सत्ता नहीं, समाजसेवा होगा गडक़री की बीजेपी का लक्ष्य

अपन नितिन गड़करी से पहले मिले तो थे। पर ऐसे कभी नहीं। एक घंटे की प्रेस कांफ्रेंस। समां बांधकर रख दिया। उन लोगों को बहुत निराशा हुई। जो राष्ट्रीय राजनीति का अनाड़ी समझ बैठे थे। पहली प्रेस कांफ्रेंस में ही मनोबल तोड़ने के इरादे से पहुंचे थे कई धुंरधर। पर गड़करी को सुनकर खुद का मनोबल टूट गया। गड़करी का मुंह ताकते रह गए। बैठे-बैठे अपन को शिव खेड़ा की याद आ गई। प्रेरणा गुरु शिव खेड़ा। दिल्ली को दूसरा शिव खेड़ा मिल गया। युवाओं का मनोबल बढ़ाने वाला। श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देने वाला। पर शिव खेड़ा हौंसला बढ़ा सकता है। चुनाव नहीं जीत सकता। ताकि सनद रहे सो बता दें- लड़कर हार चुके हैं शिव खेड़ा। बीजेपी को चुनाव जिताने का ठेका लेकर गड़करी भी नहीं आए। उनने साफ कहा- 'पार्टी को आम चुनाव के लिए नहीं। अगली सदी के लिए तैयार करना चाहता हूं। सत्ता प्राथमिकता नहीं। प्राथमिकता है गरीब और विकास। बेरोजगारों को रोजगार। जहां सत्ता है, वहां गुड गवर्नेंस हो।' गड़करी ने ऐसे बात की। जैसे वह राजनीतिक दल के अध्यक्ष नहीं। किसी एनजीओ के अध्यक्ष बने हों। उनने यह मानने में परहेज भी नहीं किया- 'मैं एनजीओ की तरह काम करता हूं।' पहला काम आज वाजपेयी के जन्मदिन पर रक्तदान का करेंगे। अपन को सोनिया गांधी का वह वक्त याद आया। जब वह अध्यक्ष बनी थी। तो एनजीओ की तरह पार्टी चला रही थी। रक्तदान शिविर भी खूब लगवाए थे सोनिया ने। आम आदमी की बात करके पार्टी को सत्ता के शिखर पर ले गई। अब गड़करी का नारा है- 'सत्ता नहीं, कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति की उन्नति ही लक्ष्य।' यह अंत्योदय का नारा दीन दयाल उपाध्याय ने दिया था। गरीब-गुरबों की पार्टी बनाना चाहते हैं गड़करी। दलित-पिछड़े, असंगठित मजदूर और अल्पसंख्यकों को जोड़ना लक्ष्य। मुसलमानों को जोड़ने की कोशिशें पहले भी हुई। अब गड़करी नई कोशिश करेंगे। उनने कहा- 'देश सबका, सब देश के।' सकारात्मक राजनीति के सबूत भी दिए उनने। बोले- विरोध के लिए विरोध की राजनीति नहीं करेगी बीजेपी। सरकार आतंकवाद-नक्सलवाद और गरीबी से लड़ेगी। तो समर्थन करेंगे। पहली प्रेस कांफ्रेंस में राजनीतिक विवादों से किनारा करते दिखे। दलितों के घर जाने वाले राहुल की वोट बैंक राजनीति का सवाल उठा। तो वह बोले- 'अच्छा कर रहे हैं राहुल। उन्हें शुभकामनाएं।' पर बीजेपी को जात-पात, धर्म-भाषा की राजनीति से दूर बताया। कहा- 'हमारी छवि वास्तविकता से अलग है, जरा नजदीक आकर देखिए।' भले शिवसेना की भाषा, क्षेत्रवाद, धर्म की राजनीति मुसीबत बने। गड़करी ने यों शुरूआत की- 'राष्ट्र पहले, पार्टी बाद में, खुद आखिर में।' पर मौजूदा पार्टी का हाल इस नारे से एकदम उलट। बीजेपी में व्यक्तिवाद शिखर पर। खुद पहले, पार्टी बाद में, देश आखिर में। इस टेढ़े सवाल पर थोड़ा झिझके। पर बोले- 'सुधार करेंगे। अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं होगी। एक गलती की छूट होगी। दूसरे की नहीं।' यानी चार साल की गुटबाजी पर नकेल कसेंगे गड़करी। पर क्या- 'डी-4' गड़करी को चलने देगा। गड़करी का दावा था- 'सब बड़े नेता मेरे पीछे खड़े हैं। सबके आशीर्वाद से सफल रहूंगा। आत्मविश्वास है, अहंकार नहीं।' तो शरारती सवाल हुआ- 'सब पीछे खड़े हैं, या सब पीछे पड़े हैं?' पर क्या गड़करी बीजेपी की पुरानी धारणाएं तोड़ देंगे। क्या विचारधारा का पुराना बंधन तोड़ देंगे। नहीं, उनने साफ कहा- अध्यक्ष बदलने से विचारधारा नहीं बदलती। गड़करी चाहते हैं- सांप भी मर जाए, लाठी भी न टूटे। हिंदुत्व के तीनों मुद्दे भी बने रहें। एनडीए भी मजबूत हो। मैनेजमेंट के माहिर गड़करी को सफल होने का पूरा भरोसा। राजनीतिक फैसलों के लिए जिद्दी माने जाते हैं गड़करी। पर उनके पहले दो फैसले ही झुकने वाले। दबाव में आकर राजस्थान में संगठन के चुनाव टालना। बागी विधायक रेणुकाचार्य को कर्नाटक में मंत्री बनाने की इजाजत देना। अब अगला इम्तिहान झारखंड का। कांग्रेस की शिबू और मरांडी दोनों को केंद्र में मंत्री बनाने की पेशकश। सोरेन के बेटे हेमंत को डिप्टी सीएम की पेशकश। सुबोधकांत को सीएम बनाना चाहती है कांग्रेस। पर शिबू सोरेन ने यह पेशकश ठुकरा दी। वह खुद बनना चाहते हैं सीएम। जो कांग्रेस को कबूल नहीं। बीजेपी तीस से अठारह हो गई। पर कांग्रेस से अब भी बड़ी पार्टी। क्या अपने पुराने सीएम संघी मरांडी को वापस लाएगी बीजेपी? क्या शिबू सोरेन को सीएम बनाने को राजी होगी बीजेपी? क्या राजनाथ सिंह जोड़तोड़ से सरकार बनाने में मशगूल नहीं? बोले- 'नहीं, अभी कोई फैसला नहीं। जो झारखंड के हित में होगा, वहीं करेंगे।' बात संगठन की चली। तो एक रेखा खींच दी उनने। संगठन में रहो, या चुनावी राजनीति में। एक चुनो। इसे इशारा समझिए। जब उनने कहा- 'मैं तीन साल तक संसद में नहीं आऊंगा। चुनाव नहीं लड़ूंगा।' यानी संगठन में भारी बदलाव होगा। गड़करी टीम में आधे नए होंगे, आधे पुराने। देशभर से चुने जाएंगे नए राष्ट्रीय नेता। यही कहा था मोहन भागवत ने। कुछ इशारा यों भी किया- 'जो अच्छा रिजल्ट देगा, उसे आगे बढ़ाएंगे। मेरा कोई आदमी नहीं, योग्यता ही पद का पैमाना।'

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