ब्यूरोक्रेसी की अकल ठिकाने लगाई तीन दस जनपथियों ने

  • strict warning: Non-static method view::load() should not be called statically in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/views.module on line 906.
  • strict warning: Declaration of views_handler_argument::init() should be compatible with views_handler::init(&$view, $options) in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/handlers/views_handler_argument.inc on line 0.
  • strict warning: Declaration of views_handler_filter::options_validate() should be compatible with views_handler::options_validate($form, &$form_state) in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/handlers/views_handler_filter.inc on line 0.
  • strict warning: Declaration of views_handler_filter::options_submit() should be compatible with views_handler::options_submit($form, &$form_state) in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/handlers/views_handler_filter.inc on line 0.
  • strict warning: Declaration of views_handler_filter_boolean_operator::value_validate() should be compatible with views_handler_filter::value_validate($form, &$form_state) in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/handlers/views_handler_filter_boolean_operator.inc on line 0.

सरदार पटेल के समय में जरूर ऐसा होता था। जब कोई मंत्री पीएम से उलझने की हिम्मत करे। इंदिरा के जमाने से वैसी हिम्मत फिर किसी ने नहीं की। जिसने भी हिम्मत की। वह केबिनेट से बाहर हो गया। वीपी सिंह का राजीव से टकराव पुरानी बात नहीं। अरुण नेहरू, अरुण सिंह और आरिफ मोहम्मद खान टकराव पर आए। तो केबिनेट से बाहर होना पड़ा। पर नेहरू से टकराव मोल लेकर भी पटेल मंत्री बने रहे। पटेल ने तो दो बार इस्तीफा भी दिया। पर नेहरू की इतनी हिम्मत नहीं थी। जो पटेल का इस्तीफा मंजूर कर लेते। श्यामाप्रसाद मुखर्जी का भी नेहरू से टकराव रहा। मुखर्जी कांग्रेस में नहीं थे। फिर भी गांधी के कहने पर केबिनेट में थे। कश्मीर जाने के लिए परमिट के मुद्दे पर टकराव हुआ तो इस्तीफा दे दिया। सरदार पटेल का तो हैदराबाद और कश्मीर पर नेहरू से खुला टकराव था। नेहरू के साथ टकराव तो पहले राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू के साथ भी हुआ। हिंदू कोड बिल के खिलाफ थे राजेंद्र बाबू। उनने दो बार बिल वापस लौटाया। तीसरी बार दस्तखत करने पड़े। पर राजेंद्र बाबू ने विरोध जता दिया था। तिब्बत पर भी कड़ा टकराव था नेहरू और राजेंद्र बाबू में। तिब्बत को चीन का हिस्सा नहीं मानना चाहते थे राजेंद्र बाबू। राजेंद्र बाबू का असली टकराव तो नेहरू के साथ सोमनाथ मंदिर पर हुआ। नेहरू ने राजेंद्र बाबू को चिट्ठी लिखकर कहा- 'आप सोमनाथ मंदिर का उद्धाटन करने न जाएं।' राजेंद्र बाबू ने जवाब लिखा- 'मेरा जाना तय है।' नेहरू ने इस पर नोट भेजा- 'जाना ही हो, तो आप अपने खर्चे पर जाएं।' राष्ट्रपति अपने खर्चे पर सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन करने गए। तब नेहरू ने ऑल इंडिया रेडियो में नोट भिजवाया था- 'सोमनाथ मंदिर के उद्धाटन की खबर प्रसारित न की जाए।' नेहरू को लोकतांत्रिक बताने वाले ऐसे किस्से भूल जाते हैं। पर इन लोगों का कद नेहरू के बराबर या बड़ा था। अब बात मौजूदा पीएम मनमोहन सिंह की। मनमोहन सिंह ने कुछ महीने पहले फरमान भिजवाया- 'मंत्रियों की परफारमेंस का इवेल्यूवेशन होना चाहिए। कामकाज की रेटिंग तय होनी चाहिए।' इसके लिए केबिनेट सेक्ट्रीएट में पीएमईएस गठित हुआ। यानी परफारमेंस मोनिटरिंग एंड इवेल्यूवेशन सिस्टम। इवेल्यूवेशन करने की जिम्मेदारी ब्यूरोक्रेसी के हाथ थी। ब्यूरोक्रेसी मंत्री की परफारमेंस बनाते। उस पर मंत्री के दस्तखत करवाते। फिर केबिनेट सेक्ट्रीएट में भिजवाते। कुछ मंत्रियों ने तो अनजाने में दस्तखत कर दिए। कुछ ने आंख बंद करके दस्तखत कर दिए। कुछ ने आंख खोलकर दस्तखत किए। दस्तखत करने वालों में गुलाम नबी आजाद भी थे। पर उनने अनजाने में दस्तखत किए। मोनिटरिंग की खबर बाहर आई। तो भड़कने वालों में सबसे पहले गुलाम नबी ही थे। गुलाम नबी की सोनिया गांधी से नजदीकी कौन नहीं जानता। कमलनाथ और अंबिका सोनी की भी सोनिया से उतनी ही नजदीकी। सो तीनों ने पीएम के फैसले पर मीटिंग की। मीटिंग में विरोध का फैसला हुआ। तीनों ने साझा चिट्ठी लिखकर गैर राजनीतिक पीएम को बताया- 'हम आपके प्रति जवाबदेह हैं। केबिनेट के प्रति जवाबदेह हैं। संसद के प्रति जवाबदेह हैं। ब्यूरोक्रेसी के प्रति जवाबदेह नहीं।' उनने चिट्ठी में पीएमओ के फरमान को लोकतंत्र के खिलाफ भी बताया। तीनों सीनियर मंत्रियों की चिट्ठी आग का धुंआ था। सो मनमोहन सिंह ने फौरन पहचान लिया। मंगलवार को सफाई दी गई। सफाई में कहा गया- 'नौकरशाह मंत्रियों के काम का मूल्यांकन नहीं कर रही। न कोई रेटिंग तय की जा रही। पीएमईएस का मकसद लक्ष्य की समीक्षा। पीएमईएस डिपार्टमेंट्स में तालमेल बिठाती है। ताकि लक्ष्य पूरा हो।' झेंप मिटाने को भले ही पीएमईएस का काम बताया गया। पर असल में तीन मंत्रियों की चिट्ठी से पीएमओ में खलबली मची। पीएम भी सकते में आए। पीएम को ऐसी चिट्ठी की उम्मीद नहीं थी। चिट्ठी सोनिया गांधी के करीबियों ने लिखी। तो इसका मतलब भी समझते हैं मनमोहन सिंह। सो अब मंत्रियों को मिलेगा ब्यूरोक्रेसी की मोनिटरिंग से छुटकारा।