कौन से सुरखाब के पर लगे होते हैं अमेरिकी राष्ट्रपति को

तो नोबेल शांति पुरस्कार का ऐलान हो गया। लाटरी निकली बाराक ओबामा के नाम। यों किसी भारतीय को मिलने की अपन को उम्मीद नहीं थी। जो अपन तिलमिलाएं। पांच-सात साल पहले जरूर वाजपेयी को मिलने की उम्मीद थी। पर अपनी उम्मीदों पर पानी फिरा। वैसे भी जब महात्मा गांधी को शांति पुरस्कार नहीं मिला। तो वाजपेयी क्या चीज। वाजपेयी को तो अब 'भारत रत्न' की भी उम्मीद नहीं। इंदिरा गांधी ने खुद ही 'भारत रत्न' ले लिया था। इस साल जब वाजपेयी को 'भारत रत्न' की मांग उठी। तो अपन को फिजूल की मांग लगी। पर बात ना वाजपेयी की। ना भारत रत्न की। बात आज नोबेल पुरस्कार की। सालभर पहले क्या हैसियत थी बाराक ओबामा की। सालभर में भी उनने ऐसा क्या किया। जो नोबेल शांति पुरस्कार के हकदार हो गए। अश्वेत के अमेरिकी राष्ट्रपति चुने जाने पर पुरस्कार मिला हो। तो पुरस्कार के हकदार ओबामा नहीं। अलबत्ता अमेरिका की जनता। जिसने बाराक ओबामा को चुनकर फिराकदिली दिखाई। ओबामा के पांच पीढ़ी पहले पूर्वज गुलाम थे। सो ओबामा की तरक्की काबिल-ए-तारीफ। अमेरिकी सोच में फेर-बदल भी काबिल-ए-तारीफ। पर शांति पुरस्कार का पैमाना कुछ जंचा नहीं। ओबामा ने इराक से फौज भी वापस नहीं बुलाई। जो अपन बुश को अशांति फैलाने वाला। तो ओबामा को शांति का दूत मान लेते। अपन को यह समझ नहीं आया। अमेरिकी राष्ट्रपतियों को कौन से सुरखाब के पर लगे होते हैं। जो आसानी से नोबेल पुरस्कार के हकदार बन जाते हैं। पर महात्मा गांधी नहीं बनते। विनोबा भावे नहीं बनते। शांतिदूत कहलाने वाले गुटनिरपेक्ष कूटनीति के जनक नेहरू नहीं बनते। चलो, वाजपेयी को अपन हकदार न भी मानें। राजीव गांधी ने निरस्त्रीकरण में कोई कसर नहीं छोड़ी। फिर भी नोबेल शांति पुरस्कार के हकदार नहीं हुए। पर सौ साल में चार अमेरिकी राष्ट्रपति नोबेल ले गए। पहला नोबेल 1906 में अमेरिकी राष्ट्रपति थोडोर रूजवेल्ट को मिला। दूसरा 1919 में वुडरो विल्सन को मिला। तीसरा 2002 में जिमी कार्टर को मिला। अब बाराक ओबामा। क्या अपन इसी बात पर संतोष कर लें। नोबेल कमेटी के चेयरमैन ने 1989 को दलाईलामा को शांति पुरस्कार देते कहा- 'यह महात्मा गांधी को कमेटी की श्रध्दांजलि है।' वैसे गांधी का नाम लेकर मार्टिन लूथर किंग पुरस्कार ले गए। आंग सान सू की ले गई। नेल्सन मंडेला और फ्रेड्रिक विलियम डी क्लार्क ले गए। गांधी का नाम लेकर अब बाराक ओबामा भी ले गए। ऐसा नहीं, जो भारतीयों को नोबेल पुरस्कार न मिला हो। रविंद्र नाथ टैगोर, चंद्रशेखर वेंकटरमन, सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर, हरगोविन्द खुराना, अमृत्य सेन के बाद इस साल रामकृष्णन वेंकटरमन को भी नोबेल मिला। पर अपन को शांति का नोबेल कभी नहीं मिला। शांति-अध्यात्म के विश्व गुरु अपन। पर अपने देश से शांति का नोबेल मिला भी। तो यूरोपियन मदर टरेसा को। सेलेक्शन कमेटी के पक्षपात की तो हद हो गई। ब्रिटेन का बोलबाला था। तो चर्चिल को नोबेल शांति पुरस्कार। अमेरिका का बोलबाला है। तो बाराक ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार। अपन कोई फिजूल में चिल-पौं नहीं कर रहे। आप खुद ही देख लीजिए। नौ महीने पहले होता है नामांकन। अभी नौ महीने भी पूरे नहीं हुए बाराक ओबामा को राष्ट्रपति पद संभाले। यानी चुने जाते ही नामांकित हो गए थे बाराक ओबामा। बिना कोई काम किए। क्या बाराक ओबामा गांधी का नाम लेकर पुरस्कार के हकदार हो गए? ओबामा ने गांधी को अपना वास्तविक हीरो कहा था। हीरो को तो नोबेल का शांति पुरस्कार नहीं मिला। पर 'जीरो' काम पर शांति का नोबेल पुरस्कार ले गए ओबामा।

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