सुख रामों-शिबू सोरेनों वाली पार्टी विद डिफरेंस

अपन ने मनमोहन सिंह का भाषण पढ़ा। देवकांत बरुआ की याद आ गई। इमरजेंसी के दिन थे। चापलूसों का जमाना था। खुद्दार जेल में थे, चापलूस बाहर। इंदिरा गांधी ने बरुआ को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। तो उनने चापलूसी की सारी हदें पार कर दी थी। जब कहा- 'इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा।' यानी इंदिरा ही भारत है, भारत ही इंदिरा है। कोई नेता कितना भी बड़ा हो। देश से बड़ा नहीं होता, न बराबर। न कोई राजनीतिक दल देश से बड़ा होता है। नितिन गड़करी भाजपा के अध्यक्ष बने। तो उनने कहा- 'देश पहले, पार्टी बाद में, खुद आखिर में।' अब आप इस संदर्भ में देवकांत बरुआ के बयान को पढ़िए। इसी संदर्भ में मनमोहन सिंह का ताजा बयान देखिए। कांग्रेस का सवा सौ साला जश्न था। मनमोहन बोले- 'कांग्रेस कमजोर हुई। तो देश कमजोर होगा।' यानी इंदिरा है, तो देश है, कांग्रेस है तो देश है। यह है देश और लोकतंत्र की समझ का फर्क। अपन को मनमोहन का बयान लोकतंत्र का अपमान लगा। देश की जनता का भी अपमान। लोकतंत्र में यह हक देश की जनता का है। वह जिसे चाहे मजबूत करे। जिसे चाहे कमजोर। जनता के फैसले से देश कमजोर नहीं होता। देश कमजोर होता है स्वार्थी नेताओं के बयानों से। बात लोकतंत्र की चली। तो लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन की बात भी करते जाएं। एनडी तिवारी की सीडी आपने नहीं देखी। पर अपन ने इंटरनेट पर देख ली थी। तीन लड़कियों के साथ बिस्तर पर थे आदरणीय तिवारी जी। देशभर में बवाल मचा। सोनिया गांधी ने इस्तीफे का हुक्म सुना दिया। तिवारी इस्तीफा देकर सोमवार को देहरादून पहुंच गए। पर महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास की खबर पढ़ी आपने। उनने तिवारी पर टिप्पणीं से इनकार कर दिया। गिरिजा व्यास पर जिम्मा है- महिलाओं के सम्मान की रक्षा का। बात तिवारी की। तो उनने देहरादून लौटते ही आंध्र की अंदरूनी राजनीति पर तोहमत मढ़ दी। बोले- 'तेलंगाना वालों को मिलने का वक्त नहीं दिया था।' बात तेलंगाना की चली। तो बताते जाएं- तटीय आंध्र-रायलसीमा के कांग्रेसी ठंडे हुए। तो तेलंगाना वाले गरम। इस्तीफे देकर तेरह मंत्री इतवार शाम दिल्ली पहुंच गए। लंच जयपाल रेड्डी के घर हुआ। बता दें- तेलंगाना से ताल्लुक रखते हैं जयपाल रेड्डी। रात को मुलाकात हुई प्रणव दा से। तो उनने समझाया- 'आपने इस्तीफा क्यों दिया? इस्तीफे वापस लो। लौट जाओ। जल्द अच्छी खबर देंगे।' पर मंत्री नहीं लौटे। सुबह का नाश्ता केशव राव के घर हुआ। तेलंगाना के केशवराव अभी-अभी झारखंड में कांग्रेस का सपना तोड़कर लौटे हैं। नतीजों से खुश लड्डू खाते दिखे थे चैनलों पर। पर बात तेलंगाना की। तो इस्तीफे देने वाले मंत्रियों का लंच हनुमंत राव के घर हुआ। वह भी तेलंगाना के एमपी हैं राज्यसभा में। पर लंच में महत्वपूर्ण रही- हर्ष कुमार और वसंत नागेश्वर की मौजूदगी। तटीय आंध्र के दोनों नेता तेलंगाना के समर्थन में बोले। खैर आंध्र के नेताओं की पेट-भरू राजनीति के बीच कांग्रेस आलाकमान की नींद हराम। सो खबर है केबिनेट सेक्रेट्री की रहनुमाई में बनेगी टीम। पर अपन ने बात शुरू की थी मनमोहन सिंह के बयान से। तो उनने अपने भाषण में नेहरू-इंदिरा-राजीव-सोनिया-राहुल की तो तारीफ के पुल बांधे। लालबहादुर शास्त्री की तो छोड़िए। नरसिंह राव का जिक्र भी नहीं किया। जो राजनीति में लेकर आए थे। अपन राजनीति में नैतिकता की बात अब क्या करें। राजनीति में नैतिकता बची होती। तो बीजेपी शिबू सोरेन को सीएम बनाती। खुद को पार्टी विद डिफरेंस बताती है बीजेपी। कोई बहुत पुरानी बात थोड़े ही है। शिबू सोरेन को शशिकांत झा की हत्या में सजा मिली। तो संसद नहीं चलने दी थी बीजेपी ने। सुखराम के खिलाफ भी संसद नहीं चलने दी थी। पर सत्ता दिखी तो अपनी सरकार में मंत्री बना दिया था सुखराम को। खैर पुरानी बातों को छोड़ भी दें। तो हफ्ताभर पहले चुनाव में शिबू को अपराधी छवि वाला बता रही थी बीजेपी। अब सुषमा स्वराज दागी मानने से इनकार करें। तो आप 'पार्टी विद डिफरेंस' के ढोल की पोल देख लो। गड़करी कहते हैं- 'कुछ फैसले राज्य के हित में लेने पड़ते हैं।' झारखंड ने तो आपको ठेका नहीं दिया था सरकार बनाने का। जब कांग्रेस ने शिबू को सीएम बनाने से इंकार किया। तो आपने क्यों मान लिया। कहां गई राजनीति में साफ-सुथरी छवि और शुचता की बातें।

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