बाल ठाकरे अब बिहार में बीजेपी की लुटिया डुबोएंगे

बीजेपी 2004 का चुनाव हारी। तो प्रमोद महाजन निशाने पर थे। हर ऐरा-गैरा कहता था- 'प्रमोद के फाइव स्टार कल्चर ने पार्टी का बंटाधार किया।' अब समाजवादी अपने अमर सिंह पर भी वही आरोप लगा रहे। समाजवादी पार्टी से निकाले गए। तो अमर सिंह अब बेपेंदे के लौटे जैसे दिखने लगे। दिन में मायावती की तारीफ। रात में सोनिया गांधी की। कभी सोनिया को इटेलियन कहते नहीं थकते थे। अब बोले- 'मेरा डीएनए कांग्रेस विरोधी नहीं।' अब उन्हें कांग्रेस मुलायम से बेहतर लगने लगी। पर अपन बात कर रहे थे फाइव स्टार कल्चर की। यों तो प्रमोद भी उसी साल मुंबई वर्किंग कमेटी में सादगी दिखा गए थे। पर जबसे नितिन गड़करी आए हैं। तब से सादगी का ढोल ज्यादा ही पीटा जाने लगा। पहले गड़करी के लिए फूल और बुक्के लाने पर रोक लगी। अब इंदौर अधिवेशन में तंबुओं में आवास। और दाल-रोटी, एक-आध सब्जी का प्रचार। प्रमोद ने रसगुल्लों, आइसक्रीम, जलेबियों की जगह गुड रखवा दिया था। इंदौर वाले मीठे में भी कुछ ऐसा ही परोसेंगे। यों यह खाने-पीने की ठाठ वाले इंदौर की परंपरा नहीं। पर इंदौरियों को किफायत की हिदायत जा चुकी। विजय वर्गीज को गाने सुनाकर मेहमाननवाजी करनी होगी। पर बात चली थी अमर सिंह के सोनिया को इटेलियन कहने की। जो अब बाल ठाकरे ने कहा। तो जयंती नटराजन भड़क गई। भड़कने की वजह अपन नहीं समझ पाए। कोई अपनी जड़ें नहीं छोड़ता। सोनिया ने भी अपना इटली वाला मकान अपने नाम पर ही रखा हुआ है। फिर भड़कने की क्या बात। बाल ठाकरे किसी मुकदमे से नहीं डरते। जैसा जयंती नटराजन ने डराने की कोशिश की। वैसे बाल ठाकरे भी अब आपे में नहीं रहे। बुढ़ापे का असर सोच पर भी दिखने लगा। मराठीवाद की संकीर्णता ने शिवसेना की लुटिया डुबो दी। पर राजनीतिक समझ में मैच्योरिटी नहीं आई। बाल ठाकरे-राज ठाकरे की जंग में बीजेपी का भी महाराष्ट्र में नुकसान हुआ। अब बारी बिहार की। अपनी सनक में खुद तो डूबे हैं सनम, बीजेपी को भी ले डूबेंगे। राहुल के राजनीतिक स्टंट को नहीं समझ पा रहे ठाकरे। राहुल ने बिहार विधानसभा चुनाव की शुरूआत की है मुंबई से। आपको याद होगा- अशोक चव्हाण ने जब ड्राइवरों के लिए मराठी जरूरी की। तो दिल्ली से घुड़की मिली थी। चव्हाण की रणनीति इस साल होने वाले मुंबई महापालिका चुनाव थे। पर मुंबई महापालिका से ज्यादा महत्वपूर्ण है बिहार एसेंबली। सो फटकार के बाद चव्हाण को हिंदी-गुजराती जोड़ना पड़ा। मुंबई से बिहार का चुनाव अभियान तभी शुरू हो गया था। राहुल ने अब यूपी-बिहार के एनएसजी को मुंबई का तारणहार बताया। तो उसी प्रचार अभियान को आगे बढ़ाया। दिग्गी राजा ने जो बात कही- 'एनएसजी में सारे देश के जवान।' तो यह बात उन्हें राहुल को भी बतानी चाहिए थी। जबकि राहुल ने कहा- 'यूपी-बिहार के एनएसजी जवानों ने मुंबई को बचाया।' तो उनने एनएसजी की राष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचाया। विरोध तो खुद एनएसजी को करना चाहिए। जिसमें राहुल ने क्षेत्रवाद के बीज बोए। वोट बैंक के लिए एनएसजी को हथियार बनाना घोर आपत्तिजनक। अपन राहुल की कार्यशैली से असहमत नहीं। पर वोट बैंक की ओछी राजनीति से पूरी तरह असहमत। क्या एनएसजी में महाराष्ट्रियन जवान नहीं? राहुल ने एनएसजी को गैर महाराष्ट्रियन क्यों कहा? बात राहुल की  कार्यशैली की चली। तो युवक कांग्रेस की बात भी करते जाएं। राहुल दो साल से अंदरूनी लोकतंत्र और पारदर्शिता का ढोल बजा रहे थे। केजे राव से युवक कांग्रेस के चुनाव करवाए। पर ढोल की पोल बुधवार को खुल गई। जब लोकतंत्र और पारदर्शिता धरी रह गई। अशोक गहलोत के दूर के रिश्तेदार युवक कांग्रेस के नए अध्यक्ष तैनात हो गए। उम्र भी पैंतीस से ज्यादा। राहुल-गहलोत के करीबी जितेंद्र सिंह के हाथों हुआ राजीव सात्व का ऐलान। युवक कांग्रेस के नए अध्यक्ष महाराष्ट्र से पहली बार एमएलए बने थे। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी महाराष्ट्र बीजेपी के अध्यक्ष थे। तो राजीव सात्व महाराष्ट्र युवक कांग्रेस के अध्यक्ष थे। दोनों की नियुक्ति बंद कमरे के दांव-पेंचों से हुई। पारदर्शिता कहीं नहीं दिखी। अमर सिंह को भले ही कांग्रेस में पारदर्शिता दिखने लगी हो।