नया फार्मूला लाएगी सरकार कम खाओ, महंगाई घटाओ

कांग्रेस ने महंगाई पर कोर कमेटी नहीं बुलाई। पर अब जब गवर्नरों की तैनाती की बात चली। तो कोर कमेटी में चर्चा हुई। पीएम के घर हुई मीटिंग में गवर्नरों पर चर्चा संविधान का कितना मजाक।  अत्यंत गोपनीय होना चाहिए यह मामला। तब तक किसी को केबिनेट के फैसले की भनक तक न लगे। जब तक राष्ट्रपति भवन से नोटिफिकेशन न हो। पर यह चर्चा करने का आज दिन नहीं। यह अच्छी बात। जो सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन को हटाने की सुगबुगाहट। सुरक्षा सलाहकार किसी रिटायर्ड आईएफएस को ही बनाना चाहिए। वाजपेयी ने बृजेश मिश्र को बनाकर सही शुरूआत की। पहली पारी में मनमोहन ने भी जेएन दीक्षित को ठीक ही चुना। पर अपन संसदीय गलियारों की अफवाहों पर भरोसा करें। तो नारायणन सरकार की च्वाइस नहीं थी। कहीं और से आया था नाम। खैर अब तीन आईएफएस का नाम चर्चा में। रोनेन सैन, शिवशंकर मेनन और श्यामसरण। आंध्र का पूरा जिम्मा नरसिम्हन को मिलेगा। यह अपन ने बताया ही था। अब गवर्नरों की तैनाती प्रदेश के हालात देखकर करने का फैसला। सो नक्सलवाद से प्रभावित इलाकों में नारायणन-नरसिम्हन जाएं। तो ठीक ही होगा। पंजाब-राजस्थान- महाराष्ट्र में राजनीतिक तैनातियों के ही आसार। पर अपन ने बात शुरू की थी महंगाई से। कई बार मनमोहन सिंह की बातें अपने पल्ले नहीं पड़ती। ऊपर से निकल जाती हैं। कसूर मनमोहन सिंह का नहीं। अलबत्ता अपना खुद का। अब देखो शुक्रवार को बोले- 'देश महंगाई पर काबू पाने को वचनबध्द।' वह अपनी सरकार की वचनबध्दता दिखाते। तो आसानी से अपने पल्ले पड़ जाता। शायद उनने सरकार की वचनबध्दता जानबूझकर नहीं कही। यह बात वह छह महीने से कह रहे थे। वही दोहराते, तो खिल्ली उड़ती। सरकार छह महीने में कुछ नहीं कर पाई। तो अब उनने जिम्मेदारी देश पर डाल दी। जिसमें आप भी शामिल, अपन भी। सो अब महंगाई रोकना अपनी जिम्मेदारी हो गई। मनमोहन सरकार ने किनारा कर लिया। अपन अपनी खुराक घटा लें। तो महंगाई का असर नहीं होगा। बच्चों को दूध अब आधा गिलास पिलाएं। रोटी तीन की बजाए दो खाएं। ज्यादा रोटी से वैसे क्लोस्ट्रोल बढ़ने की शिकायत। दाल बनाएं तो पानी थोड़ा ज्यादा डाल लें। देसी घी तो बिल्कुल बंद कर दें। ढाई-तीन सौ रुपए किलो का घी खाने की क्या जरूरत। सौ-डेढ़ सौ रुपए लीटर वाला रिफाइंड आयल खाइए। क्लोस्ट्रोल भी कंट्रोल में रहेगा। लब्बोलुबाब यह - 'कम खाओ, महंगाई घटाओ।' पर लेफ्ट और बीजेपी को मनमोहन की बात नहीं जंचेगी। जंच भी नहीं रही। दोनों में महंगाई पर आम आदमी सहानुभूति पाने की होड़। मुद्दा महंगाई पर विरोध का। पर दोनों करेंगे अलग-अलग। राजनीतिक दल तो राजनीतिक दुकानें बन चुकी। 'आम आदमी' की फिक्र होती। तो महंगाई पर विरोध में विचारधारा आड़े नही आती। इसी का फायदा उठा रही है यूपीए सरकार। 'आम आदमी' के लिए विपक्ष न संसद में एकजुट, न सड़क पर। पर बात हो रही थी मनमोहन सिंह की। जिनको जीडीपी और शेयर मार्किट की फिक्र। मुद्रास्फीति की नहीं। जब मुद्रास्फीति जीरो से नीचे चली गई थी। तो किसी को कारण समझ नहीं आया। असल में तब ग्राहक ही मार्किट से गायब था। अब सरकार की नीति ग्राहक की मांग घटाने की। तभी मुद्रा स्फीति घटेगी। यों अपन इकनामिक्स नहीं जानते। इकनामिक्स कभी नहीं पढ़ी। पर इतना तो अनाड़ी भी जानता होगा। जीडीपी और मुद्रास्फीति का स्तर बराबर होना चाहिए। प्रणव दा बुधवार को बता रहे थे- 'जीडीपी सात फीसदी हो गई। पौने आठ तक हो जाएगी।' पर खाने पीने की चीजों की मुद्रास्फीति सत्रह फीसदी से ज्यादा। सो मनमोहन ने मुद्रास्फीति रोकने का जिम्मा तो अपन लोगों को दिया। पर जीडीपी का सेहरा अपने सिर बांध रहे। वह प्रणव दा से भी आगे निकले। कहा- 'नौ-दस फीसदी हो जाएगी जीडीपी।' बात जीडीपी की हो। तो मनमोहन-प्रणव में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़। पर बात मुद्रास्फीति की हो। ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोड़ने की होड़। मंगलवार को महंगाई पर केबिनेट कमेटी बैठी। तो कांग्रेसी मंत्रियों ने शरद पवार को घेरा। प्रेस का सामना करने का जिम्मा भी पवार को दिया। ताकि कड़वा-कड़वा वह खाएं। मीठा-मीठा कांग्रेस। पर कांग्रेस की यह रणनीति सत्ताईस जनवरी को नहीं चलनी। जब सीपीएम, बीएसपी, जेडीयू, अकाली, बीजू-जद, बीजेपी के सीएम केंद्र को घेरेंगे। तो खुद मनमोहन निशाने पर होंगे।

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