राजनीति में फातिया पढ़ने वाले जरा सोचें

चार विधानसभाओं के चुनाव सिर पर। अपन महाराष्ट्र, हरियाणा, अरुणाचल के साथ झारखंड भी जोड़ लें। झारखंड के करीब आधी सीटें खाली हो चुकी। अब छह महीने भी नहीं बचे बाकी कार्यकाल में। पर कांग्रेस नौ महीने से सस्पेंड करके बैठी है। बैठी है, वक्त के इंतजार में। दिन अच्छे आएं, तो चुनाव कराएं। अपन को अभिषेक मनु सिंघवी की त्योहारों की दलील खोखली तो लगी। पर चंडूखाने की ज्यादा लगी। त्योहार महाराष्ट्र- हरियाणा- अरुणाचल में भी मनाए जाएंगे। तो झारखंड में चुनाव क्यों नहीं? बीजेपी ने बुधवार को इलेक्शन कमीशन में गुहार लगाई। तो गुरुवार को राष्ट्रपति भवन में जाकर। यों इलेक्शन कमीशन चाहे। तो आज चुनाव का ऐलान कर दे। नियम मुताबिक छह महीने पहले कभी भी करवा सकता है चुनाव। हिमाचल में तीन महीने पहले करवा दिए थे। पर वह एन गोपालस्वामी थे। यह नवीन चावला। सो वह दिसंबर से पहले चुनाव नहीं कराएंगे। फिर भी ज्यादा दूर तो नहीं झारखंड का चुनाव। सो राजनीतिक दलों का असली इम्तिहान चारों नतीजों के बाद। यूपी, बिहार, गुजरात, उत्तराखंड, एमपी, दिल्ली के उपचुनावों में भले पिट गई। कांग्रेस को महाराष्ट्र- हरियाणा में लौट आने की उम्मीद। सो कांग्रेस का अधिवेशन चारों चुनावों के बाद होगा। तारीख तय हो गई। जगह नतीजे देखकर तय होगी। अधिवेशन होगा 28 दिसंबर को। हाथों हाथ महाधिवेशन की तारीख भी तय हो गई। वह होगा 28 दिसंबर 2010 को। जगह वक्त के मुताबिक तय होगी। पर पहले महाराष्ट्र की बात करते जाएं। अपन ने जो सोलह सितंबर को लिखा था। आखिर वही हुआ। अपन ने लिखा था-  'पवार की दस सीटें घटेंगी। तो पीठ में छुरा वह भी घोंपेंगे।' याद दिला दें- महाराष्ट्र में पिछली बार एनसीपी लड़ी थी 124 सीटों पर। गुरुवार को महाराष्ट्र की स्क्रीनिंग कमेटी प्रमुख वीरेंद्र सिंह ने बताया- 'एनसीपी 114, कांग्रेस 174 सीटों पर लड़ेगी।' यानी एनसीपी की दस सीटें घट गई। अब अपन को चुनाव में छुरा घोंपने का इंतजार। पर पहले नजर उपचुनावों के नतीजों पर। उपचुनावों के नतीजे उन लोगों के लिए सबक। जो लोकसभा चुनाव के नतीजे देख फातिए पढ़ रहे थे। कोई कह रहा था- बीजेपी खत्म। कोई कह रहा था- लालू-पासवान खत्म। गुजरात में मोदी ने सात में से पांच सीटें जीती। तो मोदी का फातिया पढ़ने वालों को मुंह छुपाना पड़ा। अब लालू-पासवान का फातिया पढ़ने वालों की बारी। बिहार में 18 सीटों पर उपचुनाव हुए। आठ सीटें तो लालू जीत गए। पासवान और नीतिश तीन-तीन सीटों से बराबरी पर छूटे। कांग्रेस को अकेले लड़ने का शोक चर्राया था। पर 18 में से जीती दो सीटें। बीजेपी तो एक सीट पर ही निपट गई। एक सीट तो बीएसपी ही ले गई। मायावती ने भी खाता खोल लिया बिहार में। पिछले महीने की बात ही लो। तमिलनाडु, यूपी, कर्नाटक, बंगाल की 18 सीटों पर चुनाव हुए। तो कांग्रेस को 18 में से चार ही मिली थी। वह भी तमिलनाडु में करुणानिधि के भरोसे। तो बंगाल में ममता के भरोसे। पर असल बात तो दिल्ली के उपचुनावों की। दो सीटों पर चुनाव हुए- द्वारका और ओखला। ओखला सीट खाली हुई  थी परवेज हाशमी के एमपी बनने पर। द्वारका सीट खाली हुई थी महाबल मिश्र के एमपी बनने पर। दोनों थी कांग्रेस की सीटें। ओखला में तो शीला दीक्षित ने भी खूब जोर लगाया। द्वारका को संभाल रखा था प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जेपी अग्रवाल ने। पर दोनों सीटों पर कांग्रेस निपट गई। द्वारका बीजेपी ले गई। ओखला आरजेडी ले गई। कांग्रेस के लिए फिक्र की बात। पर कांग्रेस उतनी फिक्रमंद नहीं लगी। जनार्दन द्विवेदी बोले- 'हम फिक्रमंद तो हैं। पर उपचुनावों को लोकप्रियता में गिरावट न समझें। हां, दिल्ली की हार चौंकाने वाली।' पर लब्बोलुबाब यह- राजनीति में किसी का फातिया पढ़ना अक्लमंदी नहीं होता।

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