अटल-आडवाणी की जगह आडवाणी-मोदी

मनमोहन सिंह ने गुजरात में फिर गोधरा उठा दिया। दिल्ली में चौरासी कांग्रेस की आफत बना। तो गुजरात में गोधरा बीजेपी की आफत बनाने की कोशिश। यों अपन इसे जोड़कर नहीं देखते। पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश कांग्रेस के भागों छींका फूटने जैसा। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया- ‘गोधरा दंगों में नरेन्द्र मोदी की भूमिका भी जांची जाए।’ कोर्ट के आदेश पर अरुण जेटली कुछ ऐसे भड़के- ‘चुनाव के दौरान अदालत के बाहर और अदालत के जरिए विवाद खड़ा करना कांग्रेसी परंपरा।’ अपन बताते जाएं- अदालत का ताजा फैसला दिवंगत कांग्रेसी सांसद अहसास जाफरी के मामले में। अदालत में अर्जी थी जाफरी की बेवा जकिया नसीन अहसान की। पर बात पीएम के बयान की। मोदी ने पीएम के बयान पर फौरन चुनौती दी- ‘मैं कसूरवार निकलूं, तो फांसी पर चढ़ा दो। आप पांच साल से पीएम थे। मेरे खिलाफ कुछ नहीं कर पाए। यह आपके कमजोर होने का सबूत।’ वैसे चुनाव के वक्त गोधरा उठने से मोदी को फायदा ही होगा। पता नहीं यह बात कांग्रेस के भेजे में क्यों नहीं पड़ती। मोदी तो बाग-ओ-बाग हुए होंगे। तो क्या आडवाणी नहीं, मोदी से लड़ना चाहती है कांग्रेस। यह पंद्रहवीं लोकसभा का पीरिएड कम होने के संदेह का सबूत। कांग्रेस अगला चुनाव राहुल की रहनुमाई में लड़ने की तैयारी में। बीजेपी में अगले चुनाव की रहनुमाई पर अभी से घमासान। बीजेपी में यह कभी नहीं पूछा गया- अटल के बाद कौन। अटल के बाद आडवाणी होंगे। यह जवाब सबको पता था। जिन्ना विवाद पर आडवाणी कुछ देर पिक्चर से बाहर दिखे। तो अटल का कोई विकल्प नजर नहीं आया। आखिर सुदर्शन-आडवाणी का युध्दविराम हुआ। तो बीजेपी वर्करों ने राहत की सांस ली। याद करो, जब कुछ महीने आडवाणी पिक्चर में नहीं थे। तब राजनाथ, मोदी, अरुण में कितना घमासान हुआ। राजनाथ ने बागडोर संभालते ही दो काम किए। पहला- मोदी को पार्लियामेंट्री बोर्ड से बाहर किया। दूसरा- अरुण जेटली को प्रवक्ता पद से हटाया। प्रमोद महाजन जब नहीं रहे। तो जेटली-मोदी ही आडवाणी की आखें थे। राजनाथ के कदम से शुरू हुए घमासान को तीन साल बीत चुके। पर अभी भी खत्म नहीं हुआ। टिकटों के बंटवारे में अपन ने देखा ही। राजनाथ ने सुधांशु मित्तल को अहम पद दिया। तो कैसे बवाल खड़ा हुआ। जेटली ने उन मीटिंगों का बायकाट किया। जिसकी रहनुमाई राजनाथ करें। अपन को वह दिन नहीं भूलता। जब जेटली पार्लियामेंट्री बोर्ड की मीटिंग में नहीं गए। पर घंटेभर बाद आडवाणी के घर मीटिंग में थे। भले ही बगल में राजनाथ बैठे थे। पर मीटिंग की रहनुमाई नहीं कर रहे थे। जेटली-राजनाथ में युध्द खत्म नहीं हुआ। सिर्फ सीज फायर। आडवाणी की दोनों आंखें चुनाव नहीं लड़ रहीं। न जेटली, न मोदी। दोनों का निशाना आडवाणी को अटल बनाने का। आडवाणी पीएम हो गए। तो नंबर दो तय करना भी उनके हाथ में होगा। बात आडवाणी के बाद की। जो नंबर दो होगा। वही विकल्प होगा। अपने अरुण शौरी ने भले मासूमियत से कहा। पर बीजेपी में नई बहस तो छिड़ गई। वही जंग फिर शुरू हो चुकी। जो जिन्ना विवाद के समय थी। भले ही बीजेपी ने पुराना राग अलापा- ‘आडवाणी के बाद की लाईन में दर्जनों नेता। वक्त आने पर तय होगा।’ पर मोदी के समर्थन में बयानों की बाढ़ आ गई। विरोध में सिर्फ एक बयान आया। वह था राजनाथ सिंह का। बोले- ‘पार्टी में ऐसी कोई चर्चा नहीं हुई।’ तो क्या दूसरे नंबर की होड़ राजनाथ-मोदी में।

One Response to “अटल-आडवाणी की जगह आडवाणी-मोदी”

  1. फिलहाल आडवाणी से ज्यादा समर्थक मोदी के है.

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