बाल ठाकरे क्योंकि मूल निवासियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थे इसलिए उनकी लोकप्रियता में जबरदस्त उछाल आया। उनके भाषण की शैली और उत्तेजना से लोग उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते थे। बाल ठाकरे के घोर आलोचक और कांग्रेस के दिवंगत दिग्गज नेता वीएन गाडगिल यह कहने में जरा हिचकिचाहट नहीं करते थे कि बाल ठाकरे की वाक पटुता का कोई जवाब नहीं। वह उन्हें मराठी का कुशल वक्ता मानते थे जो लोगों के दिलों पर राज करता है। अयोध्या आंदोलन के समय बाल ठाकरे संघ परिवार के किसी नेता से कहीं ज्यादा उग्र हो गए थे। उन्होंने ताल ठोककर कहा था कि शिव सैनिकों ने बाबरी ढांचा तोड़ा है। जहां संघ परिवार के नेता ढांचा टूटने की वजह भीड़ का आक्रोश बता रहे थे वहां सिर्फ बाल ठाकरे ही थे जिन्होंने ढांचा तोड़ने की सार्वजनिक तौर पर जिम्मेदारी ली। शायद यही वजह थी कि उसकी सर्वाधिक प्रतिक्रिया भी मुंबई में हुई जहां दाऊद इब्राहिम और उनके गुर्गों ने बम धमाके करके सैकड़ों बेगुनाहों को शिकार बनाया था। इसकी प्रतिक्रिया में शिवसेना ने भी सांप्रदायिक दंगों का खूनी खेल शुरू किया जिसका 1995 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना और भाजपा दोनों को ही फायदा हुआ। शिवसेना ने जब भाजपा के साथ मिलकर 1995 में सत्ता हासिल कर ली तो बाल ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद की कुर्सी ठुकरा कर नायाब उदाहरण पेश किया था। इससे उनकी ताकत कई गुणा बढ़ गई। वह बिना किसी सरकारी पद के महाराष्ट्र के बेताज बादशाह बन गए थे। सत्ता खो जाने के बाद शिवसेना और बाल ठाकरे का पतन शुरू हो गया जो अब तक जारी है। शिवसेना ने यूपीए के पहले शासन काल के दौरान महाराष्ट्र में बिहारियों की रेलवे में भर्ती को मुद्दा बनाकर उत्तर भारतीय बनाम मराठियों का टकराव पैदा किया। मराठी अस्मिता को उभारने के लिए उन्होंने राष्ट्रपति के चुनाव में एनडीए के हिंदी भाषी उम्मीदवार भैरोंसिंह शेखावत का साथ छोड़कर कांग्रेसी मराठी भाषी उम्मीदवार प्रतिभा पाटील का समर्थन किया। लेकिन पार्टी में पारिवारिक विरासत की लड़ाई ने शिवसेना का ग्राफ और गिरा दिया। बाल ठाकरे के बेटे उध्दव ठाकरे और राज ठाकरे के बाद उनके बड़े बेटे जयदेव की विधवा स्मिता को पार्टी में जमीनी कार्यकर्ताओं से ज्यादा अहमियत देने से अंदर ही अंदर उठ रही चिंगारी लगातार भभकती रही थी। कभी छगन भुजबल ने शिवसेना छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस की राह पकड़ी तो कभी नारायण सिंह राणे ने कांग्रेस की राह पकड़ी। नारायण सिंह राणे का शिवसेना छोड़ने का कारण बाल ठाकरे की ओर से अपने बेटे उध्दव ठाकरे को तरजीह दिया जाना था। जबकि शिवसेना भाजपा सरकार के समय मनोहर जोशी के बाद नारायण सिंह राणे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। कोंकण में वह शिवसेना की रीढ़ की हड्डी थे। बाल ठाकरे पुत्र मोह में यह नहीं देख पाए कि पार्टी कार्यकर्ताओं से बनी है, सिर्फ पारिवारिक पार्टी नहीं है। वह जमीन से जुड़े अपने भतीजे राज ठाकरे को भी अपने साथ जोड़े नहीं रख सके। शिवसेना में हर कोई मानता था कि राज ठाकरे की सांगठनिक क्षमता बाल ठाकरे के बेटे उध्दव ठाकरे से ज्यादा है, लेकिन बाल ठाकरे पुत्र मोह का शिकार हो गए। राज ठाकरे के अलग होने के बाद शिवसेना का राजनीतिक ग्राफ लगातार गिर रहा है। राज ठाकरे के शिवसेना छोड़ने के बाद हुए लोकसभा चुनाव में शिवसेना को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। भाजपा के दिवंगत नेता प्रमोद महाजन एक समय यह समझने लगे थे कि शिवसेना से किनारा करने का समय आ गया है। उनकी राज ठाकरे से गुपचुप मुलाकातें भी शुरू हो गई थी। शिवसेना में बंटवारे की स्थिति न होती तो 2005 के भाजपा अधिवेशन में बाल ठाकरे को बुलाकर सम्मानित किया जाता लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अलबत्ता अधिवेशन के आखिरी दिन उध्दव ठाकरे और राज ठाकरे ने हाजिरी लगाई थी तो भाजपा नेताओं ने भविष्य की रणनीति के तहत दोनों को बराबर की अहमियत दी थी।</p>
<p style="text-align: justify;">भाजपा के राजठाकरे से संबंधों में दूरी तब बढ़नी शुरू हुई जब राज ठाकरे ने अपने चाचा बाल ठाकरे की जमीन खिसकाने के लिए उग्र तेवर अपनाने शुरू किए। राज ठाकरे का मकसद अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने और सत्ता तक पहुंचने की बजाए उध्दव ठाकरे की जमीन खिसकाना ज्यादा हो गया। इसके लिए पहले तो उन्होंने हिंदी भाषियों के खिलाफ जहर उगला और बाद में शिवसेना को चुनावों में धूल चटाने के लिए कांग्रेस का मोहरा बनने से भी परहेज नहीं किया। मराठी राजनीतिक इतिहासकार तो यहां तक कहते हैं कि बाल ठाकरे कांग्रेस में शरद पवार के मोहरे के तौर पर काम करते हुए मराठी राजनीति को आगे बढ़ा रहे थे। तो उनका भतीजा भी उन्हीं के पद्चिन्हों पर चलकर कांग्रेस का मोहरा बनकर बाल ठाकरे की जमीन खिसका रहा है। राज ठाकरे अपनी रणनीति में कामयाब रहे हैं। उन्होंने शिवसेना को राज्य की चौथे नंबर की पार्टी बना दिया है, इस पारिवारिक लड़ाई का सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा और सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस को हुआ है। राज्य में चौथे पाए पर पहुंचने के बाद अब बाल ठाकरे के परिवार में एक और दरार पैदा हो गई है। कभी राज ठाकरे और उध्दव ठाकरे से भी ज्यादा करीब समझे जाने वाली बाल ठाकरे की पुत्रवधु स्मिता ने शिवसेना के डूबते जहाज से उतरने का मन बना लिया है। वह अपने देवर उध्दव ठाकरे की रहनुमाई वाली शिवसेना छोड़कर दूसरे देवर राजठाकरे की पार्टी में जाने का संकेत देती तो इसे पारिवारिक राजनीतिक विरासत की लड़ाई का हिस्सा माना जाता, जैसा कि आंध्र प्रदेश में एनटीआर के परिवार में हुआ था, लेकिन वह तो शिवसेना की घोर विरोधी कांग्रेस की ओर रुख कर रही है, ठीक उसी तरह जैसे एनटीआर की बेटी पुरंदेश्वरी आखिरकार  कांग्रेस में शामिल होकर यूपीए सरकार में मंत्री हैं। राज ठाकरे ने खुद को बाल ठाकरे की विरासत का हकदार बनाना शुरू कर दिया है। भाजपा दुविधा में है कि वह उत्तर भारत और दक्षिण भारत विरोधी राज ठाकरे और डूबती नैय्या वाले उध्दव ठाकरे के अलावा किसी को चुन नहीं सकती। भाजपा आगे कुआं, पीछे खाई वाली हालत में है।</p>
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		<title>मनमोहन की अमेरिका यात्रा टली क्यों नही</title>
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		<pubDate>Sun, 22 Nov 2009 22:22:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[
अपना दौरा टालकर बाराक ओबामा को उनकी कश्मीर नीति पर मुंह तोड़ जवाब दे सकते थे मनमोहन सिंह। यों भी संसद सत्र के समय प्रधानमंत्री को विदेश दौरों से परहेज करना चाहिए।

संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है और हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा की मेहमानबाजी का लुत्फ उठा रहे हैं। भारतीय [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>अपना दौरा टालकर बाराक ओबामा को उनकी कश्मीर नीति पर मुंह तोड़ जवाब दे सकते थे मनमोहन सिंह। यों भी संसद सत्र के समय प्रधानमंत्री को विदेश दौरों से परहेज करना चाहिए।</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है और हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा की मेहमानबाजी का लुत्फ उठा रहे हैं। भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी आतंकवादी घटना 26/11 की कड़वी यादों को जब एक साल बाद इस 26/11 संसद में याद किया जाएगा, तो प्रधानमंत्री नदारद होंगे। कोई अंतरराष्ट्रीय समारोह या बैठक न हो तो प्रधानमंत्री संसद सत्र के समय विदेश यात्राओं से परहेज किया करते थे। जिस संसद में बहुमत के बूते कोई प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचता है, उस संसद का उसे सम्मान करना ही चाहिए। खासकर तब जब सत्र साल में सिर्फ तीन बार होता हो और वह भी पूरे साल में कुल मिलाकर सौ दिन से भी कम चलता हो। <span id="more-1379"></span>मनमोहन सिंह इस बात के लिए खुश हैं कि बाराक ओबामा ने राष्ट्रपति बनने के बाद सबसे पहले उन्हें ही अमेरिका का राजकीय मेहमान बनने का मौका दिया है। इसलिए मनमोहन सिंह ने मेहमानबाजी की वही तारीखें बेहिचक कबूल कर ली, जब संसद का शीत सत्र होता है। उन्होंने पहली बार ऐसा किया होता तो अनदेखी भी की जा सकती थी, लेकिन कभी भी लोकसभा में नहीं चुने गए मनमोहन सिंह लगातार ऐसा कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">मनमोहन सिंह उसी बाराक ओबामा के न्योते पर गए हैं, जिन्होंने राष्ट्रपति बनने के बाद एटमी करार पर नई शर्ते लादना शुरू कर दिया है। उन्होंने पहली शर्त यह लादी है कि भारत एटमी कचरे की रि-प्रोसेसिंग नहीं करने का वायदा करे और दूसरी शर्त यह लादी है कि एटमी परीक्षण नहीं करने का लिखित आश्वासन दे। जब एटमी करार पर संसद में बहस चल रही थी तो मनमोहन सिंह ने ताल ठोककर कहा था कि देश की सार्वभोमिकता को गिरवी रख कर करार नहीं किया जाएगा। उन्होंने संसद को भरोसा दिलाया था कि देश के एटमी परीक्षण करने के अधिकार सुरिक्षत रहेंगे। जबकि विपक्षी दल शुरू से अमेरिकी शर्तों की आशंका जाहिर कर रहे थे। मनमोहन सिंह एटमी करार को अपनी सबसे बडी उपलब्धि मानते हैं लेकिन जिस का डर था, वह हमारे सामने आ गया है। एटमी करार करके भारत ने एटमी ताकत बनने का सपना हमेशा-हमेशा के लिये दफन कर दिया है। अमेरिका ने हमें परमाणु बम संपन्न देश का दर्जा नहीं दिया है, जिस कारण हमारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का दावा भी कमजोर पड़ गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्राध्यक्षों की विदेश यात्राएं कोई एक-दो दिन में तय नहीं होती। महीनों पहले तय होती है और उसी के अनुरूप तैयारियां शुरू हो जाती हैं। मनमोहन सिंह की अमेरिका यात्रा तय होने के बाद बाराक ओबामा ने अपना चीन का दौरा तय किया। चीन में बाराक ओबामा ने वहां के राष्ट्रपति के साथ मिलकर जो भारत विरोधी साझा बयान जारी किया है उस के जख्म अभी हरे हैं। मनमोहन सिंह उन्हीं हरे जख्मों के साथ ओबामा के दरबार में मौजूद हैं। अपने पिछले शासन काल में उन्होंने जार्ज बुश के साथ एटमी करार किया था तो अमेरिका की नीति चीन विरोधी थी। भारत के चीनपरस्त कम्युनिस्टों के एटमी करार विरोधी रुख का मुख्य कारण यही था। चीन भी इस करार को अपने खिलाफ मानता था इसलिए शुरू से उसने विरोध किया। एक धारणा यह थी कि एटमी करार से भारत को परमाणु ऊर्जा ईंधन की सप्लाई होगी, जिससे भारत में ऊर्जा की कमी खत्म होगी और विकास की गाड़ी चीन के बराबर दौड़ने लगेगी। चीनपरस्त भारतीय कम्युनिस्ट यह कतई नहीं चाहते कि भारत का विकास चीन की कीमत पर हो। यह अलग बात है कि मनमोहन सिंह ने एटमी करार के कूटनीतिक प्रभावों को नजरंदाज करके करार को नाक का सवाल बना लिया था, जबकि उसके सामरिक और कूटनीतिक नुकसान साफ दिखाई दे रहे थे, जिनका जिक्र ऊपर किया गया है। चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए जार्ज बुश एटमी करार का इस्तेमाल कर रहे थे। लेकिन बाराक ओबामा के राष्ट्रपति बन जाने के बाद अमेरिकी कूटनीति में आश्चर्यजनक बदलाव देखने को मिल रहे हैं। सबसे पहला बदलाव अमेरिका की चीन कूटनीति में दिखाई दे रहा है। राष्ट्रपति ओबामा ने जार्ज बुश और बिल क्लिंटन की तिब्बत नीति को बदलकर चीन का समर्थन कर दिया है। भारतीय जनता भले ही तिब्बत के लिए भावुक हो और दलाई लामा का तहेदिल से समर्थन करती हो। लेकिन बाराक ओबामा की तिब्बत नीति भारत सरकार की नीति से भिन्न नहीं है। तिब्बत स्वायत्तता को भारतीय नैतिक समर्थन के बावजूद भारत सरकार ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया है। नेहरू के बाद राजीव और फिर वाजपेयी और मनमोहन ने भी ऐसा किस सौदेबाजी में किया है यह भारतीय जनमानस को अभी नहीं बताया गया। सरकार ने तिब्बत को चीन का हिस्सा इसके बावजूद बताया कि चीन हमारी 90000 किलोमीटर जमीन पर कब्जा किए हुए है।</p>
<p style="text-align: justify;">बाराक ओबामा सिर्फ तिब्बत को चीन का हिस्सा बताते तो गनीमत था, हमारे लिए एतराज करने वाली कोई बात नहीं थी। लेकिन उन्होंने भारत-पाक संबंधों को सुधारने का ठेका चीन को देने का एलान किया है, यह सीधे-सीधे भारतीय सार्वभोमिकता में दखल है। बाराक ओबामा की भारत पर दादागिरी की हिम्मत एटमी करार के कारण ही पैदा हुई है। यह अधिकार तो संयुक्त राष्ट्र को भी नहीं है कि वह बिना हमारी सहमति के किसी तीसरे देश को बिचौला बनने का अधिकार दे। राष्ट्रपति पद के चुनाव में बाराक ओबामा ने कश्मीर में जो दिलचस्पी दिखाई थी, वह उसी के अनुरूप काम करते दिखाई दे रहे हैं। तब उनका इरादा कश्मीर समस्या हल करने के लिए अमेरिकी प्रतिनिधि नियुक्त करने का था। वह तो उन्होंने अभी नहीं किया, लेकिन चीनी प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया है। कश्मीर में चीन की दिलचस्पी उतनी ही है, जितनी पाकिस्तान की। पाकिस्तान की कश्मीर में दिलचस्पी धार्मिक आधार पर है, लेकिन चीन की दिलचस्पी सामरिक कारणों से है। कश्मीर पर चीन की ललचाई नजर से भारत पूरी तरह वाकिफ है। पाक ने अपने कब्जे वाले कश्मीर का काफी हिस्सा कराकोरम मार्ग के लिए चीन को सौंप दिया था। जिस भारतीय कश्मीर का एक हिस्सा चीन ने हड़प रखा है, उस कश्मीर का विवाद निपटाने के लिए चीन को कहना निश्चित रूप से अमेरिका का भारत विरोधी कदम है। हाल ही में चीन की ओर से कश्मीरी नागरिकों को भारतीय पासपोर्ट की बजाए सादे कागज पर वीजा दिया जाना और अब चीन का कश्मीर में मध्यस्थ बनने की कोशिश भारत विरोधी अंतरराष्ट्रीय साजिश की ओर इशारा करते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">अमेरिका के पास अब इस बात के ठोस सबूत हैं कि पाकिस्तान के सभी परमाणु परीक्षण चीन की ओर से दिए गए यूरोनियम से हुए थे। पाक के परमाणु वैज्ञानिक ए.क्यू. खान ने अब इसे जगजाहिर भी कर दिया है। पाकिस्तान मूल के कनोडियन नागरिक तहाब्बुर हुसैन राणा और पाक मूल के ही अमेरिकी नागरिक डेविड कोलमन हेडली की गिरफ्तारी के बाद अमेरिका को यह सबूत भी मिल चुके हैं कि भारत पर 26/11 के आतंकवादी हमले की साजिश में पाकिस्तानी फौज और गुप्तचर एजेंसी आईएसआई भी शामिल थी। सिर्फ भारत के खिलाफ नहीं, अलबत्ता दुनियाभर के आतंकवाद के पीछे पाकिस्तान के तार जुड़ने के सबूत मिलने लगे हैं। अब तो अमेरिका को इस बात के भी सबूत मिल चुके हैं कि अफगानिस्तान के तालीबानी नेता मुल्ला उमर को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने सुरक्षित कराची पहुंचा दिया है। ताकि वह बलूचिस्तान में अमेरिकी ड्रोन हमलों का निशाना न बन सके। इन सब सबूतों के बावजूद ओबामा प्रशासन का पाकिस्तान को आर्थिक मदद बरकरार रहना आश्चर्यजनक है। कश्मीर मसले पर अमेरिका की दिलचस्पी साफ दर्शाती है कि दुनियाभर के लिए खतरा बन रहे पाक के प्रति उसका रुख अभी भी नरम बना हुआ है। इसका मतलब यह भी निकलता है कि अमेरिका पहले तो सिर्फ पाकिस्तान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा था, अब उसका चीन को भी भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने का इरादा है। पाक सरकार ओबामा प्रशासन को यह यकीन दिलाने में कामयाब होती दिखाई दे रही है कि जब तक कश्मीर समस्या का हल नहीं होगा, वह आतंकवाद को नहीं रोक सकती। ओबामा प्रशासन पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आईएसआई, पाक फौज और पाक प्रशासन के आतंकवादियों को सहयोग के ठोस सबूतों के बावजूद उसके दबाव में काम रहा है। जबकि कश्मीर समस्या पाकिस्तान की आतंकवाद नीति का एक छोटा सा हिस्सा है। दूसरी तरफ चीन में ओबामा का कश्मीर पर बोलना भारत सरकार की कूटनीतिक विफलता का भी सबूत है। भारत ने ओबामा के स्टैंड का विरोध जरूर किया है लेकिन प्रधानमंत्री अपनी अमेरिका यात्रा टालकर कड़ा विरोध कर सकते थे। ओबामा ने मनमोहन सिंह की अमेरिका यात्रा से ठीक पहले कश्मीर मुद्दा उठा कर उन लोगों को करारा झटका दिया है जो अमेरिका को भारत का नया अंतरराष्ट्रीय साथी मानने लगे थे।</p>
