नेहरू-पटेल पर मोदी सोनिया में कहा-सुनी

दिनशा पटेल अपनी जिद्द पर अड़े न रह सके। सरदार पटेल मेमोरियल ट्रस्ट के फंक्शन में मोदी को बुलाना पड़ा। मोदी पहुंचे। तो फिर वही हुआ। जिसका दिनशा पटेल को अंदेशा था। यों मोदी न बुलाए जाते। तो कोई सोनिया को जवाब देने वाला न होता। यों फंक्शन तो ट्रस्ट का था। पर दिनशा पटेल चाहते थे- कांग्रेस का मुशायरा हो जाए। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील को बुलाया। गवर्नर एससी जमीर को बुलाया। पर बात सीएम की चली। तो बोले- 'यह तो प्राइवेट फंक्शन, सरकारी नहीं।' पर ना-ना करते न्योता दिया। तो कार्ड में सीएम का नाम नहीं छापा। चाहते थे सीएम का भाषण ही न हो। पर सोनिया गांधी का भाषण लिखा कर ले गए। सोनिया के भाषण ने ही मोदी को मसाला थमा दिया। मसाला, जो अब नेहरू-पटेल के रिश्तों को फिर उजागर करेगा। सोनिया ने अपने संदेश में लिखा- 'नेहरू और पटेल में कोई मतभेद नहीं थे। अगर कोई कहता है मतभेद थे। तो वह इतिहास को तोड- मरोड़कर पेश करता है।' सोनिया ने इतिहास को कितना पढ़ा। अपन नहीं जानते। पर अपन आपको इतिहास से रू-ब-रू कराते जाएं। सोनिया हैदराबाद के विलय का इतिहास पढ़ लेती। तो ऐसा नहीं लिखती। कश्मीर के फच्चर का इतिहास पढ़ लेतीं। तो ऐसे भाषण पर दस्तखत न करतीं। नेहरू की गलतियों पर पर्दा डालने से इतिहास नहीं बदलेगा। सरदार पटेल ने डीपी मिश्र को एक चिट्ठी लिखी। चिट्ठी का जिक्र डीपी मिश्र ने अपनी किताब - 'लिविंग इन ईरा' में किया। जिसमें उनने कश्मीर में नेहरू के दखल का जिक्र किया। रियासतों के विलय पर दोनों में मतभेद थे। मतभेद ही नहीं, अलबत्ता मनभेद भी थे।  मंत्रालयों में नेहरू के दखल से पटेल खफा थे। जिस पर दिसंबर 1947 में ही पटेल ने इस्तीफे का मन बना लिया। टकराव चरम पर था। तो छह जनवरी 1948 को नेहरू ने गांधी को लिखा- 'प्रधानमंत्री के नाते मेरी ज्यादा जिम्मेदारी। मैं सभी मंत्रालयों में दखल दे सकता हूं।' छह दिन बाद पटेल ने गांधी को लिखा- 'मुझे नेहरू का दखल मंजूर नहीं। इस तरह तो पीएम तानाशाह हो जाएगा।' बात नेहरू के पीएम बनने की। तो पंद्रह में से बारह क्षेत्रीय कांग्रेस कमेटियों ने पटेल को अध्यक्ष चुना था। सिर्फ तीन ने नेहरू को चुना। तय था- नया अध्यक्ष प्रधानमंत्री बनेगा। पर गांधी जानते थे नेहरू पटेल के तहत मंत्री नहीं बनेंगे। पर पटेल नेहरू के तहत बन जाएंगे। सो राष्ट्रीय कार्यकारिणी में उनने नेहरू का नाम पास करा लिया। बात यहां तक नहीं। पटेल जब होम मिनिस्टर बने। तो मतभेद बार-बार खुलकर सामने आए। नेहरू हैदराबाद-कश्मीर के विलय में अड़चन बने। तो पटेल को लगा- 'नेहरू सेक्युलरिम के लिए राष्ट्रहित की बलि दे देंगे।' पटेल ने गांधी से कहा- 'मुझे इस्तीफा देने की इजाजत दो। मैं नेहरू के साथ काम नहीं कर सकता।' गांधी ने उन्हें इस्तीफे से रोका। गांधी की हत्या पर गृहमंत्रालय के खिलाफ खबरें किसने उड़ाई। कौन नहीं जानता। इन खबरों से दुखी पटेल ने इस्तीफा दिया था। देश के पहले राष्ट्रपति को लेकर टकराव किसे नहीं मालूम। तिब्बत के मुद्दे पर नेहरू-पटेल के मतभेद भी इतिहास का हिस्सा। कौन नहीं जानता कांग्रेस अध्यक्ष को लेकर दोनों में टकराव हुआ। पटेल के उम्मीदवार थे पुरुषोत्तम दास टंडन। जिनने नेहरू के उम्मीदवार जीवत राम कृपलानी को हराया। पर सोनिया गांधी ने नया इतिहास बनाने की कोशिश की। तो नरेंद्र मोदी से नहीं रहा गया। उनने भी मन की बात कह दी। कह दिया- 'कश्मीर में कोई जवान आतंकियों की गोली से मरता है। तो शहीद की विधवा के अंदर से आवाज निकलती है- काश आज पटेल होते। तो कश्मीर में आतंकवाद नहीं होता।' वह इशारों में कह गए- कश्मीर समस्या नेहरू ने ही खड़ी की। नेहरू के पहला पीएम बनने पर भी बोले मोदी। कहा- 'देश का पहला पीएम कोई किसान का बेटा होता। तो किसानों को आज आत्महत्याएं नहीं करनी पड़ती।' पता है ना- किसान के बेटे थे सरदार पटेल। मोदी ने सोनिया के इतिहास का तो बाजा ही बजा दिया। जब उनने कहा- 'पटेल ने 1950 में नेहरू को चीन नीति बदलने की सलाह दी थी। पर नेहरू ने दरकिनार कर दी।' आरएसएस पर बैन को लेकर भी तो गहरे मतभेद थे नेहरू-पटेल में।

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