संन्यास राजनीति से, पद से नहीं

चलो वाजपेयी के चुनाव लड़ने की खबरों का फुल स्टाप हुआ। राजनाथ सिंह ने लखनऊ से लालजी टंडन को भिड़ा दिया। वह तो भिड़ने को तैयार ही थे। अब सोमवार को चुनावों का एलान होने के आसार। तो पता चलेगा- सामने संजय दत्त उतर पाएंगे या नहीं। वैसे कानूनन चुनाव नहीं लड़ सकते। पर बात वाजपेयी की। पता नहीं, वाजपेयी के लड़ने की चंडूखाने की खबरें कौन पेल रहा था। अपन ने तो 30 दिसंबर 2005 को खुद वाजपेयी के मुंह से सुना था। जब उनने चुनावी राजनीति से संन्यास का एलान किया। मुंबई में बीजेपी काउंसिल का आखिरी दिन था। अब बात राजनीति के दूसरे संन्यास की। सोमनाथ चटर्जी ने दसवीं बार फिर संन्यास का एलान किया। अपन नौ बार पहले भी सुन चुके। गुरुवार को भरी संसद में नौंवी बार किया था। गुरुवार के एलान पर अपन को इस्तीफे की उम्मीद थी। पर उनने शुक्रवार को प्रैस कांफ्रेंस बुला ली। वाजपेयी ने संन्यास के बाद कभी प्रैस कांफ्रेंस नहीं की। उनने तो सिर्फ चुनावी राजनीति से संन्यास लिया था। राजनीति से संन्यास की बात नहीं की थी। वाजपेयी ने तब-तब राष्ट्रहित में बयान जरूर दिया। जब-जब उन्हें कुछ गलत होता दिखा। जैसे एटमी करार। दादा की पार्टी भी एटमी करार के खिलाफ थी। पर दादा अपनी पार्टी को बीच मझदार में छोड़ गए। शुक्रवार को दादा ने कई गढ़े मुर्दे खुद उखाड़े। बोले- 'मैंने स्पीकर बनने के बाद कभी राजनीति नहीं की। एक बार सेंट्रल कमेटी के वक्त दफ्तर जरूर गया था। दो बार श्रध्दांजलि देने जरूर गया था। एक बार सेमिनार में भी गया था। बस इतना ही।' दादा ने अपनी सफाई में बहुत कुछ कहा। सदन में भेदभाव के आरोप तो दादा पर हर सैशन में लगे। वाजपेयी तक ने चिट्ठी लिखकर भेदभाव के आरोप लगाए। विपक्ष सबूतों के साथ आरोप लगाता रहा। स्पीकर के खिलाफ वाकआउट भी पहली बार हुआ। वह भी एक नहीं। अलबत्ता दो-दो बार। पहली बार एनडीए ने। दूसरी बार लैफ्ट ने। फिर स्पीकर ने खुद भी वाकआउट करके इतिहास बनाया। दस सांसदों की बर्खास्तगी भी पहली बार हुई। वह भी बिना मुकदमें, बिना दलील, बिना वकील। कोर्ट तो संसदीय काम-काज में दखल नहीं देती। सो संसद के फैसले पर कोर्ट ने मोहर लगानी ही थी। पर दस सांसदों को अपनी बात कहने का मौका तक नहीं दिया। दादा खुद को हैडमास्टर कहने पर गदगद। पर स्पीकर हैडमास्टर नहीं होता। स्टूडेंट्स कभी अपना हैडमास्टर खुद नहीं चुनते। स्टूडेंट चुनते हैं मानिटर। मानिटर हैडमास्टर बन बैठे। तो सोचो स्कूल का क्या होगा। वही हाल हुआ चौदहवीं लोकसभा का। अपन दादा के संन्यास को चुनौती देने वाले कौन। पर संन्यास दो वजह से हुआ। जो अभी असल में हुआ नहीं। पहली- सीपीएम ने दादा को पार्टी से बाहर निकाल दिया। दूसरी- दादा की बोलपुर सीट रिजर्व हो चुकी। दादा ठहरे ब्राह्मण। ताकि सनद रहे, सो याद दिला दें। दादा जब लाभ के पद पर घिरे थे। तो उनने संन्यास भाव नहीं दिखाया। कांग्रेस ने जब कानून बनाकर लाभ के पद माफ किए। तो दादा की चेयरमैनी थी भी। दादा ने संन्यास की बात सिर्फ तब कही। जब सीपीएम ने पार्टी से निकाला। वाजपेयी की तरह नहीं। जब एनडीए उनके दरवाजे पर खड़ा रहता था। पर सीपीएम से उखड़े दादा बोले- 'कम्युनिस्ट किसी के बाप की जागीर नहीं।' उनने यह पूरी सीपीएम को कहा या सिर्फ करात को। अपन नहीं जानते। पर जब से दादा को सीपीएम ने सरकार का साथ देने पर निकाला। तब से दादा को राजदूत बनाने की चर्चाएं। आखिर शुक्रवार को किसी ने पूछ ही लिया- 'क्या आप कोई बड़ा पद मंजूर करेंगे?' दादा बोले- 'कौन दे रहा है?' संन्यास तो राजनीति से लिया है, पद से नहीं। तभी तो अभी स्पीकर पद नहीं छोड़ा।

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