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		<title>भाजपा की गुटबाजी संघ का सिरदर्द</title>
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		<pubDate>Mon, 16 Nov 2009 08:01:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[नितिन गडकरी को भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाने के पीछे संघ की दलील यह है कि पार्टी के सभी मौजूदा राष्ट्रीय नेता गुटबाजी में शामिल हैं। हालांकि राजनाथ सिंह को जब पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था तब वह गुटबाजी की राजनीति का शिकार नहीं थे। लेकिन उनके चार साल के कार्यकाल में पार्टी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">नितिन गडकरी को भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाने के पीछे संघ की दलील यह है कि पार्टी के सभी मौजूदा राष्ट्रीय नेता गुटबाजी में शामिल हैं। हालांकि राजनाथ सिंह को जब पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था तब वह गुटबाजी की राजनीति का शिकार नहीं थे। लेकिन उनके चार साल के कार्यकाल में पार्टी भयंकर रूप से गुटबाजी की शिकार हुई है। इस गुटबाजी का पहला कारण यह था कि राजनाथ सिंह ने पार्टी के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी को साथ लेकर चलने की जहमत नहीं उठाई। संघ ने क्योंकि लालकृष्ण आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने की मुहिम छेड़ी थी इसलिए राजनाथ सिंह यह मानकर चल रहे होंगे कि संघ लालकृष्ण आडवाणी को पसंद नहीं करता। राजनाथ सिंह ने संघ की इच्छा मानकर आडवाणी की अनदेखी और उनके समर्थकों को प्रमुख पदों से हटाने की मुहिम छेड़ दी थी। राजनाथ सिंह यहीं पर भूल कर गए, <span id="more-1362"></span>संघ अगर आडवाणी को इस हद तक नापसंद करता तो उन्हें विपक्ष का नेता भी नहीं रहने देता। मुझे याद है राजनाथ सिंह को अध्यक्ष बनाने का फैसला हो गया था और उस का ऐलान भाजपा के मुंबई अधिवेशन के समापन पर होना था। तब अधिवेशन के लिए दिल्ली से मुंबई जाते हुए आडवाणी के घोर विरोधी मुरली मनोहर जोशी ने शिगूफा छोड़ा था कि वह लोकसभा में विपक्ष के नेता भी नहीं रहेंगे। उनका तर्क था कि जब संघ ने वाजपेयी और आडवाणी दोनों को उनकी उम्र को आधार बनाकर पद छोड़ने का दबाव बनाया है तो वह विपक्ष के नेता पद पर भी कैसे रहेंगे। लेकिन मुरली मनोहर जोशी के समझने में चूक हो गई, इसीलिए मुंबई जाकर उन्हें अपने कहे से पीछे हटना पड़ा। लालकृष्ण आडवाणी पूरे पांच साल विपक्ष के नेता भी बने रहे और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी घोषित हुए। भाजपा संसदीय बोर्ड की ओर से आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने पर उन्हीं मुरली मनोहर जोशी ने भाजपा मुख्यालय में आडवाणी के मुंह में बर्फी डालकर अपनी झेंप मिटाई थी। इस मौके पर आडवाणी को मिठाई खिलाने वाले दूसरे नेता जसवंत सिंह भी मौजूद थे, जिन्होंने वाजपेयी के कार्यकाल में ही खुद को उनका उत्तराधिकारी बनने के लेख छपवाने शुरू कर दिए थे।</p>
<p style="text-align: justify;">जो गलती आडवाणी के अध्यक्ष पद छोड़ने से पहले मुरली मनोहर जोशी ने की थी वहीं गलती राजनाथ सिंह ने अध्यक्ष पद संभालने के बाद शुरू कर दी थी। भाजपा कार्यकर्ताओं में सर्वाधिक लोकप्रिय नरेंद्र मोदी को संसदीय बोर्ड से हटाया जाना गुटबाजी की शुरुआत साबित हुआ। नरेंद्र मोदी को हटाए जाने की कोई वाजिब वजह भी नहीं थी। राजनाथ सिंह का यह तर्क तो किसी के गले नहीं उतरा था कि जब बाकी मुख्यमंत्री संसदीय बोर्ड में नहीं है, तो मोदी क्यों रहे। राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी को हटाकर अपना ही नुकसान किया। मोदी को हटाए जाने से राजनाथ सिंह पिछड़ा वर्ग विरोधी ठाकुर नेता के तौर पर स्थापित हो गए। राजनाथ सिंह का यह कदम आडवाणी विरोधी और संघ को खुश करने वाला भी माना गया क्योंकि उन दिनों संघ का एक प्रभावशाली गुट विश्व हिंदू परिषद के दबाव में मोदी के खिलाफ था। राजनाथ सिंह का दूसरा कदम अरुण जेतली को पार्टी प्रवक्ता पद से हटाने का था, यह कदम भी सीधे तौर पर आडवाणी गुट पर हमला माना गया। अपने शुरुआती कार्यकाल में ही राजनाथ सिंह ने अपनी छवि गुटबाजी को बढ़ावा देने वाले अध्यक्ष के तौर पर बना ली थी। जो उसके कार्यकाल खत्म होने तक बनी रही। कर्नाटक, उत्तराखंड और राजस्थान की गुटीय राजनीति में राष्ट्रीय अध्यक्ष का शामिल हो जाना उनके कार्यकाल का सबसे कमजोर पक्ष रहा। हालांकि कर्नाटक के मामले में राजनाथ सिंह का येदुरप्पा की पीठ पर हाथ रखना सही कदम था, क्योंकि अनंत कुमार के हाथ में नेतृत्व सौंप कर भाजपा कभी भी सत्ता में नहीं आ सकती थी। अनंत कुमार जाति से ब्राह्मण हैं और कर्नाटक की मौजूदा राजनीति में ब्राह्मणों के नेतृत्व में कोई पार्टी सत्ता तक नहीं पहुंच सकती। चुनावों में टिकट बंटवारे के समय येदुरप्पा और प्रदेश अध्यक्ष सदानंद गौड़ा के हाथ में कमान सौंपना राजनाथ सिंह का सही फैसला साबित हुआ, जबकि आडवाणी गुट हर फैसले में अनंत कुमार की सहमति चाहता था। लेकिन वही राजनाथ सिंह जब उत्तराखंड में बेदाग छवि वाले मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूरी के खिलाफ भगत सिंह कोशियारी को हवा दे रहे थे या राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को उखाड़ने की कोशिश करने वालों से जुड़ा दिखते थे तो गुटबाजी को हवा देते दिखाई देते थे। किसी भी राष्ट्रीय राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष को न सिर्फ निष्पक्ष रहना चाहिए, अलबत्ता निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए। मुझे याद है कि जब राजनाथ सिंह ने अपनी पहली टीम बनाई थी तो वह लालकृष्ण आडवाणी को दिखाने ले गए थे, लेकिन आडवाणी ने उसे देखने से इनकार कर दिया था क्योंकि वह पहले ही प्रैस में लीक हो गई थी। जब आडवाणी ने लिस्ट नहीं देखी, तो राजनाथ सिंह उसे उनके मेज पर छोड़ गए थे, ताकि बाद में देख लें।</p>
<p style="text-align: justify;">सवाल यह है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का पहला प्रयोग विफल हो जाने के बाद दूसरा प्रयोग भी वैसा ही क्यों किया जा रहा है। राजनाथ सिंह भले ही पसंद पूर्व सरसंघ चालक के.एस. सुदर्शन की थे, लेकिन उन्हें चुना पार्टी ने ही था। अब नितिन गडकरी नए संघ प्रमुख मोहन भागवत की पसंद हैं, लेकिन उन्हें चुनेगी पार्टी ही। सवाल यह है कि संघ ऐसा क्यों कर रहा है, क्या ऊपर से अध्यक्ष लादा जाना भारतीय जनता पार्टी के हित में होगा। पूर्व का अनुभव बताता है कि यह नुकसानदायक साबित होगा। भले ही भाजपा संगठन की नकेल हमेशा से आरएसएस के हाथ में रही है लेकिन ऐसा पहले कभी नहीं होता था कि राष्ट्रीय अध्यक्ष का फैसला बिना राष्ट्रीय नेताओं से सलाह-मशविरा किए ही हो जाए। पार्टी के वरिष्ठ नेता जानते हैं कि के.एस. सुदर्शन ने राजनाथ सिंह के नाम पर फैसले से पहले पार्टी के सभी नेताओं को बुलाकर सुझाव मांगे थे। उन्हीं मे से राजनाथ सिंह का नाम उभरा था, जिस पर अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की भी सहमति हुई थी। सिर्फ कल्याण सिंह उन्हें अध्यक्ष बनाने के खिलाफ थे और संघ प्रमुख ने उन्हें भरोसे में लेने की जिम्मेदारी राजनाथ सिंह पर छोड़ी थी। झंडेवाला से निकलने के बाद राजनाथ सिंह ने वाजपेयी और आडवाणी का आशीर्वाद लिया था और कल्याण सिंह से फोन पर बात करके उन्हें उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री प्रोजैक्ट कर के चुनाव लड़ने का ऐलान किया था। इस तरह शुरुआत तो गुटबाजी से ऊपर उठकर हुई थी, लेकिन राजनाथ सिंह का कार्यकाल पार्टी की गुटबाजी के चरम पर पहुंचने के लिए याद किया जाएगा।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा लगता है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने 55 से 60 की उम्र और प्रादेशिक नेता को अध्यक्ष बनाने का फार्मूला पिछले अनुभव से सबक लेते हुए दिया था। पिछले दिनों कुछ पत्रकारों के साथ दोपहर भोज में मोहन भागवत ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने 55 से 60 तक उम्र का फार्मूला राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए नहीं, अलबत्ता राष्ट्रीय टीम की औसत उम्र रखने के लिए सुझाया था। इसलिए इस बार अगर 52 साल के नितिन गडकरी को पार्टी का अध्यक्ष बनाया जाता है तो अगला अध्यक्ष 60 से ऊपर उम्र का भी हो सकता है।  नितिन गडकरी को अघ्यक्ष बनाने के पीछे सबसे बड़ा तर्क पार्टी को सर्वोच्च स्तर पर व्याप्त गुटबाजी से निकालने की कोशिश है। भले ही नितिन गडकरी चारों बड़े राष्ट्रीय नेताओं वैंकैया नायडू, अरुण जेतली,  सुषमा स्वराज और अनंत कुमार से छोटे हैं। अलबत्ता भाजपा के सबसे ज्यादा लोकप्रिय मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से भी काफी छोटे हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यकाल क्योंकि तीन साल का होता है, इसलिए 2014 के लोकसभा चुनाव से करीब डेढ़ साल पहले नया अध्यक्ष चुना जाएगा। उस समय चुनावों से ठीक पहले अगर नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का फैसला करना पड़ा तो उम्र का फार्मूला बाधा नहीं बनेगा। सुषमा स्वराज और अरुण जेतली के विपक्ष का नेता बन जाने के बाद इन दोनों की तो संगठन में ज्यादा दिलचस्पी भी नहीं रहेगी। संघ मुख्यालय नागपुर निवासी नितिन गडकरी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के पीछे मुख्य तर्क यह है कि वह राष्ट्रीय नेताओं की गुटबाजी से पूरी तरह मुक्त हैं, भले ही उनका राष्ट्रीय कद नहीं है। पार्टी और संघ के सामने समस्या यह है कि राष्ट्रीय कद के सभी नेता गुटबाजी के शिकार हैं। दूसरे दर्जे के चारों ही राष्ट्रीय नेता लालकृष्ण आडवाणी के करीबी माने जाते हैं, उनमें से कोई भी अध्यक्ष बनता वह पूर्वाग्रही होए बिना नहीं रहता। इसलिए गुटबाजी और बढ़ाने का खतरा होता। नितिन गडकरी वैसे भी प्रमोद महाजन की तरह अच्छे संगठनकर्ता और जुगाड़ृ माने जाते हैं। उन्होंने विदर्भ में भाजपा को स्थापित करने में सफलता हासिल करके नेतृत्व देने की क्षमता का लोहा मनवाया है। आरएसएस ने नितिन गडकरी के नाम का सुझाव देते समय भले ही भाजपा के किसी गुट से सलाह-मशविरा नहीं किया। जिस कारण अंदर ही अंदर असंतोष व्याप्त है, लेकिन पार्टी को चलाने वाले संगठन मंत्रियों को भरोसे में लेकर किया गया फैसला है। नितिन गडकरी अध्यक्ष बनते हैं और अध्यक्ष बनने के बाद गुटबाजी से मुक्त रहते हैं तो पार्टी के गुटबाजी मुक्त होने की संभावना बढ़ जाएगी। निकट भविष्य में आडवाणी की जगह सुषमा स्वराज लोकसभा में विपक्ष की नेता बनती हैं तो पार्टी की नई तिकड़ी सुषमा, अरुण, गडकरी की होगी। लेकिन एक खतरा है पूरा नेतृत्व ब्राह्मणों के हाथ में होगा, तीनों ब्राह्मण हैं। तब नरेंद्र मोदी ही भविष्य का विकल्प बनेंगे।</p>
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		<title>महाराष्ट्र-कर्नाटक राजनीतिक गिरावट का आईना</title>
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		<pubDate>Sun, 08 Nov 2009 22:23:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[
