शिंदे बने 'इकनामी क्लास' के पहले केबिनेट मंत्री
सुशील शिंदे से अपनी मुलाकात सत्रह साल पुरानी। जब वह कांग्रेस महासचिव हुआ करते थे। मध्यप्रदेश के प्रभारी थे शिंदे। उन दिनों कांग्रेस की ढपली आधी रात को बजती थी। नरसिंह राव दिनभर सरकारी काम निपटाते। रात को पार्टी की बारी आती। वह सात रेसकोर्स से लौटते। तो खबर की पुड़िया मिलती। कभी-कभी तो आधी रात को चाय पिलाकर लौटा देते। शिंदे जब आंध्र के गवर्नर थे। तो अपन कांग्रेस अधिवेशन के समय राजभवन में मिले। कांग्रेस के हैदराबाद अधिवेशन में ही चमके थे राहुल। जब वह मंच पर नहीं बैठे। डेलीगेटों के साथ नीचे बैठे। राहुल तब जमीन से जुड़े। तो जुड़ते ही चले गए। अपन राहुल-शिंदे की बात बाद में करेंगे। पहले हैदराबाद की बात। वाईएसआर को श्रध्दांजलि का प्रोग्राम था। सो सारे समर्थक शुक्रवार को दिल्ली छोड़ हैदराबाद पहुंच गए। दिल्ली में मनीष तिवारी आंध्र के सवालों पर घिरे रहे। तिवारी ने वही कहा। जिसका अंदाज अपन शुरू से लगा रहे। बोले- 'अभी तो वहां सीएम है। बदलेंगे, तो बताएंगे।' यानी सीएम का पद खाली कहां? जो जगनमोहन की दावेदारी पर सोचें। पर यह बात उतनी आसान भी नहीं। जितनी तिवारी ने बता दी। कांग्रेस का इरादा भावनाएं ठंडी होने तक लटकाने का। यों हाईकमान के नुमाइंदे ने अपन को नाम न लिखने की शर्त पर बताया। सो अपन नाम नहीं लिख रहे। उनने कहा- 'दबाव में जगन को सीएम नहीं बनाएगी सोनिया।' पर बात आंध्र में 'पावर की जंग' की चली। तो वह बोला- 'पावर के लिए तो देश का बंटवारा हो गया।' यानी नेहरू-जिन्ना में पावर की भूख ने बंटवारा करवाया। अरे, यही तो कहा है जसवंत सिंह ने। यानी जिन्ना ने नहीं, पावर की भूख ने बंटवारा करवाया। बात आंध्र की चली। तो अपन को आंध्र का ही एक किस्सा याद आया। टी अंजैया आंध्र के सीएम थे। राजीव गांधी कांग्रेस महासचिव। राजीव आंध्र गए। तो अंजैया हवाई अड्डे पर अगवानी को पहुंचे। इसी बात पर एनटीआर ने आंध्र गौरव का मुद्दा उठा दिया। कांग्रेस आंध्रप्रदेश में इसी मुद्दे पर लुढ़क गई। सो कांग्रेस के लिए जगनमोहन की अनदेखी आसान नहीं। पर अपन बात कर रहे थे राहुल और शिंदे की। सीडब्ल्यूसी में सोनिया ने सादगी का मंत्र फूंका। तो पहल राहुल गांधी ने की। उनने इकनामी क्लास पर हवाई सफर शुरू कर दिया। क्या अब सरकारी घर छोड़ मां के साथ रहने का भी इरादा। यह आदर्श चचेरे भाई वरुण ने कायम किया। सरकारी मकान की चिट्ठी आई। तो जवाब भेजा- 'मां का घर है ना, मां के आंचल में ही रहूंगा।' पर राहुल-वरुण के आदर्श से कांग्रेसियों की नींद हराम। सत्ता सुख न मिले। तो ऐसी सत्ता किस काम की। अपन ने कल केबिनेट मीटिंग का हाल बताया ही था। जहां 'फाइव स्टार'- 'इकनामी क्लास' पर पहला तीर पवार ने छोड़ा। प्रणव दा से बोले- 'तो क्या विदेशी डेलीगेशनों को फाइव स्टार में लंच-डीनर बंद?' प्रणव दा बोले- 'सम्मानजनक व्यवहार हो। पर फाइव स्टार से बचने की कोशिश हो।' तभी फारुख अब्दुल्ला ने सलीके से एतराज किया। बोले- 'मैं लंबा हूं, इकनामी क्लास में सफर नहीं कर सकता।' इस तरह हंसी का फव्वारा छूटना ही था। तो लंबे मंत्रियों के लिए 'सादगी' की अलग गाईड लाइन बने। पर दयानिधि मारन ने गंभीरता से एतराज किया। एक बार एतराज शुरू हुआ। तो कांग्रेस का खाता आनंद शर्मा ने खोला। कमलनाथ भी एतराज में शामिल हुए। आनंद शर्मा तो शुक्रवार को भी खफा दिखे। बोले- 'इंटरनेशनल फ्लाइटों पर 'इकनामी क्लास' ठीक नहीं। फौरन मीटिंगों में जाना पड़ता है। थकावट ही नहीं मिटेगी। इकनामी क्लास में भीड़ से भी पाला पड़ेगा।' भीड़ में जाना हर नेता के बस में नहीं। भीड़ में जाना कोई सोनिया-राहुल से सीखे। राहुल को तो इकनामी क्लास में मजा आने लगा। जनता से सीधे बात तो अब होगी। पर बात रह गई शिंदे की। राहुल इकनामी क्लास के पहले महासचिव बने। तो शिंदे इकनामी क्लास के पहले मंत्री। जिस केबिनेट में फैसला हुआ। उसमें नहीं थे। पर खबर मिली। तो शुक्रवार को मुंबई से वापसी की टिकट बदलवा ली। वह आज दिल्ली पहुंचेंगे इकनामी क्लास में बैठकर।
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