अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे

लौट के 'कल्याण' घर को आए। यह उस कहावत जैसा ही लगा। जिसे अपन आमतौर पर बोल-चाल में इस्तेमाल करते। बीजेपी वालों ने 'एप्रोच' शुरू भी कर दी। अब खरा हो, खोटा हो, है तो अपना ही। कहते हैं पूत कपूत हो जाते हैं, मापे कु-मापे नहीं होते। मुलायम को मुस्लिम वोटों की फिक्र। तो बीजेपी को कल्याण के भरोसे 'राम' रथ पर चढ़ने की उम्मीद। वैसे भी राजनाथ सिंह जा रहे हैं। तो कल्याण को लौटने में क्या हर्ज। राजनाथ जिद करके अशोक प्रधान को टिकट न देते। तो कल्याण सिंह छोड़कर जाते भी नहीं। अशोक प्रधान हार गए। कल्याण सिंह जीत गए। खैर अपन ने मुलायम-कल्याण की दोस्ती देखी। अब दुश्मनी भी देखेंगे। सोमवार को अमर सिंह का बड़बड़ शुरू भी हो गया। कुछ दिन पहले यही मुलायम अमर कह रहे थे- 'छोड़ेंगे न तेरा साथ, ओ साथी मरते दम तक।' पर राजनीति में कोई सगा नहीं होता। आज का दोस्त कल दुश्मन होगा। आज का दुश्मन कल दोस्त होगा। यही है राजनीति। पर राजनीति वह भी है जो अपन रांची और मुंबई में देख रहे। पहले बात रांची की। तो मधु कोड़ा की डायरी द्रोपदी की साड़ी हो गई। हवाला कांड तो याद होगा। जैन की डायरी में दर्जनों नेताओं के नाम थे। आडवाणी से लेकर बूटा सिंह तक। माधवराव सिंधिया से लेकर श्यामाचरण शुक्ल तक। मदनलाल खुराना से लेकर ए.आर. अंतुले तक। देवीलाल से लेकर राजेश पायलट तक। कुल 76 नेताओं के नाम थे। पर अदालत ने डायरी को सबूत नहीं माना। अब मधु कोड़ा की डायरी का जिक्र। तो उसमें लालू का नाम। मौजूदा और पूर्व केंद्रीय मंत्रियों का भी नाम। बिहार के एक पूर्व मुख्यमंत्री का भी जिक्र। पत्रकार से सांसद बने नेता का भी जिक्र। दिल्ली का कोई गोयल भी था। जो पैसा इधर से उधर करता था। गुजरात का कोई अतुल भाई भी था। जो सही जगह पर पैसा पहुंचाता था। आठ करोड़ लेने वाला दिल्ली का कोई हेमंत भी। मधु कोड़ा के कुकर्मों से कांग्रेस बचेगी कैसे। सो सोमवार को मनीष तिवारी से जवाब देते नहीं बना। अपन जानते हैं- डायरी से निकलना-निकलाना कुछ नहीं। पहले कौन सा किसी भ्रष्ट नेता का कुछ बिगड़ा। पर चुनाव के वक्त विपक्ष को तो मुद्दा मिला ही। सो अरुण जेतली सोमवार को उतने ही हमलावर थे। जितने मनीष तिवारी बचाव मुद्रा में। जेतली बोले- 'सरकार डायरी में लिखे नाम जगजाहिर करे।' उनने कहा- 'भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई संसद में भी लड़ी जाएगी। सड़कों पर भी।' पर अपन ने मुंबई की बात करने का भी वादा किया था। वैसे तो बाल ठाकरे खुद को चीता कहते नहीं थकते। पर अपन को शेर-चीते की नहीं। ऊंट की कहावत याद आ रही। 'मराठी' का सवाल उठा खूब फायदा उठाते रहे बाल ठाकरे। मराठी मानुष की दुहाई दे, जब बाल ठाकरे ने प्रतिभा ताई का समर्थन किया। तो बहुत खुश हुई थी कांग्रेस। पर शेर-चीते की सवारी आसान नहीं होती। उन्हीं बाल ठाकरे ने जब सचिन तेंदुलकर पर मराठी मानुष का दॉव चला। तो कांग्रेस को समझ आया। तेंदुलकर से पंगा लेकर बुरी तरह फंस गए बाल ठाकरे। सो अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे। न बीजेपी साथ दे रही। न आरएसएस। सारा देश सचिन तेंदुलकर के साथ। अलबता मराठी मानुष भी तेंदुलकर के साथ। कहते हैं न बुरे दिन आते हैं। तो गीदड़ शहर की ओर दौड़ता है। कुछ वही बाल ठाकरे ने किया। मनीष तिवारी कह रहे थे- 'सचिन तेंदुलकर की सुरक्षा का पक्का बंदोवस्त होगा।' सलमान खुर्शीद का डायलाग अपन को खूब पसंद आया। उनने कहा- 'तेंदुलकर ने बाल ठाकरे को आऊट कर दिया।' पर खुर्शीद से बढ़िया तो शशि थरुर ने टि्वटर पर लिखा। उनने लिखा- 'महाराष्ट्र मराठियों के लिए, कश्मीर कश्मीरियों के लिए। तो भारतीयों के लिए भारत कहां है।'