कर्नाटक, महाराष्ट्र और हरियाणा तीनों राज्यों के उदाहरण हमारे सामने हैं। सियासत किस तरह व्यापारिक हितों की सीढ़ी बन चुकी है। हरियाणा में वक्त तय होने के बाद भी इसलिए शपथ ग्रहण नहीं हो सका क्योंकि सौदेबाजी सिरे नहीं चढ़ सकी। महाराष्ट्र में चुनाव नतीजे आने के चौदहवें दिन तक मलाईदार विभागों का लेन-देन सिरे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>कर्नाटक, महाराष्ट्र और हरियाणा तीनों राज्यों के उदाहरण हमारे सामने हैं। सियासत किस तरह व्यापारिक हितों की सीढ़ी बन चुकी है। हरियाणा में वक्त तय होने के बाद भी इसलिए शपथ ग्रहण नहीं हो सका क्योंकि सौदेबाजी सिरे नहीं चढ़ सकी। महाराष्ट्र में चुनाव नतीजे आने के चौदहवें दिन तक मलाईदार विभागों का लेन-देन सिरे नहीं चढ़ा। इसलिए नई सरकार का गठन होने में देर लगी। कर्नाटक में भाजपा के ही कुछ मंत्रियों ने अपने आर्थिक हितों में रुकावट बनने वाली सरकार को तलवार की धार पर लाकर खड़ा कर दिया।</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">अगर महाराष्ट्र में गैर कांग्रेसी सरकार बननी होती तो वहां गवर्नर की सिफारिश से राष्ट्रपति राज लग गया होता। उत्तर प्रदेश में रोमेश भंडारी और बिहार में बूटा सिंह ने ऐसा ही किया था। अफसोस यह है कि मलाईदार मंत्रालयों का लेन-देन खुलेआम हो रहा है और संविधान का कोई ऐसा प्रावधान नहीं है जो लूट-खसूट को रोक सके। इस लूट-खसूट को सिर्फ गवर्नर ही रोक सकता है, लेकिन गवर्नर अपने राजनीतिक आकाओं के इशारों पर काम करने के आदी हो गए हैं। अपने पूर्व राजनीतिक आकाओं को खुश करते रंगे हाथों पकड़े गए रामलाल ठाकुर, रोमेश भंडारी, बूटा सिंह सुप्रीम कोर्ट की डांट फटकार सह चुके हैं। इसके बावजूद गवर्नरों की कार्यशैली में कोई सुधार नहीं दिखता। <span id="more-1349"></span>पिछली विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने या नई विधानसभा का गठन होने से मुख्यमंत्री के कार्यकाल का कानूनी संबंध कितना है। यह कानूनी मत्थापच्ची अपनी जगह है, लेकिन अशोक चव्हाण 23 अक्टूबर को नई विधानसभा गठन के चौदहवें दिन तक बिना दुबारा शपथ लिए मुख्यमंत्री बने हुए थे। कुछ कानूनविदों का मत है कि उनका दुबारा शपथग्रहण होना चाहिए था लेकिन न कांग्रेस इस मत की थी, न कांग्रेसी गवर्नर एस सी जमीर। आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के देहांत के बाद रोसैया को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाकर भी तीन दिन तक पुराना मंत्रिमंडल काम करता रहा। जबकि यह पूरी तरह असंवैधानिक था, गवर्नर इस मत के थे कि मंत्रियों के दुबारा शपथ ग्रहण की जरूरत नहीं। जबकि जब कोई नया मुख्यमंत्री शपथ लेता है तो पुराना मंत्रिमंडल अपने आप खत्म हो जाता है। जिस तरह मुख्यमंत्री के इस्तीफे से मंत्रिमंडल खत्म हो जाता है, उसी तरह मुख्यमंत्री के देहांत पर भी उसका मंत्रिमंडल खत्म होगा। कानूनविदों की राय पर जब आंध्र के मंत्रियों को दुबारा शपथ दिलाई गई तो कांग्रेस ने लालबहादुर शास्त्री के देहांत का उदाहरण देकर बताया कि गुलजारी लाल नंदा ने ही प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, उनके मंत्रियों ने नहीं। कांग्रेस की प्रवृत्ति राष्ट्रपति, राज्यपालों, न्यायाधीशों और चुनाव आयुक्तों का मनमर्जी से इस्तेमाल करने की रही है। इसी का उदाहरण महाराष्ट्र में देखने को मिला जब राज्यपाल के सामने मलाईदार मंत्रालयों के लेन-देन पर झगड़ा चल रहा था और वह हाथ-पर-हाथ धरे बैठे थे।</p>
<p style="text-align: justify;">कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बारे में एक धारणा है कि वह भ्रष्ट नेताओं को बर्दाश्त नहीं करती, न ही उन्हें ज्यादा चतुर चालाक नेता पसंद हैं। इसीलिए उन्होंने प्रणव मुखर्जी, अर्जुन सिंह या एनडी तिवारी जैसे दिग्गजों की जगह राजनीति के अनाड़ी मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। मनमोहन सिंह की कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी, और प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री ऐसा ही होना चाहिए जिसके सामने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं, अलबत्ता जनता की सेवा और प्रशासन में सुधार का जज्बा हो। आंध्र प्रदेश में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के चलते जगनमोहन रेड्डी मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। सोनिया गांधी ने मुख्यमंत्री पद को जागीर समझने वाले जगनमोहन रेड्डी की जगह महत्वाकांक्षा नहीं रखने वाले रोसैया को मुख्यमंत्री पद की कुर्सी सौंप दी। तेल के बदले अनाज घोटाले में नटवर सिंह का नाम आने और उसके दस्तावेजी सबूत सामने आने के बाद सोनिया गांधी ने पुराने पारिवारिक रिश्तों को किनारे करके नटवर सिंह को मंत्री पद से हटवा दिया था। पिछली यूपीए सरकार में तीन मंत्री भ्रष्टाचार के आरोपों में बहुत बदनाम हुए थे। इनमें कांग्रेस के कमलनाथ भी थे, लेकिन सोनिया गांधी ने उन्हें वाणिज्य मंत्रालय से हटाकर सड़क परिवहन मंत्रालय दे दिया। साथ में यह संदेश भी स्पष्ट था कि पिछले सड़क परिवहन मंत्री टीआर बालू को भी इसी कारण दुबारा मंत्री नहीं बनाया गया है। एक तरह से यह कमलनाथ के लिए चेतावनी था। टीआर बालू को मंत्री नहीं बनाना लेकिन मजबूरी में ए राजा को मंत्री बनाना आज भी कांग्रेस अपने गले की हड्डी मानती है। उन पर संचार मंत्रालय में भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं तो प्रधानमंत्री उनका बचाव करते हुए भी सीबीआई का छापा पड़ने से नहीं रोकते। इस बार लालू यादव और शिबू सोरेन को मंत्रिमंडल से बाहर रखकर सोनिया गांधी ने यह बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि पिछली सरकार में इनको मंत्री बनाना उनकी राजनीतिक मजबूरी थी। इसी तरह मधु कोड़ा कांग्रेस के समर्थन से ही दो साल तक झारखंड के मुख्यमंत्री थे। मुख्यमंत्री पद से हटने के बावजूद लगातार सोनिया गांधी से मेल-मुलाकातें कर रहे थे। वह अभी भी केंद्र की यूपीए सरकार को एमर्थन दे रहे थे, लेकिन उनका भ्रष्टाचार उजागर होने के बाद सोनिया गांधी उनके बचाव में नहीं उतरी। भले ही मधु कोड़ा के भ्रष्टाचार से खुद कांग्रेस को भी कटघरे में खड़ा होना पड़ रहा है। इन दो उदाहरणों के बावजूद महाराष्ट्र के कांग्रेसी मंत्री और खुद सोनिया के सलाहकार मलाईदार मंत्रालयों के लिए अड़े हुए थे। इससे भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस के दोहरापन की झलक दिखती है।</p>
<p style="text-align: justify;">राजनीतिक जीवन में शुध्दता को लेकर देश की दूसरी बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा भी दूध की धुली हुई नहीं है। जिस मधु कोड़ा की अपन ऊपर बात कर रहे थे, वह भाजपा परिवार की ही राजनीतिक पैदाइश हैं। मधु कोड़ा पहली बार भाजपा के ही विधायक और मंत्री बने थे, दूसरी बार टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय लड़कर जीते और कांग्रेस की मदद से मुख्यमंत्री बने। लेकिन इससे पहले भाजपा की सरकार बनवाकर उसमें मंत्री बने थे। दो-दो बार भाजपा सरकार में मंत्री बनने पर ही कोड़ा के मुंह में खून लगा होगा। सवालों के बदले पैसा लेने वाले स्टिंग आपरेशन में भी भाजपा के ही ज्यादा सांसद फंसे थे। इसलिए भाजपा खुद को अलग पार्टी होने का दावा नहीं कर सकती। कम से कम कर्नाटक की घटना के बाद तो कतई नहीं कह सकती, जहां उनके दो मंत्री अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए सरकार को बंधक बनाकर बैठे थे, तो पार्टी आलाकमान उनको लूट-खसूट जारी रखे देने का रास्ता निकाल रहा था। मकसद था किसी न किसी तरह सरकार चलती रहे, भले ही उनके मंत्री दोनों हाथों से लूटते रहें। बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं ने भाजपा के उन 52 विधायकों को बंधक बनाकर पार्टी आलाकमान को ब्लैकमेल किया, जो उनसे आर्थिक लाभ उठा रहे थे। येदुरप्पा को स्थाई मुख्यमंत्री बनाने के लिए कांग्रेसी विधायकों को खरीदकर इस्तीफा करवाने वाले रेड्डी बंधु कीमत वसूलना अपना हक तो समझेंगे ही। भाजपा आलाकमान उस समय बेहद खुश था जब रेड्डी बंधु कांग्रेस के विधायक तोड़-तोड़कर ला रहे थे। भाजपा तब कांग्रेस से अलग होने का दावा कर सकती थी, अगर वह सरकारी ठेकों को अपना हक समझने वाले रेड्डी बंधुओं के दबाव में आने की बजाए पहले ही दिन अपनी सरकार को कुर्बान करने का ऐलान कर देती।</p>
<p style="text-align: justify;">देश की दोनों बड़ी पार्टियों के नेताओं में ज्यादा से ज्यादा पैसा इकट्ठा करने की होड़ लगी हुई है। दोनों पार्टियों के नेता अपनी सरकारों को पैसा बनाने की मशीनों की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। कोई मलाईदार विभागों के लिए जद्दोजहद कर रहा है, तो कोई सरकारी ठेकों में अड़चन बनने वाली अपनी ही सरकार को बंधक बनाने में परहेज नहीं कर रहा। सरकारें अब सुशासन का जरिया नहीं रही, न राजनीति समाजसेवा का मकसद रह गया है।</p>
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		<title>दलाईलामा के अरुणाचल दौरे का मतलब</title>
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		<pubDate>Mon, 02 Nov 2009 08:14:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
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क्या मौजूदा 14वें दलाईलामा इतिहास को उसी मोड़ पर लाने की सोच रहे हैं जहां से पांचवें दलाईलामा ने सत्ता संभालने की शुरूआत की थी। क्या वह अपने इसी तवांग दौरे के दौरान ऐसा ऐतिहासिक ऐलान करने की सोच रहे हैं, जैसी चीन की आशंका है।

आठ नवंबर का दिन जैसे-जैसे करीब आ रहा है, अरुणाचल [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>क्या मौजूदा 14वें दलाईलामा इतिहास को उसी मोड़ पर लाने की सोच रहे हैं जहां से पांचवें दलाईलामा ने सत्ता संभालने की शुरूआत की थी। क्या वह अपने इसी तवांग दौरे के दौरान ऐसा ऐतिहासिक ऐलान करने की सोच रहे हैं, जैसी चीन की आशंका है।</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">आठ नवंबर का दिन जैसे-जैसे करीब आ रहा है, अरुणाचल का सुरक्षा घेरा उतना ही बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ से मुलाकात के बाद भारत-चीन में तनाव कुछ कम हुआ है, लेकिन इसका असर अरुणाचल में दिखाई नहीं देता। जैसे-जैसे दलाई लामा के अरुणाचल पहुंचने की तारीख नजदीक आ रही है, वहां के लोगों में दहशत फैल रही है। दलाईलामा के दौरे को लेकर अरुणाचल के लोग उत्साह से भरे हैं, उनके स्वागत की तैयारियां हो रही हैं, लेकिन एक डर भी समाया हुआ है कि कहीं उस दिन चीन अक्टूबर 1962 की याद ताजा न कर दे। <span id="more-1346"></span>अक्टूबर 1962 में जम्मू कश्मीर के अक्साइचिन पर दावा ठोकते हुए चीन ने जब भारत पर हमला किया था, तो करीब-करीब पूरे अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा कर लिया था। अरुणाचल के लोगों ने तब चीनी फौज से बचने के लिए जंगलों में शरण ली थी। जब तक चीनी फौज अरुणाचल से वापस नहीं लौटी थी, तब तक वे जंगल से नहीं लौटे थे। इस जंग में भारत के 3250 और चीन के एक हजार जवान मारे गए थे। चीन अरुणाचल से तो वापस चला गया लेकिन अक्साइचिन पर अभी भी उसका कब्जा बना हुआ है। दलाईलामा आठ नवंबर को एक हफ्ते के लिए अरुणाचल के तवांग कस्बे में जा रहे हैं। वह 2003 में भी वहां गए थे, लेकिन इस बार चीन उनके तवांग दौरे से बेहद घबराया हुआ है। दलाईलामा एक हफ्ते तक 40 हजार आबादी वाले तवांग शहर के तीन सौ साल पुराने बौध्द मठ में ठहरेंगे। इस बौध्द मठ को तिब्बत के ल्हासा स्थित पोटला पैलेस स्थित इसके मठ के बाद दूसरे नंबर का महत्व दिया जाता है। तवांग से मैकमोहन रेखा सिर्फ 35 किलोमीटर की दूरी पर है, जिसे भारत अपनी सीमा मानता है, लेकिन चीन नहीं मानता। चीन की भारत के साथ सीमा कभी नहीं थी, भारत की सीमा तिब्बत के साथ लगती थी। चीन ने 1951 में तिब्बत को हड़पना शुरू किया, 1959 में जब पोटला पैलेस पर चीनी फौज ने चढ़ाई कर दी तो दलाईलामा ने अपने 80 हजार अनुयाईयों के साथ इसी रास्ते से होते हुए भारत में प्रवेश किया था। इसलिए चौदहवें दलाईलामा तेंजिन ग्यात्सो का अरुणाचल प्रदेश के तवांग से गहरा रिश्ता है।</p>
<p style="text-align: justify;">तवांग ही नहीं पूरे अरुणाचल प्रदेश में बौध्द धर्म के अनुयाई ही रहते हैं, इसलिए दलाईलामा का आगमन उनके लिए जीवन की सुखद घड़ी होगी, लेकिन चीनी हमले का डर उनके मन पर समाया हुआ है। शुरू में ऐसा लगता था कि चीन के कड़े विरोध के कारण प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दबाव में आ जाएंगे और दलाईलामा को दौरा टालने या रद्द करने की सलाह दी जाएगी। अब जबकि सिर्फ पांच दिन बाकी बचे हैं और प्रधानमंत्री ने स्पष्ट स्टैंड ले लिया है कि दलाईलामा को भारत में कहीं भी जाने से नहीं रोका जाएगा तो उनका दौरा रद्द होने की आशंका खत्म हो गई है। चीन ने सिक्किम को तो भारत का हिस्सा मान लिया है, लेकिन अरुणाचल प्रदेश पर दावा नहीं छोड़ने की वजह तवांग का प्राचीन बौध्द मठ है, जिसे तिब्बती दूसरे धार्मिक स्थल का दर्जा देते हैं। दलाईलामा के 2003 के तवांग दौरे का चीन ने इतने जोर-शोर से विरोध नहीं किया था, जितना इस बार कर रहा है, इसकी वजह दलाईलामा की ओर से अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किए जाने की आशंका है। चीन दलाईलामा के इस बयान से भयभीत हैं कि वह अपने जीते जी अपना उत्तराधिकारी तैनात कर सकते हेँ। दलाईलामा की परंपरागत नियुक्ति उत्तराधिकारी की तैनाती से नहीं होती, अलबत्ता दलाई लामा की मौत के बाद होती है। जिसमें विभिन्न संकेतों और सपनों को आधार बनाकर दलाईलामा का पुनर्जन्म होना माना जाता है, खुद तेंजिन ग्यात्सों की चौदहवें दलाईलामा के रूप में तैनाती भी 1937 में इसी तरह हुई थी, तब वह सिर्फ दो साल के थे। अब चौहत्तर साल के दलाईलामा तिब्बत की आजादी को लेकर बेहद चिंतित हैं, उन्हें लगता है कि दूसरी निर्वासित पीढ़ी के सब्र का प्याला भर गया है और वह हिंसक हो सकती है। असल में दलाईलामा को यह आभास 2007 में होना शुरू हो गया था, उन्होंने अपने जापान दौरे के दौरान एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा था कि वह अपने जीवन में अपना उत्तराधिकारी तैनात कर सकते हैं। तब से दलाईलामा चुनने की प्रक्रिया बदलने पर तरह-तरह की अटकलें लग रही हैं। अटकलें ये हैं कि वह खुद अपना उत्तराधिकारी चुनेंगे या चुनाव की पध्दति अपनाएंगे, जैसे ईसाई धर्म में पोप का चयन किया जाता है। या फिर वह बौध्द धर्मावलंबियों से जनमत संग्रह करवाएंगे कि दलाईलामा पद को आगे चलने भी दिया जाए या नहीं। अगर चलने दिया जाए तो पुनर्जन्म की पुरानी पध्दति कायम रखी जाए या आधुनिक जरूरतों के मुताबिक उसे बदला जाए। असल में दलाईलामा के मन में डर समाया हुआ है कि उनके निर्वाण के बाद चीन सरकार अपने तैनात किए पंचेन लामा से कोई चीन समर्थक दलाईलामा घोषित न करवा दे।</p>
