गवर्नर की गेंद केंद्र के पाले में

राजनीति इसी का नाम। सुषमा स्वराज बेंगलुरु में गांधी की मूर्ति के सामने बोली। तो गवर्नर रामेश्वर ठाकुर का कोई लिहाज नहीं किया। अपनी शैली बरकरार रखते हुए गरजी। येदुरप्पा को सरकार बनाने का न्यौता न मिलने पर आंदोलन की चेतावनी दी। पहले से दी गई दो दिन की मोहलत का भी ख्याल नहीं रखा। शाम तक की चेतावनी दे डाली। पर गवर्नर रामेश्वर ठाकुर ने सुषमा की बातों का बुरा नहीं माना। अलबत्ता कर्नाटक में मेहमान मानकर राजभवन आने का न्यौता भेज दिया। सुषमा को अचंभा नहीं हुआ। आखिर सालों-साल राजनीति में इकट्ठे काम किया। एक साथ संसद में रहे, कई कमेटियों में इकट्ठे रहे, कई यात्राएं इकट्ठी की। सो इन्हीं संबंधों के नाते ठाकुर ने सुषमा को राजभवन बुलाया। सुषमा राजभवन से मुस्कुराते हुए निकली। तो तस्वीर साफ थी। खबर थी- 'गवर्नर ने गृह मंत्रालय को रिपोर्ट भेज दी।' बीजेपी को चार दिन से इसी बात का इंतजार था। रिपोर्ट में ऐसा कुछ नहीं था, जिससे बीजेपी फिक्रमंद होती। गवर्नर ने वही लिखा। जो उनने देखा। उनने अपनी रिपोर्ट में लिखा- 'कुछ निर्दलीयों समेत मेरे पास जेडीएस-बीजेपी के 129 विधायक आए। उन्होंने येदुरप्पा को अपना नेता चुनने की बात कही और विधानसभा बहाल करने की मांग की। मैंने विधायकों की पुष्टि कर ली है और मैं संतुष्ट हूं।' पर गवर्नर ने अपनी तरफ से किसी तरह की कोई सिफारिश नहीं की। विधानसभा बहाल की जाए, या नहीं। येदुरप्पा को न्यौता दिया जाए या नहीं। रिपोर्ट में ऐसा कुछ नहीं कहा, अलबत्ता फैसला केंद्र सरकार पर छोड़ दिया। जो मुनासिब समझें करे। चाहे तो विधानसभा बहाल कर सरकार बनवाए। चाहे तो बीजेपी से बड़े टकराव को तैयार हो जाए। रामेश्वर ठाकुर ने वह गलती नहीं की। जो दो साल पहले बिहार के गवर्नर के नाते बूटा सिंह ने की थी। अब न तो बीजेपी-जेडीएस गवर्नर को निशाना बना सकते हैं, न कांग्रेस कोई गिला-शिकवा कर सकती है। जो फैसला लेना हो, दिल्ली में ही ले लिया जाए।

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