पवार को नहीं मंजूर सोनिया का सादगी मंत्र

पहले बात तमिल नेता मणिशंकर अय्यर की। कनाट प्लेस को राहुल चौक बनाने वाले। पर वीर सावरकर के कट्टर विरोधी। महाराष्ट्र के चुनाव न होते। तो छत्रपति शिवाजी का भी विरोध करते। यूपी में मायावती मूर्तिबाजी में मशगूल। तो महाराष्ट्र में कांग्रेस का एजेंडा शिवसेना में सेंध। इसीलिए तो चुनावों के वक्त शिवाजी का स्मारक बना। जैसे कांग्रेस का चुनावी हथियार गांधी। वैसे ही शिवसेना का चुनावी हथियार छत्रपति शिवाजी। मायावती का विरोधी कर रहे मणिशंकर फंस गए। मेघनाद देसाई ने सरकारी धन के दुरुपयोग की बात की। तो वह बात यूपी से लेकर महाराष्ट्र तक थी। बुरे फंसे मणिशंकर को कुछ नहीं सूझा। तो लंदन में चर्चिल की मूर्ति पर आ गए। मेघनाद ठहरे ब्रिटिश। सो वह अपनी भाषा पर आ गए। बोले- 'क्या नानसेंस बात कर रहे हैं आप। चर्चिल की मूर्ति सरकारी पैसे से नहीं लगी।' आपको पता ही होगा। मायावती-काशीराम की मूर्तियों का मामला सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस ले गई। कोर्ट ने सरकारी खर्चे पर मूर्तियों पर तकड़ी फटकार लगाई। पर मायावती का सवाल- 'कांग्रेस ने जो देशभर में गांधी-नेहरू-इंदिरा-राजीव की मूर्तियां लगाई। उसका क्या।' खैर आज बात मूर्तिबाजी की नहीं। बात तमिलनाडु में राहुल के राजनीतिक कंकड़ फेंककर आने की। वह तीन दिन तमिलनाडु में रहे। पर करुणानिधि से मुलाकात नहीं की। ऊपर से यूथ कांग्रेस की मीटिंग में कह आए- 'कब तक द्रविड़ पार्टियों की पीठ पर सवार रहोगे। पार्टी को फिर से खड़ा करो।' तो इसका मतलब हुआ- '2011 में अकेले एसेंबली चुनाव लड़ेगी कांग्रेस?' गुरुवार को राहुल से यह सवाल हुआ। तो बोले- 'कहां हो रहे हैं चुनाव।' यानी सवाल का जवाब नहीं दिया। पर क्या 2014 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ेगी कांग्रेस? इस सवाल से राहुल और मुश्किल में फंसे। राहुल हां में जवाब देते। तो डीएमके के कान तो खड़े होते ही। महाराष्ट्र में शरद पवार अभी से कन्नी काट लेते। पर बात महाराष्ट्र की ही हो जाए। शरद पवार तीन दिन से दिल्ली में थे। सोनिया ने गठबंधन पर बात के लिए नहीं बुलाया। इंतजार करते रहे पवार। आखिर गुरुवार की रात मुंबई लौट गए। पर जाने से पहले सोनिया को तेवर दिखा गए। केबिनेट मीटिंग में जब सोनिया के 'सादगी मंत्र' का सवाल उठा। तो पवार बिफर गए। उनने कहा- 'यह फैसला मंत्रियों पर छोड़ देना चाहिए।' बता दें- सोनिया ने पिछली सीडब्ल्यूसी में कहा- कांग्रेसी सादगी से रहा करें। इसी सादगी की भेंट चढ़े एसएम कृष्णा और शशि थरूर। पवन बंसल की रहनुमाई वाले संसदीय दल का विदेश दौरा भी टला। केबिनेट में मंत्रियों के इकनामी क्लास में सफर का मुद्दा उठा। तो सबसे पहले पवार भड़के। समर्थन कई कांग्रेसियों ने भी किया। पर पवार का अपना एजेंडा था। सोनिया के फरमान पर सवाल उठाना। पवार तो विरोध का कंकड़ फेंककर चले गए। पवार ने दिल्ली छोड़ी। तो कांग्रेस की कोर कमेटी में महाराष्ट्र की चर्चा हुई। अपन को नहीं लगता- कांग्रेस यूपी-बिहार की तरह अकेले लड़ने का रिस्क लेगी। पर कोर कमेटी में उससे ज्यादा चर्चा हुई आंध्र की। कोर कमेटी से पहले प्रणव दा आंध्र के सांसदों से मिल चुके थे। आंध्र के सांसद प्रणव दा ही नहीं। मोइली और दिग्गी राजा से भी मिले। उनने साफ-साफ कह दिया- 'जगनमोहन रेड्डी को सीएम बनाना ही कबूल। इससे नीचे नहीं।' यानी डिप्टी सीएम या केंद्र में स्टेट मिनिस्टर कबूल नहीं। सांसदों के तेवर देख प्रणव दा ने कह दिया- 'बहुमत का सम्मान किया जाएगा।' पर बहुमत तो जगन के पक्ष में। जगन के पक्ष में माहौल देख जयपाल रेड्डी मैदान छोड़ गए। वह बुधवार को सोनिया से कह आए- 'मैडम मैं सीएम बनकर नहीं जाना चाहता।' वैसे भी अपन बता दें- एक सर्वेक्षण हुआ है आंध्र में। जगनमोहन को मिले 78 फीसदी। रोसैया को तेरह फीसदी। जयपाल रेड्डी तो 2.9 फीसदी पर निपट गए।

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