<p style="text-align: justify;">तिब्बती बौध्द धर्म गुरु पद दलाईलामा पर कब्जा करना चीन का पहला लक्ष्य बना हुआ है। इस रणनीति के तहत चीन ने पिछले साल ऐलान किया है कि भविष्य में बुध्द के अवतारों की नियुक्ति चीन सरकार की इजाजत के बिना नहीं होगी, इनमें सर्वोच्च दलाईलामा पद भी शामिल है। चीन सरकार के इस साजिश भरे ऐलान के बाद दलाईलामा ने नवंबर 2008 में निर्वासित सरकार के मुख्यालय हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में सरकार का विशेष सत्र बुलाया। इसमें दलाईलामा ने कहा कि मध्यमार्ग अपनाकर चीन के भीतर स्वायत्त तिब्बत की बात शुरू करनी चाहिए। अगर चीन के साथ मध्यमार्ग की बातचीत विफल हो जाए तभी संपूर्ण आजादी का आंदोलन शुरू किया जाना चाहिए। दलाईलामा ने कहा कि चीन अगर स्वायत्ता को राजी नहीं होता तो संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को आधार बनाकर तिब्बतियों को अपना फैसला खुद करने का हक मांगा जाए। लेकिन सम्मेलन में दलाईलामा के इस मत के विरोध में आवाज उठी थी। तिब्बत की आजादी के लिए मचल रहे युवकों में व्याप्त आक्रोश को जानते समझते हुए ही दलाईलामा ने कदम-दर-कदम आजादी के आंदोलन को नए सिरे से खड़ा करने की बात कहीं थी। दलाईलामा एक तरफ तिब्बती युवाओं में बढ़ते आक्रोश से चिंतित हैं, तो दूसरी तरफ बौध्द धर्म के आधारभूत ढांचे को तहश-नहश करने की चीनी साजिश से चिंतित है। इस साजिश का पहला प्रमाण तब मिला था जब दलाईलामा की ओर से घोषित छह वर्षीय ग्यारहवां पंचेनलामा गायब हो गया था। इसी का फायदा उठाकर चीन ने तिब्बत स्थित कम्युनिस्ट पार्टी के तिब्बती नेता के बेटे को ग्यारहवां पंचेनलामा घोषित कर दिया था। इसके बाद  पिछले साल बुध्द के अवतारों की नियुक्ति पर सरकार की मुहर लगवाने का फरमान जारी कर दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत ही नहीं चीन की निगाह भी दलाईलामा के सात दिवसीय तवांग दौरे पर लगी हुई है। चीन की आशंका है कि दलाईलामा तवांग को तिब्बत की आजादी का नया प्रेरणास्रोत बनाने की रणनीति अपना रहे हैं। उसे यह भी आशंका है कि दलाईलामा अपने तवांग दौरे के समय ही तीन सौ साल पुराने बौध्द मठ को तिब्बत का अस्थाई राजभवन न घोषित कर दें। सत्रहवां करमापा दोरजी नौ साल पहले तवांग के रास्ते से ही तिब्बत से भागकर भारत में प्रवेश किया था। करमापा के तिब्बत छोड़ने पर चीन को गहरा झटका लगा था क्योंकि वह करमापा को अपना आदमी समझती थी। पद्रह साल की उम्र में भारत आए करमापा अब 24 साल के हो चुके हैं और दलाईलामा के साथ ही धर्मशाला के ग्यूतो तांत्री मठ में ही रहते हैं। सत्रहवें करमापा के चीन से भागकर भारत आने से दलाईलामा के तिब्बत की आजादी के आंदोलन को दुनियाभर में बल मिला था। दलाईलामा उनकी ट्रेनिंग अगले नेतृत्व के तौर पर कर रहे हैं, उन्हें विदेशी शासकों से मिलाने और दुनिया की राजनीति को समझने की ट्रेनिंग दी जा रही है। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि दलाईलामा पद धर्म गुरु का था, जबकि शासन की जिम्मेदारी करमापा की हुआ करती थी। पांचवें दलाईलामा के समय हुए खूनी संघर्ष में करमापा को तिब्बत की सत्ता से बेदखल कर दिया गया था और दलाईलामा ने ही दोनों जिम्मेदारियां संभाल ली थी। क्या मौजूदा 14वें दलाईलामा इतिहास को उसी मोड़ पर लाने की सोच रहे हैं जहां से पांचवें दलाईलामा ने सत्ता संभालने की शुरूआत की थी। क्या वह अपने इसी तवांग दौरे के दौरान ऐसा ऐतिहासिक ऐलान करने की सोच रहे हैं, जैसी चीन की आशंका है।</p>
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		<title>बीजेपी आलाकमान के नाम खुली चिट्ठी</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Oct 2009 08:09:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[
हमें आपकी नहीं, देश की फिक्र है, आप सुधरोगे तो लोकतंत्र मजबूत होगा। लोकतंत्र मजबूत होगा तो देश मजबूत होगा। आपने अपने अनुभव से कुछ नहीं सीखा तो युवा पीढ़ी के नए तौर तरीकों से राजनीति का क ख ग सीखिए। राहुल गांधी से सीखिए।

वैसे तो आपको आलाकमान कहूं या नहीं। इस पर मन में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>हमें आपकी नहीं, देश की फिक्र है, आप सुधरोगे तो लोकतंत्र मजबूत होगा। लोकतंत्र मजबूत होगा तो देश मजबूत होगा। आपने अपने अनुभव से कुछ नहीं सीखा तो युवा पीढ़ी के नए तौर तरीकों से राजनीति का क ख ग सीखिए। राहुल गांधी से सीखिए।</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">वैसे तो आपको आलाकमान कहूं या नहीं। इस पर मन में असमंजस है। पर परंपरा निभाने के लिए आलाकमान शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूं। वैसे तो भाजपा में आलाकमान का होना ही हास्यास्पद सा लगता है। राजनीति में आलाकमान शब्द का इस्तेमाल कांग्रेस में ही शोभा देता है। इंदिरा गांधी के जमाने में आलाकमान शब्द चलन में आया। उससे पहले कांग्रेस में सिंडिकेट हुआ करता था, जिसे आम भाषा में सामूहिक नेतृत्व कह सकते हैं। नेहरू की मौत के बाद कांग्रेस में सामूहिक नेतृत्व का चलन शुरू हुआ था। इंदिरा गांधी ने सामूहिक नेतृत्व को तहश-नहश करके कमान अपने हाथ में ली। वह कांग्रेस की आलाकमान बन गई। इस तरह राजनीति में आलाकमान की शुरूआत हुई। <span id="more-1316"></span>भारतीय जनता पार्टी इंदिरा कांग्रेस की तरह आलाकमान आधारित पार्टी कभी नहीं रही थी। अलबत्ता कांग्रेस के सिंडीकेट की तरह अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, सुंदर सिंह भंडारी, मुरली मनोहर जोशी पर आधारित सामूहिक नेतृत्व हुआ करता था। इस सामूहिक नेतृत्व की परंपरा का अंत 1997 में शुरू हो गया था, जब वाजपेयी, आडवाणी, जोशी की तिकड़ी में से मुरली मनोहर जोशी को निकाल बाहर किया गया। अगले साल लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद सुंदर सिंह भंडारी को निकाल बाहर किया गया, जब उन्हें राज्यपाल बनाकर भेज दिया गया। बाकी बचे थे वाजपेयी और आडवाणी। वाजपेयी की संगठन पर पकड़ जरूर थी पर उनकी सोच का दायरा बहुत बड़ा था, वह जनता के भीतर तक घुसे थे। पार्टी में सामूहिक नेतृत्व होते हुए भी लालकृष्ण आडवाणी के रूप में एक आला कमान बन गया। इसके बावजूद वाजपेयी का वीटो भारी पड़ता रहा। कांग्रेस की तरह भाजपा का अध्यक्ष कभी भी अपनी पार्टी का आलाकमान नहीं बन पाया। थोड़े समय के लिए जब नेहरू-इंदिरा परिवार से हटकर नरसिंह राव पार्टी अध्यक्ष थे, तो वह पार्टी के आलाकमान थे। भाजपा में मुरली मनोहर जोशी तक तो सिंडीकेट परंपरा ही थी उसके बाद कुशाभाऊठाकरे, जनाकृष्णामूर्ति, बंगारू लक्ष्मण, वेंकैया नायडू या अब राजनाथ सिंह पार्टी का आलाकमान नहीं बन पाए। भाजपा अब न तो नेहरू युग की कांग्रेस जैसी सामूहिक नेतृत्व की पार्टी दिखती है और न ही इंदिरा गांधी और उनके बाद की कांग्रेस जैसी आलाकमान आधारित पार्टी। पार्टी को या तो आलाकमान आधारित बनाइए या सामूहिक नेतृत्व पर लौटिए। आपकी पार्टी तो जंगलराज का नमूना बन चुकी है। आलाकमान की पध्दति भी कांग्रेस से सीखिए। सोनिया ऐसी आलाकमान हैं, जिसे कोई वसुधंरा चुनौती नहीं दे सकती, लेकिन वह हर फैसला सलाह मशविरे के बाद करती हैं, ताकि कोई ऊंच-नीच हो तो बाकी नेता संभाल लें।</p>
<p style="text-align: justify;">यही दुविधा है भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह को आलाकमान मानूं या सामूहिक नेतृत्व वाली पुरानी भाजपा की कल्पना करके आडवाणी को भी आलाकमान का हिस्सा मानूं। आलाकमान किसे कहूं। वेंकैया नायडू, अरुण जेटली और वसुंधरा राजे की कमान पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के हाथ में नहीं है। इन तीनों का आलाकमान भाजपा अध्यक्ष न होते हुए भी लालकृष्ण आडवाणी हैं। आपकी पार्टी में गुटबाजी तो हमेशा थी पर दिखती नहीं थी इसलिए आप लोग पार्टी विद ए डिफरेंस बताने लगे। अब आपको यह कहने का हक कहां रहा। अब आप पार्टी विद ए डिफरेंस नहीं हैं। आपके यहां तो न कोई आलाकमान है, न उसकी चलती है। आपका सामूहिक नेतृत्व पहले ही फेल हो गया था आलाकमान अब फेल हो गया। वैसे आप भले ही पार्टी के सामूहिक नेतृत्व को आलाकमान कहो, पर आलाकमान ऐसा नहीं हो सकता, जिसमें कई लोग शामिल हों और लोग भी ऐसे जो एक-दूसरे को फूटी आंख न सुहाते हों। लोकसभा चुनावों के वक्त अरुण जेटली को राजनाथ फूटी आंख नहीं सुहाते थे, इसलिए उन्होंने उन मीटिंगों में जाना बंद कर दिया था जिनकी अध्यक्षता राजनाथ सिंह करते थे। भाजपा में आलाकमान की अवधारणा तो तभी खत्म हो गई थी जब पार्टी संसदीय दल ने राज्यसभा में नेता तय करने का अधिकार पार्टी अध्यक्ष की बजाए लालकृष्ण आडवाणी को दे दिया था। क्या कांग्रेस में सोनिया गांधी के रहते ऐसे हो सकता है? आडवाणी ने तथाकथित आलाकमान को चुनौती देने वाले अरुण जेटली को राज्यसभा में विपक्ष का नेता बनाकर आलाकमान की अवधारणा खत्म कर दी।</p>
<p style="text-align: justify;">इसलिए पार्टी में आलाकमान नाम की कोई चीज नहीं बची है। आलाकमान नाम की  कोई चीज बची होती तो विजय गोयल हरियाणा विधानसभा चुनाव में पार्टी को मजाक का मुद्दा बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। वह कभी ओम प्रकाश चौटाला से गठबंधन बनाते-तोड़ते रहे और कभी भजनलाल से बातचीत करते रहे। पार्टी मझधार में खड़ी थी, जिधर की हवा बहे उधर जाने की कोशिश करती रही। लोकसभा चुनाव में चौटाला को राजग में लाकर राजनाथ सिंह और आडवाणी राजग परिवार में इजाफे का ढोल बजा रहे थे। पर चुनाव में हार के बाद शिमला बैठक में ठीकरा उन्हीं चौटाला के सिर फोड़ दिया। आप खुद को चौटाला के साथ डूबना मान रहे थे, पर आप तो चौटाला के बिना ही डूब गए। पार्टी में आलाकमान नाम की चीज तो दूर की बात, राजनीतिक दूरदर्शिता भी दिखाई नहीं देती। वरना हरियाणा विधानसभा चुनाव में हवा किस तरफ बह रही है, इसका अंदाजा लगाने में इतनी भूल नहीं होती। पार्टी में कोई आलाकमान होता तो प्रमोद महाजन की मौत के बाद गोपीनाथ मुंडे और नीतिन गड़करी रूपी दो ऐसे ध्रूव नहीं बनते जो पार्टी को दो विपरीत दिशाओं में खींच रहे थे। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद शरद पवार का बयान भाजपा और शिवसेना की अंतर्कथा का सटीक विश्लेषण है। उन्होंने कहा भाजपा और शिवसेना जनता का भरोसा जीतने में नाकाम रही इसलिए कांग्रेस-एनसीपी जीती।</p>
<p style="text-align: justify;">आलाकमान सिर्फ पार्टी पर हकूमत करने के लिए नहीं होता। राहुल गांधी के गरीब की झोपड़ी में पहुंचने की खिल्ली उड़ाने वाले आपके नेताओं को अपने गिरेबान में झांकने को कहने की हिम्मत किसमें है। जिन्हें प्राइवेट हवाई जहाजों पर दौरे करने में मजा आता है उन्हें राहुल गांधी का गरीब की झोपड़ी में जाना नौटंकी ही लगेगा। राहुल गांधी भी प्राइवेट विमानों पर सफर करते हैं, लेकिन जिन्हें आप विदेशी प्रेमिका और विदेशी संस्कृति वाला बताकर खारिज करते रहे, वह आपसे बहुत पहले जनता में अपनी साख बनाने में कामयाब हो गया है। सोनिया गांधी ने 1998 में कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद ऐसे ही लोगों के बीच जाकर देश की राजनीति और संस्कृति को समझा था। आप आलाकमान की झूठी ठसक लेकर बैठे रहें और जनता के बीच जाने की जिम्मेदारी आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों पर छोड़ दें तो आपको राजनीतिक पार्टी होने का भी हक कहां है। संघ भी जनता से सीधे संपर्क का हवाला देकर भाजपा का अध्यक्ष तय करेगा तो आपकी पार्टी का भी यही हश्र होना था, जो राजनाथ सिंह के अध्यक्ष काल में हुआ। भाजपा-संघ का रिश्ता विचारधारा का होता तो गनीमत था, संघ का बंधक बनकर भाजपा राजनीतिक दल नहीं बन पाएगी। पार्टी खुद सीधे जनता से जुड़कर राजनीतिक दल बनेगी तभी देश को एक दलीय राजनीति से बचाने के काबिल बन पाएगी। अपने वक्त के ताकतवर आलाकमान लालकृष्ण आडवाणी ताल ठोककर कहते थे कि देश को दो दलीय नहीं तो दो ध्रूवीय राजनीति में लाने में वह कामयाब रहे हैं। अब लालकृष्ण आडवाणी की आंखों के सामने देश की राजनीति फिर जवाहर लाल नेहरू के वक्त वाली एक ध्रूवीय लोकतंत्र की ओर  बढ़नी शुरू हो गई है। इसकी जिम्मेदारी किसी और की नहीं, भारतीय जनता पार्टी यानी आपकी ही है, जिसे जनता ने मौका दिया था। पर आप लोगों ने राजनीतिक अपरिपक्वता का परिचय देते हुए बिल्लियों की तरह रोटी के टुकड़े के लिए ही आपस में झगड़ते-झगड़ते यह मौका हाथ से जाने दे रहे हैं। कांग्रेस गिरते-गिरते फिर उठ खड़ी हो रही है, तो उसकी वजह पार्टी का अंदरूनी लोकतंत्र और जनता के बीच जाकर अपनी गिरती साख बचाने की कोशिश भी है। लोकसभा चुनावों के बाद लगता था कि आप सुधारात्मक कदम उठाएंगे। शिमला बैठक में पार्टी की नीतियों में परिवर्तन कर आप जनता के करीब पहुंचने वाली नीतियां अपनाएंगे। पर लोकसभा की हार से सबक सीखने की नीतियां और नेतृत्व बदलने की बजाए एक-दूसरे की पीठ में छुरा घोंपने की राजनीति से अभी फुरसत नहीं मिली है आपको। आप हार का ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोड़ने और एक-दूसरे का गला काटने को ही सुधार समझ बैठे हैं, इसलिए महाराष्ट्र और हरियाणा के नतीजे आपके सामने हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">माफ करना आपको यह चिट्ठी इसलिए लिखनी पड़ी क्योंकि देश में लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए दो ध्रूवीय राजनीति की बेहद जरूरत है। हमें आपकी नहीं, देश की फिक्र है, आप सुधरोगे तो लोकतंत्र मजबूत होगा। लोकतंत्र मजबूत होगा तो देश मजबूत होगा। आपने अपने अनुभव से कुछ नहीं सीखा तो युवा पीढ़ी के नए तौर तरीकों से राजनीति का क ख ग सीखिए। राहुल गांधी से सीखिए।</p>
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		<title>अमेरिकी शर्तें भारत के अनुकूल</title>
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		<pubDate>Mon, 12 Oct 2009 06:42:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[
पाक में जमहूरियत समर्थक और विरोधी आमने-सामने आ गए हैं क्योंकि अमेरिकी असैन्य आर्थिक मदद की शर्तें सेना और आईएसआई की बेजा हरकतों पर अंकुश लगाने वाली हैं।

सार्क सम्मेलन के मौके पर जनवरी 2004 में पाकिस्तान जाना हुआ तो जियो टीवी के मौजूदा सीईओ आमिर मीर के साथ बातचीत का मौका मिला। होटल के बाहर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>पाक में जमहूरियत समर्थक और विरोधी आमने-सामने आ गए हैं क्योंकि अमेरिकी असैन्य आर्थिक मदद की शर्तें सेना और आईएसआई की बेजा हरकतों पर अंकुश लगाने वाली हैं।</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">सार्क सम्मेलन के मौके पर जनवरी 2004 में पाकिस्तान जाना हुआ तो जियो टीवी के मौजूदा सीईओ आमिर मीर के साथ बातचीत का मौका मिला। होटल के बाहर सड़क पर ही काफी देर टहलते-टहलते बात होती रही। आमिर मीर की भारत से शिकायत थी कि वह पाकिस्तान के चुने हुए शासकों के साथ बातचीत नहीं करता, लेकिन जब-जब सैनिक शासक आ जाता है, बातचीत तेजी से शुरू कर देता है। उनका कहना था कि भारत के इस रवैये ने पाकिस्तान में लोकतंत्र मजबूत नहीं होने दिया। आमिर मीर की यही शिकायत अमेरिका के साथ भी थी। <span id="more-1295"></span>भारत के बारे में बातचीत करते हुए उनके मन में कोई तल्खी नहीं, अलबत्ता सिर्फ शिकायत थी। जबकि अमेरिका के बारे में बात करते समय तल्खी साफ दिखाई देती थी। यह तल्खी इस्लामाबाद से लेकर रावलपिंडी तक हर किसी से बातचीत के समय उभर कर आई। शीत युध्द के समय भारत और पाकिस्तान दोनों बड़े गुटों में बंटे हुए थे। जवाहर लाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति के बावजूद हम सोवियत संघ के ज्यादा करीबी थे और पाकिस्तान की पीठ पर अमेरिका का हाथ था। सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर एक तरह से कब्जा कर रखा था। उस समय अफगानिस्तान हमारे बहुत करीब था, जबकि पाकिस्तान से उतना ही दूर था। अमेरिका पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई के माध्यम से अफगानिस्तान में विद्रोहियों को आर्थिक मदद पहुंचा रहा था। पाकिस्तान उस आर्थिक मदद का तब से भारत के खिलाफ इस्तेमाल करता रहा है। सोवियत संघ टूटने के बाद उन्हीं तालिबानों का अफगानिस्तान पर शासन हो गया, जिन्हें अमेरिकी मदद मिला करती थी।</p>
