सत्ता चिड़िया की आंख बीजेपी ने तान लिया बाण

शुक्रवार बीजेपी अधिवेशन का आखिरी दिन था। आंदोलन की रूपरेखा सामने आई। दूसरे दिन राम मंदिर की तान अलापी गई। तो तीसरे दिन गंगा मैया और मुस्लिम आरक्षण छाया। तीनों मुद्दे हिंदुत्व के। यों नितिन गड़करी कट्टर हिंदूवादी नहीं। पर संघ की लाईन तो लेनी पड़ेगी। यों बात महंगाई, राष्ट्रीय सुरक्षा और कश्मीर की भी हुई। जिनका देश की जनता से सीधा वास्ता। पर मीडिया को चाहिए वे तीनों मुद्दे। जिनसे बीजेपी को सांप्रदायिक ठहराया जाए। जो नितिन गड़करी ने थमा दिए। मंदिर का मुद्दा तो जैसे मीडिया से डरकर आया। कहा- 'मैं मंदिर का मुद्दा नहीं उठाऊंगा। तो मीडिया कहेगा- मुद्दा छोड़ दिया।' वैसे उनने कोई नई बात नहीं कही। कांग्रेस 'मंदिर दो, मस्जिद लो' फार्मूले से भी परेशान सी दिखी। पर खुद कांग्रेस को नरसिंह का वादा याद नहीं। उनने मस्जिद बनाने का वादा किया था। गड़करी ने राम मुद्दे पर सिर्फ रस्म अदायगी की। ताकि विनय कटियार जैसे मुंह बंद रखें। वैसे गड़करी ने राजनाथ और कटियार को काम पर लगा दिया। खाली दिमाग, खुराफात का घर होता है। गंगा की सफाई का जिम्मा सौंप दिया। राजीव गांधी ने शुरू किया था गंगा सफाई अभियान। अब तक तीन हजार करोड़ डकार गए सफाई के नाम पर। यह आरोप लगाया बीजेपी ने। यों कहने को तो ग्रामीण रोजगार योजना से भी पार्टी वर्करों की खूब चांदी हुई। राजनाथ सिंह बोले- 'गंगा धार्मिक, सांस्कृतिक आस्था का केंद्र। पर कांग्रेस ने गंगा के नाम पर तीन हजार करोड़ डकार लिए। पवित्र गंगा गंदे नाले में बदल गई।' दूसरी बार हारने के बाद बीजेपी पुराने मुद्दों पर लौटी। तो जन आंदोलन की रूपरेखा भी बन गई। अब मुस्लिम आरक्षण और महंगाई के मुद्दों पर अलग-अलग दिन संसद घेरेंगे। महंगाई पर सांप्रदायिक मुद्दा भारी पड़ा। महंगाई पर यशवंत सिन्हा के कटाक्ष मनमोहन सिंह को खूब चुभेंगे। आर्थिक प्रस्ताव पेश करते हुए ठेठ देहाती भाषा में बोले- 'जब धूप निकली थी। तब छत पर लिपाई-पोताई नहीं की। ऊंची विकास दर का ढोल बजाते रहे। बरसात आई तो टपक रही है छत।' सरकार की आर्थिक नीतियों की खिल्ली उड़ाते बोले- 'यह हुआ है उस सरकार में। जिसका पीएम अर्थशास्त्री। पीएम बनने की योग्यता भी यही बता रही थी कांग्रेस।' बोले- 'मनमोहन सिर्फ चेहरा हैं। नीतियां चल रही सोनिया की।' मनमोहन की ऐसी ही खिल्ली पहले आडवाणी उड़ाते थे। मुस्लिम आरक्षण के खिलाफ मोर्चा वेंकैया नायडू ने संभाला। बीजेपी ने रंगनाथ मिश्र की सिफारिशें तो खारिज करनी ही थी। आंदोलन का ऐलान भी कर दिया। प्रस्ताव में कहा- 'ओबीसी का मुस्लिम कोटा 8.4 फीसदी से 15 बर्दाश्त नहीं होगा। धर्म परिवर्तन करने वाले ईसाईयों-मुसलमानों को आरक्षण कबूल नहीं। यह हिंदुओं का हक मारना होगा।' मुस्लिम आरक्षण पर तो देश की अदालतें भी खफा। पर हिंदुओं का हक मारने का राजनीतिक पैंतरा गजब का। कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक के लिए पागल। तो बीजेपी भी हिंदू वोट बैंक का कार्ड खेलने में नहीं चूक रही। एक सेर, तो दूसरा सवा सेर। सांप्रदायिक कार्ड दोनों के हाथ में। पर बीजेपी के कश्मीर मुद्दे की अचानक वापसी भी हुई। वाजपेयी सक्रिय थे। तो मार्गदर्शन उन्हीं का हुआ करता था। अब मार्गदर्शन की बारी आडवाणी की। यों तो गुरुवार को ही प्रस्ताव में कश्मीर आ गया था। पर अपने मार्गदर्शन में कश्मीर का मोर्चा आडवाणी ने खोला। आडवाणी जब होम मिनिस्टर थे। तब फारुख अब्दुल्ला सीएम थे। उनने स्वायत्ता का राग अलापा था। जिसे आडवाणी ने खारिज किया। अब वही फारुख कांग्रेस के साथ। तो सत्ता के गलियारों में स्वायत्ता की नई सुगबुगाहट। आडवाणी ने चेतावनी दी- 'कांग्रेस ने 1953 जैसी स्थिति दुबारा लाने की गुस्ताखी की। तो बीजेपी श्यामा प्रसाद की कुर्बानी दोहराने को तैयार।' नितिन गड़करी ने फौरन कमान संभाल ली। बेटे की शादी से निपट कर आएंगे। तो चौबीस को जम्मू कश्मीर में आंदोलन की शुरूआत करेंगे। बात पाक से बातचीत पर भी जमकर हुई। आडवाणी-गडकरी ने अमेरिका के हाथों खेलने का आरोप लगाया। बीजेपी के हमलों से कांग्रेसी बचाव मुद्रा में दिखे। गुरुवार को शिवशंकर मेनन ने पीएमओ में बुलाकर मीडिया को ब्रीफ किया। तो शुक्रवार को चिदंबरम-एंटनी सफाई देते दिखे। एंटनी बोले- 'बातचीत में गलत क्या है?' पूछ सकते हैं- 'फिर सवा साल क्यों ठप्प थी। फिर शर्म-अल-शेख के बाद क्यों पीछे हटे थे मनमोहन।' चिदंबरम सफाई देते बोले- 'बातचीत में 26/11 उठाएंगे।' पर बीजेपी अपने तेवरों पर लौटती दिखी। संसद सत्र के मुद्दे तय हो गए। भारत-पाक बात। कश्मीर। महंगाई। मुस्लिम आरक्षण। आडवाणी-गडकरी ने 2014 का निशाना साध लिया। आडवाणी बोले- 'हार से हताश-निराश न हों।' गड़करी बोले- '2014 चिड़िया की आंख।' तो कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी कहते दिखे- 'आडवाणी फिर देख रहे हैं पीएम बनने का ख्वाब।'

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