पच्चीस साल बाद खुलकर हुई चौरासी पर बहस

पहले ज्ञानी जैल सिंह ने राष्ट्रपति होते हुए माफी मांगी। फिर सोनिया गांधी ने भी माफी मांगी। पर जख्म इतनी जल्दी नहीं भरा करते। कई बार तो भरते भी नहीं। सिखों के कत्ल-ए-आम के जख्म माफियों से नहीं भरेंगे। कांग्रेस तो बहस से भी आंख चुराती रही। आयोगों ने कत्ल-ए-आम का खुलासा कम किया। छुपाया ज्यादा। सोमवार को राज्यसभा में पहली बार खुलकर बहस हुई। तो उसका सेहरा अपन हामिद अंसारी के सिर बांधेंगे। जिनने पहली बार बहस की इजाजत दी। ऐसी बहस की इजाजत। जिसमें सिख सांसदों ने जमकर भड़ास निकाल दी। अपन त्रिलोचन को सुन रहे थे। उनने बखिया उधेड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपन हैरान थे- त्रिलोचन जब बखिया उधेड़ रहे थे। तो कांग्रेसी बेंचों पर मुर्दनी छाई थी। विरोध की आवाजें नहीं उठी। तब भी नहीं, जब वह राजीव गांधी के खिलाफ बोले। तब भी नहीं, जब वह इंदिरा गांधी के खिलाफ बोले। उनने कहा- 'एक जने को पकड़ने के लिए फौज भेज दी गई। तोपें दरबार साहब की तरफ कर दी गई। अकाल तख्त तोड़ दिया गया। सिखों ने पाकिस्तान की बजाए भारत चुना था। सिखों ने जलियांवाला बाग में कुर्बानी दी। कूका आंदोलन में कुर्बानी दी। अंडेमान-निकोबार जेल में जाकर देख लो। कालापानी भेजे गए नब्बे फीसदी कैदी सिख थे।' गढ़े मुर्दे उखाड़ते हुए उनने कहा- 'जब प्रधानमंत्री कहें- बड़ा पेड ग़िरता है, तो धरती हिलती है। तो इसका मतलब होता है- सिखों की हत्याओं को जायज ठहराना। ऑल इंडिया रेडियो सिखों के खिलाफ आग उगलता रहा। रेडियो बार-बार कहता रहा- सिख सुरक्षा गार्डो ने इंदिरा की हत्या कर दी।' राजनीति प्रसाद नाम सुनकर आप हैरान होंगे। पर यही नाम है लालूवादी सांसद का। राजनीति प्रसाद कह रहे थे- 'गांधी की हत्या के बाद दंगे नहीं हुए। तब रेडियो ने यह नहीं कहा था- एक महाराष्ट्रियन ने गांधी को मार दिया। नहीं तो देशभर में महाराष्ट्रियनों के खिलाफ हिंसा होती।' बात हो रही थी त्रिलोचन सिंह की। जो सबसे ज्यादा हमलावर थे। उनने कहा- 'कांग्रेस से तो कोई उम्मीद नहीं। उसने तो उन पुलिस अफसरों को ईनाम दिया। जिनके इलाकों में ज्यादा हत्याएं हुई। एक पुलिस अफसर को तो कांग्रेस ने टिकट भी दिया। दो को मंत्री भी बनाया। लीपापोती करने वाले जज को अपना सांसद बनाकर ईनाम दिया। अब तो इस देश की न्यायपालिका पर भी भरोसा नहीं रहा। पांच हजार हत्याएं हुई। पच्चीस साल में एक को भी फांसी नहीं हुई।' बात उठी, तो मुआवजे पर भी उठी। सरकार बोली- 'छत्तीस हजार मामले निपटे। चार सौ करोड़ का मुआवजा दिया।' अब आप खुद सोच लीजिए। हरेक को तेरह सौ रुपया मिला। सिर्फ दिल्ली में तीन हजार सिख मारे गए। देशभर में तो पांच हजार मारे गए होंगे। पर किसी एक को फांसी नहीं हुई। राजनेता तो शिकंजे तक में नहीं आया। एसएस आहलूवालिया ने कहा- 'सिख मुआवजा नहीं, सम्मान से जीने का अधिकार चाहते हैं।' वह बोले- सिर्फ एक सिख को प्रधानमंत्री बना देने से कांग्रेस के पाप नहीं धुलेंगे। बहस शुरू की थी विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने। उनने कहा- 'अडतालीस घंटे-नॉन स्टाप किलिंग। दूरदर्शन पर दिखाए जा रहे थे- खून का बदला खून के नारे। एम्स में राष्ट्रपति पर भी पथराव हुआ। क्योंकि वह सिख था। तीन दिन हत्याएं होती रही। न पुलिस ने गोली चलाई, न सेना ने। एक दशक तक किसी के खिलाफ एफआईआर नहीं हुई। मेनका गांधी अमेठी में राजीव के खिलाफ चुनाव लड़ी। तो वहां कांग्रेस ने नारा लगाया- बेटी है सरकार की, बेटी है गद्दार की।' जेटली ने सज्जन, टाईटलर को बचाने की कोशिश पर होम मिनिस्टर चिदंबरम को भी कटघरे में खड़ा किया। याद है- चिदंबरम ने एक बार कहा था- 'मुझे खुशी है, मेरे मित्र को सीबीआई ने बरी कर दिया।' पर अब वही सीबीआई चिदंबरम के उन मित्रों के खिलाफ चार्जशीट की इजाजत मांग रही है। तो सरकार इजाजत नहीं दे रही।

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