<p style="text-align: justify;">ग्यारह सितंबर 2001 को अमेरिका पर आतंकवादी हमले तक अमेरिका ने भारत की उस शिकायत पर कभी तवज्जो नहीं दी थी, जिसमें पाकिस्तान की ओर से भारत में आतंकवादी वारदातें किए जाने के सबूत दिए जाते थे। अमेरिका पर आतंकी हमले के बाद भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जार्ज बुश से कहा था कि भारत एक दशक से अमेरिका को सावधान करता रहा था। अमेरिका को नाईन इलेवन के बाद एहसास हुआ और राष्ट्रपति बुश ने पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए मजबूर किया। पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने आतंकवाद के खिलाफ सहयोग की पूरी कीमत वसूल की। अमेरिका ने मुशर्रफ को अंधाधुंध पैसा भेजा। इसके बावजूद पाकिस्तानी जनमानस में अमेरिका के प्रति सद्भावना पैदा नहीं हुई। अमेरिका जहां एक तरफ अफगानिस्तान में जमहूरियत की दुहाई दे रहा था वहां पाकिस्तान में नवाज शरीफ का तख्ता पलट कर सैनिक शासक बने परवेज मुशर्रफ को पूरा समर्थन और शह देकर मजबूत कर रहा था। आमिर मीर जब पाकिस्तान में जमहूरियत के पांव नहीं जमने की बात कह रहे थे तो वह भारत के साथ अमेरिका को भी उतना ही जिम्मेदार ठहरा रहे थे। पाकिस्तान में मुझे भारत के प्रति उतनी नफरत नहीं दिखी जितनी अमेरिका के प्रति दिखी। इसकी दो वजहें मेरी समझ में आई। एक तो यह कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के निर्वाचित प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ दोस्ती का हाथ मिलाकर अमृतसर से लाहौर तक बस पर यात्रा की थी। लंबे समय के बाद पाकिस्तानी आवाम की यह इच्छा पूरी हुई थी कि भारत पाकिस्तान की निर्वाचित सरकार से बातचीत करके वहां की जमहूरियत को मजबूत करने में सहायक हो रहा था। दूसरी वजह यह समझ में आई कि जहां भारत सरकार परवेज मुशर्रफ से कड़ाई के साथ पेश आ रही थी वहां अमेरिका सैन्य शासक मुशर्रफ को संरक्षण देकर उन्हें अफगानिस्तान में मुसलमानों की हत्याओं के लिए इस्तेमाल कर रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">पाकिस्तान के विभिन्न लोगों से बातचीत के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा था कि वहां की आवाम भारत-पाक रिश्तों में कड़वाहट के लिए अपनी सेना को जिम्मेदार मानती हैं। अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए पाक सेना भारत के खिलाफ जहर फैलाती रही और जिस किसी चुनी हुई सरकार ने भारत से रिश्ते सुधारने की कोशिश की उसका तख्ता पलट दिया गया। नवाज शरीफ का तख्ता पलट तो इसका ताजा सबूत था। परवेज मुशर्रफ ने जहां एक तरफ आतंकवाद के लिए लड़ाई के नाम पर अमेरिका से करोड़ों डालर की मदद ली वहां उस धन का इस्तेमाल भारत में आतंकवाद फैलाने के लिए किया जाता रहा। अब इस आरोप के लिए किसी सबूत की जरूरत नहीं है क्योंकि राष्ट्रपति पद से हटने के बाद निर्वासित जीवन जी रहे परवेज मुशर्रफ ने खुद ही कुछ दिन पहले यह कबूल किया है। अब जब अमेरिकी सरकार ने पहली बार पाकिस्तान की निर्वाचित सरकार को मजबूत करने के लिए पांच साल तक लगातार 150 करोड़ डालर सालाना असैन्य मदद का कानून पास करवाया है तो पाकिस्तानी फौज उसकी शर्तों से तिलमिला उठी है। पाकिस्तानी आवाम जहां एक तरफ इसका स्वागत कर रहा है, वहीं भारत विरोधी मानसिकता वाली फौज और कट्टरपंथी मुखालफत पर उतर आए हैं। पाक को असैन्य मदद के लिए सितंबर में अमेरिकी कांग्रेस से पास हुए &#8216;कैरी-लुगर बिल&#8217; के कुछ प्रावधान पाकिस्तान की भारत विरोधी ताकतों को रास नहीं आने की ठोस वजहें हैं। इस बिल में अमेरिकी मदद की कुछ शर्तें रखी गई हैं। वे शर्तें इस प्रकार हैं-</p>
<ul>
<li style="text-align: justify;"> अमेरिकी विदेश मंत्री को हर साल यह सर्टिफिकेट देना होगा कि पाकिस्तान परमाणु संवर्धन पर रोक लगाने में मदद कर रहा है। इस मदद में उन पाकिस्तानियों के बारे में सूचनाएं मुहैया करवाना भी शामिल है, जो परमाणु संवर्धन और इससे संवर्धित नेटवर्क से जुड़े हैं। (स्पष्ट इशारा ए क्यू खान की तरफ है, जिसने हाल ही में खुलासा किया है कि वह पाकिस्तान के सैन्य शासक मुशर्रफ के इशारे पर ही मुस्लिम देशों को परमाणु तकनीक मुहैया करवा रहे थे।)</li>
<li style="text-align: justify;"> अमेरिकी विदेशमंत्री को हर साल सर्टिफिकेट देना होगा कि पाकिस्तान आतंकवाद विरोधी वचनबध्दता निभा रहा है और पाकिस्तान की फौज के तत्व या गुप्तचर एजेंसी आतंकवादी संगठनों की कोई मदद नहीं कर रहे।</li>
<li style="text-align: justify;"> अमेरिकी विदेशमंत्री को यह सर्टिफिकेट भी देना होगा कि पाक सरकार ऐसे तत्वों की कोई मदद नहीं कर रही जो अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना पर हमले कर रहे हैं या पड़ोसी देश में आतंकवादी वारदातें कर रहे हैं। (स्पष्ट इशारा भारत के खिलाफ आतंकवादी वारदातें करने वाले लश्कर-ए-तोएबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों की ओर है, जिन्हें पाकिस्तानी फौज और गुप्तचर एजेंसी आईएसआई मदद कर रही है।)</li>
<li style="text-align: justify;"> बिल के मुताबिक अमेरिकी विदेशमंत्री हर छटे महीने बाकी चीजों के अलावा आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान में हुई कार्रवाई की समीक्षा करेगा/करेगी। इसमें यह भी जांचना होगा कि पाक को दी जा रही मदद का परमाणु हथियार कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल तो नहीं हो रहा।</li>
<li style="text-align: justify;"> अमेरिकी विदेशमंत्री की इस पर भी निगाह रहेगी कि पाकिस्तान की निर्वाचित सरकार का सेना पर कितना नियंत्रण है। वह अपने राजनीतिक प्रशासनिक अधिकारों का इस्तेमाल कर रही है या नहीं। वह रक्षा बजट पर निगरानी रख रही है या नहीं। सेना में पदोन्नति की प्रणाली ठीक ढंग से काम कर रही है या नहीं। नागरिक प्रशासन की सामरिक मामलों में कितनी भूमिका है और नागरिक प्रशासन में सेना का कितना दखल है।</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;">अमेरिका की पाकिस्तान को असैन्य मदद की पांचों ही शर्तें पाकिस्तान में लोकतंत्र को मजबूत करने और सेना के दखल को कमजोर करने में कारगर साबित होने वाली हैं। मोटे तौर पर पाकिस्तान को मिलने वाली अमेरिकी मदद पर भारत आपत्ति उठाता रहा है क्योंकि पाक उस मदद का भारत के खिलाफ बेजा इस्तेमाल करता रहा है। यह पहली बार है जब भारत को अमेरिकी मदद के साथ जुड़ी शर्तों पर खुशी होनी चाहिए। पाकिस्तान में जमहूरियत को मजबूत देखने वाली ताकतें इन शर्तों पर कोई आपत्ति नहीं कर रहीं। सिर्फ वही लोग इन्हें पाकिस्तान की संप्रभुता में दखल बता रहे हैं जो फौजी शासन के पैरवीकार रहे हैं। पाकिस्तानी फौज का अमेरिकी शर्तों पर आपत्ति करना स्वाभाविक ही है, क्योंकि वह जेहादी संगठनों को हर तरह की मदद पहुंचा रही है।</p>
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		<title>केंद्र का इम्तिहान नहीं होते विधानसभा चुनाव</title>
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		<pubDate>Mon, 05 Oct 2009 07:53:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[
हरियाणा में विपक्ष कई हिस्सों में बंटा हुआ है, जिसका कांग्रेस को सीधा फायदा होगा। लेकिन महाराष्ट्र में ऐसी बात नही है। जहां  लोकसभा में सीटें  बढ़ने के बावजूद विधानसभा क्षेत्रों में हारी है कांग्रेस। अरुणाचल में चीन की सीमा पर इंफ्रांस्टक्चर की कमी मुख्य चुनावी मुद्दा।

पंद्रहवीं लोकसभा का गठन हुए पांच महीने हो [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>हरियाणा में विपक्ष कई हिस्सों में बंटा हुआ है, जिसका कांग्रेस को सीधा फायदा होगा। लेकिन महाराष्ट्र में ऐसी बात नही है। जहां  लोकसभा में सीटें  बढ़ने के बावजूद विधानसभा क्षेत्रों में हारी है कांग्रेस। अरुणाचल में चीन की सीमा पर इंफ्रांस्टक्चर की कमी मुख्य चुनावी मुद्दा।</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">पंद्रहवीं लोकसभा का गठन हुए पांच महीने हो चले हैं। इस बीच हुए विभिन्न विधानसभाओं के उपचुनावों को यूपीए सरकार की लोकप्रियता में गिरावट का पैमाना नहीं माना जा सकता। इन उप चुनावों में मोटे तौर पर उन्हीं राजनीतिक दलों की जीत हुई, जिनकी उन राज्यों में सरकारें थी। यूपीए सरकार की लोकप्रियता या अलोकप्रियता का पैमाना राज्य  विधानसभा चुनावों के नतीजों को भी नहीं माना जाना चाहिए। <span id="more-1284"></span>यूपीए के पिछले शासनकाल में हरियाणा और राजस्थान को छोड़कर कांग्रेस कहीं भी नहीं जीती थी। फिर भी लोकसभा चुनावों में 2004 से ज्यादा सीटें लेकर वापस आई। इसी तरह 2003 में राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में जीत के बावजूद भारतीय जनता पार्टी 2004 का लोकसभा चुनाव बुरी तरह हार गई थी। इसलिए अक्टूबर 2009 में होने वाले महाराष्ट्र, हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश विधानसभाओं के चुनावों को यूपीए सरकार की लोकप्रियता या अलोकप्रियता का पैमाना नहीं माना जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">हरियाणा में कांग्रेस के दुबारा सत्ता में आने की संभावना हर हालत में पचास फीसदी से ज्यादा है। इसकी वजह लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के नतीजे भी हैं। दस में से नौ लोकसभा सीटें जीतकर मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपनी लोकप्रियता का सबूत दिया है। यही वजह है कि वहां वक्त से पहले विधानसभा चुनाव करवाए जा रहे हैं ताकि हालात खिलाफ होने से पहले ही मौजूदा माहौल को भुनाकर अगले पांच साल सत्ता सुरक्षित कर ली जाए। हरियाणा में कांग्रेस के लिए माहौल लोकसभा चुनाव से भी ज्यादा अनुकूल है। लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और इंडियन नेशनल लोकदल ने मिलकर चुनाव लड़ा था। पिछली लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी की एक सीट थी, लेकिन इनलोद से गठबंधन के बाद भाजपा ने वह भी खो दी। पांच साल पहले जब हरियाणा में इनलोद की सरकार थी तो मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला अलोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गए थे। इसका खामियाजा भारतीय जनता पार्टी को भी भुगतना पड़ा, क्योंकि वह सत्ता में उसकी भागीदार थी। भाजपा-इनलोद का गठबंधन टूटा था तो भाजपा कार्यकर्ताओं ने राहत की सांस ली थी, लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा आलाकमान ने फिर गलती की। उन्हीं ओमप्रकाश चौटाला से मिलकर चुनाव लड़ा, जिससे उसे 2004 में जीती एकमात्र सीट से भी हाथ धोना पड़ा। अब भाजपा किसी के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ रही, लेकिन उसकी साख खराब हो चुकी है। लोग यह मानकर चल रहे हैं कि त्रिशंकु विधानसभा आने पर भाजपा चौटाला को मुख्यमंत्री बनने में मदद करेगी। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी भाजपा की छवि कुछ ऐसी ही हो गई थी। लोग यह मानकर चल रहे थे कि त्रिशंकु विधानसभा आने पर भाजपा मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री बनने में मदद करेगी। जबकि उत्तर प्रदेश की जनता मुलायम सिंह के यादवी शासन से इतना त्रस्त आ चुकी थी कि उन्हें किसी भी हालत में दुबारा नहीं देखना चाहती थी। नतीजतन जनता ने मायावती को पूर्ण बहुमत देकर सत्ता में पहुंचा दिया। मुलायम और चौटाला की परिवारवादी, जातिवादी राजनीति ही नहीं, अलबत्ता भ्रष्टाचार भी इन दोनों नेताओं की लोकप्रियता में गिरावट का कारण बना। वैसे भी हरियाणा में इस बार पांच कोणीय चुनाव हो रहे हैं जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को होना चाहिए। सिर्फ एक दलित फैक्टर कांग्रेस के लिए नुकसानदायक हो सकता है क्योंकि मायावती ने राज्य  में बसपा को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए सारी ताकत झोंक दी है। कांग्रेस को चौटाला, भजनलाल, मायावती के साथ भाजपा से भी मुकाबला करना है। इसके बावजूद उसका पलड़ा भारी है।</p>
<p style="text-align: justify;">महाराष्ट्र में ऐसी स्थिति नहीं है। कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस दस साल से सत्ता में हैं, इसलिए सत्ता विरोधी रुझान भी देखने को मिल रहा है। महाराष्ट्र में वैसे भी गठबंधन सरकार की छवि उतनी अच्छी नहीं है। लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की सीटें बढ़ने से कांग्रेस की लोकप्रियता का अंदाज लगाना गलत होगा। कांग्रेस 2004 में 13 लोकसभा सीटें जीती थी लेकिन 2009 में उसे चार सीटों की बढ़ोत्तरी के साथ 17 सीटें मिली। जबकि उसकी साझेदार राष्ट्रवादी कांग्रेस को नौ की बजाए आठ सीटें मिली। वैसे गठबंधन की तीन सीटें बढ़ना कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस की लोकप्रियता का नतीजा दिखाई देता है, लेकिन ऐसा है नहीं। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के उम्मीदवारों की वजह से भाजपा-शिवसेना को नुकसान उठाना पड़ा था। राज ठाकरे ने जहां-जहां अपने उम्मीदवार खड़े किए वहां-वहां भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा। वह खुद तो कोई सीट नहीं जीते, लेकिन उन्होंने वोट कटवा की अहम भूमिका निभाकर कांग्रेस को फायदा पहुंचाया। यहां देखने वाली बात यह है कि लोकसभा में भाजपा-शिवसेना की पांच सीटें घटने के बावजूद उसकी लोकप्रियता में गिरावट की बजाए इजाफा हुआ। कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस की तीन सीटें बढ़ने के बावजूद उसकी लोकप्रियता में गिरावट हुई है। लोकसभा की 48 सीटों के 288 विधानसभा क्षेत्रों के नतीजों पर नजर दौड़ाएं तो पता चलेगा कि कांग्रेस को 81 सीटों पर बढ़त हासिल मिली थी, जबकि राष्ट्रवादी कांग्रेस को 50 सीटों पर ही बढ़त हासिल हुई। मौजूदा विधानसभा में इस समय खाली नौ सीटें भी जोड़ लें तो कांग्रेस के पास 79 और राष्ट्रवादी कांग्रेस के पास 69 सीटें थी। इसका मतलब हुआ कि 148 सीटों के मुकाबले गठबंधन को 131 सीटें मिली हैं जो महाराष्ट्र विधानसभा में बहुमत से 14 कम हैं। कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस को इस बार फिर राज ठाकरे से फायदा होगा क्योंकि वह सौ सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं, अगर लोकसभा चुनावों की तरह वोट कटवा साबित हुए तो भाजपा-शिवसेना के लिए पिछली बार की 118 सीटें बचा पाना भी मुश्किल होगा। वैसे भी नारायण राणे शिवसेना में काफी सेंध लगा चुके हैं। वह 2004 के चुनाव नतीजों के बाद अपने आठ विधायक खो चुकी हैं जो अब कांग्रेसी पाले में हैं। यही वजह है कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे अपने भतीजे पर लगातार प्रहार करते हुए उन्हें महाराष्ट्र का जिन्ना बता रहे हैं। जिन्ना ने देश का विभाजन करवा दिया था और राजठाकरे मराठी वोटरों में विभाजन करा रहे हैं। भाजपा-शिवसेना राजठाकरे को वोट देने से कांग्रेस को फायदे का प्रचार करके राजठाकरे की ताकत घटाने की कोई कसर नहीं छोड़ रही। कांग्रेस-राकांपा को राजठाकरे का सहारा है, लेकिन लोकसभा चुनाव की तरह विधानसभा चुनाव में भी वह उतने वोट कटवा साबित होंगे, इसमें संदेह है। दूसरी तरफ कांग्रेस को परंपरागत सेक्युलर वोटों के बंटवारे का नुकसान भी उठाना पड़ेगा। वामपंथी दलों, सेक्युलर जनता दल और महाराष्ट्र के दलित वोटरों की परंपरागत रिपब्लिकन पार्टी ने मिलकर चौथा मोर्चा खोल लिया है, जो कांग्रेस-राकांपा गठबंधन को तगड़ा नुकसान पहुंचाएगा। करीब चार फीसदी वोटों वाली रिपब्लिकन पार्टी पहले कांग्रेस-राकांपा के साथ थी। वैसे भी महाराष्ट्र में कांग्रेस-राकांपा गठबंधन की सड़कों की खस्ता हालत, पानी की कमी से फसलों की बर्बादी, बिजली की कमी जैसी समस्याओं को झेलना पड़ रहा है। कर्जो के बोझ से दबे किसानों की आत्म हत्याएं थम नहीं रहीं, खाद्य पदार्थों और अन्य कृषि पदार्थों का उत्पादन गिर गया है। शहरी समस्याएं मुंह बाएं खड़ी हैं, महाराष्ट्र देश का ऐसा राज्य बन गया है जिसमें शहरी गरीबों की तादाद सर्वाधिक हो गई है।</p>
