कांग्रेस की लालू को छोड़ नीतिश पर निगाह

कांग्रेसियों को तो खुश होना चाहिए। आडवाणी ने जब मनमोहन को कमजोर कहा। तो सोनिया को ताकतवर बताया। फिर तिलमिलाहट क्यों। क्या सोनिया को मनमोहन से ज्यादा ताकतवर नहीं मानते। सोनिया जवाब दें, तो समझ भी आए। लग्गुओं-भग्गुओं का जवाब देना नहीं बनता। अब सोनिया ने मनमोहन को पीएम का उम्मीदवार बताया। तो उनने कौन सा सीडब्ल्यूसी से पास करवाया। बात मनमोहन के उम्मीदवार होने की। अब लालू ने मनमोहन को उम्मीदवार मानने से भी इंकार कर दिया। सोनिया ने उम्मीदवार घोषित किया था। तो कांग्रेसी बचाव में कैसे न आते। सबसे पहले लालू के खास कपिल सिब्बल ही बोले- 'मनमोहन ही हमारे उम्मीदवार।' प्रणव मुखर्जी भी बचाव में आए। उनने कहा- 'मनमोहन की बराबरी का देश में नेता नहीं।' प्रणव दा का कहना जायज। मनमोहन पर बात अड़ेगी। तो लाटरी प्रणव दा की ही खुलेगी। पर लालू भड़के तब। जब सोनिया ने लालू को बिहार का जंगलराज याद कराया। लालू के बयान देखिए। पहले दिन- 'बाबरी मस्जिद टूटने में कांग्रेस भी जिम्मेदार।' दूसरे दिन- 'मैं कांग्रेस के रहमोकरम पर मंत्री नहीं बना।' तीसरे दिन- 'पीएम पद का फैसला चुनाव बाद होगा।' जयंती नटराजन सकपका सी गई। बोली- 'बिहार में कांग्रेस की बढ़ती ताकत से बौखलाए हैं लालू। लालू को और कोई ठोर नहीं। फिर भी पता नहीं क्यों ऐसे बयान दे रहे।' पर राजनीति में जो दिखे। वह हो भी, जरूरी नहीं होता। लालू-पासवान की घटती ताकत से कांग्रेस वाकिफ। सो कांग्रेस की कोशिश नीतिश कुमार पर डोरे डालने की। ऊपर से भले न लगे। पर जयंती के बयान का मतलब निकालिए। दस्तखत किए बयान में उनने लिखा- 'एनडीए का एजेंडा जारी नहीं हो सका। क्या बाकी दल बीजेपी से सहमत नहीं हो पाए। क्या बचा खुचा एनडीए भी टूटेगा। क्या चुनाव से पहले टूटेगा।' अपन ने जो इशारा समझा। उसकी तस्दीक शाम होते-होते प्रणव दा ने कर दी। सोनिया को जाना था बिहार। वह नहीं गई, सो प्रणव दा को भेजा। प्रणव दा ने समस्तीपुर में कुछ यों कहा- 'लालू ज्यादा हेकड़ी न दिखाएं। अपने बूते मंत्री नहीं बन सकते। लालू ने कांग्रेस को डोरमैट की तरह इस्तेमाल किया।' अब आपको समझ आया होगा। कांग्रेस की निगाह नीतिश पर। अलबत्ता नवीन पटनायक पर भी। अपन को कांग्रेस का एक रणनीतिकार बता रहा था- 'जब हमने बंगाल ममता को दे दिया। तमिलनाडु करुणानिधि को दे दिया। तो केन्द्र में सत्ता के लिए उड़ीसा नवीन को देने में क्या एतराज। बिहार भी तो लालू को दिया था। लालू की जगह नीतिश मजबूत हों। तो बिहार में बदलने में क्या हर्ज।' पर अरुण जेटली को नीतिश पर पूरा भरोसा। वैसे ऐसा भरोसा भाजपाईयों को नवीन पटनायक पर भी था। कांग्रेस का बस चलता। तो मुलायम की जगह मायावती पर भी डोरे डालते। पर मायावती को बस में करना आसान नहीं। वाजपेयी जब पीएम थे। तो तीन औरतों से बेहद परेशान रहे। माया, ममता, जयललिता। पर बात मायावती की। मंगलवार को वह बीजेपी की लाइन लेती दिखी। इलेक्शन कमीशन को कांग्रेस का पिछलग्गू बताया। सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगाया। यह भी कहा- मेरी हत्या की साजिश रच रही है कांग्रेस। कपिल सिब्बल बोले- 'हम क्यों हत्या करवाएंगे। वह खुद ही आत्महत्या करेगी।' वैसे कपिल सिब्बल क्राइम के उम्दा वकील। अच्छी तरह जानते हैं- दहेज हत्याओं को कैसे आत्महत्या बताया जाता है।

नीतिश जी adventure करना छोड़

नीतिश जी adventure करना छोड़ दें. जनता जीन लोगो से ट्रस्ट होकर नीतिश को मुख्यमंत्री बनाई थी वो उनको अच्छी तरह से मालुम होनी चाहिए. बिहार में बीजेपी का कोई भी कमुनल चेहरा नहीं है, इसलिए वो बिना वजह के लफडे में ना पड़ें. कांग्रेस के साथ जाने के चक्कर में नीतिश बाबू कहीं बिहार से ही ना चला जाएँ.

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट