बीजेपी से परमानेंट किनारे के मूड में नवीन

कांग्रेस के हमले सोची-समझी रणनीति। लालू-पासवान को फूके कारतूस मानने लगी कांग्रेस। गुरुवार को शीला दीक्षित भी हमलावर हुई। वाईएसआर के बाद शीला ही दमदार। अपन भले ही वाईएसआर को 29 से 15 पर समझें। कांग्रेसी नहीं मानते। तेलंगाना में भले ही झटका लगा। पर गुरुवार को रायलसीमा-आंध्र में दबदबा रहा। अब जब सारा आंध्र निपट गया। तो कांग्रेस का अपना दावा 19-20 सीट का। यानी दस का नुकसान तो पक्का। बात एसेंबली की। तो वाईएसआर को बहुमत भले न मिले। यों वाईएसआर का दावा स्पष्ट बहुमत का। पर बहुमत न भी मिला। तो भी सरकार उन्हीं की बनेगी। दिल्ली में ऐसा कहने वालों की कमी नहीं। कहते हैं- थोड़ी बहुत कसर हुई भी। तो औवेसी जैसे जुटेंगे। वाईएसआर फिर से सीएम बने। तो चंद्रबाबू को जोरदार झटका लगेगा। वह तो दिल्ली की गद्दी में अहम रोल की फिराक में। टीडीपी-टीआरएस-लेफ्ट गठजोड़ तो दमदार। पर बाबू की मजबूती 1999 जैसी नहीं। तब बाबू-बीजेपी मिलकर लड़े। तो बाबू 29 और बीजेपी सात सीटें जीती थी। पिछली बार बाबू किनारा कर गए। तो बीजेपी धड़ाम से गिरी थी। अब जब टीडीपी-टीआरएस-लेफ्ट का तगड़ा गठबंधन। तो मानकर चलिए बीस-बाईस तो झटकेंगे ही। हैदराबाद की एआईएमआईएम की सीट तो बरकरार ही। चिरंजीवी भी एक-दो लेंगे ही। अपने बूते ही 1998 में चार सीटें जीत चुकी बीजेपी। अपन को बीजेपी के रणनीतिकार बता रहे थे- 'बंडारू दतात्रे के जीतने की उम्मीद।' आंध्र में दतात्रे-वेंकैया की अंदरूनी जंग कौन नहीं जानता। एक जमाना था, जब तेलंगाना में बीजेपी छा रही थी। पर अब सूपड़ा साफ। एसेंबली में खाता खुला, तो खुला। नहीं, तो ना सही जैसी हालत। पर अपन बात कर रहे थे शीला दीक्षित की। जो तो थी लखनऊ। पर मुलायम से ज्यादा बरसी लालू पर। बोली- 'कन्फ्यूज हो गए हैं लालू-मुलायम। कभी तीसरे मोर्चे की बात करते दिखेंगे। तो कभी चौथे मोर्चे की। फिर अगले दिन खुद को यूपीए का बताएंगे।' बात लालू यादव की चली। तो बता दें- लालू-पवार के बदलते रंग अपन हफ्तेभर से देख रहे। गुरुवार को दोनों एक राग में बोले- 'चुनाव बाद वामदलों की जरूरत पड़ेगी।' पर यह मुदई से ज्यादा गवाह के चुस्त होने वाली बात। अभिषेक मनु सिंघवी ने दोनों को नसीहत देते कहा- 'नकचढ़ों से समर्थन की नौबत आएगी ही नहीं।' उनने याद भी कराया- 'जब हमने एटमी करार पर लेफ्ट का वीटो नहीं माना। तो पीएम पद पर किसी का वीटो क्यों मानेंगे।' तो अब लालू, मुलायम, पवार दिमाग में रख लें। मनमोहन पर कोई समझौता नहीं करेगी कांग्रेस। पर अहम बात लालू-पवार या शीला की नहीं। अहम बात वामपंथी कबीले के सरदार करात की। उनने झट से कहा- 'कांग्रेस को किसी हालत में समर्थन नहीं देंगे।' ऐसी ही कुछ बात बीजेपी के बारे में नवीन पटनायक ने कही। अपन ने जब आंध्र की बात कर ही ली। तो उड़ीसा की भी कर लें। जहां लोकसभा के साथ एसेंबली भी निपट गई। आंध्र में जैसी हालत वाईएसआर की। उड़ीसा में वैसी हालत नवीन पटनायक की। दोनों सत्ता के किनारे। यों अपन को दोनों राज्यों में लंगड़ी एसेंबली का डर। पर होंगे दोनों सत्ता के करीब। जैसा अपन ने ऊपर लिखा- राजशेखर जुगाड़ कर लेंगे। पर नवीन बाबू का क्या होगा। अपन ने बाईस अप्रेल को बताया था- 'कांग्रेस की निगाह नवीन-नीतिश दोनों पर।' भाई लोगों को उम्मीद नवीन के एनडीए में लौटने की भी। पर चुनाव निपटे तो उनने कह दिया- 'बहुमत नहीं मिला। तो भी बीजेपी से समर्थन नहीं लेंगे।' तो क्या कांग्रेस से पक रही खिचड़ी। यों राजनीति में आज कही बात कल भी कायम रहे। जरूरी नहीं।

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