आम आदमी रोटी को मोहताज पीएम बोले- कोठी खरीदिए

इसे कहते हैं- दिन में सपने दिखाना। पीएम दिन में ही बोल रहे थे। सो दिन में ही सपने दिखा रहे थे। मौका था जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण मिशन का सालाना समारोह। जमीन पर काम हुआ हो, न हुआ हो। समारोह से तो दिखेगा। पिछले चार साल में बिल्डरों की कमाई खूब हुई। मनमोहन सरकार ने 2005 में शुरू की थी यह योजना। तब से शहरों में जमीनों को आग लग चुकी। दिल्ली अब मिडिल क्लास के बूते में नहीं। दिल्ली की तो बात न पूछिए। बाकी शहरों की हालत भी अलग नहीं। आम आदमी की तो बात ही छोडिए। अब मिडिल क्लास भी छत का मोहताज। मनमोहन पीएम बने, तो एनसीआर में फ्लैट मिल जाता था- हजार रुपए स्केयर फुट के हिसाब। अब नसीब नहीं तीन हजार रुपए स्केयर फुट। यह है चार साल की शहरी नवीकरण योजना का नतीजा। 'आम आदमी' अब छत की नहीं सोच सकता। बिल्डरों की चांदी हो गई। अपन न्यूयार्क से आई खबर पढ़ रहे थे। लिखा था- चार साल में दिल्ली के कमर्शियल रेट तीगुने हो गए। अपन पिछले चार साल का हिसाब देने लगे। तो आप दांतों तले ऊंगली दबा लेंगे। आप तो इसी साल का हिसाब सुनिए। लोकसभा चुनावों से पहले दिल्ली दुनिया में 69वें नंबर पर थी। अक्टूबर में 65 वें नंबर पर आ चुकी। यानी बड़ी तेजी से दुनिया के महंगे शहरों में शुमार हो रही है दिल्ली। पता है अक्टूबर में कमर्शियल किराया रेट क्या था। एक स्केयर फुट का रेट 5721 रुपए। यही हाल किराए के मकानों का। दिल्ली में अब दो बैडरूम का मकान पंद्रह हजार में मिले। तो अपना नसीब अच्छा समझिए। सो नौकरी पेशा अब छोटे शहरों को तरजीह देने लगे। दिल्ली अब सिर्फ करोड़पतियों का स्वागत करेगी। या फिर झुग्गी-झोपड़ी वालों का। जो आम आदमी के नेताओं का वोट बैंक बनेगी। अपन शहरों के बदलते चेहरे की बात कर रहे। तो महंगाई की बात भी करते जाएं। अब गुरुवार सुबह ही जारी हो जाती है मुद्रास्फीति की दर। शाम तक इंतजार की जरूरत नहीं। तो सुना आपने- दाल, रोटी का क्या हाल हो गया। छत की बात करना तो बड़े सपने देखना होगा। महंगाई की दर भी 17.47 फीसदी हो गई। पिछले हफ्ते से सीधा दो फीसदी ज्यादा। इसी हफ्ते मनमोहन और प्रणव दा विकास दर की डींग हांक रहे थे। बुधवार को बड़े खुश थे- आखिरी तिमाही में 7.9 फीसदी हो गई। पर समझदार लोग जानते हैं- मुद्रास्फीति और विकास दर का संतुलन होना चाहिए। विकास सात और महंगाई सत्रह। यानी आमदनी चवन्नी, खर्चा रुपया। यह है आम आदमी की सरकार। अपन रोटी के मोहताज। पीएम बोले- मकान सोचिए। अपन फ्लैट के मोहताज। मनमोहन बोले- कोठी सोचिए। आपने शरद जोशी की वह कहानी तो पढ़ी होगी। जिसमें राजीव को इशारा करते हुए लिखा था- 'रोटी नहीं, तो ब्रेड खाइए।' मनमोहन बोल रहे थे शहरी नवीकरण योजना की चौथी सालगिरह समारोह में। बोले- 'शहरों का मौजूदा चेहरा तो देखने लायक भी नहीं। देश की आर्थिक प्रगति हो रही है। आधुनिकीकरण के मुकाबले शहरों का चेहरा बेढंगा। सरकार शहरों का चेहरा बदल डालेगी। चार साल में काफी तरक्की कर ली। पर इतने से कुछ नहीं होगा- बड़ा सोचिए। शहरी भारत का नक्शा बदल डालिए। हमने नेहरू नवीकरण मिशन शुरू किया था। अब हम झुग्गी-झोपड़ी वालों के लिए राजीव आवास योजना शुरू करेंगे।' अपन ने शुरू में बताया ही। जमीन पर काम नहीं हुआ। सिर्फ बिल्डरों का फायदा हुआ। जहां मनमोहन बड़ा सोचने की सीख दे रहे थे। वहीं पर जयपाल रेड्डी कह रहे थे- 'शहरी विकास के लिए पैसे की बेहद तंगी।' पहली योजना ने मिडिल क्लास का बाजा बजा दिया। अब दूसरी योजना पांच साल शहरों से झुग्गियां हटाने की। पर बात चली नेहरू और राजीव की। पहली योजना कोठी वालों के लिए थी। दूसरी वोट बैंक के लिए। मध्यम वर्ग बन गया सैंडविच। पर बात नेहरू से राजीव तक की चली। तो मायावती कैसे बुरी हुई। जो अंबेडकर-कांशी राम के साथ अपनी मूर्तियां लगा रही।

क्योंकि उन्हें रोटी के लिए ना

क्योंकि उन्हें रोटी के लिए ना तो पैसा खर्च करना होता है और ना ही रोटी बेलने की मशक्कत ...
कोठी खरीदने के लिए जरुर धन की जरुरत महसूस होती है ...आम जनता और जमीन से जुड़े लोगों के राजनीति में नहीं होने का खामियाजा तो जनता को भुगतना ही होगा ..!!

फ्रांस की क्रांति की चिंगारी

फ्रांस की क्रांति की चिंगारी भी लगभग इसी तरह सुलगी थी !

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