<p style="text-align: justify;">अरुणाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले चीन की ओर से सीमा पर बढ़ी गतिविधियां बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है। अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने शासनककाल में सिक्किम समस्या का तो स्थाई समाधान कर लिया था, लेकिन अरुणाचल प्रदेश अभी भी चीन की आंख की किरकिरी बना हुआ है। अरुणाचल में विकास इस बार बड़ा मुद्दा बना है। दो साल पहले प्रधानमंत्री ने वायदा किया था कि अरुणाचल में उसी तरह सड़कों का जाल बिछाया जाएगा, जैसा सीमा पार चीनी कब्जे वाले तिब्बत में फैला हुआ है। चीनी हरकतों के बाद अब इंफ्रास्टक्चर की जरूरत भी बढ़ गई है, इसलिए मनमोहन सिंह जल्द वादा निभाने का चुनावी आश्वासन दे रहे हैं। चीनी दूतावास अरुणाचल के नागरिकों को वीजा नहीं देता था लेकिन अरुणाचल में प्रस्तावित तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा की प्रस्तावित यात्रा के बाद भारत पर दबाव बढ़ाने के लिए उसने नई चाल चली है। अब चीन ने भारत के जम्मू कश्मीर राज्य को विवादास्पद घोषित करने के लिए वहां के नागरिकों को भारतीय पासपोर्ट पर वीजा देने की बजाए अलग से कागज पर वीजा की मोहर लगाकर देना शुरू कर दिया है।</p>
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		<title>एनपीटी-सीटीबीटी पर दस्तखत का दबाव</title>
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		<pubDate>Mon, 28 Sep 2009 08:22:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[
अमेरिका ने भारत को एनपीटी-सीटीबीटी करारों के दायरे में लाने के लिए चौतरफे दबाव शुरू कर दिए हैं। मनमोहन सरकार समझती थी कि एनएसजी और आईएईए से छूट मिलने के बाद अब भारत को इन दोनों प्रस्तावों पर दस्तखत की जरूरत नहीं पड़ेगी।

यह सवाल तो तब से उठ रहा है जबसे मनमोहन सरकार अमेरिका के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>अमेरिका ने भारत को एनपीटी-सीटीबीटी करारों के दायरे में लाने के लिए चौतरफे दबाव शुरू कर दिए हैं। मनमोहन सरकार समझती थी कि एनएसजी और आईएईए से छूट मिलने के बाद अब भारत को इन दोनों प्रस्तावों पर दस्तखत की जरूरत नहीं पड़ेगी।</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-weight: normal;">यह सवाल तो तब से उठ रहा है जबसे मनमोहन सरकार अमेरिका के करीब हुई है। लेकिन अब यह सवाल ज्यादा गंभीरता से पूछा जा रहा है- क्या भारत सीटीबीटी पर दस्तखत कर देगा? नरसिंह राव ने सीटीबीटी पर भी वही रुख अपनाया था, जो इंदिरा गांधी ने एनपीटी के समय अपनाया था। नरसिंह राव के बाद सभी प्रधानमंत्रियों ने भी अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों की ओर से तय की गई विदेश नीति अपनाई। इसलिए कोई अंतरराष्ट्रीय दबाव में नहीं झुका। <span id="more-1272"></span>अटल बिहारी वाजपेयी ने तो मई 1998 में परमाणु परीक्षण करके सीटीबीटी को खुली चुनौती दे दी थी। मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ परमाणु ऊर्जा ईंधन समझौता करते समय वायदा किया कि भारत परमाणु परीक्षण नहीं करेगा, लेकिन एनपीटी और सीटीबीटी पर दस्तखत नहीं करेगा। जब यह सवाल संसद में उठाया गया था तो सरकार की तरफ से जवाब आया कि एनडीए सरकार ने ही परमाणु परीक्षणों पर विराम लगाने का एलान कर दिया था। यह बात सही है कि 1998 में परमाणु परीक्षण करने के बाद एनडीए सरकार ने कहा था कि अब किसी और परीक्षण की जरूरत नहीं है। इसलिए भारत खुद परीक्षणों को विराम देता है, लेकिन भारत परमाणु सम्पन्न देश हो जाने के बावजूद भेदभावपूर्ण एनपीटी पर दस्तखत नहीं करेगा। परीक्षणों पर स्वयं विराम देने के बावजूद सीटीबीटी पर भी दस्तखत नहीं करेगा और अपना विकल्प खुला रखेगा। विपरीत परस्थितियों के बावजूद भारत ने कभी भी अमेरिकी दबाव को कबूल नहीं किया। नतीजतन हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के भी एनपीटी और सीटीबीटी पर दस्तखत करने का सवाल नहीं था, सो उसने भी दस्तखत नहीं किए।</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;">अमेरिका ने टेढ़ी उंगली से घी निकालने की रणनीति अपनाई। इसी के तहत मनमोहन सरकार से एटमी करार किया गया। एटमी करार करने के लिए उसे परमाणु ईंधन सप्लाई करने वाले देशों (एनएसजी) से भारत के साथ व्यापार की छूट दिलाने का प्रस्ताव पास करवाना पड़ा। यह प्रस्ताव पास करवाने के लिए भारत का अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) से सेफगार्ड का करार कराने में मदद की। अपनी सरकार को दांव पर लगाकर मनमोहन सिंह अमेरिका से एटमी करार कर रहे थे तो संसद में विपक्षी दलों ने चेतावनी दी थी कि इसके बाद भारत परमाणु परीक्षण नहीं कर पाएगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माना था कि अमेरिका ने भारत को परमाणु सम्पन्न देश मानने से इनकार कर दिया है, इसके बावजूद परमाणु ऊर्जा ईंधन देने को तैयार है। उन्होंने यह भी कहा था कि भारत ने एनपीटी और सीटीबीटी पर दस्तखत करने का कोई वायदा नहीं किया है। इसके बावजूद आईएईए ने छूट दे दी है और एनएसजी देशों ने ईंधन सप्लाई पर सहमति दे दी है।</p>
<p style="text-align: justify;">अमेरिकी नीयत सबसे पहले जुलाई के आखिर में हुए जी-8 देशों के सम्मेलन में सामने आई। अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा ने भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मौजूदगी में (वह विशेष आमंत्रित थे) जी-8 से उन देशों पर एटमी ईंधन संशोधन और संवर्धन (ईएन आर) की तकनीक देने पर रोक लगाने का प्रस्ताव पास करवा लिया, जिन्होंने एनपीटी पर दस्तखत नहीं किए। एक तरफ अमेरिका ने भारत के साथ ऐसा एटमी करार किया जिसमें एटमी ईंधन संशोधन और संवर्धन की छूट दी गई, दूसरी तरफ जी-8 देशों से उसके खिलाफ प्रस्ताव पास करवाया। अगर जी-8 के प्रस्ताव को एनएसजी से मंजूरी मिलती है तो भारत को एटमी कचरे के संवर्धन की तकनीक नहीं मिलेगी। संभवत: अमेरिकी और फ्रांसीसी यूरेनियम की सप्लाई के समय उसके संवर्धन पर रोक भी लग जाए। उल्लेखनीय है कि हमारे तारापुर संयत्र में संशोधन और संवर्धन की तकनीक मौजूद है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कहना है कि एनपीटी ने जी-8 का प्रस्ताव मंजूर भी कर लिया तो भी अमेरिका संवर्धन की तकनीक मुहैया करवाएगा। मनमोहन सरकार ने जी-8 के प्रस्ताव पर अमेरिका के सामने एतराज जताने तक की जहमत नहीं उठाई।</p>
<p style="text-align: justify;">अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन अगस्त में भारत आई तो भी भारत ने उसके सामने ईएनआर प्रतिबंध पर एतराज नहीं उठाया। मैंने इसी कालम में तीन अगस्त को लिखा था- &#8216;अमेरिका ने एक तरफ पाबंदी का कूटनीतिक अभियान शुरू कर दिया है, तो दूसरी तरफ भारत पर एनपीटी पर दस्तखत का दबाव भी बनाना शुरू कर दिया है।&#8217; इस लेख को छपे सिर्फ डेढ़ महीना हुआ है और अब हमारे सामने है कि 24-25 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने सभी देशों से एनपीटी-सीटीबीटी पर दस्तखत करने और उसका अपने संबंधित निर्वाचित सदनों से पुष्टि करवाने का प्रस्ताव पास किया है यह प्रस्ताव पिछले दरवाजे पर भारत पर नया दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है। भले ही संयुक्तराष्ट्र के प्रस्ताव का मकसद ईरान और उत्तरी कोरिया की घेरेबंदी करना हो। लेकिन पाकिस्तान के परमाणु बम जनक ए क्यू खान के नए रहस्योद्धाटनों के बाद भारत और पाक भी दबाव में आएंगे ही। ए क्यू खान का यह रहस्योद्धाटन अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चौंकाने वाला है कि उन्होंने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के कहने पर ही परमाणु तकनीक की अन्य मुस्लिम देशों में तस्करी की थी। यह संतोष की बात है कि इस बार भारत ने वैसी गलती नहीं की जैसी जी-8 का प्रस्ताव पास होने पर की थी। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक से एक दिन पहले 23 सितम्बर को ही चिट्ठी लिखकर विरोध जता दिया। इस पत्र में करीब-करीब वैसी ही भाषा का इस्तेमाल किया गया है जैसी अटल बिहारी वाजपेयी ने 1998 के परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिकी प्रतिबंधों पर इस्तेमाल की थी। पत्र में कहा गया कि भारत के गैर परमाणु सम्पन्न देश के तौर पर एनपीटी पर दस्तखत करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। भारत के परमाणु हथियार भारत का अभिन्न अंग हैं और रहेंगे। इतनी कड़ी और संतोषजनक भाषा के बावजूद खतरा यह है कि संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि हरदीप पुरी ने एनपीटी पर दस्तखत करने की बात तो कही है, लेकिन सीटीबीटी का कोई जिक्र नहीं किया। पच्चीस सितम्बर को विदेशमंत्री एसएम कृष्णा ने जरूर एनपीटी के साथ-साथ सीटीबीटी पर भी दस्तखत नहीं करने की बात कही है।</p>
<p style="text-align: justify;">अब खतरा यह है कि क्या भारत कुछ ले देकर सीटीबीटी पर दस्तखत करने को तैयार हो जाएगा। परमाणु वैज्ञानिक संथानम के पोकरण द्वितीय पर सवाल उठाए जाने को इसके साथ जोड़कर देखने की जरूरत है। एटमी करार के समय भारत सरकार ने अमेरिका को आश्वासन दिया था कि भारत परमाणु परीक्षण नहीं करेगा। हालांकि मनमोहन सिंह इससे यह कहते हुए इनकार करते हैं कि भारत जरूरत पड़ने पर परमाणु परीक्षण करने को तैयार है। अगर मनमोहन सरकार एटमी करार के जंजाल में फंसी नहीं होती तो संथानम की परमाणु परीक्षण की जांच करवाने की मांग मंजूर कर ली जाती। परमाणु परीक्षण की सफलता पर सवालिया निशान लगाने में कतई चूक नहीं करती मनमोहन सरकार। क्योंकि ऐसा करने से एनडीए सरकार की महानतम उपलब्धि को कटघरे में खड़ा करने का मौका मिलता। संथानम का कहना है कि पोकरण-द्वितीय पूरी तरह सफल नहीं रहा था इसलिए भारत को दो-तीन परीक्षण और करने चाहिए और तब तक सीटीबीटी पर दस्तखत नहीं करने चाहिए। हफ्तेभर की शुरूआती चुप्पी के बाद मनमोहन सरकार अचानक सक्रिय हो गई। विदेशमंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार के बाद परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोड़कर को भी पोकरण-द्वितीय के बचाव में झोंक दिया। भारत सरकार के इस दुहाई से संदेह पैदा होता है कि परमाणु परीक्षण की कोई जरूरत नहीं है। जबकि इससे पहले संसद में प्रधानमंत्री आश्वासन दे चुके हैं कि जरूरत पड़ने पर परमाणु परीक्षण के विकल्प खुले हैं। संदेह यह है कि क्या भारत सरकार सीटीबीटी पर दस्तखत के परमाणु परीक्षण के विकल्प को हमेशा हमेशा के लिए बंद करने पर विचार कर रही है। यहां यह उल्लेखनीय है कि भारत, पाक और उत्तरी कोरिया ही तीन देश बचे हैं, जिनने सीटीबीटी पर दस्तखत नहीं किए हैं। चीन, मिस्र, इंडोनेशिया, ईरान, इस्राइल और अमेरिका ने दस्तखत तो कर दिए हैं, लेकिन इन देशों के निर्वाचित सदनों ने पुष्टि नहीं की है। अमेरिकी सीनेट पुष्टि का प्रस्ताव ठुकरा चुकी है लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में हिलेरी क्लिंटन ने वादा किया है कि अब सीनेट प्रस्ताव पास कर देगी।</p>
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		<title>सीमाओं पर लापरवाही</title>
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		<pubDate>Sun, 20 Sep 2009 19:27:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[
नेहरू की तरह मनमोहन सिंह भी सीमाओं पर चीन की घुसपैठ को वक्त रहते गंभीरता से नहीं ले रहे। अलबत्ता मीडिया पर घुसपैठ को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगा रहे हैं। सीमाओं पर हमारी सतर्कता और तैयारी आपराधिक लापरवाही की सीमा तक चली गई है।

