आडवाणी की कामना 'बीजेपी में हो संक्रांति'

आठ नवंबर को अपन दिल्ली में नहीं थे। उस दिन अपन 'विराट नगर' के 'बाल आश्रम' में थे। सो लालकृष्ण आडवाणी को जन्मदिन पर बधाई देने नहीं पहुंच सके। पर अपन उस दिन पिता पर बनी प्रतिभा की डॉक्यूमेंट्री से महरूम रह गए। गुरुवार को संक्रांति थी। सो प्रतिभा आडवाणी ने अपन जैसे उन कुछ लोगों को बुलाया। जो उस दिन नहीं आ पाए थे। आडवाणी की बेटी प्रतिभा कब राजनीति में आएगी। यह सवाल अब सब को मथ रहा। शायद यह वक्त अब दूर भी नहीं। पर आडवाणी की विरासत नहीं संभालेंगी प्रतिभा। खुद की प्रतिभा होगी। तो राजनीति में जमेंगी। कांग्रेस परिवार की तरह नहीं बनेगा आडवाणी का परिवार। सवाल हुआ, तो आडवाणी ने यही इशारा किया। प्रतिभा जर्नलिम में अपनी प्रतिभा लंबे समय से दिखा रही। मेल-मुलाकातों का हर संडे प्रोग्राम पेश करती हैं एक न्यूज चैनल पर। कोई चार साल से अपना प्रोडक्शन हाउस चला रही। अब तक राम, कृष्ण, वंदेमातरम् जैसी कई डाक्यूमेंट्रियां बनाई। 'पिता' पर बनाई डॉक्यूमेंट्री आडवाणी पर नहीं। अलबत्ता 'पिता' पर। आडवाणी को  घर में वह 'दादा' पुकारती हैं। सो दादा को समर्पित था उस संडे का एपिसोड। जिसे अपन ने संक्रांति के मौके पर आडवाणी के घर पर देखा। प्रतिभा ने पिता-पुत्र, पिता-पुत्री के रिश्तों पर घंटे भर की फिल्म बना दी। पिछले पचास साल में बॉलीवुड की फिल्मों में जहां पिता-पुत्र का रिश्ता दिखा। आधी फिल्म के बाद शुरू हुई पिता-पुत्री के भावुक रिश्तों की डोर। हाल में मौजूद शायद ही कोई रहा हो। जिसकी आंखें भींगी न हो। आज के टूटते रिश्तों में घंटे भर की यह डॉक्यूमेंट्री लाजवाब। परिवार को बैठकर यह फिल्म देख लेनी चाहिए। फिल्म के पहले हिस्से और आखिरी हिस्से को छोड़ दें। जो पिता लालकृष्ण आडवाणी को समर्पित। तो बाकी सारी फिल्म हर पिता-पुत्र की। हर पिता-पुत्री की। आडवाणी की किताब 'माई कंट्री माई लाइफ' में भी ऐसी कई तस्वीरें नहीं। जो प्रतिभा ने फिल्म में दिखाई। मजेदार बात यह रही। प्रतिभा दो महीने तक फिल्म निर्माण में लगी रहीं। पर आडवाणी और कमला को भनक तक नहीं लगी। प्रतिभा ने बताया- 'माँ को इसलिए नहीं बताया। माँ के पेट में कोइ बात पचती नहीं। वह किसी न किसी को बता देंगी। और कह देंगी और किसी को मत बताना।' आडवाणी और कमला एक दिन प्रतिभा के दफ्तर के करीब से गुजर रहे थे। तो आडवाणी ने फोन करके कहा- 'हम तुम्हारे दफ्तर आ रहे हैं।' पर प्रतिभा ने कहा- 'मैं दफ्तर में नहीं हूं।' हालांकि वह दफ्तर में थी। इस तरह आडवाणी और कमला को भनक लगने से बचाई फिल्म। यह किस्सा फिल्म के बाद आडवाणी ने खुद बताया। पर बात चली संक्रांति की। तो  आडवाणी से रहा नहीं गया। उनने कहा- 'पार्टी में भी संक्रांति आनी चाहिए। बीजेपी की दशा पर शुभ चिंतक ही नहीं। विरोधी भी चिंतित हैं। चाहते हैं- पार्टी की हालत में सुधार होना चाहिए।' बात चली सिध्दार्थ और राहुल के रिश्तों की। सवाल हुआ तो आडवाणी बोले- 'एक उपन्यास का मैंने अपनी किताब में भी जिक्र किया। जिसमें कहा गया था- जीवन में व्यक्ति सुख और सार्थकता खोजता है। पर दोनों नहीं मिलते। इसके बावजूद मैंने दोनों हासिल किए। सार्थकता वैचारिक परिवार से और सुख व्यक्तिगत परिवार से।' दिल्ली के सरसंघ चालक रमेश जी भी मौजूद थे। उनसे नहीं रहा गया। बोले- 'पूरी फिल्म में संघ का एक बार भी उल्लेख नहीं।' तो आडवाणी ने जवाब दिया- 'मेरी किताब में संघ का विस्तार से उल्लेख है। यह फिल्म मेरी नहीं, प्रतिभा की है।' सवाल-जवाब हुए। तो आडवाणी ने कहा- 'देश को परम वैभव तक पहुंचाए बिना यात्रा नहीं रुकेगी।' पर कोई नई रथ यात्रा नहीं करने जा रहे आडवाणी। बात चली, तो बात उस वक्त की भी हुई। जब आडवाणी हवाला में घिर गए थे। आडवाणी ने कहा- 'मैंने 1995 में मुंबई में ऐलान किया था- बीजेपी सत्ता में आई। तो वाजपेयी पी.एम. होंगे। जब मुझ पर हवाला चार्ज लगा। तो मैंने शुक्र मनाया। सही वक्त पर ऐलान कर दिया। अब करता, तो लोग कहते- मजबूरी में किया।' उनने कहा- 'हवाला के वक्त जब मैंने कहा- बरी होने तक संसद का मुंह नहीं देखूंगा। तो मैंने सोच लिया था- अब मेरा संसदीय जीवन खत्म हुआ। ऐसा इसलिए सोचा- क्योंकि ग्वालियर में वोट बनवाने का केस 1982 से लटका था। वह तो शुक्र है कि हवाला दो साल में निपट गया।'

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