आयोग स्वरोजगार योजना बन गई थी लिब्रहान की

आप अरुण जेटली की दलीलों से न भी सहमत हों। तो भी आप कहे बिना नहीं रहेंगे- 'मजा आ गया।' लिब्रहान रपट पर जेटली का भाषण खत्म हुआ। तो उनके पास जाकर ऐसा कहने वालों की लाईन लग गई। सेंट्रल हाल में आए। तो राहुल बजाज तक ने बधाई दी। बीजेपी वालों ने तो दी ही। मुरली मनोहर जोशी ने भी सेंट्रल हाल में बधाई दी। जेटली का पूरा परिवार गैलरी में मौजूद था। अपन बीजेपी के तीन नेताओं की तुलना करें। तो जेटली पहले नंबर पर। सुषमा दूसरे नंबर पर। राजनाथ सिंह तीसरे नंबर पर रहे। पर बेनीप्रसाद वर्मा की 'नीच टिप्पणीं' पर मोर्चा राजनाथ ने ही संभाला। बुधवार को खुद पीएम मनमोहन सिंह ने माफी मांगी। तो इसका सेहरा राजनाथ के सिर ही। पर पीएम से माफी मंगवाकर भी जरा शर्मसार नहीं हुए बेनीप्रसाद। पुराने सोशलिस्ट ठहरे। पर आज बात लोकसभा की नहीं। बात राज्यसभा की। ऐसा नहीं जो झंडा अरुण जेटली ने ही गाड़ा। कोशिश अभिषेक मनु सिंघवी ने भी की। बोले- 'बीजेपी कहती है- ढांचा तोड़ने की कोई साजिश नहीं थी। वह तो अचानक हो गया। बीजेपी वाले समझते हैं- वे तो गेहूं खाते हैं, बाकी सारे घास खाते हैं।' पर वाजपेयी को लेकर कांग्रेस का कंफ्यूजन बरकरार रहा। लोकसभा में बेनीप्रसाद की नीच टिप्पणीं पर मनमोहन ने माफी मांगी। चिदंबरम ने माफी मांगी। सलमान खुर्शीद ने कहा- 'वाजपेयी का नाम रपट की त्रुटि।' पर अभिषेक मनु सिंघवी का पतनाला वहीं का वहीं रहा। बोले- 'वाजपेयी चाहें, तो अपने नाम को कोर्ट में चुनौती दें। पर आदमी की पहचान उसकी संगत से होती है।' अपन को इंद्रजीत गुप्त की टिप्पणीं याद आ गई। उनने एक बार कहा था- 'आदमी बहुत बढ़िया है, पर है गलत जगह पर।' पर रपट में वाजपेयी का नाम क्या आया। उनके चरित्र हनन की कोशिश शुरू हो गई। एक वामपंथी अखबार ने इतिहास का पोस्टमार्टम करते हुए लिखा- 'वाजपेयी ने गुजरात में दंगों के वक्त क्यों कहा था- किसने लगाई आग? पीएम रहते हुए भी उनका स्वयं सेवक जाग उठता था। उनने सितंबर 2000 में विहिप के सम्मेलन में खुद कहा- वह पहले स्वयं सेवक हैं। फिर प्रधानमंत्री। संसद में उनने राम मंदिर का निर्माण राष्ट्रीय भावना कहा था। वाजपेयी का मुखौटा उतर गया था।' लब्बोलुबाब- वाजपेयी सेक्युलरों के गले में हड्डी की तरह अटक गए हैं। पर बात अरुण जेटली की। उनने ऐसा क्या कहा। जो अपन तारीफ के पुल बांधने लगे। अपन जेटली की कटाक्ष क्षमता के कायल। सो उनके विरोधियों को भी तीर चुभाने वाले कटाक्ष सुनकर मजा आया। बोले- "रिपोर्ट किसी जज की लिखी लगती ही नहीं। इसका खुलासा खुद लिब्रहान ने आखिरी पेज पर कर दिया। उनने  लिखा- 'हरप्रीत सिंह ज्ञानी ने सबूतों का विश्लेषण किया। नतीजे पर पहुंचने में मदद की। रपट का संपादन किया। भाषा में जोड़ घटाओ किया। विचारों में जोड़-घटाव किया। बाकियों ने जो बंटाधार किया, उसे ठीक किया।' सही बात है इसके अलावा अगर कुछ किया, तो वह खुद जज ने। लिब्रहान-ज्ञानी रिपोर्ट जजमेंट का पहला आउटसोर्सिंग उदाहरण।" और जो अपन ने 24 नवंबर को लिखा था- 'लीक जरूर एचएस ज्ञानी ने की होगी।' सो बुधवार को जेटली ने भी इशारा ज्ञानी की ओर किया। पर बात जेटली के ठहाका लगाने वाले कटाक्षों की। बोले- 'जज दो किस्म के होते हैं। पहले वो जो कानून जानते हैं। दूसरे वो जो कानून मंत्री को जानते हैं। लिब्रहान दूसरी किस्म के जज थे। उनका अंग्रेजी में हाथ तंग था।' बाद में जेटली अपने साथ सेंट्रल में गप्पिया रहे थे। तो बोले- 'लिब्रहान गुजारे लायक अंग्रेजी ही जानते हैं। अंग्रेजी में वह हैंड टू माऊथ ही हैं।' बगल में बैठे मुरली मनोहर जोशी बोले- 'हम जब आयोग के सामने पेश हुए। तो वह दूसरे सवाल में अंग्रेजी छोड़ देते थे।' जेटली बोले- 'इसीलिए उनने रपट लिखने वाला ढूंढा। जो कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने दिया।' पर बात जेटली की चुटकियों की। तो उनने कहा- 'लिब्रहान के लिए आयोग स्वरोजगार योजना थी।' पर जाते-जाते बता दें। यों तो जेटली की छवि कट्टरवादी की नहीं। विचारधारा में वह वाजपेयी के करीब। पर असल में आडवाणी के करीब। सो आडवाणी-वाजपेयी का बचाव तो किया ही। सुषमा-राजनाथ से कहीं ज्यादा रामजन्म भूमि का 500 साल का इतिहास बताया। जो उन्हें दोनों से ज्यादा संघ के करीब ले जाएगा। बोले- 'सबूत पड़े हैं- आर्कोलाजी सर्वे आफ इंडिया के पास। सबूत पड़े हैं- जीपीआरएस डाटा में। सबूत पड़े हैं- सिख इतिहास में। गुरुनानक खुद गए थे 1508 में राम जन्मभूमि मंदिर में। जिसे बाद में बाबर ने मीर बाकी से तुड़वाकर ढांचा खड़ा करवाया।'

बिल्कुल सही लिखा आपने !

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मजा आया.

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