सितम्बर के शुरू में यह खबरें आनी शुरू हुई थी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>नेहरू की तरह मनमोहन सिंह भी सीमाओं पर चीन की घुसपैठ को वक्त रहते गंभीरता से नहीं ले रहे। अलबत्ता मीडिया पर घुसपैठ को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगा रहे हैं। सीमाओं पर हमारी सतर्कता और तैयारी आपराधिक लापरवाही की सीमा तक चली गई है।</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">सितम्बर के शुरू में यह खबरें आनी शुरू हुई थी कि लद्दाख में चीनी सेना घुस आई है। पहले-पहल खबर सिर्फ वायु सीमा अतिक्रमण की थी, पर धीरे-धीरे छनकर खबर आई कि कुछ दिन पहले चीनी सेना ने मेकमाहोन रेखा भी पार की थी। यह घटना एक बार नहीं, बल्कि कई बार हुई थी लेकिन सरकार ने इसे देश की जनता से छुपाए रखा। एक बार चीनी सैनिकों ने हमारे क्षेत्र में घुसकर गडरियों को मारा-पीटा और वहां से चले जाने को कहा। उनका दावा था कि वह क्षेत्र चीन का है, भारत का नहीं। दूसरी बार वे अपने साथ लाल रंग और ब्रुश लाए थे, जिससे उन्होंने पत्थरों पर मेंडरिन भाषा में चीन लिखा। <span id="more-1259"></span>इस तरह की घटनाए सिर्फ लद्दाख में होती तो समझा जा सकता था कि बर्फीली पहाड़ियों पर सीमाओं का सही-सही अंदाज नहीं होने से गलती हुई होगी। मीडिया में खबरें आने के बाद विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने चीन की हरकतों को हल्का करके दिखाने के लिए तर्क दिया कि चीन ने मेकमाहोन रेखा को कभी सीमा के तौर पर कबूल नहीं किया है इसलिए इस तरह की घटनाएं कभी-कभी होती रहती हैं। चीन की तरफ से सिर्फ लद्दाख में प्रवेश की घटना होती तो इसे गफलत समझ कर छोड़ा भी जा सकता था। लेकिन ठीक इसी तरह की घटनाएं करीब करीब इन्हीं दिनों में अरुणाचल और उत्तराखंड में भी हुई। आमतौर पर ऐसी घटनाओं का कड़ा नोटिस लिया जाता है और सबसे पहले संबंधित देश के राजदूत को बुलाकर आपत्ति दर्ज करवाई जाती है जबकि इस मामले में सरकार की कोशिश मामले को दबाने की रही। विदेश राज्यमंत्री का बयान भारतीय सीमाओं की रक्षा करने वाला नहीं, अलबत्ता सीमाओं के उल्लंघन करने वाले चीन का बचाव करने वाला था। करीब तीन हफ्ते तक सरकार ने लद्दाख, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश से आई खबरों पर कोई तवज्जो नहीं दी। अगर मीडिया घुसपैठ की खबरों को बढ़ा-चढाकर कह रहा था तो रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय की ओर से इस पर स्पष्टीकरण जारी किया जाना चाहिए था। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1962 में भारत-चीन युध्द का आधार क्या था। नेहरू सरकार चीनी फौज की घुसपैठ को लंबे समय तक नजरअंदाज करती रही थी। धीरे-धीरे प्रवेश करते हुए चीन ने पहले लद्दाख के अक्साइचिन पर कब्जा कर लिया और बाद में अपने नक्शे बदलकर उसमें अक्साइचिन को चीन का हिस्सा बता दिया। नेहरू सरकार इन खबरों को भी नजरअंदाज करती रही थी कि अक्साइचिन को चीन ने अपने नक्शे में शामिल कर लिया है। जिस तरह अब मनमोहन सिंह घुसपैठ की खबरों को बेवजह का तूल बता रहे हैं, उसी तरह की प्रवृत्ति जवाहर लाल नेहरू की भी थी। जवाहर लाल नेहरू भारतीय सीमाओं को लेकर उतने गंभीर भी नहीं थे, जितना उन्हें होना चाहिए था। उन्होंने तो लोकसभा में यहां तक कह दिया था कि उन बर्फीली पहाड़ियों को लेकर इतना चिंतित होने की जरूरत ही क्या है, जहां घास का एक तिनका भी पैदा नहीं होता। मनमोहन सिंह ने नेहरू जैसा बयान तो नहीं दिया लेकिन सीमाओं को लेकर उनकी लापरवाही नेहरू से कम नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद सात रेसकोर्स में शुरू हुई इफ्तार पार्टी में चीन के राजदूत यान भी मौजूद थे। पिछले बीस दिनों में मनमोहन सिंह ने चीनी घुसपैठ पर अपना मुंह नहीं खोला था, लेकिन जैसे ही मौका मिला पत्रकारों ने उनसे सीमाओं का हाल जानने की कोशिश की। उनकी टिप्पणीं हैरान करने वाली थी। उन्होंने कहा- &#8216;सरकार की सूचना प्रणाली में कमी हो सकती है, जिस कारण मीडिया में घुसपैठ की खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।&#8217; उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकार को घुसपैठ की कोई जानकारी नहीं है। सवाल खड़ा होता है कि टीवी चैनलों पर मेंडरिन भाषा में लाल रंग से लिखे दिखाए गए पत्थर क्या नकली हैं? गडरिए का चैनल पर आकर चीनी सैनिकों की ओर से धमकाने और मारने-पीटने की पुष्टि करना भी क्या नकली है? अगर ये दोनों बातें नकली हैं तो सेनाध्यक्ष की ओर से चीनी हेलीकाप्टरों के भारतीय सीमा के उल्लंघन का खुलासा भी क्या नकली था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चीनी घुसपैठ को नजरअंदाज करने का रवैया अपनाकर जवाहर लाल नेहरू की गलती दोहराने की कोशिश कर रहे हैं। मनमोहन सिंह का अनुभव सिर्फ आर्थिक (और अब पांच साल से राजनीतिक) रहा है, इसलिए उन्हें पड़ोसी देशों के बारे में ऐतिहासिक दस्तावेजों का अध्ययन कर लेना चाहिए। मौका देखकर पड़ोसी देशों की जमीन हथियाना चीन की आदत में शुमार रहा है। सिर्फ तिब्बत और हमारा अक्साइचिन ही दो उदाहरण नहीं हैं। तिब्बत देश और भारतीय अक्साइचिन क्षेत्र हड़पने के बाद साठ के ही दशक में चीन ने म्यांमार में भी यही किया था। फिलीपींस में भी 1995 में इसी तरह की घुसपैठ कर उसने फिलीपींस की जमीन हड़प ली थी। उसने बड़ी खामोशी से मिसचिफ रीफ के समुद्री द्वीप पर कब्जा कर लिया, जबकि वह फिलीपींस का हिस्सा था।</p>
<p style="text-align: justify;">मैंने 1986 में चीन की ओर से लाहौल-स्पीति में घुसपैठ का नायाब तरीका अपनाने का खुलासा किया था। खुद उस क्षेत्र का दौरा कर मैंने देखा था कि चीन की निगाह भारत के साथ सिर्फ चार महीने सड़क मार्ग से जुड़े रहने वाले रोहतांग पार इलाके पर टिकी है। चीन ने वहां चीनी लड़कियां भेजकर वंश बदलने की रणनीति शुरू कर दी थी। मैं खुद वहां ऐसी कई चीनी लड़कियों से मिला था जो शादी करके वहां रह रही थीं। लौटकर मैंने इस पर विस्तृत रिपोर्ट लिखी, जिसे उस समय भाजपा के सांसद प्यारे लाल खंडेलवाल ने राज्यसभा में उठाया था। गृहराज्यमंत्री कुमुद बेन जोशी ने अपने लिखित जवाब में खुफिया एजेंसियों के हवाले से इस रहस्योद्धाटन की पुष्टि की थी। पचास के दशक में लाहौल स्पीति को सड़क मार्ग से पूरा साल जोड़ने के लिए सुरंग बनाने की एक योजना तैयार की गई थी। लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने इसे खर्चे का सौदा बताकर खारिज कर दिया था। प्यारे लाल खंडेलवाल के सवाल पर संसद में सुरंग बनाने का मुद्दा जोर-शोर से उठा, लेकिन बात फिर आई-गई हो गई। अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद चीन से रिश्ते भी सुधारे, सीमाओं की सुरक्षा पर ध्यान भी दिया। उन्होंने 1700 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाली सुरंग परियोजना को मंजूरी देकर 2003 में नींव पत्थर भी रख दिया था, लेकिन 2004 से निर्माण फिर खटाई में है। यह सीमाओं के प्रति गंभीरता का एक उदाहरण है, जबकि चीन ने भारत के साथ लगती सभी सीमाओं पर अपना इंफ्रास्टक्चर इतना मजबूत कर लिया है कि कई जगह पर तो आठ-दस किलोमीटर दूर तक सड़क बना ली है। तिब्बत में लहासा तक ट्रेन पहुंच चुकी है, लेकिन हमने 1962 के बाद भी अब तक चीनी सीमाओं पर इंफ्रास्टक्चर पर कोई ध्यान नहीं दिया। हमने लद्दाख में तीन और अरुणाचल प्रदेश में आठ एडवांस लैडिंग ग्राउंड ही शुरू किए हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर सेना और साजो सामान हवाई मार्ग से पहुंचाया जा सके। चीनी सीमा पर सरकार की लापरवाही राष्ट्रीय अपराध है। जो आगे चलकर देश के लिए बहुत घातक साबित हो सकता है। दोस्ती में हर्ज नहीं, लेकिन मुल्कों में दोस्ती भी सतर्कता से की जाती है। पड़ोसी मुल्कों में चीन की कूटनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक घुसपैठ के मुकाबले हमारी कूटनीतिक विफलताओं के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। हम भारत के हितों की रक्षा करने की बजाए मुद्दई से ज्यादा चुस्त होकर उसके गवाह बन रहे हैं। चीन अपने पंख फैला रहा है, वह ईरान-पाक-भारत पाईप लाइन की जगह ईरान-पाक-चीन गैस पाईप लाईन की कोशिशों में जुट गया है। चीन ने लंका में हबानटोटा बंदरगाह के विकास का ठेका हासिल किया है। वह पाकिस्तान और म्यांमार में भी विकास कार्यों में शामिल है। चीन सिर्फ अपनी सीमाओं से नहीं, बल्कि अपने बाकी पड़ोसी देशों की सीमाओं से भी हमारी घेरेबंदी में जुटा हुआ है। वह हमारे पड़ोसी देशों में अपना रणनीतिक मार्ग बना रहा है। अफसोस कि हमारे प्रधानमंत्री मीडिया की सतर्कता को गंभीरता से नहीं ले रहे। जवाहर लाल नेहरू ने जब कहा था कि अक्साइचिन में घास के तिनका भी नहीं उगता तो संसद में उन्हें कांग्रेस के ही सांसद महावीर त्यागी ने टोका था, लेकिन अफसोस है कि आज कांग्रेस का कोई सांसद भी उन्हें टोकने वाला नहीं है।</p>
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		<title>भावनाएं, विरासत और लोकतंत्र</title>
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		<pubDate>Mon, 07 Sep 2009 08:17:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[
आंध्र प्रदेश के कांग्रेसी विधायकों की ओर से राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन मोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग भावनात्मक तो है ही। कांग्रेस की राजनीतिक विरासत वाली वंशानुगत लोकतंत्र की परंपरा भी है।

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की हेलीकाप्टर दुर्घटना में हुई मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। दुर्घटना से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>आंध्र प्रदेश के कांग्रेसी विधायकों की ओर से राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन मोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग भावनात्मक तो है ही। कांग्रेस की राजनीतिक विरासत वाली वंशानुगत लोकतंत्र की परंपरा भी है।</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की हेलीकाप्टर दुर्घटना में हुई मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। दुर्घटना से जुड़े तकनीकी सवाल तो अपनी जगह हैं, लेकिन राजनीतिक सवाल ज्यादा गंभीर हैं। कांग्रेस के 156 में से 148 विधायकों ने राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन मोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग करके लोकतांत्रिक ढांचे की नई परिभाषा गढ़ दी है। <span id="more-1227"></span>पहली नजर में देखा जाए तो विधायकों को अपना नेता तय करने का संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार है। संविधान में स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री को सदन का बहुमत हासिल होना चाहिए। वह खुद सदन का सदस्य नहीं हो तो छह महीने के भीतर चुनकर आ जाना चाहिए। अन्यथा वह मुख्यमंत्री नहीं रह सकेगा, यही बात केंद्र और राज्यों के मंत्रियों पर भी लागू होती है। राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन रेड्डी को सदन के सदस्यों के बहुमत का समर्थन हासिल है तो उन्हें मुख्यमंत्री बनने का संवैधानिक हक हासिल है। ज्ञानी जैल सिंह ने  तो राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाते समय कांग्रेसी सांसदों के समर्थन की पड़ताल भी नहीं की थी।</p>
<p style="text-align: justify;">राजतंत्र, परिवारतंत्र और लोकतंत्र का फर्क ऐसे मौके पर मिटता हुआ दिखाई देने लगता है। ऐसा नहीं है कि आजाद भारत में यह पहली बार हो रहा हो। शेख अब्दुल्ला की मौत के बाद फारुख अब्दुल्ला और एनटी रामाराव की मौत के बाद उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू को विधायकों ने ऐसी ही भावनाओं में बहकर मुख्यमंत्री बनाया था। चौधरी देवीलाल ने अपने सामने ही मुख्यमंत्री की कुर्सी अपने बेटे ओमप्रकाश चोटाला को सौंप दी और फारुख अब्दुल्ला ने अपने सामने ही मुख्यमंत्री की कुर्सी अपने बेटे उमर अब्दुल्ला को सौंप दी। लेकिन ये चारों ही उदाहरण क्षेत्रीय पार्टियों के हैं, कांग्रेस या भाजपा में ऐसा कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलता। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद केन्द्रीय मंत्रियों ने जिस तरह उनके बेटे राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का फैसला किया था, ठीक उसी तरह दिवंगत वाईएस राजशेखर रेड्डी के मंत्रिमंडल ने भी उनके बेटे को मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव पास कर दिया। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने और सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने ने ही कांग्रेस को परिवारवादी पार्टी बना दिया। अब जबकि नेहरू-गांधी परिवार की परंपरा कांग्रेस के प्रादेशिक नेताओं में पहुंच रही है, तो कांग्रेस में उच्च स्तर पर असुविधा महसूस की जा रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">दक्षिण में कांग्रेस का पतन हाईकमान की ओर से क्षत्रपों की अवहेलना से शुरू हुआ था। इंदिरा गांधी ने हाईकमान की ताकत दिखाने के लिए क्षत्रपों को कमजोर करना और मुख्यमंत्रियों को दिल्ली के इशारे पर हटाने की परंपरा शुरू की थी। जिसका नतीजा यह निकला कि राज्यों में कांग्रेस कमजोर होती चली गई। पहले तमिलनाडु और केरल में कांग्रेस की हालत खस्ता हुई और बाद में आंध्र प्रदेश और कर्नाटक उसमें जुड़ गए। इन राज्यों में नाराजगी इस बात को लेकर थी कि कांग्रेस हाईकमान जमीन से जुड़े हुए नेताओं को सत्ता सौंपने के बजाए अपने चापलूसों के हाथ में बागडोर थमा देता है। नतीजतन कांग्रेसी मुख्यमंत्री अपनी जनता के प्रति जवाबदेह होने की बजाए हाईकमान के प्रति जवाबदेह होकर रह जाते हैं। तमिलनाडु में एमजीआर और आंध्र प्रदेश में एनटीआर का राज्य की राजनीति में उदय होने का कारण कांग्रेस हाईकमान की मनमानी ही था। बहुत लंबे समय के बाद दक्षिण के एक राज्य आंध्र प्रदेश में राजशेखर रेड्डी नाम का एक क्षत्रप पैदा हुआ, जिसने अपने बूते पर पहले 2004 में और अब 2009 में कांग्रेस को बहुमत दिलाया। राजशेखर रेड्डी को आंध्र प्रदेश और केंद्र में कांग्रेस को बहुमत में लाने के लिए सोनिया गांधी की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ी। आंध्र प्रदेश विधानसभा के 156 कांग्रेसी विधायकों में से ज्यादातर राजशेखर रेड्डी की वजह से ही चुनाव जीते थे, इसलिए उनकी ओर से उनके बेटे को मुख्यमंत्री बनाने की मांग सिर्फ भावनात्मक नहीं, अलबत्ता वे उन्हीं की रहनुमाई में अपना भविष्य सुरक्षित मानते हैं। यह ठीक उसी तरह है, जैसे इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के सांसद भावनाओं के साथ-साथ उन्हीं के नेतृत्व में अपना भविष्य सुरक्षित मानते थे।</p>
