सुप्रीम कोर्ट को बचाव में ढाल बनाया राठौर ने

शशि थरूर चुप हो गए। एसएम कृष्णा पहली बार कारगर मंत्री के रूप में दिखे। थरूर को बुलाकर साफ-साफ कहा- 'सरकारी नीतियां टि्वटर पर डिसकस नहीं हो सकती। आपने मंत्री पद की शपथ ली है। आप किसी एक मंत्रालय के खिलाफ नहीं बोल सकते।' मतलब साफ था- टि्वटर और मंत्री पद में से एक चुनना होगा। सो फिलहाल थरूर ने चुप्पी साध ली। टि्वटर पर रहेंगे। पर मंत्री और थरूर में फर्क दिखेगा। दूसरी बात जसवंत सिंह की। जो आज पीएसी की चेयरमैनी से मुक्त हो जाएंगे। तो अब स्पीकर के पास यशवंत सिन्हा के सिवा चारा नहीं। पीएसी में बीजेपी के बाकी मेंबर हैं शांता कुमार और गोपीनाथ मुंडे। मुंडे विपक्ष के उपनेता हो चुके। पीएसी की चेयरमैनी राज्यसभा से नहीं होती। सो शांता कुमार का भी कोई चांस नहीं। सो यशवंत सिन्हा का ऐलान आज-कल में। वैसे भी सहमत न होते हुए भी सिन्हा झारखंड पर चुप्पी साधे रहे। वरना सिन्हा उन मामलों में मुंह खोले बिना नहीं रहते। जो उनको जंचते न हों। शिबू सोरेन को सीएम बनाना सिन्हा को नहीं जंचता। पर वह आलाकमान से पंगा लेकर अपना नुकसान क्यों करते। अब बात तेलंगाना की। तो कांग्रेस मकड़जाल में फंस चुकी। सोनिया के जन्मदिन का तोहफा कांग्रेस के जी का जंजाल बन गया। कभी तटीय आंध्र और रायलसीमा में हिंसा। तो कभी तेलंगाना में हिंसा। दोनों इलाकों के राजनीतिक दल भी टूट-फूट चुके। तेलंगाना के कांग्रेसी नेता आंध्र के नेताओं से बात करने को तैयार नहीं। यही हालत बीजेपी, तेलुगूदेशम और प्रजारायम पार्टी में। के रोसैया के लिए सरकार चलाना मुश्किल। सरकार की बात छोड़िए। केबिनेट की मीटिंग बुलाना मुश्किल। हिंसा है कि थम नहीं रही। सो अब कांग्रेस की कोर कमेटी ने नई चाल चली। मंगलवार की कोर कमेटी में तय हुआ- होम मिनिस्ट्री राज्य के राजनीतिक दलों की मीटिंग बुलाए। कोर कमेटी के फैसले पर केबिनेट में मोहर लगी। बुधवार को ऐलान हुआ- आंध्र के आठों राजनीतिक दलों की पांच जनवरी को दिल्ली में मीटिंग होगी। ठीकरा राजनीतिक दलों के सिर फोड़ने की कोशिश। जो बात पहले शुरू होनी चाहिए थी। वह बाद में। पहले राजनीतिक दलों की मीटिंग बुलाई जाती। तो सोनिया के जन्मदिन का तोहफा नहीं बनता। यों रोसैया ने सात दिसंबर को मीटिंग बुलाई थी। पर बवाल हुआ, तो नेता मुकर गए। अब पांच जनवरी को भी क्या होगा। ज्यादातर राजनीतिक दलों का आधार आंध्र और रायलसीमा में। सो कोई तेलंगाना का समर्थन करने से रहा। बाकी दल इस चक्रव्यूह से कैसे निकलेंगे। अपन को इंतजार करना पड़ेगा पांच जनवरी का। अब बात रुचिका प्रकरण की। उन्नीस साल बाद प्रशासन की नींद खुली। तो मंगलवार को रिटायर्ड डीजीपी राठौर के खिलाफ दो नई एफआईआर हुई। पर तीस घंटे बाद भी राठौर पर कार्रवाई नहीं। कोई ऐरा-गैरा होता। तो गिरफ्तार हो चुका होता। पर पुलिस ने कहा- 'जांच पड़ताल के बाद गिरफ्तार करेंगे। सात सदस्यों की जांच टीम बना दी।' राठौर बुधवार को सेशन कोर्ट में जा पहुंचे। एंटीस्पेटरी बेल की अर्जी लगा दी। अब जब इतनी फजीहत हो चुकी। तो अदालत भी जमानत क्यों देती। शुक्रवार तक हरियाणा सरकार से जवाब मांगा है कोर्ट ने। राठौर से भी कहा- 'नई एफआईआर के कागजात लाओ।' पर अदालत में राठौर की वकील बीवी ने क्या कहा। जरा उस पर गौर फरमाइए। बोली- 'मीडिया ट्रायल चल रहा है। मुकदमा मीडिया की अदालत में लड़ा जा रहा है। मामला सुप्रीम कोर्ट में खत्म हो चुका।' ताकि सनद रहे, सो बता दें। रुचिका को आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला कैसे निपटा था। सीबीआई अदालत ने कहा था- 'आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज हो।' सीबीआई के जांच अधिकारी आरएम सिंह ने भी सिफारिश की थी- '306 लगाई जाए।' पर राठौर ने सीबीआई डायरेक्टर को पटा लिया। सीबीआई अदालत के फैसले को पहले हाईकोर्ट से पलटवा लिया। फिर सुप्रीम कोर्ट से भी मोहर लगवा ली। सीबीआई तब चुप्पी साधकर बैठी थी। अब सुप्रीम कोर्ट का वही फैसला राठौर की ढाल।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट