चीन से दो टूक बात के दो मौके अगले हफ्ते

भारत-चीन के शब्दबाण चरम पर। नवंबर में दलाईलामा तवांग जाएंगे। जा पाएंगे क्या? गए तो नवंबर में तनाव तेज होगा। यों अब नवंबर में वक्त भी क्या। दलाईलामा तवांग के रास्ते ही भारत में घुसे थे। ऐसा नहीं जो तवांग पहली बार जा रहे हों दलाईलामा। आठ-दस बार जा चुके। वाजपेयी के वक्त 2003 में भी गए थे। पर तब तनाव इतना नहीं हुआ। शब्दबाण भी इतने तीखे नहीं थे। अब तो जैसे जंग की तैयारी कर रहा चीन। इसकी वजह सिर्फ दलाईलामा नहीं। अपनी अमेरिका से बढ़ती दोस्ती भी। पर यह कैसी दोस्ती। अब्दुल कलाम के बाद अब शाहनवाज हुसैन का अपमान। शाहनवाज को वीजा देने से इनकार। अपन को सेक्युलरिज्म की नसीहत। खुद का चेहरा सांप्रदायिक। पर बात चीन से बढ़ते खतरों की। आप चीन की नेपाल में गतिविधियों पर नजर दौड़ाएं। म्यांमार की गतिविधियों पर नजर रखें। नेपाल में बढ़े दखल को भी देखें। पाकिस्तान की मदद का पैमाना देखें। तो अपने कान खड़े होने चाहिए। आंखें खुल जानी चाहिए। सबसे पहले बात नेपाल की। माओवादियों के जरिए नेपाल में घुस चुका चीन। भारत-नेपाल में कितने सुखद रिश्ते थे। बार्डर को हमेशा खुला रखा दोनों देशों ने। पासपोर्ट-वीजा भी नहीं लगाया। नेपाल की भारत नीति अब वैसी नहीं रही। चीन ने दस साल पहले रणनीति बनाई थी। राजशाही के खिलाफ माओवादी खड़े किए गए। राजशाही खत्म कर दी। माओवादियों की सत्ता पर पहुंचते ही नीति बदल गई। अब नेपाल की नब्ज पर चीन का हाथ। चीन की नई मंशा है- 'नेपाल अपनी सीमाएं सील करे। तिब्बती भारत से घुसकर नेपाल का इस्तेमाल कर रहे।' नेपाली सरकार चीन की मदद को तैयार। भारत के साथ अब रिश्ते वैसे नहीं। यह है वामपंथियों की मदद से पांच साल चली यूपीए सरकार का नतीजा। अब बात पाक की। तो पाक के कब्जे वाले कश्मीर में बांध। भारतीय पासपोर्ट वाले कश्मीरियों को कोरे कागज पर वीजा। अब ताजा खुलासा भी समझ लो। तिब्बत जाने वाले टूरिस्टों को जो मूल जानकारी मुहैया करा रहा। कागजों की उस किट में तिब्बत के बारे में लिखा है- 'तिब्बत की सीमाएं भारत, नेपाल, म्यांमार और कश्मीर से लगती हैं।' तो पीओके को पाक हिस्सा मानता है चीन। पर भारत के कंट्रोल वाले कश्मीर को अलग देश। यह है अपने तिब्बत को चीन का हिस्सा मानने का नतीजा। वाजपेयी ने भी तिब्बत को चीन का हिस्सा बताकर उतनी गलती की। जितनी जवाहर लाल नेहरू ने। वाजपेयी पहले कभी तिब्बत को चीन का हिस्सा नहीं मानते थे। पीएम बनकर बदल गए वाजपेयी भी। अपन तो पहले से इस बात को लिखते रहे। अब आरएसएस ने भी वाजपेयी को गलत माना। वाजपेयी ने चलो तिब्बत के बदले सिक्किम हासिल किया। पर नेहरू ने तो गंवाया ही गंवाया। पर बात अरुणाचल की। अरुणाचल को अपना हिस्सा मानता है चीन। अरुणाचल कभी भारत में नहीं रहा होगा। पर चीन में तो कभी नहीं था। चीन का तो तिब्बत भी कभी नहीं था। तिब्बत को हड़पकर अरुणाचल पर दावा ठोकता है चीन। पर अरुणाचल के लोग भारत के साथ। इस बार की 72 फीसदी वोटिंग सबूत। तो क्या कश्मीर को 'बारगेन' का मोहरा बना रहा है चीन। जैसे नेहरू दबे, जैसे वाजपेयी दबे। अपन को मनमोहन के दबने का भी अंदेशा। देखते हैं- सत्ताईस अक्टूबर को क्या होगा। जब अपने एसएम कृष्णा की मुलाकात यांग जिची से होगी। सताईस को है बेंगलुरु में रूस-चीन- भारत के विदेशमंत्रियों की मीटिंग। वहीं पर होगी दलाईलामा के दौरे पर बात भी। अपन को इंतजार मनमोहन-वेन जियाबाओ की मुलाकात का भी। अगले हफ्ते दोनों पीएम मिलेंगे थाइलैंड में। बर्फ पिघली, तो दलाईलामा का दौरा पड़ेगा खटाई में। अब अरुणाचल के चुनाव भी हो चुके। फिलहाल तो कृष्णा ने कहा- 'देश के किसी हिस्से में जा सकते हैं दलाईलामा।'

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट