चिदंबरम बोले- आपने तोड़ी, सुषमा बोली- हां

सत्रह साल क्या कम थे। अब पिनाकी मिश्र ने मांग कर दी- 'एचएस ज्ञानी की रहनुमाई में लीक जांच आयोग बनाओ।' आयोग की रपट लीक हुई थी। तो अपन ने इसी 'ज्ञानी' पर ऊंगली उठाई थी। अब संसद में भी ज्ञानी की तरफ इशारा। अलबत्ता सुषमा स्वराज का तो आरोप- चिदंबरम ने ज्ञानी से ही मनमर्जी की रपट लिखाई। वह बोली- 'यह विकृत मानसिकता से लिखी अवसरवादी राजनीतिक रपट है। इसके निष्कर्ष अपने ही सबूतों के खिलाफ हैं। कहां है साजिश का सबूत।' रपट की खामियों का खुलासा जारी रहा। सुषमा ने जिन्ना की टिप्पणीं दीनदयाल उपाध्याय के मत्थे मढ़ने की खामी उजागर की। तो अनंत गीते ने ढांचा टूटते वक्त बाल ठाकरे की मौजूदगी की खामी बताई। यों तो लोकसभा में दूसरे दिन की बहस के हीरो सुषमा और चिदंबरम थे। पर नए-नए मुल्ला ने ऊंची बांग देकर माहौल खूब बिगाड़ा। कांग्रेस ने कुछ ऐसी रणनीति अपनाई। पहले दिन कार सेवक जगदम्बिका पाल। तो दूसरे दिन मुलायम का साथ छोड़कर आए बेनीप्रसाद वर्मा। जिनने लिब्रहान के 'लिटिल लीडर' का हिंदी में ऐसा अनुवाद किया। बवाल खड़ा हो गया। अटल, आडवाणी, जोशी को 'लिटिल' लिखने पर राजनाथ भड़के ही थे। बेनीप्रसाद आग में घी डालते हुए बोले- 'लिटिल का मतलब होता है- निम्न स्तर के लोग। अलबत्ता 'नीच' लोग।' पहली बार बोले। तो पत्ता भी नहीं हिला। अपन हैरान थे। पर बेनीप्रसाद फिर बोले। तो हो गया बवाल। स्पीकर की कुर्सी पर थे- फ्रांसिस्को सरदिनाह। गोवा के अंग्रेजी भाषी फ्रांसिस्को समझ नहीं पाए। मीरा कुमार होती तो हिंदी और भोजपुरी का यह शब्द जरूर समझती। आडवाणी-सुषमा मौजूद नहीं थे। बीजेपी के सांसद भी कम थे। राजनाथ सिंह जरूर बैठे थे। उनने सांसदों को हल्ले का इशारा किया। फिर तो बवाल हो गया। बवाल हुआ। तो बेनीप्रसाद के अंदर का सोशलिस्ट जाग गया। वह बार-बार 'नीच-नीच' दोहराने लगे। चिदंबरम दौड़ते हुए सदन में घुसे। आते ही खड़े होकर माफी मांग ली। फ्रांसिस्को ने भी बिना मतलब जाने रिकार्ड से निकाल दिया। यों जब सीधा प्रसारण हो रहा हो। तो रिकार्ड से निकालने का कोई मतलब नहीं रहता। अब यह पुराने जमाने की बात हो गई। पर स्पीकर लीक पीट रहे हैं। मामला वाजपेयी का था। सो राजनाथ अड़ गए बेनीप्रसाद की माफी पर। सदन ठप्प हो गया। दस मिनट बाद दुबारा शुरू हुआ। तो मीरा कुमार कुर्सी पर थी। सुषमा और अनंत भी आ गए। चेंबर में बात हो चुकी थी। बेनीप्रसाद ने माफी मांगनी थी। मामला शांत हो जाता। पर वह 'माफी' की जगह 'खेद' करके बैठ गए। तो बात नहीं बनी। शरद यादव और मुलायम ने भी समझाया। बताया- 'वाजपेयी बहुत बड़े नेता हैं। आपके शब्द भी मर्यादा के अनुकूल नहीं।' मीरा कुमार भी माफी मांगने का इशारा करती रही। पर बेनीप्रसाद थे- कि अड़ गए। लोकसभा फिर ठप्प हुई। चैंबर में फिर बात हुई। पर कांग्रेस को हल्ले में जवाब देना मुनासिब लगा। सो अबके स्पीकर की चेयर पीसी चाको ने संभाली। उधर मीरा कुमार चैंबर में समझाईश करती रही। इधर चाको ने चिदंबरम से जवाब शुरू करवा दिया। चिदंबरम संघ परिवार पर तीर चलाते रहे। संघ परिवारी नारे लगाते रहे। घंटा भर चिदंबरम बीजेपी को पानी पी-पीकर कोसते रहे। बीजेपी के सांसद घंटाभर बिना एक घूट पिए भड़ास निकालते रहे। चिदंबरम का रुख एटीआर जैसा लुंज-पुंज नहीं था। उनने रपट से ढूंढ-ढूंढकर संघ परिवार के खिलाफ सबूत सुनाए। मुस्लिम वोट बैंक की सरकारी लाईन पहले लीक हो चुकी थी। सो सुषमा ने भी कह दिया था- 'चिदंबरम जी, आपने लिब्रहान को क्या लालच देकर यह राजनीतिक रपट लिखाई है?' चिदंबरम भी जवाब में सुषमा पर हमलावर दिखे। बोले- 'सुषमा जी, आप कहती हैं साजिश नहीं थी। तो मस्जिद तोड़ने का सामान कैसे पहुंचा। मस्जिद ऊपर से नहीं। अंदर से छत में सुराख करके तोड़ी थी' उनने किसी भी सेक्युलर सांसद से ज्यादा हमले किए। संघ बीजेपी को एक ही सिक्के के दो पहलू बताया। कहा- 'संघ के प्रचारक परिवार के हर संगठन में होते हैं।' चिदंबरम की रणनीति साफ दिखी। उनने अपने जवाब में सिर्फ कल्याण सिंह को नहीं। आडवाणी, जेटली और सुषमा को भी घेरा। अब गुरुवार को राज्यसभा में निशाने पर जेटली भी होंगे। पर बीजेपी भी अब शर्मसार होने से उबर चुकी। राजनाथ ने सोमवार को कहा था- 'मंदिर था, मंदिर है, मंदिर रहेगा।' तो सुषमा दो कदम आगे बढ़कर बोली- 'आपको कौन सा जवाब चाहिए। क्या ढांचा टूटने का जवाब चाहिए। तो हां, कार सेवकों ने ढांचा तोड़ा। पर इसमें कोई साजिश नहीं थी। हम सजा भुगतने को तैयार हैं। संसद के अंदर भी,  बाहर भी। किंतु-परंतु न करो। समस्स्या को टालो मत। दोनों समुदायों से बैठकर बात करो।' सुषमा का अबके नेता विपक्ष बनना तय समझिए। संघ की लाइन अपनाते उनने कहा- 'हमलावरों के चिन्ह गर्व नहीं, शर्म के स्मारक होते हैं।'

हमलावरों के चिन्ह गर्व नहीं,

हमलावरों के चिन्ह गर्व नहीं, शर्म के स्मारक होते हैं।

सहमत.

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