तो यूपीए के सैध्दांतिक गठबंधन की खुली पोल

अपने अभिषेक मनु सिंघवी इतवार को जयपुर में थे। तो उनने आडवाणी पर जमकर हमले किए। सिंघवी का पहला एतराज- स्विस बैंकों में जमा काले धन का सवाल उठाने पर। बोले- 'यह सवाल अब क्यों उठाया। जब सरकार थी, तब क्यों नहीं उठाया। जब विपक्ष के नेता थे, तब क्यों नहीं उठाया।' सिंघवी को मनमोहन ने मंत्री बनाया होता। तो  यह बात न कहते। आडवाणी ने मनमोहन को अप्रेल 2008 को चिट्ठी लिखी थी। तब जर्मनी को उन भारतीयों की लिस्ट मिली थी। जिनका पैसा स्विस बैंक में था। आडवाणी ने चिट्ठी लिखी। तो चिदंबरम के एक सेक्रेटरी ने जर्मन एम्बेस्डर को लिखा- 'लिस्ट लेने के लिए कोई भाग-दौड़ न की जाए।' अरुण शौरी ने सही कहा- 'जिस सरकार ने क्वात्रोची के सील खाते खुलवा दिए। वह काला धन क्यों लाएगी।' सिंघवी ने दूसरी बात कंधार पर कही। बोले- 'आडवाणी उस सरकारी प्रोसेस के हिस्सा थे। जिसमें आतंकियों को छोड़ने का फैसला हुआ। वह अपनी आत्मकथा में यह कैसे कहते हैं- 'उन्हें कुछ पता नहीं था।' आडवाणी की आत्मकथा पढ़ लेते। तो सिंघवी यह भी न कहते। आडवाणी ने पेज नंबर 624 पर उन हालात का खुलासा किया। जिनमें तीन आतंकियों को छोड़ने का फैसला करना पड़ा। सुनी सुनाई बात पर नेताओं के बयान भरमाने वाले। सुनी सुनाई और आंखों देखी में कितना फर्क। यह बताने के लिए सोमनाथ चटर्जी का उदाहरण लीजिए। सीपीएम नेता कहते थे- 'दादा ने स्पीकर पद के लिए कांग्रेस से हाथ मिला लिया था।'  तो अपन भरोसा नहीं करते थे। पर अब सोमनाथ चटर्जी ने खुद खुलासा कर दिया। तो भरोसा करना पड़ेगा। दादा का इंटरव्यू सुन अपन दंग रह गए। दो बातें चुभने वाली लगी। पहली- 'सीपीएम को सरकार से समर्थन वापस न लेने की लिखित सलाह।' दूसरी- 'समर्थन वापसी बीजेपी को फायदा पहुंचाएगी।' दोनों ही बातें स्पीकर के निष्पक्ष होने की पोल खोलने वाली। अपन अपनी कलम न भी चलाते। पर प्रकाश करात अपन से सहमत। करात ने कहा- 'सोमनाथ पद पर बने रहना चाहते थे। इसलिए उनने कांग्रेस का समर्थन किया। उनने स्पीकर के निष्पक्ष होने की धज्जियां उड़ा दी।' उस सीक्रेट चिट्ठी का खुलासा प्रकाश करात ने नहीं किया। सोचो, करात कांफिडेंस वोट के समय खुलासा करते। तो सोमनाथ चटर्जी का क्या होता। क्या वह स्पीकर पद पर बने रह पाते। करात ने सोमनाथ को पार्टी से निकाला। पर चिट्ठी का खुलासा फिर भी नहीं किया। अब दादा ने खुद अपनी निष्पक्षता की खुद पोल खोल दी।  दादा ने सर्वसम्मति से शुरूआत की। अल्पमत के स्पीकर बन कर रिटायर हुए। मनमोहन की शुरूआत और अंत भी मिलता-जुलता। लेफ्ट तो पहले साथ छोड़ गया था। लालू, पासवान, पवार आखिर में छोड़ गए। मुलायम से साढ़े चार साल नफरत का खेल रहा। आखिर में प्यार की पींगें पड़ी। पर प्यार चार दिन की चांदनी जैसा ही रहा। हनीमून खत्म होते ही तलाक। मुस्लिम वोटों के लिए तीनों कांग्रेस से बिगड़ गए। मुस्लिम वोट खिसकते दिखे। तो लालू बोले- 'कांग्रेस भी बाबरी मस्जिद टूटने की जिम्मेदार।' अब मनमोहन सफाई देते घूम रहे। पर सोमवार को पासवान ने राग बाबरी अलाप दिया। बोले- 'लालू ने क्या गलत बोला।' उनने लालू के राग बाबरी की वजह भी बता दी। बोले- 'सोनिया जमुई में बिहार के लालूराज के मिस गवर्नेंस की बात न कहती। तो लालू भी न बोलते।' देखा आपने सिध्दांत आधारित गठबंधन का खोखलापन। राजनीति में सिध्दांतों की बात चली। तो अपन को करुणानिधि का बयान भी याद आया। उनने कहा- 'प्रभाकरण मेरे दोस्त। मैं आतंकवादी नहीं। वह भी आतंकवादी नहीं।' अपन को याद दिलानी पड़ेगी- जैन आयोग की अंतरिम रपट। अठाईस अगस्त 1997 को आई रपट में भी यही बात थी। जिस पर सीताराम केसरी ने गुजराल सरकार गिरा दी थी। सात साल बाद सोनिया ने करुणानिधि से सिध्दांतहीन गठबंधन किया।  अब उसकी भी पोल खुल गई।

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