अब झारखंड का नैतिक दबाव होगा कांग्रेस पर

तो चुनावी बुखार चढ़ने लगा। भले ही शरद पवार पूरी तैयारी कर रहे हों। पर गठबंधन टूटना नहीं। जनार्दन द्विवेदी बता रहे थे- 'बात जारी, गठबंधन होगा।' पवार की अकेले तैयारी का कारण भी बताते जाएं। उनके कान में किसी ने डाल दिया- 'कांग्रेस बात में उलझाकर रखेगी। आखिर में गठबंधन नहीं करेगी।' सो उनकी तैयारी दोनों तरह की। पवार का आंख-कान खोलकर चलना जायज। पर कांग्रेस दिग्गी-सत्यव्रत के कहने पर फैसला नहीं करेगी। अपन को कांग्रेस का एक जनरल सेक्रेट्री बता रहा था- 'महाराष्ट्र कोई यूपी-बिहार नहीं। जो अकेले लड़ लें। यूपी-बिहार में खोने को क्या था। महाराष्ट्र में तो खोने को सत्ता है। यों भी कांग्रेस-एनसीपी और शिवसेना-बीजेपी में टक्कर मुकाबले की। वोट बैंक में कोई ज्यादा फर्क नहीं दोनों गठबंधनों में।' अपन ने दो सितंबर को लिखा ही था- 'एंटी इनकंबेंसी कम नहीं। लोकसभा में तो राज ठाकरे ने फायदा पहुंचाया। कांग्रेस-राष्ट्रवादी गठबंधन न हुआ। तो राज ठाकरे भी क्या कर पाएंगे।' पर इस वक्त कांग्रेस का सिरदर्द महाराष्ट्र से ज्यादा आंध्र। सोनिया ने एक बार तो जगनमोहन रेड्डी को रोक लिया। पर विधायकों को भी ठंडा करना पड़ेगा। सो रास्ता ढूंढने की जिम्मेदारी तय हो गई। संकट मोचक प्रणव दा जाएंगे हैदराबाद। साथ होंगे दिग्गी राजा और वीरप्पा मोइली। दस-ग्यारह को तिकड़ी जाएगी हैदराबाद। आप कांग्रेस की शैली तो जानते ही होंगे। इरादा वही प्रस्ताव पास करवाने का। जो अब तक होता आया- 'विधायक दल ने सर्वसम्मत प्रस्ताव से फैसला सोनिया पर छोड़ा।' सो यह प्रस्ताव बगावत की आशंका खत्म कर देगा। एक बार प्रस्ताव हो गया। तो सब ठंडे। फिर सोनिया तय करेंगी- 'रोसैया ही बने रहें या किसी और को बागडोर सौंपी जाए।' यों अपना अनुमान रोसैया के बने रहने का। पर सोनिया का इरादा जगनमोहन को किनारे करना नहीं। केंद्र में स्टेट मिनिस्टर बनाने का। अभी सीएम बनाया। तो हाईकमान कमजोर दिखेगा। सो अब यही फार्मूला- ठंडा करके खाने की सलाह। पर अपन बात कर रहे थे चुनावों की। सो चलते-चलते हरियाणा की बात करते जाएं। चौटाला से रिश्ता तोड़ अब बीजेपी भजन लाल से दूसरी शादी को तैयार। सोमवार को पार्लियामेंट्री बोर्ड में यही तय हुआ। बात चौटाला की चली। तो बताते जाएं- इस बार चौटाला खुद लुढ़क जाएं। तो आप हैरान न होना। चौधरी वीरेंद्र सिंह खम ठोकेंगे चौटाला के सामने। वैसे वीरेंद्र सिंह से खतरा चौटाला को ही नहीं। भूपेंद्र सिंह हुड्डा को भी। तभी तो जुगाड़ से महाराष्ट्र की स्क्रीनिंग कमेटी का चेयरमैन बनवा दिया। ताकि टिकट बंटवारे के वक्त दूर ही रहें। बात हरियाणा की चल ही रही है। तो बता दें- राजनाथ सिंह ने रोहतक में राग जिन्ना क्यों अलापा। इसकी वजह है शरणार्थियों की दुखती रग पर हाथ रखना। हरियाणा में रोहतक, पानीपत, करनाल, कुरुक्षेत्र, अंबाला। जहां देखिए जिन्ना के सताए शरणार्थियों का डेरा। सो वोट बैंक पर नजर है राजनाथ की। जिन्ना का जिक्र आया। तो बता दें- जसवंत सिंह ने सोमवार को पीएसी की मीटिंग कर ली। बीजेपी के यशवंत, मुंडे, शांता तो नहीं आए। पर जेडीयू के एनके सिंह पहुंच गए। बीजेपी समझती थी नारायण केसरी मेंबर। सो केसरी को ही जाने से रोका। पर लिस्ट में केसरी की जगह अब एनके सिंह मेंबर। सो पार्लियामेंट्री बोर्ड में इसका भी जिक्र हुआ। पर अपन बात कर रहे थे चुनावों की। तो क्यों न झारखंड की बात भी कर डालें। यों तो चुनाव साथ ही होने चाहिए थे। नौ महीने से सस्पेंड है एसेंबली। कांग्रेस को पलड़ा भारी दिखता। तो हाथों-हाथ निपटाती। सो बीजेपी ने तय किया- 'इस्तीफे देकर दबाव बनाओ।' वैसे अपन बता दें- आडवाणी सहमत नहीं थे। सो सोमवार को संसदीय बोर्ड बैठा। तो तय हो गया- अब नौ सितंबर को होंगे इस्तीफे। बताते जाएं- सदन 82 का। सत्रह सीटें पहले से खाली। बाईस और खाली हुई। तो कांग्रेस पर नैतिक दबाव तो पड़ेगा ही। वैसे कांग्रेस की सेहत पर असर नहीं। अभिषेक बोले- 'राष्ट्रपति राज में हुए कामों से घबरा गई है बीजेपी।'

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