मंहगाई का ठीकरा फोड़ा तो पवार भी मुंहतोड़ जवाब देंगे

बात मंहगाई की। कांग्रेस मीडिया के सवालों से परेशान। ऊपर से पवार के चीनी-दूध की कीमतें बढ़ाने वाले बयान। यों भी कांग्रेस को मंहगाई पर कोई जवाब नहीं सूझ रहा। पीएम केबिनेट कमेटी की मीटिंग कर चुके। केबिनेट में चर्चा हो चुकी। चीनी की कीमतें घटाने के कुछ कदम भी उठाए। खासकर इम्पोर्टेड चीनी को किसी भी चीनी मिल में लाने की छूट। मायावती ने किसानों के दबाव में रोक लगाई थी। सो रॉ चीनी बंदरगाहों पर अटकी थी। फैसले से मायावती को बदनाम करने का मौका मिला। पर मायावती भी राजनीति की अनाड़ी नहीं। उनने मुख्यमंत्रियों की मीटिंग में आने की शर्त रख दी। बोली - 'पहले मंहगाई के जिम्मेदार पवार को हटाओ। फिर आएंगी मीटिंग में।' माया-पवार की तू तू - मैं मैं शुरू हो गई। कांग्रेस बाहर बैठकर तमाशा देखने लगी। तो पवार ने माया पर पलटवार किया- 'माया की खुन्नस इम्पोर्टेड चीनी पर फैसले से।' पर माया को समर्थन नितिश से मिला। कांग्रेस ने अपनी खाल बचाने के लिए ठीकरा राज्यों के सिर फोड़ा। भले ही अपने कांग्रेसी मुख्यमंत्री भी लपेटे में आए। पर गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों की तादाद ज्यादा। सो गैर-कांग्रेसी सीएम भी एकजुट हो गए। बीजेपी-सीपीएम सड़कों पर उतर आई। आडवाणी की रहनुमाई में बीजेपी मनमोहन से भी मिली। नितिन गडकरी ट्रेनी लीडर की तरह साथ गए। पर बात बीजेपी के इरादे की।' कांग्रेस ने जो गेंद राज्य सरकारों के पाले में फेंकी थी। उसे बीजेपी वापस कांग्रेस और केंद्र के पाले में डाल आई। अब मीडिया को भी कांग्रेस की दलील नहीं पच रही। गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों से डरकर पीएम ने मीटिंग तो टाल दी। पर बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी। सो कांग्रेस की नीति अब पवार पर ठीकरा फोड़ने की। यही फर्क है एनडीए और यूपीए में। एनडीए राज में बीजेपी ने कभी अपनों को बदनाम नहीं किया। कांग्रेस अपनों को बदनाम करने का मौका नहीं चूकती। मुलायम ने एटमी करार के वक्त सरकार बचाई। तो बाद में कांग्रेस ने मुलायम की रेल बना दी। पिछली सरकार के रेल मंत्री लालू की खाट ममता से खड़ी करवा दी। तो ममता की खाट स्टेट मिनिस्टरों की मीटिंग में मुनिअप्पा से खड़ी करवाई। बात ममता की चली। तो बताते जाएं- बंगाल में ममता की कांग्रेस के साथ चख-चख शुरू हो चुकी। पर पहले बात कांग्रेस की अंदरुनी मारकाट की। उस दिन भोपाल में राहुल ने कहा था- 'कांग्रेसी ही कांग्रेसी को हराता है।' तो सिब्बल पिछले एचआरडी मंत्री अर्जुन सिंह की वैसी ही पोल खोल रहे। जैसी ममता ने लालू की खोली। बात ममता की चली। तो बता दें- ज्योति दा को श्रध्दांजलि देने मनमोहन कोलकाता गए। तो ममता जानबूझकर गैरहाजिर रही। सोनिया गई। तब भी गैरहाजिर रही। फिलहाल तो कांग्रेस ममता का बचाव कर रही। पर यह ज्यादा दिन नहीं चलना। शुक्रवार की बात ही लो। शिबू सोरेन के नक्सल विरोधी अभियान पर नकेल की बात उठी। तो बंगाल में ममता के नक्सलियों को समर्थन की बात भी उठी। पर मनीष तिवारी ने ममता का बचाव किया। बात शिबू की चली। तो बता दें- बीजेपी उनकी नक्सल समर्थक नीति से बेहद खफा। शिबू ने लाइन न बदली। तो ज्यादा देर नहीं चलना गठबंधन। पर मूल बात थी मंहगाई की। अपन को तो बजट में मंहगाई की मार बढ़ने की आशंका। बात बजट की चली। तो बता दें- प्रणव दा का बजट राहुल की लाइन पर होगा। अमीर और गरीब की खाई पाटने वाला। चिदंबरम ने पिछली बार जो इंफ्रास्ट्रक्चर की अनदेखी की। इस बार जोर इंफ्रास्ट्रक्चर पर होगा। पर बात मंहगाई की। सोनिया मंहगाई पर यूपीए की मीटिंग बुलाती। तो अपन को ज्यादा गंभीरता दिखती। पर उनने फैसला किया सीडब्ल्यूसी बुलाने का। मतलब साफ- मंहगाई पर राजनीति करने का। सीडब्ल्यूसी कुछ ठीकरा राज्यों के सिर फोड़ेगी। तो कुछ बिना नाम लिए पवार के सिर। पवार को इसकी भनक लग चुकी। द्विवेदी-सिंघवी-शकील के बयान वह भी देख रहे। सो उनने भी शुक्रवार को पुणे में बिना नाम लिए पलटवार किया। बोले- 'एग्रीकल्चर मिनिस्टरी का मंहगाई से क्या ताल्लुक। मिनिस्टरी का काम कृषि उत्पादों पर निगाह रखना। मैं चालीस साल में पहली बार मंहगाई का ठीकरा कृषि मंत्रालय पर फूटता देख रहा हूं।'

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