तो बेबात का तूल लगा मनमोहन को

तीनों पड़ोसियों की शरारत भरी हरकतों पर सरकार की चुप्पी। शरारत सिर्फ चीन ने नहीं की। पाक और बांलादेश भी कम नहीं। अपन इन तीनों पर बात करेंगे। पर पहले बात कांग्रेस के 'सादगी मंत्र' की। 'सादगी मंत्र' का शिकार नए-नए खिलाड़ी शशि थरूर। पुराने कांग्रेसियों की आंख की किरकिरी तो थे ही थरूर। ऊपर से टिवटरबाजी। पुराने कांग्रेसियों को टिवटरबाजी समझ नहीं आती। पर थरूर से सीख अब मनमोहन भी टिवटर के शौकीन। वैसे टिवटर और फेसबुक अपनी राजनीति में फिट नहीं। सुधींद्र कुलकर्णी ने आडवाणी को सोशल नेटवर्किंग में खूब घुमाया। थरूर इससे ही सबक लेते। नेटवर्किंग में राजनीति का वही हश्र होना था। जो एनडीए का 2004 में 'इंडिया शाइनिंग' से हुआ। पर थरूर ने ऐसा क्या लिखा। जो राजनीतिबाजों के गले नहीं उतर रहा। अंग्रेजी में ऐसी भाषा नई बात नहीं। अपना हंसी-ठठ्ठा अलग। अंग्रेजी वालों का अलग। सो अंग्रेजी वाले थरूर की पीठ पर। उनकी दलील- 'अंग्रेजी का उपहास समझ नहीं आया हिंदी वालों को।' रिकार्ड के लिए अपन बताते जाएं। टिवटर पर थरूर से एक खबरची ने पूछा- 'क्या अगली बार आप कैटल क्लास पर केरल जाएंगे?' थरूर ने जवाब दिया- 'बिल्कुल, हमारी सभी पवित्र गऊओं से एकजुटता दिखाते हुए कैटल क्लास में ही।' यों इसका मतलब है- 'अगर यह कैटल क्लास है, तो मैं इसी में सफर करूंगा।' इसका मतलब है- 'मैं सभी के साथ हूं।' क्या इसका मतलब यह नहीं- 'इकनामी क्लास पर सफर करने वालों को उनने गऊओं जैसा पवित्र कहा।' पर नहीं, अपनी नकारात्मक सोचने की आदत। मीन मेख निकालने की आदत। सो बीजेपी, तो बीजेपी। कांग्रेस भी खफा। मुलायम का विरोध तो अपन को समझ भी आता। पर जयंती नटराजन। वह तो तमिलनाडु से। पर अपन को क्या। लड़ने दो बेबात पर कुत्ते-बिल्लियों की तरह। सीख जाएंगे धीरे-धीरे थरूर भी। राजनीति में नए-नए रंगरूट। इस बार तो मनमोहन बचा ही लेंगे। उनने इफ्तार पार्टी में कह ही दिया- 'थरूर की टिप्पणी पर बेवजह की तूल।' यों भी थरूर ने तो गुरुवार की रात अफसोस जाहिर कर ही दिया। उसी टिवटर पर लिखा- 'कैटल शब्द का इस्तेमाल पत्रकार ने किया था। इस पर बवाल की जानकारी मिली। यह बेतुका है, इसका मतलब इकनामी क्लास के यात्रियों का अपमान नहीं। अलबत्ता एयर लाइंस पर टिप्पणीं। जो अपन को भेड़-बकरियों की तरह ठूंस देते हैं। पर मुझे बताया गया- इसका मल्यालम में अनुवाद बहुत बुरा है। खास तौर पर तब, जब बिना संदर्भ में कहा जाए। सो अब मुझे अहसास है- मुझे यह नहीं समझना चाहिए था कि लोग इस हंसी-ठठ्ठे को समझ लेंगे। मुझे उन्हें मौका नहीं देना चाहिए था, जिनने मेरे शब्दों का रूप बिगाड़कर फायदा उठाया।'  अपन को याद आई एक ऐतिहासिक शरारती खबर। हू-ब-हू थरूर के साथ बीती जैसी। एक बार अमेरिका गए थे पोप। हवाई जहाज से उतरे ही थे। एक पत्रकार ने पूछा- 'क्या आप वेश्याओं के इलाके का भी दौरा करेंगे?' उनने कहा- 'क्या यहां रेड लाईट एरिया है।' पता है अगले दिन क्या लीड थी। लीड थी- 'पोप ने हवाई जहाज से उतरते ही रेड लाईट एरिया पूछा।' ऐसा ही हुआ थरूर के साथ। पर अब थरूर ने जो लिखा। उसका लब्बोलुबाब- 'बवाल मचाने वालों को हंसी-ठठ्ठा समझ नहीं आया।' फिर भी उनने एक तरह से अपनी गलती तो मान ली। टिवटर-फेसबुक पर बातें खालाजी का घर नहीं। उमर अब्दुल्ला ने भी की थी कोशिश। पर खरी-खरी टिप्पणीं आने लगी। तो गायब हो गए। आडवाणी भी सबक ले चुके। पर अपन बात कर रहे थे सीमाओं की। पाक फौज ने जम्मू कश्मीर सीमा पर गोलीबारी की। बांग्लादेश रेंजर्स मेघालय बार्डर के अंदर घुस आए। चीनी फौज लद्दाख सीमा में घुसकर पत्थरों पर चीन लिख गई। पर जिस इफ्तार में मनमोहन ने थरूर पर उठे बवाल को बेवजह तूल कहा। उसी इफ्तार में उनने चीनी घुसपैठ को भी बेवजह का तूल कहा। चीनी की पैरवी करते बोले- 'घुसपैठ के सबूत नहीं।'

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट