भ्रष्टाचार में सिर्फ बाबू धरे जाएंगे, कोई क्वात्रोची नहीं

संसद में घोटाला कबूल हो चुका। कबूल हो चुका- बोफोर्स तोपों की खरीद में दलाली हुई थी। पर कांग्रेस शुरू से पर्दा डाल रही थी। यही करना था एक दिन। यूपीए की पिछली सरकार ने क्वात्रोची की मदद की। क्वात्रोची के सील खाते खुलवाना शुरूआत थी। लेफ्ट की मदद से किया यह कांग्रेस ने। अब दूसरी बार सरकार बनी। तो बैसाखियां लेफ्ट से भी ज्यादा लाचार। सो सरकार ने तय कर लिया- ‘क्वात्रोची के खिलाफ मुकदमे हटा लिए जाएं।’ मंगलवार को कोर्ट में बता दिया। तीन अक्टूबर को मुकदमे हटा लेंगे। यह होना ही था। दलाली का आरोप विपक्ष का नहीं था। भारतीय मीडिया का भी नहीं। जिसका काम सरकार पर निगाह रखने का। दलाली का खुलासा किया था- स्विस रेडियो ने। चित्रा सुब्रह्मण्यम वह भारतीय पत्रकार थी। जिसने स्विटरलैंड और स्वीडन में पड़ताल की। तीन सौ से ज्यादा दस्तावेज हासिल किए। जिनसे साबित हुआ- ‘बोफोर्स तापों की खरीद-फरोख्त रिश्वत और दलाली से हुई।’ पर जिस अखबार में चित्रा थी। वह अखबार भी पलट गया। तो चित्रा को अखबार बदलना पडा। अब जब सरकार बोफोर्स दलाली पर हमेशा-हमेशा को पर्दा डालेगी। तो इनवेस्टिगेटिव जर्नलिम का एक युग खत्म हुआ। इनवेस्टिगेटिव जर्नलिम की हत्या समझिए आप। जांच में साफ था- वह दलाल ओतोवियो क्वात्रोची था। इटली का क्वात्रोची। बोफोर्स घोटाले ने 1989 में उन राजीव गांधी को हरा दिया। जो 1984 में रिकार्ड तोड़कर जीते थे। वीपी सिंह घर के भेदी थे। पीएम बने, तो उनने जांच शुरू की। पर वह अपनी सरकार बचाने में ज्यादा लगे रहे। चंद्रशेखर जांच करवाते ही कैसे। वह तो राजीव की मदद से पीएम बने। नरसिंह राव ने क्या करना था। जुलाई 1993 में स्विस कोर्ट ने दलाली के खातेदारों के नाम घोषित किए। तो नाम था- क्वात्रोची। सीबीआई क्वात्रोची को पकड़ने वाली ही थी। तभी 29 जुलाई की रात क्वात्रोची फरार हो गए। फिर मुड़कर भारत की तरफ नहीं देखा। देवगौड़ा की सरकार बनी। तो बोफोर्स पर फिर हरकत में आई सीबीआई। पर हरकत में आते ही सीताराम केसरी ने टांग खींच ली। वाजपेयी सरकार में दो उपलब्धियां हुई। सीबीआई ने 22 अक्टूबर 1999 में चार्जशीट दाखिल की। तो क्वात्रोची का नाम भी था। वाजपेयी सरकार को दूसरी सफलता जून 2003 में मिली। जब इंटरपोल ने क्वात्रोची के दो खाते खोज निकाले। खाता संख्या-5 ए 5151516 एम और 5 ए-5151516 एल। बीएसआई एजी बैंक लंदन में थे दोनों खाते। एक ओतोवियो क्वात्रोची के नाम। दूसरा पत्नी मारिया क्वात्रोची के नाम। चालीस लाख यूरो जमा थे दोनों खातों में। वेतनभोगी की इतनी बचत संभव नहीं। यानी आमदनी से ज्यादा बचत। ऐसे ही मुकदमे झेल रहे हैं अपने लालू, मुलायम, चौटाला, मायावती। यानी इनका भी कुछ नहीं बिगड़ना। पर बात क्वात्रोची के खातों की। वाजपेयी ने खाते सील करवा दिए। दलाली का पक्का सबूत थे खाते। पर मई 2004 के चुनावों ने हालात बदल दिए। दलाली का पर्दाफाश बंद हुआ। पर्दा डालना शुरू हुआ। यूपीए सरकार के लॉ मिनिस्टर थे हंसराज भारद्वाज। गुपचुप ढंग से क्वात्रोची के खाते यह कहकर खुलवा दिए- ‘सबूत नहीं मिला।’ खाता खुलते ही क्वात्रोची पैसा निकालकर रफू चक्कर हो गए। अपनी सुप्रीम कोर्ट ताकती रह गई। पर यूपीए सरकार के सामने दूसरी मुसीबत तब आई। जब क्वात्रोची को इंटरपोल ने अर्जेटीना में धर दबोचा। सीबीआई भारत लाने में कम जुटी थी। छुड़ाने में ज्यादा। सो जून 2007 में क्वात्रोची रिहा हुए। तो अर्जेटीना की कोर्ट ने कहा- ‘भारत ने कानूनी दस्तावेज भी पेश नहीं किए।’ अलबत्ता सीबीआई ने वहां कोर्ट में कहा- क्वात्रोची के खिलाफ केस पेंडिंग नहीं। यह कहकर रेड कार्नर वारंट भी रद्द करवा दिए। अदालत तब से सीबीआई से पूछ रही- ‘बिना रेड कार्नर वारंट क्वात्रोची को कैसे लाएगी भारत।’ सीबीआई हर तारीख पर वक्त मांग रही थी। अब सरकारी वकील ने कह दिया- ‘क्वात्रोची पर मुकदमा वापस लेगी सरकार।’ अपन कल ही पढ़ रहे थे- ‘सरकार भ्रष्टाचार रोकने का नया कानून बनाएगी। भ्रष्ट सरकारी बाबू की संपत्ति कुर्क होगी।’

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