<p style="text-align: justify;">जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के समय राज्यों में कांग्रेस के जितने भी क्षत्रप नेता थे, उनकी राजनीतिक विरासत उनके परिवारों को ही मिलती रही थी। भले ही किसी मुख्यमंत्री के देहांत पर उसके बेटे को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया, लेकिन राजनीतिक विरासत को कबूल करने में कोई कमी नहीं छोड़ी गई। मध्यप्रदेश में रविशंकर शुक्ल का मुख्यमंत्री पद पर देहांत हुआ था, उनके बेटे श्यामाचरण शुक्ल राजनीति में आ चुके थे। लेकिन इंदिरा गांधी ने श्यामाचरण शुक्ल को मुख्यमंत्री नहीं बनाया, अलबत्ता डीपी मिश्र को मुख्यमंत्री बनाया। इसी तरह प्रताप सिंह कैरो की मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए हत्या हुई, लेकिन उनका बेटा सुरेंद्र सिंह मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया। इसके बावजूद कांग्रेस में राजनीतिक विरासत की परंपरा रही है। केंद्र सरकार के मौजूदा मंत्रिमंडल में 29 मंत्री ऐसे हैं जिनके बाप-दादा भी मुख्यमंत्री या केन्द्र में मंत्री रहे हैं। कांग्रेस ही नहीं, अलबत्ता सभी राजनीतिक दलों में राजनीतिक-पारिवारिक विरासत की परंपरा चल रही है। दूर जाने की बात नहीं, देशभर के आधा दर्जन मुख्यमंत्रियों के बेटे-बेटियां सांसद हैं। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के बेटे अनुराग, कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदुरप्पा के बेटे राघवेंद्र, हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के बेटे दीपेंद्र हुड्डा, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि का बेटा अझगरी और बेटी कन्नीमूरी, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का बेटा संदीप दीक्षित, जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के पिता फारुख अब्दुल्ला और आंध्र प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन रेड्डी सांसद हैं। वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री रहते ही उनका बेटा दुष्यंत सांसद बन गया था। देश में ऐसे सौ ही परिवार हैं, जिनके बच्चे सांसद, विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री बनते हैं। इसलिए कई बार तो ऐसा लगता है जैसे भारत में लोकतंत्र की जगह वंशवादी लोकतंत्र कायम हो गया है। जब देश ने इस वंशवादी लोकतंत्र को कबूल कर लिया है, तो राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन रेड्डी को मिला अपार समर्थन आश्चर्यजनक नहीं होना चाहिए। यह विधायकों का समर्थन चापलूसी की हद कहा जा सकता है, लेकिन यह चापलूसी की हद तब भी होती है, जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद केन्द्रीय मंत्रिमंडल उनके बेटे राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव पास कर देता है। देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के लिए यह कोई इम्तिहान की घड़ी नहीं है, अलबत्ता कांग्रेस की पुरानी परंपराओं का इम्तिहान जरूर है। कांग्रेस अगर राज्य के विधायकों की मर्जी के मुताबिक राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन मोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बना देती है, तो कांग्रेस में क्षत्रपों के महत्व का युग लौट आएगा। राजशेखर रेड्डी 1998 में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने से पहले तेरह साल तक कांग्रेस के दिग्गज नेताओं का कोपभाजक बनते रहे थे। वह कभी चुनाव नहीं हारे, इसके बावजूद जब भी कभी उनके मुख्यमंत्री बनने का मौका आया, बड़े नेता एकजुट होकर उनके रास्ते में रुकावट बनते रहे। राजशेखर रेड्डी मे आंध्र प्रदेश का क्षत्रप बनने की क्षमता थी, लेकिन कांग्रेस आलाकमान उनकी अनदेखी करता रहा। इसका नतीजा कांग्रेस ने 21 साल तक भुगता, इस दौरान आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव और उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू का जादू चला। राजशेखर रेड्डी को जब मौका दिया गया तो उन्होंने पांच साल के अंदर खुद को क्षत्रप के तौर पर उभारकर कांग्रेस को न सिर्फ राज्य में स्थापित किया, बल्कि केंद्र में भी कांग्रेस का वनवास खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब राजशेखर रेड्डी के बेटे में भले ही अपनी पिता जितना राजनीतिक अनुभव और उन जितनी क्षमता न हो, लेकिन विधायकों की इच्छा की अनदेखी कांग्रेस के लिए महंगी भी पड़ सकती है।</p>
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		<title>विदेशनीति में भटकाव</title>
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		<pubDate>Sun, 26 Jul 2009 18:39:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ajay Setia</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[
मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में देश की विदेशनीति में भारी बदलाव देखने को मिल रहे हैं। नीति का झुकाव अमेरिका की तरफ दिखाई दे रहा है और पाकिस्तान के मामले में कूटनीतिक विफलताएं सामने आ रही हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने पर आम धारणा थी कि विदेशनीति का झुकाव अमेरिका की तरफ हो [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में देश की विदेशनीति में भारी बदलाव देखने को मिल रहे हैं। नीति का झुकाव अमेरिका की तरफ दिखाई दे रहा है और पाकिस्तान के मामले में कूटनीतिक विफलताएं सामने आ रही हैं।</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने पर आम धारणा थी कि विदेशनीति का झुकाव अमेरिका की तरफ हो जाएगा। जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरसिंह राव तक देश की विदेशनीति गुटनिरपेक्ष की बनी रही थी। हालांकि नेहरू से लेकर नरसिंह राव तक कांग्रेस की हर सरकार का झुकाव दोनों में से एक गुट सोवियत संघ की तरफ बना रहा था। आम धारणा के विपरीत वाजपेयी सरकार की विदेशनीति अपेक्षाकृत ज्यादा गुटनिरपेक्ष साबित हुई। <span id="more-1193"></span>एनडीए शासन में अमेरिका और इस्राइल से हथियारों की आपूर्ति हुई, तो रूस से भी कई महत्वपूर्ण रक्षा सौदे हुए। वाजपेयी किसी भी पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री से ज्यादा लोकतांत्रिक थे, इसलिए अमेरिका ने जब इराक पर हमला किया तो उन्होंने सर्वदलीय बैठक बुलाकर देश की नीति तय की। विदेश नीति पर यह पहली सर्वदलीय बैठक थी। इससे पहले किसी भी प्रधानमंत्री ने विदेशनीति पर बाकी राजनीतिक दलों को भरोसे में लेने की जहमत नहीं उठाई थी। हां जवाहर लाल नेहरू और नरसिंह राव विदेश नीति पर संसद में विपक्ष के नेता को भरोसे में जरूर लेते रहे थे। नरसिंह राव ने तो कश्मीर पर पाकिस्तान के तेवरों का जवाब देने के लिए संयुक्तराष्ट्र में विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भारत के प्रतिनिधि के तौर पर भेजकर विदेशनीति पर देश की एक राय का नया उदाहरण पेश किया था।</p>
<p style="text-align: justify;">2004 में मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद से देश की विदेश नीति में एक तरफा बदलाव देखे जा रहे हैं। लेकिन विपक्ष के नेताओं को भरोसे में लेना तो दूर की बात, प्रधानमंत्री अपनी ही पार्टी को भरोसे में नहीं ले रहे हैं। विदेशनीति में सबसे पहला बदलाव 2005 में अमेरिका के साथ एटमी करार के समय देखने में आया। एटमी करार के समय देश के विदेश मंत्री रहे नटवर सिंह ने बाद में खुलासा किया था कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को एटमी करार की कोई पूर्व जानकारी नहीं थी। एटमी करार वाले दिन ही अटल बिहारी वाजपेयी की ओर से देश की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ने वाले विपरीत प्रभावों के बयान ने कांग्रेस को घोर संकट में खड़ा कर दिया था। एटमी करार के कुछ दिन बाद तक कांग्रेस की तरफ से करार के बचाव में कुछ भी कहने से परहेज किया गया। बाद में मनमोहन सिंह ने सोनिया गांधी को राजी कर लिया। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष को कैसे राजी किया, वह अलग बात है, लेकिन यह सच है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बुश से किया गया वादा नहीं निभा पाने पर उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने की धमकी दी थी। एटमी करार से देश की स्वतंत्र विदेशनीति में बदलाव का पहला सबूत तब मिला जब भारत ने अमेरिकी  दबाव में आकर आईएईए बैठक में ईरान के खिलाफ वोट दिया। दूसरा बदलाव अमेरिकी दबाव में ईरान-पाक-भारत गैस पाईप लाइन को हमेशा हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में डालने का हुआ है।</p>
<p style="text-align: justify;">मनमोहन सरकार की दूसरी पारी ज्यादा भयावह साबित हो रही है। विदेशनीति में व्यापक बदलाव देखने को मिल रहे हैं, जिस पर तरह-तरह की आशंकाएं उठ रही हैं। एटमी करार के समय कांग्रेस में इतनी आशंका पैदा नहीं हुई थी, जैसी अब पैदा हो रही है। हालांकि अमेरिकी दबाव में भारत की पाकिस्तान संबंधी विदेशनीति में भी बदलाव के संकेत मिल गए थे। मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के साथ साझा बयान में पाक को भी आतंकवाद का शिकार बताकर देश की विदेशनीति में व्यापक बदलाव का संकेत दिया था। परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान के फौजी शासकों की उस परिपाटी के शासक थे जिनकी रणनीति भारत में आतंकवाद फैलाकर अंदर से खोखला करने की थी। पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अंधेरे में रखकर पाकिस्तानी फौज की कारगिल में घुसपैठ करवाने वाले मुशर्रफ का अब भी यह कहना है कि वह उनकी कूटनीति का हिस्सा था ताकि कश्मीर को भारत-पाक वार्ता का केंद्र बिंदु बनाया जा सके। उनका दावा है कि इस लक्ष्य में सफलता हासिल करके उन्होंने एक तरह से विजय हासिल की थी। हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी ने कश्मीर की &#8216;कोर ईश्यू&#8217; बनाने के मुद्दे पर ही आगरा वार्ता तोड़ दी थी। यहां यह भी उल्लेखनीय होगा कि परवेज मुशर्रफ की ओर से भारतीय संपादकों के साथ नाश्ते पर बैठक में कश्मीर के आतंकवाद को जंग-ए-आजादी कहने पर वाजपेयी ने साझा बयान पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया था, जिस पर उन्हें आगरा से बैरंग लौटना पड़ा था। जबकि देश के बंटवारे के समय से ही पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान में चल रही जंग-ए-आजादी को मनमोहन सिंह ने आतंकवाद कहकर साझा बयान जारी कर दिया है।</p>
<p style="text-align: justify;">ब्लूचिस्तान की जंग-ए-आजादी के पीछे भारत का हाथ बताना पाकिस्तान का पुराना आरोप  रहा है, लेकिन किसी भी प्रधानमंत्री ने बेसिर-पैर के इस आरोप पर कभी तवज्जो नहीं दी। पाकिस्तान की सेना पिछले पचास साल से ब्लूचिस्तान के शासक रहे नवाब अकबर खान बुगती की रहनुमाई में चल रहे सशस्त्र आंदोलन से जूझती रही है। तीन साल पहले परवेज मुशर्रफ ने धोखे से उनकी हत्या करवा दी थी। ब्लूचिस्तान में भारत का हाथ होने के आरोप को नवाब बुगती के बेटे तलत बुगती ने पूरी तरह खारिज किया है। मनमोहन सिंह ने चार साल पहले पाक को भी आतंकवाद का शिकार बता दिया और अब ब्लूचिस्तान में चल रही जंग-ए-आजादी में अपनी टांग अड़ा ली है। भारत-पाक साझा बयान में ब्लूचिस्तान का जिक्र आना न तो अच्छी कूटनीति का सबूत है न अच्छी विदेशनीति का। मनमोहन सिंह सफाई दे रहे हैं कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने ब्लूचिस्तान में आतंकवादी वारदातों पर चिंता जाहिर की थी, जिस पर उन्होंने कहा था कि भारत का उससे कुछ लेना देना नहीं, फिर भी पाक चाहे तो जो पूछना चाहे, पूछ सकता है। यह कोई अच्छी कूटनीति का सबूत नहीं है, प्रधानमंत्री अगर कूटनीति नहीं जानते तो उन्हें कूटनीतिज्ञ विशेषज्ञों को अपने साथ रखना चाहिए। उन्होंने अपना विदेश मंत्री भी ऐसा बना लिया है, जो कूटनीति में अनजान है। साझा बयान तैयार करने में अहम भूमिका निभाने वाले विदेश सचिव शिवशंकर मेनन अपनी सेवानिवृत्ति के पायदान पर हैं, उन्होंने ऐसी गलती क्यों की। वह कह रहे हैं कि साझा बयान की भाषा खराब हो सकती है, लेकिन भावना खराब नहीं है। रिटायरमेंट की दहलीज पर खड़े विदेश सचिव मेनन यह भी नहीं जानते कि विदेशनीति में राष्ट्र सर्वोपरि होता है, भावनाएं नहीं। राष्ट्र भी अपना सर्वोपरि होता है, सामने वाले का नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">कूटनीति में अनाड़ी प्रधानमंत्री की सारी टीम अनाड़ियों की साबित हो रही है। मनमोहन सिंह की दूसरी पारी में कूटनीतिक विफलताओं के चार सबूत हमारे सामने हैं। पाकिस्तान के साथ साझा बयान में आतंकवाद को बाकी मुद्दों से अलग करना और ब्लूचिस्तान का जिक्र करने के अलावा वे तीन और घटनाएं उल्लेखनीय हैं। प्रधानमंत्री ने जी-8 में अमेरिका की ओर से ग्लोबल वार्मिंग के संबंध में पर्यावरण की रक्षा के लिए &#8216;ओमिशन&#8217; घराने की जिम्मेदारी ओढ़कर भारतीय हितों की अनदेखी की। जिसे उन्हीं के मंत्री जयराम रमेश ने भारत आई अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन के सामने एतराज जताकर दुरस्त किया है। संभवत: जयराम रमेश ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से बातचीत के बाद ही स्टैंड लिया। मनमोहन सिंह की दूसरी कूटनीतिक विफलता उनकी मौजूदगी में ही जी-8 का वह प्रस्ताव है जिसमें कहा गया है कि एनपीटी पर दस्तखत नहीं करने वाले देशों को एटमी संवर्धन एवं पुन: प्रसंस्करण तकनीक नहीं दी जाएगी। मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ किए एटमी करार में यह छूट भी हासिल की थी। सितंबर 2008 में करार पर दस्तखत हो जाने के बाद नवंबर 2008 में अमेरिका ने खुद एनएसजी के नियमों में बदलाव का ड्राफ्ट तैयार किया। अब जी-8 ने इसे मंजूरी दे दी है और 45 देशों के समूह एनएसजी में पारित होने के बाद भारत पर भी लागू हो जाएगा। इसके बाद भारत को या तो संवर्धन का काम अमेरिका में करवाना पड़ेगा जिससे उसे दोहरा मुनाफा होगा या भारत को एनपीटी पर दस्तखत करने पड़ेंगे। यह एनपीटी पर दस्तखत करने का दबाव ही है। हिलेरी क्लिंटन की ओर से दिल्ली में दिया गया यह आश्वासन पूरी तरह गुमराहपूर्ण है कि यह शर्त भारत पर लागू नहीं होगी। कूटनीतिक विफलता की तीसरी बड़ी गलती हिलेरी क्लिंटन की भारत यात्रा के दौरान किया गया एंड यूज एग्रीमेंट है, जिसके तहत अमेरिका अपनी ओर से बेचे गए सामान की इंस्पैक्शन करने का हकदार होगा। वह यह जांचना चाहेगा कि उसने जो वस्तु बेची थी उसका उस काम के लिए उपयोग हो रहा है या नहीं, जिस काम के लिए बेची गई थी। एटमी करार के समय मनमोहन सिंह ने संसद से वायदा किया था कि एटमी रिएक्टरों का अमेरिकी इंस्पैक्टर नहीं, अलबत्ता आईएईए के इंस्पैक्टर निरीक्षण करेंगे। एंड यूज एग्रीमेंट से एटमी करार का वह हिस्सा बेकार हो गया है कि आईएईए के इंस्पैक्टर ही निरीक्षण करेंगे। एनएसजी की एनरिचमेंट एण्ड रीप्रोसेसिंग (इएनआर) नीति के बाद करार का दूसरा हिस्सा भी बेकार हो जाएगा जिसमें हमें संवर्धन और पुन: प्रसंस्करण का अधिकार दिया गया था।</p>
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