झेंप मिटाने को पी-3 बोला यह तो यूपीए का फैसला

सो संसद दूसरे दिन भी नहीं चली। चलनी भी नहीं थी। यही लिखा था अपन ने कल। कांग्रेस खाम ख्याली में थी। सोचा था- शुक्रवार को बुंदेलखंड के पैकेज पर राहुल को बधाई देंगे। खाम ख्याली की बात चली। तो एक किस्सा बताते जाएं। बात पिछले सेशन की। वीरप्पा मोइली लोधी गार्डन में घूम रहे थे। वहीं पर अरुण जेतली से मुलाकात हुई। तो बोले- 'आज जजों वाला बिल पास करवा दो।' जेतली बोले- 'बिल बोगस है, मैं तो पेश होने की स्टेज पर ही विरोध करूंगा।' जेतली की बात सुनकर मोइली बोले- 'वह तो कर लेनां। पर पास आज ही करवा देना।' आखिर बिल पेश होने की स्टेज पर ही वापस लेना पड़ा था। अब अध्यादेश का ठीकरा भी मोइली के सिर फूटने लगा। जिसे शुक्रवार को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला हुआ। अब जब सोमवार को गन्ना मूल्य नियंत्रण बिल पेश होगा। तो अध्यादेश की धारा 3 बी बिल में नहीं होगी। यही धारा किसान विरोधी थी। पवार कहते हैं- 'अध्यादेश का मजमून लॉ मिनिस्ट्री ने बनाया।' पर कांग्रेस खुद को पाक-साफ और किसानों का हमदर्द बताने पर आमादा। इसके लिए ठीकरा पवार के सिर फोड़ रही। पर कुछ कांग्रेसी भी दबी जुबान से मोइली की क्षमता पर सवाल उठा रहे। शुगर के अध्यादेश ने कानूनी कीड़े हंसराज भारद्वाज की याद दिला दी। वैसे वह भी रामसेतु के हलफनामे में बुरे फंसे थे। पर बात कांग्रेसी खामख्याली की। कांग्रेस के जुगाडू प्रणव-पृथ्वी-पवन (पी-3) सोचते थे- 'सोमवार को अध्यादेश का हल निकालेगें।' सो सोमवार को प्रणव दा की ब्रेक फास्ट मीटिंग रख दी। पर शुक्रवार को एक पल भी संसद नहीं चली। तो ऊपर से नीचे तक पसीने छूटे। तब तय हुआ- 'दोपहर दो बजे यूपीए मीटिंग हो। ढाई बजे सर्वदलीय।' सो प्रणव दा के कमरे में यूपीए की मीटिंग हुई। फैसला तो गुरुवार को संसद में हल्ले के बाद ही हो गया था। जब मनमोहन ने पवार, प्रणव, चिदंबरम से बात की थी। पर विपक्ष को श्रेय न मिले। सो यूपीए की मीटिंग बुलाई। फैसला हुआ- 'गन्ना कीमतों की पुरानी प्रणाली लागू रहे।' क्या थी पुरानी प्रणाली। जरा बता दें- केंद्र सरकार एमएसपी यानि न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती थी। पर राज्य सरकारें एसएपी यानि स्टेट एडवाइजरी प्राइस तय कर देती थी। जो हमेशा एमएसपी से ज्यादा होता ही था। सो चीनी मिलों को वहीं देना पड़ता। सो मिल मालिकों ने सुप्रीम कोर्ट में अलख जगाई। कहा- 'केंद्र लेवी चीनी की कीमतें तय करती है- एमएसपी के मुताबिक। पर मिलों को गन्ना खरीदना पडता है एसएपी के मुताबिक। सो लेवी चीनी की कीमत एसएपी के मुताबिक हो।' मिल मालिकों ने 1974 से हरजाना मांगा। सुप्रीम कोर्ट का फैसला उनके हक में हुआ। पच्चीस साल का बकाया निकला 14 हजार करोड़ रुपए। केंद्र सरकार के हाथ पांव फूले। तो आनन-फानन में आया यह अध्यादेश। जिसमें कहा गया- 'राज्य सरकार केंद्र से ज्यादा एसएपी दे। तो फर्क की अदायगी खुद करेगी।' राज्य सरकारों ने एसएपी ही बंद कर दिया। सो कुल मिलाकर अध्यादेश से मिल मालिकों का फायदा हुआ। किसानों का नुकसान। अध्यादेश 14 हजार करोड़ अदायगी से बचने का इलाज था। पर उससे बड़ी बीमारी गले पड़ गई। अध्यादेश के साईड इफेक्ट का सोचा ही नहीं। अपन जानकारी के लिए बता दें। अब गन्ने का न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं होगा। अलबत्ता एमएसपी की जगह उसका नाम होगा एफआरपी। तो अब यूपीए ने कान पकड़ लिए। सोमवार को ऐसा बिल आएगा। जिसका लब्बोलुआब होगा- 'पुरानी प्रणाली रहेगी। एसएपी ही मिलेगा किसानों को। अदायगी करनी पड़ेगी मिल मालिकों को।' बिल जब कानून बनेगा। तो लागू होगा- 1974 से। ताकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला अप्रभावी हो जाए। सुषमा स्वराज उस मीटिंग में थी। जिसमें फैसला हुआ। सुषमा ने नए बिल का समर्थन किया। यानि सोमवार को लोकसभा में पास हो जाएगा संशोधित बिल। सुषमा बोली- 'यह लोकतंत्र और किसानों के आंदोलन की जीत।' अजित सिंह को बड़ी सफलता मिली। सो बाग-ओ-बाग थे। राहुल को श्रेय देने की कोशिशों की खिल्ली उड़ाते बोले- 'यह कांग्रेस की पुरानी आदत। जीत है आंदोलनकारी किसानों की।' पर सर्वदलीय बैठक के पी-3 के प्रेस नोट ने सारा श्रेय यूपीए को दिया।

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