किसी के पास बेटी है तो किसी के पास मां

कलावती के घर रात बिताना आसान। पर जेएनयू में एक घंटा बिताना भी मुश्किल होगा। राहुल गांधी ने ऐसा सोचा नहीं था। जेएनयू के नौजवानों ने राहुल के छक्के छुड़ा दिए। पहले तो अंदर घुसते ही काले झंडों का सामना हुआ। पर तनाव में नहीं आए राहुल। पर जब सवालों का सिलसिला शुरू हुआ। तो पसीने छूट गए। सवाल हुआ- 'कार्पोरेट घरानों को सब्सिडी। पर हायर एजुकेशन के लिए पैसा नहीं?' राहुल को जवाब नहीं सूझा। वह बोले- 'लगता है आप वामपंथी विचारधारा को मानते हैं।' यह सच भी। जेएनयू पर शुरू से ही वामपंथियों का कब्जा। प्रकाश करात से लेकर सीताराम येचुरी तक जेएनयू की देन। पर बात राहुल के फंसने की। इस सवाल ने तो राहुल के बारह बजा दिए। शिक्षा के अधिकार पर अभी-अभी कानून बना। पर राहुल को इसके बारे में जानकारी नहीं थी। भ्रष्टाचार का सवाल ठीक उस समय हुआ। जब यूपीए सरकार ने कोर्ट में बोफोर्स घोटाले को दफनाने की दलील दी। सो राहुल का जवाब सूचना के अधिकार पर आकर टिक गया। तो राहुल को टिप्पणीं का सामना करना पड़ा। टिप्पणीं थी- 'राहुल भाई, आप असली राजनेता हैं। आप बोलते तो बहुत हैं। पर जवाब किसी भी बात का नहीं देते।' देखा कितना फर्क है कलावती के घर रात बिताने और पढ़े-लिखों के साथ घंटाभर बिताने में। पर हद तो तब हुई। जब एक सवाल हुआ- 'मिस्टर गांधी, मैं यहां आपसे मणिपुर की फर्जी मुठभेड़ों पर नहीं पूछूंगा। चौरासी के सिख विरोधी दंगों पर भी नहीं पूछूंगा। विदर्भ में मर रहे किसानों पर भी नहीं पूछूंगा। आप लोकतंत्र की बात करते हैं। कृपया मुझे बताइए आपको आखिर किसने नेता चुना?' वंशवाद पर इस तरह पूछा गया सवाल राहुल की जुबान पर ताला लगा गया। बुधवार को कांग्रेस असहज दिखी। पूछा, तो अभिषेक मनु सिंघवी बोले- 'जेएनयू में जो कुछ हुआ। उससे बुरा मानने की कोई बात नहीं। न कांग्रेस को बुरा लगा, न राहुल को।' जब युवा वोटर निशाना हों। तो जेएनयू छात्रों के खिलाफ बोलकर पंगा क्यों ले कांग्रेस। पर बात वंशवाद की चली। तो महाराष्ट्र-हरियाणा चुनावों के वंशवाद की बात हो जाए। पहले बात हरियाणा की। मायावती भजन लाल के बेटे कुलदीप बिश्नोई को प्रोजेक्ट करना मान लेती। तो गठबंधन न टूटता। बीजेपी बिश्नोई को प्रोजेक्ट करना मान लेती। तो गठबंधन हो जाता। यह है परिवारवाद का चस्का। भजनलाल पिछली बार सीएम नहीं बन पाए। तो कांग्रेस छोड दी थी। अब खुद सीएम बनने की ख्वाइश नहीं रही। सो बेटे को सीएम बनाने की कोशिश। पर महाराष्ट्र में शरद पवार ऐसी कोशिश नहीं कर रहे। पवार ने कांग्रेस के साथ अजीब-ओ-गरीब खेल शुरू कर दिया। पहले दिन वोटरों से बोले- 'अंतिम बार मौका दे दो।' अगले दिन बोले- 'अब युवा पीढ़ी का जमाना आ रहा। मुझे धीरे-धीरे रिटायर होना चाहिए।' तो क्या पवार का इरादा रिटायर होने का? नहीं, बेटी सुप्रिया सूले ने बताया- 'अभी तीन-चार साल तो नहीं।' तो क्या युवा पीढ़ी का जिक्र सुप्रिया सूले को सामने रखकर किया? फिर आखिरी बार मौके का क्या मतलब? यह बात अपन को तब समझ आने लगी। जब बुधवार को डीपी त्रिपाठी ने गांठ खोली। उनने कहा- 'इस बार 2004 नहीं दोहराया जाएगा। गठबंधन को बहुमत मिला। एनसीपी की सीटें ज्यादा हुई। तो मुख्यमंत्री एनसीपी का होगा।' यानी पवार आखिरी दौर में सीएम बनने का दांव चलेंगे। पवार ने अब पीएम बनने का सपना छोड़ ही दिया। पवार चाहते हैं- पिछली बार की तरह एनसीपी की सीटें ज्यादा आएं। तो वह खुद ही कमान संभाल लेंगे। फिर तीन-चार साल बाद युवा पीढ़ी। यानी सुप्रिया सूले। बात परिवारवाद की हो ही रही है। तो बताते जाएं- अमरावती में डा. सुनील देशमुख बागी उम्मीदवार हो चुके। राष्ट्रपति का बेटा राजेंद्र शेखावत मुश्किल में फंस चुका। तीन चौथाई कांग्रेस बागी के साथ जा चुकी। पर राजेंद्र शेखावत खुद को मुश्किल में नहीं मानते। आखिर अमरावती में हर किसी के मोबाइल पर एसएमएस है- 'मेरे पास मां है।' किसी के पास बेटी है, तो किसी के पास मां।

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