करुणानिधि के बाद ममता ने दिखाई आंख

एनसीपी-कांग्रेस का गठबंधन कैसा होगा। होकर भी कैसा निभेगा। पवार की दस सीटें घटेंगी। तो पीठ में छुरा वह भी घोपेंगे। विलासराव-पवार का टकराव इस हद तक तो पहुंच ही चुका। सो अपन इंतजार करेंगे चुनावी भीतरघात का। फिलहाल बात करुणानिधि और ममता की। करुणानिधि भड़केंगे। यह अंदाज तो अपन को पहले से था। राहुल गांधी जब चेन्नई में थे। तो अपन ने 11 सितंबर को लिखा था- 'बात तमिलनाडु में राहुल के राजनीतिक कंकड़ फेंककर आने की। वह तीन दिन तमिलनाडु में रहे। पर करुणानिधि से मुलाकात नहीं की।' ऊपर से राहुल नदियां जोड़ने की मुखालफत कर आए। भले ही यूपीए ने वाजपेयी के इस एजेंडे को छोड़ दिया। पर रिकार्ड में नहीं छोड़ा। सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा था- 'सरकार नदियां जोड़ने के काम पर अमल करेगी।' पर राहुल नदियां जोड़ने की मुखालफत कर आए। दक्षिण में नदियों को जोड़ना अहम मुद्दा। करुणानिधि नदियां जोड़ने के कट्टर हिमायती। यों जरूरी नहीं था- करुणानिधि विरोध जताते। पर राहुल ने गुस्ताखी की। वह तीन दिन चेन्नई में रहे। फिर भी करुणानिधि से नहीं मिले। ऊपर से यूथ कांग्रेस की मीटिंग में कह आए- 'कब तक द्रविड़ पार्टियों की पीठ पर सवार रहोगे। पार्टी को फिर से खड़ा करो।' सो करुणानिधि का गुस्सा फूट पड़ा। उनने नदियां जोड़ने को मुद्दा बनाकर बयान ठोका। बोले- 'यूपीए एजेंडे से बाहर न जाएं राहुल।' पर यह तो शुरूआत भर। एसेंबली चुनाव आते-आते बहुत कुछ होगा। अभी दो साल बाकी। डीएमके की नाराजगी तब भी साफ झलकी। जब 'सादगी मंत्र' पर दयानिधि मारन ने एतराज किया। बात 'सादगी मंत्र' की चली। तो मंगलवार का ताजा किस्सा भी सुन लो। राहुल गांधी शताब्दी से लुधियाना गए। तो 'चेयर कार' की टिकट थी। एसपीजी से घिरे थे राहुल। सो सफर कर रहे 'आम आदमी' छह घंटे कैद में रहे। सुबह भी शाम को भी। राहुल एक्जीक्यूटिव क्लास में जाते। तो 450 रुपए ही ज्यादा लगते। पर 'आम आदमी' तो दहशत में न आते। अपन को वीपी सिंह का किस्सा याद। वीपी सिंह पीएम बने। तो उनने यही 'सादगी मंत्र' अपनाया। पर दो बार में ही आम यात्रियों की तकलीफ समझ आ गई। तो उनने चोंचलेबाजी छोड़ दी। सादगी हो, तो फिर जार्ज फर्नाडीस जैसी हो। उनने आज तक बिजनेस क्लास में सफर नहीं किया। कभी मंत्री रहते हुए भी नहीं। देने को अपन के पास ममता का भी उदाहरण। पर अपन देख रहे- ममता दिल्ली में कम। कोलकाता में ज्यादा। तभी तो पचास फीसदी केबिनेट मीटिंगों से नदारद रहीं। केबिनेट मीटिंगों की बात छोड़िए। दिल्ली से फाइलें रोज पहुंच रही कोलकाता। वह भी ट्रेन पर नहीं, विमान पर। सो यह चूना लगाने वाली सादगी। बात रेलमंत्री की चली। तो पुराने रेलमंत्री की बात। लालू ने सोनिया पर खूब चुटकी ली। बोले- 'सादगी हो, तो गांधी जैसी। जरा ट्रेन के थर्ड क्लास में सफर करके देखे सोनिया।' पर बात सोनिया की नहीं। पवार, करुणानिधि के बाद बात ममता की। आपको याद होगी वह 23 जुलाई की केबिनेट। जिसमें जमीनों के अधिग्रहण का मामला आया। सवाल था- 'औद्योगिक मकसद के लिए जमीन अधिग्रहण।' ममता सिंगूर-नंदीग्राम के रथ पर सवार होकर ही तो चमकी। सो वह ऐसा बिल क्यों पास करने देती। तू-तू, मैं-मैं न करके वाकआउट कर गई। पर बिल तो ममता की गैर मौजूदगी में मंजूर हो गया। केबिनेट ने मंजूरी तो दी। पर न मीडिया को बताया। न संसद पटल पर रखा। अब अचानक अपने सीपी जोशी को न जाने क्या सूझी। मंगलवार को खुलासा किया- 'बिल केबिनेट में मंजूर हो चुका।' संसद में पेश कब होगा? यह सवाल हुआ। तो बोले- 'पवन बंसल से पूछो।' पर बिल पेश करने देगी क्या ममता। अपन ने ममता से पूछा। तो वह भड़की- 'मुझे नहीं पता, बिल कब पास हुआ। पास हुआ, तो संसद में क्यों नहीं लाए?' तो यह ममता की मनमोहन को चुनौती। साथ उनने कह दिया- 'मेरी सोनिया से बात हो चुकी। सोनिया ने कहा- बिल नहीं आएगा।' यहीं पर चुप नहीं ममता। धमकी भी दे गई- 'मैं यूपीए की सबसे बड़ी पार्टनर। मेरी अनदेखी कर सकेगी कांग्रेस।'

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