मनमोहन कन्फ्यूजन से निकले तो अब चिदंबरम की बारी

बात अपने मनमोहन सिंह की। जिनने पीएम बनते ही 2005 में हवाना जाकर कहा- 'पाकिस्तान भी आतंकवाद का शिकार।' महाराजा रणजीत सिंह के बारे में मशहूर था। वह सबको एक नजर से देखते थे। उसी तरह मनमोहन सिंह ने भी आतंकवाद को एक ही नजर से देखा। भारत और पाक के आतंकवाद का फर्क नहीं समझे। भारत का आतंकवाद पाक की देन। आतंकवाद में पाक फौज और आईएसआई शामिल। पर पाक का आतंकवाद घरेलू अमेरिकापरस्ती के खिलाफ। पाक ने जिस तालिबान-अलकायदा को पाला पोसा। उसी को मारने में अमेरिका की मदद की। तो तालिबान-अलकायदा के निशाने पर आया पाक। माना, कूटनीति में अनाड़ी हैं मनमोहन सिंह। पर आतंकवाद को समझने में इतनी नादानी। किसी पीएम को तो शोभा नहीं देती। जरूर अमेरिकी दबाव का असर रहा होगा। मनमोहन आईएसआई की हिस्ट्री जान लेते। तो ऐसा बयान न देते। आईएसआई आतंकवाद के खिलाफ जंग में मददगार नहीं। अलबत्ता आतंकवाद का मददगार। वह आतंकवाद तालिबान का पाक में हो। या लश्कर-ए-तोयबा का भारत में। पर मनमोहन-मुशर्रफ का 2005 वाला बयान भूल भी जाएं। तो मुंबई पर आतंकी हमले के बाद मनमोहन ने क्या किया। इसी सोलह जुलाई को शर्म-अल-शेख में क्या कहा। गिलानी के साथ साझा बयान में पतनाला फिर वहीं का वहीं। आतंकवाद को फिर दोनों देशों की साझा समस्या बताया। वह तो सोनिया साझा बयान पर भड़क गई। तो मनमोहन को पाक से सख्ती करनी पड़ी। अब मनमोहन का ताजा बयान देखिए। मंगलवार को तीनों सेनाओं के प्रमुखों से मीटिंग में बोले- 'भारत पर मुंबई जैसे एक और हमले की आशंका।' यह अपनी खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट। मनमोहन हवाना और शर्म-अल-शेख के कन्फ्यूजन से निकलते दिखे। मुंबई हमले के वक्त दिया बयान दोहराया- 'काबुल हो या मुंबई। भारत के आतंकी वारदातों में पाक के 'स्टेट और नान स्टेट एक्टर' दोनों शामिल।' बस इसी बात पर कायम रहें मनमोहन। आतंकवाद पर बार-बार कन्फ्यूज होना छोड़ें। पीएम बने साढ़े पांच साल होने को। पर मच्योरिटी के मामले में सिर्फ मनमोहन को क्या कोसना। इस छलनी में तो सैकडों सुराख। मनमोहन सिंह ने हाल ही में कहा था- 'नक्सलवाद देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा।' पर अपने चिदंबरम नक्सलवाद पर कन्फ्यूज। मंगलवार को उसी मीटिंग में बोले। जिसमें तीनों सेना प्रमुखों के साथ पीएम थे। चिदंबरम बोले- 'नक्सलवाद को राजनीतिक दल की तरह ही समझें सुरक्षा बल।' यह बात सेना प्रमुखों को बता रहे हैं चिदंबरम। जिसका काम देश की हिफाजत करना। 'अंदरूनी और बाहरी' दोनों हमलों से। उस दिन केबिनेट ने वायुसेना को नक्सलियों पर फायरिंग की इजाजत नहीं दी। आज कहते हैं नक्सलियों को राजनीतिक दल समझें। आंध्र में 'बैन' हटाने का नुकसान देख चुकी सरकार। तब तो चलो लेफ्ट का असर रहा होगा। पर अब क्यों कन्फ्यूज है यूपीए सरकार। जरा नक्सलियों का इतिहास-लिटरेचर तो पढ़ लें चिदंबरम। अब सिर्फ बंगाल के सिलीगुड़ी जिले के नक्सलबाड़ी गांव का आंदोलन नहीं है यह। कानु सन्याल और नागभूषण पटनायक की फौज बहुत आगे बढ़ चुकी। इमरजेंसी के बाद नक्सली रिहा हुए। तभी तय हो गया था- वे लोकतंत्र का हिस्सा नहीं बनेंगे। बाकायदा मुकम्मल बहस हुई थी। बिहार में कुछ नक्सली लोकतंत्र का हिस्सा जरूर बने- सीपीआईएमएल। पर उसी बिहार में 'माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर' ने गुरिल्ला युध्द की राह पकड़ी। आंध्र में 'पीपुल वार ग्रुप' ने गुरिल्ला युध्द की राह पकड़ी। उड़ीसा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, यूपी निशाना तय हुए। इन्हीं छह राज्यों पर कब्जे से नागपुर पहुंचना तय हुआ। दिल्ली नहीं है नक्सलवादियों का निशाना। नागपुर से सत्ता पर कब्जे का लक्ष्य। देश के 220 जिलों में रेड कारिडोर बन चुका। चिदंबरम कहते हैं- 'राजनीतिक दल की तहर समझा जाए नक्सलियों को।' कोई दिन नहीं जाता। जब नक्सली किसी पुलिस थाने पर कब्जा न करें। मंगलवार को बंगाल के मिदनापुर का थाना बना निशाना। बता दें- अब बंदूक की नली से सत्ता वाले अलग-थलग नहीं। बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान, नेपाल के माओवादियों से तालमेल। जुलाई 2003 में इन देशों के नुमाइंदों की को-आर्डिनेशन कमेटी भी बन चुकी। पर कन्फ्यूजियाए हुए हैं चिदंबरम।

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